श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २६९
सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २६९
केसिंहेभपृषव्याघ्रनृगचित्रविचित्रितान् । पीतरक्तहरिच्छयामकृष्णरत्नमण्डितान् ॥४४॥
तत ऊर्ध्वं ददृशुस्ते पदकान्युज्ज्वलानि हि । शृङ्खलापमान्येव हेमजातान्यथानि च ॥४५॥
मद्वांचनशृङ्खलानि काञ्चनग्रथितानि च । नानाग्रन्थिविचित्राण्ये मुक्तेर्मण्डिततान्यपि ॥४६॥
नानामाणिक्ययुक्तानि दीप्तिमन्तपुत्तल विधि तत'ददृशुस्ते विख्यातं समानान्तरविचित्रितान् ॥४७॥
नवरत्नयुतान्दान्गगुच्छांस्तारानुश मुक्ताः । मुनिमाला रुक्मपत्र चम्पमाला विचित्रिताः । ४८।
पुष्पमालाः कांचनजाः मणिकारत्नमण्डिताः रुक्मगुच्छान्विता माला हेमपत्रिकातन्विताः ॥४९॥
प्रवालमणिमुक्तामिश्रिचित्रविचित्रिताः । चम्पकूप्रकलिकार मण्डिता हेममालिकाः ॥५०॥
कण्ठे मंगलसूत्रं च पेटिका रत्नभूषिता । कांचनानां सुवृत्तानां मणीनां विविधानि च ॥५१॥
गुच्छैः कण्ठभूषणानि मुक्तागुच्छोथतान्यपि ददृशुस्ते हि सीतायाः कण्ठे हेमन्तनेकशः ॥५२॥
रत्ननामट्टताम्येव ग्रीवाया भूषणान्यपि । प्रवालमणिशणिक्यग्रचित्ताम्युज्ज्वलानि च ॥५३॥
मुक्तागुच्छान् काञ्चगुच्छान् माणगुच्छैर्विचित्रितान् ।
प्रवालमणिगुच्छांश्च रत्नपुष्पविभूषितान् ॥५४॥
ततो ददृशुस्ते सर्वे थैथीलारुचकञ्चुकैम् । हेमन्तन्तुमयं चित्रो मुक्तामाणिक्यगुंफितम् ॥ ५५॥
आदर्शबिंबसंयुक्तो पुष्टताजिर्विराजितम् । मयूरशुकहंसैश्च लवगैस्तन्तुनिर्मितैः ॥५६॥
विचित्रां श्रमणभणौर्दो गलन्तों रुई नत्री । ततो ददृशुर्भूपत्योः केयूरे रत्नमण्डिते ॥५७॥
वज्रकंकणसादृश्ये हेममाणिक्यनिर्मिते । रत्नविचित्रित्राश्च भूजशोः पेटकाः शुभाः ॥५८॥
हेमतन्तुमवैर्लंबमानगुच्छैः सुमंडिताः प्रवालमणियुक्तानां नानागुच्छैर्युक्ता अपि ॥५९॥
तदधः करयोः सर्वे ददृशुर्भूषणानि ते । रत्नमाणिक्यमुक्ताभिविचित्री हेममम्बवौँ ॥६०॥
करचूडी दाभिमनी हेमपुष्पादिचित्रिती । काचकङ्कणघण्टाशी चन्द्रार्धार्था विधा ॥६१॥
व्याघ्र और मृग आदिके चित्र बने थे। पीले, लाल, हरे, नील और काले मणि स्थान-स्थानपर जड़े हुए थे ॥४२-४४॥ इसके ऊपर सामान देखा कि भांति-भांतिके आभूषण पड़े हैं। कहीं सोनकी जंजीरें हैं, कहीं काञ्चन काम बना है और कहीं लटकनयुक्त रत्नोंकी सजावट है ॥४४॥४६॥ कई तरहक मणियोंके आभूषण देदीप्यमान हो रहे हैं। नौ रत्नोंस जड़ा हुआ हार है। मोतियोंका माला है। सोनेकी जंजीर हैं। मणियमाला, नलुण एवं पत्का माला भी पड़ा हुआ है ॥४७॥४८॥ फूलोंका माला, कञ्चनकी माला, कञ्चन और मुक्ताओं मिश्रित माला, सुवर्णकम्पित मणियोंका माला, पल्लव तथा अन्यान्य मणियोंसे मिश्रित माल चंपाकी कलीके समान बने हुए सुवर्णकी माला, पेटिका मंगलसूत्र, रत्न-जटित पेटो, सुवर्ण तथा मूक्षा मणियोंके बने हुए गुच्छ और मोतियोंके गुच्छोंको उन्होंने सीताके गलेमें देखा । ४९-५२॥ ठीक कण्ठके समान ही सीताका अनेक आभूषण भी दख पड़ते थे। उनम भी प्रवाल और मणि माणिक्य आदि जड़े थे। मोतियोंके गुच्छे काँचके गुच्छे और रत्नाके गुच्छोंस वे रंग-बिरंगे मालूम होते थे। इसके अनन्तर लगान सीताजीका चोली देखा। वह भा सुवर्णके तारामे बनी, मुक्ता-मणि-माणिक आदिसे सजा और प्रकाश युक्तम था जिसम मयूर और तोतोंके चित्र बन थे, वृक्षोंस चित्रित एवं चंद्रबिन्दुओंसे भीगी तथा अत्यंत विस्ती हुई वह सोभा थी। इसके बाद सतारू रत्नमण्डित बाजूबन्दपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी ॥५३-५७॥ यह भी विचित्र प्रकारके रत्नोंसे जटिल थी और उनकी आभा स भिन्न-विचित्र मालूम देती था। फिर जिसमें जरीके काम किये हुए थे मणिका उस कमर्पट्टिकापर लोगोंकी दृष्टि पडी ॥५८॥ उसमें भी सुवर्णके तारोंके बड़े-बड़े गुच्छे लटक रहेथ । जगह-जगहपर प्रवालमणि-मुक्ता आदिकोंके गुच्छे लटक इस रहे थे ॥५९॥ फिर दोनों हाथांम जो और आभूषण थे उन्हें लोगोंने देखा। वे भी रत्न-माणिक और मोती आदिसे चित्रित सुवर्णके बने थे ॥६०॥ हाथोंके दोनों कंकण सुवर्णके पुष्पसे सजे हुए
२७० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
तदूर्ध्वः कङ्कणानि हेमजानि घनानि च । रत्नमाणिक्यमुक्ताभिश्चित्रितान्युज्ज्वलानि च ॥ ६२॥
प्रवालमयी मुक्तानां कङ्कणानिर्विचित्रितान् । कर्णयोः सारिके दिव्ये शुशुभाथे रत्नमण्डिते ॥६३॥
तदूर्ध्वं कङ्कणान्येव पुष्पवल्ल्यङ्कितानि हि । दंतराड्युपमार्थानि रत्नहेमोज्ज्वलानि च ॥६४॥
अंगुलीषु ददृशुस्ते मुद्रिका रुक्मनिर्मिताः । रत्नमाणिक्यमुक्ताभिर्नीलपार्वतसंज्ञिषु ॥६५॥
प्रवालचन्द्रकांतैश्च सूर्य्यकांतैर्विचित्रिताः । नानापुष्पोपमा दिव्याः प्रतिपर्वमथाश्रिताः ॥६६॥
ततो ददृशुः सीताया रम्यं गण्डेऽतिमोऽज्ज्वलम् । दिव्यं मयूरं चित्रं च वररुक्मविनिर्मितम् । ६७ ।
मणिमाणिक्यमुक्ताभिर्नानारत्नैः सुमण्डितम् । लंबिनं मौक्तिकादीनां वरगुच्छैः सुवेष्टितम् । ६८।
ततो ददृशुः सीतायाः कर्णयोर्भूषणानि ते । मकरध्वजसादृश्ये ताटंके रत्नचित्रिते ॥६९॥
मणिमाणिक्यमुक्ताभिर्गुम्फिते सोऽज्ज्वले वरे । रत्नपुष्पादिभिश्चित्रैर्विचित्रिते रविभास्वरे । ७०॥
ततो भ्रमरिके दिव्ये रुक्मरत्नविचित्रिते । मुक्ताभिर्गुम्फिते रम्ये हेमपुष्पाणि वै तथा ।७१॥
कर्णयोः शृङ्खलाश्चित्रा ददृशू रुक्मनिर्मिताः । मुक्तागुच्छैर्गुम्फिताश्चरत्नमाणिक्यमण्डिताः ॥७२॥
आकर्णाभ्यां च सीमन्तपर्यन्तं मालपासयोः । हार्यद्रुक्मवालानि माणिक्यरमहितानि हि ॥७३॥
मुक्तागुच्छैर्गुम्फितानि वैदूर्य्यविचित्रितान्यपि । ततस्तदूर्ध्वं सभाया ददृशुः शिरसि द्विजाः ॥७४॥
सीमन्तयोरुत्तरे याम्ये केशेषु सूर्य्यभास्करौ । रुक्मजौ रत्नवैदूर्यमणिमुक्ताविचित्रितौ ॥७५॥
नीलकान्तींग्रकांतैश्च विद्रुमैर्विद्योतिनौ । चन्द्रसूर्य्याविव स्वायभासा दारयन्तौ दिशः । ७६॥
निटिले तिलकं रत्नमणिमुक्ताविराजितम् । दैवं दिव्यमुज्ज्वलं च कोटिसूर्य्यसमप्रभम् ॥७७॥
ततो ददृशुः सीमन्तं मुक्ताहारं महोज्ज्वलम् । नानारत्नविचित्रं च सर्वांगतिलकावधि । ७८।
चूडामणिं च ददृशुस्ते जनकेन समर्पितम् । नानारत्नविचित्रं च मुक्तागुच्छविराजितम् ॥७९॥
थे। काँचकी बनी हुई चूड़ियोंके मध्यम में सूर्य और चन्द्रमाकी नाईं मालूम पड़ते थे ॥ ६१॥ उनके ऊपर-
पाँच सुवर्णके गाढ़े मटकड़े पड़े थे, वे भी नाना प्रकारके रत्न'स विचित्र दाप्ति धारण कर रहे थे ॥ ६२॥
उन्हींके ऊपर प्रवालमणि मुक्ता आदि मण्डीत एक-एक दिव्य सारिकाएं बनी थीं ॥ ६३॥ उनके भी ऊपर
रत्ननिर्मित फूलों और लताओंसे जटित कंकण पड़े थे ॥ ६४॥ उँगलियोंम सुवर्णकी बनी रत्न, माणिक्य,
नीलम, मरकत मणि आदिसे जटित अनेक अंगूठियां थीं। वे भी प्रवाल, चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त आदि
मणियांस विचित्र मालूम होती थीं । ६५ ॥ ६६ ,, इसके अनन्तर सब लोगोन सीताकी नासाग्रणिको देखा,
जिसमें एक दिव्य स्वर्णमयूर बना हुआ था। वह भी नाना प्रकारके मणियोंसे अलंकृत था ॥ ६७ ॥ उसमें भी
मणि-माणिक और माणिक्य शुभ्र लटक रहे थे ॥६८॥ इसके बाद लोगोने सीताके कर्णभूषणोंको देखा। जिनमें
मकरध्वजके सदृश विविध रत्नोंसे चित्रित झुमके थे। उनमें भी मणि-माणिक और मोतियोंके झुच्छे लटक
रहे थे। रत्ननिर्मित पुष्पोंसे वे सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहे थे। ६९ ॥ ७० ॥ फिर लोगोंने सीताके कानोंमें
पड़ी हो भ्रमरिकाओंको देखा। वे भी सुवर्णकी बनी तथा रत्नोंके जड़ वमें चित्र विचित्र मालूम होती थीं
॥ ७१ ॥ फिर सबोने सीताकी उस कणशृङ्खलाको देखा, जो सुवर्णकी बनी तथा रत्नजटित थी और उसमें
भी माणिक्यके गुच्छे लटक रहे थे ॥ ७२ ॥ कानसे लेकर सीमन्त पर्यन्त ललाटके बगल-बगल स्वर्ण मणियमयके
आभूषण हारके समान मालूम पड़त थ ॥ ७३ ॥ इसके अनन्तर सबन्न नांताक मस्तककी ओर देखा, जहाँ केशमें
सूर्य और चन्द्रमा दिखाई पड़ते थे। वे भी सुवर्ण-रत्न-वैदूर्यमणि-मुक्ताम विचित्र थे ॥७४-७५॥ नीलम कन्मारे
कांत्यादिक मणियाने वे कतिबय शोभित हो रह य, वे अपनी अनुपम कान्तिसे दूसरे सूर्य-चन्द्रमाके समान दसों
दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥७६॥ ललाटम रत्नों और मणि-मुक्ताओंस बना हुआ तिलक था। वह भी
सुवर्णका बना था और कोटि सूर्यक समान उसका प्रकाश था ॥ ७७ ॥ इसके अनन्तर उन्होंने सीताके सीमन्तमें
अतिशय दीप्तिमान् एक चूड़ामणि देखा, जो वेणीसे लेकर तिलक पर्यन्त अपनी छटा दिखा रहा था ॥ ७८ ॥
सर्गः ४] विलासकाण्डम् २७१
ततो ददृशुः शिरसि मुक्ताजालानि भूसुराः। हेमन्ततन्तुगुम्फितानि रत्नपुष्पयुतान्यपि ॥८०॥
मणिवैदूर्यकाश्मीरविद्रुमैश्चित्रितानि हि। तदूर्ध्वं पुष्पजालानि सुगन्धीनि व्यलोकयन् ॥८१॥
ततो वेण्यां भूषणानि ददृशुस्ते वराणि हि नानापक्ष्युपमान्येव माणिक्यचित्रितानि हि ॥८२॥
पल्लवान्तरवर्तीन्यतिदीप्यदुज्ज्वलानि च। हेमन्ततन्तुमान् गुच्छान् मुक्ताहारविमिश्रितान्॥८३॥
लम्बमानान् ददृशुस्ते मणिमाणिक्यसंयुतान्। वेण्यग्रेमंस्थितानरम्यन्नपुष्पापाडममन्वितान् ८४॥
एवं सीतां ददृशुस्ते श्रान्त्यस्तविभूषयाम्। सर्वांलङ्काररहितां तां द्रष्टुं कोऽपि न क्षमः। ८५॥
दिव्यालङ्काररत्नानां प्रभया हतलोचनाः। वामहस्तेन पात्रं च दर्वों दक्षिणसत्करे। ८६॥
दधानां पद्मचरणां रत्नोत्पलकरां वराम्। पद्मास्यां पद्मपत्रक्षीं पद्मगर्भस्वरूपिणीम्। ८७॥
दिव्यकर्पूरगन्धैश्च चन्दनैरपि चर्चिताम्। स्फुरन्मञ्जीरचरणां दिव्यकङ्कणमण्डिताम् ।८८॥
स्तपदालक्तवर्णेन गतिं दर्शयतीं निजाम्। रत्नांगदधरां सीतां ददृशुस्ते द्विजादयः ॥८९॥
गजेंद्रगमनां रम्यां दिव्यपुष्पैः सुशोभिताम्। दिव्यमन्दारकुसुममालाभिश्च सुशोभिताम् ॥९०॥
कस्तूरीकृततिलकां कुंकुमेन सुशोभिताम्। हरिश्रिया कज्जलाद्यैर्मण्डितां च स्मित्ताननाम् ९१॥
इति दृष्ट्वा जानकीं तेऽभूवन् चित्रोपमास्तदा। आत्मानं न विदुः सर्वे सीतासौंदर्यविस्मिताः ॥९२॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विलासकाण्डे
सीतालङ्कारवर्णनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥४॥
इसके अनन्तर उन राजाओंने सिरपर सुशोभित मोतियोंको देखा, जो सुवर्णके तारमें गुँथे थे और उनके बीच-बीचमें रत्ननिर्मित पुष्प पड़े हुए थे, ७९॥ ८०। वे भी मणि वैदूर्य काश्मीर-विद्रुम आदिस चित्रित थे। उसके बाद उनके ऊपर लगे हुए सुगन्धित फूलोंको देखा ॥ ८१ ॥ तदनन्तर वेणीमें लगे हुए सुन्दर आभूषणोंके ऊपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी जो विविध प्रकारके उन माणिक्य-चित्रित पक्षियों जैसे दीखते थे, जो पत्तोंके भीतर बैठे हुए अतिशय दीप्तिमान् हो रहे हों सुवर्णके तारोंसे बने गुच्छ मोतियोंके हारसे मिले तथा मणि-माणिक्यसंयुक्त थे। वे वेणीके अग्रभागमें लटक थे और उनमें नाना प्रकारके फूल गँथे हुए थे ॥ ८२ ८४ । सीताने बोझके डरसे बहुतसे आभूषणोंको निकाल दिया था। फिर भी सब प्रकारके अलङ्कारोंको धारण किये हुएके सदृश दीखनेवाली सीताको लोगोंने देखा सही, किन्तु कोई भी अच्छी तरह नहीं देख सका ॥ ८५ ॥ क्यों कि उन अलंकारोंके प्रभावके आगे लोगोंकी दृष्टि ही नहीं ठहरती थी। सीताके बाएँ हाथमें एक पात्र था और दाहिने हाथमें कलछी थी ॥ ८६ ॥ उनके चरण कमलसराखे थे। रत्नोंसे बने हुए कमलकी नाईं सीताके हाथ थे। कमलके समान मुख, पद्मपत्रके समान आँखें तथा कदलीके खम्भेके भीतरी भागके समान कोमल स्वरूप था। दिव्य कर्पूर तथा चन्दनसे उनका समस्त शरीर चर्चित था। झमझम करता हुआ मंजीर पाँवोंमें था और दिव्य कंकण सीताके पाँवोंमें पड़े थे। ८७-८८ ॥ रक्तवर्णके चरणोंसे वे अपनी मन्द गति दिखा रही थीं। रत्ननिर्मित विजायठ हाथमें पड़े थे। इस प्रकारकी सीताको लोगोंने देखा ॥ ८९ ॥ गजेन्द्रके समान उसकी मन्द गति थी। दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित तथा दिव्य मंदार विरचित मालाओंसे अलंकृत होकर कस्तूरीका तिलक लगाये हुए थी, उनकी आँखोंमें काजल लगा था और वे मन्द-मन्द मसका रही थीं। इस प्रकारकी सीताको देखकर देखनेवाले चित्रलिखित जैसे हो गये और उनके सौन्दर्यसे विस्मित होकर वे सब अपने आपको भूल गये। ९०-९२॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते विलासकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
२७२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५
पञ्चमः सर्गः
( रामसीताका जलविहार )
श्रीरामदास उवाच
अथ सीता क्षणेनैव चकार परिवेषणम् । हेमपात्रेषु सर्वेषां पक्वान्नैर्विविधैर्मुदा ॥ १ ॥
कामधेनुदुग्धैश्च मण्डकान् पूर्णपूरितान् । वटकान्फेनिकांश्चापि पायसान्युज्ज्वलानि च ॥ २ ॥
पर्पटकान् लड्डुकांश्च कूष्माण्डवटकांस्तथा । घृष्टपर्पटदुग्धान्नं दधिक्षीरं घृतं मधु ॥ ३ ॥
पृथक्कांञ्चनद्रोण्यां जानकी पर्यवेषयत् । शर्कराः श्वेतवर्णाश्च तथैव गुडशर्कराः ॥ ४ ॥
मरिचायुपनागैश्च संस्कृतं तक्रमुत्तमम् । घृतपक्वविविधशाकांश्च सुस्वादूंश्च क्वचित्कदाः ॥ ५ ॥
तिलसम्मिश्रवटकानाद्रकं बीजपूरकम् । आम्रादीनां रसांश्चापि रम्भादीनि फलान्यपि ॥ ६ ॥
एवमादीन्यनेकानि चोष्याणि विविधानि च । तथा लेह्यानि पेयानि जानकी पर्यवेषयत् ॥ ७ ॥
ततो रामः सहमित्रैः कथां कुर्वन् सुखेन सः । अकरोदुपहारं च करशुद्धिं विधाय सः ॥ ८ ॥
सर्वेषां निजहस्तेन ददौ तांबूलमुत्तमम् । स्वयं भुक्त्वाऽथ ताम्बूलं वाससि परिधाय सः ॥ ९ ॥
बध्वा शस्त्राणि सर्वाणि दृष्ट्वाऽऽदर्शं निजं मुखम् । आरुह्य शिविकां दिव्यां मुक्तागुच्छविराजिताम् ॥ १० ॥
हैमीं रत्नादिमिश्रितां ययौ निजगृहाद्वहिः । वन्धुभिः सचिवैर्हस्त्यश्वैस्तैः सर्वत्र वेष्टितः ॥ ११ ॥
स्तुतो वन्दिजनैः सर्वैर्ययौ स जानकीगृहम् । तत्र नत्वाऽथ कौसल्यां तथा मान्यार्यथाक्रमम् ॥ १२ ॥
आशीर्भिरभिनन्दितास्ताभिर्ययौ रामः सभां वरम् । तत्र सिंहासने स्थित्वा मन्त्रिभिर्लक्ष्मणादिभिः ॥ १३ ॥
राजकार्याणि सर्वाणि चकार नीतिमान्नरः । शशास राज्यं धर्मेण बुद्धिमांश्चारुलोचनः ॥ १४ ॥
चारैर्ज्ञात्वा स्थितिं सर्वो स्वगणस्य च सर्वथा । शशास राज्यं धर्मेण राघवो दीर्घलोचनः ॥ १५ ॥
अथ सीतोपहारं स्वसखीभिश्चोर्मिलादिभिः । देवरणां कामिनीभिः स्वसृभिश्चाकरोत्सुखम् ॥ १६ ॥
करशुद्धिं विधायाथ भुक्त्वा ताम्बूलमुत्तमम् । परिधाय हरिद्वस्त्रं तथा रक्तं तु कञ्चुकम् ॥ १७ ॥
श्री रामदासने कहा—हे शिष्य ! इसके अनन्तर सीताने क्षण भरमें सबोंके अर्थ रक्खे हुए सुवर्णके पात्रोंमें विविध प्रकारके पक्वान्न परोसे । वे पक्वान्न कामधेनुके दुग्ध उत्पन्न किये हुए थे। उत्तम मण्डक, पूरनपूरी, वटक फेन, टम्पुका दनी खीर आदि, पापड़, लट्टू, कूष्माण्डाप, निम्बूड़ा, दही, दूध घी, शहद आदिकोंको जानकीजीने अलग-अलग स्वर्णनिर्मित पात्रोंमें परोसा ॥ १-३ ॥ सफेद शक्कर, लाल शक्कर, जीरा मिर्चे आदि मसाला डालकर बना हुआ रायता, घृत छोड़ हुए नाना प्रकारके शाक, चटनी तिलकी बना हुई टिकिया, मूला बात्रापूरक, अमरक रस, कन्द आदिक फल, इसी प्रकार चूसने लायक तरह-तरहके अचार, चाटने लायक कितनी ही तरहकी चटनी और पीने लायक तन्मई आदि वस्त्रभोजोंको माताजीने परोसा ॥ ४-७ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजीने मित्रोंके साथ बातचीत करते हुए भोजन किया और हाथ धोकर सबका अपने हाथसे पान दिया। फिर स्वयं भी पान खाया और कपड़े बदले ॥ ८-९ ॥ इसके बाद सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र बाँधकर आदर्शमे मुख देखा और मणियोंके गुच्छामें सजाई हुई पालकीपर सवार होकर घरसे बाहर निकले । बान्धव, मन्त्री मित्र तथा दूत, वे सब चारों ओरसे रामचन्द्रजीको घेरे हुए थे ॥ १०-११ ॥ वंदीजन गच्छी भावावली स्तुति करते चलत थे। इस तरह सबको अपने साथ लिये हुए वे माताके भवनमें न पहुंचे, वहाँ माता कौसल्या तथा अन्य माताओंको प्रणाम करके उनसे आशीर्वाद लिय और उन माताओं का भी साथ लिये हुए सभामवन पहुंचे । वही मन्त्रियों तथा लक्ष्मणादिक भ्राताओंके साथ सिंहासनपर बैठे ॥ १२ ॥ १३ ॥ वहाँपर राज्यसम्बन्धी समस्त कार्योंको खूब अच्छी तरह सोच-विचारकर किया । रामचन्द्रजी गुप्तचरों द्वारा आने राज्यके सब समाचार मालूम करके धर्मपूर्वक शासन करते थे ॥ १४ ॥ उधर सीताजीने भी अपनी देवरानियो बहिनों तथा सखियोंके साथ भोजन किया, हाथ धोया और ताम्बूलका उत्तम बीड़ा खाया । हरे रंगकी साड़ी तथा लाल रङ्गकी चाली जिसमें सुवर्णके
सर्गः ५ ] विलासकाण्डम् २७३
हेमतन्तुमपुष्पाढ्यां मुक्ताजाल बगुम्फिताम् । गेहान्तर्वर्त्युपवनशालायां संस्थिताऽभवत् ॥१७॥
सखीभिर्वेष्टिता रम्या धृतऽधौतोत्तरीयेणा ततो दिव्यामलङ्कारामिजदेहे दधार सा ॥१८॥
ये मया कथिता नैव पूर्वन्त्येस्तान् क्रमेणतान्। करोतुं वर्णने शक्तो भवेदत्र नरोत्तमः ।१९।।
चतुर्रास्यः कुण्ठितोऽभूत्पञ्चास्यश्च षडाननः । ऊर्ध्वःश्रवाश्च सम्प्राप्यः सहस्रास्योऽपि वर्णने ॥२०॥
श्रुत्वा सीतामुपवने गतां ते जल्यन्त्रिणः । जल्यन्त्राणि सर्वाणि चतुर्मुक्तानि वेगतः ॥२१॥
रत्नमञ्चकसंस्था सा सीता चामरचीजिता। जल्यन्त्रकौतुकानि ददर्श नगरीरुहः ॥२२॥
एतस्मिन्नन्तरे रामो राजकार्याणि कृत्स्नशः । कृत्वा ययौ समाशः स निजगृहं तु बन्धुभिः ॥२३॥
तदा दुन्दुभिनिर्घोषा नववाद्यस्वना अपि। शङ्खानां गोमुखानां च भेरीणां तुमुलस्वनाः ॥२४॥
बभूवुर्वंश वृन्दाश्च तूरादीनां स्वनाः शुभाः । ननृतुर्नारनायैव तुष्टुवुर्मगधादयः ।।२५।।
तं स्वनं जानकी चापि श्रुन्वा चोपवने स्थिता । सम्भ्रमेण समुत्तीयं मञ्चकाद्यो वरानना ।।२६।।
वामहस्ते समा री तां धूपपात्रं च दक्षिण । धृन्वा करे सा वैदेही रामं प्रत्युज्जगाम वै ॥२७॥
एतस्मिन्नंतरे रामस्त्यक्त्वारूढां शिबिकां बहिः । विसृज्य सकलाँल्लोकान् विवेश बन्धुभिर्गृहं ॥२८॥
एतस्मिन्नन्तरे दास्यः शतशो रत्नभूषिताः । गृध्ररात्रे द्रुतुमुत्ना स्वस्वकर्मसु तत्पराः ॥२९॥
काचित् व्यजनेनैव वीजयामास वेगतः । दधार चामरं काचित्काचिदासनमुत्तमम् ॥३०॥
काचित् फलपात्रं सा काचिन्निष्ठीवन्तस्य च । पात्रं दधार काचित्तु जलकुम्भं मनोरमम् ॥३१॥
काचिद्दधार वस्त्राणां कोशं काचित्तु कार्मुकम् । काचिद्दधार तूणीरं काचिन्खङ्गं दधार सा ॥३२॥
एवमादीन्यनेकानि तदोपकरणानि ताः । जगृहु रामचन्द्रं तं वेष्टयामासुरादरात् ।।३३।।
ततो रामः सुनैःपद्मयां ययौ जनकनन्दिनीम् । स्थितां तत्र प्रतीक्षन्तीं पतिं जलरुहेक्षणम् ॥३४॥
तारोंसे जगह जगह बेल-बूटे बने थे, उसे पहिना और सबके साथ भवनके भीतर ही बने हुए उपवनमें जाकर बैठो ॥ १५-१७ ॥ वहाँ सखियोंने उन्हें चारों ओरसे घेर लिया और सीताने विविध प्रकारके आभूषण पहने ॥ १८ ॥ जिन षोडश संस्कारोंको मैं बडे परिश्रमके साथ लिखकर पहले कह आया हूँ, उन यहाँ पूर्णरूपसे वर्णन करनेमें कौन श्रेष्ठ पुरुष समर्थ होगा ॥ १९ ॥ सीताकी उस अलौकिक शोभाका वर्णन करनेमें चतुरानन ब्रह्मा, पञ्चवक्त्र शिव, षडानन स्वामिकार्त्तिकेय, गान सुखवाले ऊर्ध्वःश्रवा और हजार मुखवाले शेषनागके भी बुद्धि कुण्ठित हो गया ॥ २० ॥ जलयन्त्रके अधिकारियोंने जब सुना कि माताजी उपवनमें आ गयी हैं, तब उन्होने सब फौवारोंको बड़े वेगके साथ छोड़ दिया ॥ २१ ॥ तदनन्तर मणिकी बनी हुई चौकीपर बैठकर सीता फौवारोंके कौतुक तथा वृक्षोंकी शोभा देखने लगीं और दासियाँ मस्तक ऊपर चँवर डुलाने लगीं ॥२२॥ इतनेमें रामचन्द्र भी राज्यसम्बन्धी सब काम करके पाषर्दोंके साथ अपने भवनमें आये ॥ २३ ॥ उस समय दुन्दुभीके शब्द, नवीन बाजोकी ध्वनि और शङ्ख, गोमुख, भेरी आदिका घनघोर शब्द होने लगा ॥ २४ ॥ विविध वाद्ययन्त्रोंके शब्द और तुम्बी आदिकी ध्वनि सुनाई देने लगी, वेश्याएं नाचने लगीं और बन्दीजन महाराजकी स्तुति करने लगे ॥ २५ ॥ उन बाजोंके स्वर सुनकर सीता भी घबड़ाहटके साथ चौकीपरसे उतरकर बांये हाथमें तारी तथा एक अर्घपात्र लेकर रामकी ओर चलीं ॥ २६ ॥ २७ ॥ हेवतक रामचन्द्रजी भी पालकीसे उतरे और सब लोगोंको बिदा करके भ्राताओरु साथ घरके भीतर गये ।। २८ ।। इतनेमें विविध प्रकारके अलङ्कारोंको पहने हुए सैकड़ों दासियाँ अपना अपना काम करनेके लिये दौड़ पड़ीं ॥ २९ ॥ कोई भगवान्को पंखा झलने लगी, किसी ने चमर ले लिया। कोई आसन बिछाने लगी। किंचित् पानदान किसीने उग़ालदान किसीने सुन्दर जलपात्र और किसीने कपड़े रखनेकी पेटी सम्हाल ली । एकों दासीने रामजीका धनुष ले लिया । किसीने तरकस लिया और किसीने तलवार ले ली ॥३०-३२॥ इस तरह रामकी सब वस्तुओंको सब दासियोंने चारों ओरसे घेरकर सम्हाल लिया ॥ ३३ ॥ इसके बाद
२७४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५
गृहांगणागममध्ये संस्थितां सस्मिताननाम् । दृष्ट्वात्मानं विसृजन्तीं सुतं मां चारुलोचनाम् । ३५।
कटाक्षांश्च पडयन्तीं सखीभिः परिवेष्टिताम् । तां दृष्ट्वा गण्डवस्त्रापि किञ्चित् कृत्वा स्मिताननम् । ३६॥
चक्राताचमनं सम्यक् सीतापर्पितजलेन सः । ततः स्निग्धाऽऽसने पीत्वा जलमने ययौ पुनः । ३७ ।
जलपन्त्रगृहं पश्या झालां संख्यासमन्वितः । तस्यां सिंहासने स्थित्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः ॥३८॥
गच्छ भोजनशालां त्वं सर्वानह्वय वेगतः । ब्राह्मणादीन्नृपँश्चित्रवर्गीयां स्वयमत्र हि ॥३९॥
सर्वं कृत्वा यथायोग्यं ततो मां कुरु मूरनाम् । तथेति राघवेनाज्ञास्तेन स शत्रुहा । ४०॥
लक्ष्मणस्त्वरितो गत्वा सर्वनाहूय वेगतः । वसिष्ठ दिनमुनीन्मित्रमंत्रिणः सुहृदस्तथा ॥ ४१॥
त्वय्यामासोर्मिलां च मांडवीं भरतप्रियाम् । श्रुतकीर्ति च सौमित्रि श्रीरामवचनात्तदा । ४२॥
एतस्मिन्नन्तरे रामः केसरादिर्विनांमतेः । चित्ररंगैः पूरितानि जलयन्त्रान्यनेकशः ॥४३॥
कारयित्वा तेषु सीतां बाहुपार्श्वदृढं मुदा । धृत्वाऽक्षिपत्तृपङ्कवत्यादिषु पदन्मुवैमुहुः ॥४४॥
ततः स्वयं पपातोर्ध्वर्जलगेषु वै पृथक् । जलक्रीडां स मैथिल्या चकार रघुनन्दनः ॥ ४५॥
भुजाभ्यां म ममालिग्य तां मुहुः प्राक्षिपन्मुदा । रञ्जवाद्यम वैदर्दी सुगन्धाञ्जलिसञ्चनैः ॥४६॥
ततः सुगन्धतैलानि तथा परिमलानि हि । नानामुगन्धद्रव्याणि मङ्गल्यानि बहूनि च ॥४७॥
दासीभिः प्रोद्यमानीय तानुभौ हि परस्परम् । वर्पयतुः सुगंधैश्च काह्लाद्यैर्व्यमनोरमैः ॥४८॥
कराभ्यां जलपंत्राणि मिथस्तो मधुमानतुः । रामाऽक्षिमत्तया दास्यः संतास्तलयोऽपि सूचिताः । ४९॥
बस्त्रमिश्रिवहिदूरं गत्वा तस्थुर्बिलज्जिताः । काश्चिदुद्दारैषु तस्थुस्ताम्बूलीं प्रमुदिताननाः ॥५०॥
अदृष्ट्वाऽथ नराः सीताराभौ रहसि सादरम् । जलपन्त्रेषु तौ क्रीडां चक्रतुः सुचिरं मुदा ॥५१॥
मुष्टिभ्यां जानकी राम ताडयामास कौतुकात् साश्चेप तां ताडयामास मुष्ट्या पुष्पमयात्तथा । ५२॥
रामजी धीरे धीरे सीताजी की ओर चले, जा पहले ही से उस गरुड़ा रामचन्द्रजक बालको प्रशक्षा कर रही थी। जिसका मस्तक रामको देखकर लज्जा से झुक चुका था, वे सीता गृहाङ्गणके बने उस खंभे बैठी थीं। मुसकराता हुआ उनका मुख था। रामचन्द्रजीने देखा कि, इन दासीओ और सुडौल नामिवाळ की सीम हम देखकर लज्जा रही है। उनके चारों ओर सखीयां घेरा खड़ा है और यह रहकर माता अपना कटाक्षावाण हमपर दबाती आता है। इस प्रकारकी चालाकी देखकर रामचन्द्रजी मुसकाने हुए उनके पास पहुचे और सीता के हाथसे प्राप्त जलको लेकर आचमन किया। फिर आसनपर बैठ, उस दिशा ओर सखीके साथ उस बंगलाकी तरफ चले, जो फोवराक बीचम बना हुआ था। वहाँ पहुंचकर राम एक दिव्य सिहासनपर बैठे ओर लक्ष्मणसे कहने लगे-, ३४-३७ ॥ हे लक्ष्मण तुम भोजनशाला जाओ ओर सत्र ब्राह्मण तथा सितादिक क्षत्रियोंसे कहो कि जल्दी भोजन तैय्यार करे जैसा मैने बतलाया है, वैसा कराकर बाद फिर हम सूचना दा । 'बहुत अच्छा' कह-कर लक्ष्मण शत्रुघ्न तथा भरतका साथ लेकर भोजनशाला पहुचे, वह वशिष्ठादि मुनियों, मन्त्रियों तथा मित्राको बुलाकर शीघ्र तैयार होनेको कहा ॥ ३८-४१ ॥ तदनन्तर लक्ष्मण मांडवी, श्रुतकीर्ति, उर्मिला आदिको रामचन्द्रजीके अनुसार वहापर दिया कि तुम शीघ्र ही भोजनका तथ्यारा कराओ ॥४२॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजीने कमसर आदि नानाप्रकारके जलसे भरे हुए अनेक कूपोंके भीतर सुन्दरीको गोदमे लेकर फक दिया सखी जिसको फुहारे के पानी से मुँह धोया था ॥ ४३,४४ ॥ इसके अनन्तर वे ऊपरका रास्ता ढूढ़कर और सीताके साथ जलक्रीड़ा करने लगे। सीताजीके शरीर पर बार बार जल उड़ा उड़ाकर जलमे फेंकते, फिर स्वयं फूल और सीता-पर जल उछालते थे। तदनन्तर सुगन्धित तेल, सुगन्धित तैल तथा विविध प्रकारके परिमल मँगाकर जलममं एक दूसरेपर डालते लगे। वे हाथमें पिचकारी लेकर एक दूसरेका मजा ले रहे थे मिले हुए जलकी वर्षा करते थे। ४५-४८॥ रामचन्द्रजीके संकेतसे सखियां लज्जाके मारे बहाँसे हट गयी और दूसरी जगह जा बैठी उनमें से कुछ स्त्रियां प्रसन्नतापूर्वक ताम्बूल धरे हुए उनके फाटकपर जा बैठी इस प्रकार एकान्तम सीताके साथ राम-चन्द्रजी बहुत देरतक क्रीड़ा करन रहे ॥५०। ५१ । कभी खेल खेलमे सीताजी रामचन्द्रक। मुक्का मार देती थीं,