श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः २ ] | जन्मकाण्डम् | २९९
| सर्गः २ ] | जन्मकाण्डम् | २९९ |
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कदा चित्रकथा रम्यारवेणूत्थानानि वा कदा । कदा दन्तरुहोत्तादिकौतुकानि ददर्श सा ॥१७॥
कदा सम्मोहनं दिव्यं दृश्यं कौतुक महद् । कदा रम्भास्तम्भशूल्कं वस्त्रग्रंथिविनिर्मितम् ॥१८॥
कदा कृत्रिमहस्त्यादिनाणारूपाणि वै वने । सीता ददर्श कुशलैश्चातुर्यान्मृगतान्पयि ॥१९॥
एवं सीतोऽश्रममध्ये मासमेकं निनाय सा । ययौ रामेण नगरीं नृत्यगीतादिभिः शनैः ॥२०॥
सौधस्थानिः पुरस्त्रीभिर्विना कुसुमादिभिः । नीराजिता कुम्भदीपेर्दीपैदपोदनोद्भवैः ॥२१॥
माषतिलसर्षपार्यैर्नानाबलिभिगदगद् । ययौ निजगृहं सीता राघवेण समन्विता ॥२२॥
एवं नानाकौतुकैश्च नानादोहदपूरणैः । रामपत्नीं रमयामास माऽपि रामं स्वलीलया ॥२३॥
षष्ठे मासे त्वथ प्राप्ते सीतया राघवो मुदा । सीमन्तोन्नयनं चैव वसिष्ठेन चकार सः ॥२४॥
सुमेधां जनकं चापि समाहूयादरेण वि । ददौ दानान्यनेकानि ब्राह्मणेभ्यो रघूत्तमः ॥२५॥
जनकः पूजयामास रामं स्वान्यसुतयुतम् । कौसल्यादांश्च संक्लैन्वामिनो वसनादिभिः ॥२६॥
पौराश्च सुहृदः सर्वे भोजनार्थं विदेहजाम् । स्वस्वगेहं पुत्राऽनिन्युः श्रीरामादिमहोत्सवैः ॥२७॥
नानावाद्यनिनादैश्च वरस्त्रीनृत्यगायनैः । स्त्रीमुखपुष्पवर्षैर्नानाकौतुकदर्शनैः ॥२८॥
नानादेशनिवासिन्यः कोटिशश्चा नृपस्त्रियः । समाययुर्योध्यायां सीतां द्रष्टुं मुदान्विताः ॥२९॥
तया सैन्यैश्च सर्वत्र वेष्टिता नगरी बभौ । ताः सदा नृपपत्न्यश्च सीतायाः परमान् वरान् ॥३०॥
दोहदान् पूरयामासुर्दिव्यवस्त्रादिसादरम् । ददुर्वस्त्राण्यलङ्कारान् दिव्यांश्चित्रविचित्रितान् ॥३१॥
स्वस्वदेशोद्भवोद्देषनानाहस्त्यादिसादगत् । जानकीं पूजयामासुस्ताः सर्वाः पार्थिवस्त्रियः ॥३२॥
स्थिन्त्वा ता मासमेकं तु जग्मुर्दैवं निजं निजम् । अथैकदा तु श्रीरामः सुमेधा जनक तथा ॥३३॥
सीतायाः पुरतः प्राह गुह्यं रहसि हम्स्थितम् । सीतामदृष्ट्वा साभिध्ये क्षणञ्च विरद्वेष ताम् ॥३४॥
कभी मधुर तथा पत्रपोर अथवा बाजाका धुन सुनती थी। कब विविध प्रकारका चित्र देखती थी, कभी बाजीगरो और बाँसपर चढ़कर नटवरन के करतूत खेल देखा करती थी ॥ १७ ॥ ॥ १८ ॥ कभी स्तम्भके सुन्दर कौतूहों तथा मुख्यसभामे वैदा कलात्मक काज तब कला बनावटी हाथ आदिके विविध रूपाको देखा करती थी ॥१९-०१९॥ इस तरह सीताजी उस बग़ीचाम एक महीना बिताया। फिर नृत्य-गीतादिक देखती-सुनती हुई रामचन्द्रके साथ अपनी नगरी अयोध्याको लौट आयीं ॥ २० ॥ जब सीता और रामने नगरमें प्रवेश किया, उस समय नगरके स्त्रियोंने अंटारीपर चढ़कर उन दोनोपर फूलोकी वर्षा की, आरती उतारी और दही, भात, उड़द, तेल तथा सरमों आदिके बलि दिये। तब राम सीताके साथ अपने महलको गये ॥ २१ ॥ २२ ॥
इस तरह विविध प्रकारका अभ्यास रामने माताजी तथा सतान रामको आनन्दित किया ॥ २३ ॥ जब गर्भका छठौं महीना आया तब राघवने अपने कुलगुरु वसिष्ठके द्वारा सीताका सीमन्तोन्नयन संस्कार कराया ॥ २४ ॥ सुमेधा और जनकके पास निमत्रण भेजकर उन्हें अपने यहाँ बुलवाया और ब्राह्मणोंको रामने विविध प्रकारक दान दिये ॥ २५ ॥ जनकने आकर सीता तथा अपने सब भाइयोंके साथ बैठे हुए राम और कौसल्यादि माताओका नाना प्रकारके वस्त्राभूषणों द्वारा सत्कार किया ॥ २६ ॥ अयोध्यावासी नागरिकों तथा मित्रोंने रामचन्द्र और सीताको अपने यहाँ भोजन करनेके लिए बुलाया ॥ २७ ॥ अनेक बाजोके साथ-साथ वराङ्गनाओंके नाच-गान हुए स्त्रियोंके हाथसे फूलोंकी वर्षा हुई और कितने ही तरहके खेल-तमाशे हुए ॥ २८ ॥ उस समय सीताको देखनेके लिए प्रत्येक देशकी राजनारियाँ अयोध्या आयीं। २९ ॥ उनके साथ आयी हुई सेनासे घिरकर वह अयोध्या नगरी और भी सुन्दर लगने लगीं। उन रानियोंने अभादि देकर सीताकी इच्छा पूर्ण की और आनन्दपूर्वक बहुतसा वस्त्र-अलंकार तथा अपने देशके विशिष्ट वस्तुएं देकर सीताकी पूजा की ॥ ३०-३२ ॥ वे रानियां एक महीना अयोध्यामे रहकर अपने अपने देशको लौट गयीं। एक दिन जब कि सुमेधा, जनक, सीता तथा रामचन्द्र एकान्तमें बैठे थे । तब रामने कहा- हे महाराज ! सीताको अपने पास न छल तथा क्षणभर भी उनके वियुक्त होकर मैं नहीं रह सक्ता। जब सीताके पास पहुँच
३०० आनन्दरामायणे [ सर्गः २
मयाऽऽलभ्य तन्मुखेन्दुसुधया स्वास्थ्यमाप्यते । आत्मानं विह्वलं दृष्ट्वा सीतामाश्रित्यमाश्रये । ३५॥
अधुना जानकीं दृष्ट्वा कामो मेऽतीव बाधते । पञ्चमासोर्ध्वतः सङ्गं गर्हयन्ति मुनीश्वराः । ३६॥
प्रसूत्यर्थं पञ्चमासं स्त्री स्वास्थ्यं प्राप्यते पुनः । पञ्चममार्गविनः सङ्गादपत्योः क्षाणतेरिति । ३७।
अत्र किं करणीयं हि वद त्वं श्वशुराय माम् । चेत्प्रेषणीया सीतेयं मिथिलां प्रति वै मया । ३८॥
तर्हि तत्रापि मे गन्तुं मविष्यति समुद्यमः । किञ्चित्कालं तु सीताया वियोगो येन मे भवेत् । ३९॥
उपायः संविधातव्यश्चिन्तितोऽस्ति मयाऽपि च । लोकापवादभीत्याऽहं रजकोक्तेश्छलादपि । ४०॥
गङ्गाया दक्षिणे तीरे वाल्मीकेराश्रमे शुभे । त्यजामि जानकीं शुद्धां किञ्चित्कालान्तरात्पुनः॥४१॥
एनां ममानयिष्यामि प्रत्ययं मां प्रदास्यति ।ततोऽनया चिरं कालं नानाभोगान भजाम्यहम् ॥ ४२॥
जनकोऽथ त्वया तत्र निजपत्न्या सुमेधया । वाल्मीकेराश्रमे गत्वा स्थेयं वर्षाणि पञ्च वै ॥४३॥
तथेत्यङ्गीचकाराथ जनकोऽपि सुमेधया । सीताऽप्यङ्गीचकाराथ विहस्य तद्वचः पतेः ॥४४॥
अथ रामो ददावाज्ञां सप्रियं जनकं मुदा । मगन्त्वा मिथिलाराज्ये स्वायं संस्थाप्य मन्त्रिणाम् ॥४५॥
ययौ सुमेधया शीघ्रं वाल्मीकेराश्रमं मुदा । किंचिद्दासीदामनेन्यवाशिवारणवेष्टितः ॥४६॥
नानोपचारानीतार्थे मगृश्च शकटादिभिः । चकार गेहं विपुलं वाल्मीकेश्च सुखावहम् ॥४७॥
सर्वसम्पत्तिमंयुक्तं बहुगोमहिषीयुतम् । पूरितं धान्यसंघैश्च वस्त्रैराभरणादिभिः । ४८।
कामारोपवनारामपुष्पवाटिशताङ्गतम् । गवाक्षैश्चन्द्रकान्तानां कपाटैश्च समन्वितम् ॥४९॥
कृष्णागुरुसकर्पूरैःशीतमल्यादिमादिभिर् । कांचनैःशृङ्खलारत्नैरत्नपर्यङ्कमण्डितम् ॥५०॥
हंसापायतपिककेकांशुकनिनादितम् । मुक्तागुच्छवितानाद्यैः शोभिनं चित्रिताश्वितम् । ५१॥
आता हूँ तो इनके मुखचन्द्रकी सुधासे स्वस्थ हो जाता हूँ । जिस समय मुझको कुछ भी घबराहट होती है, उस समय में सीताके ही समीप रहता हूँ ॥ ३३-३५ । इस समय सीताको देखकर मुझ कामपीड़ा हो रही है और मुनियोंकी सलाह यह है कि गर्भ वःह हो जानेपर पाँच महीने बाद स्त्रीप्रसङ्ग करना निन्दित है ॥ ३६ ॥ प्रसव होनेके अनन्तर पाँच महीने बाद ही स्त्री स्वस्थ होती है। बिना पाँच महीने बाद प्रसङ्ग करनेसे दोनोंको हानि ही हानि है। ऐसे असमञ्जसके समय मुझे क्या करना चाहिये, सो आप बतलाइये। यदि मैं सीताको मिथिला भेज देता हूँ तो मुझ को भी वहाँ जाना पड़ेगा। किन्तु मै कुछ दिन तक सीतासे अलग रहना चाहता हूँ। जिस तरह मेरा इच्छा पूर्ण हो, वही इस समय करना चाहिए। मैंने तो यह सोच रक्खा है कि लोकापवादके डरसे अथवा उस धाबीके ख्यालसे गङ्गाके दक्षिण तटपर वाल्मीकिके पवित्र आश्रमम कुछ समयके लिए परम शुद्ध जानकी को छोड़ दूँ। थोड़े दिन बाद शास्त्र ले आऊँगा फिर मैं इनके साथ चिरकालतक नाना प्रकारके भोगांको भोगूंगा ॥ ३७-४२॥ उस समय आपको अपनी सुमेधाके साथ वाल्मीकिके आश्रमपर जाकर पाँच वर्ष पर्यन्त निवास करना होगा ॥ ४३। सुमेधा और जनकने रामकी सलाह स्वीकार की और सीताने भी हँसकर पतिका कहना मान लिया ॥ ४४। इसके अनन्तर रामने जनकको अपन देश जानकी आज्ञा दी। वे अपने देश गये और राज्यका सब भार मन्त्रीपर छोड़कर अपनी स्त्री सुमेधाके साथ वाल्मीकि ऋषिके आश्रमको चल दिये। चलते समय अपने साथ कुछ दास, दासी, सैनिक तथा हाथी-घोड़े भी ले लिये । ४५ ॥ ४६ ॥ सीताके लिए बहुत सी सामग्रियाँ गाड़ियोंपर लदवाकर साथ ले गये। महर्षि वाल्मीकिके आश्रमको जनकने सब सुखांका भण्डार बना दिया । ४७ ॥ जनकजीके वहाँ पहुंचतेही वह आश्रम सब सम्पत्तियों एवं बहुत सी गौओ और भैंसोंसे भर गया । विविध प्रकारके अन्नों और भाँति-भाँतिके वस्त्राभूषणों से वह पूरा हो गया । ४८ ॥ अनेक पास सैकड़ों पसार, उपवन, बगीचे बावड़ी तथा कुएं तैयार हो गये । चन्द्रकान्त मणिके दरवाजों तथा फटकाबाल भव्य भवन बने । ४६ ॥ कृष्णागुरु, कपूर, खस तथा विविध प्रकारके सुगन्धित द्रव्योंसे वह आश्रम सुगन्धमय हो गया जगह-जगह पर सोनेकी जंजीरोंसे सुसज्जित पलङ्ग पड़ हुए थे ॥ ५० ॥ हंस, कबूतर, कोयल, मयूर तथा तोतोंके शब्दोंसे
सर्गः २ ] जन्मकाण्डम् ३०१
एवं मनोहरं गेहं सीताथं जनकोऽकरोत् । श्रीः साक्षाद्..तमुद्युक्ता यस्मिन्वसितुं चिरम् ॥५२॥
किं दुर्लभं हि तत्रास्ति वर्णनीयं मयाऽथ किम् । यस्या नेत्रकटाक्षेण शक्रादीनां विभूतयः ॥५३॥
वाल्मीकये सर्ववृत्तं जनकोऽपि न्यवेदयत् । मुनिधाप्यतिमंतुष्टो मेने स्वसपसः फलम् ॥५४॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे द्वितीयः सर्गः । २ ।
तृतीयः सर्गः
( राम द्वारा सीताका त्याग )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामं तु कौसल्याऽब्रवीद्रहसि संस्थिता । सीतां सीमोल्लङ्घनार्थं शीघ्रं प्रेषय राघव ॥१॥
तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा सत्रिस्तरात् । सलक्ष्मणां निजांपत्नीं प्राह सम्मन्त्रिनं पुरः ॥२॥
वाल्मीकेराश्रमं सीतात्यागादि च सकारणम् । अथ मासेऽष्टमे प्राप्ते राधो राजीवलोचनः ॥३॥
एकान्ते जनकीं प्राह रीजयन्ता लक्ष्मणेन हि । कम्पयित्वा मिषा देवि रजकोक्तं त्वदश्रयम् ॥४॥
त्यजामि त्वां वने लोकवादाद्भीता इवापरः । त्रिमान्मार्ध्वञ्चमासाद्वाः सम् मामामुयुदाद्भिः ॥५॥
अन्तर्वत्नी न गच्छेति शास्त्राज्ञां रजकच्छलात् । त्वां त्यक्त्वा पालयिष्यामि निकटे वस्तुमक्षमाः ॥६॥
त्वां दृष्ट्वा संवदन्त्यां कामो मेन्मान बाधते । त्वद्वियागस्तु निर्बन्ध्वानिना मन्त्र कथं भवेत् ॥७॥
तस्मात्कृताऽयं निर्ग्रन्थः सत्यं विद्धि मनोरथं । पञ्चवर्षानन्तरण पुनरागत्य मण्डलेऽकम् ॥८॥
लोकानां प्रत्ययार्थं त्वं शपथं हि करिष्यसि । भूमेर्धिवरमार्गेण स्थित्वा मिहायसोपरि ॥९॥
वह आश्रम शब्दरायमान हो रहा था। यत्र तत्र मोतियोंका झालरवाली चाँदनियाँ टॅगी हुई थीं और बहुत-सी तसवीर भी जहाँ-तहाँ टॅगी थीं ॥ ५१ ॥ जनकजी ने सीताके लिए इस प्रकारका सुन्दर भवन बनाकर तैयार करवाया। यदि ऐसा दिव्य भवन सीताजीके वास्ते बन गया तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। जहां निवास करनेके निमित्त साक्षात् लक्ष्माजी जन्मवाला हा, वहाँ कौन वस्तु दुर्लभ हो सकती है। जिसके कटाक्षमात्रसे इन्द्रादि देवनाओंकी भा सम्पत्तियां बनतानबगटता है। उसके विषयमें मैं कहाँ तक वर्णन करूंगा। जनकजीने महर्षि बाल्मीकिको भी वह सब बात बतला दी, जिसे सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए और सीताके उस भावी आगमनको उन्हान अपनी तपस्याका फल समझा ॥ ५२-५४ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयात्मजविरचित ज्योत्स्ना भाषाटीकासमन्वित जन्मकाण्ड द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
श्रीरामदासने कहा—एक दिन एकान्तमे कौसल्याने रामसे कहा कि अब समय हो गया है। शीघ्र सीताको अपनी सीमासे कहीं अलग भेज दो। माताकी बातको रामने स्वीकार किया और वह भी बतलाया, जिसका निर्णय बहुत दिनों पहले कर चुके थे ॥ १ ॥ २ ॥ फिर यह भी कहा कि मेरा इस समय सीताका त्याग करना उचित है। कुछ दिन बाद आठवाँ महीना लगनेपर रामने सीताको एकान्तमें बुलाकर समझाते हुए कहा—देवि ! उस दिन एक धोबीने तुम्हारे विषयमें बड़ा कुत्सित आलोचना की थी उसीके बहाने मैं तुम्हें कुछ दिनोंके लिए वनमें छोड़ दूंगा। इससे दुनिया समझेगी कि मैं लोकापवादसे बहुत डरता हूँ। दूसरी एक बात यह है कि गर्भसे तीसरे, पाँचवे अथवा सातवे महीनेमें स्त्रीका सङ्ग नहीं करना चाहिए। यह शास्त्रोंकी आज्ञा है। इसलिए उस धोबीकी बातके व्याजसे तुम्हें दूर रखकर मैं शास्त्रकी आज्ञाका पालन करूंगा और पास रहनेमें यह न हो सकेगा कि मैं तुमसे न बोलूँ ॥ ३-६ ॥ क्योंकि तुमको देखनेसे मुझे काम सताने लगता है। तुम्हारा वियोग भी बिना किसी बहानेके नहीं हो सकता था। इसलिए मैंने ऐसा प्रबन्ध किया है और इस समय मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे अक्षरशः सत्य समझो। पाँच वर्षके बीतते ही तुम फिर यहाँ आओगी और संसारको दिखानेके लिए तुम्हें शपथ लेनी होगी ॥ ७ ॥ ८ ॥ ९ ॥
३०२ आनन्दरामायण [ सर्गः ३
यदा गच्छसि पातालं जगन्त्या पूजिता तदा । भुवस्तुन्दा मीषयित्वा त्वामंके स्थापयिष्यहम् ॥१०॥
पुत्राभ्यां च मया सीते ततो भोगानवाप्स्यसि । मत्स्वकः कुश्रो ज्येष्ठस्तव पुत्रो भविष्यति ॥११॥
सुम्भवः प्रभावेण भविष्यत्यपरो लवः । वाल्मीकेराश्रमे चैवं कुमारी द्वौ भविष्यतः ॥१२॥
अग्रे गत्वा त्वन्मात्रिप्रा स्वच्छापं च गृहादिकम् । मसुमेधन सकलं कृतमस्ति ममाज्ञया ॥१३॥
कुरुष्वाद्य मया यच्चोच्यते जनकात्मजे । सात्त्विकी त्वं यथापूर्वं दंडके गौतमीतटे ॥१४॥
अज्ञानाने स्थिता यद्वन्मे वामभागे तथाधुना । वाल्मीकेराश्रमे गन्तुं शुजद्वयविमिश्रिता ॥१५॥
भूत्वा स्वमाश्रमे स्थित्वा मद्धियोगं प्रदर्शय । तत्रापि त्वां कुशोत्पत्तौ दास्यामि दर्शनं रहः ॥१६॥
तथेति रामवचनाज्जानकी सा स्मितानना । रजनमोमयीं स्वर्चा छायां निधाय सादरम् ॥१७॥
अंशाथपस्य वामांगे सत्त्वरूपा लयं ययौ । ततो रामः सभां गत्वा रत्रौ ज्ञानैकविग्रहः ॥१८॥
मविविधर्मयत्त्रासुदेलमुखैर्यथोक्तकैः । समन्ततो वेष्टितः संस्तस्थौ सिंहासनोपरि ॥१९॥
तत्रोपविष्टं राजानं सुहृद पर्युपासिरे । हास्यप्रायकथा भिश्च हासयन्तः स्थिताः सुखम् ॥२०॥
अथ प्रसङ्गात्पप्रच्छ रामो विजयनामकम् । पौरा जानपदा वा म किं वदन्ति शुभाशुभम् ॥२१॥
सीतां तां मातरं वा मे भ्रातृन्वा कैकयीमथ । न भेतव्य त्वया ब्रूहि शापितोऽसि ममापरि ।२२।
इत्युक्तः प्राह विजयो देव सर्वे वदंति ते । कृतं सुदुष्करं कर्म रामेणाविदितात्मना ॥२३॥
यद्याप्येवं वदन्ति स्वां जनास्तच्चे वदाम्यहम् । किंतु हन्त्वा दशग्रीवं सीतामाहृत्य राघवः ॥२४॥
अमर्षे पृष्ठतः कृत्वा स्ववेश्म प्रत्यपादयत् । कीदृश हृदयं तस्य र्भतामभागजं सुखम् ॥२५॥
समय तुम अब एक दिव्य सिंहासनपर बैठकर भूमिके विवरमार्गसे पातालको जाने लगोगी । तब मैं भूमिकी प्रार्थना करके या धमकाके तुम्हें वापस ले लूँगा और अपने गोदमें बिठाऊँगा ॥ ९ ॥ १० ॥ उस समय तुम अपने दो बेटोंको लिय हुए मेरे साथ रहकर विविध प्रकारके सुख भोगोगी। मेरे द्वारा मुझसे एक पुत्र होगा, जिसका नाम पडेगा कुश और दूसरा बेटा ऋषि के कृपावरके प्रभावसे उत्पन्न होगा, जिसका नाम होगा लव । इस प्रकार वाल्मीकिके आश्रमपर तुम्हारे दो पुत्र होंगे ॥ ११ ॥ १२ ॥ तुम्हारी माताके साथ जनकजी पहले ही उस आश्रमपर जा चुके हैं और उन्होंने तुम्हारे आगमनकी सब सामग्रियाँ प्रस्तुत कर दी है । १३ ॥ आज मैं तुमको जैसा कह रहा हूँ हे जनकात्मजे ! तुम्हें वही करना पडेगा। जैसे उस समय गौतमीके तट-पर तुमने अपनी दो मूर्तियाँ बनाया थी । उसी प्रकार इस समय भी अपनी दो स्वरूप बनाओ और पहलेकी नाई इस समय भी तुम सात्विक रूपमें मेरे बाम अंगमें निवास करो । १४ ॥ १५ ॥ और दूसरे स्वरूपसे वाल्मीकिके आश्रमपर रहकर संसारको मेरे वियोगका दुःख दिखलाओ। आश्रमपर भी जब कुशका जन्म होगा, उस समय आकर मैं तुम्हें एकान्तमें दर्शन दूंगा । १६ ॥ रामकी बात सुनकर सीताजी मन्द मुस्कराहट के साथ 'तथास्तु' कहा और रजोगुणमयी तथा तमोगुणमयी संता अपनी छाया नामक दक्षिण भागमें बैठ गयी और सत्त्वरूपसे रामके वाम भागमें विलीन हो गयी ॥ १७ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजी सभाभवनमें गये । वहाँ मन्त्रणानिपुण मन्त्रियों तथा कितने ही दरबारियोंसे वेष्टित होकर बैठे। मित्रोने उस समय भगवान्की विविध प्रकारसे पूजा की। तत्पश्चात् तरह-तरहकी हँसी-दिल्लगीकी बात कर-करके वे परस्पर मनोविनोद करने लगे । १८-२० ॥ प्रसंगवश रामने विजय नामक एक गुप्तचरसे पूछा कि इस समय अयोध्यावासी लोग मुझ किस दृष्टिसे देखते है। उनकी दृष्टिमं मेरा शासन कैसा है वा खराब ? इसके अतिरिक्त सीता मेरी मात, भा, भाइया अथवा कैकईके प्रति लोगक हृदयमं कमानभाव है। किसी प्रकार डरो मत, जो कुछ मालूम हा साफ़-साफ़ बतला दो । तुम्हे मेरा शपथ है। इस प्रकार रामक पूछनपर विजयने कहा-हे देव ! आपके किये महान् कार्यों की सराहना करते हुए लोग प्रशंसा ही करते है ॥ २१-२३ । फिर भी आपके विषयमे कुछ लोगोका जो दूसरा राय है। उसे भी बतलाता हूँ, वे कह रहे कि रामने रावणको मारकर सीताको उससे छुड़ाया और बिन कुछ सोच-विचार अपन घरमं बिठाल लिया। हम नहीं समझते कि रामका
सर्गः ३] उत्तरकाण्डम् ३०१
सा हृता विजने पूर्वं रावणेन वने तदा। अकस्मादपि दुष्कर्म योषित्स्वमर्षदं भवेत् ॥२६॥
यादृग्भवति वै राजा तादृश्यो नियमाः प्रजाः। इति नानाविधा वाचः प्रवदन्ति पुरेजनाः ॥२७॥
अपरञ्चिन्तयन्पश्यामि सांप्रतं रजकोदितम्। दुर्भागां स्वगृहाद्भार्यां कीदृशेन यः ॥२८॥
रजकः प्राह मोऽङ्गे मोऽहं रामो न मैथिलीम्। शरण्य शुद्धे स्पष्टं स्थित्वामगीचकार यः ॥२९॥
यथेच्छं गच्छ रंडे त्वं नाहं रामवदाचरे। गच्छता च मया मार्गे रजकेन ममोदितम् ॥३०॥
इति राम श्रुतं पूर्वं मया दृष्टं निवेदितम्। यत्पथ्यमि हितं चात्र तत्कुरुष्व रघूत्तम ॥३१॥
श्रुत्वा तद्वचनं रामः स्वजनांश्चाप्यपृच्छत्। तेऽपि तन्माञ्जब्रुवन् राममेवमेतन्न संशयः ॥३२॥
ततो विसृज्य सचिवाग्विजयं सुहृदस्तथा। ग्राहूय लक्ष्मणं रामो वचनं चेदमब्रवीत् ॥३३॥
लोकापवादस्तु महान्संयातामद्यैव मेऽभवत्। सीतां प्रातः समारोप्य वाल्मीकेराश्रमांतिके ॥३४॥
त्यक्त्वा शीघ्रं रथेन त्वं पुनरायाहि लक्ष्मण। वक्ष्यमे यदि वा किंचिदत्र मां हतवानसि ॥३५॥
छित्त्वा सीताभुजं नोऽद्यप्रत्ययार्थं समानय। इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः कैकेयीं श्रूङ्गुमाययौ ॥३६॥
एतस्मिन्नन्तरे सीतां कैकेयी रहसि स्थिता। पप्रच्छ कौतुकात्सीते भित्तीलिख्य दशाननम् ॥३७॥
मामग्र दर्शयस्वाथ तां प्राह जानकी तदा। मयाऽवलोकितो नैव कदाऽपि स दशाननः ॥३८॥
यदा हर्तुं पंचवट्यां मां भ्रामो गौतम्यतटे। तदा दृष्टस्तदङ्गुष्ठो मया दक्षिणपादजः ॥३९॥
तन्सीतावचनं श्रुत्वा कैकेयी प्राह तां पुनः। यथा दृष्टस्त्वयांगुष्ठस्तथा भित्तौ लिखस्व हि ॥४०॥
तथेति जानकी लेख्य तदंगुष्ठ भयानकम्। कैकेय्यै दर्शयामास तापसंश्च गृहं ययौ ॥४१॥
हृदय कैसा है जो इतना अनर्थ होनेपर भी लोटा हुई माताके साथ विहार करते हुए सुखी हो रहे हैं ॥२४।२५॥ जो सीता उस दुष्टके द्वारा हरी गयी और कई वर्ष तक उसके घरमे रही, उसके लिए रामको कुछ सोच विचारनेकी आवश्यकता क्योंकर नहीं मालूम हुई ? उनका क्या बिगडा वे चाहे एक बार कोई दुष्कर्म भी कर लें तो कोई दृष्टि नहीं उठा सकता लेकिन इसका दुष्प्रभाव तो प्रजाके ऊपर पड़ेगा। यह साधारण नियम है कि जिस देशका जैसा राजा होता है, प्रजा भी वैसी ही हुआ करती है। इस प्रकारकी बातें बहुतोंके मुंहसे सुनी गयी हैं। एक धोबीने भी एक बात आपके बारेमें कही थी सो भी कहता हूँ। उसने कामवश अपनी व्यभिचारिणी स्त्रीको संबोधित करके कहा 'अरी ओ रण्डे ! मैं वह राम नहीं हूँ, जिन्होंने क्यों शरणके वशमें रही हुई सीताको अङ्गीकार कर लिया है। तेरी जहाँ इच्छा हो जा मैं रामकी तरह कर्म नहीं करूँगा और तुझे नहीं रखूँगा ॥२६-३०॥ मैं रास्तेमे चला जा रहा था, तब धोबीकी बात सुनी थी। सो पूछनेपर आपको बतला दी। अब आप जो अच्छा समझें, वह करें। विजयकी बातें सुनकर रामचन्द्रजीने अपने मित्रोंसे भी इस विषयमें पूछ-ताछ की। उन लोगोंने भी वही कहा जो विजयने बतलाया था। इसके बाद रामचन्द्रजीने मंत्रियों तथा विजयको बिदा कर दिया और लक्ष्मणको बुलाया। लक्ष्मणसे रामने कहा— हे लक्ष्मण ! सीताके कारण नगरमें लोग हमारी बड़ी निन्दा कर रहे हैं। इससे भी बढ़कर अपवाद होनेकी आशंका है। इसलिए कल सबेरे तुम सीताको रथम बिठाकर मुनि वाल्मीकिके आश्रमपर छोड़ आओ। इस बातके विपरीत यदि तुम कुछ कहोगे तो तुम्हें हमारी हत्या करनेका पाप लगेगा। हाँ, इतना और करना। उनसे छोटेके समय सीताकी एक भुजा भी काटकर ले आना, जिसे दिखाकर मैं अयोध्यावालोंको विश्वास दिला सकूँ॥। इतना कहकर राम कैकेयीके पास चल दिये। इसी बीच कैकेयीने आँगनमें बैठी बाते करते-करते सीतासे कहा-सीते ! इस दीवारपर रावणका चित्र लिखकर हमें दिखाओ कि वह कितना बड़ा था। इसके उत्तरमे सीताने कहा 'मैंने रावणको कभी देखा ही नहीं ॥३१ ३८ ॥ हाँ, जब वह पंचवटीमें मुझे हरनेके लिए गया था, तब मैंने उसके दाहिने पैरका अंगूठा देखा था। सीताका उत्तर सुनकर कैकेयीने कहा—अच्छा, उसका अंगूठा जैसा रहा हो, वही इस दीवारपर लिख दो। जानकीने कैकेयीके कथनानुसार दीवारपर उसके भयानक अंगूठेका चित्र लिखकर दिखा दिया और थोड़ी देर बाद अपने
३०४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
अङ्गुष्ठोपरि कैकेय्या यथायोग्यो दशाननः । लिखितः स्वेन हस्तेन रामं द्रष्टुं कुबुद्धितः ॥४२॥
द्वारद्वारं समायातं दृष्ट्वा सा संभ्रमान्विता । भित्तिनिके राघवाय ददावासनमुत्तमम् ॥४३॥
रामोऽपि नत्वा कैकेयीमासने संस्थितोऽभवत् । ददर्श भित्तौ लिखितं विचित्रं तं दशाननम् ॥४४॥
रामः पप्रच्छ केनात्र लिखितोऽयं दशाननः । कैकेयी कथयामास सीतया लिखितस्त्विति ॥४५॥
यत्र यत्र मनो लग्नं स्मर्यते हृदि तत्सदा । स्त्रियाश्चरित्रं को वेत्ति शिवाद्या मोहिताः स्त्रिया ॥४६॥
कैकेयीवचनं चेत्थं श्रुत्वा रामो महामनाः । सीताश्रयं समावृत्तं कैकेयीमाह विस्तरात् ॥४७॥
लक्ष्मणेन त्यजाम्यद्य श्वः सीतां जाह्नवीतटे । सीताभुजं वने छित्त्वा समानयतु मन्दिरात् ॥४८॥
सौमित्रिस्त्वां तथा पौरान्दर्शयिष्यति निश्चयात्
सीतया लिखितो यस्मात्स्वभुजेन दशाननः ॥४९॥
स्त्रीहत्याभयमालस्य नहन्मे लक्ष्मणो मया । न चोदितश्च तां हिंस्रा भक्षयिष्यन्ति वै क्षणात् ॥५०॥
इति रामवचः श्रुत्वा कैकेयी मुदिताऽभवत् । सीताया विरहाद्रामो नेदं राज्यं प्रशास्यति ॥५१॥
सेवार्थं रामचन्द्रस्य लक्षमणोऽपि न शाप्स्यति । तदा श्रीरामवाक्येन भरतो मे प्रशास्यति । ५२॥
इति मञ्चिन्त्य हृदये कैकेयी मुदिताऽभवत् । रामोऽपि नत्वा कैकेयीं सुमित्रां स्वां च मातरम् ॥५३॥
समावृत्तं च कैकेयीगेहे यज्ज्ञानमादरात् । श्रावयामास सकलं वृत्तं सीताश्रयं प्रभुः ॥५४॥
नत्वा सुमित्रां कौसल्यां रामः सीतागृहं ययौ । सीतया दत्तपाद्यार्घासनमर्गांचकार सः ॥५५॥
समावृत्तं च कैकेयीगेहे यद्दष्टमादरात् । श्रावयामास तत्कृत्स्नं वृत्तं तं जानकी मुदा ॥५६॥
तच्छ्रुत्वा जानकी प्राह कैकेय्या वचनान्मया । अङ्गुष्ठ एव लिखितस्त्वयोर्ध्वं लिखितो धिया ॥५७॥
अङ्गुष्ठस्यानुरूपेण दशास्यो दुष्टबुद्धितः । तन्मेतावचनं श्रुत्वा जानकीमाह राघवः ॥५८॥
महलोंको चली गयी। सीताके चले जानेपर द्वेषवश कैकेयीने रामको दिखानेके लिए उस अंगूठेके अनुसार रावणके पूरे शरीरका चित्र अपने हाथसे बना दिया ॥ ३९-४२॥ इतनेमें कैकेयीने देखा कि राम इसी ओर आ रहे हैं। तब झटपट उसने उस दीवारके पास ही रामजीको बैठनेके लिए आसन डाल दिया। रामने वहीं पहुँचकर कैकेयीको प्रणाम किया। फिर आसनपर बैठ गये। थोडी देर बाद रामका दृष्टि उस बने हुए रावणके चित्रपर पडी ॥ ४३ ॥ ४४ । रामने पूछा यहांपर रावणका चित्र किसने बनाया है? तदुत्तरमें कैकेयीने कहा कि आपके बहू सीतने यह चित्र लिखा है। जहां जिसका मन लगा रहता है, बार बार उसीकी याद आती रहती है। यह एक साधारण नियम है। और फिर स्त्रियोंके चरित्रको कौन जान सकता है शिवाद्दिक देवता भी तो स्त्रीचरित्रका पार नहीं पा सके और वे भो मोहित हो गये ॥४५॥४६॥ कैकेयीकी बात सुनकर मनस्वी रामचन्द्रजीने कैकेयीको वह बातें भो बतलायीं, जो सभामें विजयके मुंहसे सुनी थीं। इसी सिलसिलामम उन्होंने यह भी कहा - मातः! कल सबेरे लक्ष्मणके साथ मैं सीताको गंगाजीके तटपर भेज रहा हूँ। वह उसे वहीं छोड देगा और आप तथा पुरवासियोंको दिखानेके लिए मेरे कहनेसे सीताका एक हाथ भो काट लायेगा। क्योंकि सीताने उसी हाथसे तो रावणका यह चित्र बनाया होगा। स्त्रीहत्याके भयसे मैं उसे मारनेकी आज्ञा नहीं दूँगा। लेकिन जब उसके हाथ नहीं रहेंगे तो वह जियेगी कैसे ? वनके हिंसक जीव ही उसको खा जायेंगें ॥४७-५०॥ इस प्रकार रामके वचन सुनकर कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई और मनही मन सांचन लगी कि सीताके विरहसे दुखी होकर राम राज्यका काम नहीं कर सकते। लक्ष्मण भी रामकी सेवामें लगे रहनेके कारण राज्यका भार अपने ऊपर नहीं लेंगे। उस दशामे विवश होकर राम मेरे बेटे भरतसे राज्यका काम करनेके लिए आग्रह करेंगे। यह सोचकर कैकेयी प्रसन्न हुई । रामजी भी कैकेयीको प्रणाम करके अपने महलोंको चले गये। वहाँ अपनी माता कौसल्या तथा सुमित्राको आदिसे अन्ततक सीतासम्बन्धी सब वृत्तान्त कह सुनाया । फिर कौसल्या और सुमित्राको प्रणाम करक वे सीताके भवनमें जा पहुँचे । सीताने पाद्य-अर्घ्य-आचमनायादिसे उनकी पूजा की और रामजी एक आसनपर बैठ गये। इसके