श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २९१
सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २९१
इति सीतायचोभिः सा लोपामुद्रा जिता तदा । तूष्णीमाप क्षणं नत्रीमध्यायां लज्जिताऽभवत् । २७।
ततो विहस्य वैदेही लोपामुद्रां प्रपूजयत् । मुनिपत्नीश्च संपूज्य प्रार्थयामास ता मुहुः ॥२८॥
मयाऽपराधितं वैऽद्य तत्क्षमस्व पतिव्रते । स्नेहात्प्रणयजोत्थोक्तं न्वद्वशे गम्यतेऽहान् । २९
मद्भर्तुश्शिशुता राधे पौरुषं वेति वेद्म्यहम् । इति संप्रार्थ्य ताः सर्वा मुनिपत्नीर्विसर्जयन। ३०॥
पूजिता नृपपत्नीभिर्ययौ सीता गृहंमथ् । ततो रामोऽपि पृथिवी. पूजितो जनक विमिः ।३१॥
ययौ स नगरीं तुष्टः सीतया गरुडे स्थितः । ये ये समागतास्तत्र कुरुक्षेत्रे रविग्रहे ।३२॥
ते सर्वे स्वस्थलं जग्मु रामदर्शनहर्षिताः । रामोऽपि नगरीमध्ये पुरस्त्रीभिर्मुहुः पथि । ३३॥
नीराजितः कुंकुमार्घ्यैर्ययौ निजगृहं मुदा । रेमे जनकनन्दिन्या चिरकालं यथासुखम् ।३४ ।
एवं रामेण साकेतनृपतिर्मन्दिरुन्मया । नानाक्रोडाकौतुकानि कृतवत्यनिशं०ान्यपि ॥ ३५ ।
यथा कृतं राघवेण मुदं क्रीडा च सीतया । तथैवोर्मिलया रेमे लक्ष्मणेऽपि यथासुखम् । ३६॥
मांडव्या भरतश्चापि रेमे रामो यथा स्त्रिया । तथैव श्रुतकीर्त्याऽपि शत्रुघ्नः कोडनेऽबधात् ।।३७।
एवं ते स्त्रीपपत्नीभिः पौराः क्रू डाः प्रचक्रेिरे । तथैव विविधैर्भोपास्त्रानादेशनिवासिनः । ३८॥
रेमिरे तेऽपि पत्नीभिः स्तीयामर्मुदिताः सुखम् । सीतया राघवो रेमे यथा गौर्या स शङ्करः । ३९॥
रामे शासतिराज्येऽत्र न कोऽपि जगतीतले । परदाररतो वेश्यागामी मादकद्रव्यानुक्रू ॥४०॥
न दरिद्री नैव रोगी चिन्ताग्रस्तो न विह्वलः । न पापिन्मण्डो नाशीन गौरो नापि हिंसकः ।४१।।
एवं शिष्य मया प्रोक्त विलासचरितं वरम् सीतया रामचन्द्रस्य साकेने मौख्यदं नृणाम् ॥४२।
विलासकाण्डमेतद्धि यः पठिष्यति मानवः प्रातः काले च सन्ध्यक्षे निशायां रामसन्निधौ ॥४३।
बधयाया था। जिस बालक ने तवणका विसाव किया था और न जान कई बार मारा, सो उन्होंने कह दिखाया ॥ २७ । अब सब कोई परस्पर कहते हैं कि जिन रामने मनुष्य शिर काटेंगेग दिया था वे ही यवणान्तक पुत्र राम हैं ॥ २६ ॥ इस प्रकार माताकी बातोमे लोपामुद्रा पराजय हो गयी, थोडा देरके लिए इसपर सभाके नृपबाल बैठी हुई व कुछ लज्जित-सा हो गयीं ॥ २७।। फिर हंसकर व बाल लोपामुद्रा तथा अन्य-अन्य मुनिपत्नियोकी पूजा की ओर बारम्बार प्रार्थना करक कहा- ॥ २८ । मने जो वचन कहा है, उसे आप क्षमा करें। आपके स्नेह तथा प्रेमके आश्रय जानकर मैंने इस प्रकार रामके पौरुषका वर्णन किया है ॥ २९ ॥ हमारे पतिदेव रामके श्रीकुक पराक्रम है, यह सब आपके स्वामी अगस्त्यजीके ही माल ओफिस है। इस प्रकार विनती करक सीताने उन मुनिपत्नियोकी विदा किया ॥ ३० ॥ तदनन्तर र जगनिवा द्वारा पूजित होकर सीता राथक पास चली गयीं । राम जी उन दश-देशान्तरस अ य हुए राजाअ स विनत हो हावा-पादोका उपहार लकार पूजित हुए और प्रसन्नतापूर्वक सीताके साथ गरुडपर सवार होकर अयोध्याका चल पड़े ॥३१॥ ३२ । सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रम जो लोग स्नान करन आयथ व रामके दशनस हर्षित हो-होकर अपने-अपन घरको आपस गये । राम भी अयोध्यामे पहुंचकर नागरिक स्त्रियोके द्वारा नीराजित हुए अपन महलोम गए। इसके बाद फिर बहुत कालपर्यन्त रामचन्द्रजी सीताक साथ विहार करते रहे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ इस तरह रामने सोताक साव अयोध्यामे विचित्र प्रकारक क्रोडा-कौतुक किये ॥ ३५ ॥ जिस तरह राम सीताके साथ आनन्द करत थ, ठीक उसी तरह लक्ष्मण ऊर्मिलाके साथ सुखपूर्वक विलास करते थे ॥ ३६ ॥ उस तरह भरत माडवीके साथ तथा शत्रुघ्न श्रुतकीतिके साथ क्रीडा करते थे ॥ ३७॥ पुरवासी-गण नाना विविध प्रकार और देशके नवासी भी अपनी-आपनी स्त्रियाके साथ प्रसन्नतापूर्वक भोग-विलास करते थे । राम तो सीताके साथ उसी तरह आनन्द करते थे जैसे कैलाशप पर्वतके साथ शंकरजी स्वच्छन्द विहार करते हैं ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ रामके शासनकालम कोई भी मनुष्य दूसरंकी स्त्रियोपर आसक्त तथा वेश्यागामी नहीं था । न कोई किसी तरहकी मादक वस्तु ही खाता-पीता था ॥ ४० ॥ रामके राज्यमें कोई दरिद्र, रोगी, चिन्तातुर, विह्वल पापी, मूर्ख चोर अथवा हिंसक नहीं था ॥ ४१ ॥ हे शिष्य ! मैने तुम्हे इस प्रकार रामका सुन्दर दिललसाकाण्ड कह सुनाया। जिसमे राम और सीताका सबके लिए सुखद चरित्र भरा हुआ है ॥४२॥
| २९२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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स ज्ञेयो राघवः साक्षाद् भुवि मानवरूपधृक् । विलासकाण्डपठनाद्धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥४४॥
भोगान्याप्नोति भोगार्थी पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात् । विलासकाण्डमेतद्वै रामभक्त्येह मानवः ॥
यः शृणोति नरः कश्चित्स सुखं प्राप्नुयाद्भुवि ।४५।
विलासकाण्डश्रवणात्पापैः पापात्प्रमुच्यते । विलासकाण्डं परमं रम्यं जनमनोहरम् ॥४६॥
आनन्ददायकं चित्रं श्रुतिसौख्यप्रदं महत् । ये पठन्त्यथ शृण्वन्ति सर्वान्कामान् लभन्ति ते ॥४७॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी प्राप्नुयान्निधिम् । कामानाप्नोति कामार्थी मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ॥
निशार्धे मंचके स्थित्वा निजपत्न्या पठेत्तु यः । विलासकांडं षण्मासं तस्य पुत्रो भविष्यति ॥४९॥
अथवा मंचके श्यामं सन्निवेश्याथ तत्पुरः । द्वितीये मंचके स्थित्वा स्वयं दयितया सह ।५०॥
यः शृणोति निशार्धा हि विलासाख्यं मनोहरम् । एतत्कांडं पवित्रं च नवमासान् पुनः पुनः ॥५१॥
तस्यापुत्रस्य पुत्रः स्यान्नात्र कार्या विचारणा । पुत्रार्थमेव भोक्तव्यं मञ्चके ह्युपरिष्ट्य च । ५२।
भोक्तव्यं नान्यकामेषु मञ्चकस्थैर्नरैः कदा । विलासकाण्डमेतद्वै स्त्रीकामी यः पठेन्नरः ॥५३॥
स भार्यां प्राप्नुयाद्रूपां नवमासैर्न संशयः । कुमारी शृणुयादेतत्पत्यर्थं काण्डमुत्तमम् ॥५४॥
पुनः पुनस्तु षण्मासं लभिष्यति वरं पतिम् । विलासकांडमेतद्वै यः शृण्वन्ति वराः स्त्रियः ।५५॥
सौभाग्यलक्ष्म्या न कदा हा विहीना भवन्ति हि । भर्तुरायुरभिवृद्ध्यर्थं स्त्रीभिश्च स्नानपूर्वकम् ॥
श्रवणीय विलासाख्यमेतत्काण्ड मनोहरम् ॥५६॥
रंभाविचित्रं मधुरं पवित्र विलासकांडं हि यथैक्षुदण्डम् । पाठादिना पापचयप्रदण्डं धर्मैककुण्डं भवरोगदण्डम् ॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डे कुरंगोपाख्यानवर्णनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
जो मनुष्य इस विलासकाण्डका प्रातःकाल मध्याह्न अथवा रात्रिके समय रामचन्द्रके समीप पाठ करता है, उसे मनुष्यरूप धारण किये हुए साक्षात् राम ही समझना चाहिये । धनका इच्छा रखनेवाला मनुष्य विलास-काण्डका पाठ करनेसे धन पाता है, भोगार्थी भोग पाता है पुत्रार्थी पुत्र पाता है और जो प्राणी इसकी सुनता है, वह संसारमें सुखी रहता है ॥ ४३ ४५। विलासकाण्डका श्रवण करनेसे पापी पापसे छूट जाता है। यह विलासकाण्ड बड़ा सुन्दर और जनोंके मनको चुरानेवाला काण्ड है ॥ ४६ ॥ यह आनन्ददायक एवं विचित्र कथाओंसे भरा हुआ है। इसको सुननेसे कानोंको आनन्द मिलता है, जो लोग इसे सुनते अथवा पाठ करते हैं, उनकी सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं । ४७॥ इससे धमार्थी धर्म पाता, धनार्थी धन पाता, कामार्थी काम पाता तथा मोक्षार्थी मोक्ष पाता है ॥ ४८ ॥ रात्रिके समय जो मनुष्य छः महीनेतक अपनी स्त्रीके साथ बैठकर इस विलासकाण्डका पाठ करेगा, उसको पुत्र मिलेगा ॥ ४६ ॥ एक मञ्चपर श्यामको बैठाकर उसके आगे स्वयं अपनी पत्नीके साथ एक दूसरे मंचपर बैठकर रात्रिके समय जो इस मनोहर विलासकाण्डको नौ महीनेतक बार-बार सुनता है, उस अपुत्रके भी पुत्र होता है। इसमें किसी तरहका सन्देह करनेकी आवश्यकता नहीं है। पुत्रकी कामनावालेको मञ्चपर बैठकर इसे सुनना चाहिए । ५०-५२ । किसी दूसरी कामनावालेको मंचपर बैठकर यह कथा न सुनना चाहिए । जो स्त्रीकी इच्छासे इसका पाठ करता है, उसको नौ महीनेमें स्त्री अवश्य मिल जाती है । यदि कुमारी कन्या पतिकी कामनासे इस काण्डको सुने तो उसे सुन्दर पति मिलता है। जो सुवशा स्त्रियाँ इसको सुनेंगी वे कभी भी अपनी सौभाग्यलक्ष्मी से विहीन न होंगी अर्थात् उनका सौभाग्य अटल रहेगा। समस्त नारियोंको अपने पतिकी आयुष्य बढ़ानेके लिए स्नान करके यह विलासकाण्ड सुनना चाहिये ॥ ५३- ५६ ॥ क्योंकि यह विलासकाण्ड ईखके दण्डकी तरह मीठा विचित्र, मधुर तथा पवित्र है। यह पाठादि करनेवालोंके पापोंको मार भगानेवाला और धर्मका एकमात्र कुण्ड तथा भवरोगके लिये दंडके समान है। इस काण्डमें भी सर्वतया १७८ श्लोक हैं ॥ ५७॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतनुज पण्डित ज्वालाप्रसाद टीकायां विलासकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
* इति श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डं समाप्तम् *
श्रीसीतापतये नमः
श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-
आनन्दरामायणम्
'ज्योत्स्ना'ऽऽह्वया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्
जन्मकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
( रामका उपवनदर्शन )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामः सीतया स साकेते बंधुभिश्शिरम् । क्रीडां चकार विविधां दुर्लभां त्रिदशैरपि ॥ १ ॥
एकदा रघुवीरस्तु सोऽन्तर्वत्नीं विदेहजाम् । ज्ञात्वा धात्रीमुखात्तुष्टो ददौ दानान्यनेकशः ॥ २ ॥
ब्राह्मणान् भोजयामास कोटिशः प्रत्यहं मुदा । चकार नानालंकारान्नवीनान् रत्ननिर्मितान् ॥ ३ ॥
सीतायै दिव्यवासांसि हेमतन्तूद्भवानि च । हरितान्यथ पीतानि रक्तानि चित्रांतान्यपि ॥ ४ ॥
कारयित्वाऽथ कुशलैर्जनैः सूक्ष्माणि राघवः । विस्तीर्णान्यतिदीर्घाणि पुष्पवत्सुलघून्यपि ॥ ५ ॥
महार्घाण्यतिरम्याणि ददौ पत्न्यै मुदान्वितः । अथ मासे द्वितीयेऽह्नि रामो द्विजवरैः सह ॥ ६ ॥
वसिष्ठेन पुंसवनसंस्कारं विधिपूर्वकम् । स चकारोत्सवैर्दिव्यैः सीतायाः परमादरात् ॥ ७ ॥
सुमेधां जनकं चापि समाहूय सविस्तरम् । जनकः परमर्तुष्टः सोऽन्तर्वत्नीं निजां सुताम् । ८ ।
दृष्ट्वा पुंसवनोत्साहे सीतारामौ प्रपूजयत् । नानालंकारवासांसि हेमतन्तूद्भवानि च ॥ ९ ॥
हरितान्यथ पीतानि सूक्ष्मान्यथ लघूनि च । विस्तीर्णान्यथ दीर्घाणि सीतायै स ददौ मुदा ॥ १०॥
श्रीरामदास कहने लगे—श्रीरामचन्द्रजी सीता भरतादिक भ्राताओंके साथ चिरकाल तक देवताओंको भी दुर्लभ क्रीड़ाएं करते रहे ॥ १॥ एक दिन रामचन्द्रजीने किसी धायके मुखसे सीताके गर्भिणी होनेका समाचार सुना तो विविध प्रकारका दान दिया ॥ २ ॥ तबसे लेकर प्रतिदिन करोड़ों ब्राह्मणोंको हर्षपूर्वक रामचन्द्रजी भोजन कराते थे । अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटिल नवीन अलंकार, सुवर्णके तारोंके कामदार दिव्य वस्त्र और हरे, लाल तथा छींटके कपड़े बनाकर रामने सीताजीको दिये, जो बड़े लम्बे चौड़े और फूफसे हल्के थे ॥ ३-५ ॥ वे वस्त्र बहुमूल्य और सुन्दर थे जब एक मास व्यतीत हो गया और दूसरे महीनेका दूसरा दिन आया, तब रामचन्द्रजीने गुरु वसिष्ठ तथा बहुतसे ब्राह्मणोंके साथ विधिपूर्वक और सोत्साह सीताका पुंसवनसंस्कार किया ॥ ६ । ७ ॥ उस पुंसवनसंस्कारके उत्सवमें रामचन्द्रजीने सीताके पिता बुद्धिमान् जनकजी तथा माता सुमेधाको भी बुलाया । यह समाचार सुनकर जनकजी बहुत प्रसन्न हुए और सीताको गर्भिणी देखकर पुंसवनसंस्कारके समय ही सीता तथा रामचन्द्रजीकी पूजा की, नाना
२९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १
इन्द्रपुष्ट्यस्तुरङ्गांश्च दासीदासाम्यनोग्मान् । शिबिकाश्चापि वासांसि ददौ रामाय सादरम् ॥११॥
एवं सम्पूज्य श्रीरामं सीतां च जनकः स्त्रियाः । सम्मानिनो राघवश्चाथ ययौ स्वां मिथिलां पुरीम् ॥१२।
अथ रामः सीतया स रेमे सन्तुष्टमानसः । गर्भातिभाराक्रान्ता सा सीता मंन्यस्तभूषणा । १३ ।
पाण्डुवर्णाऽनना दीना कृशाऽपि नितरां बभौ । एकदा मधुरं पाठ्या सूचयामास जानकी । १४
ममञ्चाऽऽगमसच्छाद्यं रतुमास्ति त्वया सह । तथो पवनमध्येऽपि साकेतनगराद्वहिः । १५ ।
तद्वाक्यास्यात्प्रियाय क्यं श्रुत्वा चाहूय लक्ष्मणम्। रामोऽब्रवील्लक्ष्मणाऽथै वार्यं मधुरं स्मितपूर्वकम् । १६॥
हे सौमित्रेऽद्य सीतया जाताऽऽगमस्पृहास्ति हि। मया तु तन्मत्त्व हि सूचितोऽभि मयाऽधुना । १७ ।
तथेति रामवाक्यं सोऽप्युरीकृत्य लक्ष्मणः । गन्त्वा सभायामाहूय त्वरयामास सेवकान् ॥१८।
चित्रोष्णीषान्क्षेत्राणीनाह वाक्यं स्मिताननः । कथनीयं हट्टमध्ये ह्युगमं याति जानकी ॥१९ ।
राघवेण नतो व्य वणिग्व्यवहारिभिः । ततः सौमित्रिवचनाच्छ्रुत्वा ते क्षेत्रापालयः । २० ।
चित्रोष्णीषा रुक्मदण्डा राजमार्ग चतुष्पथे हट्ट वीथ्यामुर्ध्वहस्तास्तदा प्रोचुर्महास्वरैः । २१ ।
पौराश्च वणिजं भवे तथाऽन्ये व्यवसायिनः । शृण्वंतु हृष्टहृदयाः सीतोद्यानं प्रगच्छति । २२ ।
राघवेणाभ्यनुज्ञातेर्भविद्भिर्गम्यतां पुरः । एवं प्रेषयित्वाऽथ जग्मुन्ते लक्ष्मणं चराः ॥२३।
दूतानाज्ञापयामास पुनः सौमित्रिरादरात्। रामोगेहानि चित्राणि ह्यागमेषु समंततः । २४॥
कम्पनीशनि वेगेन शोधनीया भुवः शुभाः । जलयंत्राणि मदांसि शोधनीयानि सादरम् ॥२५
नानापांगस्कवस्तूनि सुगधीनि महान्ति च । स्थापनीयानि वै तत्र वस्त्राण्यतिलघूनि च । २६ ।
एवमदीन्यनेकानि कम्पनीशनि सादरम् मृगम्यौयाः प्रासादाः सर्वे ह्यारामसम्भवाः ॥ २७।
दिव्यवस्त्रैस्तोरणाद्यैर्मूकापुच्छैर्भगन्विताः । तथेति दूतास्ते सर्वे तदा चक्रुस्त्वरान्विताः ॥ २८॥
प्रकारके सुनहले गहने तथा बहुत जाहरे कंच, लाल रंग रंगे हुए तथा फुन्दकारतूहलुक थे। उन्हें प्रसन्नतापूर्वक माताजीको दिया। साथ ही हाथी घोडे, रथ, ऊँट, सुन्दर दास-दासी तथा पालकी आदि रामचन्द्रजीको दिया । ॥११॥ इस प्रकार राम और सीताकी पूजा करके जनकजी अपनी स्त्रीके साथ मिथिलापुरीको लौट गये ॥ १२ । उधर रामचन्द्रजी प्रसन्नतापूर्वक सीताके साथ विहार करते रहे गर्भके भारसे लदी तथा न्यस्त भूषणाका स्पर्श पीत मुख और दुर्बल अङ्गोवाली भी सीताजी बहुत ही सुन्दर दीखती थी। एक दिन सीताने विश्वासाके द्वारा रामचन्द्रजीके पास यह सन्देश कहला भेजा कि आज आपके साथ बाहिरके बगीचेमें घूमनेकी मेरी इच्छा है ॥ १३-१५ । उस धात्रीके मुखसे यह संवाद सुनकर रामचन्द्रने लक्ष्मणको बुलाया और मुस्कराते हुए कहने लगे हे लक्ष्मण ! आज माता गारे साथ नगरके बाहिरवाले बगीचेमें घूमने जाना चाहती हैं, सो उसका सब प्रबन्ध ठीक कर देना। लक्ष्मणजी 'तथास्तु' कहकर सभामें गये और सेवकोंको बुलाकर जल्दी तैयारी करवाके आज्ञा दी रंग-बिरंगी पगड़ी पहने तथा हाथमें बेंतके दण्ड लिये सिपाहियोंसे लक्ष्मणने कहा कि आज रामचन्द्रजी सीताके साथ बगीचे जायेंगें। तुमलोग जाकर नगरके व्यापारियोंसे कह दो कि वे लोग जल्दसे अपनी दूकान बढ़ाकर मार्ग खाली कर दें। इस प्रकार लक्ष्मणकी बात सुनकर ॥ १६-२० ॥ रंग बिरंगी पगड़ी पहिरे तथा सुनहरे दंड लिये हुए सिपाही चौरास्ते, गली, बाजार और कूँचोंमें हाथ उठाकर जोर जोरसे कहने लगे हे पुरवासियों, व्यापारियो तथा व्यवसायियों ! आप लोग प्रसन्नतापूर्वक हमारी बात सुनते जायें। आज सीताजी बागमें जायेंगी। इसलिए आप सब पहिले ही से वहाँ चलें । इस प्रकार सबको सुनाकर वे दूत लोग फिर अपनी ड्योढ़ीपर अर्थात् लक्ष्मणके पास लौट आये । २१-२३ लक्ष्मणजीने फिर उनको आज्ञा दी कि बगीचेमें तुम लोग जाओ और स्थान स्थानपर नाना प्रकारकी रहनेकी जगहें बनाओ और बगीचेके चारों ओरकी जमीन शुद्ध अस्त्रकी तरह साफ़ करा दो। जलयंत्रोंकी भी परीक्षा करके उन्हें ठीक कर दो ॥ २४ । २५॥ विविध प्रकारकी मांगलिक वस्तुयें और महीन कपड़े आदि लाकर वहाँ रक्खो । जो जो चीजें आवश्यक समझी जायें, वे सब प्रस्तुत रहें। बगीचेके
सर्ग १] जन्मकाण्डम् २९५
लक्ष्मणो राघवं गत्वा नत्वा स प्राह सादरम् । उद्योगसन्न होऽथैव वर्तते रघुनन्दन ॥२९॥
कुर्यां सिद्धं हि कियान् सीतायास्त्वथ वा विभो । उम्मीमित्रेर्वचः श्रुत्वा जानकीं राघवोऽब्रवीत् ॥३०॥
सीते यानं वदाद्य त्वं रुचे मनसि रोचने । तद्रामवचनं श्रुत्वा शिविकां प्राह जानकी ॥३१॥
रामोऽपि रोचयामास शिबिकामेव वै तदा । मल्लक्ष्म्या लक्षमणाद्वारि शिबिके रत्नभूषिते ॥३२॥
हेमन्तन्तूज्ज्वलैर्वस्त्रैः सर्वत्र वेष्टिते शुभे । आनयामास दूतैः सन्मुक्ताजालझणत्कृते ॥३३॥
आरुरोहाथ श्रीरामः शिविकां वरया मुदा । ततः सीता पांडुरंगा परिधेयविभूषिता ॥३४॥
कृतांगयष्टिदार्त्ताभिर्दत्तहस्ता ययौ शनैः । शिविकामारुरोहाय पृष्टलग्नोपवर्हणा ॥३५॥
वामीभिर्वीजिता चापि धृताशोकद्रुववरणा । दधार शिविकामारुरोहाथ पृष्टलग्नोपवर्हणा ॥३६॥
विमुक्तिं च मुक्ताभिः सीता स्वीयकरेण तम् । मुक्ताजालगवाक्षैश्च पश्यन्ती सा मुहुर्मुहुः ॥३७॥
राजमार्गेणयान्येव कौतुकानि समन्ततः । ददृशे नृप वेश्मानां सर्वाणि परितो वृता ॥३८॥
ततस्ते बान्धवाः सर्वे बन्धुपत्न्यश्च मातरः । शिबिकाधूपतविष्टा दिव्यासु च पृथक् पृथक् ॥३९॥
अग्रे ते भ्रातरः सर्वे ततः सर्वाश्च मातरः । सीताद्याः बन्धुपत्न्यश्च सर्वेषां पुरतो गुरुः ॥४०॥
एवं ते प्रययुः सर्वे पश्यन्तो राघवं मुहुः । ननृतुर्वारनार्यश्च नेदुर्वाद्यान्यनेकशः ॥४१॥
तुष्टुवुर्बन्दिनः सर्वे सीतां च रघुनायकम् । एव नानासमुत्साहैरागमन् मयीं मुदा । ४२ ।
राघवः सीतया युक्तः सैन्यैः सर्वत्र वेष्टितः शिविरा बासगेहे म मर्यातो रघुनन्दनः ॥४३॥
वासोरोहेषु सर्वे ते तस्थुः पौराः समन्ततः । दृष्ट्वा समन्ततश्चामत्रनृत्यंवारयोषित. । ४४॥
वासोरोहस्य सीताया भित्तयो वस्त्रनिर्मिताः । पञ्चक्रोशमितायामाश्रामन । स्ताम्बोऽपि च । ४५॥
पञ्चक्रोशमितायमे यत्र रेमे विदेहजा । ददर्श जानकी मम्म्यागम नृपमील्यदम् ॥४६॥
सब भवन अच्छी तरह सजाये जायें । उत्तम कपटकी झालरें, तोरण और माणिक के गुच्छ लटकाये जायें । वहाँ पहुँचकर दूतोंने लक्ष्मणजीके आज्ञानुसार सब कुछ तुरन्त ठीक कर दिया । १६-२८ ॥ तब लक्ष्मण रामचन्द्रजीके पास गये और प्रणाम करके सादर कहने लगे - हे रघुनन्दन ! मैने आपकी आज्ञास पूरी तैयारी कर दी है । अब महा आप और सीताजीके लिए सवारी लानेका भी आज्ञा दे दें ? इस प्रकार लक्ष्मणकी वाणी सुनकर रामचन्द्रजीने सीतासे कहा- सीन वन्याआ, आज तुम्हे कौनसी सवारी चाहिए ? सीताजीने रामजाकी बात सुनकर पालकी पसन्द की और सञ्जीन अपने लिए भी गलकी ही माँगी । रामचन्द्रजीकी आज्ञासे लक्ष्मण रानीतम विभूषित दो पालकियां मंगवायी, जिनका सुनहला कामक ओहार पड थे और चारो ओर मोतियोके झुच्छ लटक रहे थे ॥२६-३३॥ तब प्रसन्नतापूर्वक रामचन्द्रजी पालकीपर सवार हुए और पोरंसे भूषणान्का पहन हुए सीता भी दाभियाक हाटक सहारे शनै शनै जाकर पालकीपर बैठीं । उसमें चारो ओर नकचया लगी हुई थी । शक्कियां पंखे झलने लगी । ओहतर डाल दिया गया और पालकी चल पडी । रस्तेम सीताजी पालकीक दरीवेसे उन दृश्योका देखती जाती थी, जो वहांपर थे। उसक अनन्तर रामचन्द्रजीके और भाई भा तथा उनकी त्रियवें और मातायें अलग-अलग दिव्य पालकियोपर बैठ-बैठकर चलीं । अग्रे आगे भाइयोकी, फिर माताओकी, फिर सीतादिक पत्नियोकी और सबसे आगे गुरु वसिष्टजाका पालकी चली ॥ ३४-४० ॥ इस प्रकार सब लोग रामचन्द्रजीका दर्शन करते हुए चल जा रहे थे । वेश्याये नाच रही थीं और नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे । बन्दीगण सीता और रामजीकी वन्दना कर रहे थे । इस प्रकार कितने ही तरहके उत्साहाँके साथ वे सब नगरीमे पहुँचे । रामचन्द्रजी सीताके साथ-साथ सेनाओसे घिरे हुए एक तम्बूमें उतरे । ४१-४३ ॥ इसके बाद और लोग भी तम्बुओंमें टिके । साथ ही समस्त नगरवासी लोग भो बागों और तम्पुओमे ठहर गये । चारों ओर हाट लग गयी और वैश्यायें नाचने लगीं । ४४ । जिस स्थानपर रामचन्द्रजी अपने पुरवासो नागरिकोंके साथ ठहरे थे,
२९६ आनन्दरामायणे [ सर्ग १
रसालयं रसालैस्तैरशोकैः शोकनाशनम् । तालैस्तमालैर्हिन्तालैः शालैः सर्वत्र शोभितम् ॥४७॥
खपूरैः सपूगैश्चापि श्रीफलैः श्रीफलं किल । डुकुलिश्च स्वगुरुभिः कपित्थिमं कपित्यकैः ॥४८॥
स्तन अथः कुब्जकार्लेजुंश्च मनोरमम् । सुधार्कसममारम्भैरम्भोधः परिभाशितम् ॥४९।
सुरंगांश्चापि नारङ्गैरङ्गमण्डपवत्स्थितः । शानीरैश्चापि जंबी रैर्बीजपूरैः प्रपूरितम् ॥५०॥
मन्दान्दोलितपूर्पकदलीललल्लतया । विश्रमाय श्रमापन्नानाह्वयन्निवाध्वगान् ॥५१॥
पुन्नाग इव पुन्नागपल्लवैः करपल्लवैः । कल्पयन्निव्रालोलैर्मल्लिकास्तनकस्तनम् ॥५२॥
विदीर्णदाडिमैः स्वान्तं दर्शयन्ननुरागतत् । माधवीस्वरुपेण श्लिष्यतमिव कानने ॥५३॥
उदुम्बरैर्नरन्तफलशालिभिः । ब्रह्मांडकोटिविप्रन्नमनन्तमिव सर्वतः ॥५४॥
पद्मनामैननासाभिः शुकनामैः पलाशकैः । फलव्याजाद्दिशन्त्या पत्यन्यक्कैविवामृतम् ॥५५॥
कदंबवादिनो वीशान्दृष्ट्वा कंटकितैरिव । समन्ततो भ्राजमानं कदंबककदंबकैः ।५६॥
नमेरुभिश्च मेरोश्च शिखगैरिव राजितम् । राजादनैश्च मदनैः सदनैरिव कामिनाम् ॥५७॥
समंततः पटुपटैरुच्चैः पट्कुटीकृतम् । कुटन्नस्तवकैर्यातमधिग्रिन्नवकैरिव ॥५८॥
करमर्दैः करोरैश्च करजैश्च कदंबकैः । मद्रुककवचनमधिप्रन्युद्धतैः करैः ॥५९।
नीराजिनमिरोहीपै राजचंपककोरकैः । मधुपश्चान्तमलीभिश्च जिनपद्याङ्गश्रियम् ॥६०॥
क्वचिद्वटदलैरुच्चैः कचिन्काञ्चनकेतकैः । कृतमालैर्नक्तमालैः शोभमानं क्वचित् क्वचित् ॥६१॥
कर्कन्धुवन्धुजीवेश्च पुत्रजीवैरिवान्वितम् । मरिंदुकैरूद्दीमिश्च करुणैः करुणालयम् ॥६२॥
उसका विस्तार पांच कोसका था। पांच कोसके अन्दर मोर बगीचेमें जहाँ रामचन्द्रजी ठहरे थे, सीताजी प्रसन्नतापूर्वक विहार करने और उस सुन्दर बगीचेको खूब अच्छी तरह देखने लगीं ॥४५, ४६॥ उसमें रसालक वृक्ष वास्तव्य रसके आलय और अशोकके वृक्ष शोकको दूर करनेवाले थे ताल, तमाल, हिन्ताल और शालक वृक्ष चारो ओर सुशोभित हो रहे थे ॥४७॥ खजूरके वृक्षोंसे वह बगीचा खपूर (स्वर्ग) सदृश लग रहा था और श्रीफलसे श्रीफलके सदृश था। बकुल, न्यग्रोध अर्थात् वट और कैथ तथा कैथके वृक्षोंसे कपित्थ-वर्गका हो रहा था ॥४८॥ वनस्थलीके वृक्षोंके समान लकुच ( बड़हर ) के वृक्ष लगे हुए थे, अमृतफलका नाईं वेलेसे युक्त लग हुए थे ॥४९॥ सुन्दर रङ्गालये नारङ्गीके वृक्षोंसे रङ्गमण्डपकी शोभा हो रही थी। पानीर, जंबीर, बीजपूर आदिके वृक्षभी उस बगीचेमें कुछ कम नहीं थे ॥५०॥ धीरे-धीरे वायुके झोंकेसे झूमता हुआ केलेका पन्ना मानो एक हुए बटोहीयॉको हाथके मतलसे विश्राम करनेके लिए बुला रहा था ॥५१॥ पुन्नागको सदृश पुन्नागके पल्लव करपल्लवके समान थे और मल्लिकाके गुच्छे स्तनके समान दीखते थे ॥५२॥ अनारके फटे हुए फल मानो अपना हृदय फाड़कर हार्दिक प्रेम प्रदर्शित कर रहे थे। सुन्दरता खुद लम्बान्तीहुइ वृक्ष था, जिससे असंख्य फल लग हुए थे। वह करोड़ों ब्रह्माण्डोंको धारण किये हुए साक्षात् अनन्त भगवान्के सदृश मालूम पड़ता था। उपवनकी नासके समान इतरूटके वृक्ष तथा तोतेकी नासके समान पलाशके वृक्ष लगे हुए थे। कण्ट-कित पुष्पवाले कदम्बके वृक्षोंको देखकर रोमांच हो जाता था ॥५३-५६॥ नमेरूके वृक्ष को देखकर सुमेरुशृङ्गकी याद आ जाती थी। राजादनके वृक्ष कामियोंका मदनके भवन सदृश दीखते थे ॥५७॥ चारों ओर लगे हुए पट्टकूटके वृक्ष पट्टहर्टके सदृश दीखते थे । कुटजके गुच्छे से युत बगुलेके सदृश मालुम पड़ते थे ॥५८॥ जहाँ तहाँ करौंद, करीर, कंज, कदम्ब आदिके बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्ष हजारौं हाथ उठाये याचकौके समान मालूम पड़ते थे ॥५९॥ राजचम्पक तथा डाँडेगाके वृक्ष मानों आरती बनकर उस बगीचेकी आरती उतार रहे थे फूलोंसे लदे हुए रेशमके वृक्ष शय्यावस्रकी शोभाको भी पराजित कर रहे थे ॥६०॥ कहीं फड़फड़ाते हुए पत्तोंवाले वटक्के बड़े-बड़े वृक्षोंसे, कहीं सुन्दरसी कनकके छोटे-छोटे पौधोंसे, कहीं कृतमाल और नक्तमालके वृक्षोंसे वह बगीचा सुशोभित हो रहा था ॥६१॥ बेर, बन्धुजीव तथा पुत्रजीवक वृक्ष लग थे । तेंदु, इङ्गुदी, करुण आदि वृक्षोंसे यह बगीचा करुणामय हो रहा था । टपकते हुए महुएके फूलोंको देखकर मालूम होता
सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् २९७
गलन्मधूककुसुमैर्धरायापधरं हरम् । स्वहस्तमुक्तमुक्ताभिरर्चयन्तमिवानिशम् ॥६३॥
सर्जार्जुनाम्रैर्बीजैश्च व्यजनैर्वीज्यमानवत् । नारिकेलैः सखर्जूरैर्धृतच्छत्रमिवांबरैः ॥६४॥
अमदैः पिचुमन्दैश्च मंदारैः कोविदारकैः । पाटलार्तिन्तिणीधौटाशाखोटैः करहाटकैः ॥६५॥
उद्दण्डैरपि सेहुण्डैर्गुंडपुष्पैर्विराजितम् । बकुलैस्तिलकैश्चैव तिलकांकितमस्तकम् ॥६६॥
अक्षैः प्लक्षैः सल्लकीभिर्देवदारुहरिद्रुमैः । सदाफलसदापुष्पवृक्षवल्लिविराजितम् ॥६७॥
एलालवंगमरिचकुलंजनवनावृतम् । जम्ब्वाम्रातकभल्लात शेलुश्रीपर्णिपर्णितम् ॥६८॥
शाकशखवनं रम्यं चन्दनै रक्तचन्दनैः । हरीतकीकर्णिकारधात्रीवनविभूषितम् ॥६९॥
द्राक्षावल्लीनागवल्लीकर्णवल्लीशतावृतम् । मल्लिका यूथिकाकुंदमदयन्तीसुगंधितम् ॥७०॥
तुलसीवृक्षषंडैश्च शिवत्यगस्तिद्रुमैर्युतम् । भ्रमद्भ्रमरमालाभिर्मालतीभिरलंकृतम् ॥७१॥
अलिच्छलागतं कृष्णं गोपी रंतुमनेकशः । सुगंधवातं सुखदं कामसञ्जनकं परम् ॥७२॥
नानामृगगणाकीर्ण नानापक्षिनिनादितम् । नानासरित्सरःश्रोतः पल्वलैः परितो वृतम् ॥७३॥
उत्सृजतमिवार्थं वै रत्नपुष्पैस्तितस्ततः । केकि केकारवैर्दूरात्कुर्वन्तं स्वागतं किल ॥७४॥
एतादृशं सुपवनं जानकी तद्ददर्श सा । तुष्टाऽभूद्दर्शनेनैव विचचार स्थितस्ततः ॥७५॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकांडे नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
था कि मानो शिवजी धरणीका रूप धारण किये हुए हैं और अपने ही हाथसे अपनेपर मोतियोंकी वर्षा कर रहे हैं। ६२ ॥ ६३॥ सर्ज, अर्जुन, बीजपूर आदिके वृक्षोंसे ऐसा मालूम होता था कि वे सब बगीचेको पंखा झल रहे हैं। नारियल तथा खजूरके वृक्ष छत्र धारण करनेवाले सेवक जैसे थे। अमद, पिचुमन्द, मन्दार, कोविदार, पाटल, तिन्तिणी, धोंटा, शाखोट, करहाटक, ऊँचे डण्डेवाले सेहुंड और गुंडहूलक वृक्ष भी उस बगीचेमें यत्र-तत्र लगे हुए थे। बकुल और तिलकके वृक्ष उस बगीचेके मस्तकपर तिलकके समान मालूम पड़ते थे ॥ ६४-६६ ॥ अक्ष, प्लक्ष, सल्लकी, देवदारु, हरिद्रुम, सदाफल, सदापुष्प और वृक्षवल्ली आदिके वृक्ष भी उस बगीचेमे लगे हुए थे ॥ ६७ ॥ इलायची, लौंग, मरिच तथा कुलंजनके वृक्षोंसे वह समस्त बगीचा भरा हुआ था। जामुन, आम्र, भल्लातक, श्रीपर्णी आदि वृक्षोंसे उस बगीचेकी रंगीली शोभा देखते ही बनती थी ॥ ६८। शाक तथा शलवनके वृक्षोंसे रमणीक एवं चन्दन, हरीतकी, कर्णिकार, आंवला आदिके वृक्षोंसे वह विभूषित था ॥ ६९ । जिनमें सैकड़ों अंगूरकी लताएं तथा पानकी बेले रमी हुई थीं। मल्लिका, जूही, कुन्द और मदयन्तीके वृक्षोंसे वह बगीचा सुगन्धित हो रहा था ॥ ७० ॥ उसमें कितने ही तुलसी, सहिजन तथा अगस्तके वृक्ष लगे हुए थे जिनपर भौंराकी श्रेणी चक्कर काट रही थी, ऐसी मालतीके वृक्षोंसे वह अलंकृत था ॥ ७१ ॥ जिस समय मालतीके समीप भौंरा आता था, तब देखनेवालेके हृदयमें यह उत्प्रेक्षा होती थी कि मानो श्रीकृष्ण गोपियोंके साथ विहार करनेके लिए आये हैं ॥ ७२ ॥ उस बगीचेमें बहुतसे मृग चोकड़ियां भरा करते थे, विविध प्रकारके पक्षी बोलते रहते थे, कितनी ही नदियों तालाबों, स्रोतों तथा गडहोंसे वह बगीचा घिरा हुआ था ॥ ७३ । बगीचेके वृक्षोंसे गिरे हुए फूल किसी दानीकी धनराशिके समान लगते थे। मयूरोंकी आवाजसे ऐसा मालूम पडता था कि मानों वह बगीचा अपने यहाँ आनेवालोंका स्वागत कर रहा है ॥ ७४ ॥ इस प्रकारके उस सुन्दर उपवनको सीताने देखा । देखते ही उनका चित्त प्रसन्न हो गया और वे इधर उधर घूमने लगीं ॥ ७५ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
२९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २
द्वितीयः सर्गः
( रामसीताका उपवनविहार )
श्रीरामदास उवाच
अथ सीता राघवेण रम्योपवनभूमिषु । क्रीडञ्चकार विविधाश्चिन्त्यैरपि सुरैर्नुताः ॥ १ ॥
कदा वनान्तःप्रागङ्गे कदा वस्त्रगृहेष्वपि । कदाऽऽम्रवृक्षच्छायायां कदा पुष्पवनेषु सा ॥ २ ॥
कदा सा जलप्रश्रावां सर्वयन्त्रवरासने । कदा सरोवरतटे कदा नगान्तरेऽपि च ॥ ३ ॥
नौकास्था मन्दतोये सा रामेणञ्चक्रे कदा । कदा रात्रौ जलक्रीडामथ दिनाऽपि कदा मुदा ॥ ४ ॥
कदा तटाके नौकास्था कदा रम्यावनेषु सा । कदा वृक्षोध्वगेहेषु कदलीगृहेष्वपि ॥ ५ ॥
कदा सा सुरयन्त्राणां निर्मितेषु गृहेषु वा । कदा कृत्रिमगेहेषु पुस्तगेहेषु सा कदा ॥ ६ ॥
कदा सा चित्रशालायां पुष्पके वा कदा मुदा । कदा सा केतकीपत्रैः कृतकञ्चुकमम्बरनि ॥ ७ ॥
कदा नौकोर्ध्वगेहस्था गन्धर्वाः सैकते कदा । एकस्तम्भोर्ध्वगेहेऽपि सखीभिः परिवेष्टिता ॥ ८ ॥
कदा रामेण रहसि कदा दोलकसंस्थिता । पर्यङ्कचक्रमध्यस्था कदा सा दाडिमीवने । ९ ।
सूक्ष्मवस्त्रपर्यङ्कसंस्थिता राघवेण हि । चकार सा कदा क्रीडां षोड़शांगी सुसुन्दरी ॥१०॥
हरिद्वस्त्रयुतस्कन्धयुक्ता जातकौतुका । गोपयित्वा निजं देहं सीता वृक्षदलैर्धनैः ॥११॥
सकार व्याकुलं रामं विनोदेन स्मितानना । ज्ञात्वात्मानं राघवेण दृष्टां मत्वाऽथविध्य च ॥१२।
दुद्राव संभ्रमाद्रामं कण्ठे दोर्लतयोर्बभौ । एवं सीताराघवयोः क्रीडनं परमाद्भुतम् ॥१३॥
विस्तारेणेह को वक्तुं समर्थः पृथिवीतले । एक एव समर्थोऽभूद्वान्मीकिर्मुनिपुंगवः ॥१४॥
शतकोटिमितं येन चरितं वर्णितं तयोः । सारं सारं मया यस्माद्गृह्यते तत्प्रवर्ण्यते ॥१५॥
गन्धर्वीणां कदा नृत्यं सीताऽपश्यद् ददर्श सा । कदा शुश्राव वाद्यानि मङ्गुलानि महोति च ॥१६॥
श्रीरामदासजी कहते हैं इसके बाद सीता रामचन्द्रजीके साथ उस रमणीक उपवनमें देवताओं द्वारा प्रशंसित विविध प्रकारकी क्रीड़ायें करने लगीं ॥ १ ॥ कभी उस बगीचेके बगलेमें, कभी तम्बूके भीतर, कभी शाम्रवृक्षकी छायामें कभी फूलोंकी शय्याओंमें कभी फौव्वारेके समीप बने हुए किसी एक सुन्दर आसनपर, कभा सरोवरके तटपर और कभी नहर के समीप जाकर बिहार करती थीं ॥ २ ॥ ३ ॥ कभी वे नौकापर सवार होकर मन्दगति मन्दम गन्धके साथ बिहार करतीं थीं कभी रात्रिके समय और कभी दिनमें ही जल-क्रीडा करती थीं ॥ ४ ॥ कभी सरोवरमें नौकापर कभी-कभी उत्तम तथा वृक्षके ऊपर बने हुए भवनमें, कभी सुन्दर सुन्दरालय कभी कदली भवन कभी अन्य भवनोंमें, कभी बनावटी मकानोंमें, कभी पुस्तकोंकी कभी चित्रण कभी मण्डप विमानपर कभी मयूरके समूह और कभी एक खम्भेके ऊपर बने भवनमें समय साथ बिहार करती थी । ५-८ । कभी नौका के ऊपर बने बंगलेमें, कभी बालूकी वेदीपर कथा अपनी सखियोंके सहित एक खंभपर ऊपर बनी हुई जगह अंदर जाकर कभी रामके साथ एकान्तमें कभी झूलेपर बैठकर, कभी चक्करदार पलंगपर कभी अनारके बगीचेमें और कभी किसी वृक्षके समान पड़े हुए पलंगपर सुहावने वस्त्रोके दुकाल सीता रामके साथ साठ क्रीड़ा करती थी । ८-१० । वे कभी हरे रङ्गके कपड़े तथा साठ कंचुकी पहनकर रामके साथ क्रीड़ा करती हुई वृक्षोंके घने पत्तोंमें छिपकर रामको व्याकुल कर देतीं और स्वयं सिर्फ हँसी मुखपर रखती थीं । जब वे समझतीं कि रामने लख लिया है तो दौड़ती हुई आतीं और रामके गलेमें गलबहियाँ डालकर उनके हृदयसे लिपट जाती थीं । इस प्रकार सीता तथा रामका अद्भुत कौतूहल हुआ करता था ॥ ११-१३ ॥ इस विस्तारपूर्वक कहनेको सामर्थ्य भला किसीमें है ? हाँ एकमात्र महर्षि वाल्मीकिजी समर्थ हुए थे, जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें उनके चरितोंका वर्णन किया है । उनमेंसे सार-सार लेकर मैं तुमसे कह रहा हूँ । १४ । १५ ॥ कभी सीताजी उस बगीचेमें वेश्याओंके नृत्य देखती थीं