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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २ ] पूर्णाकाण्डम् ७६५

सर्गः २ ] पूर्णाकाण्डम् ७६५

यावत्कथा मम शुभा स्थास्यत्याधुनाकिनी । तावच्छङ्खरूपेण त्वमत्र मृन्मयी चिरम् ॥६२॥
तथेति रामवचनाच्छङ्खरूपाऽथ सुमंगरी अग्रेऽथ मन्दिता दित्वा हेमा गोपेण साऽययौ ॥६३॥
अयोध्या नगराच्चाऽपि रामः सेनाबलं ययौ । यद्यप्याया नगरस्य प्रभावो न गतो दिनः ॥६४॥
अथ सीता महानागीमारुरोह सखीजनैः । पृथक् ता मुनिकानामाः समारुरुहुमङ्गनाः ॥६५॥
अथ रामो मुदा वेगात्समारुह्य गजोपरि । उवाच लक्ष्मणं वाक्यं पुष्पकैः सकलान् जनान् ॥६६॥
पंगूनन्धांश्चैव त्वं स्वबंधुभ्यां सुनादिभिः । नागरीः पृथक् शीघ्रं समारुह्य गजोपरि ॥६७॥
अनुगच्छन्तु मच्छ्रेष्ठे लक्ष्मणः स तथाऽकरोत् । अथ सर्वे नृपतयो नानायानेषु संस्थिताः ॥६८॥
ययुः स्वस्वबलैर्युक्ताः शीघ्रं श्रीरामपार्श्वतः । ययावग्रे ऽथ्र्यमग्नो रज्जुखालधारिभिः ॥६९॥
दृषद्विकारैस्ततक्षैश्च कुठारटङ्कपाणिभिः । ततो ययौ महानागः पताकाध्वजशोभितः ॥७०॥
ततो ययुर्यन्त्रहस्ता नानावाहनसंस्थिताः । ततो ययुः शस्त्रनाभिः पूरिताः शकटाः शुभाः ॥७१॥
ततोऽश्वसंस्था वाद्यानि वादयन्तो ययुर्भटाः । ततोऽश्वसंस्थाः ज्ञातयो ययुस्ते वस्त्रपाणयः ॥७२॥
ततो ययुर्मागपाथ वदिनो यानसंस्थिताः । नरा नटाभाश्चाथ यानस्थाः सुविभूषिताः ॥७३॥
ततस्ता वारनार्यश्च काश्चित्खट्वाङ्कवाहनाः । अपरेषु भटैर्मागे नृत्यन्त्यः प्रययुः सुखम् ॥७४॥
ततो ययुर्भूषितास्ते श्रीरामस्य तुरङ्गमाः । नराः पुष्टारुणिच्छन्नाः प्रमदास्तथा ॥७५॥
ययुस्तद्रूपतः शतशः सुवेश्मनः सुतोलियः । गंधेविनाश्चाः स्युत्किन्वस्तुर्गवादिषु संस्थिताः ॥७६॥
ततो ययुर्दण्डहस्ता दासीपुत्राः सुभूषिताः । ततो ययौ रामचन्द्रस्तत्पृष्ठे लक्ष्मणो ययौ ॥७७॥

रहती हुई मैं आपके वियोगका दुःख नहीं सह सकती। इसलिये मैं भी आपके साथ ही चलनेको तैयार बैठी हूँ। उसकी ऐसी बात सुनकर रामने ... कहा कि जबतक जगत्में मेरी परमपवित्री कथा विद्यमान रहे तबतक तुम शङ्खरूपसे मृन्मयी होकर यहीं निवास करो ॥६२॥ रामकी आज्ञानुसार उसने अपने आभूषण सुमंगरी ... और साथ चल पड़ी ॥६३॥ इसके बाद रामकी आज्ञा तथा मन्त्रके साथ-साथ सारी सेनाके साथ चल पड़ी। यद्यपि अयोध्या तथा सरयू के दोनों तटपर ... प्रभाव ज्योंका त्यों बना रहा, वह नहीं गया ॥६४॥ इसके अनन्तर सीताजी एक अगहना हस्तिनीपर सवार हुईं और उर्मिला आदि दूसरी हस्तिनियोंपर जा बैठीं ॥६५॥ इसके बाद राम भी प्रसन्नतापूर्वक गजराजपर सवार हुए और लक्ष्मणसे कहा कि समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ अन्धोंको पालकियोंपर बिठाकर गजपर सवार कराओ और स्वयं तुम अपने परिवारावालोंको हाथीपर बिठाकर मेरे पीछे-पीछे आओ। रामकी आज्ञानुसार लक्ष्मणने सब प्रबन्ध ठीक कर दिया। इसके बाद सब राजे अनेक प्रकारकी सवारियोंपर सवार हो-होकर अपनी-अपनी सेनाके साथ रामके पास आये। आगे-आगे वे मजदूर चले, जो रस्सियों तथा कुदाल लिये थे। पत्थर काटनेवाले तथा बढ़ई आदि विविध प्रकारके औजार लिये थे। उनके पीछे-पीछे एक बड़ा हाथी पताका और ध्वजाओंसे अलंकृत होकर चला। उसके पीछे अपने-अपने हाथोंमें बन्दूक आदि विविध प्रकारके शस्त्रवाले सैनिक तरह-तरहके वाहनोंपर सवार होकर चले। उनके पीछे शस्त्रादिसे भरी बैलगाड़ियाँ चल जा रही थीं ॥६६-७१॥

उनके पीछे-पीछे अनेक प्रकारके बाजे बजानेवाले लोग घोड़ोंपर बैठ-बैठकर चले। उनके पीछे बहुतस गूढ़-सवार हाथमें वस्त्र लिये हुए चले ॥७२॥ उनके पीछे वन्दीजन आरूढ़ होकर बहुतसे मागध और वन्दीजन चले जा रहे थे। उनके पीछे नटलोग और स्वांग बाँध-बाँधकर बैठी हुई वेश्यायें गाती-बजाती और नाचती हुई चली जा रही थीं ॥७३॥७४॥ उनके पीछे-पीछे रामके सुसज्जित हुए घोड़े और उनके पीछे पुष्पके समान वेष धारण किये, अनेक प्रकारके अलंकार पहन, तरह-तरहके शस्त्र लिये, परदेमें अपना मुख छिपाये और घोड़े आदि विविध सवारियोंपर सवार स्त्रियें चली जा रही थीं ॥७५॥ ७६॥ उनके पीछे हाथमें लाठिये लिये तरह-तरहके आभूषण पहने दासीपुत्रगण चले जा रहेथे। उनके पीछे भगवान् रामचन्द्र और लक्ष्मण, भरत,

७६६ आनन्दरामायणं [ सर्गः ३

तत्पृष्ठे भरतश्चापि शत्रुघ्नश्च ततो ययौ । ततः कुशो लवश्चाथ ततः सोऽप्यंगदो ययौ ॥७८॥
ययौ ततश्चित्रकेतुः पुष्करश्च ततो ययौ । ततस्तक्षः सुबाहुश्च यूपकेतुस्ततो ययौ ॥७९॥
ततः सीता ययौ शीघ्रमुर्मिला च ततः परम् । माण्डवी श्रुतकीर्तिश्च स्नुषाः सर्वाः क्रमागयुः ॥८०॥
ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे शिबिकारूढविक्रमा ययुः । ततो ययुर्वानराश्च कोटिशः पर्वतोपमाः ॥८१॥
ततो ययुर्नृपाः सर्वे कोटिशो वारगस्थिताः । ततो नृपाणां सैन्यानि यपुर्वाजिश्चितानि हि ॥८२॥
ययुस्ततस्ते यंत्राणां शकटाः कोटिशो वराः । शतघ्नीखड्गचर्मादिपूरिताः शकटास्तदा ॥८३॥
ततो वारणमुख्यश्च नववाद्यसमन्वितः । ततश्चोष्ट्राः सुवर्णानां ततः पृष्ठे खरादयः ॥८४॥
एवं रामः शनैर्मार्गं चामराद्यैः सुवीजितः । सीतया चालल्यैश्च वीक्षितश्च मुहुर्मुहुः ॥८५॥
ययौ शनैः शनैः श्रीमान्स्तुतो मागधवंदिभिः । पश्यन्नृत्यान्यप्सरसां शृण्वन् गान्यान्यथ ॥८६॥
सेनानिवेशस्थानानां यात्राकांडे यथोदिता मया पूर्वं सुरचना तद्वदासीत्पुनस्त्विह । ८७॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये पूर्णकांडे
रामदासविष्णुसंवादे रामप्रस्थानं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीयः सर्गः

( रामका सोमवंशियोंके साथ युद्ध )

श्रीरामदास उवाच

अथ रामः शनैर्मार्गे नानादेशान्विलंघ्य च एकादशदिनैः प्राप सेनया तद्वयाह्वयम् ॥ १ ॥
राममागमनंज्ञात्वा सुषेणो वेगवत्तरः । प्रत्युद्ययौ स्वकत्रिभिविंशल्लक्षसमन्वितैः । २ ॥
नत्वा रामं च सीतां च सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् राम राम महाबाहो प्रतापात्तव वै मया ॥ ३ ॥


शत्रुघ्न, कुश, अङ्गद, चित्रकेतु, पुष्कर, तक्ष और उनके पच्छे राजपुत्र सुबाहु चल जा रहे थे । राजपुत्रोंकी टोलीके पीछे सीता, उर्मिला, माण्डवी, श्रुतकीर्ति और उनके पीछे उनकी पतोहुएं चली जा रही थीं उनके पीछे समक्त मन्त्रिगण पालकियोंपर बैठ चले जा रहे थे । उनके भी पीछे पर्वतके समान बड़े-बड़े आकारवाले वानर और उनके पीछे विविध प्रकारकी सवारियोंपर सवार सब राज चले जा रहे थे । उनके पीछे उन राजाओंकी सेनाये घोड़ोंपर सवार होकर चलीं जा रही थी । उनके पीछे कितनी ही बैलग़ाड़ियोंपर रखे हुए तोप आदि यन्त्र चल जा रहे थे ॥ ७७-८३ ॥ उनके पीछे मुख्य-मुख्य हाथी अनेक प्रकारके दाज लदे हुए चले जा रहें थे और उनके भी पीछे एक बहुत बड़ा हाथी चल रहा था जिसपर राष्ट्रकी पताका सुशोभित हो रही थी उनके पीछे सुवर्णसे लदे हुए ऊँट और उनके पीछे और-और सामान लादे हुए गधे तथा खच्चर आदि चल रहे थे ॥ ८४ ॥ इस तरह राम धीरे-धीरे चले जा रहे थे । उनके ऊपर चमर व्यजन् आदि चल रहे थे और सीताजी अपनी सर्वाङ्गसे डोलोंपर बार बार रामको निहार रही थीं । ८५ ॥ मागध-वन्दीजन आदि विविध प्रकारकी स्तुतिये कर रहे थे और कितने ही अप्सराओंके नृत्य-गान हो रहे थे ॥ ८६ ॥ रामचन्द्रजीके पड़ाव ठीक उसी तरह इस समय भी थे, जैसे कि पीछे यात्राकाण्डमें बतलाये जा चुके हैं ॥ ८७ ॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पूर्णकाण्डे द्वितीय सर्गः ॥ २

इस तरह धीरे-धीरे चलते हुए राम अपनी सेनाके साथ अनेक देशोंको लांघते हुए ग्यारह दिनमे हस्तिनापुर पहुंचे । १ ॥ रामके पहुंचनेका समाचार पाते ही सुषेण बीस लाख सैनिकोको लेकर आ पहुंचे ॥ २ ॥ रामके समक्ष पहुंचकर उसने सीता रामको प्रणाम किया और कहन लगा—हे महाबाहो राम ! आपके

सर्गः १ ]
पूर्णकाण्डम्
७६७


चतुर्दशदिनं युद्धं कृतमेभिः सुदारुणम् । अधुना त्वं समायात इवैते स्थास्यन्ति भूतले ॥ ४ ॥
सुषेणस्य वचः श्रुत्वा तमप्याश्वासयन्प्रभुः । अथ रामः स जाह्नव्याश्चोत्तरे परमे तटे ॥ ५ ॥
सेनानिवासमकरोद्ददर्श रिपुवाहिनीम् । तां निशां समतिक्रम्य द्वितीये दिवसे ततः ॥ ६ ॥
चोदयामास युद्धाय वानरान् रघुनन्दनः । ततस्ते वानराः सर्वे जाह्नव्यामवलङ्घयन् च ॥ ७ ॥
रामं सीतां नमस्कृत्य निर्ययुः समरं मुदा । ततस्ते वानराश्चक्रुः सिंहनादान्भयङ्करान् ॥ ८ ॥
वादयामासुर्वाद्यानि ददृशुः शत्रुवाहिनीम् । नलाद्यास्तेऽपि श्रीरामसेनां दृष्ट्वाऽतिविस्मिताः ॥ ९ ॥
चकिता भयभीताश्च निर्ययुः संगरं जवात् । ततस्ते वानराः सर्वे गंगासमुल्लङ्घ्य वेगतः ॥ १०॥
दृषद्भिः पर्वतशृङ्गैः शिलाभिर्विटपैर्द्रुमैः । पदैः निजघ्नुः शत्रुवीरांस्ते कीर्त्तयन्तो रघूत्तमम् ॥११॥
नलवीराश्च ते सर्वे क्षुरैर्वाणैस्तीक्ष्णैः कपीश्वरान् । निजघ्नुः समरे वेगाद्बभूव तुमलो रणः ॥१२॥
अथ तैर्वानरैः सर्वे बलादृक्षैः प्रपीडिताः । पराङ्मुखाः कृताः सर्वे रणे नलसैनिकाः ॥ १३॥
तान् दृष्ट्वा ते नलाद्याश्च रणाद्भीरान् पराङ्मुखान् । निहतान्द्दिपरीतांश्चोदयामासुर्नृपांस्तदा ॥ १४॥
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे जम्बूद्वीपनिवासिनः । तथा द्वीपांतरोद्भूता ये ऽद्यापि पुरोदिताः ॥ १५॥
ययुर्युद्धाय सन्नद्धा नानावाहनसंस्थिताः । तन्समानागतान्दृष्ट्वा ययुः श्रीरामसैनिकाः ॥ १६ ॥
जम्बूद्वीपांतरस्थाश्च तथा द्वीपांतरस्थिताः । पुरातनाश्च नृपाः सर्वे नानावाहनसंस्थिताः ॥ १७॥
सुग्रीवश्वांगदश्चाथ हनुमांश्च विभीषणः । जाम्बवांश्च सुषेणश्च संपातिर्मकरध्वजः ॥ १८॥
गुहको भूरिकीर्तिश्च कंचुकंठः प्रनारदान् । तथाऽन्ये जनकाद्याश्च ययुः संग्रामभूतलम् ॥ १९॥
तदोभयोर्महानासीत्सैन्ययोर्हरिनिःस्वनः । नरवाद्यानि च नेदुरुभयोः सैन्ययोः पृथक् ॥ २०॥
तदा ब्रह्मादयो देवाः शिवेन सहिताश्च खे । सयुधनाथ सोमेन देवेन्द्रेण युता मुदा ॥ २१॥
नानाविमानमारूढा ददृशुर्युद्धकौतुकम् । अथ चन्द्रादयो देवाश्चक्रमंत्र परस्परम् ॥ २२॥


प्रतापसे मैंने चौदह दिनों तक इन लोगोंके साथ भयंकर युद्ध किया है। अब आप भी आगये हैं तो ये दुष्ट बचकर कहाँ जावेंगे ॥ ३ ॥ ४ ॥ सुषेणकी बात सुनकर रामने भी उसे आश्वासन दिया और गङ्गाके उत्तरी तटपर अपना सेनानिवास बनाया ॥ ५ ॥ वहींसे ही शत्रुको सेना देखी। रात बीत जानेपर सवेरे ही रामने वानरोंको युद्धके लिए विदा किया। रामकी आज्ञासे वे लोग सीता तथा रामको प्रणाम करके बड़ी प्रसन्नतासे गंगाजीको पार करके संग्रामभूमिमें जा पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने भयङ्कर सिंहनाद किया, विविध प्रकारके शङ्ख बाजे बजाय और शत्रुको सेनापर धावा बोल दिया। रामकी सेनाको देखकर वे नल आदि राजे बड़े विस्मित हुए ॥ ६-९ ॥ वे तुरन्त अपनी सेनाके साथ युद्धके लिए जा डटे। इसके अनन्तर वे सब वानर पत्थरके बड़े-बड़े खण्ड और वृक्ष ले-लेकर रामचन्द्रजीकी जयजयकार करते हुए शत्रुदलके वीरोंका संहार करने लगे ॥ १० ॥ ११ ॥ उधर नलकी सेनाके भी वीर अपने तीखे शस्त्रोंसे वानरोंको मारने लगे। इस तरह बहु देर तक घमासान युद्ध हुआ और वानरोंने अपनी वृक्ष पाषाणवर्षासे शत्रुओंके छक्के छुड़ा दिये। जिससे नलके सैनिकोंको वहांसे पीछे हटना पड़ा ॥ १२ ॥ १३ ॥ इस तरह अपने वीरोंको भागते देखकर नल आदिने और-और राजाओंको प्रोत्साहित किया ॥ १४ ॥ इससे जम्बूद्वीपके अन्यान्य द्वीपोंके राजे जिनकी गणना पीछे कर आये हैं, वे सब अनेक प्रकारके वाहनोंपर आरुढ़ हो-होकर बड़ी तैयारीके साथ निकल पड़े। उन लोगोंको युद्धभूमिमें उपस्थित देखकर रामके सैनिक जा डटे । १५ ॥ ॥ १६ ॥ उधर जम्बूद्वीप तथा अन्यान्य द्वीपोंके राजे उपस्थित थे। इधर सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान्, विभीषण, जाम्बवान्, सुषेण, सम्पाती मकरध्वज, भूरिकीर्ति, कञ्चुकण्ठ तथा जनक आदिवीर लड़नेके लिए संग्रामभूमिमें डटे हुए थे। उस समय दोनों ओरके सैनिक बहुत जोर-जोरसे सिंहनाद कर रहे थे और विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे ॥ १७-२० ॥ उस समय शिव, बुद्ध, शेष और इन्द्र आदि देवताओंको साथ लेकर

७६८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

महाभयं समुत्पन्नं प्रलयोऽद्य भविष्यति । ब्रह्मदत्तवराश्चैते सोमवंशोद्भवा नृपाः ॥२३॥
रामो विष्णुरयं साक्षात्कथं जयपराजयौ । भविष्यतः कथं युद्धनिवृत्तिरुभयोरपि ॥२४॥
भविष्यति उपायः कः कार्यो युद्धानिवृत्तये । तदा ब्रह्मा सुरान्प्राह किंचिद्दृष्ट्वा ह्ययं रणम् ॥२५॥
करिष्यामस्तयोः सख्यं रामसोमजयोस्स्विह । इत्युक्त्वा मकलान्वेधा ददर्श रणकौतुकम् ॥२६॥
तयोस्तयोः सैन्ययोश्च बभूवुर्यन्त्रनिःस्वनाः । यन्त्रोत्थवह्निज्वालाभिव्याप्ता दश दिशोऽभवन्॥ २७॥
यन्त्रोत्थनानागुटिकाभिनिजघ्नुस्ते परस्परम् । शतघ्नो सैन्यथा जग्मुः शस्त्रमुख्याश्शिरादगत् ॥२८॥
तथा वीरा निजघ्नन्ते बाणैः खङ्गैः परस्परैः । पट्टशै तोमरैश्च भिंदिपालैश्च मुद्गरैः ॥२९॥
परिघैश्चक्रबाणैश्च कुंतैः शूलैश्च पट्टिशैः । तदा जघान पितरं पुत्रः पुत्रं तथा पिता ॥३०॥
पितामहस्तथा पौत्रं पौत्रश्चापि पितामहम् । अन्योऽन्यं कुलजात्यादिशब्दिका मन्नाम वै मुहुः ॥३१॥
तथा रणे प्रपौत्रं च जघान प्रपितामहः । तथा रणे प्रपौत्रोऽपि जघान प्रपितामहम् ॥३२॥
मातामहं तु दौहित्रस्तदा बाणैरताडयत् । तथा मात महश्चापि दौहित्रं च रणेऽहनत् ॥३३॥
एवं परस्परं घोरमियुद्धं लोमहर्षणम् । तत्र ये ये हता धीरैः सगरे रामसेवकाः ॥३४॥
तान्सर्वान् जीवयामास तदा पवननंदनः द्रोणावत्यौषधीभिश्च वार वारं स्वसैनिकान् ॥३५॥
रिपुसैन्ये मृता ये ते मृता एव तु नोत्थिताः । एव तदा सोमवशेनृपाम्ने क्षीणतां ययुः ॥३६॥
तदा लोहितपूरा सा बभूव सुरनिम्नगा । अर्बुपप्रमिता सेना नलादीनां तदा रणे ॥३७॥
निपातिता शथवीर्येर्नृपैः सा दरसंगरैः । एवं बभूव समरः षण्मासं हस्तिनापुरे । ३८॥
ततस्ते सोमवंशस्था नृपाः किंचिद्बलान्विताः । विषण्णा विगतात्साहा निर्ययुः सगरं स्वयम् ॥३९॥
तानागतांस्तदा वीक्ष्य कुश्याद्या बालकाश्च ते । रामदोर्भा ययुस्सग्रे स्थस्था रणभूतलम् ॥४०।

अपने वाहनपर बैठे हुए ब्रह्माजी आकाशमण्डलमें आ पहुंचे और उन लोगोंका वह भयानक युद्ध देखने लगे । कुछ देर बाद चन्द्रमा आदि देवताओंने आपसमें कहा कि यह बड़ा भयावह समय आ पहुंचा है, ऐसा लगता है कि आज प्रलय हो जायगा । इधर ये सोमवंशी राज ब्रह्मासे वर प्राप्त किये हुए हैं इसलिए किसीसे पराजित नहीं होंगे, उधर रामरूप धारण किये साक्षात् विष्णुभगवान् लड़ने आये हैं। ऐसी अवस्थामें जय-पराजय कस ही सकता है ? और यदि यह झगड़ा है तब उसका विचार किया जाय तो कैसे हां । २१-२४॥ उनकी बात सुनकर ब्रह्माने कहा कि हम यथा दण्डक इनका युद्ध समाप्त इन दोनोंमें सन्धि करवा देंगे । ऐसा कहकर ब्रह्माजी युद्धकौतुक देखने लगे। उस समय दोनों सेनाओंमें तोप बन्दूक आदिकी भयंकर गर्जना सुनायी पड़ रही थी। उन यंत्रोंके मुखसे निकलते अगारोकी लपटों से दशों दिशायें व्याप्त हो गयीं । २५-२७॥
बन्दूकोंकी गोलियोंसे आपसमें एक दूसरेको मार रहे थे। दूसरी ओर बन्दूकोंकी बन्दूकियांपर रक्खी हुई नालें अग्या अगल उगल रही थी । दोनों पक्षके वीर बाणों पट्टिश आदिसे लड़ रहे थे। उस समय युद्धके मदसे मतवाले होकर पिता पुत्रको, पुत्र पिताको, पौत्र पितामहको तथा पितामह पौत्रको अपना ग्राम-कुल आदि बतलाकर मार रहा था, प्रपितामह प्रपौत्रको, प्रपौत्र प्रपितामहको, दौहित्र मातामहको और मातामह दौहित्रको निशङ्कभावसे मार रहा था ॥ २८-३३॥ इस तरह परस्पर लोमहर्षक युद्ध हो रहा था उस समय संग्राम-भूमिमें जो-जो रामके सैनिक मरते थे, उन हनुमान्‌जी द्रोणाचलकी संजीवनी बूटीसे जीवित कर लिया करते थे ॥३४॥ किन्तु शत्रुंकी सेनामें जो मरे, वे मर ही रह गये। इस कारण वे सब सोमवंशी राजे धीरे-धीरे कंवबल हो गये । ३६ । उस संग्राममें रुधिरकी गंगा बह चली और रामके सैनिकोंने नल आदि राजाओंकी बारह पद्म सेनाका संहार कर डाला । इस तरह छह महीने तक हस्तिनापुरीमे बहु महासंग्राम होता रहा । ॥ ३७॥ ३८ ॥ अन्तमें वे सोमवंशी राजे अपनी थोड़ी-सी सेना लेकर स्वयं संग्रामभूमिमें आये ॥ ३९ ॥ उनको आये देखकर कुश आदि बालक रथ-