श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७५३
सर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७५३
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णस्तं प्राह वटुरूपधृक् । ज्ञात्वाऽर्जुनमुखात्सर्वं पूर्ववृत्तं पणादिकम् ॥ २६ ॥
उभाभ्यां यच्चचरितं पूर्वं तच्च मृषा गतम् ।
साक्षित्वेन बिना कर्म सत्यं मिथ्या न बुद्ध्यते ॥ २७ ॥
साक्षित्वेनाधुना मेऽत्र युवाभ्यां कर्म पूर्ववत् ।
कर्त्तव्यं तदहं दृष्ट्वा सत्यं मिथ्या वदाम्यहम् ॥ २८ ॥
तद्वटोर्वचनं श्रुत्वा द्वावूचतुस्तथेति च । ततश्चकार गांडीवी शरसेतुं हि पूर्ववत् ॥ २९ ॥
सेतोरन्तर्गतं चक्रं श्रीकृष्णश्चाकरोत्तदा ।
ततः स्वांगुष्ठभारेण कपिः सेतुं प्रपीडयन् ॥ ३० ॥
सेतुं दृढं कपिर्ज्ञात्वा पादजानुकरादिभिः ।
बलेन पीडयामास स सेतुर्नैश्चचाल न ॥ ३१ ॥
तदा तूष्णीं हनूमांस्तं मंत्रयामास चेतसि । पूर्वं मयांगुष्ठमात्रत्सेतुश्चाधो विलोपितः ॥ ३२ ॥
हस्तादिभिः कृत नायमिदानीं न विलुप्यते ।
कारणं वटुरेवात्र वटुर्नायं हरिस्स्वयम् ॥ ३३ ॥
अस्तीत्यहं विजानामि स्मृतं पूर्ववरादिकम् ।
मद्गर्वपरिहारोऽद्य कृष्णेनानेन कर्मणा ॥ ३४ ॥
कृतोऽस्त्यत्र क्व कृष्णाये मन्मर्कटमुखोद्भवम् । इति निश्चित्य मनसि कपिः सोऽर्जुनमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
जितं त्वया वटोर्योगात्तत्र साहाय्यमाचरे ।
नायं वटुस्त्वयं कृष्णः सेतुचक्रमवेशकृत् ॥ ३६ ॥
स्वन्माहात्म्यार्थमत्रायातः सत्यं ज्ञातो मयाऽर्जुन ।
अनेन रामरूपेण त्रेतायां मे वरोऽर्पितः ॥ ३७ ॥
समुद्रके तटपर ही चिता तैयार की और हनुमान्जीके रोकनेपर भी वे उसमें कूदनेको उद्यत हो गये ॥ २५ ॥ इसी समय एक ब्रह्मचारीका रूप धारण करके श्रीकृष्णचन्द्रजी वहाँ आये ओर उन्होंने अर्जुनसे चितामें कूदनेका कारण पूछा । अर्जुनके मुखसे ही सब बात मालूम करके कहा कि तुम लोगोंने उस समय जो बाजी लगायी थी, वह निःसार थी । क्योंकि उस समय तुम्हारी बातोंका कोई साक्षी नहीं था । साक्षीके बिना सच झूठका कोई ठिकाना नहीं रहता । इस समय में तुम्हारे समग्र साक्षीके रूपमें विद्यमान हूँ । अब तुम लोग फिर पहले-की तरह कार्य करो तो मैं तुम्हारे कर्मोंको देखकर विजयपराजयका निर्णय करूँगा ॥ २६-२८ ॥ ब्रह्मचारीकी बात सुनकर दोनोंने कहा-ठीक है और फिर अर्जुनने पूर्ववत् सेतुकी रचना की २९। अबकी बार सेतुके नीचे कृष्णचन्द्रजीने अपना सुदर्शन चक्र लगा दिया । सेतु तैयार होनेपर हनुमान्जी पूर्ववत् अपने अंगूठेके भारसे उसे डुबाने लगे ॥ ३० ॥ जब हनुमान्जीने अबकी बार सेतुको मजबूत देखा तो पैरों, घुटनों तथा हाथोंके बलसे उसे दबाया, किन्तु वह जौ भर भी नहीं डूबा । ३१ ॥ चुपचाप हनुमान्जीने सोचा कि पहले तो मैंने अंगूठेके ही बोझसे सेतुको डुबा दिया था तो फिर यह हाथ-पैर आदि मेरे पूरे शरीरके बोझसे भी क्यों नहीं डूबता। इसमें ये ब्रह्मचारीजी ही कारण हैं। ये ब्राह्मण नहीं, बल्कि साक्षात् कृष्णचन्द्रजी ही हैं और मेरे गर्वका परिहार करनेके लिए ही इन्होंने ऐसा किया है। वास्तवमे है भी ऐसा ही । भला, इन भगवान्के सामने हम जैसे बानरकी सामर्थ्य ही क्या है । ऐसा निश्चय करके हनुमान्जीने अर्जुनसे कहा कि आपने इन ब्रह्मचारीकी सहायतासे मुझे परास्त कर दिया है। ये कोई वटु नहीं, साक्षात् भगवान् हैं। इन्होंने सेतुके नीचे अपना सुदर्शन चक्र लगा दिया है ॥३२-३६॥ हे अर्जुन ! मुझे यह बात मालूम हो गयी है कि ये आपकी
७५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १८
दास्यामि दर्शनं तेऽहं द्वापरे कृष्णरूपधृक् । तत्सत्यं वचनं चाद्य कृतं त्वत्सेतुहेतुतः ॥३८॥
इत्यर्जुनं कपिर्यद्वदत्यीक्षात्तदग्रतः ।
बटुर्देवाभवत्कृष्णः पीतवासा घनप्रभः ॥३९॥
तद्दर्शनोर्ध्वरोमाऽभूत्प्रणनामाञ्जनीसुतः ।
आलिङ्गितोऽपि कृष्णेन स मेने कृतकृत्यताम् ॥४०॥
चक्रं ययौ यथास्थानं श्रीकृष्णस्याज्ञया तदा । सागरेण स्वकल्लोलैः शरसेतुर्विलोपितः ॥४१॥
तदार्जुनो गर्वहीनो मेने कृष्णेन जीवितः ।
कृष्णस्तदाऽर्जुनं प्राह त्वया रामेण स्पर्द्धितम् ॥४२॥
हनूमता धनुर्विद्या तवातोऽत्र मृषा कृता ।
यत्प्रतापादिति शिरा न्न्याऽपि वायुनन्दनः । ४३।
रामेण स्पर्द्धितं यस्मात्तस्मादर्जुन संजितः । अतः परं वीतगर्वस्त्वं मां भज निरन्तरम् ॥४४॥
इत्युक्त्वा मारुतिं पृष्ट्वाऽर्जुनेन तत्पुरं ययौ ।
अतः कपिध्वजश्चेति जनैरर्जुन ईर्यते ॥४५॥
इति भाविकथा पृष्टा त्वया साऽपि मयोदिता ।
किमग्रे श्रोतुकामोऽसि संपृच्छस्व वदामि ते ॥४६॥
विष्णुदास उवाच
गुरोऽधुना राघवस्य वैकुण्ठारोहणोत्सवम् ।
मां वदस्व सविस्तारं येनाहं तोषमाप्नुयाम् ॥४७॥
श्रीरामदास उवाच
पूर्णकांडं त्वावाद्याहं वदिष्यामि शृणुष्व तत् ।
सहायताके लिए ही यहाँ आये हैं। यही रूप धारण करके त्रेतामें रामने हमें वरदान दिया था कि द्वापरके अन्तमें मैं तुम्हें कृष्णरूपसे दर्शन दूंगा। आपके सेतुके बहाने इन्होंने अपना वरदान भी आज पूरा कर दिया ॥३७॥ ३८। हनुमानजी अर्जुनसे ऐसा कह ही रहे थे कि इतनेमें भगवान् अपने बटुरूपको त्यागकर कृष्ण बन गये। उस समय वे पीले वस्त्र पहने थे और नवनीरदके समान उनका श्याम शरीर था। उस कृष्णचन्द्रजीका दर्शन करते ही हनुमान्जीके रोंगटे खड़े हो गये और उन्होंने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। जब श्रीकृष्णने हनुमान्जीको उठाकर अपने हृदयसे लगाया, तब हनुमान्जीने अपनेको कृतकृत्य मान लिया ॥३९॥४०॥ श्रीकृष्णके आज्ञानुसार चक्र सेतुसे निकलकर अपने स्थानको चला गया और अर्जुनका बनाया सेतु भी समुद्रकी तरंगोंमें लुप्त हो गया ॥४१॥ इस तरह अर्जुनका गर्व नष्ट हो गया और उन्होंने समझा कि कृष्णने हमें जीवित रख लिया। कुछ देर बाद श्रीकृष्णजीने अर्जुनसे कहा कि तुमने रामके साथ स्पर्धा की थी। इसलिए हनुमान्जीने तुम्हारी धनुर्विद्याको व्यर्थ कर दिया था! इसी प्रकार हे पवनसुत! तुमने भी रामसे स्पर्धा की थी। इसी कारण तुम अर्जुनसे परास्त हुए। तुम्हारा गर्व नष्ट हो गया। अब भ्रातृत्वके साथ मेरा भजन करो। ऐसा कह और हनुमान्जीसे पूछकर श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ हस्तिनापुर चले गये। हे शिष्य, इसी कारण अर्जुन कपिध्वज कहे जाते हैं ॥४२-४५॥ यद्यपि तुमने हमसे यह भविष्यकी कथा पूछी थी, फिर भी मैंने कह सुनाया। अब आगे क्या सुनना चाहते हो सो बताओ। मैं तुमको सुनाऊँ ॥४६॥ विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! अब मैं रामचन्द्रजीके वैकुण्ठारोहणका वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ। सो आप विस्तारपूर्वक हमें बताइए, जिससे हमारे हृदयको सन्तोष हो। श्रीरामदासने कहा—माने मैं तुमसे पूर्णकांड कहनेवाला हूँ। उसमें भगवानके वैकुण्ठारोहणका वृत्तांत तुम्हे अच्छी तरह सुननेको मिलेगा ॥४७॥
सर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७५५
यस्मिंश्च रामचन्द्रस्य वैकुण्ठारोहणोत्सवम् ॥४८॥
इदं मनोहरं काण्डं मया ते समुदीरितम् ।
ये शृण्वंति नरा भूम्यां तेषां रामे रतिर्भवेत् ॥४९॥
मनोऽभिलषितान् कामांस्ते लभन्ते न संशयः ।
पुत्रार्थी प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥५०॥
इदं रम्यं पवित्रं च श्रवणान्मंगलप्रदम् ।
पठनीयं प्रयत्नेन रामसद्भक्तिवर्धनम् ॥५१॥
आनन्दरामायणमध्यसंस्थ मनोहरं काण्डमिदं विचित्रम् ।
पठंति शृण्वंति गृणन्ति मर्त्यास्ते स्वीयकामानखिलान् लभंते ॥५२॥
इदं पवित्रं परमं विचित्रं नानाचरित्रं त्वतिपुण्यदं च ।
सदा नरैः श्राव्यमिदं मुदा श्रीसीतापतेर्भक्तिविवृद्धिकारि ॥५३॥
इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतं श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे रामदासविष्णुदाससंवादे हनूमता शरसेतुभंगो नाम अष्टादश सर्गः ॥ १८ ॥
मनोहरकांडे सर्गा आनन्दरामायणेऽष्टादश ज्ञातव्याः ।
एकत्रिंशच्छताः श्लोका रामदासमुनिना पापनुदः प्रोक्ताः ॥ १ ॥
अथ मनोहरकांडे प्रकरणानुक्रमः ।
लघुरामायणम् ॥ १०४ ॥ वैकुण्ठारोहणम् ॥ १५५ ॥ रामपूजा ॥ २७५ ॥ लघुरामतोभद्रम् ॥३०९॥ रामलिंगतोभद्रम् ॥३७७॥ नवमीव्रतम् ॥२४१॥ रामनवम्युद्यापनम् ॥ १३२ ॥ वेदादिकाव्यपूजा ॥१२७। विशेषकालपूजा ॥ १९३ ॥ चैत्रमहिमावर्णनम् ॥ १६७ ॥ पिशाचमुक्तिः
॥ ४८ ॥ मैंने तुम्हें यह मनोहरकांड सुनाया है। जो लोग इस कांडको सुनते हैं, उन्हें रामचन्द्रजीकी भक्ति प्राप्त होती है ॥ ४९ ॥ वे अपना मनोऽभिलषित फल प्राप्त कर लेते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है। इसको सुननेवाला यदि पुत्र चाहता हो तो पुत्र और धनार्थी धन पाता है ॥ ५० ॥ यह कांड बड़ा रम्य, पवित्र और सुननेसे मङ्गलदायक है। इसलिए लोगोंको प्रयत्न करके इसका पाठ करना चाहिए। इसके पाठसे रामके चरणोंमें भक्ति बढ़ती है ॥ ५१ ॥ आनन्दरामायणके अन्तर्गत यह मनोहरकांड बड़ा विचित्र है। जो लोग इसका पठन-श्रवण तथा मनन करते हैं, वे अपनी सारी कामनायें पूर्ण कर लेते हैं ॥ ५२ ॥ यह कांड परम पवित्र, विचित्र, भगवान्के विविध चरित्रोंसे भरा हुआ और अतिशय पुण्यदायक है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि रामकी भक्ति बढ़ानेवाले इस मनोहरकांडका अवश्य श्रवण करें ॥ ५३ ॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे अष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥
इस मनोहरकाण्डमें कुल अठारह सर्ग हैं और इसमें रामदास मुनिने पापनाशकारी एकतीस सौ श्लोक कहे हैं। १ ॥ मनोहरकांडका प्रकरणानुक्रम—लघुरामायणमें १०४ श्लोक, वैकुण्ठारोहणमें १५५, रामपूजामें २७५, लघुरामतोभद्रमें ३०९, रामलिंगतोभद्रमें ३७७, नवमीव्रतमें २४१ रामनवमीउद्यापनमें १३२,
| ४६६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १८ |
|---|
। २६६। अद्वैतवर्णनम् ॥ १०७ ॥ कवचद्वयम् ॥ ८८ । सीताकवचम् । १०३ ॥ लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्नकवचानि ॥ १८४ ॥ हनुमत्पताकारोपणम् । ६५॥ साररामायणम् । १५२ ॥ शरसेतुभङ्गः ॥ ५३ ॥ इति प्रकरणानि । एवं मिलित्वा मनोहरकांडे श्लोकसंख्या ॥३१००॥ इयं मंत्रवृत्तादिरहिता संख्याऽस्ति ।
वेदादिकाव्यपूजामें १२७, द्विषोषकालकी पूजामें १९३, चैत्रमहिमात्रर्णनमें १६७, पिशाचमुक्तिमें २६६, अद्वैतवर्णनमें १०७, हनुमत्कवच तथा रामकवचमें ८८, सीताकवचमें १०३, लक्ष्मण भरत तथा शत्रुघ्नकवचमें १८४, हनुमत्पताकारोपणमें ६५, साररामायणमें १५२ और शरसेतुभङ्गमें ५३ श्लोक कहे गये हैं और ये ही १८ प्रकरण वर्णित हैं। सब मिलाकर ३१०० श्लोक इस काण्डमें हैं। किन्तु यह संख्या मन्त्र और वृत्त आदिकी संख्या छोड़कर बतायी है।
<br>॥ इति आनन्दरामायणे मनोहरकाण्डं समाप्तम् ॥
<br>श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु ।
श्रीसीतापतये नमः
श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-
आनन्दरामायणम्
'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्
पूर्णकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
( सोमवंशी राजाओंकी कथाका विस्तार )
श्रीरामदास उवाच
अथ शासति राजेन्द्र रामे सीताभिरञ्जिते । समायामेकदा दूत. सुवेगश्च गजाद्वयात् ॥ १ ॥
सभास्थं स विक्लवो रामं नत्वाऽब्रवीद्वचः । राम राजीवपत्राक्ष सोमवंशाद्भवैर्नृपैः ॥ २ ॥
सवेष्टितं गजपुरं नलार्यैश्चिरजीविभिः । तद्दूतवचनं श्रुत्वा राघवोऽतीव विस्मितः ॥ ३ ॥
वसिष्ठं प्राह भद्रान्मे न कदा पार्थिवात्मजाः । समागता मया योद्धुं किमिदानीं हि भूपते ॥ ४ ॥
किं कारणं गुरो ह्यत्र विचारय सविस्तरम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा तं गुरुः प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥
प्रष्टव्यमत्र वाल्मीकिं येन ते चरित कृतम् तच्छ्रुत्वा लक्ष्मण प्रेष्य समाहूयाथ तं मुनिम् ॥ ६ ॥
सीतया पूजनं कृत्वा शर्म पृष्ट्वं न्यवेदयत् । वाल्मीकिस्तु तदा प्राह राम किंचिद्विहस्य सः ॥ ७ ॥
किं त्वं न वेत्सि राजेन्द्र विनोदान्मां तु पृच्छसि । शृणुष्व तर्हि मे वाक्यं सर्व शृण्वन्तु ते प्रियाः ॥ ८ ॥
एकादश सहस्राणि वत्सराणि तथा पुनः । एकादश समाश्चापि मासास्त्वैकादशैव हि ॥ ९ ॥
श्रीरामदास कहने लगे- जब कि रामचन्द्रजी सीताके साथ सुख भोगते हुए अयोध्याका राज कर रहे थे । उन्हीं दिनों सुवेगका एक घबड़ाया हुआ दूत हस्तिनापुरसे आ पहुँचा । उसने भगवान्को प्रणाम करके कहा-हे राजीवपत्राक्ष राम ! सोमवंशी राजे नल आदिने हस्तिनापुरको चारों ओरसे घेर लिया है । दूतकी यह बात सुनकर रामचन्द्रजी बड़े विस्मित हुए ॥ १-३ ॥ वे गुरु वसिष्ठसे बोले- हे गुरुवर ! यह मैं क्या सुन रहा हूँ ? आज तक तो कभी ये राज मेरे साथ युद्ध करने नहीं आय थे ॥ ४ ॥ कृपा करके आप इसपर सविस्तार विचार करिए । रामकी बात सुनकर वासिष्ठजीने कहा कि यह बात आप वाल्मीकिजीसे पूछें । क्योंकि उन्होंने ही आपके चरित्रकी रचना की है यह सुनकर रामने लक्ष्मणको भेजकर वाल्मीकिजीको बुलवाया ॥ ५ ॥ ६ ॥ वाल्मीकिने आनेपर सीताके साथ-साथ रामने उनकी पूजा की और हस्तिनापुरका सब समाचार कह सुनाया । वाल्मीकिने हँसकर कहा- क्या आपको ये बातें नहीं मालूम हैं ? मालूम हैं । किन्तु कौतुक वश आप हमसे पूछ रहे हैं। अच्छा, आपकी यही इच्छा है तो सुनिए । आपके प्रियजन भी सावधानीके साथ मेरी बात सुनें ॥ ७ ॥ ८ ॥ ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष, ग्यारह महीना, ग्यारह दिन, ग्यारह घड़ा और ग्यारह पलका समय
७५८ आनन्दरामायणे [ सर्गः १
एकादश दिनान्यत्र घटिकाश्चापि सन्मिताः । एकादश फलान्येव ते राज्यं निश्चितं मया ॥१०॥
शतकोटिमिते काव्ये पूर्व्वं तेऽवतारतः ।
| तन्मध्येऽत्र व्यतीतानि सहस्राणि तथा समाः । | अतीताः शेषभूताश्च मासाः शेष दिनादिकम् ॥११॥ |
| अष्टादशदिनैर्न्यूनमेकं वर्षं ममोद्य यत् | शेषभूतं मयूरेण परिपूर्णं भविष्यति ॥१२॥ |
| अयं कालोऽवतारस्य समाप्तेस्ते समागतः | गत्वा भागीरथीं पुण्यां पूर्व्वैरानायिताऽलम् ॥१३॥ |
| प्रापितां तत्र राजेन्द्र तस्यां स्नात्वा यथाविधि | स्तुतो ब्रह्मादिभिः सर्वैः पदं स्वीयं गमिष्यसि ॥१४॥ |
| तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् | एतावत्कालपर्य्यन्तं नलाद्याः क्व संस्थिताः ॥१५॥ |
| कुतोऽधुना समायातास्तन्मह्यं विस्तराद्वद । | तद्रामवचनं श्रुत्वा वाल्मीकिर्वाक्यमब्रवीत् ॥१६॥ |
| शृणु राम महाबाहो सर्व्वं ते कथयाम्यहम् । | अत्रिर्मुनिः पुरा राम पूर्णिमायां कृते युगे ॥१७॥ |
| वैशाख्यामेकदा सोमं दृष्ट्वा नारीमुखोपमम् | मुमोच वीर्यं भूम्यां स तस्यानुभो बभूव ह ॥१८॥ |
| सोमस्य दर्शनाज्जातः सोमाख्यः स बभूव ह । | सोऽरण्ये जाह्नवीतीरे चकार तप उत्तमम् ॥१९॥ |
| एतस्मिन्समये तत्र कश्चिद्धस्ती समाययौ । | निहतः पक्षिभिस्तत्र तद्दृष्ट्वा कौतुक महत् ॥२०॥ |
| सोमो विचारयामास पक्षिभिर्निहतः करी । | अस्या भूम्याः प्रभावोऽयं पुरं तत्र चकार सः ॥ २१॥ |
| हस्तिनाशात्पुरं जातं तस्मात्तद्धस्तिनापुरम् । | तत्र पौरैः कृतो राजा सोम एव रघूत्तम । २२॥ |
| तस्य जातो बुधः पुत्रस्तत्सुतौ जगतीततम् । | सद्वीपं स्ववशं कृत्वा सुरलोकं प्रजग्मतुः ॥२३॥ |
| तत्र जित्वा सुरान्सर्व्वान्सुरस्त्रीभिश्च संयुतौ | मुक्त्वा देवान्स्वर्गलोके निवासं चक्रतुर्मुदा ॥२४॥ |
| तयोर्ददौ वरान्ब्रह्मा युवां मद्धस्तमग्रतौ । | युवाभ्यां मोहितन्वन्ध देवमघपुरस्सरम् ॥२५॥ |
| युवाभ्यां तर्ह्यहं दद्मि वरांश्छृणुत बालकौ | युष्मद्वंशे नृपाः केचिदग्रे त्रिपुरुषोर्द्धवतः ॥२६॥ |
आपको राज्य करनेके लिए मैने निर्धारित किया था ॥ ६ ॥ १० ॥ ये बातें मैं आपके अवतारके पहले ही अपने शतकोटिसंख्यात्मक रामायणमें लिख चुका हूँ । वे ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष व्यतीत हो गये । अब ग्यारह महीना और ग्यारह दिन तथा घड़ी-पल बाकि हो बाको बज है ॥ ११ ॥ सब मिलाकर अठारह दिवस न्यून एक वर्ष बाकी है । वह समय मंत्र मत समाप्त होगा ॥ १२ ॥ आपके अवतारका समय समाप्त हो रहा है । अब आप अपने पूर्वज अर्थात् भगीरथ द्वारा लायी हुई गङ्गामें विधिवत् स्नान करके ब्रह्मादिक समस्त देवताओंसे संस्तुत होकर अपने परम धामको जायँगे ॥ १३ ॥ १४ ॥ वाल्मीकिकी बात सुनकर रामने कहा कि अबतक ये नल आदि राजे कहाँ थे ? ॥ १५ ॥ इस समय कहाँसे आ गये हैं, यह सब आप मुझे विस्त रपूर्वक बतलाइए । रामका वचन सुनकर वाल्मीकि बोले-हे राम ! हे महाबाहो ! मैं सब कुछ कहता हूँ, सुनिए । बहुत दिन हुए, सत्ययुगमें अत्रि ऋषिने वैशाखकी पूर्णिमाको चन्द्रमाका मुख एक स्त्री के समान सुन्दर देखकर अपना वीर्य त्याग दिया और उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १६-१८ ॥ चन्द्रमाको देखकर वह पुत्र उत्पन्न हुआ था। इसलिए वह सोम कहलाया और वनमें जाकर गङ्गाजीके तटपर उत्तम तप करने लगा ॥ १९ ॥ उसी समय वहाँ एक हाथी आ गया । उस हाथीको कुछ पक्षियोंने मिलकर मार डाला । यह महाकौतुक देखकर सोमने अपने मनमें डाया कि यहाँके पक्षियोंने हाथीका मार डाला है । यह अवश्य इस भूमिक। ही प्रभाव है । ऐसा विचार करके सोमने उसी स्थानपर एक नगर बसाया ॥ २० ॥ २१ ॥ उस स्थानपर पक्षियोंने हाथीका विनाश किया था। इस कारण उसका हस्तिनापुर नाम पड़ गया । हे रघूत्तम ! वहाँके पुरवासियोंने आग्रह करके सोमको ही वहाँका राजा बनाया । २२ ॥ सोमके बुध नामका पुत्र हुआ । फिर वश या, बुध और सोमने मिलकर सब द्वीपोंको अपने अधीन कर लिया और कुछ दिनाक अनन्तर स्वर्गलोकको गय ॥ २३ ॥ उन्होंने स्वर्गमें देवताओंको जीतकर छोड़ दिया और वे सस्त्रीक वहीं रहने लगे ॥ २४ ॥ उन दोनोंको ब्रह्मा ने अनेक वरदान दिये । ब्रह्मा ने
सर्गः १ ] सूर्यकाण्डम् ७५९
अन्यैः पराजिताः सप्त पुरुषा न भवंति हि । इति दत्त्वा वरं ब्रह्मा ययौ निजपदं प्रति ॥२७॥
ततः सोमाय दौहित्री दत्ता पद्मावती शुभा । इन्द्रेण तत्र तौ सोमबुधौ स्वर्गे स्थितौ चिरम् ॥२८॥
बुधस्य तनयो भूम्यां नाम्नाख्यातः पुरूरवाः । चकार राज्यं धर्मेण तथा चद्धस्तिनापुरे ॥२९॥
हस्य पुत्रश्च गव्योऽभूद्गव्यपुत्रोऽन्य उच्यते । अन्यपुत्रोनल श्रीमान् दिक्पालान् जेतुमुद्यतः । ३०॥
राज्ये पुरूरवादींश्च त्रीन् स्थाप्य निजपूर्वजान् । सप्तद्वीपन्नृपैर्युक्तः प्रतस्थौ मेरुमुन्नतम् ॥३१॥
आदौ जित्वा सबह्निं दियमं जित्वाऽथ निर्ऋतिम् प्रययौ वरुण जेतुं गरुणादिभिरन्वितः ॥३२।
एतस्मिन्नन्तरे राम तूणं सैन्येन रावणः । प्रययौ नाकलोकं हि सुरानिंद्रादिकान् रणे ॥३३ ।
जित्वा निनाय स्वां लंकां सोमो युद्धाय चाऽव्रजत् निर्भयो सुहृदः सर्वानिन्द्रादीन् मोचयितुं सुरान् ३४॥
तदा निवारयामास ब्रह्मा सोमं त्वरान्वितः । विष्णुर्भूत्वा नृवेषेण रावणं हि हनिष्यति ॥३५ ।
स्वं माऽद्य रावणं याहि वरदस्तस्मै मयाऽर्पितः । तद्वाक्याच्च न मुक्त्वा ययौ सोमोऽमरावतीम् ॥३६॥
भूम्यां नलरूपतो गत्वा प्रहृत्य पतनं तथा । जित्वा कुवेरमीशानं कृतकार्यममन्यत ॥३७॥
वात्मानं च ततः स्वर्गे चेंद्रं जेतु समुद्यतः । एवं नलेन भ्रमता गत तस्य कृत युगम् ॥३८॥
त्रेतायुगसमाप्तौ स ददर्श सकलं बलम् । नत्राऽपश्यत रावण स देवान्कृत्वाऽवशं निजति ॥३९॥
देवान्त्वशगान् कृत्वा लंकां स्वां स गतः पुनः । तत्र मध्ये तु अभवौ नलस्य नहुषः सुतः ॥४०॥
हूषहस्य जानीकरस्तत्सुतो बभ्रुदः स्मृतः । तस्य पुत्रो लघुभूतः सुरथस्तत्सुतः स्मृतः ॥४१॥
अजमीढस्तु तत्पुत्रस्त्वेवं वंशोऽभवन्पथि । ततः स मंत्रयामास नलो मंत्रिजनैः सह ॥४२॥
किमर्थमिंद्रलोकं तं गन्तव्यमधुना यदि । श्रूति देवाः समालोका लङ्कायां रावणेन हि ॥४३।
कहा-तुम दोनों मेरे वंशज हो। तुमने मेरे सहित समस्त देवताओंको जीतकर छोड़ दिया है। इसलिए मैं तुम्हें यह वरदान देता हूँ कि तुम्हारे वंशमें तब पह के आगे सात पुरुष तक जितने राजे होगे वे किसीसे भी पराजित नहीं होंगे। इस प्रकार वरदान देकर ब्रह्मा अपने स्थानको चले गये ॥ २५-२७ ॥ इसके अनन्तर इन्द्रने पद्मावती नामकी अपनी सुन्दरी नतिनी सोमको द दी। इस तरह व सोम और बुध आनन्दके साथ बहुत दिनों तक स्वर्गलोकमे रहे । २८ ॥ बुधका पुत्र इस संसारम पुरूरवा नामसे विख्यात हुआ । उसने धर्मपूर्वक हस्तिनापुरमें राज्य किया ॥ २९ ॥ उसका पुत्र गव्य हुआ। गव्यका पुत्र अहर और अन्यका पुत्र नल हुआ । नल इतना प्रबल बोर था कि उसने दसा दिक्पालोको जीतनेकी इच्छा की। सेनाकी तैयारी करके यह हस्तिनापुरमे पुरूरवा आदि तीन पूर्वजोंको छोड़कर सातो द्वीपोंके राजाओंके साथ उन्नत शिखरवाले मेरु-पर्वतपर चढ़ गया । ३० ॥ ३१ । वहां पहुंचकर उसने पहले अग्निको, फिर यमको और उसके बाद निर्ऋतिको जीतकर रावण आदि दैत्योंके साथ वरुणको जीतनेके लिए गया ॥ ३२ ॥ उसी समय रावण अपनी सेनाके साथ स्वर्गलोक पहुंचा और इन्द्रादि देवताओंको संग्राममें जीतकर अपनी लंकाको वापस चल गया । तब सोम अपने मित्रों तथा पुत्रोंको साथ लेकर रावणस युद्ध करने तथा इन्द्रादि देवोंको छुड़ानेके लिए चल पड़ा ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ उसी समय ब्रह्माजीने आकर सोमको रावणपर चढ़ाई करनेसे रोक दिया और कहा कि स्वयं विष्णुरूपवान् मनुष्यका रूप धारण करके राक्षसका संहार करेंगे। तुम आज रावणके पास मत जाओ। ब्रह्माकी बात मानकर होम लंका न जाकर अमरावतीपुरी गया । ३५ ॥ ३६ ॥ इसके अनन्तर वही सोम नलरूपसे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुआ और अपने पराक्रमसे कुबेर एवं ईशानको परास्त करके उसने अपनेको कृतकृत्य माना ॥ ३७॥ कुछ दिनों बाद इन्द्रको जीतनेके लिए नल स्वर्गलोकमें जा पहुंचा। इस तरह उसके घूमते-फिरते सत्ययुग बीत गया ॥ ३८॥ त्रेतायुगके समाप्त हो जानेपर नलने सब वीरोंको तो देखा, किन्तु रावण नहीं मिला। अन्तमें नलने फिर सब देवताओंको वशमे किया। लंकापर भी अधिकार जमाया । आगे चलकर नलके नहुष, नहुषके जातीकर, जातीकरके बभ्रुद, बभ्रुदके लघुभूत, लघुभूतके सुरथ, सुरथके अजमीढ़ पुत्र हुआ और इस प्रकार नलकी सन्तति बढ़ी। एक दिन नलने अपने मंत्रियों-
७६० आनन्दरामायणे [ सर्गः १
अस्माकं सेवकः सोऽस्ति दशास्यः करप्रदः । निजं पुरं प्रगन्तव्यमधुना चिरकालतः ॥४४॥
दिग्भ्रंशयादथ सर्वैर्जीविताः स्म चिरं भुवि । पुरूरवादिकास्ते नः पूर्वजाः सन्ति वा मृताः ॥४५॥
नास्माभिर्विद्यते कापि तद्वार्त्ता भ्रमतः श्रुतम् । अतः स्वगोपुरं गत्वा द्रष्टव्यास्तेऽत्रिपूर्वजाः ॥४६॥
चेत्सोमपृथुगोर्नागं गन्तव्यं दर्शनेच्छया । तर्हि ताभ्यां युता देवाः किं जेता रावणेन हि ॥४७॥
किं ताभ्यां रहिता देवा जिताश्चेति न संशयम् । आगतेभ्यस्त्विह ज्ञेयं विदितं हस्तिनापुरे ॥४८॥
भविष्यति ततो यद्धि कार्य्यं तत्कार्य्यम् । इति निश्चित्य य नलः शनैः स्वनगरं ययौ ॥४९॥
एतस्मिन्नन्तरे राम त्वज्जनोऽप्यवतीर्णवान् । हन्वा तं रावणं देवा मोचितास्ते दिवं गताः ॥५०॥
सप्तद्वीपांतरास्था ये नृपास्ते रावणकृताः । पुरूरवादिकाः स्त्रींश्च निष्कास्यान्यं गजाह्वये ॥५१॥
सुषेणः स्थापितः पूर्वं वानरैः सहितस्त्वया । ततः पुरूरवाद्यास्ते स्वकालेन मृतांस्त्विह ॥५२॥
इदानीं ते समायाताः सोमवंशोद्भवा नृपाः । नलाद्याः सप्त स्वपुरं सप्तद्वीपपुरोत्तमाः ॥५३॥
त्वत्कृताः स्ववशगा ये च द्वीपांतरस्थिताः । तृपास्तेषां पूर्वजान् स्वसैर्न्यैस्ते नृपोत्तमाः ॥५४॥
बलिनः कोटिशः सर्व्वे प्रभायाता गजाह्वयम् । भविष्यति त्वया तैश्च समरः सोमवंशजैः ॥५५॥
तदा ब्रह्मा सुरैर्युक्तः समागत्य तवांतिकम् । पदयोस्ते प्रणामंश्च नलाद्यैः कारयिष्यति ॥५६॥
कृत्वा वः प्रार्थनां तेऽपि त्वां वैकुण्ठं प्रनेष्यति । एव राम सविस्तारं तवाग्रे कथितं मया ॥५७॥
यत्पृष्टं मां त्वया पूर्वं नलादीनां कथानकम् । विवाहकाण्डमारभ्य रम्यं रामायणं शुभम् ॥५८॥
समग्रं हि मया राम पुराणं श्रावितं मया पुत्राभ्यामधुना सर्व्वं शृणुष्व रघुनंदन ॥५९॥
इत्युक्त्वा कुशलवयोरथवाग्दां मुनिस्ततः । विवाहकाण्डाण्डकाण्डानि चत्वारि जगतुः शिशू ॥६०॥
हे मन्त्रणा की कि अब रावण सब देवताओंको पकड़कर लङ्केश्वरपर ही ले आया है, अब हम स्वर्गलोकको नयाँ चल । ३६-४३ । रावण हमारा सेवक है, वह हम कर देता है । इस लोकको घूमते-घूमते ही बहुत दिन हो गये हैं । इसलिए अब अपनी पुरीको लौट चलना चाहिए । कितनी दिशाओंमें घूमते फिरते हमलोग बहुत समय तक जीवित रहे, किन्तु पुरूरवा आदि हमारे पूर्वज जीवित हैं वा मर गये । मुझे उनकी कुछ भी खबर नहीं है ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ अतएव चलें, अपने राजभवनहीमें वापस चलें । वहांका हाल-चाल देखें और अपने तीनों पूर्वजोंका दर्शन करें ॥ ४६ ॥ लेकिन उनका यह भी नहीं ज्ञात है कि सोम और पृथु भी तो और-और देवताओंके साथ रावण द्वारा बन्दी नहीं बना लिये गये । हस्तिनापुर चलनेसे यह बात भी ज्ञात हो जायेगी । उसके बाद जो करना उचित होगा, वह किया जायगा । ऐसा निश्चय करके वह अपने नगरको लौटा ॥ ४७-४९ । इसी समय हे राम ! आपका अवतार हो गया । आपने रावणको मार डाला और देवताओंको छुड़ा लिया । जिससे वे सब देवता स्वर्गलोकको चले गये ॥ ५० ॥ सातों द्वीपामें रहनेवाले राजाओंको आपने अपने वशमें कर लिया, वे पुरूरवा आदितीन राजा भी आपके वशमें हो गये । तब आपने उनको हस्तिनापुरसे निकालकर वानरोंके साथ सुषेणको उसका गद्दीपर बिठाल दिया । कुछ दिनों बाद समय आनेपर पुरूरवा आदि भी मर गये ॥ ५१ । ५२ । इस समय नल आदि सोमवंशी राजा उन सप्त राजाओंके साथ यहाँ आ रहे हैं जिनको कि आपने अपने वशमें कर लिया था और अब तक वे किसी दूसरे द्वीपमें रक्षा करते थे । वे राजा अकेले नहीं बल्कि अपने पूर्वजों तथा करोड़ोंकी विशाल सेना के साथ हस्तिनापुरपर चढ़े आ रहे हैं । उन सोमवंशियोंके साथ आपका युद्ध करना पड़ेगा ॥ ५३-५५ ॥ इस समय सब देवोंके साथ ब्रह्माजी आकर नल आदिसें आपका प्रणाम करवायेंगे । ५६ ॥ इसके बाद ब्रह्मा आपकी विधिवत् स्तुति करके अपने साथ आपको वैकुण्ठलोक ले जायेंगे । हे राम ! इस तरह मैंने आपको आज्ञा से उन नल आदि चन्द्रवंशी राजाओंका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया ॥ ५७ ॥ हे रघुनन्दन ! बहुत दिन हुए, जब मैंने विवाहकाण्ड- से लेकर सारी रामायण आपको सुनादी थी । अब आप अपने पुत्रोंके मुखसे यह पुनीत कथा सुनिए ॥ ५८ ॥ ५९ ॥ इतना कहकर वाल्मीकिने कुश और लवको रामचरित्र सुनानेकी आज्ञा दी और वे विवाहकाण्ड-