श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १ ] | पूर्णकाण्डम् | ७७१
| सर्गः १ ] | पूर्णकाण्डम् | ७७१ |
|---|
यदा त्वया वरो दत्तस्तदा किं विदितं नव । नासीच्छ्रीरामसामर्थ्यं अधुना शाठ्यंस सुवा ॥७॥
त्वयि चेद्वर्तते किंचित्सारं धर्तुं रणं मया । तर्हि कुरुष्व साहाय्यं नलादीनां सुरैर्युतः ॥८॥
पश्या रणे ममाग्नेय्यं बलं पश्यतु राघवः । सीताऽपि पुष्पकासीना जालैरन्ध्रैश्च पश्यतु ॥९॥
एवं कुशस्य वचनं श्रुत्वा लज्जापूतो विधिः । सोमेनाथ बुधेनापि नलाद्यान्निन्द वेगतः ॥१०॥
रे रे मूढाः शृणुध्वं मे वचनं हि गतायुषः । साक्षान्नारायणं रामं यूयं योद्धुं समुद्यताः ॥११॥
केनेयं शिक्षिता बुद्धिः सर्वेषां घानकारिणी । गच्छध्वं शरणं राम नोचेद् मरिष्यथ ॥१२॥
ममायं जनकः साक्षाद्रावो विष्णुनं संशयः । इति धिक्कृत्य तान्वेधाः कुशं वचनमब्रवीत् ॥१३॥
यावद्यास्याम्यहं रामान्तिकंत्वां कुशबालक । तावच्चेन्मोक्ष्यसे बाणं तर्हि मां हतवानसि ॥१४॥
इत्युक्त्वा तं कुशं वेधा नलद्यैः परिवेष्टितः । ययौ रामं सुरैर्युक्तः पुरस्कृत्य वृषध्वजम् ॥१५॥
शिवमागतमाज्ञाय पुष्पकाद्रघुनन्दनः । प्रत्युद्गम्य शिवं नत्वा प्रणाम ततो विधिम् ॥१६॥
ततस्ताम्पूजयामास त्रिवाटीरघुनन्दनः । ततः सभायां रामस्य तिष्ठन्वेधा नलादिभिः । १७॥
प्रणामान्कारयामास सोमेन च बुधेन च । ततस्तान्महसोत्थाय रामचन्द्रः करेण हि । १८॥
श्रुत्वा तेषां हि नामानि विधेरास्यात्पृथक्पृथक् । ततः पप्रच्छ वेगेन ब्रह्माणं पुरतः स्थितम् । १९॥
सर्वे किमर्थमानीतास्त्वयैते सोमवंशजाः । बद त्वं कारणं शीघ्र सत्यमेव ममाग्रतः ॥२०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा रामं वेधा वचोऽब्रवीत् । राम राम महाबाहो पालयस्वाद्य मे वचः । २१॥
रक्षस्वैतान्नृपानद्य वरदानान्मम प्रभो । द्वापरान्तमजेयत्वं दत्तमस्ति मया पुरा ॥२२॥
ममास्त्रं सन्दधानं निवारय कुशं सुतम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा विहस्य रघुनायकः ॥२३॥
सभायामाह ब्रह्माणमजेयत्वं त्वयोदितम् । क गतं चाद्य समरात्किमर्थमिह बागताः ॥२४॥
जब आपने इनको वरदान दिया था तब क्या रामकी सामर्थ्यका आपको ध्यान नहीं था ? तब तो रामको कुछ समझे नहीं, अब मूठकी प्रार्थना करने आये हैं ॥ ७ ॥ मैं कहता हूँ कि यदि आपमें कुछ शक्ति हो तो देवताओंके साथ लेकर आप नल आदिकी सहायता करिए । मैं बालक साप चचाके साथ युद्ध करूं और रामचन्द्रजी तथा सीता पुष्पक विमानके झरोखेसे मेरा और आपका समर्थ देखें ॥ ८ ॥ ९ ॥ इस प्रकार कुशकी बात सुनी तो ब्रह्माजी लज्जित हो गये और नल आदिको फटकारते हुए कहने लगे—अरे मूढो ! जान पड़ता है कि तुम लोगोंकी वायु समाप्त हो गयी है, जो साक्षान्नारायणस्वरूप रामचन्द्रजीसे युद्ध करने आये हो ॥ १० ॥ ११ ॥ सर्वनाश उपस्थित करनेवाली यह दुर्बुद्धि तुमको किसने दी है ? अब यदि अपना कल्याण चाहते हो तो रामकी शरणमें जावो, नहीं तो एक-एक करके तुम सब मार डाले जाओगे ॥ १२ ॥ मेरे पिता विष्णुभगवान् ही तो रामरूपसे इस पृथ्वीतलपर अवतरे हैं । इस तरह उन लोगोंको डाँट-फटकार करके ब्रह्माजी कुशसे कहने लगे कि मैं रामके पास जा रहा हूँ । जबतक उनके पाससे न लौट आऊँ, तबतक बाणका प्रहार न करना । ऐसा करोगे तो मानो उनका नहीं, तुमने मेरा वध किया ॥ १३ । १४ ॥ ऐसा कुशसे कहकर ब्रह्माजी शिवजीको आगे करके नल आदिके साथ-साथ श्रीरामचन्द्रजीके पास गये । जब रामने सुना कि शिवजी आ रहे हैं तो पुष्पक विमानसे उतरकर उनका स्वागत और प्रणाम करके ब्रह्माजीको भी अभिवादन किया ॥ १५ ॥ १६ ॥ इसके अनन्तर रामने शिवजी आदिकी विधिवत् पूजा की और सब लोग सभामण्डपमें गये । वहाँ ब्रह्माने सोम और बुधसे श्रीरामको प्रणाम करवाया । तब रामने इनको अपने हाथोंसे उठा लिया और ब्रह्माजीके मुखसे उनका नाम सुना । कुछ देर बाद रामने ब्रह्मा से पूछा कि आप इन सोम-वंशियोंको यहाँ किस लिए लाये हैं ? जो इसका वास्तविक कारण हो, वह मुझे बतलाइए ॥ १७–२० ॥ रामकी बात सुनकर ब्रह्माने कहा—हे राम ! हे महाबाहो ! आज आप मेरा बात मानकर इन नल आदि राजाओंकी रक्षा कीजिए । मैंने इन लोगोंको यह वरदान दे रक्खा है कि द्वापरपर्यन्त तुम लोग किसीसे पराजित नहीं होवोगे । २१ । २२ ॥ उधर कुश मेरे शस्त्र ( ब्रह्मास्त्र ) का सन्धान करके खड़े हैं। उन्हें भी
| ७७२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
|---|
ब्रह्मास्यवचनं श्रुत्वा रामं प्राह विधिः कुतः। सर्वैर्वा पुरतो मेऽस्ति बलं न तु तवाग्रतः ॥२५॥
त्वं तु मे जनकः साक्षादतस्त्वां प्रार्थयाम्यहम्। ततो रामः पुनः प्राह विहस्य चतुराननम् ॥२६॥
न श्रोष्यति वचो मेऽद्य कुशोऽयं यौवनस्थितः। प्रायः कुमरा वृद्धानं वाक्यमग्रे मजन्ति न ॥२७॥
अन्यच्चापि शृणुष्व त्वं यच्छास्त्रेऽप्युच्यते वचः लालयेत्पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् ॥२८॥
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् । अतन्मे बालकाः सर्वे कुशाद्याः स्वार्थतत्पराः ॥२९॥
न श्रोष्यन्ति वचो मेऽद्य तान्गत्वा प्रार्थयस्व हि। ततः प्राह पुनर्ब्रह्मा रणक्रोधाम्बुधौ मया ॥३०॥
वाक्यं रम्यं मंजुलं च नैवाद्य वदति प्रभो। ततः प्राह विधिं रामः पुनर्वाक्य विनोदयन् ॥३१॥
विधे त्वं गच्छ वाल्मीकिं स स्वां युक्तिं वदिष्यति। ततः स रामवाक्येन वाल्मीकिं पुष्पंके स्थितम् ॥३२॥
मुनिभिर्मुनिशालायामूर्ध्वं सर्वैः स्थितं विधिः। नत्वाऽथैः सहितो गत्वा वृतं सर्वं न्यवेदयत् ॥३३॥
विधिमाहाथ वाल्मीकिर्ज्ञात्वा राममनोगतम् । स्त्रीलब्धजीविताश्चैते भवन्तु मुनिसन्निधौ ॥३४॥
नरादीनां स्त्रियः सर्वाः प्रार्थयन्तु विदेहजाम् । कुशोऽपि जानकीवाक्याच्छान्तिमेष्यति बालकः ३५
तथेति ते नलाद्याश्च दूतान् प्रेष्याथ सादरम् । आनीय स्वकुलत्राणि शतशस्तु तदा जवात् ॥३६॥
जानकीं प्रेषयामासुस्ताः सर्वाः पार्थिवयोषितः । उपायनानि संगृह्य जानकीं प्रययुर्जवात् ॥३७॥
ददृशुर्जानकीं नारीगुप्तां स्वयमथैक्षताम् । स्नुषाभिः सेवितपदां पर्यङ्के निद्रितां मुदा ॥३८॥
ततः स्त्रीः समागताः सीता दृष्ट्वा चामन्दजीविता । मस्तकद्वयमुत्थाय धृष्ट्वाऽधौपवदर्हणा ॥३९॥
त्यक्ताहं मंचकं कृत्वा संस्थिताऽऽसीन्मणीन्द्रिता। स्नुषाभिर्नीति हे रम्या प्रणेमुस्तां परस्त्रियः ॥४०॥
तासां सीमन्तरत्नोत्थप्रभया पदपंकज । विराजन्ते सोतायाश्चित्रगत्रिषिवित्रे ॥४१॥
उपायनानि संगृह्य ताभ्य सा जनकात्मजा । समालिंग्य निवेदयाथ ताः प्राह सुस्वरं वचः ॥४२॥
आप रोक दीजिए। ब्रह्माकी बात सुनकर रामने कहा कि आपने जब इतनकी अजय कर दिया था, तब किस ये लोग संग्रामभूमि छोडकर यहाँ मेरे पास क्या आय है ? ॥ २३ । २४ ॥ रामकी यह बात सुनकर ब्रह्मा कहने लगे—सब लोगोंके लिए होते मेरे पास बल है, किन्तु आपके लिए मेरेमें कुछ भी सामर्थ्य नहीं है ॥ २५ ॥ आप मेरे पिता हैं, इसी नाते मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। फिर राम बोले कि कुश युवावस्था में है। संसारमें प्रायः देखा जाता है कि कुमार लोग वृद्धोंकी बात नहीं मानते ॥ २६ ॥ २७ । इसके अतिरिक्त शास्त्रमें भी कहा गया है कि पाँच वर्षकी अवस्थातक बच्चोंका दुलार करे, दश वर्षकी अवस्था तक डराये-धमकाये, किन्तु सोल्ह वर्षका हो जानेपर घटक साथ मित्रताका व्यवहार करना चाहिए। इसी कारण ये स्वार्थी बालक मेरी बात नहीं मानेंगे आप स्वयं जाकर उनसे प्रार्थना कीजिए। ब्रह्माने कहा कि संग्राम-कलित क्रोधके कारण आज तो वह मुझसे मीठी बात भी नहीं करता। फिर विनोदवश रामने ब्रह्मासे कहा कि आप वाल्मीकिके पास जाइए। वे आपको कोई युक्ति बतलायेंगे। रामके कथनानुसार ब्रह्मा नल आदिको अपने साथ लेकर वाल्मीकिके पास गये। वाल्मीकिजी उस समय रामके साथ पृथक विमानपर ही रहा करते थे। इससे उनके पास पहुँचने में विशेष समय नहीं लगा। वहाँ जाकर ब्रह्माने वाल्मीकिको सब वृत्तांत कह सुनाया ॥ २८-३३ ॥ रामका मनोगत अभिप्राय जानकर वाल्मीकिने ब्रह्माजीसेकहा कि अपनी स्त्रियोंकी कृपासे ये लोग जीवनदान पा सकते हैं। इसका उपाय यह है कि नल आदिकी स्त्रियाँ सीताके पास जाकर अपने पतियोंके जीवनकी भीख माँगें। यदि सीता प्रसन्न हो गयीं तो कुश भी मान जायगा ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ वाल्मीकिके कथनानुसार नल आदिने अपनी स्त्रियोंको लिवा लानेके लिए सैकड़ों दूत भेजे और वे तुरन्त उनको लिये हुए जा पहुँचे। इसके अनन्तर वे स्त्रियाँ विविध प्रकारके उपहार लेकर सीताके पास गयीं। वहाँ पहुँचकर उन स्त्रियोंने देखा कि सीता अपनी सखियोंसे घिरी हुई बैठी झपको ले रही हैं और बहुएँ उनकी सेवामें तत्पर हैं ॥ ३६-३८ ॥ जब सीताने उन स्त्रियोंको देखा तो तकिया बगलमे कर ली और उठ बैठीं। उस समय उन स्त्रियोंने उनको प्रणाम किया ॥ ३९ ॥ ४० ॥ उन राजदयनिताके सीमन्तरत्नकी प्रभासे सीताके पैर चित्र विचित्र
सर्गः ५१] पूर्णकाण्डम् ७७३
किमर्थमागता यूयं मा भैष्टवमितः परम्। कथयध्वं यथावन्मेऽभीष्टोऽद्य क्रोष्यहम् ॥४३॥
तदा ताः कथयामासुः सर्वं वृत्तं परस्तरम्। देहि करुणदानानि कुशं युद्धान्निवारय ॥४४॥
तथेति जानकी चोक्त्वा ज्ञात्वा राममनोगतम्। नार्हस्तान्मोचनीयार्थने निर्जग्मुर्भवति ॥४५॥
आश्वास्य स्त्रिकयास्तास्ताभिर्युक्ता कुशं ययौ। तदा तं मानयद्रामान्म क्रोधं त्यज कुशाधुना ॥४६॥
निवर्त्तस्व रणादद्य शृणु मे वचनं शिशो। तथेति जानकीवाक्याद्विहस्याथ कुशस्तदा ॥४७॥
भ्रात्रा सधैर्यसंयुक्तः सेनया संन्यवर्नत। पुष्पकं प्रययौ सीता नृपस्त्रीपरिवेष्टिता ॥४८॥
कुशाद्यास्ते कुमाराश्च सभायां राघवं ययुः। ततो वाल्मीकिना ब्रह्मा नलाद्यैः सहितस्तदा ॥४९॥
सनिर्जरैः सभां गत्वा सर्वां श्री राघवं यतः। कुशाद्यश्चेक्षतौऽपि प्रणामं प्रक्रम्य तस्य सन्निधौ ॥५०॥
तम्पुष्टतेनालिंगिताश्च स्त्रीभिर्नीराजनं अपि। तदा रामोऽब्रवीद्ब्रह्मन्नग्रतः महसि स्थितम् ॥५१॥
रणादवर्तिता बालाः किमग्रे तव वाञ्छितम्। न मे राज्ये छत्रपतिर्द्वितीयोऽत्र भविष्यति ॥५२॥
करणीयं नलाद्यैः किं तद्वदस्व मविस्तरम्। तदाऽऽसनादुत्थितः सः वेधा रामाग्रतः स्थितः ॥५३॥
उवाच मधुरं वाक्यं मध्वग्रं रघुनन्दनम्। राम राम महाबाहो भूभारश्च त्वया हृतः ॥५४॥
चिरकाल कृतं राज्यं वैकुण्ठ पालयधुना। कुरु मन्य वचो मेऽद्य दृष्ट्व हस्तिनापुरम् ॥५५॥
नलादिभ्यस्त्वयोध्यायां कुशो राज्यं प्रपामतु। तदा रामो विधिं प्राह ममाप्येतन्न रोचते ॥५६॥
वैकुण्ठं ह्यो गमिष्यामि सीतया बन्धुभिर्युतः। दशवर्षसहस्राणि प्रोक्तमायुर्युगेऽत्र हि ॥५७॥
तन्मया स्वीयसामर्थ्यान्कृतमत्र वध नृपाः। एकादश सहस्राणि समाप्त्यवतारकैव तु ॥५८॥
तथैकादश मासाश्च गता मे दिवसा अपि। शेषायायुश्च किञ्चिन्मे तदद्य पूर्ण भविष्यति ॥५९।
प्रकारके दीख रहे थे॥ ४१॥ इसके बाद सतीजी उनसे भली प्रकार को और उनका हृदयसे लगाकर कहने लगी कि तुम लोग यहाँ किस कामसे आयी हो ? अपना इच्छा प्रकट कर। तुम जो कुछ भी चाहोगी मैं उसका प्रबन्ध कर दूंगी। ४२।४३॥ तब उन रात्रिमान पुटस्त्रयया सब वृत्तान्त सुनाते हुए कहा हे देवि ! आज आप मेरो ठहरती हुई सुहाग रक्षार्थके लिए कुशको युद्ध करनक रोक दीजिए ॥ ४४॥ सीताने मन ही मन रामकी इच्छा जान ली। उन्होंने सोचा-ये बहुत है कि स्त्रियोंके द्वारा नर आदिको जीवनदान मिले। यह सोचकर उन्होने उन स्त्रियोंसे कहा-अच्छी बात है। इसके अनन्तर वे तुरन्त सान्त्वना लगाकर उठीं और कुशके पास जा पहुंची और कहा-बेटा शृणु ! अब तुम अपने क्रोधका परित्याग कर दो ॥ ४५ ॥ ४६॥ मेरी बात मानकर संग्रामभूमिसे लौट चलो। जानकीकी बात सुनकर कुश मुसकराये और अपने बन्धु-बान्धवों तथा सेनाको साथ लेकर लौट पडे। सीता कुशको तथा उन स्त्रियोंको अपने साथ लिये अपने पुष्पक विमानपर जा पहुँचीं। वहाँ पहुंचकर कुश आदि बालक सभामे रामचन्द्रजीके पास चले गये। इसके अनन्तर ब्रह्माजी भी वाल्मीकि तथा नल आदिका साथ लेकर सभामे रामचन्द्रजीके पास पहुँचे। कुश आदि बालक भगवान्को प्रणाम करके एक ओर खडे हो गये॥ ४७-५० ॥ रामने उनको अपने हृदयसे लगा लिया और स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी। कुछ देर बाद रामने बह्माजीसे कहा कि आपके इच्छानुसार कुश आदि बालक तो संग्राम-भूमिसे लौट आये। अब आपकी क्या इच्छा है? अबतो मेरे राज्यमें कोई दूसरा छत्रधारी राजा नहीं रहेगा ॥ ५१॥ ५२॥ अब आप यह भी बतला दीजिए कि नल आदिका क्या करना चाहिए। रामकी यह बात सुनते ही बह्माजी उठकर रामके आगे जा बैठे और कहने लगे-हे राम ! हे महाबाहो ! आपने पृथ्वीका भार उतार किया। बहुत दिनोंतक पृथ्वीपर राज्य भी किया। अब चलकर वैकुण्ठधामकी रक्षा करिए और मेरी बात सच करनेके लिए नल आदिको हस्तिनापुरी दे दीजिए । ५३-५५॥ कुश आनन्दके साथ अयोध्याका राज्य करे। तब रामने ब्रह्मासे कहा कि यही बात मुझे भी जंच रही है॥ ५६॥ कल मैं सीता तथा अपने बान्धवोंके साथ वैकुण्ठधामको चल दूँगा। इस युगमें मनुष्यकी आयु दस हजार वर्ष निर्धारित की गयी है। किन्तु हे बह्माजी ! मैं अपनी सामर्थ्यसे उस नियमको व्यर्थ करके ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष और ग्यारह
७७४ | आनन्दरामायण | [ सर्गः ५
द्वादश्यां घटिकायां सोऽहं वैकुण्ठमाश्रये। ततो विधिं कुशः प्राह नलाद्या यदि मां द्विजे ॥६०॥
दास्यंति करभारं मे तर्हि तिष्ठतु छत्र ते। मदाज्ञां पालयंत्वेते तव नास्पात्सुरक्षिताः ॥६१॥
छत्रहीनाः सुखं त्वद्य वसन्तु हस्तिनापुरे। तद्वाक्यं स विधिः श्रुत्वा पुन प्राह कुशं प्रति ॥६२॥
छत्रमाज्ञापयस्यैतांस्तवज्ञावशवर्तिनः। दास्यंति करभारं त्वां मम वाक्यं हि पालय ॥६३॥
तथेति स कुशः प्राह विधिं किंचिस्मिताननः। अथ ते सोमवंशस्था नृपाः सर्वे विधिं तदा ॥६४॥
प्रोचुर्वयं त्वया स्त्रीभिर्यास्यामो दिवमद्य वै। अजमीढोऽद्य नृपनिर्भवत्वत्र गजाव्हये ॥६५॥
तथेति तान् विधिश्चोक्त्वा सभायां समुपविशत्।
अथ नृपाऽजमीढाय ब्राह्मणैरभिषिच्य च। गजाव्हये तं राजानं चकार राघवाज्ञया ॥६६॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पूर्णकाण्डे
सोमसूर्यवंशजयो मंत्रीकरणं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चमः सर्गः
(रामका मित्रों तथा राजाओंको विदा करना)
श्रीरामचन्द्र उवाच
अथ रामं सुषेणश्च सुग्रीवश्च विभीषणः। वानराः प्रार्थयामासुर्वयं राम त्वया दिवम् ॥ १ ॥
यास्यामो नात्र जीवामस्त्वया राम विना भुवि। ददस्वाज्ञां त्वया गंतुं तथाह राघवोऽपि सः ॥ २ ॥
विभीषण त्वया स्थेयं लंकायां मम वाक्यतः। प्रचरिष्यति यावन्मे रामनामावनीतले ॥ ३ ॥
त्वं गच्छाद्यैव मे वाक्यात्तथेति स विभीषणः। नत्वा रामं ययौ लंकां राघवेणातिमानितः ॥ ४ ॥
ततः प्राह जांबवंतं राघवः पुरतः स्थितम्। हे जाम्बवंस्त्वया स्थेयं यावद्भूभ्यां कथामम ॥ ५ ॥
महीने इस संसारमें रहा ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ थोड़ी-सी आयु शेष बची थी, सा भी कल पूरी हो जायगी ॥ ५९ ॥ ठीक बारह घड़ी बाद मैं वैकुण्ठधामके लिए चल दूँगा। तदनन्तर कुशने ब्रह्माजीसे कहा कि यदि नल आदि राजे मुझे करभार दें और मेरी आज्ञानुसार चलें तो मैं आपकी आज्ञासे इनको हर तरहसे सुरक्षित रखूँगा। इनको छत्र धारण करनेका अधिकार नहीं रहेगा। अर्थात् छत्रविहीन होकर ये लोग आनन्दके साथ रह सकेंगे। कुशकी बात सुनकर ब्रह्माने कहा कि आप इन्हे छत्र धारण करनेका आज्ञा दे दीजिए। हाँ, ये सदैव आपकी आज्ञाका पालन करते हुए करभार देते रहेंगे ॥ ६०-६४ ॥ कुशने ब्रह्माकी बात स्वीकार कर ली। इसके अनन्तर उन सोमवंशी राजाओंने ब्रह्मासे कहा कि हमलोग अपनी स्त्रियें लिये हुए आपके साथ स्वर्गको चले चलेंगे। अब इस हस्तिनापुरका राजा यह अजमीढ़ बनेगा ॥ ६५ ॥ ब्रह्माने भी उनकी बात स्वीकार कर ली और सभामें बैठ गये। इसके बाद रामकी आज्ञासे ब्रह्माने ब्राह्मणों द्वारा अजमीढ़का राज्या-भिषेक कराके हस्तिनापुरीका राजा बना दिया ॥ ६६ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहित पूर्णकाण्ड चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
श्रीरामदासने कहा-इसके बाद सुषेण, सुग्रीव, विभीषण तथा अन्यान्य वानरोंने भगवान्से प्रार्थना की- हे राम ! हमलोग भी आपके साथ स्वर्गको चलगें। आपके बिना हमारा इस पृथ्वीपर जीवित रहना कठिन है। कृपया हमें भी अपने साथ चलनेकी आज्ञा दीजिए। यह सुनकर रामने कहा-हे विभीषण ! तुम मेरे कहनेसे तबतक लंकामें ही रहो, जबतक संसारमें मेरे नामका प्रचार होता रहे। तुम आज ही लंका चले जाओ। विभीषणने भी भगवान्की बात मान ली और प्रणाम करके लङ्काको प्रस्थान कर दिया। चलते समय भगवान्ने विभीषणका बहुत सम्मान किया ॥ १-४ ॥ इसके अनन्तर जाम्बवान्से बोले-हे जाम्बवान् ! जबतक इस संसारमें मेरी कथा प्रचलित रहे, तब तक तुम इसी लोकमें रहो। द्वापरके अन्तमें फिर तुम हमारा दर्शन