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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ७ ] जन्मकाण्डम् १२७

सर्गः ७ ] जन्मकाण्डम् १२७

भस्त्रात्रेण विनिर्मुक्तः प्रजवाल ह्यमन्दहा । मुग्धावागङ्गलवाभाम सद्योरु बाललीलथा ॥१०५॥
तं दृष्ट्वा दुद्रुवुः सर्वे त्यक्त्वा तोयघटानपि । शकृन्मूत्रं प्रमुञ्चन्तो मुक्तकच्छा लवेषवः ॥१०६॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रीडन्गङ्गायां तानूजनान्दृशः । पप्रच्छाथ मुहूर्तीर किमर्थं नीयते जलान् ॥१०७॥
जनाः प्रोचुर्लवं हन्तुमस्माभिर्नीयते जलम् । दिव्यमैलरवास्त्रेण तन्मुग्धा मययौ कुशः ॥१०८॥
संगृह्य स्वाश्रमाच्चापं तूणीरं देगशत्रुतः । लव मोचयितुं चापं टान्कुन्वाऽश्वत्थशाखे ॥१०९॥
कुशचावध्वनिं श्रुत्वा तस्थौ तूष्णीं लवः क्षणम् । मनो दृष्ट्वा कुशं प्राप्तं ययौ योद्धं म लक्ष्मणः ॥११०॥
तं दृष्ट्वा म कुशः प्राह छलिनौ जानकीसूतौ । त्वदा गमण नोकेंश्च गयोः कर्तुं विनिष्कृतिम् ॥१११॥
अह हाहोपमंय मां बाल लक्सन्न न यानय ।
युवयोः रीक्ष्यं नार्था शिक्षावन्मीति वेदम्यम् ॥११२॥
गंतवकेशान्तुलम्बतासद्धर्षं पुरयोर्वलम् । न ममाग्रे स्फुटं कार्यं युवाभ्यामुपहामकन् ॥११३॥
वाञ्चार्काक्षाक्षतां विद्यां राम स्वामद्य दर्शये । इत्युक्त्वा तुमुलं युद्धं विक्षुब्धेन चकार मः ॥११४॥
आसन् वृथा जानकीये लक्ष्मणेन्मुष्टमार्षणाः । रामायणानुक्तौ ज्ञात्वा ज्ञेय एवात्र लक्ष्मणः ॥११५॥
जातोऽर्थादिति वधे मस्य गरुडास्त्र मुमोच सः । क्षात्रधर्मं पुरस्कृत्य न तद्धिमाभयं दधे ॥११६॥
जानन् युद्धं पितुर्हन्ता ज्ञानं चैव मय न्विति । तदृष्ट्वा स्वगताश्चासं सौमित्रिः कु ठेना मतिः ॥११७॥
भयभीतः पृथिव्यां हि पपात लक्ष्मणो रथात् । च्युतं दृष्ट्वा स्वयं तत्र दीक्षायुक्तोऽपि वेगतः ॥११८॥
धृन्वा चापं च तूणीरं यज्ञकुण्डप्रवः स्थितः । चाप संधाय ब्रह्मात्रं सौमित्रेर्जी विनाशश ॥११९॥


जल भर-भरकर लाया जा रहा था और स ही लगाकर लवलर उसकी आग डाला जाता थी ॥ १०४ ॥ उसी समय सबके देखत ही इसन सब ब्रह्मास्त्रस्त्र छूट गया और अगार मय वाल डोगत हुआ दौड़ने लगा। उसको देखकर वहाँके सारे नर-नारग अपने अपने कलसानी छु ड-छाडकर भाग गये। उसक उस विकराल रूपको देखकर बहुतोंकी बालियाँ सुन्त गयीं। कई एकका तो मारे डरके पशाव टट्टी तक हा गयी । १०५ ॥ १०६ ॥

उधर कुश बच्चोकी तरह खेलत-कूदता गङ्गाजीके किनारे गया। वहीं उसन देखा कि बहुतस लोग पानी भर रहे हैं। उनस कुशल पूछा-तुमलोग इतना पानी क्यों भरे लिये जा रह हो ? ॥ १०७ ॥ उन्होने कहा— लवको मारनेके लिए। यह सुनकर कुश अपने आश्रमपर गया और धनुष-बाण लेकर लवको छुड़ानेके लिए रावणके यज्ञशालाके समान जा पहुंचा और ध.णुषका भीषण टंकार किया ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ कुशके धनुषकी टंकार सुनकर लव कुछ देरके लिए शान्त खडा हो गया और कुशसे युद्ध करनेके लिए लक्ष्मणके सामने जा पहुँचा । ११० ॥ लक्ष्मणको देखकर कुशने कहा—तुमन और रामन लव तथा सीताके साथ बडा छल किया है। उसीका बदला लनक लिए मैं आ रहा हूँ। मुझको लवकी तरह साधरण बालक न समझना। तुम लोगोंका औरना स्वा और छाट-छाट बच्चोंपर ही चल सकता है यह में जानता हूँ। सीताके बलक्षयकी कुरुना आदिम तुम्हारा श्रम जल चुका है। अब अपना उपहास करानेके लिए मेर सामने लड़नेको व्यर्थ आये हैं। अच्छा, यदि तुम्हारी यही इच्छा है ता वाणवार्षिकी शिक्षाकी विद्या आज में तुम्हें और रामको दिखाता हूँ। ऐसा कहकर कुशने लक्ष्मणके साथ तुमुल युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥ १११-११४ ॥ लक्ष्मणने कुशपर जितने वाण चलाये, वे सब व्यथ गये। रामायणकी भविष्यवार्तासे कुशने ज्ञात हो चुका था कि अब लक्ष्मणके सिवाय और कोई वीर बांकी बचा हा नहीं है कि जिसके साथ युद्ध करके हारनेकी आवश्यकता हो। यह सोचकर क्षात्रधर्मके अनुसार उसने बालकके मारनेम कई अपराध न समझकर उन्हें मारनेके लिए गरुडास्त्रका प्रयोग किया ॥ ११५ ॥ ११६ ॥ उस गरुडास्त्रको अपने ऊपर आते देखकर लक्ष्मण सिटपिटा गये उनको सारी चतुरी भूल गयी और मूर्छित होकर रथसे पृथ्वोपर गिर पड़े। लक्ष्मणको रथसे गिरते देखकर राम दीक्षित होते हुए भी धनुष बाण लेकर दौड़े और लक्ष्मणको बचानेके लिए उन्होंने कुशके छोड़े हुए गरुडास्त्रपर अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। ब्रह्मास्त्रके पहुँचनेपर गरुडास्त्र आकाशमें ही ठंडा हो

३२८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७

मुमोच बाणमाग्नेयं गरुडेऽपि मारुत्य् । तेन गच्छन्निगगद्वह्निर्मातुं तु गारुडम् ॥१२०॥
ततः कुशः संदधे य मदाख्यं गपवातरि... वच नारी सीतान्युलब्धकीर्तिं त्वया । १२१॥
जनान दर्शयितुं स्वाय पौरुषं जानकी यते । न्यक्तं यया वृथा पूर्वं जानैद्ध न चेष्टितम् १२२॥
वाल्मीकिशितिरुत्पन्नां विद्यां ममाद्य श्व विलोकया । नेचेत्य यदि दृप्तस्त्वं वाल्मीकिं जानकीमपि ॥१२३॥
तद्वाक्यैर्रिन्नमर्माऽगवन्मा विलोक्य नरा गोत्रेषु मुमुचे बांर म्नैन उत्छ्रितिमाप वै ॥१२४॥
मध्ये मान्गयाणं कुशस्तं राघव पुनः । गन्धर्वेण दोशलाश्चेण वारमयं न्यवारयन ॥१२५॥
इषुगत्रं मुमुचे घोरं कुशाऽरि राघव जवात् । तन्जगामच तद्राभो मेघ क्षेण व लीलया ॥१२६॥
पपुलपं मुमुचे गाम जानकीजटरोद्भवः । नदावारयच तद्राभ पर्वतेन लीलया । १२७।
वज्राम्रं मुमुचे शर्व यानेश्व मोऽतिमन्त्रवान् । याग श्वेनाथ रामेऽपि वज्रास्त्रं तन्न्यवादयत ॥१२८॥
अंवाश्मं मुमुचे राम मातयः परमदारुन हाहाशब्दस्तदा चार्मद्राघवस्याश्वसंगणे ॥१२९॥
अथवारयचवाश्मं वैष्णवेन रघूत्तम । ततोगम कुशश्चोष्णान्नानां बांणतस्तः पुनः ॥१३०॥
मुमोच राघवश्चापि मार्गणांश्चहुशः कुशम् । एव तत्तुल युद्धं बभूव प्रहर नयोः ॥१३१॥
तदाऽऽश्चर्याकौतुक रामकुशयोर्युद्धवामहन् गढचापार्ष मुक्ता रता ये ये पनात्रिणः ॥१३२॥
ने ने कुशशिरोन्मार्गेपतितादृष्टवान्त्वरे । पति सम् तथा ने ये कुशचापविनिर्गताः ॥१३३॥
शासने रामचंद्रस्य पतन्ति स्म पदांतिके । तद्दृष्ट्वा क्षोभक गतो दम्भाश्चर्यप्रजाप्रजः ॥१३४॥
आज्ञापयन्मंत्रिवरं गच्छ वाल्मीकिमान्तिवे । पूष्धव ग जाकन्थ्य कौन श्छावावनी वली॥१३५॥
तता गान्त्वाऽनयोर्याने करिष्यामि मनि कामतम् । श्वेत रामवचनाम् मन्त्री ददमास्थितः । १३६॥
काश्चयंतिरंरगत्र गच्छं कृत्वा कुशं त्वरात् । दृष्ट्वा वन्चाऽब्रवन्त सर्व रास्व बचनवेद्यवन् । १३७ ।
मुनिः प्राह मंत्रिवण म्व बद रामाय म वचः । सभाऽग्रे मागनश्व राल श्वा विचित्वम् ॥१३८॥

गया। ११९-१२० इसके अनन्तर कुश ने गान्धर्वास्त्र... पर चलाया... वह गरुडास्त्र नष्ट हुआ जो मृत्यु था। समरकी विद्यातक लिये तुमने अपनी सामर्थ्य दिखलाया, अब यदि मन पौरुष देखना चाहते हो तो... मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। यदि सामर्थ्य हो तो मुनि... जानकी... जीतकर दिखाओ; न कर सको तो हाथ बाँधकर जानकी के पास... आज्ञाकार बनो। १२१-१२३॥ कुशकी बात न सह सकनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ने क्रोध किया। जिससे बहु भ्रान्त हो गया। फिर गान्धर्वास्त्र से जो बाण चलाया था श्रीरामचन्द्रजी ने उसका निवारण किया। कुशनें रामपर बाण चलाया और श्रीरामचन्द्रजी ने जल से उसका विनाश किया। तदनन्तर सुकुमार वीर कुशने रामपर पर्शुलपाश चलाया, तब रामने पर्बतास्त्र से उसका विनाश किया ॥ १२४-१२७॥ तब कुशने वज्रास्त्र चलाया और रामने आग्नेयास्त्र से उसका नाश किया। १२८॥ एव वृक्षन बाण के ऊपर वैष्णवास्त्र चलाया, उस समय दोनों सेनाओं में विस्मय हुआ। अपने वैष्णवास्त्र बाण उसको व्यर्थ कर दिया। इसके बाद कुशने बाण छोड़े और श्री रामचंद्रजी ने बाण चलाये ॥ १२९॥ १३०॥ रामने भी कुशके प्रती-कारार्थ बाण छोड़े। इस प्रकार एक प्रहर तक राम और कुशमें तुमुल युद्ध होता रहा ॥ १३१॥
उस समय आप-पेटके युद्धमें यह बड़ा कौतुक था कि श्री बाण श्रीरामके धनुषसे छूटे वे कुशके मस्तकपर गिरते थे तथा कुश द्वारा छूटे बाण रामके पैरोंपर गिरते थे। यह आश्चर्य देखकर विस्मित रामने अपने मंत्रीको बुलाया और उनसे कहा कि वाल्मीकि के पास जाकर पूछो कि आपके ये महाबलवान् शिष्य कौन हैं ॥ १३२-१३५ । यह जानकर मैं इनकी माताका यत्न पूर्वक उपाय करूँगा। रामके आज्ञानुसार मन्त्री रथपर सवार हुआ और दो कोस चलकर वाल्मीकिके पास जा पहुंचा। वाल्मीकिको देखकर मन्त्रीने प्रणाम किया और रामका सन्देश सुनाया ॥ १३६। १३७॥ मुनि वाल्मीकिने कहा—उनसे कह दो कि कल

सर्गः ८ ] जन्मकाण्डम् १२९


भविष्यति समस्तं हि वृत्तं शालकयोः शुभम् । ततो मन्त्री मुनेर्वाक्यं राघवाय न्यवेदयत् ॥१३९॥
कुशं लवं समाहूय वाल्मीकिरपि तौ मुदा । समालिङ्ग्य कथाभिस्तां निनाय रजनीं सुखम् ॥१४०॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे
कुशलवयोः पराक्रमवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( रामका सीताको पुनः स्वीकार करना )
श्रीरामदास उवाच

अथ प्रभाते रामेण समाहूतावुभौ शिशू । नत्वा मुनिं मातरञ्च सभायां जग्मतुर्मुदा ॥ १ ॥
वाल्मीकेराज्ञया बालौ जटाकृष्णाजिनाम्बरौ । जन्मकाण्डं त्वेकमेव जग्रतुस्तौ पितुः पुरः ॥ २ ॥
जनैः श्रुत्वा स्वचरितं रामोऽभूदतिविस्मितः ॥ ३ ।
आसन् जनाश्चापि सर्वे विस्मयाविष्टमानसाः । ज्ञात्वा सीताकुमारौ तौ सन्तोषं परमं ययुः ॥ ४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे सर्वे लवबाणस्वरूपीडिताः । शत्रुघ्नाद्या ययुस्तत्र यानस्थाश्चाप्तजीविताः ॥ ५ ॥
अंगदाद्याः पार्थिवाश्च मोहनास्त्रैकजीविताः । ययुः सवानराः सर्वे लक्ष्मणोऽपि ययावरुक् ॥ ६ ॥
सर्वे नत्वा रामचन्द्रं तस्थुश्चास्थांतिके मुदा । अथ समाप्य रामोऽपि तौ विसृज्यादरेण हि ॥ ७ ॥
राक्षसेंद्रं लक्ष्मणं च शत्रुघ्नं मकरध्वजम् । खगराजं सुषेणं च जांबवन्तं वचोऽब्रवीत् ॥ ८॥
आनयध्वं मुनिवरं समीतं देवममितम् । अद्यास्तु पर्षदां मध्ये प्रत्ययो वै सभांगणे ॥ ९ ॥
गंगाया दक्षिणे तीरे सभा कार्याऽऽयता शुभा । करोतु शपथं सीता ममाग्रे जाह्नवीतटे ॥१०॥
मुनीश्वराद्याः सर्वे तां जानन्तु गतकल्मषाम् । तथा ममापि वाल्मीके शुद्धिं जानंतु देवताः ॥११॥


जब सभामें ये दोनों रामायण गाने पहुंचेंगे, उस समय सारा वृत्तान्त ज्ञात हो जायगा । १३८ ॥ तदनुसार मंत्री लौट आया और बाल्मीकिने जो कुछ कहा था, सो रामको बतला दिया । उधर वाल्मीकिने लव और कुशको पास बुलाकर हृदयसे लगाया और अनेक प्रकारकी कहानियां कहते हुए रात बितायी ॥ १३९ ॥ १४० ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योतिष्मती'भाषाटीकासहिते जन्मकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

श्रीरामदास बोले-दूसरे दिन सबेरे रामने उन दोनों बालकोंको बुलवाया और वे अपनी माता तथा मुनि वाल्मीकिको प्रणाम करके रामकी सभामें गये ॥ १ ॥ जटा एवं वल्कल वस्त्र धारण किये हुए उन बच्चोंने उस दिन वाल्मीकिके आज्ञानुसार केवल जन्मकाण्डका गान किया । २ ॥ रामने जब अपना चरित्र सुना तो बड़े विस्मित हुए । सभामे बैठे हुए लोगोको भी बड़ा आश्चर्य हुआ और जब यह जाना कि ये सीताके बेटे हैं तो बहुत ही प्रसन्न हुए । ३ ॥ ४॥ उसी समय लवके बाणोंसे पीड़ित लक्ष्मण-शत्रुघ्न आदि भी वहाँ आ पहुंचे । उनके साथ अङ्गद-हनुमान् आदि जो लवके मोहनास्त्रसे मूर्च्छित हो गये थे, वे भी आये। वहाँपर सबान रामको प्रणाम किया और उनके समीप जाकर बैठ गये । तब रामने अपने मंत्रियोंसे सलाह करके लव कुशको विदा कर दिया ॥ ५-७ ॥ तदनन्तर विभीषण, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, मकरध्वज तथा अङ्गदको सम्बोधित करके राम बोले-तुम सब जाकर बाल्मीकिके साथ सीताको यहाँ ले आओ। आज इस सभामे यह निश्चय किया जायगा कि सीता-का क्या अपराध है। इसी पुनीत जाह्नवीके तटपर सीता शपथ खायगी । यहाँपर आये हुए समस्त ऋषिगण जिससे यह समझ जायें कि सीता सर्वथा निष्कलंक तथा पापोंसे रहित है। साथ ही हमारो ओरसे बाल्मीकिकी भी परीक्षा होगी । इस प्रकार रामके आज्ञानुसार लक्ष्मणादि वाल्मीकिके पास गये और उन्होंने

२३० आनन्दरामायणे [ सर्ग ८


इति तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणाद्या महीं गताः । ऊचुर्यथोक्तं रामेण वाल्मीकिं लक्ष्मणादिकाः ॥ १२॥
रामस्य हृद्गतं सर्वं ज्ञात्वा वाल्मीकिरब्रवीत् । सर्वानितान् सुमंत्राद्यान् लक्ष्मणाय समर्प्य च । १३।
युष्माभिः कथनीयं यद्वाक्यं श्रीराघवं प्रति । श्वः करिष्यति वै सीता शपथं जनसंसदि । १४।
योषितां परमो देवः पतिरेको न चापरः । पतिं विना गतिः काऽन्या भार्याश्चास्ति जगत्त्रये ॥१५।
लक्ष्मणाद्यास्ततः सर्वे राममागम्य ते पुनः । सुमंत्रादींश्चतुर्वीरांश्चाघवाय समर्प्य च ॥१६।
वाल्मीकेर्वचनं हर्षात्पुनर्मं रघुनायकम् । वाल्मीकेर्वचनं श्रुत्वा तुतोष राघवोऽपि च ॥१७।
सुमन्त्रं भरतं वायुपुत्रं वानरनायकः । समालिङ्ग्य चतुर्व्यान् स पुनर्जन्ममन्यत । १८।
सीतया पालिताः सर्वे वयं लवजितास्त्विति । कथयामासुः श्रीरामं सुमन्त्रादिद्विरद० ॥१९।
द्वितीये दिवसे कृत्वा सभां श्रेष्ठां मनोरमाम् । सर्वानृष्यान् समाहूय रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥२०॥
मुनयः पार्थिवाः सर्वे शृणुत स्वयमागताः । सीतायाः शपथं लोद्य विज्ञास्येऽनुभयं ततः॥२१
इत्युक्त्वा राघवेणाथ लोकाः सीतादिदृक्षवः । ब्राह्मणा क्षत्रिया वैश्या शूद्राश्चैव सहस्रशः २२।
सत्रावगः समाजग्मुस्तद्दिव्यं द्रष्टुमुद्यताः । ततो मुनिसंयुक्ता सीता समाययौ पुरः ॥२३।
अध्रनर्त्त मुनिं कृत्वा यांती किंचिदवाङ्मुखी । तावल्लोका जनाश्चैव चक्रुर्जयजयं ततः ॥ २४।
दृष्टा लक्ष्मीमिरायांतीं श्रीविष्णोरनुयायिनीम् । वाल्मीकेः पुरत स्तेषां जयघोषं प्रचक्रिरे २५।
तदा मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः । माहामात्यैः वाल्मीकिर्मदा मघामब्रवीत् । २६।
इयं दाशरथे सीता सुवृत्ता धर्मचारिणी । त्वया पापान्मुदा त्यक्ता ममाश्रमसमीपत २७।
लोकापवादभीतेन यमुनादक्षिणे तटे । प्रत्यक्षं दास्यते मह्यं तदनुज्ञातुमर्हसि ॥२८॥
इमौ तु सीतातनयौ कुशश्चवत्तो लवे मया । लवैर्वनिर्मितः सीताप्रत्ययञ्चाग्रवेचनमा ॥२९।


जो कुछ कहा था, सो कह सुनाया ॥ ६-११॥ रामके मनकी बात जानकर वाल्मीकिने कहा - आज तुम लोग जाओ और रामसे कह दो कि कल सभामे जाकर सीता सब लोगोके सामने शपथ खायगी ॥ १२-१४॥ स्त्रियोंके लिए पतिके सिवाय और कोई देवता नही होता ! इसी अवस्थामें सीता और कर ही क्या सकती है। पतिके बिना स्त्रीके लिए लोकमें और कोई गति भी नहीं है ॥ १५। तब लक्ष्मण आदि वहाँसे लौट आये। रामने उनके मुखसे वाल्मीकिका सन्देश सुना तो परम प्रसन्न हुए। वे लोग वहांसे लौटते समय सुमन्त्र आदि चारों वीरोंको, जिनको कि लवने बन्दी बना रक्खा था, साथ में लाये थे। राम उन सबको अपनी छातीसे लगाकर मिले और यह समझा कि इन चारोंका पुनर्जन्म हुआ है ॥ १६-१८ उन सबोंने अपना हाल बतलाते हुए कहा कि यद्यपि लवने हम सबको कैद कर दिया था किन्तु सीताने पूर्णरूपसे हमारी रक्षा की ॥ १९॥ दूसरे दिन एक विशाल सभा आयोजित की गयी। उसमें सब लोगोंको सम्बोधित करके रामने कहा- हे देशविदेशसे आये हुए ऋषियों ! आज इस सभामे आप लोगोंके समक्ष सीता शपथ खायगी। इससे आप लोगोंको उसके शुद्धता तथा दुष्टताका पता लग जायगा। इस प्रकार राम-के वचन सुनते ही सब लोग माताको देखनेके लिए उतावले हो उठे। नगरमें भी यह समाचार पहुँच गया। अतएव इस दिव्य शपथको देखनेकी लालसासे कितने ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वहाँ आ पहुँचे ॥ २०-२२॥ थोड़ी देर बाद सीताके साथ वाल्मीकि जी सभा में पधारे। आगे आगे वाल्मीकि थे और उनके पीछे नीचा सिर किये सीता मन्दगतिसे सभा में आयीं। उस समय सीता और वाल्मीकिको देखकर ऐसा लगता था कि मानों विधातुके पीछे पीछे लक्ष्मी चली आ रही हैं। सीताको देखते ही लोगोंने जयजयकार किया और वाल्मीकिजी सभाके बीचमे पहुँचकर रामसे कहने लगे - । २३-२६॥ हे राम ! कुछ दिन हुए जब आपने लोकापवादके भयसे सीताको मेरे आश्रमके समीप छोड़वा दिया था । आज वह ही सीता आपके सामने शपथ खायगी, आप इसके लिए आज्ञा दें । सीताके इन दोनों पुत्रोंमें कुश आपका सगा रूप (कुशकी दूर्वोंसे) बनाया हुआ मेरा वेटा है। उसे मैंने सहसा सीताके डरस बनाया था। ये दोनों बेटे

॥ सर्गः ८ ॥ जन्मकाण्डम् १३१

मुक्ताविमौ तु दुर्धर्षौ मध्यमेन्द्रावपि ते । प्रचेतासोऽहं दशमः पुत्रो रघुकुलोद्वह ॥३०॥
अनृतं न स्मराम्युक्तं यथेमौ तव पुत्रकौ । बहुवर्षसहस्राणां सम्यक् तपश्चर्या मया कृता ॥३१॥
नोपभोक्ता फलं तस्या भवेयं यदि मे ऽनिला । इत्युक्त्वा राघवस्यांके दक्षिणे स्थाप्य वै कुशम् ॥३२॥
लवं विन्यस्य वामांके तस्यान्वेवापरासने मूर्त्तः । गतोऽपि तौ समालिंग्य मूर्ध्न्यावघ्राय सादरम् ॥३३॥
लक्ष्म्य हस्तेके हस्तं संस्थाप्य आशीश्वरः । प्रतिष्ठास्ततं बालं पूर्ववन्मोऽकरोत् च तम् ॥३४॥
ततो रामोऽपि तां सीतां दृष्ट्वा बुद्धयन्विताम् । अथात इव सम्प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् ॥३५॥
त्वया सूनः ममानीतः सीतायाश्च प्रदर्शितुम् । पुरा तमानयस्वाद्य खेदस्ति शशिनस्त्वया ॥३६॥
तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपि पेटिकान्निहितं भुजम् । सीतायाः पुरतो राम दर्शयामास सादरम् ॥३७॥
सीताभुजोपमं दृष्ट्वा भुजं मारुतिनिर्मितम् । वस्त्ररुपांतरे काले सामन् सर्वऽतिविस्मिताः ॥३८॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र पश्यत्सु सकलेष्वपि । भुजः स गुप्ततां प्राप्तो विश्वकर्मोद्भवः क्षणात् ॥३९॥
तद्दृष्ट्वा कौतुकं लोका अभूवन्नतिविस्मिताः । रामोऽपि विस्मितः प्राह वाल्मीकिं प्रणिपत्य च ॥४०॥
एवमेव महाप्राज्ञ यदुक्तं मा मया ऽनृतम् । प्रत्ययो जनितो मह्यं तव वाक्यैरकिल्बिषैः ॥४१॥
लङ्कायामपि दृष्टा मे चैरेवाऽप्रतप्तः शपतः । इन्द्राद्यैः सुरतस्तेन मन्दिरं सम्प्रवेशिता ॥४२॥
सेयं लोकापवादेन मयाऽपि मतिमाऽधुना । मया त्यक्ता परित्यक्ता तद्गतान् क्षन्तुमर्हसि ॥४३॥
ममार्जुनोऽर्कश्चारूपं कुशीऽय वलवान्मया। सर्वशौर्या कृतो वेद्मि सीतायामप्यनसूये ॥४४॥
तथापि लोकसङ्गह्यान्कुरुतां शपयं त्वयि । जगत्सु शपयं नापि ममाद्यो तव सन्निधौ ॥४५॥
शुद्धायां जगतामध्ये सीतामंगीकरोम्यहम् । तदा तच्छपथं द्रष्टुमामन्लोकाः समुत्सुकाः ॥४६॥
समग्रा जानकी चाथ तदा कौशेयवासिनी । उदङ्मुखी ह्यधोदृष्टिः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥४७॥

असाधारण बल हैं। कोई भी योद्धा इनके सामने नहीं टिक सकता। विधाताका मैं दसवाँ पुत्र हूँ। आज तक मैं कभी झूठ नहीं बोला। अनेक वर्षोंतक मैने घोर तपस्या की है। यदि सीता किसी तरह भी पापाचारिणी हुई तो मैं उस तपस्याके फलका उपभोग न ग्रहण करूंगा। इतना कहकर वाल्मीकिने कुशको रामके दाहिना बगल तथा लवको बायीं ओर बिठाया और स्वयं उनके सामने एक ऊँचे आसनपर बैठे। रामने इन भाइयों उस बालकोंका आलिंगन किया, माथा सूंघा और उनके मस्तकपर अपना दाहिना हाथ रखकर कुशके समान उस अवसरपर उनका नाम बता दिया ॥ २७ से ३४ ॥ इसके अनन्तर रामने सीताकी ओर देखा तो सीताका शरीर देखकर बहुत शोक देखा। उन्होंने मज सभासद लक्ष्मणको आज्ञा दी कि उस समय जो सुवर्ण भुज काटकर हनुमान तुम दिखाये लाये थे, यदि वह सुरक्षित रीतिसे रक्खी हो तो यहाँ ले आओ ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कहकर पटाम रक्खी भुजा लाकर रामके सामने रख दी ॥ ३७ ॥ दृश्न दिन दसोरपर भी ठंक सीताकी भुजाओंके समान लटकते चामके चीथड़े तथा रुधिरसंयुक्त भूषाप्रथा देखकर सभासद जितने लोग बैठे थे वे बड़े विस्मित हुए ॥ ३८ ॥ इसी बीच लोगोंके देखते ही देखते वह विश्वकर्माकी बनायी भुजा गायब हो गयी। यह कौतुक देखकर लोगोंको और भी आश्चर्य हुआ। तब रामने विस्मित होकर वाल्मीकिसे कहा—हे महाराज ! मुझे तो आपकी बातोंसे ही विश्वास हो गया था कि सीता परम पवित्र है ॥ ३९-४१ । लङ्कामें भी मैंने सीताका शपथ देखी थी। उस समय देवताओंके समक्ष शपथ लेनेपर ही मैंने उसे अपने घर किया था ॥ ४२ । तथापि लोकापवादके भयसे पवित्र समझकर भी मैंने सीताका परित्योग किया। आप मेरे इस अपराधको क्षमा करें ॥ ४३ ॥ यह भी मैं जानता हूँ कि कुश मेरा पुत्र है और लवको आपने सीताके गर्भसे उत्पन्न किया था ॥ ४४ । यह सब होते हुए भी इन संसारवालोंको विश्वास दिलानेके लिये सीता इस सभा में शपथ ले ॥ ४५ । यदि इस जनसमाजमें और इस संसारमे सीता शुद्ध सिद्ध हो गयी तो मैं इसको फिर अङ्गीकार कर लूँगा। उस समय सीताकी शपथको देखनेके लिए वहाँ बैठे हुए सब लोग उत्सुक हो रहे थे ॥ ४६ ॥ तदनन्तर सभामें रेशमी कपड़े पहने सीता खड़ी हो गयी और हाथ

३३२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

रामादन्यमहं चेद्धि मनसाऽपि न चिन्तये । तर्हि मे धरणी देवि विवरं दातुमर्हसि ॥४८॥
एवं शपन्त्याः सीतायाः प्रादुरासीन्महाद्भुतम् । भूतलाद्दिव्यरूपार्थं सिंहासनमनुत्तमम् ॥४९॥
धृतो दिव्यरसै रोषैः समानीतं मनोहरम् । नागेन्द्रैर्ध्रियमाणं तद्दिव्यदेहं रविप्रभम् ॥५०॥
मूर्द्ध्ना जानकीं दोर्भ्यां धृत्वा दुहितरं निजाम् । स्वागतामीति तामुक्त्वाऽऽसने मा मन्यवेशयत् ॥५१॥
वस्त्राऽलङ्कारसम्पन्नमुदधैः पूज्य मैथिलीम् । समालिङ्ग्याथ भूदेवी वीजयामास सादरम् ॥५२॥
तदा शनैः शनैर्भूम्यां सुतं सिंहासनं त्वभूत् । सिंहासनस्थ वैदेही प्रविशन्ती रसातलम् ॥५३॥
दृष्ट्वाऽऽकाशस्थिता देवाश्चैव सर्वांस्तु मन्त्रमन्त् । निरन्तरं भिर्र्वैदेही ववपुः पुष्पवृष्टिभिः ॥५४॥
साधुवादश्च सुमहान्बभूव सुरकीर्त्तितः । अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वं स्थावरजङ्गमम् ॥५५॥
तदा बभूव चकितं सीतापथदर्शनात् । ऊचुश्चे वसुधा वाचो वानराश्च नगादिकाः ॥५६॥
केचिच्चिन्तापराः केचिदासन्ध्यानपरायणाः । केचिद्रामं निरीक्षन्तः केचित्सीतामचेतसः ॥५७॥
मुहूर्त्तमात्रं तत्सर्वं तूष्णींभूतमचेतनम् । प्रविशन्तीं भुवं सीतां दृष्ट्वा संमोहितं जगत् ॥५८॥
एतस्मिन्नन्तरे रामः प्रविशन्तीं दृ भूतले । विदेहजां तदा दृष्ट्वा वामहस्तेन संभ्रमात् ॥५९॥
यां दधार करेणादौ धन्वा हस्तेन वै भुवम् । ततम्भो प्रार्थयामास भुवं स रघुनन्दनः ॥६०॥

श्रीरामचन्द्र उवाच

देवि त्वं सर्वलोकानां निवासस्थानमुत्तमम् । अपि लोकमाता त्वं महानीरोपरिवृतः सदा ॥६१॥
वर्तसे पुण्यरूपान्वं सम्पुदा सकलान् जनान् । स्वजठरोर्ध्वौषधीभ्यश्च करोषि विभृतन्विद्राः ॥६२॥
त्वं दुर्गा त्वं स्वरा लक्ष्मीरभमं विष्णोः प्रिया शुभा त्वमेवाद्यात्र मे शुक्तिर्निमिताऽसि मयैव हि ॥६३॥
निजोधराद्ददासि त्वं धातून्बीज्या जनान्मदा अभायुक्ता त्वमेवासि सूक्ताष्टाकादिकर्मसु ॥६४॥


की ओर नीचे निगाह तथा ऊपर मुँह करके बोली—॥४७॥ हे पृथ्वि माता ! यदि रामके सिवाय अन्य किसीको मैंने अपने हृदयमें भी न ठाना हो, तो आप मुझे ऐसी जगह दीजिए कि जिससे मैं आपमें समा जाऊँ ॥ ४८ ॥ इस प्रकार सीताके प्रार्थना करनेपर तुरन्त एक दिव्य सिंहासन पृथ्वीके भीतरसे निकला । उसको बड़े-बड़े नाग अपने शिरपर उठाये हुए थे सूर्यके समान देदीप्यमान उन नागोंका प्रकाश था ॥ ४९ ॥ ५० ॥ इतनेमें साक्षात् पृथ्वी देवीने अपनी दोनों भुजाओंमें सीताका स्वागत किया। फिर छातीसे लगा तथा गोदमें लेकर उन्हें उस सिंहासनपर बिठाल दिया । इसके अनन्तर वस्त्र अलङ्कार माला-फल आदिसे सीताकी पूजा की और छातासे लगाकर पङ्खा झलने लगी । ५१ । ५२ ॥ इसके बाद धीरे-धीरे वह सिंहासन पृथ्वीके भीतर घूमने लगा । सिंहासनपर बैठी हुई सीताको पातालमें जाती देखकर आकाशमें स्थित सारी देवांगनाएँ उनपर पुष्पोंकी वर्षा करने लगीं ॥ ५३ । ५४ ॥ आकाश और पृथ्वीमें देवताओं और मनुष्योंने साधुवाद किया । सीताकी उस शपथको देखकर समस्त स्थावर-जंगम प्राणी चकित हो गये और अपनी बुद्धि-बुद्धि भूलकर परस्पर बात करने लगे ॥ ५५ । ५६ ॥ उनमें कुछ लोग चिन्तित थे और कुछ ध्यानमग्न । कुछ लोग रामको देख रहे थे । कुछ लोग अपनी सुधि-बुद्धि भूलकर सीताकी ओर निहार रह थे ॥ ५७ ॥ मुहूर्तभरके लिए वही सारा समाज सन्न हो गया । सीताको पृथ्वीके भीतर समाती देखकर समस्त संसार मुग्ध हो गया ॥ ५८ ॥ राम सीताको पृथ्वीमें धंसती देखकर अपने सिंहासनसे कूद पड़े और पृथ्वीके पास जा पहुंचे। वे उनका हाथ अपने हाथसे पकड़कर इस प्रकार पृथ्वीसे प्रार्थना करने लगे । ५९ । ६० । श्रीरामचन्द्र बोले— हे देवि ! आप सारे संसारकी निवासभूमि हैं समस्त जगत्की माता होकर महानीरके ऊपर आप स्थित हैं ॥६१॥ आप पुण्यरूप हैं । समस्त जनोंको हर प्रकारकी सम्पत्तियां देनेको सामर्थ्य रखती हैं । आप अपने उदरसे अनेक प्रकारकी औषधियाँ उत्पन्न करके सबका रक्षा करती हैं । आप दुर्गा, रुद्रा और विष्णुकी प्रिया लक्ष्मी हैं । आप आदिशक्ति हैं और मैंने ही आपको बनाया है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥ आप अपने उदरसे भाँति-भांतिके धातु निकालकर

सर्गः ८ ] जन्मकाण्डम् ३३३

जानकी तव कन्येयं श्वश्रूस्त्वं मेऽधुना प्रिये । कन्यादानं कुरु मुदा यत्त्वया पूर्वं कृतं न हि ॥६५।
प्रसीद देवि नोचेन्मे त्वयि क्रोधो भविष्यति ।
श्रीरामदास उवाच
इति संप्रार्थिता साऽथ शश्वत्तु महात्मना ॥६६।
नारी काठिन्यभावाच्या नाश्रृणोद्रघवेश्चित् । शनैः शनैः समाविष्टा सा जगाम ह ॥६७।
तां गच्छन्तीं पुनर्दृष्ट्वा भृशं रामो रुषान्वितः । बभूव क्रोधताम्राक्षस्तदा लक्ष्मणमब्रवीत् ॥६८।
चापमानय सौमित्रे शिक्षयेऽहं भुवं त्विमाम् । मन्मुखोपेक्षरूपेण वसुधेयं विदेहजाम् ॥६९॥
मामकं दास्यति क्षिप्रमन्यथा घातं न संशयः । ततोऽसौ लक्ष्मणस्तूर्णं करे कोदण्डमुक्तवान् ॥७०॥
धृत्वा ज्यारोपणं कृत्वा शरसंधानमातनोत् । तदा ववौ महन्वायुरुद्भूमे लवणार्णवः ॥७१॥
तारा निपेतुर्धरणीं बभूवुः सरजा दिशः । चकम्पे धरणी भीता त्राह्यत्राह्यति वदती मुहुः ॥७२॥
कराभ्यां जानकीं धृत्वा रामस्याङ्के न्यवेशयत् । श्रीरामचरणयोः पृथ्वी शिरसा नमनं व्यधात् ॥७३॥
तदा खे देववाद्यानि नेदुः कुसुमवृष्टिभिः । ववृषुर्जाानकीं रामं देवसङ्घा मुदान्विताः ॥७४॥
ततो रामोऽपि तां दृष्ट्वा पदयोर्नमतीं भुवाम् । स्वक्रोधं शान्तमकरोत्त्यक्त्वा चापमथोऽसृजत् ॥७५॥
विस्मृत्योत्थापयामास स्वकराभ्यामपि प्रभुः । ततः सा राघवं नत्वा प्रसाद्य च पुनः पुनः ॥७६॥
दत्त्वा विदेहकन्यायै तन्सिंहासनमुत्तमम् । सीतां स्तुत्वाऽथ तां पृष्ट्वा तया संपूजिताऽपि च ॥७७॥
आमन्त्र्य राघवं पृथ्वी क्षणदन्तरहिताऽभवत् । तदा सीतां जनाः सर्वे पुनर्जातान्तु मेनिरे ॥७८॥
अयोध्यास्थाः प्रणमुस्तां चक्रुः पूजां पृथक् पृथक् । ददौ दानान्यनेकानि तदा रामो मुदान्वितः ॥७९॥
नवरत्नादिनिम्नाश्च सम्बभूवुः समन्ततः । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्बन्दिमागधाः ॥८०॥

संसारी मायाका प्रीतिपूर्वक प्रदान करता है। मुझ और अमुक जितना था कम है, उनमें आप सहायका हैं ॥ ६४ ॥ यह सीता आपका कन्या है। इस नाते आप मम सास हैं। आपने विवाहके समय कन्यादान नहीं किया था, सो अब कर दीजिए ॥ ६५ ॥ हे देवि ! आप मेरेपर प्रसन्न हो जावें । नहीं तो मैं आपपर क्रुद्ध हो जाऊँगा । श्रीरामदासवत कहा—रामके इस तरह प्रार्थना करनेपर भी पृथ्वीने उनकी एक न सुनी। क्योंकि स्वभावतः ही नायिकाका हृदय कठिन हुआ करता है। सीता धीरे-धीरे पृथ्वितलम समाती जा रही थी ॥ ६६।६७ ॥ विनय करनेपर भी जब रामने देखा कि पृथ्वी मेरी बातोंपर कुछ ध्यान नहीं दे रही है तो मारे क्रोधके उनका आँख लाल हो गयी और लक्ष्मणसे बाले—॥ ६८ ॥ लक्ष्मण ! मेरा धनुष तो उठा लाओ, मैं पृथ्वीका उसके दुराग्रहका दण्ड दे दूँ। मेरे छूटे सदृश तीक्ष्ण बाणसे डरकर यह सीताको लौटा देगी। इस मैं मारना नहीं चाहता, चाहता हूँ केवल साताको इसके हाथोंसे लोटना। तदनुसार तुरन्त लक्ष्मण धनुष उठा लाये। रामने उस लेकर राजा ठाक किया और बाण चढ़ाया। उस समय जोरास बांय चलन लगा, समुद्रमे प्रलयसदृशकी लहरें उठने लगीं, तारे टूट-टूटकर गिरने लगे और चारों दिशाएँ धूलसे आच्छादित हो गयी। ऐसी अवस्था में 'त्राहि त्राहि' करती हुई पृथ्वी काँपने लगी और उसने अपने हाथो साताका उठाकर रामकी गोदमें बिठा दिया। इसके बाद पृथ्वीने सिर भुकाकर रामके चरणोंकी वन्दना की ॥ ६९-७३ ॥ उस समय स्वर्गमें देवताओंने देवबाय बज ये और राम तथा सीतापर फूलोंकी वर्षा की ॥ ७४ । इसके बाद जब रामने देखा कि पृथ्वी मेरे चरणम मुकी हुई विनती कर रही है तो अपना कोप शान्त कर लिया तथा धनुष-बाणका परित्याग करके अपन दत्तो हाथोंसे पृथ्वीको उठाया । इसके अनन्तर पृथ्वीने किन्द भगवान्को बार-बार नमस्कार किया, प्रार्थना की और सीता तथा यह सुवर्णमय सिहासन रामको समपर्ण कर दिया। फिर सीताकी स्तुति की। सीताने भी पृथ्वीकी विधिवत् पूजा का। तत्पश्चात् रामकी आज्ञा लेकर क्षण भरके भीतर ही पृथ्वी अन्तर्धान हो गयीं। उस समय सभामें बैठे हुए लोगोंने सीताका पुनर्जन्म समना ॥ ७५-७८ ॥ सब लोगोंने सीताकी विधिवत् पूजा की और जय-जयकार करके प्रणाम किया। तब रामने अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ७९ ॥ भाँति-भाँतिके नवीन बाजे बजे,

३३४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ८

सीतायाः शपथो यत्र जाह्नव्या दक्षिणे तटे । सीताकुण्डमिति ख्यातं तत्र तीर्थं बभूव ह ॥८१॥
पातालस्थं जलं पुण्यं सन्तप्तमनलोपमम् । दर्शनेष्वपि यत्तीर्थे सीतोष्णोष्णमुपद्रवात् ॥८२॥
तदत्र जानकीकुण्डं स्मरणान्घविनाशनम् । पुत्पुत्रायुषवृद्ध्यर्थं स्त्रीभिः सेव्यं सदा भुवि ॥८३॥
ततः सीतायुतो रामः पुत्राभ्यां सहितो मुदा । वसिष्ठऋश्यशृङ्गाभ्यां स्नानं सर्वमृषेर्गणैः ॥८४॥
चकार ऋषिमिश्रैश्च पूर्ववच्च सविस्तरम् । अथ यज्ञसुतं पूर्णमेव कृत्वा रघूत्तमः ॥८५॥
जातकर्मादिसंस्कारान् लवस्य विधिनाऽकरोत् । चकार नानादानानि देवान् सपूज्य भक्तितः ॥८६॥
ततो मुनीश्वरान् पूज्य पूजयामास पार्थिवान् । जनकं च सुमेधां च पूजयामास राघवः ॥८७॥
विससर्ज ऋषीन्सर्वान् ऋत्विजो ये समागताः । द्विजाद्यखिलाञ्जन्तून्धनाद्यैश्च तोषयामासुर्मुदं गतान् ॥८८॥
ततो विसृज्य विप्रांश्च पार्थिवैः सह राघवः । कुशाभ्यां सीतया च बन्धुभिश्चागमत्पुरीम् ॥८९॥
नीराजितः पुरस्त्रीभिर्हस्तिष्ठो रघूत्तमः । सीतया तनयाभ्यां च ययौ निजगृहे प्रति ॥९०॥
तदा महोत्सवेनासीदयोध्यायां समन्ततः । चिरकालेन वैदेह्या दर्शनं च जनैः कृतम् ॥९१॥
ततो नृपादिकान् पूज्य विससर्ज रघूद्वहः । जनकं च सुमेधां च ददवाज्ञां निजां पुरीम् ॥९२॥
सुतः सीतायुतो रामः पुत्राभ्यां बन्धुभिः सह । पूर्ववच्च सुखं रेमे चिरकालं रघूद्वहः ॥९३॥
रामेण सीतया सार्थं सहस्राणि त्रयोदश । वर्षाण्यत्र कृतं राज्यं कस्मिन्कल्पे द्विजोत्तम ॥९४॥
एकादश सहस्राणि वत्सराणि महान्ति च । वर्षान्कादश वर्षाणि मासा एकादशैव तु ॥९५॥
दिनान्येकादशैवात्र रामेण सीतया सह । अयोध्यायां कृतं राज्यं कस्मिन्कल्पे द्विजोत्तम ॥९६॥
एकादश सहस्राणि चैकादश दिनानि च । समहीपवनेनापि रामेणाभूत् कल्पभेदतः ॥९७॥
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च । गायन् सीतया राज्यं कस्मिन्कल्पे कृत द्विज ॥९८॥
इति श्रीमत्कोटिसंहितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकाण्डे जानकीग्रहणं नामाष्टमः सर्गः ॥८॥


वैभवपूर्वक नृत्य किया और बन्दियों तथा मागधोंने विविध प्रकारसे स्तुति की ॥८०॥ जाह्नवीके दक्षिणी तटपर जहां सीताने शपथ ली थी, वह सीताकुण्डके नामसे एक विख्यात तीर्थ बन गया ॥८१॥ सीताके उष्ण उच्छ्वास निकलनेके कारण आज भी वहां अग्निके सदृश तपता हुआ पवित्र जल निकलता रहता है ॥८२॥ इस जानकीकुण्डके स्मरणमात्रसे सब अघ नष्ट हो जाते हैं। अपने पतिकी आयुवृद्धिके लिए स्त्रियोंको इसमें स्नान करना चाहिये ॥८३॥ इसके बाद सीता तथा अपने पुत्रोंके साथ रामने यज्ञशाला सम्बन्धी स्नान किया। यह अवभृथ स्नान था पूर्वकथित स्नानके सदृश ही उत्साहयुक्त हुआ। इस प्रकार रामने सो यज्ञ पूर्ण करके विधिवूर्वक लवका जातकर्मादि संस्कार किया। अनेक प्रकारके दान दिये और देवताओंका विधिवत् पूजन किया। इसके अनन्तर यज्ञमें आये हुए समस्त ऋषियों तथा राजाओंकी पूजा की और जनक तथा सुमेधाका भी पूजन किया। इसके बाद ऋषियों तथा ऋत्विजोंको धनादिसे सन्तुष्ट करके विदा किया ॥८४-८८॥ साथ ही ब्राह्मणों तथा राजाओंको भी विदा किया और सीता, पुत्रों तथा बन्धुबान्धवोंके साथ राम अपनी अयोध्यापुरीको गये ॥८९॥ अयोध्यामें जाते ही राम हाथ पर सवार होकर पहुंचे, त्यों ही नगरकी स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी और सब लोग अपने महलोंमें गये। उस समय अयोध्यामें चारों ओर महान् उत्सव हो रहा था। बहुत दिनोंके वियुक्त सीताका लोगोंने दर्शन पाया ॥९०।९१॥ कई दिनों बाद रामने जनक, सुमेधा तथा अन्य राजाओंको अपने-अपने नगर जानेकी आज्ञा दी ॥९२॥ इसके अनन्तर फिर पहिलेके समान रामचन्द्रजी सीता तथा पुत्रोंके साथ आनन्दपूर्वक अयोध्यामें रहने लगे ॥९३॥ किसी कल्पमें रामने सीताके साथ तेरह हजार वर्ष तक राज्य किया, किसी कल्पमें ग्यारह हजार वर्ष तथा किसी कल्पमें ग्यारह हजार वर्ष ग्यारह मास और ग्यारह दिनतक राज्य किया ॥९४-९७॥ किसी कल्पमें रामने दस हजार दस सौ वर्ष तक राज्य किया है ॥९८॥ इति श्रीमत्कोटिसंहितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेय-कृत ज्योतिष्मतीभाषाटीकासहिते जन्मकाण्डे अष्टमः सर्गः । ८॥