श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १ ] सारकाण्डम् १३
सर्गः १ ] सारकाण्डम् १३
अद्य मे सफलं जन्म प्रतीतोऽसि मम प्रभो । नमोऽस्तु जगतां नाथ नमस्ते भक्तिभावन ॥३७२॥
नमः कारुणिकान्त रामचन्द्र नमोऽस्तु ते । देव यद्यत्कृतं पुण्यं मया लोकजिगीषया ॥३७३॥
तन्मत्रं तव बाणाय भूयाद्राम नमोऽस्तु ते । ततो मुक्त्वा शरं रामस्तत्कर्म भस्मसात्करोत् ॥३७४॥
ततः प्रसन्नो भगवान् श्रीरामः करुणामयः । जामदग्न्यं तदा प्राह वरं वरय चेति सः ॥३७५॥
ततः प्रीतेन मनसा भार्गवो राममब्रवीत् । यदि मेऽनुग्रहो राम तवास्ति मधुसूदन ॥३७६॥
त्वद्भक्तसङ्गस्त्वत्पादे मम भक्तिः सदाऽस्तु वै । तथेति राघवेणोक्तः परिक्रम्य प्रणम्य तम् ॥३७७॥
पूजितस्तदनुज्ञातो महेंद्रं चलमन्वगात् । रावणेन जिता देवाः सगणो रावणो महान् । ३७८॥
सहस्रबाहुना बद्धः सोऽर्जुनो भार्गवेण हि । हतः क्षणेन समरे सोऽद्य श्रीभार्गवोऽपि च । ३७९॥
जिताऽनेनूप बाणमोचनाद्राघवेण हि । एवं श्रीरामचन्द्रस्य पौरुषं किं वदाम्यहम् ॥३८०॥
अथ राजा दशरथो रामं मृतमिवागतम् । दृढमालिङ्ग्य हर्षेण नेत्राभ्यां जलमुत्सृजन् ॥३८१॥
ततः प्रीतेन मनसा स्वस्थचित्तः पुरीं ययौ । अयोध्यायां सुमन्त्रोऽपि नृपं श्रुत्वा समागतम् । ३८२॥
नगरीं शोभयामास पताकाध्वजतोरणैः । वारणेंद्रं पुरस्कृत्य रामं प्रयुद्ययौ जरात् ॥३८३
अथो नदत्सु वाद्येषु राजा पुत्रैः सुहृज्जनैः । विवेश नगरं पौरैः पश्यन्नृत्यादिकं पथि ॥३८४॥
रामादयः स्वपत्न्यो ते राजभक्त्या ययुः पुरीम् । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्मागधादयः ॥३८५
एवं राजा गृहं गत्वा बालकैः स्वीयमश्मनि । रमापूजाः कारयित्वा ददौ दानान्यनेकशः ॥३८६॥
सदाऽलङ्कारवस्त्रार्थैः सुहृदः पार्थिवाद्यः । रामादीन्पूजयामासुस्तथा दशरथं नृपम् ॥३८७॥
रह, ऐसा कहकर प्रभु अन्तर्द्धान हो गये। मैंने भी सब वैसा ही किया ॥ ३७० ॥ हे राम ! वहां आप ब्रह्मासे प्रार्थित होकर पृथिवीपर अवतीर्ण हुए हैं, मेरे तनमें स्थित अपना तेज आपने ही फिर आज आहरण कर लिया है ॥ ३७१ ॥ आपके दर्शनसे मेरा जन्म सफल हो गया। हे भक्तिभावन ! हे जगन्नाथ ! हे करुणामय हे रामचन्द्र ! आपको नमस्कार है। हे देव ! लोकोंको जीतनेकी इच्छासे मैने जो जो कर्म किए हैं, वे सब आपके बाणको समर्पित हैं (अर्थात् उन्हें आप अपने बाणका लक्ष्य बनाकर नष्ट कर दें) ।
तब रामने बाण छोड़कर उनके कर्मोंको भस्म कर दिया ॥ ३७२-३७४ ॥ तत्पश्चात् प्रसन्न होकर करुणामय भगवान् श्रीरामने परशुरामसे कहा कि तुम वर मांगो, मैं तुमपर प्रसन्न हूँ ॥ ३७५ ॥ यह सुनकर प्रसन्न मनसे भार्गवने रामसे कहा—हे मधुसूदन राम ! यदि आप मेरेपर अनुग्रह रखते हों तो मुझे सदा आप अपार भक्तोंका संग तथा अपने विषयमें निर्मल भक्ति प्रदान करें। तब रामचन्द्रजीने 'तथास्तु' कहा। तदनन्तर परशुराम उन्हें नमस्कार तथा परिक्रमा करके और आज्ञा लेकर महेन्द्राचलकी ओर चल दिये। जिस रावणने देवताओंको जीता था, उस भारी सङ्ग्रामी रावणको सहस्रबाहु अर्जुनने बाँध लिया था। उसी अर्जुनको परशुरामने युद्ध करके क्षणभरमें मार डाला था। उन परशुरामजीको भी रामने उन्हींके दिये हुए धनुषपर बाण चढ़ाकर जीत लिया है पार्वती ! इस प्रकार रामके पुरुषार्थका वर्णन मैं कहाँ तक करूं । उनके बलका कोई अन्त नहीं है ॥ ३७६-३८० ॥ पश्चात् राजा दशरथ रामको मरकर लौटे हुए की तरह आलिङ्गन करके हर्षके आंसू बहाने लगे ॥ ३८१ ॥ बादमें प्रसन्न मन होकर वे स्वस्थ चित्तसे अयोध्यापुरी को चल पड़े। उधर अयोध्यामें सुमन्त्रने जब राजा दशरथके आगमनकी बात सुनी तो उन्होंने नगरीको पताका, ध्वजा तथा तोरणोंसे खूब सजाया और हाथी लेकर रामको लेनेके लिए आगे आये ॥ ३८२-३८३ ॥ राजा दशरथने पुत्र-मित्र तथा नगरनिवासियोके साथ रास्तेमें नृत्य आदि देखते हुए बाजे-गाजेके साथ नगरमें प्रवेश किया ॥ ३८४ ॥ राम आदिने भी अपनी स्त्रियोंके साथ हाथियोंपर बैठकर पुरमें प्रवेश किया। वेश्याएँ नृत्य करने लगीं तथा भाट आदि स्तुति करने लगे ॥ ३८५ ॥ राजाने घर आकर बालकोंसे लक्ष्मीका पूजन करवाया और अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ३८६ ॥ पश्चात् सुहृदों तथा राजाओंने वस्त्र-अलङ्कारसे राम आदिकी और राजा दशरथकी पूजा की ॥ ३८७ ॥
३७ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
दशरथोऽपि तान्सर्वान् पूजयामास वैभवैः । ततस्ते सुहृदः सर्वे नृपाश्च स्वस्थलं ययुः ॥३८८॥
प्रीत्या युधाजितं राजा स्थापयामास स्वांतिकम् । रामाद्या रमयामासुः स्वस्वदारैः स्वसद्मसु । ३८९॥
पार्वत्युवाच
श्रीविष्णोस्तु चिदंशेन जामदग्न्यस्त्वया स्मृतः ॥३९०॥
तद्वदयं राघवः किं नुद मे संशयं प्रभो ।
श्रीशिव उवाच
अष्टावंशेन विवृता अवताराश्च विष्णुना ॥३९१॥
रामकृष्णावतारी च पूर्णरूपेण तौ धृतौ । वरिष्ठौ सकलेष्वेवावतारेषु हि तावुभौ ॥३९२॥
तयोरपि वरः पूर्वः सत्यसंधो जितेंद्रियः । ज्ञेयो रामावतारो हि नानेन सदृशः परः ॥३९३॥
कृष्णः कृष्णरुचिर्ज्ञेयः श्रीरामो रुक्मसंरुचिः । एवं गिरींद्रजे प्रोक्तं सीतायाश्च स्वयंवरम् ॥
अस्य सर्गस्य श्रवणान्मंगलं लभ्यते नरैः ॥३९४॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे सीतास्वयंवरोनाम तृतीयः सर्गः ॥३॥
चतुर्थः सर्गः
(रामका शत्रु राजाओंके साथ युद्ध तथा विष्णुको वृन्दाका शाप)
श्रीशिव उवाच
अथ सीतायुतः श्रीमान् रामः साकेतसंस्थितः । बुभुजे विविधान् भोगान् राजसेवापरोऽभवत् ॥ १ ॥
शरत्कालाश्विने मासि जनकेन स्वमंत्रिणः । आहूनाय च राजानं प्रेषितास्त्वरितं ययुः ॥ २ ॥
तानागतान्दशरथः शीघ्रं सत्कृत्य सादरम् । पप्रच्छागमने हेतुं तेऽपि नत्वा तमूचिरे ॥ ३ ॥
दीपावत्युत्सवार्थं त्वां स कुटुंबं समंत्रिणम् । पौरजानपदैः सार्द्धमाह्वयामास ते सुहृत् ॥ ४ ।
तत्तेषां वचनं श्रुत्वा दूतानाज्ञापयन्नृपः । कथ्यतां नगरे राष्ट्रे गमनं मिथिलां प्रति ॥ ५॥
राजा दशरथने भी उन सबका अनेक विभवोंसे सत्कार किया । बादमें वे सब सुहृद् तथा राजा लोग अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ३८८ ॥ किन्तु राजाने प्रीतिपूर्वक युधाजित्को रोक लिया । राम-लक्ष्मण तथा भरत आदि भी अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ जाकर अपने-अपने महलोंमें रमण करने लगे ॥ ३८९ ॥
पार्वतीजी कहने लगीं—हे शिवजी ! श्रीविष्णुके चिदंशसे परशुरामजीका अवतार आपने बताया और उसीसे आपने रघुपति रामचन्द्रजीका भी अवतार बताया है । फिर इन दोनोंमें क्या अन्तर है ? सो कहकर मेरी शङ्का दूर कीजिये । श्री शिवजीने उत्तर दिया कि विष्णुभगवान्ने अपने अंशसे कुल आठ अवतार धारण किये थे । उनमेंसे राम तथा कृष्णका पूर्ण अवतार था । सब अवतारोंमें ये दो अवतार श्रेष्ठ थे ॥ ३९०-३९२ ॥ उन दोनोंमें भी सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय रामावतार उत्तम था । रामके समान और कोई नहीं था ॥ ३९३ ॥ कृष्णको कृष्णरुचिवाले तथा रामको रुक्मरुचिवाले जानो इस प्रकार शिवजीने गिरीन्द्रतनया (पार्वती) को सीताका स्वयम्वर कह सुनाया । इस सर्गको सुननेवाले मनुष्योंको मङ्गल लाभ होता है ॥ ३९४ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये 'ज्योत्स्ना-भाषाटीकायां सारकाण्डे सीतास्वयंवरो नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
श्रीशिवजी बोले हे देवि ! श्रीमान् राम सीताके साथ अयोध्यामें विविध राजभोगोंका सुख भोगने लगे ॥ १ ॥ शरत्कालके आश्विन महीनेमें राजा जनकने अपने मन्त्रियोंको महाराज दशरथको बुलानेके लिये भेजा । वे शीघ्र अयोध्या जा पहुँचे ॥ २ ॥ राजा दशरथने उनका आदर सत्कार करके आनेका कारण पूछा । मन्त्रियोंने नमस्कार करके कहा—॥३॥ आपके मित्र राजा जनकने सकुशल आपको मन्त्रियों, पुरवासियों तथा
सर्गः ४ ] सारकाण्डम् ३५
सुमुहूर्त्ते ततो राजा ह्यश्वस्थरथपत्तिभिः । पौरैर्जानपदैः साकं ययौ करिभिराजनः ॥ ६ ॥
गजः पृष्ठे समाजग्मुर्गजोपरि विराजिताः । रामलक्ष्मणभरतशत्रुघ्नास्ते स्वलंकृताः ॥ ७ ॥
कौसल्याद्या राजदाराः स्नुषाभिस्ताः पृथक् पृथक् । रत्नमाणिक्यमुक्तादिशोभितासु वरासु च ॥ ८ ॥
कारणीषु समारूढा वेष्टिता चेष्टपार्षदैः । धातुकाभिः स्वदासीभिर्ययुर्वस्त्रादिभूषिताः ॥ ९ ॥
आगतं नृपतिं श्रुत्वा जनकः पौरवासिभिः । प्रत्युज्जगाम हर्षेण निनाय नगरीं प्रति ॥ १० ॥
राघवापाणिनादैश्च दुन्दुभीनां महास्वनैः । वरांगनानां नृत्याद्यैर्गायकानां च गायनैः ॥ ११ ॥
मार्ग मार्गं महामोघा रूढस्त्रीणां कदम्बकैः । पुष्पवृष्टिविचित्राभिर्ययौ नृपगृहं नृपः ॥ १२ ॥
ततो गृहाणि रम्याणि पूरितान्यन्नवारिभिः । प्रविवेश नृपश्रेष्ठो जनकेनाभिमानितः ॥ १३ ॥
ततो नानारसुत्सादैर्मिष्टानैर्नृत्यवादवैः । वस्त्रैरभरणैः सर्वान् जामातृं च विशेषतः ॥ १४ ॥
मणिरत्नादिदीपैश्च मुहुर्नीराजनैरपि । जनकः पूजयामास दीपावल्यां महादिने ॥ १५ ॥
दीपोत्सवोर्महापुण्यैर्बलिराज्यं प्रवर्त्तते । आनन्दः मर्त्तलोकानां मंगलानि गृहे गृहे ॥ १६ ॥
अभ्यंगोद्वर्त्तनार्थेय वरपक्वान्नभोजनैः । गोदानदासीदानैश्च हस्त्यश्वरथपत्तिभिः ॥ १७ ॥
चकार तुष्टान् जामातॄन् जनको नृपतिं तथा । नृपपत्नीं स्नुदुहितॄर्योध्यास्यादिकान् क्रमात् ॥ १८ ॥
अतः प्रस्थानमकरोत्पुरिं दशरथो नृपः । ततो राजा दशरथः सैन्येन परिवेष्टितः ॥ १९ ॥
ययौ शनैः शनैर्मार्गं सुहृन्मन्त्रिपुरःसरः । एतस्मिन्नन्तरे मार्गे सीतार्थे धनुषा पुरा ॥ २० ॥
मग्नमाना नृपतयः पूर्ववैरमनुस्मरन् । अमरुयाताः ससैन्यास्ते रुरुधुर्नृपतिं पथि ॥ २१ ॥
देशवासियोंके सहित दीवालीके उत्सवपर बुलाया है ॥ ५ ॥ उनका यह वचन सुनकर राजाने दूतों द्वारा मिथिला चलनेका समाचार सारे गाँवो तथा नगरोंमें कहला दिया ॥ ५ ॥ फिर शुभ मुहूर्त देखकर राजा श्वावारूढ, गजारूढ तथा पैदल सैनिकोको साथ लेकर नगर तथा राष्ट्रके लोगोंके साथ हृष्टपुष्ट सवार होकर चले । ६ । राजाके पीछे सुन्दर अलंकार धारण करके हाथीपर सवार होकर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चले । ७ ॥ उनके पीछे कौसल्या आदि राजाकी स्त्रियां भी अपनी-अपनी पुत्रवधुओंके साथ रत्न माणिक्य-मोती आदिसे सुशोभित उत्तम हथिनियोंपर अलग-अलग सवार हो बेतधारी सिपाहियों, धाइयों तथा दासियोंसे घिरी हुई वस्त्र आदिसे भूषित होकर चल रहीं ॥ ८ ॥ ९ ॥ राजा दशरथका आगमन सुनकर राजा जनक पुरवासियोंको साथ लेकर स्वागत करनेके लिए गये और राजा दशरथको नगरमें ले आये ॥ १० ॥ रास्तेमें जगह-जगह वाद्योंका घोषनाद और नगाड़ोंका तुमुल निनाद होने लगा, वारांगनाएं नाचने लगीं, गायकोंके गान हान लगे तथा बड़े-बड़े महलोंकी अटारियोंपर स्थित स्त्रियोंके मण्ड फूलोंकी बौछार करने लगे । इस प्रकार राजा दशरथ राजभवनमें पहुंचे ॥ ११ ॥ १२ ॥ पश्चात् जनकसे सम्मानित होकर अन्न-जल आदिसे परिपूर्ण भवनोंमे पधारे ॥ १३ ॥ बादम विशेषरूपसे राजा जनकने सब जामाताओंक विविध उत्सवोस, मिष्ठान्नसे, नृत्यसे, गीतसे, वस्त्रसे, अलंकारस तथा मणिरत्नमय दीपकोंकी आरतीसे दीपावलीके शुभ दिन बारम्बार पूजन तथा सत्कार किया । १४ । १५ ॥ दीपोत्सवके महापुण्यसे राजा बलिको राज्य आरम्भ हुआ था। इससे सब लोगोंकें आनन्द हुआ तथा घर-घर मंगल होने लगा ॥ १६ ॥ राजा जनकने उन जामाताओक शरीरमें तेल और चन्दन आदि लगा तथा गुलाबजल छिड़ककर इत्र आदि लगाया और उन्हें सुन्दर पकवान जिमा तथा हाथी, घोड़े, रथ, गाड़े, प्यादे, दास तथा दासिएँ देकर जराइयों और राजा दशरथको सन्तुष्ट किया। तदनन्तर क्रमशः राजकी, स्त्रियोंको, अयोध्यानिवासियोको और अपनी लडकियोंको भी राजा जनकने यथायोग्य वस्तुएं देकर सन्तुष्ट किया ॥ १७ ॥ १८ ॥ तदनन्तर अब कि राजा दशरथ राजाओं, मन्त्रियों, सेना तथा मित्रोके साथ धीरे-धीरे अयोध्याको जा रहे थे। उसी समय उन राजाओंने जिनका कि सीतास्वयंम्बरमें मानभंग हुआ था, उस बैरका स्मरण करके असंख्य सेनाओंके साथ आकर राजा दशरथका घेर लिया। उनको देखा
३६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
तान्दृष्ट्वा नृपतींश्चापि किमेतदिति विह्वलः । मन्त्रिभिर्मन्त्रयामास जनकः स्वजनैरपि ॥२२॥
ततश्चान्तः रामः श्रुत्वा चिन्ताऽर्णवे निजम् । निमग्नं पितरं शीघ्रं ययौ लक्ष्मणसंयुतः ॥२३॥
नत्वा दशरथं रामः आश्वासयन्निदं जगौ । तात राजन्न कर्त्तव्या चिन्ता मयि स्थिते त्वया ॥२४॥
क्षणादेव बाधयिष्यामि पश्य त्वं कौतुकं मम । ततो रामवचः श्रुत्वा राजाऽऽलिङ्ग्य रघूत्तमम् । २५।
प्राह षड्वार्षिको बालस्त्वं कथं योद्धुमिच्छसि । अरण्ये मद्कुटुम्बोऽहं वेष्टितोऽस्मि नृपाधमैः ॥ २६॥
अहमेव गमिष्यामि योद्धुं त्यक्त्वा वाहिनीम् । तत्तांतवचनं श्रुत्वा रामस्तं पुनरब्रवीत् ॥२७॥
यदा मे कुण्ठितां शक्ति पश्यांमन्त्र रणांगणे । तदा मे कुरु साहाय्यं तावदत्र स्थिरो भव । २८ ।
स्थां वाहिनीं सकुडुंबां तत-त्वं रक्ष मद्विरा । इत्युक्त्वा पितरं नत्वा सज्जीकृत्य शरासनम् । २९
जगाम रथमारूढो लक्ष्मणोऽपि तमन्वगात् । ता दृष्ट्वा भरतश्चापि शत्रुघ्नोऽपि जगाम सः । ३० ।
तान्दृष्ट्वा दशसाहस्रीं राजसेना मचोदयत् । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे रथस्थं तं रघूत्तमम् । ३१ ।
निरीक्ष्य दर्शयामासुः स्वसेनायां परस्परम् । समागतोऽयं श्रीरामः स्वपितुःस्यन्दनस्थितः ॥३२॥
एष वै सुमहच्छ्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते । विशालजम्बुज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे ॥३३॥
दशश्याङ्या तस्य रथे वस्त्राद्यैरुपशोभिते ध्वजबद्धपताकोच्चकोविदारे स्थितस्त्वयम् । ३४ ।
एवं वदन्तस्ते सर्व रथेर्योद्धुं समाययुः । ततोऽभवन्महद्युद्धं घोरं तच्च परस्परम् । ३५ ।
अस्त्रः शस्त्रास्त्रगन्दिपालै शतघ्नीभिः परस्परैः । रामस्य सैनिकांस्त्यक्त्वा राजानो राममन्वयुः ॥३६ ।
ते ववर्षुर्महाऽस्त्रास्त्राण्याव्य विहायसम् । तान्दृष्ट्वा नृपतीन् सर्वान् राममेवाभिसम्मुखान् ३७॥
लक्ष्मणः प्राद्रवच्छीघ्रं भरतोऽपि च शत्रुहा । स्वामितारकयोरिवासीद्युद्धं सुदारुणम् ।३८॥
ततो नृपतयः सर्वे शस्त्रावर्षमगतं तदा । ते विव्वा मूच्छितं चक्रुः स्यन्दनात्पतितो भुवि ॥३९।
वार्ता सुनकर राजा दशरथ मन्त्रियों तथा स्वजनोंको पास बुलाकर विचार करने लगे कि यह क्या बात है ? ॥ २१-२२ ॥ अपने पिताको चिन्तासमुद्रमें डूबा सुनकर राम लक्ष्मणके साथ उनके पास गये ॥ २३ ॥ पिता दशरथको नमस्कार करके राम सान्त्वनापूर्वक कहने लगे— हे राजन् ! मेरे रहते हुए आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ २४ ॥ मैं क्षणभरमें इन सबोंको मार डालूँगा। आप मेरा कौतुक देखिये । रामके वचनको सुनकर राजाने उनका आलिंगन करके कहा हे राम, छ वर्षका बालक तू क्या युद्ध करेगा ? इस अरण्यमें सकुटुम्ब मुझको इन नीच राजाओंने घेर लिया है। इसलिये मैं ही इनको मारूँगा और तू सेनाकी रक्षा कर । पिताके इस वचनको सुनकर राम उनसे फिर कहने लगे —॥ २५-२७ ॥ जब आप मेरी शक्तिको रणाङ्गणमें कुण्ठित होते देखें, तब मेरी सहायता कीजियेगा। तबतक आप मेरे कहनेसे यहीं रहकर सकुटुम्ब अपनी सेनाकी रक्षा करें । ऐसा कहकर रामने पिताको नमस्कार किया और धनुषको ठीक करके रथपर सवार होकर चल दिये । उनके पीछे लक्ष्मण भी गये । उन दोनोंको जाता देख भरत और शत्रुघ्न भी उनके साथ चल दिये ॥ २८-३० ॥ उन सबको जाते देखकर राजा दशरथने दस हज़ार सैनिकोंकी सेना उनके साथ भेजी । उधर सब राज रथस्थित रामको आते देख अपनी सेनामें एक दूसरेको दिखाने लगे कि यह राम अपने पिताके रथपर सवार होकर आ रहा है। यह बड़ा तेजस्वी है। विशाल शालावाले पेड़के समान ऊँचे तथा शोभित कन्धोंवाला राम स्वयं कोविदार ( कचनार या रक्तकाञ्चन ) की ध्वजा लगाये हुए अपने पिताकी आज्ञासे उनके ही रथपर सवार होकर आ रहा है। ऐसा कहकर वे सब राज युद्ध करनेके लिए रथ लेकर चले। पश्चात् परस्पर बड़ा भारी युद्ध होने लगा ॥ ३१-३५ ॥ वे सब एक दूसरेपर अस्त्र, शस्त्र, तीर, तोप तथा फरसे चलाने लगे । वे राजे रामके सैनिकोंको छोड़कर रामपर झपटे ॥ ३६ । ये लोग आकाशको व्याप्त करके बड़े-बड़े शस्त्रों तथा बाणोंकी वर्षा करने लगे । उन सब राजाओंको अकेले रामके साथ युद्ध करते देख लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न भी दौड़ पड़े और उनमें तारकासुर तथा कार्तिकेयकी तरह भयानक युद्ध होने लगा। तब उन