श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ८] सारकाण्डम् ७३
सर्गः ८] सारकाण्डम् ७३
निश्चितं मनसा वाली दुर्मदेन हतस्त्विति । एतस्मिन्नन्तरे श्रुत्वा किष्किन्धां विपुवेदिताम् ॥१६॥
गुहाद्वारे शिलामेकां निधाय दुर्मदस्य च । यन्मतो मार्गरोधार्थं किष्किन्धामगमं स्वयम् ॥१७॥
मां दृष्ट्वा रिपवः सर्वे वेगाच्चक्रुः पलायनम् । अनिच्छतं मन्त्रिणो मां तद्राज्ये समवेशयन् ॥२०॥
ततो दृष्ट्वा रिपुं वाली दृष्ट्वा मां स्वपदस्थितम् । संताड्य नगरान्मां स बहिर्न्यष्कासयत्तदा ॥२३॥
ततः स सर्वदेशेषु वादयामास दुन्दुभिम् । भूपां सुग्रीवपाता यः स वध्यो भवेदिति ॥२४॥
ततो लोकान्वरित्यज्य ऋष्यमूकं मयाऽऽश्रितः । एकदा दुन्दुभिर्नाम दैत्यो महिषरूपधृक ॥२५॥
युद्धाय वालिनं रात्रौ समाह्वयत वीर्यवान् । ततो वाली समागम्य धृत्वा शृंग करेण तु ॥२६॥
हस्ताभ्यां सन्विभञ्जिच्छित्वात्रोत्थिप्याऽक्षिपद्द्रुति। पतितं तच्छिरो रात्रौ मतङ्गाश्रममात्रतः ॥२७॥
रक्तवृष्टिः पपातोर्व्यामन्तःकोधादथर्षन्दधा। यद्यागतोऽसि मे वालिन् गिरिं शीघ्रं ममापये ॥२८॥
एवं शप्तस्तदारभ्य ऋष्यमूकं न यात्यसौ । प्रतिज्ञां ते करोम्यद्य सीतां चात्र समानये ॥२९॥
यदा नीता रावणेन तदा दृष्टा मयाऽत्र खे । बद्ध्वोत्तरीये क्षिप्तानि पश्य त्वं भूषणानि हि ॥३०॥
इत्युक्त्वा दर्शयामास सुग्रीवो भूषणानि हि । तानि दृष्ट्वाऽब्रवीद्वन्धुं रामस्येव निश्चय वद ॥३१॥
न्याराण्यानि सीतायास्तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणोऽब्रवीत् । न वेद्म्यहं ममस्थानं वेधयन्नुलितानि हि ॥३२॥
वदने यानि दृष्टानि मया नित्यं स्पृदह । ततो रामोऽतिमन्तुष्टो लज्जां सीतायमन्वयत् ॥३३॥
सुग्रीववचनाद्रामः प्रत्ययार्थं तदा क्षणात् । पादांगुष्ठेनाक्षिपत्तद्दुन्दुभेः शिर उत्तमम् ॥३४॥
किन्तु वह बाहर नहीं आया । मैंने जब गुहामें निकलता हुआ रुधिर देखा तब मनमें विचार कर कि दुर्मद दानवने वालीको मार डाला । उसी समय यह सुनकर कि शत्रुने किष्किन्धाको घेर लिया है मैंने गुहाके द्वारपर एक बड़ा भारी शिलाखण्ड रख दिया और निश्चय कर लिया कि अब दुर्मदका मार्ग रुक गया है । वह यत्न करके भी बाहर नहीं निकल सकेगा । तब मैं अपनी किष्किन्धा नगरीमें चला आया ॥१६-२१॥ मुझे देखनेके साथ ही सब शत्रु भाग गये और मेरी इच्छा न रहनेपर भी मन्त्रियोंने मुझे गद्दीपर बैठा दिया ॥२२॥ पश्चात् वाली भी शत्रुको मारकर घर आया और मुझ अपने पदपर बैठा देखा ता मुझको पीटकर उसी समय नगरसे बाहर निकाल दिया । २३॥ साथ ही सब देशोंमें उसने डिण्डोरा पिटवाकर कहला दिया कि जो कोई सुग्रीवको शरण देकर क्षमा करेगा, वह मेरा अपराधी होगा और मार डाला जायगा ॥ २४ ॥ तदनन्तर सब देशोंमें घूमकर मैंने इस ऋष्यमूक गिरिका आश्रय लिया यहाँकी कथा यह है कि एक दिन दुन्दुभि नामक दैत्य भैंसका रूप धरकर रात्रिके समय बालके यहाँ गया और उसको युद्धके लिये ललकारा । तब वह आकर अपने हाथसे उसकी सींग पकड़ लिया और खींचकर उसका शिर धडसे उखाड़लिया पुनरपि दूर फेंक दिया जिससे उसका वह शिर मतङ्ग ऋषिके आश्रममें जा गिरा ॥ २५-२७ ॥ इससे मतङ्गऋषिके ऊपर भी रुधिर गिरा । तब उन्होंने कुपित होकर इस बातपर शाप दिया कि 'अरे वालिन् यदि मेरे पर्वत तथा आश्रमके पास तू आवेगा तो तुरन्त मर जायगा' ॥ २८ ॥ इस शापसे डरकर वाली यहाँ कभी नहीं आता। हे राम ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपकी भार्या हो ले आऊँगा ॥ २९ ॥ जब रावण उनको ले जा रहा था, तब यहीं बैठे हुए मैंने आकाशमें देखा था। उस समय सन्तान अपनी साड़ीमें बाँधकर कुछ आभूषण नीचे फेंक थे। वे यहाँ हैं, आप उसे देखें ॥ ३० ॥ इतना कहकर सुग्रीवने वे आभूषण दिखलाये । उन्हें देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा- हे भाई ! तुम इन्हें देखकर ठीक ठीक बतलाओ कि ये जानकी के हैं या नहीं। बड़े कृतज्ञतासे जानकीके आभूषण देख ही रहा है। यह सुनकर लक्ष्मणने कहा कि मैं सबको तो नहीं पहचानता, परन्तु पाडकी अँगुलीके नूपुरके वाक्य अवश्य कह सकता हूँ कि ये सीते के ही हैं। कारण कि मैन प्रणाम करते समय केवल उनके पाँव देखे हैं-अन्य अङ्ग नहीं देखा। यह सुनकर राम प्रसन्न हुए और 'अब सीता मिल गयी' ऐसा समझा ॥ ३१-३३ । तदनन्तर सुग्रीवका विश्वास दिलानेके लिए उसी समय रामने अपने पाँवके अँगूठेसे मारकर दुन्दुभीके बड़े विशाल सिरको
| ७४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ८ |
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दशयोजनपर्यन्तं तथा बाणेन वै पुनः । चक्राकारान् सप्त तालान् दृष्ट्वा देहे महोः प्रभुः ॥३५॥
स्वोयांशुष्ठेन पीमितैः पदं किंचिद्विपर्य्ययम् । ऋजुं कृत्वा पन्नगं तं शेषांशेन स्थित भुवि ॥३६॥
सुग्रीवप्रत्ययार्थं हि सप्त तालान् बिभेद सः । गुहायामर्कदा तालफलादि स्थापितनि हि ॥३७॥
बलिना मम नीतानि तेन सर्पं ददर्श सः । नमश्चपञ्चापि वृक्षाश्च भविष्यन्तीति वानरः ॥३८॥
सर्पिण्याहृद्य तान् छेत्ता यस्ते हन्ता न संशयः तद् दृष्ट्वा रामसामर्थ्यं तस्मिन्प्रत्ययमाप सः ॥३९॥
सुग्रीवस्त पुनः प्राह राघवं तुष्टमानसः वालिन सुगनाधेन पुरा दत्ताऽस्ति मालिका ॥४०॥
यां दृष्ट्वा रिपवो युद्धे गनवीर्या भवन्ति हि । या पुरा कश्यपेनैव तपसा दूकरण च ॥४१॥
शिवाल्लब्धा पिता पुत्रमिन्द्रं सेनापि वालिने । प्रीत्या दत्ता मालिका सा चल कण्ठे दधान्यसौ ॥४२॥
तस्यास्त्वं दर्शनाद्राम शत्रुमग्णो भविष्यसि तत्रापायं विन्त्यस्व येन तेऽद्य जयो भवेत् ॥४३॥
तस्यैवं वचनं श्रुत्वा रामः सर्प तमब्रवीत् । यः शामन्मोचनः पूर्वं मम नालेनबिभ्य च ॥४४॥
गच्छ त्वं मम शापेन किष्किन्धायां भयालिनम् । निर्भयो निद्रितं दृष्ट्वा हर तन्मालिकां शुभाम् ॥४५॥
तथैव रामवाक्येन किष्किन्धांपेत्य पन्नगः मचकण्ठा सम्हृत्य ता मालां वायवे ददौ ॥४६॥
ततो रामाज्ञया गत्वा समाहूयाथ वालिनम् । युद्धं चकार सुग्रीवः श्रीरामोऽपि ददर्श तम् ॥४७॥
समानरूपौ तौ दृष्ट्वा मित्रघातविशङ्कया न मुमोच तदा बाणं गमः सोऽपि न्यवर्त्तत ॥४८॥
सुग्रीवो राघवं प्राह मां घातयसि वालिना । यदि मद्वधनं वाञ्छा त्वमद्य जहि मां विभो ॥४९॥
तत्तस्य वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य रघूत्तमः । बन्धय मास सुग्रीवकण्ठे मालां तु बन्धुना ॥५०॥
दूर फेंक दिया ॥ ३४ ॥ वह दस योजनकी दूरीपर जा गिरा। फिर आकाशमें सबने गोलाकार जमे हुए सात तालवृक्षोंको देखा तब रामने पृथ्वी पर शेषके अंशसे स्थित पन्नगके नीचेका अपना पाँवके अङ्गूठेसे दबाकर उस सर्पको सीधा किया और बाणसे उन सात वृक्षोंको एक ही बारमें काट डाला ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ऐसा करके उन्होंने सुग्रीवका विश्वास दिलाया कि राम में सहायता करने और वालीको मारनेमें समर्थ हैं। तब समयकी बात है कि वालीने अपनी गुफामे तालके कुछ फल रक्खे थे। उन्होंने नागफण कोई उठा ले गया। वालीने कहा तो उस गुहाँ फलोंको ज्योंका त्यों लाके रख दिया। तब नागाने सुग्रीवको शाप दे दिया कि सा तेरो ऊपर सात ताल वृक्ष उगेंगे ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ तब सर्पने भो कहा कि जो इन वृक्षोंको काटेगा, वही तुम मारेगा -इसमें सन्देह नहीं है। इसी सामर्थ्यको आज राममें देखकर सुग्रीवको विश्वास हो गया ॥ ३९ ॥ तब प्रसन्न होकर सुग्रीवने कहा- पूर्वसमयमें इन्द्रने वालीको एक माला दी थी, ४० ॥ जिसे देखकर इसके शत्रु युद्धमें बलहीन हो जाते हैं। कठिन तपस्या तय करनेपर वह माला कश्यपको शिवजीसे मिली थी। कश्यपजी से वह अनमोल पुत्र इन्द्रको दी और इन्द्रने वालीको अर्पण की। प्रीतिपूर्वक अर्पित की हुई उस मालाको बाली सदा गलेमें पहिने रहता है ॥ ४१, ४२ ॥ हे राम ! उसको देखकर शायद आप भी कर्महीन हो जावेंगे। अतएव इस विषयमें कोई उपाय सोचिए जिससे आपकी विजय हो ॥ ४३ ॥ सुग्रीवके इन वचनोंको सुनकर राम, जिसको बाणके द्वारा सात तालवृक्षोंको काटकर शापसे मुक्त किया था उस सर्पसे कहा कि तुम मेरे कथनानुसार किष्किन्धा-में जाकर रात्रिके समय जब कि बाली सोता रहे तब इसके गलदेशसे उस सुन्दर मालाको चुरा लाओ ॥ ४४ । । ४५ । 'तथास्तु' कहकर वह साँप रामके आज्ञाके अनुसार किष्किन्धा नगरीमें गया और चुपचाप से उस मालाको चुराकर इन्द्रको दे आया ॥ ४६॥ तदनन्तर रामकी आज्ञासे सुग्रीवने बालीके पास जाकर उसको युद्ध के लिये ललकारा और युद्ध किया। उस युद्धको राम देख रहे थे किन्तु उन दोनों भाइयोंको समान रूपवान् देख धोखेसे कहीं मित्र सुग्रीव ही न मारा जाय इस आशङ्काके कारण रामने बालीपर बाण नहीं छोड़ा। तब सुग्रीव रामके पास लौट आया और रामसे बोला कि मुझे आप वालीके हाथों क्यों मरवाना चाहते हैं? यदि मुझे मारनेकी ही इच्छा हो तो हे विभो ! आप ही मार डाल ॥ ४७-४९ ॥ सुग्रीवके इस वचनको सुनकर
सर्गः ८ ] सारकाण्डम् [ ७५
पुनस्तं प्रेषयामास सोऽपि वालिनमाह्वयत् । ततः श्रुत्वा ययौ वाली तं ताराऽप्रार्थयत्तदा ॥५१॥
सुग्रीवस्याङ्कितेन भ्राता रामः समागतः । चकार मैत्रीं किं तेन मा कुरुष्वाद्य संगरम् ॥५२॥
गच्छ नत्वा रमानायं बन्धुं मानय सादरम् । यौवराज्यपदं देहि तन्मे वचनं शृणु ॥५३॥
तत्तारावचनं श्रुत्वा वाली तां श्लक्ष्णमब्रवीत् । जानाम्यहं राघवं न नररूपधरं हरिम् ॥५४॥
तस्य हस्तान्मुक्तिमस्मि गच्छामि परमं पदम् । तूष्णीं त्वं तिष्ठ तारेऽत्र सुग्रीवं भज मन्मदा ॥५५॥
यदा त्वया म सुग्रीवः कल्पितां गति विधेये । तदा त्वत्पाणिग्राहस्यानुष्यं गच्छामि भामिनि ॥५६॥
अत एव मालिका मे गुञ्जाऽऽभूषयदस्य सन्प्रिये । अद्याहं रामबाणेन पातिष्यामि रणाङ्गणे ॥५७॥
अद्य धन्याऽस्म्यहं तारे धन्यौ नौ पितरौ मम । योग्यं श्री रामहस्तेन मरिष्यामि रणाङ्गणे ॥५८॥
एवमाश्वास्य तां मार्गं ययौ वाली त्वरान्वितः । दृष्ट्वा वाली महोत्पातान् सन्तोषं परमं ययौ ॥५९॥
चकार बन्धुना युद्धं तदा बाणेन राघवः । वृक्षषण्डे तिरोभूत्वा पातयामास तं भुवि ॥६०॥
ततस्तारा समागत्य शुशोच वालिनं प्रति । रामं दृष्ट्वा रमानायं तदा प्राह स गद्गदः ॥६१॥
वृक्षषण्डे तिरोभूत्वा मय्याऽर्के तद्दिने हृदि । स्वाद्य दृष्ट्वा जनं मम जातो महोदयः ॥६२॥
किं मयाऽपकृतं ते हि त्वया यन्माऽसि पातितः । रामः प्राह वालिनं त्वं रूमाया लम्पटः सदा । ६३।
बन्धुभार्यां गृहे स्थाप्य बन्धु हन्तुं त्वमिच्छसि । दूषणं म्ना समालोक्य मया त्वन्माऽसिपातितः ॥६४॥
यथा त्वया रुमा भुक्ता तथा तारां तव प्रियाम् । भोक्ष्यत्यद्य हि सुग्रीवो वचनान्मे कपीश्वर । ६५।
यद्यपि त्वं दुराचारो निहतोऽसि रणे मया । तथापि भिल्लरूपेण द्वापरान्तेऽथवाऽथ मन ॥६६॥
भित्त्वा प्रभासे बाणेन पूर्ववैरेण वानर । तदा मद्धस्तमरणान्मोक्ष कारणान्मोक्षवाग् ॥६७॥
मुक्तिं गच्छसि त्वं वालिन शुभां जन्मान्तराद्धि हि । ततः प्राह पुनर्वाली मद्धस्तव्यथदुह्यास्तम् ॥६८॥
तब रामने भाई लक्ष्मणके द्वारा उस (द्वन्द्वयुद्धके लिए सुग्रीवको भेजा) । तदनन्तर पुनः लंका युद्ध करनेके लिये नगाड़ा बजवाकर फिर बाली को ललकारा । सुग्रीव का वह नाद सुनकर ताराने प्रार्थनापूर्वक कहा कि, हे नाथ! आपके एक सुग्रीव ही नहीं, बल्कि उनके साथ राम इस समय आये हैं । इसलिये आप प्रभावक साथ मित्रता कर और उनके लिए यौवराज्य पद देकर उनके चरणोंकी वन्दना कर और मेरा कहना मानकर भाई को अपना सादर युवराज पद प्रदान करो ॥५३॥ तारा की बात सुनकर बालीने कहा कि, हे प्रिये ! यदि साक्षात् श्रीभगवान् राम आये हैं तो उनके हाथों यदि मुझे मृत्यु मिले तो परमपद प्राप्त करूंगा । तू यहाँ पर चुपचाप बैठकर उसका ध्यान करना हे प्रिये ! जब तुम सुग्रीवके साथ सोवोगी, तब मैं उसका फलक भोग करूंगा ॥५६॥ अरे भामिनि ! देखो, आज गुंज माला से सजकर सुग्रीव आया है इससे मैं समझता हूँ कि मैं अवश्य ही रामके बाणसे मारा जाऊंगा । ५७ ॥ हे तारे ! मैं तथा मेरे दोनों पितर धन्य हैं कि जो आज श्रीरामके हाथों मरूँगा ॥५८॥ इस प्रकार ताराको समझाकर बाली युद्धके लिये बढ़ा और बहुत उत्पातोंको देखकर प्रसन्न हुआ ॥५९॥ तब अपने भाई सुग्रीवके साथ युद्ध किया । तब श्रीरामने वृक्षकी ओटमें खड़े हो गये और बाली को बाणसे मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया । तब तारा आकर पति के लिये अत्यन्त विलाप करने लगी। वालीने अपने नगरके स्वामी रामचन्द्रजीको देखकर गद्गद कंठसे कहा - ॥ ६१ ॥ हे नाथ ! आपने जो बाण मुझको मारा है उससे मेरे हृदय में आज आपके दर्शन हुए इससे मेरे लिये तो यह महान् अभ्युदयकी बात है, परन्तु इसपर आपका भारी अपयश होगा ॥६२॥ दूसरा बात यह है कि मैंने आपका कौनसा अपराध किया था, जो आपपर मुझ मारा ? रामने कहा - तू सदा मद्य देवात्मा रुमा में लिप्त रहता था ॥ ६३ । तू छोटे भाईकी पत्नीको अपने घरमें रखकर भाईको मार डालना चाहता था। यह दुराचार देखकर मैंने तुझे मारा है तो भी तू अंतमें भील होकर तू पूर्ववैरको स्मरण करके प्रभासक्षेत्रमें अपने बाणसे मुझे पोढ़ावेगा। तब मरण
| ७८ | आनन्दरामायणे | [ सर्ग ८ |
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सीतायुक्तं त्वया पूर्वं क्षणेन रावणेन हि। दत्ताऽभविष्यत्सीताद्य मया तव मया तदा ॥६९॥
अधुना प्रार्थयामि त्वामङ्गदं परिपालय इत्युक्त्वा स तदा वाली जहौ प्राणान् रणाङ्गणे ॥७०॥
अङ्गदेन तदा रामः कारयामास संस्कियाम्। अथ रामं च सुग्रीवो राज्यार्थं प्रार्थयत्तदा ॥७१॥
तमन्तमेव राजानं चकार लक्ष्मणेन सः। अथ वार्षिकमासांश्च वस्तुं रामोऽविचिन्तयत् ॥७२॥
प्रवर्षंणगिरेः प्राप्यशिखरे स्फाटिकोद्भवाम्। रम्यां दृष्ट्वा गुहां रामः पत्रपुष्पसमन्विताम् ॥७३॥
निनाय वार्षिकांन् मासान् चतुरः श्रीरघूद्वहः। एकदा लक्ष्मणः स्नात्वा यावद्रामं समन्ततः ॥७४॥
सात्त्विक्या सीतया युक्तमपश्याद्रामे निर्गतः। सौमित्रिणा वन्दिता सा पुनरंशे लयं ययौ ॥७५॥
एवं नासीत्तदा सीताविप्रयोगो राघवस्य हि। सुग्रीवोऽथ पुरीमध्ये चकार राज्यमुत्तमम् ॥७६॥
एकदा हनुमद्वाक्याद्वानरान् समाह्वयत्। प्रवर्षंणगिरौवसन्तों तांश्च द्वे रामलक्ष्मणौ ॥७७॥
एतस्मिन्नन्तरे रामो दृष्ट्वा प्राप्तं शरद्मृतुम्। क्रोधेन प्रेषयामास सुग्रीवाय लक्ष्मणं च सः ॥७८॥
सोऽपि गत्वाऽथ किष्किन्धां भीषयामास वानरान्। आगतं लक्ष्मणं श्रुत्वा सुग्रीवो भयविह्वलः ॥७९॥
मारुतिं प्रेषयामास सान्त्वनार्थं हि लक्ष्मणम्। स गत्वा तं सान्त्वयित्वा किष्किन्धामानयत्तदा ॥८०॥
एतस्मिन्नन्तरे तारां प्रेषयामास वानरः साऽपि गत्वा मध्यकक्ष्यां प्रस्थितं तं ददर्श ह ॥८१॥
लक्ष्मणं सान्त्वयामास वचोभिर्मधुरैर्निजैः। समाहूतानि सैन्यानि समर्थे प्लवगेन हि ॥८२॥
सुग्रीवे च वृथा कोपो मा कार्याऽद्य हि देवर ततो लक्ष्मणहस्ते सा गृत्वा राजगृहं ययौ ॥८३॥
दृष्ट्वा सुग्रीवराजस्तस्मादासन्त् चचाल सः, सुग्रीवं लक्ष्मणः प्राह विस्मृतोऽपि रघूत्तमम् ॥८४॥
वाली येन हतो वीरः स वाणस्त्वां प्रतीक्षत। त्वमद्य वालिनो मार्गं गमिष्यसि मया हतः ॥८५॥
हाथों मरनेसे आपके सम्बन्धरहित शुभ गतिको प्राप्त हुआ। वालीने फिर कहा-यदि आप मेरे पास आते तो मैं तुरन्त आपका संशाका बना रवाना तथा रावणन संशाको लाकर छीन आपकेम आपको दे देता । ६४-६९ ॥ अपुनु अब में प्रार्थना करता हूँ कि आप अङ्गनदकी रक्षा कीजिएगा। इतना कहकर वालीने उसी समय रणाङ्गणमें प्राण छोड़ दिया ॥ ७० ॥ तदनन्तर रामने अङ्गदसे उसका क्रियाकर्म कराया। बादमें सुग्रीवने रामसे वह राज्य ग्रहण करनेके लिये प्रार्थना की ॥ ७१ ॥ तब रामने लक्ष्मणको भेजकर सुग्रीवको वहाँ- का राजा बना दिया अब राम वरषाऋतुमें कहीं चातुर्मास निवास करनेका विचार करने लगे ॥७२॥ तद्नुसार उन्होंने वहाँ प्रवर्षणगिरिके उस शिखरपर सुन्दर पत्तों-पुष्पोंकी लताओंसे वेष्टित एक रमणीक गुफा देखी ॥ ७३ ॥ बस, राम वहाँ रहकर धोमार्क चार महीने बिताने लगे। एक दिन लक्ष्मण स्नान करके जब आये तो रामको मनोहरायसी सीताके युक्त देखा। लक्ष्मणने उन्हें प्रणाम किया तैसे ही सीता अपने पति रामके वामाङ्गमें विलीन हो गई ॥ ७४-७५ ॥ इस तरह उस समय भी रामसे सीताका वियोग नहीं हुआ था। उधर सुग्रीव अपना पुरमें उत्तम रीतिसे राज्य करने लगा, ॥७६॥ एक बार हनुमान्के कहनेपर सुग्रीवने वानरोंको बुलवाया। उस समय राम-लक्ष्मण प्रवर्षणगिरिपर रहते थे। ॥७७॥ तथा रामने शरदऋतुको प्राप्त देखा तो क्रोधसे लक्ष्मणको सुग्रीवके पास मदयाताका स्मरण दिलाने लिये भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर किष्किन्धाके वानरोंको डराना आरम्भ किया। लक्ष्मणका आय सुनकर सुग्रीव भी भयसे विह्वल हो उठा ॥ ७८ ॥ ७९ ॥ उसने लक्ष्मणको शान्त करनेके लिय हनुमान्को भेजा। उन्होन जाकर लक्ष्मणको समझाया और अपने साथ किष्किन्धामें ले आये ॥ ८० ॥ उसी समय वानर सुग्रीवने ताराको भेजा वह जाकर महलके आगेवाले दालानमें बैठ गयीं। इतनेम उसने लक्ष्मणको आत देखा ॥ ८१ ॥ ताराने अपने मधुर वचनोंसे लक्ष्मणको समझाकर शांत करते हुए कहा-हे देवरजी ! वानरोंके राजा सुग्रीवने रामके कामके लिये वानरोंको बुलवा भेजा है। आप कोप न करें। इतना कह तथा लक्ष्मणका हाथ पकड़कर भरम राजा सुग्रीवके पास ले गयी ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ उन्हें देख राजा सुग्रीव सिहासनसे उठकर खड़े हो गये। तब लक्ष्मणने सुग्रीवते कहा कि तुम रघुकुलमें उत्तम
सर्गः ८ ] मारकाण्डेयम् ७७
ईदृशमत्यन्तपरुषं वदन्तं लक्ष्मणं तदा । उवाच हनुमान् वीरः कथमेवं प्रभाषसे ॥८६॥
रामकार्यार्थमनिशं जागर्ति न तु विस्मृतः । इत्युक्त्वा तं पूजयित्वा सुग्रीवेण स मारुतिः ॥८७॥
चकार लक्ष्मणं शांतं सुग्रीवोऽथ ययौ वानरैः । गत्वा स राघवं नत्वा दर्शयामास वानरान् ॥८८॥
राघव न तदा प्राह सुग्रीवं प्लवगाधिपः । देव पश्य समायान्तीं वानराणां महाचमूम् ॥८९॥
अत्र यूथाधिपतयः पञ्चानन्दप्रख्याः स्मृताः । ततो ऽऽज्ञाप्य सीताशुद्ध्यर्थन्तन् दिदेश सः ॥९०॥
दिक्षु सर्वासु विविधान् वानरान् प्रेष्य सत्वरम् । ययौँ दिश जाम्बवन्तंङ्गदं वायुनन्दनम् ॥९१॥
नल सुषेण शरभ मैंदं सम्प्रेषयत्तदा । मासादूर्द्धाद्विनिवर्त्तध्व नाचेद्दण्ड्या भविष्यथ ॥९२॥
ततो रामो मुद्रिकां स्वां ददौ मारुतिसत्करे । मन्नामाक्षरयुक्तेयं सीतायै दीयतां रहः ॥९३॥
ततो रामो निज मन्त्रं ददौ तस्मै हनूमते । तन्मन्त्रस्य लक्षमिते कृत्वा तु जपलेखने ॥९४॥
लब्ध्वासामर्थ्यमतुलं लङ्कां गन्तुं स मर्कटः । नत्वा रामं परिक्रम्य जगाम कपिभिः सह ॥९५॥
वदन्तं राघवः प्राहः चित्रकूटे पुरा कृतम् । मनःशिलायास्तिलकं सीताभाले विनिर्मितम् ॥९६॥
पद्धयोः पद्मवन्त्यादि सीतायै कथयन् रहः । ततस्ते प्रार्थना मन्वे पश्चिमादपु दिक्षु च ॥९७॥
कपयस्ते समायान्ता न दृष्टा सेति ते ब्रुवन् । तथाङ्गदाद्याः प्लवगाः सीतार्थं वभ्रमुर्वने ॥९८॥
अन्विष्य वणथेष्विति राक्षसग्राम्छशोध्यन् । साश्रास्त्यास्तेवराच्छृङ्गैः गुहाद्वारान्निर्गतान् ॥९९॥
जलार्थं प्रप्रविष्टे स्ते गुहायां वानरोत्तमाः । तस्या जान्न गच्छन्तमूष्णों दिनान्यष्टादशैव हि ॥१००॥
तत्रिक्रान्तार्त्तन निस्तर वभ्रमन्तु इतस्ततः । तत्र रत्नमयं दिव्य गेहे दृष्ट्वा स्त्रयं शुभाम् ॥१०१॥
शायद भूल गये हो। =४ । जिस बाणसे तारा मारा गया था, उसी बाण सुग्रीव की प्रतिक्षा कर रहा
है आज मैं तुम्हें मारकर जल का बिम्ब बना दूंगा है जो तुम्हारा मद भंजन दूँगो । लक्ष्मण जब स प्रकार
अत्यन्त कठोर बचन कहन लगे तब हनुमानने कहा कि आप एम कठोर बचन क्यों मुखसे निकाल रहे हैं ?
। ८५ ॥ रामके काजके लिये सुग्रीव रात दिन सचेत रहता है इतना कहकर मारुति रामने लक्ष्मणको पूजा
करवाया और उनका शान्त करवाया। पश्चात् स्वयं वानरोंको लेकर रामके निकट गया । जहाँ जा कर
सुग्रीवने सिरझुकाकर रघुनाथजीके आगे कहा- हे दैव देखिए, वानरगणकी भारी सेना आ रहा है
। ८६ । इसमें अठारह पद्म सेनापति हैं। तदनन्तर राजाज्ञा अनुसार सीताकी खोज करनेके
लिये सब दिशाओमें बहुतसे वानरोंको उसी समय भेज दिया। उनमेंसे जाम्बवान्, अंगद, हनुमान्, नल
व सुषेण तथा मैंदको दक्षिण दिशामें भेजा और कह दिया कि एक मासके भीतर सीताकी सुधि लेकर लौट
आना, नहीं तो तुम सबको भण्ड किया जायगा । ६०-९२ । तब रामचन्द्रजीने हनुमान्के हाथमें
मुद्रिका दीया। जिसपर कि राम नाम अंकित अपनी नामके सीताको देना। ९३। बादमें अपना मंत्र
हनूमानको दिया। जिसके कि एक लाख मन्त्र जप तथा लिखकर हनुमान् अतुल सामर्थ्य प्राप्त
करेंगे। पश्चात् हनुमान्ने रामको प्रणाम किया और परिक्रमा करके कपियोंके साथ चल दिये ॥९४।६५ ॥
जाते समय रामने चित्रकूटमें किया हुआ एक चरित्र हनूमान्को बताते हुए कहा कि एक समय मैंने सीताके
कण्ठमें मैनाशिलाका तिलक तथा कागलोचन बकवन्ध्याका उपाय की था। उस बातको तुम सीतासे
एकान्तमें कहना। जिससे कि उनका तुम्हारे विश्वास हो जाय। इसके बाद वानर विभिन्न दिशाओ के
गए दिये । ९६-९७॥ कुछ कालके बाद बहुतसे वानरोने आकर सुग्रीवसे कहा कि हमको सीता
नहीं दिखाई दी, उधर अङ्गदके साथपर भी सीताकी खोजमें ढूंढते वानर इधर-उधर भ्रमण कररहे थे । ९८
उन्होंने शांति खोजनेके बहुतसे पक्षी देखे ॥ ६८ । ९६ । यह देखकर प्यासमें पीडित वानरोंमें उत्तम वे वानर
जलकी अभिलाषासे उस गुफामें घुसे, उसमें जाते जाते उन्हें अठारह दिन बित गये । १०० । वे उस
अन्धकारमें इधर उधर भटकने लगे अचानक वही उन्हे रत्नमय दिव्य दो भवन तथा उनमें एक सुन्दरी स्त्री दिखायी
| ७८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ८ |
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संप्रालब्ध्वा निजं वृत्तं स्वदूतं श्रोतुमद्यताः । ताम्पूज्य कथयामास चंतं वृत्तं तु योगिनी ॥१०२॥
हेमानाम्र्ना सुता विश्वकर्मणः सा महेश्वरम् । नृत्त्येन तोषयामास ददौ तस्यै पुरं महत् ॥१०३॥
अत्र स्थित्वा चिरं काल यदा गंतुं समुद्यता । मां मां प्राहात्र रामस्य प्रतीक्षां कुरु गच्छति ॥१०४॥
सभार्य्यश्चाथ रामस्य कृत्वा पूजनमुत्तमम् । इत्युक्त्वा सा दिवं याता राघव गम्यते मया ॥१०५॥
स्वयंप्रभेति नाम्नाऽहं हेमायाः परिचारिका। अधुना बत युष्माकं साहाय्यं किं करोम्यहम् ॥१०६॥
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा मत्वा स्वोयदिनाव्ययम् । तामुचुर्वानराः सर्वे नस्त्वं कुरु गुहाद्बहिः ॥१०७॥
इत्युक्ता सा व्यनैषीत् तैः सहैव ययौ बहिः । तद्विलाच्छादितैयायैनयैर्नावर्तनान्मुदा । १०८॥
न ज्ञातं च तया केन मार्गेण च बहिः कृतम् । साऽपि गत्वा पूज्य रामं देहं त्यक्त्वा दिवं ययौ ॥१०९॥
ततस्ते वानरा ज्ञात्वा गुहाद्वा स्वदिनाव्ययम् । विषण्णाः सागरं दृष्ट्वा तस्थूः प्रायोपवेशने ॥११०॥
जटायोः कीर्तनं चक्रू गमकार्य्यं कृतं पुरा । तच्छ्रुत्वाऽथ म सपातिः तांन्दंत गः समुद्यतः ॥१११॥
तेभ्यः श्रुत्वा मुनिं वोचेद्दर्शनार्थमं जलोत्थित् तेषां श्रुत्वा पृथङ्कन मोतातून न्यवेदयत् । ११२॥
शतराजनमध्ये ऽथैलंकायां वर्ततेऽधुना । अशोकवनिकायां तु न.र्शाऽलंब तां प्रपश्यथ । ११३॥
अह पक्षविहीन ऽस्मि मया गन्तुं न शक्यते गृध्रत्वाद्दूरदृष्ट्वाऽहं सीता म' दृश्यते गिरौ ॥११४।
भ्रात्रा जटायुषा पूर्वमुड्डीयाहं बलाद्रविम् । प्रष्टुकामस्तदा तप्तश्भानो बंधुमथा मखे ॥११५॥
पक्षभ्यां भस्मसाञ्जातो मे पक्षी पतितावुभौ । जटायुः स मपक्षश्च गतो देशान्तरं पुनः ॥११६॥
अहं तदा वसन्हसँश्चन्द्रशर्माणमुत्तमम् । मुनिं नत्वा तदा तस्मै निजवृत्तं निवेदितम् । ११७।
दी ॥ १०१ ॥ उसके वृत्तान्तका सुनकर अभिप्रायमे वानरोंने कहा— अपना वृत्तान्त सुनाओ, तुम कौन हो और तुम्हारा क्या नाम है? यह वातिका उन सबका सम्मान करके कहने लगी—॥ १०२ ॥ विश्वकर्माकी हेमा-नामक प्रसिद्ध एक कन्या थी। उसने जब महादेवजीको तृप्तिकरके प्रसन्न किया, तब उन्होंने उसको यह बड़ा भारी नगर दिया ॥ १०३ ॥ वहां बहुत कालतक निवास करके जब वह जाने लगी, तब उसने मुझको कहा कि यहाँ बहुत कालतक निवास करती हुई तुम रामके आगमनकी प्रतीक्षा करो । १०४ ॥ उन रामका उत्तम प्रकारसे पूजन करके बाद तुम भी चले आना, इतना कहकर वह चली गयी। इसी कारण अब मैं भी रामके पास जाना चाहती हूँ ॥ १०५ ॥ तथा हेमाकी मैं स्वयंप्रभा नामकी दासी हूँ। अब आप लोग यह कहे कि मैं आप लोगोंका कौनसा सहायता करूँ ॥ १०६ ॥ उसको इस बातको सुन तथा बहुत दिन व्यय अर्थात हुआ देखकर वे सब उसी बोले कि हमको इस बिलसे बाहर कर दो ॥ १०७ ॥ यह सुनकर उसने उन सबको अथवा अपना आंख मून्दने किए कहा। उसो अवसर वानरोंका यह नहीं मालूम हुआ पाय कि उसने किस प्रकार किस मार्गमें बाहर कर दिया। वह भी रामके पास चली गयी तथा उनका पूजा करके स्वर्ग सिधारी ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ उस बिलसे बाहर अपने अत्यधिक दिनोंका व्यय देख उदाम हो समुद्रके किनारे गये और अनशन करके बैठ गये ॥ ११० ॥ बानरोंका इसप्रकार शोक देख प्रायोपवेशके दरम्यान जटायुका चरित्र चल पढा। वहा रहनेवाला संपाती जो उनका चचेरा भाई (पितृव्य-पुत्र) था, वह उनके मुखसे रामके कार्यके लिये जटायुका मरण तथा प्रशंसा सुनकर भाई संपाती, रूपान्तरित होकर समुद्रतटपर गया। पश्चात् उन वनेचरोंका वृत्तान्त सुनकर अपकार्य तथा समाचार कह सुनाया और वह ॥ १११ ॥ ११२ । यहाॅसे समुद्रको पार करके सौ योजनपर लङ्कामें तुम उन्हें देख सकते हो । ११३ । मैं पंख-रहित हूँ। इस कारण वहाँतक नहीं जा सकता, गृध्रकी दृष्टि तेज होती है। अतएव मैं सौ क्या पर्वतपर बैठी हुई लङ्कामें यहाँसे देख रहा हूँ ॥ ११४ ॥ मेरे पंख न होनेका कारण यह है कि मैं एक बार अपने बलके दर्पसे भाई जटायुके साथ उड़कर सूर्यका स्पर्श करनेके लिए आकाशमें उड़ा। रश्मि सूर्यका प्रभाव जटायु जलने लगा। तब मैंने अपनी पांखोंसे ढककर उसकी रक्षा की। जिससे कि मेरे दोनों पांख भस्म हो गयीं और मैं तथा जटायु दोनों उसरस गिर पड़े, जटायु उस ओर सपक्षा था। उससमय दुःखीने मैंने चन्द्रशर्मा नामक मुनिके