श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १२ ] मनोहरकाण्डम् ७०५
सर्गः १२ ] मनोहरकाण्डम् ७०५
तत्र स्नात्वा रामचन्द्रः कृत्वा बाप्यादिकं ततः। यावद्भोक्तुं मनश्चक्रे तावत्तेऽपि समाययुः ॥४७॥
कुशाद्याः सर्वसैन्यैश्च रामराजीवदानुगाः । ते मठे जानकीं दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययुः ॥४८॥
ततस्ते शबरीवाक्यात्सर्वं श्रुत्वा कुशादिकाः । अवबोद्धा रामचन्द्रं मेनिरे चन्द्रशेखरम् ॥४९॥
सीतां गिरेस्तनूजां चापि मेनिरे ते विनिश्चयात् । ततो रामः कुशाद्यैश्च मुदा सैन्येन सीतया ॥५०॥
भुक्त्वा पीत्वा जलं स्वच्छं वाक्यं स्त्रीः प्राह सादरम् । वरयध्वं वराद्भार्या युष्माकं यत्तु रोचते ॥५१॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा स्त्रियः प्रोचू रघूत्तमम् । येनास्माक भवेत्कीर्तिस्तं वरं दातुमर्हसि ॥५२॥
ततः प्राह रामचन्द्रस्ता नारीस्तुष्टमानसः । मम नामास्तु युष्माकं रामेति जगतीतले ॥५३॥
युष्माकं मयि सद्भक्तिः पुरुषेभ्योऽपि चाधिका । भविष्यति सदा नार्यो वरेण मम निश्चयात् ॥५४॥
देवे विप्रे कथायां च धर्मे भक्तिर्भविष्यति । सदा यूयं पवित्राश्च भवध्वं सधवाः स्त्रियः ॥५५॥
मांगल्ये शकुने सर्वकर्मसु च पुरःसराः । यूयं भवध्वं सर्वत्र त्रिवेणीयुतमस्तकाः ॥५६॥
मम बाणात्कृतं तीर्थं मन्नाम्नेदं भविष्यति । इति रामवचः श्रुत्वा स्त्रियः प्रोचू रघूत्तमम् ॥५७॥
जन्मांतरेऽपि स्वामिंस्त्वं दर्शनं देहि नः पुनः । तमासां वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥५८॥
द्वापरे कृष्णरूपेण युष्माकं दर्शनं मम । भविष्यति वने यद्वै त्वक्रयात्राप्रसंगतः ॥५९॥
विप्रपत्त्यस्तदा यूयं भविष्यथ विप्रो वने । इयं तु शबरी पत्नी विप्रस्यैव भविष्यति ॥६०॥
महद्दर्शनार्थमुद्युक्तामेनामस्याः पतिर्यदा । स्तम्भे बद्ध्वा महादण्डं स करिष्यति वै गृहे ॥६१॥
तदेयं मद्गतमना वने यास्यति मां प्रति । भिन्नदेहेन शबरी कौतुकं तद्भविष्यति ॥६२॥
तदा यूयं स्त्रियः सर्वास्तद्दृष्ट्वा कौतुकं महत् । भूत्वाऽत्र मद्गतमना मां ध्यात्वा सर्वदा हृदि ॥६३॥
अंते मद्लोकमासाद्य भोक्ष्यथ सुखमुत्तमम् । रामेति तारकं नाम मम नित्यं हि सर्वदा ॥६४॥
सोतेसे जल निकाला ॥ ४६ ॥ उससे स्नान किया और मध्याह्नकृत्यके क्रियाओंसे फुरसत पायी। तब जैसे ही भोजन करनेको तैयार हुए तैसे ही कुश आदि भी सेनाके साथ राम स्थानपर आ पहुंचे। उन्होंने वहाँ जानकीको देखा तो उनके आश्चर्यका ठिकाना नहीं रहा ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ फिर शबरीके मुखसे उन्होंने सब समाचार सुना, तब उन लोगोंको विश्वास हुआ कि रामचन्द्रजी साक्षात् शिव ही हैं ॥ ४९ । और सीताजी साक्षात् पार्वती हैं। तत्पश्चात् रामचन्द्रजीने कुश आदि बालकों तथा सेनाके साथ भोजन किया, स्वच्छ जल पिया और उन स्त्रियोंसे कहा—हे स्त्रियो ! अब तुम लोगोंकी जो इच्छा हो, वह वर माँग लो ॥ ५० ॥ ५१ ॥ इस तरह रामकी बात सुनकर स्त्रियां बोलीं कि जिससे संसारमें हमारी सुकीर्ति हो, कोई ऐसा वरदान दीजिये ॥ ५२ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्न होकर उन नारियोंसे कहा कि जो नाम हमारा है, वही तुम्हारा भी "राम" यह नाम विख्यात होगा ॥ ५३ । हे स्त्रियो ! हमारे वरदानके प्रभावसे पुरुषोंकी अपेक्षा नारियोंको हमारेमें विशेष भक्ति रहेगी ॥ ५४ ॥ देवता, ब्राह्मण, हरिकथा एवं धर्ममें तुम्हारी विशेष रुचि रहा करेगी। तुम जैसी सधवा स्त्रियां सदा पवित्र रहेंगी ॥ ५५ ॥ अपने मस्तकपर तीन वेणी धारण करनेवाली स्त्रियां किसी माङ्गल्य कार्य तथा शकुन आदि सब कार्यों में आगे आगे चलेंगी ॥ ५६ । मेरे बाणसे इस सरोवरकी रचना हुई है। अतएव यह तीर्थ मेरे ही नामसे विख्यात होगा। इस तरह रामके द्वारा वरदान पाकर तब स्त्रियोंने कहा—हे राम ! आप जन्मान्तरमें भी हम लोगोंको अपना दर्शन दीजिएगा। उनकी बात सुनकर रामने कहा—द्वापरमें जब गोकुल प्रकटन हो कृष्णरूपसे मैं तुम लोगोंको दर्शन दूंगा ॥ ५७–५९ । उस समय जब वनमें तुम हमें मिलोगी, तब तुम सब ब्राह्मणका स्त्रिय रहोगी। यह शबरी भी उस समय विप्रपत्नी होगी ॥ ६० ॥ मेरे दर्शनके लिए जानेको उद्यत इस नारीका जब इसका पति खम्भेमें बाँधकर दण्ड देगा तो यह अपना मन मुझे अर्पण करके भिन्न रूपसे मेरे समीप चली आयेगी। उस समय यह कौतुक देखकर तुम सब बड़ी विस्मित होओगी और तबसे मुझमें अपना मन लगाकर सर्वदा मेरा ध्यान करोगी ॥ ६१–६३ ॥ अन्तमें मेरे
| ७०६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १२ |
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युष्माभिर्जपनीयं वै तेनास्तु गतिरुत्तमा। इति दत्वा वरांस्ताभ्यः सीतामाह पुरःस्थिताम् ॥ ६५॥
सुखं याहि स्थलस्वार्थं तथेत्युक्त्वा विदेहजा। रामं प्रणम्य स्त्रीयुक्ता ययौ देवालयं पुनः ॥ ६६॥
देवालयगता भूत्वा दुर्गरूपं दधार सा। तदातिविस्मयं प्रापुस्ता नार्यो निश्चितामिति ॥ ६७॥
तास्तां दुर्गां प्रपूज्याथ नार्यो जग्मुः स्थलं निजम्। रामोऽपि बन्धुपुत्रायैर्वृतो निजपुरीं प्रति ॥ ६८॥
ततो गेहे कुशः सीतां पप्रच्छ स्वविचेष्टितम्। दृष्टश्च यथा वृत्तं तथा सीता न्यवेदयत् ॥ ६९॥
ततस्ते लक्ष्मणाद्याश्च मेनिरे राघवं हरम्। सीतां साक्षान्महादुर्गां मेनिरे गतविभ्रमाः ॥ ७०॥
एवं शिष्य जनानां च रामेण शमनात्मना। द्वैतबुद्धिः खण्डिताऽथ दैवे कृत्वा तु कौतुकम् ॥ ७१॥
एवं वरेण रामस्य रामा नार्यत्र कथ्यते। तासामपि मनुश्चायं रमन्ते रामेति द्वयक्षरः ॥ ७२॥
नान्यो मन्त्रोऽस्ति नारीणां शूद्राणां चापि भो द्विज। सर्वेभ्यो मन्त्रवर्येभ्यो रामस्यायं मनुर्वरः ॥ ७३॥
त्रासे भये महाशापे बाधायां सर्वदा नरैः। रामेति द्वयक्षरं मन्त्रः कीर्त्तने जागति क्षितौ ॥ ७४॥
कृत्वा पापं महाघोरं पश्चात्तपेन यो नरः। सकृद्रामेति मन्त्रं हि कीर्त्तयेच्छुद्धिमाप्नुयात् ॥ ७५॥
रामेति मंत्रराजोऽयं गमने भोजने तथा। शयने काऽने रात्रौ स्थिते कार्यान्तरे नरैः ॥ ७६॥
जपनीयः सर्वदैव संध्ययोरुभयोरपि। चतुर्वर्णैः सदा जप्यश्चतुराश्रमवासिभिः ॥ ७७॥
नास्य मंत्रस्य कालोऽस्ति जपार्थं कालरूपिणः। तस्माज्जनेऽप्ययंयः सर्वदा मनुरुत्तमः ॥ ७८॥
राममंत्रो मुखे यस्य देहो मुद्रांकितस्तथा। राममुद्रांकितं वस्त्रं यस्य तं नेक्षतेयमः ॥ ७९॥
राममुद्रांकितं वस्त्रं समुद्रं वस्त्रमुच्यते। सर्ववस्त्रेषु तच्छ्रेष्ठं पवित्रं पापनाशकम् ॥ ८०॥
समुद्रं वसनं देहे बिभ्रत मानवोत्तमम्। कृतं पापं न लिप्येत पद्मपत्रमिवांभसा ॥ ८१॥
समुद्रवस्त्रसंयुक्तं दृष्ट्वा भुवि नरोत्तमम्। यमदूताः पलायन्ते सिंहं दृष्ट्वा मृगा यथा ॥ ८२॥
श्रापको प्राप्त करके तुम सब उत्तम सुख भोगोगे। मेरा 'राम' इस तारक मन्त्रको तुम लोग सदा जपते रहना, इससे तुम्हें उत्तम गति प्राप्त होगी। इस तरह उन स्त्रियोंको वरदान देकर सामने बैठी हुई सीताजीसे कहा कि अब आप आनन्दसे अपने मन्दिरको जाइए, 'तथास्तु' कहकर वे भी उन स्त्रियोंके साथ मन्दिरकी ओर चली गयीं ॥ ६४-६६ ॥ देवालयमें पहुँचकर उन्होंने फिर पूर्वकी तरह दुर्गाका रूप धारण कर लिया। उस समय वे स्त्रियां और भी विस्मित हुईं ॥ ६७॥ इसके बाद उन स्त्रियोंने दुर्गाकी पूजा की और अपने-अपने घरोंको चली गयीं। राम भी अपने बन्धुओं, पुत्रों एवं सेना आदिको साथ लेकर अयोध्या चल दिये ॥ ६८॥ घर पहुंचकर कुशने सीतासे यह वृत्तान्त पूछा तो माताने इस तरह सब कह सुनाया कि जैसे उन्होंने अपनी आंखों सब कुछ देखा हो ॥ ६९॥ तबतो लक्ष्मण आदिने सन्देहरहित होकर रामको महेश्वर और सीताको महादुर्गा माना ॥ ७० ॥ हे शिष्य! अपने भक्तोंकी द्वैत बुद्धिको दूर करनेके लिए ही रामने उत्तम इस प्रकारका कौतुक किया था ॥ ७१ ॥ रामचन्द्रजीके वरदानसे ही स्त्रियां रामा कहलाती हैं। उन लोगोंके लिए भी 'राम' यह दो अक्षरोंका मन्त्र बतलाया गया है ॥ ७२ ॥ स्त्रियां और शूद्रके लिए इसके सिवाय और कोई मन्त्र नहीं है। सब मन्त्रोंमें यह राममन्त्र सर्वश्रेष्ठ है ॥ ७३ ॥ किसी प्रकार त्रास बाधा या पाप मानकर लोग इसी नामका उच्चारण करते हैं ॥ ७४ ॥ महाघोर पाप करके भी जो प्राणी पश्चात्तापपूर्वक 'राम' इस मन्त्रका कीर्त्तन करता है, उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ७५ ॥ किसीके लिए कि नहीं जाने समय, भोजन करते समय, सोते समय, विलग्र हुएके समय अथवा कोई भी कार्य करते समय और सायंकालका, चाहे वे किसी वर्ण तथा किसी आश्रमके हों, राम इस मन्त्रका जप करते रहें। क्योंकि यह बड़ा उत्तम मन्त्र है ॥ ७६-७८ ॥ जिसके मुखमें राममन्त्र है, जिसका शरीर रामनामसे अंकित है और जिसकी देहपर राममुद्रा-से अंकित वस्त्र पड़ा रहता है, उसे यमराज नहीं देख पाते ॥ ७९॥ राममुद्रासे अंकित वस्त्र समुद्र वस्त्र कहलाता है। यह वस्त्र सबमे श्रेष्ठ, पवित्र और पापनाशक होता है ॥ ८० ॥ इस समुद्र वस्त्रधारी प्राणीको किसी प्रकारका पातक नहीं लगता। जैसे कमलके पत्तेपर जलका असर नहीं होता ॥ ८१ ॥ समुद्र वस्त्र धारण किये हुए मनुष्यको
[सर्गः १२] मनोहरकाण्डम् ७०७
पुरैकदा तु मुनयः संभूयोचु रघूत्तमम् । राम राम महाबाहो कलावग्रे द्विजोत्तमाः ॥८३॥
स्वप्रविना मंदधियो भविष्यन्त्यवनीतले निजजठरपूर्त्यर्थे द्वाराद्वाराद् भ्रमन्ति हि ॥८४॥
कुतोऽवकाशः स्मरणे तव तेषां भविष्यति । अतस्तेषां हितार्थाय त्वां याचामोऽद्य राघव । ८५॥
तेषां हितार्थं किंचिञ्चोपायं वक्तुमर्हसि । तेषां वचनं श्रुत्वा मुनीनां रघुनन्दनः । ८६॥
उवाच वाक्यं सन्तुष्टस्तन्मुनीन्द्रसमन्वभू । सम्यगुक्तं मुनेश्रेष्ठाः शृणुध्वं वचनं मम ॥८७॥
मम मुद्रांकितं वस्त्रं कलौ धार्यं जनैः सुखम् । मम मुद्रांकितं वस्त्रं विभ्रतं मानवोत्तमम् । ८८॥
न स्पृशेद्यमकं किंचित्कृतं वापि नरेण हि । शङ्खचक्रगदापद्मशतमद्रांकितं शुभम् ॥८९॥
वस्त्रं धार्यं नरैर्भक्त्या मुद्रयैवांक्तिं तु वा । शङ्खादिश्चिह्नसंयुक्तं सदा वस्त्रं मम प्रियम् । ९०॥
मन्मुद्राङ्कितं वापि वस्त्रं मत्तोऽपदं स्मृतम् । स्नात्वा धार्यं सदा तच्च जपकाले विशेषतः ॥९१॥
मलमूत्रोत्सर्जने च शयने क्रीडने तथा । अशुचौ च सथे शूद्रौ दृष्टे राजसभासु च ॥९२॥
पथि दुर्जनसंसर्गे मुद्रावस्त्रं न धारयेत् । तथा भोजनकालेऽपि विहारे नैव धारयेत् ॥९३॥
स्नानकाले व्रते तीर्थे पूजायां पितृकर्मभिः । होमे दाने जप कृच्छ्रचांद्रायणव्रतादिषु ॥९४॥
नित्यकर्मसु काम्येषु तथा नैमित्तकेष्वपि । तथा तपःसु मन्मुद्रावस्त्रं धार्यं सदैव हि ॥९५॥
मम मुद्रांकितं वस्त्रं विभ्रतं मनोत्तमम् । अहं मोक्षं प्रदास्यामि सत्यं मन्य मुनीश्वराः । ९६।
एवं श्रुत्वा राघव वयं मुनयस्ते मुदान्विताः । रामं पृष्ट्वाऽऽश्रमं स्वं स्वं प्रतस्थू मुदिताननाः । ९७।
तस्मान्मदा मवमुद्रावस्त्रं धार्यं नरैर्भुवि । रामेति द्वयक्षरो मन्त्रो जपनीयस्तु सर्वदा ॥९८॥
राममुद्रा शुभा धार्या गोपीचन्दनसंयुता । मुद्रांश्च मार्दवंभक्त्या शमतानार्थमादरात् ॥९९॥
देखकर यमके दूत उसी तरह भागत हैं, जैसे सिंहका देखकर मृग भाग जाते हैं॥ ८२॥ एक बार बहुतसे मुनि एकत्र होकर रामसे बोले- हे महाबाहो ! आगे चलकर कलियुगमें ब्राह्मण बड़े मन्दबुद्धि होंगे और पेट पालनेके लिये द्वारा २ घूमते हुए द्वार-द्वार घूमेंगे ॥ ८३ ॥ ८४ । उनका आपका स्मरण करनेके लिए अवकाश कैसे मिलेगा। अतएव उनके कल्याणार्थ हम आपसे यह भिक्ष माँग रहे हैं कि उनके हितके लिये कोई उपाय बतला दीजिए। उन मुनियोंकी बात सुनकर रामचन्द्रजी प्रसन्न मनसे बोले कि आपने बहुत उत्तम प्रश्न पूछा है। अच्छा सुनिए ८५-८७। उन लोगोंको चाहिए कि सदा मेरी मुद्रासे अंकित वस्त्र धारण करें। जो मेरी मुद्रासे अंकित कपड़े पहन रहेगें, उनसे यदि किसी प्रकारका पातक भी हो जायगा तो वह उनका नहीं लगेगा इसलिए वे सदा शंख चक्र, गदा और पद्मसे अङ्कित कपड़े पहनें। यह भी न हो सके तो केवल मेरे नाम ही से चिह्नित कपड़े पहने। शंख आदिसे चिह्नित वस्त्र भी मुझे बड़े प्रिय हैं॥ ८८-९०॥ राममुद्रासे अंकित वस्त्र मुझे बहुत प्रसन्न करता है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि स्नान करके ऐसे ही कपड़े पहने और जपके समय इसके लिए विशेष ध्यान रक्खें ॥ ९१ ॥ मलमूत्र त्यागते समय, बिछौनेपर, खेलते समय, अपवित्रामस्थान, किसी दुष्टके के घरपर, बाजारमें, राजसभा में, रास्ते में और दुर्जनोंके संसर्गमें इस मुद्रावस्त्रको कभी भी न पहनें। भोजन करते समय और स्त्रीके साथ विहार करते समय भी इसे न पहनें ॥ ९२ ॥ ९३ ॥ स्नान करनेके अनन्तर, उत्तम तीर्थमें पूजा करते समय, पितृश्राद्ध करते समय, होम, दान, जप आदि करते समय, चान्द्रायण आदि व्रतमें, नित्यकर्म करते समय, काम्य कर्ममें, कोई नैमित्तिक कर्म करते समय और तपस्या करत समय मेरी मुद्रासे अंकित वस्त्र अवश्य पहनना चाहिए ॥ ९४ । ९५ । हे मुनीश्वरो ! यह बात बिल्कुल सत्य है कि मेरी मुद्रासे अंकित वस्त्र पहननेवालोंको मैं स्वयं मुक्ति देता हूँ ॥ ९६ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर वे सब बहुत प्रसन्न हुए और रामसे आज्ञा लेकर अपने-अपने आश्रमोंको चले गये । ९७ ॥ इसीलिए लोगोंको यह चाहिए कि हमेशा राममुद्रासे अंकित कपडे पहन और 'राम' इस दो अक्षरके मंत्रका जप करें ॥ ९८ ॥ गोपीचन्दनसे राममुद्रा
| ७०८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३ |
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पूजा सदा राघवस्य कार्याऽत्र मानवैर्भुवि सदा स्नानं रामतीर्थे नरैः कार्यं प्रयत्नतः ॥ १०० ॥
सदा रामायणं चेदं श्रवणीयं नरैर्भुवि चिंतनीयः सदा रामो जन्ममृत्युन्निवारकः ॥ १०१ ॥
स्तोतव्यः कीर्तनीयश्च वन्दनीयोऽत्र राघवः । न किंचिदणुमात्रं हि विनारामं सदाऽऽचरेत् ॥ १०२ ॥
हनुमत्कवचं दिव्यं पठित्वाऽऽदौ नरैर्भुवि । ततः श्रीरामकवचं पठनीयं हि सर्वदा । १०३ ॥
पठंति रामकवचं हनुमत्कवचं विना । अरण्ये रोदनं तैस्तु कृतमेव न संशयः ॥ १०४ ॥
स्तोत्राणामुत्तमं स्तोत्रं सर्वभीतिनिवारकम् । श्रीरामकवचं नित्यं पठनीयं नरैर्भुवि ॥ १०५ ॥
विष्णुदास उवाच
गुरोऽहं श्रोतुमिच्छामि हनुमत्कवचं शुभम् । तथैव रामकवचं वद कृत्वा कृपां मयि ॥ १०६ ॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः श्रृणु हनुमत्कवचं रामकवचं च वदामि ते ॥ १०७ ॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे
आदिकाव्ये रामपार्षदत्वप्रदर्शनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
त्रयोदशः सर्गः
( हनुमत्कवच तथा रामकवच )
श्रीरामदास उवाच
एकदा सुखमासीनं शंकरं लोकशंकरम् । पप्रच्छ गिरिजाकांतं कर्पूरधवलं शिवम् ॥ १ ॥
पार्वत्युवाच
भगवन् देवदेवेश लोकनाथ जगत्प्रभो शोकाकुलानां लोकानां केन रक्षा भवेद्द्भुवम् ॥ २ ॥
संग्रामे संकटे घोरे भूतप्रेतादिके भये दुःखदावाग्निसंतप्तचेतसां दुःखभागिनाम् ॥ ३ ॥
धारण करें। इससे श्रीरामचन्द्रजी प्रसन्न होंगे। ९९ ॥ संसारमे मनुष्योंको चाहिए कि सदा रामचन्द्रजीकी पूजा करें और प्रयत्न करके रामतीर्थमे स्नान करें ॥ १०० ॥ सर्वदा इस आनन्दरामायणका पाठ करते हुए जन्म और मृत्युका दुःख दूर करनेवाले रामचन्द्रजीका ध्यान करते रहे। उन्हींकी स्तुति करें और उन्हींका गुणानुवाद गावें कहनेका भाव यह है कि रामचन्द्रके भजनके सिवाय कोई और काम न करें ॥ १०१॥१०२॥ पहले हनुमत्कवचका पाठ करके श्रीरामकवचका पाठ किया करें। १०३ ॥ जो लोग हनुमत्कवचका पाठ किये बिना ही श्रीरामकवचका पाठ करते हैं, वे मानो अरण्यरोदन करते हैं इसमें कोई संशय नहीं है । १०४ ॥ सब स्तोत्रोंमें उत्तम तथा सब प्रकारके भयका निवारण करनेवाले श्रीरामकवचका पाठ सांसारिक मनुष्योंको अवश्य करना चाहिए ॥ १०५ ॥ विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! हम आपके मुखसे हनुमत्कवच और रामकवच सुनना चाहते हैं। मेरे ऊपर कृपा करके बतलाइए ॥ १०६ ॥ रामदासने कहा—हे वत्स ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। मैं हनुमत्कवच और रामकवच इन दोनों कवचोंको कहूँगा। तुम सावधान होकर सुनो ॥ १०७ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
श्रीरामदास कहने लगे—एक बार संसारका कल्याण करनेवाले शिवजी बैठे हुए थे। उसी समय पार्वतीजीने कहा—हे भगवन् ! हे देवदेवेश ! हे लोकनाथ ! हे जगत्प्रभो जो लोग किसी प्रकारके शोकसे आकुल हों उनकी किस प्रकार रक्षा की जा सकती है ? जो लोग घोर संग्राम, महान् संकट, भूत प्रेत आदिकी बाधाओं अथवा दुःखरूपी दावाग्निसे जल रहे हों, उनके उद्धारार्थ कौन उपाय किया जा सकता है ? । १ ३ ।