सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २] राघवकाव्यम् (पूर्वार्द्धम्) १०१

सर्गः २] राघवकाव्यम् (पूर्वार्द्धम्) १०१

जीवनमुक्ता त्वत्कृपया मोक्षमाप सुविप्रता । तव कृष्णस्य ताः पत्नीभ्योऽन्येनापि हृतव्रजः ॥४४॥
जित्वाऽर्जुनं बलादेव हृताः पूर्वं सहस्रशः । स्त्रीभिश्च क्षिप्ता दत्तः कस्यचित्स्वं नारदात् ॥४५॥
सर्वासामपि कामपूर्त्यर्थं निशि निद्राविवर्जितः । बंधुभ्यां योषिका भुक्ता मातृतुल्यारयोधिकाः ॥४७॥

कृष्णोपासक उवाच

शत्रुना तव रामस्य वधुभीत्या न निद्रितः । बंधुपत्न्यर्पिता तारा सुग्रीवाय यथासुखम् ॥४८॥
वानरैश्च कृता मैत्री स्पार्शत दुन्दुभेः शवम् । निरर्थकं हतो वाली साहाय्यं वानरैः कृतम् ॥४९॥
वानरो यस्य वै यानं वृथा शाला विदारिता । सागरो रोधितो येन लङ्का सा ज्वालिता वरा ॥५०॥

रामोपासक उवाच

दारिद्र्य सुदाम्ना वै कृष्णेन पत्रिकी कृता । न शेषा वानरास्तेऽपि सर्वे देवांशरूपिणः ॥५१॥
कापट्येन हतो येन जरासंधो निरर्थकः । साहाय्यं सर्वदा यस्य कृतं गोपैर्ब्रजे वने ॥५२॥
गोपालस्य कृतं यानं क्रीडनं सर्वदा वने । ज्वलिता येन सा काशी सुहृत्कंशी विरूपितः ॥५३॥
शिवभक्तेन समरः कृतो बाणेन सादरम् । शिवेनापि कृतं युद्धं चैद्येन निन्दितो मुहुः ॥५४॥
परैः पौत्रो जितो यस्य येन कृष्णेन परम्पराम् । कृता विषमता चात्र पारिजातापणादिभिः ॥५५॥

कृष्णोपासक उवाच

तथापि श्वशुरपुत्रेण सुहृद्धदो रणे जितः । शिवभक्तदशास्येन रामेण समरः कृतः ॥५६॥
द्विजहत्या कृता येन मुनिना निन्दितोऽपि यः । तथा मित्रं जितो यस्य बंधुजेन विभीषणः ॥५७॥
परगेहस्थिता पत्नी पुनर्यैनाभिता सुखम् । वैदुष्यं च कृतं पत्न्यां स्वाङ्गा बाधा न पूरिता ॥५८॥


कहा—हमारे रामने अपनी छायामयी पत्नीको राक्षसके हाथसे छुड़ाया था। जिसकी तुम दासी कह रहे हो, वह दासी नहीं, बल्कि मुनियोंकी सेवामें रहकर शबरी थी ॥४४॥ रामचन्द्रजीकी कृपासे वह जीवन्मुक्त हो गयी और उसे मोक्ष मिल गया। किन्तु तुम्हारे कृष्णकी पत्नियोंको आज भी उनके शत्रुगण मांग रहे हैं ॥४५॥ कृष्णकी हजारों स्त्रियोंको अर्जुनसे डाकुओंने छीन ले गये थे। कृष्ण पूरे दुर्बल थे। उनकी एक स्त्रीने तो उन्हें दान दे दिया था और बादमें उसी सत्यभामाने नारदसे उन्हें खरीदा ॥४६॥ सब स्त्रियोंकी कामपूर्तिके लिए उन्हें रात रात भर जागना पड़ता था। दोनों भाइयोंने उन बड़ी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा की थी, जो माताके समान थीं ॥४७॥ कृष्णोपासकने कहा—तुम्हारे राम शत्रुओंके भयसे रात रात भर जागा करते थे। बड़े भाईकी स्त्री ताराको रामने बड़े हंसी-खुशीके साथ सुग्रीवको दे दी थी। वानरोंके साथ उन्होंने मैत्री की और दुन्दुभी नामक राक्षसके शवका स्पर्श किया। बालि बेचारेको बिना किसी अपराधके मार डाला। वानरोंने उनकी सहायता की ॥४८॥४९॥ वानर ही उनकी सवारीका काम देते थे। बिना किसी प्रयोजनके उन्होंने सात ताल वृक्षोंको काटकर गिरा दिया। सागरमें पुल बनाया और सोनेकी सुन्दर लङ्कापुरी जलवा दी ॥५०॥ रामोपासक बोले—तुम्हारे कृष्णने एक दरिद्र ब्राह्मण सुदामाके साथ मित्रता की थी। जिन्हें तुम वानर कह रहे हो, वे वानर नहीं, बल्कि वानरका शरीर धारण करके सब देवता रामकी सेवाको आये थे ॥५१॥ तुम्हारे कृष्णने कपट करके व्यर्थ जरासंधका वध करवाया था। वनमें सदा गोपगण उनकी सहायता करते रहते थे ॥५२॥ उन्होंने गोपोंको अपनी सवारी बनाया और सदा वनमें इधर-उधर खेलते रहे। उन्होंने काशी नगरीको जलवा डाला और अपने सगे माले रूक्मीको कुरूप कर दिया ॥५३॥ शिवभक्त बाणासुरके साथ उन्होंने युद्ध किया और स्वयं शिवको भी उनके साथ युद्ध करना पड़ा। शिशुपालने उनकी खूब निन्दा की ॥५४॥ शत्रुओंने उनके पौत्रको जीतकर अपने वशमें कर लिया और पारिजातादिको देते समय अपनी स्त्रियोंमें भी उन्होंने भेदभाव किया ॥५५॥ कृष्णोपासकने कहा—तुम्हारे रामके बेटेने भी तो अपने श्वशुर पुत्रको बाँध लिया और रामने शिवभक्त रावणके साथ युद्ध किया था ॥५६॥ उन्होंने ब्रह्महत्या तक कर डाली और मुनि अगस्त्यने उनकी अच्छी तरह निन्दा की। अपना काम बनानेके लिए रामने रावणके भाई विभीषणको फोड़कर मित्र

४०२आनन्दरामायणे[ सर्गः २

यानारूढा कृता पात्रा वेश्याः स्पृष्टास्तथा रहः । पतिव्रतायां सीतायां दोषारोपः कृतोऽपि च ॥५९॥
पुत्रं हंतुं कृता ज्ञाज्ञा शूद्रसिंह्यौ हतौ, पत्नीसक्ताऽऽश्रिता येन पश्यता पालिता नृपैः ॥६०॥
रामोपासक उवाच
अंते कृष्णस्य ते शापादंशच्छेदो ऽभूद्विज । अब्धिना लोपिता यस्य नगरी द्वारका शुभा ॥६१॥
स्वगोत्रस्य वधस्त्वंते मद्यपानादि यत्कुले । दर्शनं चार्ज्युनायान्ते येन मित्राय नार्पितम् ॥६२॥
स्वस्थानं गमनं येन कृतमेकाकिना तथा । स खतोऽपि कृतस्वान्ते व्याधेनाल्पेन पत्रिणा ॥६३॥
कृष्णोपासक उवाच
तव रामेण समरः पुत्रेणापि कृतो महान् । तथा सीता मया त्यक्ता चेति लोकं प्रतार्य च ॥६४॥
वाल्मीकेराश्रमं गत्वा दृष्टौ सीतासुतौ रहः पिण्याकेन तथेङ्गुद्या पिंडदानदिकं कृतम् ॥६५॥
दंडके तव रामेण स्वपित्रे अमताऽर्पितम् । तयैरावणमुक्तायाः स्पृष्टः स नभस्तः स्थले ॥६६॥
तथाऽश्वत्थच्छेदनाथं महान् यत्नः कृतो मुहुः । स्वमन्त्रिणश्च शेषायुःपूत्यर्थं सङ्गरोऽपि च ॥६७॥
कारितो यमराजेन पूर्वजेन लवादिभिः । पुष्पास्वादनमात्रादिपत्न्यः शिक्षा तथा कृता ॥६८॥
मम कृष्णेन बालत्वे लीलया पूतना हता । हतास्तृणासुराद्याश्च धृतोऽङ्गुल्या गिरिस्तथा ॥६९॥
रामोपासक उवाच
मम रामेण बालत्वे लीलया ताटिका हता । मारीचाद्या हताश्चारि पर्वतास्तारिता जले ॥७०॥
कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णस्वरूपेण गोपिका मोहिता व्रजे । मोहिता राधिका श्रेष्ठा मदनस्यापि मोहिनी ॥७१॥
रामोपासक उवाच
मम रामेण देवानां मोहिताः स्त्रीस्वरूपतः । देवपत्न्यो रहो रात्रौ मातृतुल्या विचिन्तिताः ॥७२॥


बनाया ॥ ५७॥ दूसरेके घरम रही हुई स्त्रीको लाकर घरम रख लिया । फिर उसी स्त्रीके साथ निठुराई की । बहुत सी स्त्रियां कामवाञ्छाके लिये पहुंचीं, किन्तु उनकी कामना उन्होंने पूर्ण नहीं की ॥५८॥ सवारीपर चलकर तीर्थयात्रा की । एकान्तमें वेश्यागमन करके पतिव्रता सोतापर झूठमूठका दोषारोप किया ॥ ५९ ॥ उन्होंने अपने पुत्र लव तकको मारनेकी आज्ञा दे दी और शम्बुक शूद्र तथा सिंहिका वध किया । ६० । रामोपासकने कहा-हे द्विज ! अन्तमे तुम्हारे कृष्णका ब्राह्मणके शापसे वंश नष्ट हुआ था । उनकी द्वारिकापुरीको समुद्रने लय कर लिया ॥ ६१ ॥ उन्होंने मद्यपान करवाकर अपने कुटुम्बियोंका वध किया । अन्तिम समयमे अपन अतिप्रिय मित्र अर्जुनको भी दर्शन नहीं दिया ॥ ६२ ॥ उन्होंने अकेले ही यहसि गोलोककी यात्रा की । एक बहेलियेके साधारण बाण द्वारा उन्होंने अपना अन्त किया । ६३ ॥ कृष्णोपासक बोला-तुम्हारे रामने अपने पुत्रके साथ महान् संग्राम किया था। "मैने सीताका परित्याग कर दिया है" ऐसा संसारको दिखलाते हुए भी वाल्मीकिके आश्रमपर जाकर चुपकेसे सीताको और अपने बेटेको देख आये । पिण्याक और इंगुदीके फलसे अपने पिताको पिण्डदान दिया ॥ ६४ ॥ ६५ । सब दण्डकारण्यमें इधर-उधर घूम रहे थे, तब भी इन्हीं फलोंसे पिताका श्राद्ध किया था। ऐरावत द्वारा भोगे हुए मंचको उठाकर पृथ्वीतलमें ले आये ॥ ६६ ॥ अश्वत्थ काटनेके अपराधपर रामने एक महायज्ञ किया। मन्त्रियोंकी शेष आयुकी पूर्तिके निमित्त अपने बड़े बेटेको यमराजसे लड़ा दिया और केवल फूल सूंघ लेनेसे स्त्रियोंको भी उन्होंने दण्ड दिया ॥ ६७ । ६८ । हमारे कृष्णने बाल्यकालमें खेल-खेलमें ही पूतनाको मार डाला। तृणासुर आदि दैत्योंको मारकर गोवर्धन गिरिको अँगुलियोंपर उठा लिया ॥ ६९ ॥ रामोपासकने कहा हमारे रामने बाल्यकालके समय खेल-खेलमे ताटका तथा मारीचादि कितने ही राक्षसोंको मार डाला और पानीमें पत्थर तैराया ॥ ७० ॥ कृष्णोपासक बोला-हमारे प्रभु कृष्णने अपने सुन्दर रूपसे

सर्गः ३ ]
राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् )
१०३


ताः कृतार्थाः स्ववश्यातो जातास्तु गोपिकाः । तांबूलोंच्छिष्टरसं दासी रामस्य भक्तितः ॥७३।
पीत्वा यस्यैव वरतो ब्रजे सा राधिकाऽभूत् । अतो मे राघवो धन्यो यस्यैका दयिताऽत्र हि ॥७४॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन पत्न्यश्च सहस्राणि हि षोडश साष्टोत्तरशतान्यत्रोद्वाहिताश्च विधानतः ॥७५॥

रामोपासक उवाच
मम रामस्वरूपेण सर्वास्ता मोहिताः स्त्रियः । मातृवन्मोहितास्तेन वीरेण पुरुषार्थिना ॥७६॥
कृष्णेन रतिकामेन मोहिता गोपिकाः स्त्रियः ।

* कृष्णोपासक उवाच
गजेन्द्रो मम कृष्णेन लीलया निहतो द्विज ॥७७॥

रामोपासक उवाच
मम रामेण नागेन्द्ररिपुरष्टापदो हतः ।

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णप्रतापेन यमुना खंडिता त्वभूत् । ७८॥

रामोपासक उवाच
मम रामप्रतापेन खंडिता जाह्नवी त्वभूत् ।

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन वै स्वर्गादानीतः सुरपादपः ॥७९॥

रामोपासक उवाच
मम रामेण स्वर्गादानीतौ सुरपादपौ ।

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन स्वगुरोर्मृताश्चापि सुता मृताः ॥८०।
सुजीविताः समानीताः सप्त ताभ्यां निवेदिताः ।


ब्रजकी समस्त गोपियोंको मोहित कर लिया और राधानामवाली उस सुन्दरीको मुग्ध कर लिया था, जो अपने असाधारण सौन्दर्यसे कामदेवको भी लजाती थी ॥७१॥ रामोपासकने कहा-हमारे रामने अपने सौन्दर्य-से देवपत्नियोंको मोहित किया था। वे सब रात्रिके समय एकान्तमें रामके पास पहुँचीं। किन्तु उन्हें रामने अपनी माताके समान माना और वरदान देकर कृतार्थ किया। वे ही जन्मान्तरमें गोपिकायें हुईं। उस समय रामचन्द्रके मुखसे ताम्बूलके निकाले हुए पोयको पीनेवाली दासी दूसरे जन्ममें राधा हुई। इससे मेरे रामचन्द्र धन्य हैं । क्योंकि वे एकपत्नीव्रतधारी हैं ॥७२-७४॥ कृष्णोपासकने कहा—हमारे कृष्णचन्द्रजाने सोलह हजार एक सो आठ स्त्रियोंके साथ विधिवत् विवाह किया था ॥ ७५ ॥ रामोपासकने उत्तर दिया कि हमारे रामचन्द्रजीने अपनी सुन्दरतासे संसारकी समस्त नारियोंको मोह लिया था, किन्तु स्त्रीके भावसे नहीं—अपितु माताके भावसे; क्योंकि हमारे राम वीर और पुरुषार्थी थे ॥ ७६ ॥ कृष्णने गोपियों नारियोंपर मोहिनी डाली थी अपनी कामवासनाकी पूर्तिके लिए। कृष्णोपासकने कहा-हे द्विज ! हमारे कृष्णने खेल खेलमें कुवलयापीड हाथीको मार डाला था ॥ ७७ ॥ रामोपासक बोला—मेरे रामने अष्टापद नामक राक्षसको खेल-खेलमे मार डाला था। कृष्णोपासकने कहा—मेरे कृष्णने अपने प्रतापसे यमुनाकी धारा खण्डित कर दी थी ।। ७८ ॥ रामोपासकने कहा - मेरे रामके प्रतापसे गंगा खण्डित हो गयी थी। कृष्णोपासकने कहा—हमारे कृष्ण अपने पराक्रमसे कल्पवृक्ष ले आये ॥७९॥ रामोपासकने कहा—हमारे

४०४आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

रामोपासक उवाच
मम रामेण साकेते सप्त मर्त्याः सुजीविताः ॥८१॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन पौरुष्याद्विप्रस्य जीविताः सुताः ।

रामोपासक उवाच
मम रामेण सचिवः सुमंत्रो जीवितः पुनः ॥८२॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन द्रौपद्याः संधितं हि फलं तरौ ।

रामोपासक उवाच
मम रामेण वैदेह्याः संधितं तुलसीदलम् ॥८३॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णप्रतापश्च जनान्संदर्शितः पुरा दुर्वाससाऽन्नयाञ्चा सा गोपिकानां कृता वृजे ॥८४॥

रामोपासक उवाच
मम रामप्रतापश्च जनान् मन्दर्शितः पुरा । दुर्वाससाऽन्नयाञ्चा सा कृता रामस्य तत्पुरि ॥८५॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन रूपाणि बहून्यद्य कृतानि हि ।

रामोपासक उवाच
बहूनि राघवेणापि स्वरूपाणि कृतानि हि ॥८६॥

कृष्णोपासक उवाच
मम कृष्णेन मित्राय दत्तं स्वर्णमयं पुरम् ।

रामोपासक उवाच
मम रामेण मित्राय दत्ता स्वर्णमयी पुरी ॥८७॥

कृष्णोपासक उवाच
सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे स्नानं कृष्णेन मे कृतम् ।


रामचन्द्रजीने अयोध्यामे बैठे-बैठे स्वर्गसे कल्पवृक्ष तथा पारिजातको मंगा लिया था । कृष्णोपासक बोला—हमारे कृष्णाजी अपने गुरुजीके मरे हुए सात पुत्रोंको यमपुरीसे लाये और उन्हें जीवित करके अपने गुरुजीको दे दिया था। रामोपासकने कहा—हमारे रामचन्द्रजीने अयोध्यामें मरे हुए सात मनुष्योंको जीवित कर दिया था ॥ ८० ॥ ८१ ॥ कृष्णोपासकने कहा—हमारे कृष्णने द्रौपदीके कथनानुसार बिना फलवाले वृक्षमें भी फल लगा दिया था। रामोपासक बोला—हमारे रामने भी सीताके कहनेपर तुलसीदलके दो टुकड़ोंको जोड़ दिया था ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ कृष्णोपासक कहने लगा—हमारे श्रीकृष्णजीने जंगलमे दुर्वासाके अन्न मांगनेपर उनकी मांग पूरी की थी ॥ ८४ ॥ रामोपासक बोला—हमारे रामने भी अयोध्यामें दुर्वासाके अन्न माँगनेपर उनकी इच्छा पूर्ण की थी। इससे हमारे रामका प्रताप सब संसार देख चुका है। ८५ ॥ कृष्णोपासक बोला—हमारे कृष्णने अनेक रूप धारण किये थे। रामोपासकने कहा—हमारे राम भी लंकासे लौटकर अयोध्या आनेपर अनेक रूप धारण करके सबसे एक साथ मिले थे। कृष्णोपासक बोला—श्रीकृष्णने अपने मित्र सुदामाको सुवर्णकी नगरी दे डाली थी। रामोपासकने कहा कि हमारे रामने भी अपने मित्र विभीषणको सोनेकी लंका दे दी थी ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ कृष्णोपासक बोला—हमारे कृष्णने सूर्यग्रहणपर कुरुक्षेत्रम जाकर स्नान किया था। रामो-