श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १७७
सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १७७
चामरं वीजयामास विजयः पार्श्वमस्थितः । अन्यस्तु बालव्यजनं वीजयामास पृष्ठतः ॥३८॥
कस्तूरैः क्षतसारैश्चैर्मुक्ताहारैस्तु शोभितम् । रत्नदण्डं सुविस्तीर्णं छत्रमन्यो दधार तम् ॥३९॥
हस्त्युद्वहं गजमारुह्य लक्ष्मणः शीघ्रमाययौ । सीताद्यास्ताः समाजग्मुः सौमित्रिगजपृष्ठतः ॥४०॥
पश्यन्त्यः कौतुकान्येव जलन्ध्रैः समंततः । पुष्पकं चापि गगनमार्गेणैव शनैः शनैः ॥४१॥
अमात्य संस्थितास्तत्र पुरनार्यो रघूत्तमम् । पश्यन्त्योऽथ कौतुकानि दवदुः पुष्पवृष्टिभिः ॥४२॥
ततस्ते तुरगारूढा गजारूढा रथे स्थिताः । नेमिरेस्योपमाः सर्वे स्थितान्ते रामपार्श्वयोः ॥४३॥
बाहुः प्रणामान् श्रीरामं संस्थिता हारवत्तवत् । रामोऽपि कंडहस्ताभ्यां प्रणामानन्ववन्दयत् ॥४४॥
एवं गच्छति राजेन्द्रे राघवेन्द्रे शनैः पथि । गजोपरि सर्वाणास्ते नटा गाने प्रचक्रिरे ॥४५॥
एवं पश्यन् स रामोऽपि पुष्पागमदिकौतुकम् । दृष्ट्व चित्राणि वेश्यानां नृत्यानि विविधानि च॥४६॥
सुस्वराण्यथ वाद्यानि शृण्वन् मार्गे शनैः शनैः । वेष्टितश्चतुरंगिण्या सेनया स समंततः ॥४७॥
प्राप सेनानिवासाय कल्पितां शयनूत्तमाम् । अयोध्यामिव तां दृष्ट्वाऽवतरद्राघवो गजात् ॥४८॥
अभिनंद्य प्रणामंश्च पुनर्वारकृतान् मुहुः । लक्ष्मणस्य करं धृत्वा स्वकक्षां समापविः ॥४९॥
स्त्यनेहं संप्रविश्य तस्यां सिंहासनने पुनः । सीताह्यास्ताः स्त्रियः सर्वा विविशुश्चस्वगणानि ।५०।।
ततः श्रीरामचन्द्रोऽपि लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । सांतायाः क्रोशमात्रेऽथ ह्यनृतान् पृथक्पृथक् ॥५१॥
एकैकस्यां दिशि त्वं मे वचनात्स्थापयस्व भोः । योजनोपरि सौमित्रि त्वंहादेतु समंततः ।५२।।
नियोजयस्व शतशो वाजिवाहान् समाज्ञया । तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपि तथा सर्वं चकार सः ॥५३॥
स्तो विप्रैः सुहृद्भिश्च विविधाम्नर्मनोरथैः । घृतेन श्राद्धदानेन भोजनं राघवो व्यधात् ॥५४॥
और खड़ा होकर विजय रत्नजड़ित दण्डवाला तथा मयूरपंखसे निर्मित चमर लेकर रामके आगे स्थान ... पीछेकी ओर दूसरा जयनामक सेवक पखा करने लगा ॥ ३८ ॥ तीसरा सेवक मरुजंकक्षसे सुलिखित, हजारों मुक्तागम्जाओंसे मण्डित तथा रत्नजड़ित डण्डेवाला सुविशाल छत्र तानकर खड़ा हो गया ॥ ३९ ॥ उनके पीछे हाथीपर सवार होकर लक्ष्मण शीघ्रतासे चल दिये। लक्ष्मणके हाथीके पीछे सीता आदि स्त्रियें जालिदोंमेंसे सारी ओरके दृश्योंको देखती हुई चलीं। पुष्पकविमान भी धीरे-धीरे आकाशमार्गमे उड़ता हुआ चला ॥ ४० ॥ ४१ ॥ उसपर बैठी नगरनिवासिनी स्त्रियें कौतुक देखती हुई रामचन्द्रजीके ऊपर आनन्दसे पुष्पवृष्टि करने लगी ॥ ४२ ॥ तदनन्तर घुड़सवार, गजसवार और रथसवार सैनिक रामके दोनो ओर पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो गये ॥ ४३ ॥ हारकी तरह कतारबद्ध खरे उन सैनिकोंने रामको प्रणाम किया। रामने भी अपने करकमलोंसे उनके प्रणामोंको स्वीकार किया । ४४ ॥ जब इस प्रकार श्रीराम राजेन्द्रपर सवार होकर धीरे धीरे चले, तब दूसरे गजोंपर बैठे हुए गायकगण अपनी-अपनी वीणा लेकर मधुर गान करने लगे ॥ ४५ ॥ रामचन्द्रजी रास्तेमें फुल्लाके महावन बागोंका दृश्य, अनेक तरहके बाजारोंका अवलोकन करते, वेश्याओंके विविध नृत्योंके देखने, मनको हरण करनेवाले बाजोंको सुनते, सम्बन्ध्य कौतुकोंको निहारते तथा चारों ओर चतुरङ्गिणी सेनासे घिरे हुए धीरे धीरे सेनानिवासके लिए कल्पित उत्तम शिविरमें आ पहुँचा। उस स्थानको दूसरी अयोध्याके समान सुरक्षित देखकर राम हाथीसे उतर पड़े। ४६-४८॥ उस समय स्त्री संनिवाके द्वारा बारम्बार किये हुए प्रणामोंको स्वीकार करके अपने हाथमे लक्ष्मणका हाथ पकड़कर रमापति राम तम्बूमें गये और वहाँ सिंहासनपर विराजमान हो गये। सीता आदि स्त्रियें भी अपनी-अपनी सवारियोसे उतरकर तम्बुओंमें जा विराजीं ॥ ४९ ॥ ५० ॥ पश्चात् श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा कि तुम मेरे आज्ञानुसार सीमाकी सब दिशाओंमें एक-एक कोसकी दूरीपर सैकड़ों सिपाही अलग अलग खड़े कर दो और बाकी दिशाओमे एक-एक योजनकी दूरीपर सैकड़ों घुड़सवार नियुक्त कर दो। "जो आज्ञा" कहकर लक्ष्मणने सब वैसा ही प्रबन्ध कर दिया ॥ ५१-५३ ॥ पश्चात् ब्राह्मणों
१७८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
ताम्बूलं दक्षिणां दत्त्वा नानाविधंन्नृप आदरात् । मुखशुद्धिं स्वयं कृत्वा तस्थौ सिंहासने पुनः ॥५४॥
श्रुत्वा शास्त्रपुराणानि वेदान्तांश्चापि सादरम् । सायंसन्ध्यादिकं कृत्वा कृत्वा होमं यथाविधि ॥५५॥
सिंहासने समासीनो वेश्यानां नृत्यमुत्तमम् । पश्यन् शृण्वन् गायनं च नीत्वा यामद्वयं निशाम् ५७
ततः सुष्वाप पर्यङ्के सीतया सह राघवः । द्वितीय दिवसे तत्र स्थित्वा रमान्नु कौतुकैः ॥५८॥
नीत्वा समग्रं सुदिनं तृतीये दिवसे पुनः । पूर्ववद्ब्राह्मणोयाद्यैः शनैः स्थानान्तरं ययौ । ५९॥
क्वचिद्दिनमतिक्रम्य क्वचिद्द्वे त्रीणि राघवः । स्थित्वा पश्यन्कौतुकानि प्रीणन् जनकात्मजाम्६०॥
शनैः शनैर्ययौ मार्गं मासेनैकेन राघवः । प्राप जीर्णं मुद्रलेन त्यक्तमाश्रममुत्तमम् । ६१।
राममागतमाज्ञाय मुद्गलो नूतनाश्रमात् । भागीरथ्या दक्षिणतः प्राप रामांतिकं तदा । ६२.।
तं दृष्ट्वा राघवश्चापि नत्वा सम्पूज्य सादरम् । रामोगेहे समारोप्य पप्रच्छ विनयान्मुनिम् । ६३॥
त्वयाऽयमाश्रमस्त्यक्तः किमर्थं मुनिसत्तम । तत्त्वं वद महाभाग यथावच्च मयिस्तरम् ॥६४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा मुद्गलो वाक्यमब्रवीत् । अद्य धन्योऽस्म्यहं राम निवृत्तं वनवासतः । ६५।
यत्त्वां पश्यामि नेत्राभ्यां चिरकालेन राघव । भरतप्राणरक्षार्थं यदा नीता मदाश्रमात् ॥६६॥
दिव्यौषध्यस्तदा जातं पूर्वं ते दर्शनं मम । मयाऽयमाश्रमन्त्यक्तः किमर्थं तद्व्रवीमि ते ॥६७॥
सान्निध्य नात्र गङ्गायाः सरय्वा अपि नात्र वै । इति मत्वा मया त्यक्तश्चाश्रमोऽयं महत्तमः ॥६८॥
अत्र सिद्धिं गताः पूर्वे शतशोऽथ सहस्रशः । मुनीश्वरा मयाप्यत्र तपस्तप्तं कियदिमम् ॥६९॥
इति राम मयाख्यातमाश्रमस्य च मोचने । कारणं च त्वया पृष्टं किमग्रे श्रोतुमिच्छसि । ७०॥
तथा मित्रोंके साथ बैठकर रामने घृतमिश्रित नाना प्रकारक स्वादिष्ट पकवानोंका भोजन किया । ५४॥
आदरस ब्राह्मणोंको ताम्बूल तथा अनेक प्रकारकी दक्षिणार देकर रामने मुखशुद्धिक लिए ताम्बूल खाया
और पुनः सिंहासनपर आ विराज । ५५॥ तदनन्तर वेदान्त आदि सत् शास्त्रों तथा पुराणोंकी कथाको
प्रेम और श्रद्धासे शान्तिपूर्वक सुना । सायंकाल होनेपर पुन यथाविधि संध्यावंदन तथा हवन
आदिस निवृत्त होकर सिंहासनपर आ सुशोभित हुए । वहां रात्रिके दो पहर तक वेश्याओंका नृत्य-गान
देखत सुनते रहे ॥ ५६ ॥ ५७॥ तदनन्तर राम सीताके साथ पलंगपर शयन करनेको चले गये दूसरा
भी सारा दिन रामने आनन्दसे वही रहकर विताया तीसरे दिन मानन्द ब्राह्मणोंके साथ धीरेधीरे
दूसरे पडावकी ओर बड़े ॥ ५८ । ५९ ॥ इसी प्रकार कहीं एक दिन, कहीं दो और कहीं तीन दिन तक निवास
करत हुए गम जानकी को प्रसन्न करने तथा विविध कौतुकोंको देखते रहे ॥ ६० । इस प्रकार एक मास
चीत जानेपर वे मुद्गल ऋषिके छोड़ हुए एक पुराने तथा पवित्र आश्रमम जा पहुँचे ॥ ६१ ॥ रामको अपने
पुराने आश्रमपर आये सुनकर मुद्गलऋषि भागीरथीके दक्षिण तटपर स्थित अपने नवीन आश्रमसे दर्शन
करनेके लिए उनके पास आये ॥ ६२ ॥ राघवने उन्हें देखकर नमस्कार किया और उनकी विधिवत् पूजा की।
पश्चात् ताम्बूल देकर आदरपूर्वक आसनपर बैठाया और उनसे नम्रतापूर्वक कहा- । ६३॥ हे मुनिश्रेष्ठ !
आपने इस आश्रमको क्यों छोड़ दिया ? हे महाभाग इसका कारण विस्तारसे आप हम कह सुन इयं
। ६४॥ यह सुनकर मुद्गल्मुनि कहने लगे- हे राम ! मेरा धन्य भाग्य है कि जो मैं आज बहुत दिनां बाद
वनवाससे लौट हुए आपको अपनी आंखों देख रहा हूँ । पूर्वकालमें भरतके प्राणोंकी रक्षा करनेके लिए जब
आप मेरे आश्रमम दिव्य औषधि ले गये थे, तब मुझे आपका दर्शन मिला था । अब मैने इस आश्रमको
क्यों छोड़ दिया, इसका कारण आपसे कहता हूँ । ६५-६७॥ हे प्रभो ! मैनें इस विशाल आश्रमका केवल
इसलिए छोड़ दिया है कि यहाँपर गंगा अथवा सरयू इन दोनों पवित्र नदियोंमेसे कोई भी नदी नहीं
है ॥ ६८॥ इस आश्रमम निवास करके हजारों मुनीश्वरोंने सिद्धि प्राप्त की है और मैंने भी कुछ दिनों
तक यहाँ रहकर तपस्या की है । परन्तु क्या करें, किसी तीर्थके न होनेसे इस स्थानपर बड़ा
कष्ट है ॥ ६९॥ हे राम ! यह तो मैंने आपके पूछनेके अनुसार इस आश्रमको छोड़नेका कारण कह
सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १०९
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा पुनस्तं प्राह राघवः । किं कृत्वा मेऽत्र वसतिर्भविष्यति मुने वद ॥७१॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा राघवं प्राह मुद्गलः यद्यत्र सरयूगङ्गाः संगमो हि भविष्यति ॥७२॥
जाह्नव्या सदृशं चात्रं वन्द्ये राम यथार्जुनम् तत्तस्य वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह तं पुनः ॥७३॥
किमर्थं सरयूः श्रेष्ठा कुतः प्राप्ता धरातलम् तन्मे वद महाभाग सविस्तारं मयाग्रतः ॥७४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा मुद्गलो वाक्यमब्रवीत् । तवैव चरितं राम सन्मुखाच्छ्रोतुमिच्छसि ॥७५॥
तर्हि ते संप्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व रघूत्तम । शङ्खासुरो महादैत्यो वेदान् पूर्वं जहार हि ॥७६॥
क्षिप्त्वा तांश्च समुद्रे हि स्वयमासीन्महोदधौ । तदर्थं च त्वया मात्स्यं वपुर्धृत्वा महत्प्रभु ॥७७॥
हतः शंखासुरो वेदास्त्वया दत्तास्तु वेधसे । ततो हर्षेण महता पूर्वरूपं त्वया धृतम् ॥७८॥
तदा हर्षेण नेत्रात्ते पतिताश्चाश्रुबिन्दवः । हिमालये ततो जाता नदी पुण्या शुभोदका ॥७९॥
साक्षान्नारायणस्येवेह आनन्दाश्रुसमुद्भवा । उर्वी तैर्विन्दुसारः प्राप्तं तस्माच्च मानसं ययौ ॥८०॥
एतस्मिन्नन्तरे राम पूर्वजन्मे महत्तमः । वैवस्वतो मनुर्यष्टुमुद्युक्तो गुरुमब्रवीत् ॥८१॥
अनादिमिद्धाऽयोध्धेयं विशेषेणापि वै मया रचिता निजवासार्थमत्र यज्ञं करोम्यहम् ॥८२॥
यदि ते रोचते चित्ते तच्छ्रुत्वा गुरुरब्रवीत् अत्र तीर्थं वरं नास्ति नास्ति श्रेष्ठा महानदी ॥८३॥
यद्यत्रेवास्ति ते रुच्यं यष्टुं नृपतिसत्तम । आनयस्व नदीं रम्यां मानसात्पातकापहाम् ॥८४॥
तद्गुरोर्वचनाद्राजा मनुर्वैवस्वतो महान् । टणकृत्य महच्चापं सन्दधे शरमुत्तमम् ॥८५॥
स शरो मानसं भित्त्वा तस्मान्निष्काश्य तां नदीम् । अयोध्याम्यानयामास पन्थानं दर्शयन्निव ॥८६॥
शरमार्गानुसारेणायोध्यायां प्राप वै नदी महोदधौ पूर्वदेशे मिलिता रघुनन्दन ॥८७॥
भूताया। आगे क्या करना है, सो कहिये ॥ ७० ॥ मुनिके इस वाक्यको सुनकर रामने कहा— हे मुने अब यह बताइये कि क्या करनेसे आप फिर इस आश्रममें निवास कर सकते हैं? ॥ ७१ ॥ रामके प्रेमपूर्ण वचनको सुनकर मुद्गल ऋषि बोले— यदि यहाँपर सरयू और गंगाका संगम हो जाय तो मैं बड़े सुखसे रह सकता हूँ। इस बातको सुनकर रामने पुनः उनसे प्रश्न किया— ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ हे महाभाग ! सरयू नदीका इतना श्रेष्ठ माहात्म्य क्यों है और वह कहाँसे धरातलपर आयी है ? इन बातोंका विस्तारसे वर्णन करिए ॥ ७४ ॥ मुद्गलने कहा हे प्रभो ! आप अपना ही चरित्र यदि मेरे मुखसे सुनना चाहते हैं ॥ ७५ ॥ तो हे रघूत्तम ! मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिए पवित्र कथा शंखासुर नामका एक बड़ा भारी राक्षस हुआ था। वह सब वेदोंको हर ले गया ॥ ७६ ॥ उसने समुद्रमें जाकर समुद्रमं डुबो दिया तथा स्वयं भी उसी महासागरमे छिप गया उसको मारनेके लिए आपने बड़े भारी मत्स्यका रूप धारण किया ॥ ७७ ॥ और उसको मारकर वेदोंकी रक्षा की। वेदोंको लाकर आपने ब्रह्माको दिया और प्रसन्नतापूर्वक पुन अपना पूर्वरूप धारण कर लिया ॥ ७८ ॥ उस समय आपके नेत्रोंसे आनन्दाश्रुकी बूंदे टपक पड़ीं। हिमालयपर गिरी हुई आप नारायणके उन हर्षाश्रुकी बूंदोंने एक पवित्र तथा निर्मल जलवाला नदीका रूप धारण कर लिया। आगे चलकर वे कासार और कासारसे मानसरोवरके रूपमें परिणत हो गयी ॥ ७९ ॥ ८० ॥ हे राम ! उसी समय आपके पूर्वज महात्मा वैवस्वत मनुने यज्ञ करनेकी इच्छा करके अपने गुरुसे कहा— ॥ ८१ ॥ इस अयोध्यापुरीके अनादिकालसे स्थित रहनेपर भी मैंने अपने निवासके लिए इसकी कुछ विशेषतापूर्वक रचना करवायी है। इस कारण यदि आप कहें तो मैं इस नगरीमे यज्ञ करूँ। तब गुरुने कहा कि रुशिए, न तो यहाँ कोई पवित्र तीर्थ है और न कोई बड़ी नदी ही है ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ इसलिये यदि आपकी यहीं यज्ञ करनेकी इच्छा हो तो हे नृपतियोंमें श्रेष्ठ नृप ! मानसरोवरसे सुन्दर तथा पापोंको नष्ट करनेवाली एक नदीको यहाँ ले आइए ॥ ८४ ॥ गुरुके इस वचनको सुनकर महान् राजा वैवस्वत मनुने अपने विशाल धनुषका बड़ा तथा टंकोर करके बाण चलाया ॥ ८५ ॥ वह बाण मानसरोवरको भेदकर उसमेंसे निकली नदीके आगे-आगे चलकर रास्ता दिखाते हुए अयोध्या ले आया। बाणके मार्गका अनुसरण करती हुई वह नदी अयोध्या आयी तथा वहाँसे आगे जाकर पूर्वी महा-
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आनीता सा शरैरेव सरयूरिति कथ्यते । सरोवरात्समुद्भूता सरयूरिति केचन ॥८८॥
ततो भगीरथेनेयं कपिलक्रोधवह्निना । विनिर्दग्धान् पूर्वजान् वै सागरात् प्रेषितुं दिवम् ॥८९॥
भागीरथी समानीता त्वत्पादाब्जसमुद्भवा । तपसा शङ्करं तोष्य सरय्वा मिलिताऽथ सा ॥९०॥
वरदानाच्छंभोर्गङ्गा ख्यातिं गमिष्यति । अग्रे सागरपर्यन्तमेनां गङ्गां वदन्ति हि ॥९१॥
तव पादसमुद्भूता या विश्वं पाति जाह्नवी । इयं तु नेत्रसंभूता किमत्राग्रे वदाम्यहम् ॥९२॥
कोटिवर्षसहस्रैश्च कोटिवर्षशतैरपि । महिमा सरयूनद्याः कोऽपि वक्तुं न वै क्षमः ॥९३॥
इति राम समाख्यातं यथा पृष्टं त्वया मम । मुनेस्तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः ॥९४॥
सरयूमानयस्वात्र शरं मुक्त्वा ममाज्ञया । तथेति रामवचनाद्गत्वा चापं स लक्ष्मणः ॥९५॥
शरं मुक्त्वा तटं भित्त्वा सरयूमानयन्क्षणात् । सरयू सा द्विधा भूत्वा मुद्गलाश्रममाययौ ॥९६॥
जाह्नव्या मिलिता सावेक्षां दृष्ट्वा राघवोऽब्रवीत् । अत्र स्थित्वा लक्ष्मणेन दारितेयं महानदी ॥९७॥
अतो ददरीति नाम्नाऽत्र नगरी ख्यातिमेष्यति । ददरीयं जगतीमध्ये बदर्याश्च यथाधिका । ९८॥
भविष्यति न संदेहस्त्वत्र रामाग्निसेवनात् । ततः सीतां समाहूय राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥९९॥
मुद्गल्याश्रम एवैषा नीता सरयूनदी । पश्य सौमित्रिणा मुक्त्वा शरं मन्नामचिह्नितम् ॥ १००॥
नारीभिर्मातृभिः सार्धं पुण्यकेनाभिभाष्यता । दृष्ट्वा मां सरयुर्यत्र संगताऽस्ति महानदी ॥१०१॥
जाह्नव्या संगमे स्वं दिगच्छस्व गुरुणा द्विजैः । पूरयित्वा सविस्तारं यथोक्तं वचनं पुरा ॥१०२॥
आगच्छस्व ततः शीघ्रमुत्र त्वं मम सन्निधौ । विशेषान्मुद्गलस्यापि सन्निधावथ वै पुनः ॥१०३॥
नवीनसरयूनद्या भागीरथ्यास्तु संगमे । पूजनं त्वं मया साकं कर्तुमर्हसि मैथिलि ॥१०४॥
सागरम मिल गयीं ॥८८॥८९॥ शरके द्वारा लायी आनम लोग उसको सरयू नदी कहने लगे । अथवा सरोवरसे निकलकर आनेके कारण उसका 'सरयू' नाम पडा, कुछ लागोंका ऐसा कथन है ॥ ८८ ॥ उसके बाद राजा भगीरथ कपिल मुनिका कोपामिसम अगाये गय अपन पूर्वज सगर पुत्रोंको स्वर्ग भेजनेकी इच्छासे आपके चरणारविन्दसे प्रादुर्भूत भागीरथी गङ्गाको ले आये । बादम शङ्करजीको तपसे प्रसन्न करके उस नदीको सरयूसे ला मिलाया । ८९ ॥९०। शङ्करभगवान्के वरदानस गंगाको बडी भारी प्रसिद्धि हुई तथा समुद्र तक उसको लोग गंगा कहन लगे ॥ ९१ ॥ हे प्रभो आपके चरणकमलोंसे निकली हुई गया समस्त विश्वको पवित्र करने लगी। वैसे ही आपके नेत्रजलसे उत्पन्न होकर यह सरयू भी लोगोंको पावन करने लगी । हे भगवन् ! अब मैं आगे क्या कहूँ ? ॥ ९२ ॥ करोड़ों वर्षोंमें भी इस सरयू नदीकी महिमाका वर्णन कोई नहीं कर सकता ॥ ९३ ॥ हे राम ! आपने जो पूछा था, सो मैंने कह सुनाया । मुनिके इस वाक्यको सुनकर रघुपति रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे कहा- ॥ ९४ ॥ तुम बाण छोड़ तथा सरयूके तटको भेदन करके उसे यहाँ ले आओ । लक्ष्मणने वैसा ही किया और वह सरयू दो भागोंमें विभक्त होकर क्षणभरमें मुद्गलऋषिके प्राचीन आश्रमम आ पहुंची ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ उसको अकेली ही नहीं, किन्तु जाह्नवीके समम सहित आयी हुई देखकर रामने कहा कि लक्ष्मण दारण (चीर) करके इस नदीको यहाँ ले आये हैं ॥ ९७॥ इसलिए इस जगहपर दरी नामकी प्रसिद्ध नगरी बसेगी । वह दरी नगरी पृथ्वीतलमें बदरीनाथ धामम भी जीधर बढ़कर पुनीत होगी ॥ ९८ ॥ इसमें संदेह नहीं है । विशेष करके आपके यहाँ निवास करनेसे इसकी और भी अधिक ख्याति होगी । पश्चात् रामने सीताको बुलाकर कहा-॥६९॥ सीते ! देखो, सुमित्रापुत्र लक्ष्मण मेरे नामसे चिह्नित बाण छोड़कर सरयू नदीको यहाँ मुद्गल मुनिके आश्रमम ले आये हैं ॥ १०० ॥ अब तुम हमारी माताओं, अन्य स्त्रियों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंके साथ स तथा इस पुण्यक विमानपर स्वार होकर जहाँ सरयू तथा गंगाका संगम है, वहाँ जाओ और अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार विधिवत् उनकी पूजा कर आओ ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ वहाँसे लौटकर शीघ्र ही मेर हवा इन मुद्गल मुनिके सम्मुख इस नवीन सरयू तथा भगवती भागीरथीके संगमका
सर्गः ५] यात्राकाण्डम् १८१
तथेति रामवचनमङ्गीकृत्य विदेहजा । पूजासंभारमादाय विवेश स्वान्तर्गृहम् ॥ १०६ ॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे सरयूशुद्धिकरणं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चमः सर्गः
(कुम्भोदरोपाख्यान)
श्रीरामदास उवाच
ततो गृहीत्वा सम्भारान् पूजार्थं जानकी जवात् । कौसल्यादिश्च श्वश्रूभिस्तु पुष्पकं चारुरोह सा ॥ १ ॥
क्षणेन शुद्धा सरयूर्यत्र सा गङ्गया शुभा । सङ्गताऽस्ति महाश्रेष्ठा तत्र प्राप विदेहजा ॥ २ ॥
पतिं विनाऽन्विन्ना नारी सीमामुल्लङ्घ्य न व्रजेत् । स दोषोऽत्र न विज्ञेयः सीतायाश्च विहायसा ॥ ३ ॥
उत्तीर्य सा विमानाग्र्यान्नमस्कृत्याऽथ सङ्गमम् । पुरोधसा चोदिता सा नारिकेलं सवायनम् ॥ ४ ॥
भागीरथ्यै समर्प्याथ स्नात्वा चैव यथाविधि । सङ्गमं पूजयामास चोपस्कारैर्यथाविधि ॥ ५ ॥
सुरामांसोपहारैश्च पक्वान्नैर्बलिभिस्तथा । पट्टकूलादिभिर्वस्त्रैर्मुक्तहारैः सचन्दनैः ॥ ६ ॥
दिव्यैराभरणैश्चित्रैर्वायनाद्यैः सविस्तरम् । ततः सुवासिनीः पूज्य पूजयित्वा त्वरुन्धतीम् ॥ ७ ॥
वसिष्ठं ब्राह्मणांश्चापि भोजयामास विस्तरैः । पट्टकूलादिभिर्वस्त्रैर्दिव्याभरणादिभिः ॥ ८ ॥
सुवासिनीर्ब्राह्मणांश्च तोषयामास मैथिली । स्वयं कृत्वोपहारं न राघवार्यमथोषिता ॥ ९ ॥
ययौ यानेन शीघ्रं सा राघवस्यान्तिकं मुदा । ततः श्रीरामचन्द्रोऽपि सीतया गुरुणा द्विजैः ॥ १० ॥
गङ्गयोः सङ्गमे चक्रे पूजनं स यथाविधि । यथा कृतं च वैदेह्या तस्माच्चापि शताधिकम् ॥ ११ ॥
ततः सहस्रशो विप्रान् भोजयामास सादरम् । दत्त्वा दानान्यनेकानि गोहस्तिरथवाजिनाम् ॥ १२ ॥
ततो भुक्त्वा स्वयं रामः सीतया बन्धुभिर्जनैः । सिंहासने समासीनो सौमित्रिमिदमब्रवीत् ॥ १३ ॥
मेरे साथ मिलकर पूजन करो । १०३ ।। १०४ ।। तब विदेहराजकी पुत्री सीता "जो आज्ञा" कहकर पूजाकी सामग्रियें लेनेको संभ्रम गयी ॥ १०५ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे आकाशांकायां शरयूद्धिकरणं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
श्रीरामदासजीने कहा—बादमें बालकी पूजाका सब सामान लेकर कौसल्या आदि सासुओ तथा अन्य बहुओंके साथ शीघ्रतासे पुष्पक विमानपर जा बैठीं ॥ १ ॥ क्षण भरमें विदेहराजकी पुत्री सीता उस पुराने सङ्गमपर जा पहुँचीं, जहाँपर कि सरयू पवित्र गङ्गा नदीस मिली हैं ॥ २ ॥ पत्नीको पतिके बिना आगेकी सीमा नहीं लांघनी चाहिये । यह दोष यहाँ सीताको नहीं लग सकता । क्योंकि सीताका गमन आकाशमार्गस हुआ था । ३ ॥ वहाँ पहुँचनेपर सीता विमानसे नीचे उतरीं और सङ्गमका नमस्कार किया । पश्चात् पुरोहितके कथनानुसार सीताने वायन (ऐपन) सहित नारियल भागीरथीको समर्पण करके उसमें विधिवत् स्नान किया। फिर सुरा मांस-पक्वान आदिका बलिसे दुपट्टा आदि सुन्दर वस्त्रोंसे, दिव्य आभूषणोंसे, मुक्ताके हारसे, चन्दनसे तथा डायन आदिकी पूजाके उपकरणोंसे विधिवत् तथा विस्तारपूर्वक सीताने संगमका पूजन किया । तदनन्तर पतिनुमन्ती सोहागिन स्त्रियोंको पूजा करके सीताने अरुन्धतीका पूजन किया ॥ ४-७ ॥ तब उनको तथा वसिष्ठ आदि सब ब्राह्मणोको भोजन कराके सुवासिनी स्त्रियोंको दुपट्टो, मोतियों हारों तथा दिव्य आभूषणोसे सीताने संतुष्ट किया । स्वयं निराहार रहकर सीताने रामक कल्याणार्थ उपवास किया ॥८॥९॥ तदनन्तर विमानपर स्वार होकर आनन्दसे शीघ्रतापूर्वक रघुनन्दन रामके पास आ गयीं। रामने भी सीताको, गुरु वसिष्ठको तथा विप्रोंको साथ लेकर सीताकी की हुई पूजासे सौगुने धूम-धाम तथा विधिसे गङ्गा-सरयूके सङ्गमको पूजा की ॥ १० ॥ ११ ॥ वहाँ उन्होने बड़े आदरसत्कारसे हजारों विप्रोंको भोजन कराया । अनेक गायें, हाथी, घोड़े तथा
१८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५
आनन्द्यो मम रामोऽत्र शर्वाणीव पृथूनथ । सीमाचारान् कुरुष्व त्वं शासनं यन्मयोच्यते ॥ १४॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः । यः कश्चिद्वा समायाति पथिकः स ममाज्ञया ॥१५॥
मया संपूजितो नैव गन्तु देयः समन्ततः । मयाऽदृष्टो गतः कश्चिन्दण्ड्यो वः शासनं मम ॥१६॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथा चक्रे स लक्ष्मणः । च्यवनो मुनिवर्यस्तु ज्ञात्वा रामं समागतम् ॥१७॥
दर्शनार्थं ययौ शीघ्रं रामेणापि प्रपूजितः । स्थिरमासन वश्येहे राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥१८॥
राम गर्जावपत्राक्ष गङ्गाया दक्षिणे तटे । आश्रम कीकटे देशे ममास्ति परमः शुभः ॥१९॥
कंदमूलफलार्थे हि विघ्नं कुर्वन्ति मागधाः । ममाश्रमे गजांस्तेभ्यो रक्षां विधीयताम् ॥२०॥
च्यवनस्य वचः श्रुत्वा टणत्कृत्य महद्धनुः । बाणं मुक्त्वाऽऽश्रमन्तस्य परितः परिखोपमाम्॥२१॥
चकार रेखां बाणेन दुर्लङ्घ्यां च दुरासदाम् । रामबाणकृता रेखा यत्र तत्र पुरी शुभा ॥२२॥
रामरेखेति नाम्नाऽऽसीत्तथा चैव महा नदी । च्यवनश्च ततो हृष्टो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥२३॥
निंद्यः स कीकटी देशो वर्तते रघुनंदन तव वाक्याद्भविष्यंति तत्र पुण्यस्थलानि हि । २४॥
नहि त्वयाऽद्य वक्तव्यं वचनं मे सुखप्रदम् । तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवं रामस्तमब्रवीत् ॥२५॥
कीकटेषु गया पुण्या नदी पुण्या तु पुनपुना । आश्रमस्ते महापुण्यः पुण्यं राजनन् पदम् ॥२६॥
भविष्यति न सन्देहो मम वाक्यान्मुनीश्वर । च्यवनस्तेन सन्तुष्टो राम दृष्ट्वाऽऽश्रमं ययौ । २७॥
तस्मिन्नन्तरे तस्य सत्रे रामेण निर्मिते । प्रत्यहं कोटिश्रो विप्रा भुञ्जन्ति यतिभिः सह ॥२८॥
कुम्भोदरो मुनिः प्राप्तःसीमाचारान्तिकं तदा । गङ्गायात्राप्रसंगेन गयां गन्तु समुद्यतः ॥२९॥
समागतः प्रयागाच्च दूतान्दृष्ट्वाऽब्रवीद्वचः । हे दूता उत्तरं देयं यूयं कस्याज्ञया स्थिताः ॥३०॥
रथ ऊंट दानमें दिये ॥ १३ । उनका भोजन कराकर बाद भाई-बन्धुओं तथा अन्यान्य लोगोंके साथ सीता तथा स्वयं रामने भी भोजन किया । तत्पश्चात् सिंहासनापर बैठकर उन्होंने लक्ष्मणसे कहा- ॥ १४ ॥ हे रघूत्तम ! मैं इस जगह दो दिन तक निवास करूंगा । इसलिए मेरे कहनेसे तुम सीमापर सब दूतांका आज्ञा दो कि कोई भी यात्री, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यासी बिना मेरी पूजा ग्रहण किये न जाने पाय । यदि कोई चला गया और मुझे ज्ञात हुआ तो मैं दूतोंको दण्ड दूँगा ॥ १५-१६ ॥ रामके वचन सुनकर लक्ष्मणने वैसी ही आज्ञा दे दी । उधर च्यवन मुनिने जब सुना कि यहाँ रामचन्द्र आए हुए हैं तो वे रामके दर्शनार्थ वहाँ आए । रामन उनकी पूजा की । पश्चात् तस्वमे सुन्दर आसनपर विराजमान होकर मुनिन रामसे कहा- ॥ १७ ॥ १८ ॥ हे कमलपत्रके समान नेत्रोंवाले राम ! मगध देशम गङ्गाके दक्षिणी तटपर मेरा एक परम रमणीक आश्रम है । १९ ॥ परन्तु मेरे उस आश्रमम मगध देशके दून फल-मूल आदि लेनेम बड़ा विघ्न डालते हैं । इसलिए आप उन विघ्नोंसे मेरी रक्षा करें । २० । च्यवनकी बात सुनकर रामने धनुषका टंकोर करके एक बाण छोड़ा। जिससे च्यवन आश्रमके चारो ओर खाईके समान गहरा लकीर खिंच गयी, जिसको लांघना उन दूतोंके लिए असंभव हो गया। जहाँ रामके बाणकी रेखा खिंची थी, वहाँपर "राम-रेखा" नामकी सुन्दर नगरी बसी और रामरेखा नामकी नदी भी प्रवर्तित हो गयी । इसके बाद च्यवनऋषि प्रसन्न होकर रामचन्द्रजीसे बोले-॥ २१-२३ । हे रघुनन्दन ! अभी कीकट देश निन्द्य माना जाता है । आपके कहनेसे यह भी पुण्यस्थान अवश्य बन जायगा। इसलिए आप मुझे सुख देनेवाला कोई वचन आज कहें । मुनिके इस वचनको सुनकर रामजीने महर्षि कहा -॥ २४ । २५ । हे मुनीश्वर ! मेरे कहनेसे कीकट देशमे गया, पुनपुना नदी, आपका आश्रम तथा राजनन् (गजागृह) पुण्यस्थल होंगे। इसम आप कुछ भी संदेह न मानें । श्रीभगवान्के इस कथनसे संतुष्ट होकर च्यवनऋषि रामजी से आज्ञा लेकर अपने आश्रमको चले गये ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसके बाद रामजीके द्वारा स्थापित अन्नसत्रमें प्रतिदिन करोड़ों ब्राह्मण और यति भोजन करने लगे । २८ ॥ ऐसा होनेपर एक दिन गङ्गायात्राके प्रसङ्गम कुम्भोदर नामके मुनि प्रयागसे रामजीकी भोजनशालाके लिए नियत की हुई सीमापर आये । वहाँ दूतोंको देखकर वे बोले-हे दूतो !