श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ७ ] उत्तरकाण्डम् ३२५
सर्गः ७ ] उत्तरकाण्डम् ३२५
न मत्सौढोऽसि हे व्यर्थं गच्छ नोचेन्न रिष्यसि । शमं न गमयन्नद्य भग्नोऽहं स्यां न संशयः ॥७२॥
त्वयाऽपराधिनं बालं रामस्य सुतमेककम् । नाहं हन्मीह नानेनात्मानं निहन्म्यहम् ॥७३॥
नीतान् वीरान् समर्प्यथ बद्धांस्तुल्यान्निजैः सुतैः । सपुत्रं रघुपत्याशु प्राप्नुयान्मम संमुहात् ॥७४॥
तत्सौमित्रेर्वचः श्रुत्वा लवोऽपीत्थमभाषत । जानेऽहं राघवौ चाथ सौन्दर्याणामपौरुषम् ॥७५॥
सीतायामेव युष्माकं पौरुषं न त्वन्यतः । सम्भूताऽपनादार्थं मुनिना निर्मितस्त्वहम् ॥७६॥
यूयं जित्वाऽथ समरे मातुस्तापं प्रमार्क्ष्यहे । मुरा नृपाश्चापि या माना ल्लवनात्पापिनोवता ॥७७॥
तस्या विनिष्कृतिं कर्तुं कङ्कपत्रं समागतः । मातर्दुःखाग्निना युष्मत्पापं दग्धमवेहि तत् ॥७८॥
न स्वातन्त्र्यं ममाग्रेऽत्र गच्छध्वं विधयोपमाः । इति ते लववाणौघैर्हृत्प्रमथ्यदलश्च वै ॥७९॥
लक्ष्मणायो यत्प्रयुक्तं शस्त्रमस्त्रं च वृथा ततो मन्त्रश्च तैर्र्बाणैः शस्त्रैश्चैव निवारिते च ॥८०॥
श्रीरामसचिवार्दींश्च प्राधमद्यज्ञमण्डपे । ते सर्व सचिवा व्याध लक्ष्मणगताऽद्वताः ॥८१॥
भिन्नदेहा लोहिताङ्गा मेनू रामं व्यजिज्ञपन् । पश्य त्वं भो पश्याम किं तूष्णामध्यक्षमण्डपे ॥८२॥
उपायं चिन्तयस्यान्यं वधेऽन्यस्य लवस्य च । शस्त्रास्त्रैरिति युद्धं न गच्छति लवः प्रभो ॥८३॥
साहाय्यं कुरु सौमित्रेर्यदि बन्धुं मनीषितम् । लवशरप्रहारैश्चातुमुत्सलम् ॥८४॥
इत्युक्त्वा सर्ववाक्यानि राघवं ते न्यवेदयन् । तानि श्रुत्वा राघवोऽपि तूष्णामप्यासीत्तदा क्षणम् ॥८५॥
लवाऽपि लक्ष्मणं बाणैर्विद्व्याध दशभिर्दृढम् । अपृच्छन्मज्जने बाणाः शरीरे लक्ष्मणस्य च ॥८६॥
ततः क्रोधपरोतात्मा लक्ष्मणो वेगवत्तरः । स्वदेहं स्वशस्त्राणि भवन्ति विफ़लानि हि ॥८७॥
बालकका सामन देख तो दुखपूर्वक कहने लगे- देख, वत्स! अब मैं आया हूँ। मेरे सामने किसी तरहकी दुष्टता न करना। तुम मेरे सामने नहीं ठहर सकते। जाओ, चले जाओ, नहीं तो तुम नहीं बच सकते। अभी तुम तुम्हारे उत्तम व्यर्थ रामका काम भुगता है। इसलिए नहीं मार रहा हूँ हे अज्ञान बालक ! तुमने कई बार रामको अपराध किया है। मैं सब जानता हूँ। फिर भी मैं तुमको नहीं मारता ॥७१-७३॥ यदि तुम्हें अपने प्राणोंका लोभ हो तो तुमने जिन लोगोंको पकड़ लिया है, उन्हें लाकर हम दे दो और भाइयोंको लेकर मेरे साथ रामचन्द्रजी के पास चलो। -७४ इस तरह लक्ष्मणजीकी बात सुनकर लबने कहा- बेचारी सीताके ऊपर अपना वीरता दिखलानेवाले तुमको और रामको मैं अच्छी तरह जानता हूँ। सीताके ऊपर तुम्हारा जो पुरुषार्थ चला था, वह संसार नहीं भूल सकता। सीताके दुःखको दूर करनेके लिए ही महर्षि बाल्मीकिने मेरा रचना की है। ७५, ७६, अब मैं तुम दोनोंको जीतकर सीताका दुःख दूर करूँगा। तुमने भोलीभाली सीताके साथ कपटपूर्ण व्यवहार किया है। उसका प्रायश्चित्त करनेके लिए ही मैं यहाँ आया हूँ। सीताके दुःखरूपी अग्निमें तुमलोगोंका दुष्कर्म जल चुका है ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ तुमलोगोंको चाहिए कि मेरे सामनेसे हट जाओ। इस प्रकार लवके चलाये हुए बाणोंसे लक्ष्मणका हृदय विदीर्ण हो गया। ७९ । ८० ॥ अतः क्रुद्ध होकर सब एक साथ लवपर बाणवर्षा करने लगे। लवने भी अस्त्रसे उनके शस्त्रास्त्रका निवारण किया और लक्ष्मणके साथ आये हुए मन्त्रिसैनिक आदिको अपने बाणोंसे उठा उठाकर रामके यज्ञमण्डपमें फेंक दिया। लवके बाणोंसे आहत मन्त्री आदिका दङ्गल जहाँतहाँ पाथ हो गये थे और उनसे रुधिर बह रहा था। इस दशामें वे सब रामके पास जाकर कहने लगे- हे राम ! इस यज्ञमण्डपं चुपचाप बैठे बैठे आप क्या देख रहे हैं । ८१॥ ८२ ॥ लवको मारनेके लिए कोई दूसरा उपाय सोचिये। हे प्रभो ! लव संग्राममें किस तरहके अस्त्र-शस्त्रसे नहीं मर रहा है। हे बन्धुवत्सल ! यदि लक्ष्मणको जीवित देखना चाहते हो तो उनकी सहायता करिये क्योंकि वे बाणोंके प्रहारसे बहुत थकगये। इस तरह वहाँका समाचार सुनानेके बाद उन बातोंको बतलाया, जो लवने रामके विषयमें कहा थी। उनकी बातें सुनकर राम कुछ देरतक चुप बैठे रहे। उधर लबने दश बाणोंसे लक्ष्मणको घायल कर दिया और वे दसों बाण लक्ष्मणके शरीरमें सिरसे लेकर पूँछतक घुस गये थे ॥ ८३-८६ । ऐसी अवस्थामें लक्ष्मण क्रोधसे आग-
३२६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ७
दृष्ट्वेत्यूचुर्भृशं वित्रस्ताः सः क्षणं सन्विचिन्त्य वै हृदि । ब्रह्मास्त्रेण लवं बद्ध्वा साश्वं गङ्गे न्यवेदयत् ॥८८॥
ब्रह्मास्त्रं मानयंस्तूणीं ययौ राम लवेऽपि सः । पश्चादस्तं समायांतं दृष्ट्वा लक्ष्मणमब्रवीत् ॥८९॥
जानन्नपि सुतं स्वोष कौतुकं दर्शयञ्जनान् । महत्कार्यं कृतं बन्धो त्वयाऽत्र विद्धि बहुजम् ॥९०॥
द्विजहत्यामय त्यक्त्वा घातयस्सैनमद्य हि। राम प्रोवाच सौमित्रिर्नायं शस्त्रैर्मरिष्यति ।९१।
भरताद्यैर्मया चापि नायं किं ताडितोऽग्निभिः । यस्य देहे क्षतं चैकमपि किं दृश्यते त्वया ।९२॥
तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह प्रष्टव्यो बालकोऽन्यथा। केनोपायेन ते मृत्युर्भवेदिति समाग्रतः ।९३॥
गोपायन्ति निजं मृत्युं न शूरा वधशङ्कया । न वदन्त्यनृतं क्वापि स्वबलेनैव जीविताः । ९४॥
वतः पृष्टो लक्ष्मणेन लवः प्राहाथ लक्ष्मणम् । जलस्य सेचनाद्वृद्धिं स्वीयां ज्ञात्वा मुनेर्गिरा ॥९५॥
ज्ञापयन्बुद्ध्या लोकांश्च दर्शयन् स्वपराक्रमम् । जलस्य सेचनान्मे मृत्युर्मे निश्चितो भवत् ॥९६।
ततस्त्य वचनं श्रुत्वा शिलायां तं निवेश्य च । सेचनं तोयकलशैः कारयामास लक्ष्मणः ॥
अयोध्यावासिभिर्नारैः पुरुषैः परमादरात् । ९७॥
चतुर्मुखैश्च घटैर्पानीयंश्च कोटिशः । तथा कार्पटिकैश्चापि रथौष्ट्रवारणादिभिः ॥९८॥
आनयित्वा जलं शीघ्रं सिषेचु लवालकम् । यथा यथा जलैस्त हि सेचन चक्रिरे जनाः ॥९९॥
तथा तथा लवस्तत्र व्यवर्द्धत घनो यथा । सप्ततालप्रमाणोऽभूदृष्ट्वा ताम्पसत्तमम् ॥१००॥
ततस्तं लक्ष्मण, प्राह त्वया लव मुषेरितम् । नाय तव वधोपायः स्ववृद्धयर्थे कृतः खलु । १०१॥
लवोऽप्याहाय सौमित्र कोटिन्येन प्रनाश्यन् । यथा तैरुद्यने दीपो वृद्धिमते प्रणश्यति । १०२।
तथायुषः क्षये मेऽपि वृद्धिं पश्य क्षणं निशम् । तद्वाक्यं मानयन्नन्य सेचयत् स लक्ष्मणः । १०३॥
जलेर्मागैः समानीतैः पूर्ववच्च पुनः पुनः । कष्टमोषानमार्गेण सेचन चक्रिरे जनाः । १०४॥
बबुल हो उठे। उन्होंने कई शस्त्र लवपर चलाये, लेकिन जब उन्हें बेकार होते देखा तो घबड़ा उठे। क्षण भर उन्होंने न जाने क्या सोचा और तब ब्रह्मास्त्रसे लवको बाध लिया और घोलाको भी साथ लेकर अयोध्यामे रामके पास ले आये ॥८७॥ ८८ ॥ ब्रह्मास्त्रका मर्यादा रखकर लिए लव भी चुपचाप लक्ष्मणके साथ चल दिये। जब रामने लवको देखा तो कौतुकावश कहा यद्यपि मै जानता हूँ कि यह मेरा ही पुत्र है। फिर भी संसारको शिक्षा दनक लिय मै आज्ञा देता हूँ कि द्विजहत्याके भयको दूर करके आज ही इसे मार डालो। इसने बड़े अपराध किये हैं। लक्ष्मणने उत्तर दिया कि यह किसी शस्त्रास्त्रस नहीं मरेगा ॥ ८९-९१॥ हमने तथा भरतजीने इसपर कितना ही बार शस्त्रास्त्रके प्रहार किये है, किन्तु देखिए न ! इसके शरीरमे कहीं कोई घाव दीखता है ! ॥ ९२ ॥ रामने कहा- इससे पूछो कि तू किस प्रकार मर सकेगा। जो सच्चे शूरवीर होते है, वे अपनी मृत्युके उपायको भी नही छिपाते। राज्य बार कभी झूठ नही बोलते ॥ ९३॥ ॥९४॥ इस प्रकार पूछनेपर लव कुछ सोचने लगा। एक बार महर्षि वाल्मीकिने लवस कहा था कि तुम्हारे ऊपर जितना जल डाला जायगा, तुम उतने ही बढ़ोगे । इसी बातका ख्याल करके लवने समारको अपना पराक्रम दिखाने-के लिए लक्ष्मणसे कहा- जलके सींचनेपर मेरी मृत्यु होगा ॥ ९५ । ६६ ॥ लवकी बात सुनकर लक्ष्मणने लवको पास ही एक पत्थरपर बिठाया और पानके घडासे नहलाने लगे। अयोध्यानिवासी बहुतसे नरनारी बड़े आदरके साथ लवपर जल डालने लगे । चार मुंहवाले बड़े-बड़े घमडकर झट बेल रथ हाथी, घाड़े, ओर ऊँटपर लाद-लादकर कराडोका सख्यामे वहाँ आन लग और व सब उसके ऊपर डाल दिये गये। जैसे-जैसे पानी पड़ता था, त्यो त्यो लव मेघके समान बढ़ने जाते थे। बहु परम वीर बढ़ते-बढ़ते जब सात ताड़का ऊँचाई तक बढ़ा ॥ ९७-१०० ॥ तब लक्ष्मणने कहा-लव ! जान होता है कि तुम झूठ बोल हो। तुमने मरनेके लिये नहीं, अपने बढ़नेका उपाय बताया था ॥ १०१ ॥ लवने भी लक्ष्मणका बहकाकर कहा-न एक जब बुझनेवाला होता है तो उसकी ली कितना बढ़ जाया करता है। उसी तरह आयुके क्षय होनेसे मै भी बढ़ रहा हूँ। अबकी बार भी लक्ष्मणने लवका बात सच मानी और उसी तरह लवके ऊपर जलके कमसे डालते रहे ॥ १०२।१०३। बहुत्तणोके