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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ६] भव्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४१७

सर्गः ६] भव्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४१७

भवेदिति सखीयुक्ता ददौ सर्वान्मुरेशतः। कदा पत्युर्न संत्रा न ययौ राघवं विना ॥१९॥
नैका तस्थौ क्वापि सीता स्वाम्यने दर्शनं जहौ। न मिष्टान्नं न ताम्बूलं न तैलं केशबंधनम् ॥२०॥
अंगीचकार श्रीगमविरहानलकर्शिता। सम्भाषणं न चान्येन गुरूणाञ्चाप्यनेकधा ॥२१॥
सास्रतोन्मुस्मितं वक्त्रं रोक्षणाञ्चाऽप्य ददर्श सा। अन्यार्थमोधितः पश्यन् बहुदुःखमवाप्नुयात् ॥२२।
पर्यंङ्के शयनं सीता नाकगेद्राघवं विना । मुहूर्तं न ददर्शान्यं मुखं विरहपीडिता ॥२३॥
न दधौ वसनं चित्रं न चित्रां कंचुकीं दधौ। न पत्यौ शयने सा दम्पत्याणभूमिषु ॥२४॥
न ययौ सरयं स्नातुं ययौ नोपवनं वनम् । ग्रामं न ययौ सीता न तथा पुष्पवाटिकाप् ॥२५॥
न सकार स्नतो दूरं माङ्गल्यानि विदेहजा । वस्तुभि द्विजवर्येभ्योऽतोषयामास जानकी ॥२६॥
नियमानाकरोन्नाना देवीनां च पृथक् पृथक् । निःशेषं व्रतसामर्थ्यं दध्यं नित्यं विदेहजा ॥२७॥
षट्कं वा पट्ट माल्यमर्पयामि हनूमते । षोडशापू वगणां च दास्यामि पुष्पान्वितान् ॥२८।
मिष्टान्नेनापि नैवेद्यं ते दास्यामि गणाधिप दुर्गे त्वां बलिदानं च करिष्यामि प्रसीद मे ॥२९॥
चण्डिके त्वां प्रदास्यामि रक्त जिह्वोद्भवं त्यहम् । सुद्रव्यञ्च समायुक्तं वलिदीपसमन्वितम् ॥३०॥
शीघ्रं रामो जयं प्राप्य शिशुभियांतु वै पुरम्। मंदवारे करिष्यामि वृत्तं सोपोषणन्वहम् ॥३१॥
नोपभोक्ष्यामि मधुरं नोपभोक्ष्याम्यहं घृतम् । यावन्नैकं करिष्यामि व्रतान्येवं मनिन्नृशन् । ३२॥
कृष्णपक्षे तृतीयायां चतुर्थ्यां वा महेश्वरि । किञ्चित्किञ्चिन्मामिष्यामि तिल्वाटं विजयाय वा ॥३३॥
गुडेनाहं तिलुन्मेष्ये यावच्छ्रीरामदर्शनम् । भविष्यति कृपार्थेऽथ लक्ष्मणार्येण बंधुभिः ॥३४॥
मन्दरे नवरात्रं च सखीभिश्च करोम्यहम् । एकस्मिन्नेव दिवसे नवभिः प्रचुरस्तनैः ॥३५॥

शकुन अच्छा उठ जाता तो बड़ा हर्ष होता था । वे समझती कि अब ही रामचन्द्रजीके दर्शन होंगे । इसी खुशीमें सखियों को वे मिठाई भी बाँटती थीं । जबसे राम परदेश गये, तबसे वे किसके घर नहीं गयीं ॥ १८ ॥ १९ ॥ कहींपे सीता कभी अकेली नहीं बैठतीं, अपने रूपपे घमण्ड नहीं ल्यातीं, मिठाई नहीं खाती, ताम्बूल नहीं चरबती और अपने केशोंका संस्कार नहीं कराती थी जबसे राम गये, तबसे उन्होंने किसी पुरुषके साथ सम्भाषण नहीं किया ॥ २० ॥ २१ ॥ क्या किसीने दुरवलोकन नहीं बोली, ऊपर मुँह उठाकर किसीकी ओर नहीं निहारा, कभी किसी पक्षने देखातो वह दया पाया और कभी भी उनकी आत्माको चैन नहीं मिली । २२ । राघव विरहसे पीड़ित सीताने कभी शय्यापर शयन नहीं किया और विरहसे दीन पड़ हुए अपने मुखारविन्दक भी न कोई देखा न उन्होंने कभी रङ्ग बिरङ्गे कपड़े पहने और न रङ्ग बिरङ्गी चाली ही धारण की । सबस वे कभी दम्पत्यारुक सोभटेपर नहीं पड़ी हुई ।। २३ ॥ २४ ॥ सरयू-स्नान करनेको नहीं गयीं और किसी वन या उपवनमें सैर करने नहीं गयी । किसी बगीचे तथा पुष्पवाटिकापे भी नहीं गयीं ॥ २५ ॥ उसम उन्होंने कोई माङ्गलिक कार्य नहीं किया । अनेक प्रकारकी वस्तुयें दे देकर उन्होंने ब्राह्मणिणयोंका प्रसन्न किया और कितने ही तरहके व्रत करके अनेक देवियोंकी सुप्रती कीं । इस तरह बहुतसे व्रतोंको करके व अपने उस समस्त व्रतोंको बिचारती रहीं ॥ २६ ॥ २७ ॥ सदा इस तरह मनौती मानती थीं— हे ईश्वर और पवन भी यदि रामचन्द्रजी विजयी होकर अपने भाइयों और सेना समेत शीघ्र अयोध्या वापस आये तो हे हनुमान ! मैं चंपा की माला बनवाकर आपको पहनाऊँगा । हे गणपती ! आपको पूरी और हलुवा भात तथा और अनेक प्रकारके पक्वान बनवाकर आपको समर्पण करूँगी । हे दुर्गे ! मेरे ऊपर प्रसन्न हंओ । यदि राम लौट आएँ तो आपके लिए बलिदान करूंगी । हे चण्डिके, ! मैं आपको विविध प्रकारके स्वादिष्ट अन्नो तथा बलिदीपके साथ अपनी जीभका रक्त चढ़ाऊँगी ! रविवारका व्रत करूंगी । एक महिने तक मिठाई और घृत न खाऊंगी । २८-३२ ॥ हे महेश्वरी ! कृष्णपक्षकी तृतीया तथा चतुर्थीको थोडे थोडे गुड़के साथ तिल खाऊंगी यह व्रत तब तक चलता रहेगा, जब तक मुझे लक्ष्मणादि भ्राताओके साथ श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन नहीं मिलेंगे ॥ ३३ ॥ हे चण्डिके ! यदि मुझे

११८आनन्दरामायणे[ सर्ग ६

रविवारे करिष्यामि रवेऽहं पूजनं तव। इत्थं दिने दिने सीता नियमनकरोत्तदा ॥३६॥
ब्राह्मणैरर्घ्यदानं च कारयामास जानकी। न सा सुष्वाप रात्रौ तु दिवा वा वरवर्णिनी ॥३७॥
एवं दिने दिने सीता श्रीरामविरहातुरा। न शमाप क्वापि देशे श्रीरामार्पितमानसा ॥३८॥
एवं ता ऊर्मिलाद्याश्च चण्डिकाद्यापि वै स्त्रियः। स्वस्वस्वामिवियोगाग्निज्वलिता व्याकुलाः क्षणम् ॥३९॥
न सुखं क्वापि वै प्रापुः स्वकान्तार्पितमानसाः। सर्वास्ता लुलुठुर्भूमौ मणिभूमौ सुधीरधः ॥४०॥
काचिन्तर्तयति क्रीडामयूरं न मुदा तदा। शुकं न पाठयन्त्यन्या पञ्जरस्थं कुतूहलात् ॥४१॥
लालयन्नकुलं नान्या नालापयति सारिकाम्। अपराजतीव मत्ता नैव खेलति सारसैः ॥४२॥
मेजिरे न विलासं ता रेमिरे नैव मंदिरे। सखीभिरुचिरे नार्तं वीणावाद्यं न शुश्रुतुः ॥४३॥
कल्पद्रुमप्रसूतं यद्भवत्सुधोपमम्। मद्यत्कुसुमामोदं न पपुर्मधुरं मधु ॥४४॥
योगिन्य इव ता शुद्धा नासाग्रन्यस्तलोचनाः। अलक्ष्यध्यानावधानाः स्वनाथार्पितमानसाः ॥४५॥
चन्द्रकांतमणिच्छन्ने स्रवद्वारिकणद्रवैः। क्षण शतायने स्थित्वा जलप्रवेक्षणं क्वचित् ॥४६॥
रचयति क्षणं शय्या दीर्घिका मोजिनीदलैः। वीज्यमानाः सखीभिस्ताः शीतलैः कदलीदलैः ॥४७॥
इत्थं युगसमां रात्रिं दिनं ता मेनिरे सदा। कथञ्चिद्धारणां कृत्वा विह्वलाः मन्मथाः स्थिताः॥४८॥
एतस्मिन्नन्तरे सीता नियमैश्च व्रतादिभिः। मपानीतावाञ्जनेयगरुडस्वीयतुः पुरीम् ४९।
प्रास्फुरच्च भुजो वामः सीताया नयनं तथा। सुचिह्नं मन्यमाना सा किञ्चित्तुष्टाऽभवत्तदा ॥५०॥
अथ तौ कंपनोद्भूतगरुडौ सद्मि स्थितम्। अयोध्यायां यूपकेतुं वृत्तं कथयतो जवात् ॥५१॥
तच्छ्रुत्वा यूपकेतुः स इष्टं मत्वा न्यवेदयत्। सा तु तुष्टमनाः सीता तस्मिन्नेव दिने शुभे ॥५२॥

शीघ्र मेरे प्रभुका दर्शन मिल जाय तो मै अपनी सहेलियाके साथ नवरात्रका व्रत करूँगी ॥ ३४॥ ३५॥ हे सूर्य भगवान् ! प्रत्येक रविवारको मै आपका विधिवत् पूजन करूँगी। इस प्रकार रामके वियागवान दिनोंम सीता प्रतिदिन अनेक प्रकारकी मनौती गन्डा करती थी ॥ ३६ ॥ वे ब्राह्मणोने अर्घ्यदान कराती रहती थी। रात-दिन कभी नहीं सोती थीं। इस तरह रामके वियोगसे दुखिनी सीता कहीं भी सुख नहीं पाती थी ॥ ३७॥ ३८॥ इसी तरह उर्मिला और चण्डिकादिक स्त्रियाँ भी अपन-अपने स्वामियाके वियोगरूपी अग्निसे दग्ध होकर व्याकुल रहतीं थीं । वे समस्त स्त्रियाँ अपने महलोकी मणियाकी भूमियोपर लोट-लोटकर दिन काटतीं थीं। उन्हे समाग्के किसी भी प्रदेशम आनन्द नही मिलना था ॥ ३६ ॥ ४० ॥ उनमेसे न कोई क्रीडामयूर नचाती, न पिंजरेमे बैठे हुए तूतको पढ़ाती, न पाले हुए नेवलको प्यार करती, न मैना पढ़ाती और न कोई स्त्री सारसोंके साथ खेलवाड ही करती थी ॥ ४१ । ४२ । उन्होंने किसी सुखका उपभोग नहीं किया। महलोंम उन्होने आनन्द नहीं लिया। वे न अपनी सहेलियोके साथ हंसी-दिल्लगी करती थी, न वीणा बजातीं और न सुनती थीं ॥ ४३ ॥ कल्पवृक्षके पुष्पस उत्पन्न कुसुमकी अमृतसरीखी सुगन्धिका भी उपयोग नहीं करतीं थीं । ४४॥ वे नारियां योगियीके समान अपनी दृष्टि नासाग्रभागम रोक्तर रात-दिन अपन अपन पतियोका ध्यान किया करतीं थी। उन्होंने अपना-अपना मन अपने-अपने पतियोंको अर्पण कर दिया था ॥ ४५ ॥ वे झरोखेमे लगे हुए चन्द्रकान्त मणिके समीप, जिसमें सदा रातके समय अलकी धारा बहा करती थी, वहाँ बैठकर कुछ देर वर्धाको निहारा करती थीं ॥ ४६॥ कभी कमलके दलकी शय्यापर सोंतीं और हथियास कनक पत्तोंका पखा झलवाती थी ॥ ४७॥ इस प्रकार एक-एक रात्रिको युगके समान मानकर बड़े सन्तापसे विह्वल होकर समय बिताती थीं। जब सीता इतनी कठिन यंत्रणा भाग रही थीं, उसी समय गरुड और हनुमान्जी वहाँ आ पहुंचे। सहसा सीताकी बायीं आंख तथा भुजा फडकने लगीं। इस शुभ शकुन मानकर वे अपन मनमे कुछ प्रसन्न हुई ॥ ४८-५० ॥ थोड़ी देर बाद गरुड और हनुमान्जी राजसभा मे बैठे हुए यूपकेतुके पास पहुंचे और उन्होंने रामका सन्देश सुनाया ॥ ५१ ॥ उसे सुनकर यूपकेतुने सीताको बतलाया और रामके आज्ञानुसार सीता उसी दिन कुछ ब्राह्मणो, पुरोहितों