श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ४७
सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ४७
ततः पूर्णे वर्षे प्राप्ते यदा यास्यसि भूतलम् । सूर्यवंशेऽद्भुतो राजा विख्यातंस्त्वं भविष्यसि ।।२६।।
नाम्ना दशरथस्तत्र भार्याद्वययुतः पुमान् । तृतीयेयं तदा भार्या पुण्यश्लेषार्धभागिनी ।।२७।।
कलहा कैकेयी नाम्नी भविष्यति न संशयः । तत्रापि तव सामीप्यं विष्णुर्दास्यति भूतले ।।२८।।
आत्मानं तव पुत्रत्वं प्रकल्प्यामत्कार्यकृत् । रामनाम्ना रावणादीन् हत्वा राज्यं करिष्यति ।।२९।।
तवाजन्मव्रतादस्माद्विष्णोस्तुष्टिकरात्परम् । न यज्ञा न च दानानि न तीर्थान्यधिकानि वै ।।३०।।
अतस्त्वमग्रेऽपि धर्मज्ञ नित्यं विष्णुव्रते स्थितः । त्यक्तमात्सर्यदम्भोऽपि भव त्वं समदर्शनः ।।३१।।
कार्तिके माधवे माघे चैत्रे मन्मथतुष्टये । प्रत्यब्दं त्वं धर्मदत्त प्रातःस्नायी सदा भव ।।३२।।
एकादशीव्रते निष्ठ तुलसीवनपालकः । ब्राह्मणानपि गाश्चापि वैष्णवांश्च सदा भज ।।३३।।
मसूरिकास्तालाबुं वृन्ताकादीनि खाद मा । एवं त्वमपि देहान्ते तद्विष्णोः परमं पदम् ।।३४।।
प्राप्स्योषि धर्मदत्त त्वं तद्भक्त्यैव यथा वयम् । पुण्यशीलसुशीलाख्यौ जयश्च विजयस्तथा ।।३५।।
धन्योऽसि विप्रार्थ्य यतस्त्वयैतद्व्रतं कृतं तुष्टिकारं जगद्गुरोः ।
यदर्थमोघात्फलमन्मुरारेः प्रणीषतेऽस्माभिरियं सलोकताम् ।।३६।।
मुद्गल उवाच
इत्थं तौ धर्मदत्तं तमुपदिश्य विमानगौ । तया कलहया सार्द्धं वैकुण्ठभवनं गतौ ।।३७।।
धर्मदत्तोऽप्यसौ राजन् प्रत्यब्दं तद्व्रते स्थितः । देहान्ते परमं स्थानं भार्याभ्यामन्वितोऽन्वगात् ।।३८।।
बहून्यब्दसहस्राणि स्थित्वा वैकुण्ठसद्मनि । ततः पुण्यक्षये जाते जातोऽमित्वं नृपो महान् ।।३९।।
त्रिभिः स्त्रीभिर्दशरथ ते विष्णुः पुत्रतां गतः । शमोऽथ लक्ष्मणः शेषो भरतोऽब्जोऽरिमर्दनः ।।४०।।
एवं सर्वं मयाऽऽख्यातं यथा पृष्टं त्वया मम । धन्यस्त्वं यस्य तनयः साक्षात्न्नारायणोऽभवत् ।।४१।।
इसलिए तुम भी दोनों स्त्रियोंके साथ कई हजार वर्ष पर्यन्त उनके सान्निध्यको प्राप्त होओगे ॥ २५ ॥ तत्पश्चात् पुण्य क्षीण होनेपर जब तुम पुनः पृथ्वीपर आओगे, तब सूर्यवंशमें बड़े प्रख्यात राजा बनोगे ॥ २६ ॥ दोनों स्त्रियां तुम्हारे साथ रहेंगी और तुम श्रीमान् दशरथ नामके राजा बनोगे। उस समय यह आध पुण्यकी भागिनी कलहा निःसन्देह कैकेयी नामकी तुम्हारी तीसरी स्त्री होगी। वहाँ पूर्वापर भी भगवान् सदा तुम्हारे सन्निकट रहेंगे ॥ २७ । २८ ॥ वे प्रभु देवताओंका कार्य साधन करनेके लिए अपने आपको तुम्हारा पुत्र बनावेंगे तथा रामनाम धारण करके रावण आदिको मारकर राज्य करेंगे ॥ २९ ॥ विष्णुको प्रसन्न करनेवाले तुम्हारे जन्मसे लेकर किये हुए इस व्रतसे बढ़कर कोई यज्ञ, दान तथा तीर्थ आदि नहीं हैं। ३०॥ इस कारण आगे भी तुम धर्मज्ञ, नित्य विष्णुक व्रतमें स्थित और मात्सर्य दम्भ आदिसे रहित होकर समदर्शी बनो ॥ ३१ ॥ हे धर्मदत्त ! प्रतिवर्ष कार्तिक, वैशाख, चैत तथा माघ इन चारो महीनोंमें प्रातःकाल स्नान करके तुम एकादशीका व्रत और तुलसीका पूजन करो ब्राह्मण, गौ तथा वैष्णवभक्तोंकी सेवामें तत्पर रहा करो ॥ ३२ । ३३॥ मसूर, सोवीर तथा बैंगन आदिका खाना छोड़ दो। हे धर्मदत्त ! ऐसा करनेसे तुम भी जय-विजय तथा पुण्यशील-सुशील आदि हम लोगोंकी तरह विष्णुके उस परम पदको उनकी भक्तिभावसे ही प्राप्त होजाओगे ॥ ३४ । ३५ ॥ हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो क्योंकि तुमने जगद्गुरु विष्णुको सन्तुष्ट करनेवाला यह व्रत किया है, जिसके अमोघ पुण्यफलके प्रभावसे हमलोग भी मुरारि भगवान्की सलोकताको (समानलोकको) प्राप्त हुए हैं ॥ ३६ ॥ **मुद्गल बोले—**इस प्रकार वे दोनों धर्मदत्तको उपदेश दे तथा विमानमें बैठकर कलहाके साथ वैकुण्ठधामको चले गये ॥ ३७॥ हे राजन् ! वह धर्मदत्त भी प्रतिवर्ष उस व्रतको करके देहान्त होनेके बाद दोनों स्त्रियोंके साथ परमपदको प्राप्त हुआ ॥ ३८ ॥ बहुत वर्षों पर्यन्त वैकुण्ठ-धाममें रहकर पुण्यक्षय होनेके बाद यहाँ आकर वही तुम इतने बड़े राजा बने हो ॥ ३९ ॥ तुम अपनी तीनों स्त्रियोंके साथ यहाँ आये। विष्ण भगवान् तुम्हारे पुत्र राम बने, शेष लक्ष्मण बने, ब्रह्मा भरत बने तथा चक्र शत्रुघ्न बना ॥ ४० ॥ जो तुमने पूछा था, वह सब मैंने तुमको कह सुनाया। तुम धन्य हो। क्योंकि साक्षात् नारायण तुम्हारे पुत्र हुए हैं ॥ ४१ ॥ श्रीशिवजी
४८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५
इत्युक्त्वा नृपतिं पूज्य विससर्ज मुनिसत्तमः । आलिंग्य रामं सौमित्रि मेने च कृतकृत्यताम् ॥४१॥
तदा राजा स्वसैन्येन महता हर्षसमन्वितः । अयोध्यां प्रययौ द्रष्टुं गोपुशालमवेक्षिताम् ॥४२॥
नृपस्यागमनं ज्ञात्वा मन्त्रिणः परया मुदा । पताकातोरणाद्यैश्च दिव्यचन्दनसेचनैः ॥४३॥
नगरीं भूषयित्वा ते नृत्यवाद्यादिमंगलैः । निर्गताः सम्भ्रमात्तूर्णं गच्छन्तं नगरीं प्रति ॥४४॥
गम्यमानममात्याय गोपुशाङ्गलपंक्तिषु । कट्यां विधाय बाह्वग्रं स्त्रियः स्थित्वा निजं करैः ॥४५॥
सुवर्णकुसुमाद्यैश्च वर्षैः पुष्पववृष्टिभिः । काश्चिन्मार्गोपरि स्थित्वा कंचरीपादिदर्शकैः ॥४६॥
आर्तिक्याद्यैश्च राजानं सगर्भ शांतिकारकःै । पूजयन्ति स्म ताः सर्वा राजमार्ग पृथक् पृथक् ॥४७॥
एवं नानामृदंगहैनर्तकीभिश्चिताप्सु । दृश्यमाना विलोकैश्च गायकानां च गायनैः ॥४९॥
सौधोद्भवरवाद्यैश्च स्त्रीमुक्तपुष्पवृष्टिभिः । ययौ स्वशिबिरं राजा वीज्यमानः सुचामरैः ॥५०॥
सम्पूज्य जनकस्यापि भ्रातॄनलंकारवाहनेः । सन्तर्क्य योजनाद्यैश्च प्रेषयामास मैथिलम् ॥५१॥
एवं सर्वोत्सवेषु जनको वार्षिकेषु सः । निनाय मिथिलां राममनुभिः पार्थिवेन च ॥५२॥
उत्सवान्तः पूज्य तोषयामास राघवम् । रामोऽपि रमयामास लीलाभिर्नृपतिं तदा ॥५३॥
प्राप्तं षष्ठमिदं तेजञ्छ्री श्रीराघवस्य लक्ष्मणा । लग्नाभिषेकाद्वादशे वर्षे रजोधूता बभूव ह ॥५४॥
तद्वार्तां जनकः श्रुत्वा परमेष्ठिम॑मन्त्रिभिः सह । अयोध्यागमच्छीघ्रं राजा प्रत्युज्जगाम तम् ॥५५॥
परस्परं समालिङ्ग्य साकेतमिथिलाधिपौ । नृत्यवाद्यमहोत्साहैर्योध्यौ विविशुः सुखम् ॥५६॥
ततो महासभामध्येनानामण्डपपोरणैः । कदलीस्तंभमालाभिरिक्षुदंडैः सुचामरैः ॥५७॥
चतुर्द्वारैर्मण्डपैश्च घटाघोषैः सददैर्ध्वजैः । किंकिणीजालघोषैश्च विश्रान्तीवरराजिभिः ॥५८॥
बोले कि ऐसा कहकर मुनिने राजाकी पूजा की और सब विदा किया । राम लक्ष्मणका आलिङ्गन करके उन्होंने अपनेको कृतकृत्य समझा ॥४१॥ तब राजा दशरथ अत्यन्त हर्षित अपनी सेनाके साथ पुरद्वार तथा अटरियोंमे लगे हुए रमणीक अयोध्यापुरीको गये । ४२ ॥ राजाका आगमन सुनकर मन्त्रियोंने तथा पुरवासियोंने पताकाओं तथा तोरणोंसे नगरको सजा मया मण्डपोंपर चन्दन छिड़कवाकर नृत्य और मांगलिक बाजे बाजनेके साथ मुष्टाव राजाको नगरके ले अया ॥४३॥४४॥ गमको आया जानकर स्त्रियं अपने बाल्मोंका कप्परपर उठाकर पुरद्वार तथा अटरियोंका अमियोंपर जाकर खड़ा हो गयीं और अपने हाथस उनपर सुवर्ण-पुष्पोंकी वृष्टि करने लगीं । कुछ स्त्रियों मार्ग से आग मागलिक कलश और कुछ मांगलिक दीप लेकर रास्ते में सामने खड़ी हो गयीं और वह राजमार्गमे जगह-जगह ऋत्विकाम अपनी आदिस रामके सहित राजाकी पूजा करने लगीं ॥४५-४८॥ इस प्रकार अनेक मृदङ्गराम युक्त वेश्याओंके नृत्य तथा नगाड़ोंके शब्दों एवं गायकोंके गानाके साथ अवलोक डरनेवाले स्त्रियों डंग को दया पुष्पवृष्टिम आच्छादित तथा सुन्दर चमरौँसे वीज्यमान हुए राजा दशरथ अपने शिविरम गये ॥४९॥५०॥ तदनन्तर वस्त्र, अलङ्कार, अश्वगजादि वाहन तथा भोजन आदिसे राज जनकक मन्त्रियोंका सत्कार करके उन्हें मिथिला भेज दिया ॥५१॥ इस प्रकार राजा जनक प्रत्येक वार्षिक उत्सवमें रामको उनकी माताओं तथा राजा दशरथको मिथिलापुरीमें बुलाते थे ॥५२॥ राजा जनक रामको सदा सन्तुष्ट रखनकी चेष्टा करत थ । राम भी अनेक लीलाओं द्वारा राजाको आनन्दित करते थे, सुन्दरी तथा शुभा जानकी रामसे छः महीना छोटी थी। विवाहके ग्यारहवें वर्षमें वे रजस्वला हुईं ॥५३॥५४॥ यह समाचार सुनकर राजा जनक अपनी स्त्रियों तथा मन्त्रियोंके साथ अयोध्या गये। राज दशरथने भी उनका अगवानी की ॥५५॥ अयोध्यापति तथा मिथिलाधिपति दोनों परस्पर जी भरकर गले मिले। सदनन्तर नृत्य वाद्य आदि उत्सवपूर्वक सुखस अयोध्यामें प्रविष्ट हुए ॥५६॥ पश्चात् विविध मण्डपों, तोरणों, केलके स्तम्भों, पुष्पोंकी मालाओं, ईखके दण्डों, चामरों, चार दरवाजेवाले मण्डपों, घण्टा-घड़ियालके शब्दों, छोटी-छोटी घंटियोंके समुदायके शब्दों, शीशी, चंदोवों तथा दीपपंक्तियों द्वारा
सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ४९
वसिष्ठो मुनिभिः सार्द्धं गर्भाधानविधिं शुभम् ।
कारयामास रामेण सीतयाश्चातिहर्षितः ॥५९॥
ततो वस्त्रालङ्कारैर्जनको नृपतिं मुदा ।
पूजयामास सब्रातं स्नुषापुत्रसमन्वितम् ॥६०॥
मासमेकमतिक्रम्य ययौ स्वंनगरं सुखम् ।
रामोऽपि सीतया सार्द्धं नानाभोगान्मुहुन्मुदान् ॥६१॥
बुभुजे हेमरत्नौघनिर्मितेषु गृहेषु सः ।
कस्तूरीकुङ्कुमालिप्तो रामयोर्जनितः सुखम् ॥६२॥
एवं तासां नृपसुतपत्नीनां च पृथक् पृथक् ।
यथाकाले विधानेषु गर्भाधानादिकेषु च ॥६३॥
आगत्य जनकश्चक्रे नानारत्नांशुकादिभिः ।
अयोध्यानगरीयं वै वाद्यघोषो गृहे गृहे ॥६४॥
मङ्गलानि च सर्वत्र न कुत्राप्यप्यमङ्गलम् ।
न दरिद्रो क्षुधा नार्त्तो नाऽऽधिव्याधिप्रपीडितः ६५।
गवादिभिश्चतुर्भिर्येपृथग्भिन्नदशारथम् ।
पृथग्गेहेषु भार्याभिर्गार्हस्थ्यमध्वनुष्ठितम् ॥६६।
रामः प्रातः समुत्थाय कृतशौचादिक्रियः ।
आरुह्य शिबिकां दिव्यां स्नानार्थं सरयू नदीम् ॥६७॥
गत्वा कूले वाहनादि विसृज्य रघुनन्दनः ।
गरुडस्याग्रतः पावनार्थं सरय्वाः पुलिनं मुदा । ६८।
सविधिर्विहितो गत्वा नत्वा तां सरयूनदीम् ।
स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा ब्राह्मणैः परिवारितः । ६९॥
दत्त्वा दानान्यनेकानि गोधून्याम्बरादिभिः ।
संपूज्य सरयू पुण्यां ब्राह्मणान् पूज्य सादरम् । ७०॥
ययौ रथे समारूह्य शुक्लवस्त्रनयोधितम् ।
हयैर्मनोजवाऽश्वैश्च सर्वतः परिवेष्टितम् ॥७१॥
पट्टकूलादिवसनैर्वरंगच्छंश्चादितं शुभम् ।
राजितारं भार्गवता सुखात्नेन प्रबोदितम् ॥७२॥
किङ्किणीजालसम्भिन्नैर्घण्टाभिर्निनादितम् ।
रुक्मदण्डधरैर्दृप्तैरग्रे दर्शितसम्पथम् ॥७३॥
पथि पौरजनैः सर्वैरर्चितः पुष्पवृष्टिभिः ।
प्राप स्वाय गृहं रामः सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥७४॥
अवतीर्य रथाद्रामः पादयोर्धृत्य पादुके
ददर्श सीतामदनपादाभ्यामाचमनां गृहम् ॥७५॥
गत्वाऽग्निहोत्रशालायां सीतयाऽऽसनमास्थितः ।
वाग्दौत्रादार्श्विना वह्निं हुत्वा ततः परम् । ७६॥
महान् उत्सवके साथ गुरु वसिष्ठने मुनियोंको साथ लेकर प्रसन्नचित्त सीतासहित रामका शुभ गर्भाधान-संस्कार किया । ५९-६० ।। तदनन्तर राजा जनकने स्त्रियों युक्त तथा पुत्रवधुओं सहित राजा दशरथको वस्त्र-अलङ्कार आदिसे प्रसन्नतापूर्वक पूजा क० ।। ६० ।। इस प्रकार एक मास अयोध्यामें रहकर आनन्दसे वे अपने नगरको लौट गये । राम भी सीताके साथ सुवर्ण-रत्नों आदिसे निर्मित भवनोंमें अनेक प्रकारके भोगोंको भोगते तथा उस समय रामके वदनपर सुगन्धित केशर लगा हुआ था ॥ ६१ ॥ ६२ ।। इसी प्रकार प्रत्येक राजपुत्रका व्याह गर्भाधानादिकालीन आनन्द राजा जनकने विशेष उत्सव किये और अयोध्या नगरीमे घर-घर बाजे बजे । ६३ । ६४ । सारी अयोध्या मङ्गलमयी हो गयी। कहीं भी अमङ्गलका नाम न था। उस समयमें कोई दरिद्र, ऋणी, मानसिक तथा शारीरिक दुःखसे पीडित नहीं था ।। ६५ । पश्चात् राम आदि चारों भाई अपना-अपना गिरोह हाय अलग-अलग महलोंमें गृहस्थधर्मका पालन करने लगे ।। ६६। राम प्रतिदिन प्रातः उठते तथा शौचादि कृत्यसे निवृत्त हो दिव्य पालकीपर सवार होकर स्नान करनेके लिये सरयू नदीपर जाते थे। सवारी आदिको किनारे छोड़ आनन्दसे सरयूको पवित्र करनेके लिये बालूकापर होत हुए वहीं जाते थे । ६७ ॥ ६८ ।। विधि पूर्वक सहित होकर वे सरयू नदीको नमस्कार करके स्नान तथा नित्यकर्म करते और ब्राह्मणोंका गौ भूमि, धान्य तथा सुवर्ण आदिका दान देकर पवित्र सरयू और ब्राह्मणोंकी सादर पूजा करते थे । ६९ . ७० ।। तदनन्तर सोनेके वचनोंसे बँधे हुए सुवर्णके कलगी जडितोंसे युक्त रेशम तथा मखमलके मुख्य वस्त्र द्वारा चारों ओरसे आच्छादित एवं वायुके वेगसे प्रेरित अति शोभन रथपर सवार होकर लौटते थे ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ घुंघुरूंकी आवाजों तथा घण्टियोंके शब्दसे मण्डित उस रथके आगे सोनेकी छडियोंवाले छडीदार दौड़कर मार्ग दिखलाते चलते थे । ७३ ॥ रास्तेमें शिष्यों द्वारा पूजित तथा पुष्पवृष्टिसे आच्छादित राम करोड़ों सूर्यके समान प्रभावसम्पन्न अपने गृहमें पधारते ७४ जहाँ रथसे उतरकर चरणपादुका हाथ में पहिनकर चरण धरते। यहाँ सीताजी सदा उन्हें पवित्र तथा हाथ मुँह धोनेका जल देती थी । ७५ । पश्चात् सीता समेत राम अग्निहोत्रशालामें जा तथा आसनपर बैठकर अग्निहोत्रकी विधिसे अग्निमें हवन
५० आनन्दरामायणे [ सर्ग ५
स्फटिकस्य च लिङ्गस्य कर्ममार्गं यथाविधि । लोकानां शिक्षणार्थाय कृत्वा पूजनकन्त्वभूत् ॥७७॥
जानक्या दत्तपक्कान्नैर्नैवेद्यादि समर्प्य च । ब्राह्मणान्पूज्य दारांश्चन्तोष्य दृष्ट्वा तदाशिषः ॥७८॥
तुलसीं च गुरुं धेनुमश्वत्थं मुनिपादपम् । पूजयित्वा रविं देवं ब्रह्मयज्ञं विधाय च ॥७९॥
गुरोर्मुखाच्च पौराणीं कथां श्रुत्वा तु सीतया । गुरुं पुनः प्रपूज्याथ बन्धुभिः परिवेष्टितः ॥८०॥
प्रातराशं मृदुः पत्न्या ब्राह्मणैः परिवेषितः । नारिकेलकपित्थाम्रगुळभाण्डाम्लदधिभिः ॥८१॥
सजंब्रिक्षीपसंयवैः पक्वान्नैर्नूतनाशनैः । उपहारं मुखे कृत्वा ताम्बूलं परिगृह्य च ॥८२॥
दिव्यवस्त्राणि संगृह्य रङ्ग्याऽऽदर्शं निजं मुखम् । निरीक्ष्यैनाथ वैदेह्याऽऽरुह्य स्यन्दनमुत्तमम् ॥८३॥
वेष्टिता मन्त्रिदूताद्यैस्तूर्यध्वनिनुरःसरम् । मातृगेहं ततो गत्वा ताः प्रणम्यावेति मनः ॥८४॥
मध्या प्रदक्षिणां कृत्वा गत्वा गजगृहं ततः । सिंहासनस्थं राजानं नत्वा स्थित्वा तदाज्ञया । ८५॥
योजयामासत्यानेकानि कृत्वा गङ्गां विसर्जितः । ययौ स्यन्दनमारुह्य नृपं नत्वा पुनः पुनः ॥८६ ।
तूर्यगीतनिनार्दैश्च नर्तनैर्वारयोषिताम् । ययौ स्वीयं गृहं रामः स्यन्दनादवरुह्य च ॥८७॥
भूमिजादत्तपादाद्याचमनाद्यामनादिकम् । गृहीत्वा तद्धडिम्बौघा कृतं चेष्टां न्यवेदयन् ॥८८॥
सर्वं वृत्तं कौतुकेन हास्यगीतादिमङ्गलैः । रमयित्वा भूमिकन्यां दिव्यवस्त्रादिभूषिताम् ॥८९॥
ततो मध्याह्नसमये सय्यां वाऽथ सखीवृतेः । स्नात्वा माध्याह्निकं कर्म सकलं रघुनन्दनः ॥९०॥
नित्यं यत्राकरोत्स्नानं सरयूनिर्मले जले । तदाख्याऽऽभूत्तत्तीर्थे रामतीर्थमिति स्फुटम् ॥९१॥
तद्विष्टस्यानं त्रिशुबने चैत्रमासि विशेषतः । माध्याह्निकं च सप्ताद्यं ब्राह्मणैर्मित्रादिभिः ॥९२॥
इष्टैः सुवर्णपात्रेषु षिवडान्ने घृतेषु च । परिष्कृतेषु जानक्या सीतया गनिलक्षणान् ॥९३॥
कनककणमञ्जीरकिङ्किणीनपुरैरपि । नटन्त्य भोजनं चक्रे राघवो हर्षपूरितः ॥९४॥
करशुद्धिं विधायोच्चै भुक्त्वा ताम्बूलमुत्तमम् । ततः द्यूतपदं गत्वा निद्रां कृत्वा तु सीतया ॥९५॥
करते थे ॥ ७६॥ स्फटिकका कर्म करना यथार्थ उपलब्ध कर ... ने इसलिये शिवलिङ्गका पूजन करना और सीताके दिये हुए पक्वान्नादिकोंका भोग लगाते थे । तदनन्तर ब्राह्मणोंको प्रसन्न करके उन्हें दान आदिके द्वारा सन्तुष्ट करके उनका अनेक आशीर्वाद लेते थे ॥७७-७८॥ तदनन्तर तुलसी, गुरु, गौ, पीपल, शमी तथा सूर्यदेवकी पूजा और ब्रह्मयज्ञका विधान करके मादिके साथ गुरुमुखसे पौराणिक कथा सुनते थे फिर गुरुकी पूजा करके पश्चात् परिजन, बान्धवोंसे युक्त तथा बन्धुओंके साथ भोजन करते थे, जिसमें नारियल, कपित्थ, जामुन, अनार, खजूर, मट्ठा, दाल, आंवले और विविध प्रकारके पक्वान्नमें खीरवर भोजन करते थे ॥ ७९-८२॥ तत्पश्चात् दिव्य वस्त्र धारण करके शीशेमें मुख देख वैदेहीके सहित उत्तम रथपर चढ़ मन्त्री, दूत और मन्त्रिगणके साथ में भेरी आदि वाद्योंके साथ माताके महलमें गये और भूमिपर गिरकर उन्हें प्रणाम करते थे ॥८३-८४॥ फिर दाहिने आकर प्रदक्षिणा कर के राजा दशरथके महलमें जाते और वहां सिंहासनपर बैठे हुए राजाको प्रणाम करके उनका आज्ञासे बैठ जाते थे ॥ ८५ ॥ तब तदनन्तर राजसम्बन्धी अनेक कार्योंको समाप्त करके राजा उनको लौटा देते थे। तब फिर राजाको प्रणाम करके और रथपर सवार हो जाते रास्ते में तथा नाचनेके छन्दोंको सुनते हुए चले जाते तब रथसे उतरकर अपने घरमें जाते और सीताके हाथों प्रदत्त जलसे पाद हाथ मुंह आदि धोकर जो कुछ कार्य कर आये थे, वह सब सीताको कह सुनाते ॥ ८६-८८ ॥ पश्चात् दिव्य वस्त्रांग भूषित सीताको सुन्दर हास्यगान आदिके द्वारा प्रसन्न करते थे ॥ ८९ ॥ इसके बाद राम दोपहरको सरयू या घर ही में स्नान करके मध्याह्न कृत्य करते थे ॥ ९०। जिस जगह वे नित्यप्रति स्नान करते थे, उस स्थानका नाम रामतीर्थ पड़ गया ॥ ९१ ॥ तीनों लोक में वह स्थान प्रसिद्ध हो गया। विशेष करके चैत्रमासमें उसका बड़ा माहात्म्य है। मध्याह्नकृत्य करनेके बाद ब्राह्मणों, पण्डितों तथा मित्रजनोंके साथ नियत आदर रखते हुए सुन्दर परिष्कृत सुवर्णपात्रोंमें अन्नशालिदाली तथा जिनके अङ्ग-प्रत्यङ्गमें कंकण, झांझर, नूपुर और करधनी आदि गहने बज रहे थे, ऐसी सीताके साथ रघुपति राम हर्षपूर्वक भोजन करते थे ॥ ९२-९४॥ पश्चात् हाथ धो