श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ९ ] | राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) | ४३५
| सर्गः ९ ] | राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) | ४३५ |
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वर्षे सरिच्छैलाः सन्ति बहवः ॥ ४५ ॥ तद्यथा मलयो मङ्गलप्रस्थो मैनाकस्त्रिकूटः ऋषभः कूटकः सह्यो देवगिरिर्ऋष्यमूकः श्रीशैलो वेंकटो महेंद्रो वारिधरो विंध्यः शक्तिमानृक्षगिरिः पारियात्रो द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतकः ककुभो नीलो गोकामुख इन्द्रकीलः कामगिरिरित्यन्ये च शतसहस्रशः शैलास्तेषां नितम्बप्रभवा नदा नद्यश्च संत्यसंख्यताः ॥ ४७ ॥ चन्द्रवशा ताम्रपर्णी अवटोदा कृतमाला वैहायसी कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावती तुंगभद्रा कृष्णा वेणा भीमरथी निर्विन्ध्या पयोष्णी तापी मही सुरसा नर्मदा चर्मण्वती सिंधुः शोणश्च नदौ महानदी वेदस्मृतिः ऋषिकुल्या त्रिसामा कौशिकी मंदाकिनी यमुना सरस्वती दृषद्वती गोमती सरयू रोधस्वती सप्तवती सुषोमा शतद्रुश्चन्द्रभागा मरुद्वन्धा वितस्ता असिक्नी विश्वेति महानद्यः । ४८ । एवं शिष्य रघुनायको नायकः सोपदीपं जम्बूद्वीपं स्ववशं कृत्वा लक्षयोजनविस्तीर्णं जंबूद्वीपपरिखोपमं समुल्लंघ्य पुष्पकस्थः प्लक्षं नाम द्वितीयं द्वीपं ददर्श ॥ ४९ ॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकांडे पूर्वार्धे जंबूद्वीपजयो नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
नवमः सर्गः
( राम द्वारा प्लक्षादि छः द्वीपोंकी विजय )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामो ययौ श्रीमान् प्लक्षद्वीपं मनोरमम् । द्विलक्षयोजनमितं सप्तवर्षसमन्वितम् ॥ १ ॥
उपास्यो यत्र वै सूर्यो ब्राह्मणैश्च शुपामकाः । द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति प्लक्षवृक्षो हिरण्मयः । २ ॥
यथाऽऽरामाद्बहिर्नीयाः परिखाश्च समंततः । जंबूद्वीपाच्च क्षारोदोऽद्विद्व्रीपस्तथा त्वयम् ॥ ३ ॥
॥ ४४ ॥ उनमेंस सीता पूर्व समुद्रमें, चक्षुर्भद्रा पश्चिम समुद्रमें और अलकनन्दा दक्षिण समुद्रमें जाकर मिलती है ॥ ४५ ॥ भारतवर्षमें भी बहुत-सी नदियां और पर्वत हैं, ४६ ॥ मलय, मंगलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट, ऋषभ, कूटक, सह्य, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल, वेंकट, महेन्द्र, वारिवर, विन्ध्य, शक्तिमान्, ऋक्षगिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, रैवतक, ककुभ, नील, गोकामुख, इन्द्रकील और कामगिरि ये पर्वत हैं। इनके अतिरिक्त और भी बहुत से पर्वत हैं, जिनकी तलैटीसे बहुतसे नद और नदियां निकली हैं। जैसे— ॥ ४७ । चन्द्रवशा, ताम्रपर्णी, अवटोदा, कृतमाला, वैहायसी, कावेरी, वेणी, पयस्विनी, शर्करावती, तुङ्गभद्रा, कृष्णा, वेणा, भीमरथी, गोदावरी, निर्विन्ध्या, तापी, मही, सुरसा, नर्मदा, चर्मण्वती। सिंधु और शोण ये दोनों महानद हैं। वेदस्मृति, ऋषिकुल्या, त्रिसामा, कौशिकी, मन्दाकिनी, यमुना, सरस्वती, दृषद्वती, गोमती, सरयू, रोधस्वती, सप्तवती, सुषोमा, शतद्रू, चन्द्रभागा, मरुद्वन्धा, वितस्ता, असिक्नी और विश्वा ये महानदियां हैं ॥ ४८ । हे शिष्य ! इस प्रकार उपद्वीपों समेत जम्बूद्वीपको अपने वशमें करके राम एक लाख योजन विस्तृत लवणसमुद्र, जो कि जम्बूद्वी पकी खाईके समान था उसे पार करके पुष्पक विमान द्वारा प्लक्ष नामके एक दूसरे द्वीपमे जा पहुंचे ॥ ४९ । इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते आनन्दरामायणे राज्यकांडे पूर्वार्धे अष्टमः सर्गः । ८ ॥
श्रीरामदासने कहा—इसके बाद श्रीमान् रामचन्द्र अतिशय मनोरम प्लक्षद्वीपको गये, जो दो लाख योजन विस्तृत था और उसमे सात देश थे । १ ॥ वहां सबके आराध्य देवता सूर्य और देवाराधक ब्राह्मण थे। वहाँ सुवर्णका एक बड़ा-सा प्लक्ष (पाकड) का वृक्ष था और उस प्लक्षके ही कारण उसका प्लक्षद्वीप नाम पड़ा था ॥ २ ॥ जिस तरह किसी बगीचेके चारों ओर खाई बना दी जाय, ठीक उसी तरह उसको चारों ओरसे
४३६ आनन्दरामायणे • [सर्गः ९
मेरोः पूर्वदिशायां वै तत्र वर्षं शिवाङ्गकम् । आदौ ययौ रामचन्द्रः क्षणादेव विहायसा ॥ ४ ॥
नदी यत्राऽरुणा नाम्नी सर्वपापप्रणाशिनी । तस्यां स्नात्वा रघुश्रेष्ठः शीघ्रं तद्वर्षपं ययौ ॥ ५ ॥
तेन वर्षाधिपेनैव युद्धमासीत्सुदारुणम् । तं जित्वा पञ्चमासेंश्च तैश्च पार्थिवसत्तमैः ॥ ६ ॥
पूजितो रघुनाथस्तु वज्रकूटाचलं ययौ । वज्रकूटं महाश्रेष्ठं द्वयोः सागरयोः स्थितम् ॥ ७ ॥
परस्परं वर्षयोश्च सीमाभूतं ददर्श सः । तं गिरि पृष्ठतः कृत्वा वर्षं पयसमं ययौ ॥ ८ ॥
नुम्णानदीजले स्नात्वा ययौ यावयसेश्वरम् । तेन सम्पूजितो रामस्ततस्तद्वर्षपार्थिवैः ॥ ९ ॥
सहितः पुष्पकैनैवमुपेंद्रसेनपर्वतम् । दृष्ट्वा कृत्वा पृष्ठतस्तं सुभद्रं वर्षमाययौ ॥ १० ॥
अगौग्मींनदीतोये स्नात्वा स रघूनायकः । वर्षाधिपेन कोशैः संपूजितः पार्थिवैः सह ॥ ११ ॥
ज्योतिष्मन्तं गिरि गत्वा तं कृत्वा पृष्ठतः क्षणात् । शान्तिवर्षेश्च सावित्रानदीतोये विगाह्य च ॥ १२ ॥
तद्वर्षेशं नृपं जित्वा तथा तद्वर्षसंस्थितान् । नृपान् जित्वा क्षणादेव सुवर्णपर्वतं ययौ ॥ १३ ॥
ततो गत्वा क्षेमवर्षं सुप्रभातानदीजले । स्नात्वा रामः क्षेमपेन स्वकोशैः परिपूजितः ॥ १४ ॥
हिरण्यग्रीवनामानं गिरि रम्यं विलंघ्य च । वयऽमृते तन्नृपेण पार्थिवैः परिपूजितः ॥ १५ ॥
ऋतंभरानदीतोये चकार स्नानमादरात् मेघमालं गिरि त्यक्त्वा पृष्ठतः पुष्पकेण हि ॥ १६ ॥
वर्षेऽभये तन्नृपतिं क्षणाञ्जित्वा रणे प्रभुः । सत्यधरानदीतोये स्नात्वा स रघूत्तमः ॥ १७ ॥
सुचंद्राख्यं नृपं प्लक्षद्वीपेशं तीक्ष्णसङ्गरैः । कृत्वा तं स्वपदाक्रान्तं तेन तद्द्द्दीपपार्थिवैः ॥ १८ ॥
मणिष्टूटं गिरिवरं समातिक्रम्य वै क्षणात् । इक्षुरसोदनामानं द्विलक्षयोजनं वरम् ॥ १९ ॥
तीर्त्वा तं सागरं भीमं प्लक्षस्य परिखोपमम् । तथा च शाल्मलीद्वीप चतुर्लक्षमितं ययौ ॥ २० ॥
द्वीपस्तुरूपवान्कुत्र यत्रास्ति शाल्मली द्वीपपादपः । यत्रोपास्थ्यश्च सोमोऽस्ति तत्रस्थास्तदुपासकाः ॥ २१ ॥
विस्तारद्दीपमानानि दीर्घतायाः स्मृतानि च । तत्र क्रमेण वर्षाणि कथ्यते पूर्ववन्मया ॥ २२ ॥
लवण समुद्र घेरे हुए था। ३ ॥ मंदरपर्वतकी पूर्व ओर प्लक्षद्वीपमें शिवाङ्कक नामका एक देश था। रामचन्द्रजी क्षणमात्रमें आकाशमार्गसे वहाँ पहुंचे। ४ ॥ वहाँपर सब पापोंका नाश करनेवाली अरुणा नदी बहती थी। जिस-में उन्होंने स्नान किया और उस देशके राजाके पास गये। ५ ॥ उस राजाके साथ रामका भयंकर युद्ध छिड़ गया। पाँच महीनेतक घमासान युद्ध होनेके पश्चात् वहाँका राजा रामके वशमें आ गया और उसने उनकी पूजा की ॥ ६ ॥ फिर वहाँसे वज्रकूटाचलपर गये। वह पर्वत दो सागरोंके बीचमें स्थित होकर दोनों देशोंकी सीमा-का काम कर रहा था। उसको लाँघकर पयसम नामक देशको गये ॥ ७॥८॥ वहाँ उन्होंने नुम्णा नदीमें स्नान किया और थवयस देशवाले राजाके पास गये। उसने रामकी पूजा की। इसके बाद रामने वहाँके भी बहुतसे राजाओंको अपने पुष्पक विमानपर बिठा लिया और आगे उपेन्द्रसेन नामक पर्वतपर पहुंचे। उसे देखकर वे सुभद्र देशको गये। ९॥ १०॥ वहाँ आगस्तं नदीमें स्नान करनेके पश्चात् वहाँके राजासे मिले। उसने बहुतसे धनका व्यय करके रामचन्द्र तथा उनके साथवाले राजाओंका सत्कार किया। ११ ॥ फिर ज्योतिष्मान् नामक पर्वतको लाँघकर वे शान्तिदेशको गये। वहाँ सावित्री नदीमें स्नान करके उस देशके राजाको परास्त किया और उसके आगे सुवर्ण पर्वतपर गये। वहाँसे क्षेमदेशमें पहुंचे। वहाँ रामने सुप्रभाता नामकी नदीमें स्नान किया और क्षेमदेशके राजाने रामका विधिवत् पूजन किया ॥ १२-१५ ॥ इसके अनन्तर ऋतंभरा नदीमें स्नान करके मेघमाल नामके पर्वतको लाँघते हुए राम अभय देशमें पहुंचे। वहाँके राजाको क्षणमात्रमें जीतकर सत्यधरा नदीम स्नान किया। फिर सुचन्द्र नामक राजा जो प्लक्षद्वीपका शासक था उसे भयानक युद्धमें हराकर वहाँके बहुत-से राजाओंको अपने साथ लेकर इक्षुरसोद नामके भयंकर समुद्रको पार किया। वह प्लक्षद्वीपकी खाईके समान दो लाख योजन विस्तृत था। वहाँसे चलकर शाल्मली द्वीपमें पहुंचे, जो चार लाख योजन विस्तृत था। १६-२० ॥ वहाँ एक विशालका शाल्मली (सेमर) का
सर्गः ९] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४३७
मेरोः पूर्वदिशामारभ्य सर्वत्र क्रम उच्यते सुलोचनं सौमनस्यं तथा रम्यकं शुभम् ॥२३॥
देववर्षं पारिभद्रमाप्यायनमनुत्तमम् । अविज्ञातं सप्तमं च सप्त वर्षाणि वै क्रमात् ॥ २४॥
अनुमती सिनीवाली तथैव च सरस्वती । कुहूश्च रजनी नन्दा च राका नद्यः प्रकीर्त्तिताः ॥२५॥
शतशृङ्गो वामदेवो कुन्दश्च कुमुदस्तथा । पुष्पवर्षः पदभ्रश्च सहस्रश्रुतिनभसः ।२६॥
स्वरसः पर्वता सप्त ज्ञेयाः सीमासु वै क्रमात् । एतेषु सप्तवर्षेषु वर्षपानान् विजित्य सः ॥२७॥
जित्वा द्वीपेश्वरं रामः सुबाहुं मुदमभ्ययात् । सुरोदं च चतुर्लक्षमितं तीर्त्वा पयोनिधिम् ॥२८॥
कुशद्वीपं महालक्षमितं रामो ययौ क्षणात् । तत्रोपास्यो जातवेदाः सर्वेषां द्वीपवासिनाम् ॥२९॥
द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति कुशस्तम्बः सुरैः कृतः । तत्र क्रमेण वर्षाणि कीर्त्यन्ते सप्त वै मया ३०॥
बर्भू च वसुदानं च तथा दृढरुचिं शुभम् । नाभिगुप्तं तथा सत्यव्रतं विविक्तमत्तमम् ॥३१॥
वामदेवं सप्तमं च वर्षं ज्ञेयं क्रमेण हि । मस्कुल्या मधुकुल्या मित्रविंदा नदी शुभा ॥३२॥
श्रुतिविंदा देवगर्भा तथा चैव धूतच्युता । मंत्रमाला क्रमाद्य नद्यः सप्तसु वै क्रमात् ॥३३॥
वतुःशृङ्गः कपिलाश्चित्रकूटो मनोरमः । देहानीक ऊर्ध्वरोमा द्रविणश्चक्र ईरितः ॥३४॥
एते सीमासु वर्षाणां गिरयः सप्त वै क्रमात् । एतेषु सप्तवर्षेषु मन्त्रितान्वार्थिवोनभान् । ३५॥
राघवः समरे जित्वा लब्ध्वा चानुत्तमं यशः । कुशद्वीपपतिं जित्वा महासेनं तुतोष सः । ३६॥
अष्टलक्षमितं तीर्त्वा घृतोदं सागश्रोत्तमम् । क्रौञ्चद्वीपं ययौ रामः पुष्पकेणातिभास्वता । ३७।
कुशद्वीपाच्च स ज्ञेयो द्विगुणो द्वीप उत्तमः । द्वीपाख्याकृच्च यत्रास्ति क्रौञ्चनामा गिरिर्महान् । ३८॥
यत्रोपास्योऽस्मयो देवो हविष्मद्वीपवासिनाम् । तत्रापि सप्त वर्षाणि कथ्यंतेऽथ क्रमेण हि ॥३९॥
शामं मधुरूहं मेघपृष्ठं चैव मनोहरम् । सुभ्रमानं च भ्राजिष्ठ लोहिताणं वनस्पतिम् ॥४०॥
युक्त था। इसीलिए वह देश शल्मली द्वीपके नामसे विख्यात था वहाँ चन्द्रदेव सब के आराध्य देवता हैं और वहाँके निवासी चन्द्रमाकी ही उपासना करते हैं। पीछे जिन द्वीपोंका जो विस्तार कह आये हैं, उन्हींके अनुसार यह भी विस्तृत था, वहाँके जो देश हैं, अब उनको बतलाता हूँ ॥ २१ ॥ २२ ॥ मेरुके पूर्व ओरसे लेकर क्रमशः सब देशोंका नाम कहूँगा। जैसे—सुलोचन, सौमनस्य, रम्यक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात ये सात देश उस द्वीपमें हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ वहाँपर अनुमती, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नन्दा और राका ये नदियाँ हैं ॥ २५ ॥ शतशृङ्ग, वामदेव, कुन्द, कुमुद, पुष्पवर्ष, सहस्रश्रुति और स्वरस ये उस देशके सात पर्वत हैं जो उसकी सीमाका काम कर रहे हैं। इन सातों देशोंके राजाओंको रामने जीत लिया ॥ २६ ॥ २७ ॥ इसके अनन्तर उस द्वीपके अधीश्वरको जीतकर चार लाख योजनके लगभग लम्बे-चौड़े सुरोदसमुद्रको लाँघकर वे सुबाहुके पास पहुँचे ॥ २८ ॥ फिर क्षणमात्रमें राम आठ लाख योजन विस्तृत समुद्रको लांघकर कुशद्वीप गये । उस द्वीपके समस्त निवासी अग्निके उपासक हैं ॥ २९ । द्वीपके नामका स्पष्ट करनेके लिए वहाँपर एक कुशका जंगल देवताओं द्वारा लगाया हुआ है। अब वहाँके जो सात देश हैं, उनको बतलाते हैं— ३० । बभ्रु, वसुदान, दृढरुचि, नाभिगुप्त, सत्यव्रत, विविक्त और सातवाँ वामदेव नामक देश हैं। उन सातों देशोंमें मस्कुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतिविन्दा, देवगर्भा, धूतच्युता तथा मन्त्रमाला ये सात नदियां हैं, बभ्रु शृङ्ग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊर्ध्वरोमा, द्रविण और चक्र ये सात पर्वत उस द्वीपमें हैं ॥ ३१-३४ ॥ इन सातों देशोंके राजाओंको रामने जीतकर कुशद्वीपके अधिपति महासेन नामक राजाको उन्होंने जीत लिया। इससे रामको प्रसन्नता हुई । ३५ ॥ ३६ ॥ फिर आठ लाख योजन विशाल घृतोद सागरको पार करके वे अपने देदीप्यमान पुष्पक विमान द्वारा क्रौञ्चद्वीप गये ॥ ३७ ॥ कुशद्वीपकी अपेक्षा यह द्वीप दूना लम्बा-चौड़ा है। वहाँ उस द्वीपका नाम सार्थक करनेके लिये एक विशाल क्रौञ्च पर्वत है ॥ ३८ ॥ वहाँके समस्त निवासी वरुणके उपासक हैं और विष्णुभगवान्
[४३८ आनन्दरामायणे [सर्गः ९
एतानि सप्त रूपाणि कृतवानुरुशक्तिभिः । वर्धमानो भोजनश्च तथोद्बर्हणो महान् ॥४१॥
नन्दश्च नन्दनश्चैव सर्वतोभद्र एव च । शुक्लाभ्रभाश्चलाः प्रोक्ता मण्डलायुः परन्तः शुभाः ॥४२॥
अमृता अमृतौघा च तथा वैरम्भिरामथा । ज्योतिष्मती रम्या वृष्टिरूपवती तथा ॥४३॥
पवित्रवन्ता सुपुण्या द्वे शुकोक्तं मत्र कीर्तिताः । सप्तद्वैपेषु नद्यश्च स्नानात्पातकनाशनाः ॥४४॥
एतेषु सप्तवर्षेषु पार्थिवेभ्यो निजं प्रभु । कन्यारत्नं मुदाऽऽच्छाद्य तैः सर्वैः परिपूजितः ॥४५॥
क्रौञ्चद्वीपपतिं युद्धे जित्वा तु शङ्खलोचनम् । हयकुञ्जररथतुरगं कोषाद्यैस्तेन पूजितः ॥४६॥
स्तुतो मागधवृन्दैश्च नितरां मुदमाप सः । ततस्तीर्त्वा तु क्षीरोदं क्रौञ्चद्वीपसमं मुदा ॥४७॥
शाकद्वीपं ययौ रामो द्वात्रिंशल्लक्षममितम् । द्वीपरूप्याक्रुञ्चयत्रास्ति शाकवृक्षोऽतिरङ्गनः॥४८॥
यत्रोपास्यो वायुरूपी हरिनिरुद्धापनाभिमान् । तत्रापि सप्त वर्षाणि कथ्यंते पूर्वजन्मना ॥४९॥
पुरोजवं नाम वर्षं तथा तच्च मनोजवम् । पवमानं महच्छुद्धं धूम्रानीकं मनो मयम् ॥५०॥
बहुरूपं चित्ररूपं विद्याधारं तथा स्मृतम् । एवं सप्तसु वर्षेषु नद्यश्चापि ब्रवीम्यहम् ॥५१॥
अनघा च तथाऽऽयुर्दा चोभयसृष्टिश्च वै तथाऽपराजिता पुण्या शुभा पञ्चपदी स्मृता ॥५२॥
सहस्रश्रुतिरन्या सा प्रोक्ता निजवृत्तित्तथा । एव सप्तसु वर्षेषु सप्त नद्यः शुभानहाः ॥५३॥
उरुशृङ्गो बलभद्रस्तथाऽन्यः शतकेसरः । सहस्रस्रोतोऽन्य प्रोक्तो देवपालो महानमः ॥५४॥
ईशानाः पर्वताः सप्त सीमाम्ध्येते प्रकीर्तिताः । एवं सप्तसु वर्षेषु तत्र तत्र नृपोत्तमैः ॥५५॥
पूजितो रघुनाथः स शाकद्वीपपतिं रणे । सुन्दरारव्यं नृपं युद्धे सप्ताहोभिर्महाबलम् ॥५६॥
जित्वा स्पृ जनस्तेन वादयाम स दुन्दुभीम् । तीर्त्वा तं दधिमण्डोदं द्वात्रिंशल्लक्षसस्मितम् ॥५७॥
चतुःषष्टिलक्षमितं पुष्करद्वीपमाययौ । मेखलावत्तस्य मध्ये पर्वत चक्रपोपमम् ॥५८॥
मानसोत्तराचलाख्यं तं ददर्श रघूद्वहः । द्वे वर्षे तत्र वै प्रोक्ते पूर्वं रमणकं शुभम् ॥५९॥
वह्निके देवता हैं । उस द्वीपमें भी बड़े-बड़े सात देश हैं । उन बनतांन है—॥३९॥ आम्र, मधुष्ट, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, व्यतिहाय और वनस्पति । ४०॥ ये सा कौंचद्वीपके सात देश हैं वर्धमान, भोजन, उपवर्हण, नन्द नन्दन, सर्वतोभद्र और शुक्ल ये सात स्थिर रहने वाले शोभन इस द्वीपको घेरे हुए हैं । ४१ ॥ ४२ ॥ अमृता, अमृतौघा, आरंभा, सुवर्णा, वृष्टिरूपवती, पवित्रवती और पुण्या ये पवित्र नदियां उन सातो देशामें बहती हैं। जिनम स्नान करनस समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ इन सातों देशोंके राजाओंसे रामनं कन्या-रत्नोंको प्राप्त किया और उन राजाओंने रामकी पूजा की ॥ ४५ । तत्पश्चात् रामने क्रौञ्चद्वीपके अधीशमको संग्रामभूमिमें परास्त किया और उनपर प्रसन्न होकर, घोड़े, रथ, ऊंट आदिका उपहार पाकर पूजित हुए ॥ ४६ ॥ स्तुतिपाठकजनोंके द्वारा कीर्तिगायन सुनकर रामचन्द्रजी परम प्रसन्न हुए इसके बाद क्षीरोदनामक समुद्रको पार करके क्रौञ्चद्वीपके समान ही बत्तीस लाख योजनक लगभग विस्तृत शाकद्वीपमें गये। जहाँपर द्वीपके नामकी भाँति वटवृक्षके समान बहुत बड़ा ही सुन्दर शाकवृक्ष है । ४७-४८ ॥ वहाँपर वायुरूप धारण करनवाले विष्णुभगवान्के उपासक रहते हैं । उस द्वीपके जो सात देश हैं, उनको कह रहा हूँ ॥ ४९ ॥ पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररूप, बहुरूप और विद्याधार ये ही सात देश हैं। अनघा, आयुर्दा, उभयसृष्टि, अपराजिता, पञ्चपदी, सहस्रश्रुति तथा निजवृत्ति ये नदियाँ उन सातो देशामें बहती हैं। उरुशृङ्ग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल, महानस और ईशान ये सात पर्वत इन देशोंकी सीमापर स्थित हैं। उन सातों देशोंके राजाओंने रामका पूजाकी और सुन्दर नामक महाबली अर्द्धस्वरयसे उन्होंने सात दिन पर्यन्त युद्ध करके हरा दिया ॥ ५०-५६ ॥ इसके बाद उसन भी रामकी पूजा की । रामके इस मनुष्यसे प्रसन्न होकर देवताओंने दुन्दुभी बजायी । तत्पश्चात् बत्तीस लाख योजन विस्तृत दधिमण्डोद नामक समुद्रको पार करके चौसठ लाख योजन विस्तृत पुष्करद्वीपमें पहुंचे, जिसके मध्यमे मेखलाके समान मानसोत्तर
सर्गः ९ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) २३९
अपरं तद्गतञ्चैतत्स्वरूपान्नं ते कङ्कणोपमम् तद्वर्षपौ नृपौ जित्वा ततो द्वीपेश्वरं नृपम् ॥ ६०॥
उत्तराङ्गाह्वयं रामः परां मुदमवाप सः । ददर्श पुष्करं तत्र द्वीपसंज्ञाकारकं वरम् ॥६१॥
कमलासनम्य यज्ज्ञेयं ब्रह्मणः परमासनम् तत्र कूर्म्ममयं लिंगं ब्रह्मलिंगं जनोऽर्चयत् ॥६२।
वर्षयोर्बहुला नद्यः पापहन्त्रीरुनत्तमाः दशलक्षप्रमानेन प्रागुत्तंगः स पर्वतः ॥६३॥
तस्मिन् गिरी पूर्वभागे पुरी मद्यवतः शुभा । देवभाविति नाम्ना सा मनोज्ञा ज्वलनप्रभा ॥६४॥
गिरीतस्मिन् दक्षिणस्यां दिशि संयमनी पुरी। यमराज्ञस्य सा ज्ञेया मनोज्ञा ज्वलनप्रभा ॥६५॥
पश्चिमे वरुणस्याथ पुरी निम्लोचनी स्मृता । उत्तरस्यां तु कौबेरी पुरी ख्याता विभावरी ॥६६।
भिन्नाः पुर्य्यस्तिस्रो ज्ञेया मेरुश्याभ्यः शुभावहाः यथा नृपस्य स्थानानि ह्यनेकानि महीनिभाः ॥
सर्व्वे सीमापर्वतास्ते विस्तीर्णाश्च पृथक स्मृताः । द्विसहस्रैर्योजनैश्च प्राञ्चस्तां ते वदाम्यहम् ॥६८॥
सर्व्वेषां दशलक्षैश्चयोजनैः प्रोच्यते, नृप । उत्सर्गा वां तु शुद्धोदं पुष्करद्वीपममितम् ॥६९॥
सीतायाः कौतुकार्थं हि स जगाम ०धुजमः । उद्गगं व्याहलोकान्तस्त्यानां नृणामपि ॥७०॥
ततोऽग्रे भूमिं सार्द्धमसलक्षोत्तरमर्ककोटि ( १५७५०००० ) परिमितां कंचिन्न प्राप्तिसहितां रघुनन्दनो ददर्श । ७१। तैः सर्वभूमिभिनिवासिभिः सुपूजितो रघुनन्दनो मैथिलीरंजनार्थमग्रे जगाम ॥ ७२ ॥ मेरुमन्दारोन्त्यसमपञ्चशताधिकं सार्द्धकोटि ( १५७५००० ) योजनपरिमितं मेरुमान-मान्गवलयान्तरंगले भन्न ज्ञात्वेयम् ॥७३ । ततोऽग्रे आदर्ष तापनां काञ्चनीं भूमं देवैर्यधिष्ठितां चैकोनचत्वारिंशल्लक्षोत्तरकोट्यष्ट ( ८३९००००० परिमिमां दृष्ट्वा देवैः संपूजितः श्रीरामचन्द्रो मुदमवाप ॥ ७४ ॥ ततोऽग्रे लोकालोकपर्वतं सार्द्धद्वादशकाट ( १२५०००००० ) परिमितं विस्ती-र्णावत्तया भूमिप्राकारोपमं केनाप्यनलङ्घयं स रघुनन्दनो ददर्श ॥ ७५ ॥ यस्मिंश्चतसृदिषु द्विरदप-तयः ऋषभः पुंडरीकः पुष्पदन्तः कुमुदो वामनः पृषदन्तःउपराजितः सुप्रतीक इत्यष्टौ दिग्गजाः
पर्वत विद्यमान है, उसे रामने देखा । उस द्वीपका प्रथम देश — पहला मण्डल देश और दूसरा घातकी ये दोनों देश उस द्वीपके कङ्कणके समान । रामने उन देशोके राजाओ तथा पुष्करद्वीपके स्वामी उत्तराङ्गको जीत लिया, जिससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । इसके अनन्तर उस द्वीपके नामको सार्थक करनेवाले पुष्कर सरोवरको देखा ॥ ५७-६१ ॥ कमलका एक मात्र आसन है। यहाँपर कूर्ममय ब्रह्माकी मूर्त्तिका लोग पूजते हैं ॥ ६२ ॥ उन दोनों देशों में बहुत-सी पाप हरनेसमर्थ बहुत-सी नदियाँ बहती हैं। यह पर्वत दस हजार योजनके लगभग ऊंचा है। इसके पूर्व भागपर इन्द्रकी देववतीपुरी है। पश्चिम ओर वरुणकी निम्लोचनी नामकी पुरी । ... ... उत्तरमें कुबेरकी कुबेरीपुरी है ॥ ६३-६६ ॥ मेरु पर्वतपर इन्द्रादिकोंका जो पुरी ... ... ... स्थान वह है। जैसे राजाके एक देशमें अनेक स्थान होते हैं, उसी तरह इनके विषयमें भी जानना चाहिये ॥ ६७-६८ ॥ सबवे सब आपसमें जितने सीमापर्वत हैं। वे सब अलग-अलग दो हजार योजन ऊंचे हैं। इस तरह सब मिलाकर दस हजार योजन उनकी उंचाई है। इसके बाद रामचन्द्रजी शुद्धोद समुद्रको पार करके सीताके कौतुक या यह कहिये कि उस द्वीपके निवासियांको अपने दर्शन देनेके लिये आगे बढे ॥ ६९-७० ॥ डेढ करोड अडतालीस लाख योजन विस्तृत भूभाग ऐसा है कि जिसको रघुनन्दन श्रीरामजीने देखा ॥ ७१ ॥ वहाँके निवासिगण सीतारामकी पूजा की और ये लोग आगे बढ गये ॥ ७२ ॥ मेरु और मानसलोचनाके बीचमें डेढ करोड साढे सात लाख एकचालीस हजार योजन परिमित अन्तरकाल है इसके अनन्तर दर्पणके शीशेके समान चमकती कांचनमयी भूमि देखी जहाँ कि देवता लोग रहते हैं। जिसका विस्तार आठ करोड़ उनतालीस लाख योजन है। वहाँके भी निवासियोने रामकी पूजा की और वे प्रसन्न हुए । इसके अनन्तर साढ़े बारह करोड़ योजन परिमित विस्तीर्ण तथा ऊंचे लोकालोक नामक पर्वतको देखा, जिसे कि आजतक कोई नहीं लांघ सका है ॥ ७३-७५ ॥ जहाँकी
४९० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
सकलाकाशावस्थानहेतवः ॥ ७६ ॥ तस्मिन्नेव गिरिवरे भगवान् परममहापुरुषो महाविभूतिपतिः
सकललोकहिताय आस्ते । ७७ । ततः परस्ताद्योगेश्वराणां विशुद्धामुदाहरन्ति ॥ ७८ ॥ एव पञ्चा-
शत्कोटिगुणिता भूगोलोऽयं ज्ञेयः । ७९ ।। एवं पञ्चविंशतिकोटिमितां भूमिं लोकालोकमध्यवर्तिनीं
स रघुनन्दनः स्ववशां कृत्वाऽऽकाशपथा परिक्रम्य सर्वान् द्वीपान् पूर्ववत्पश्यन् जंबुद्वीपं भारत-
वर्षमध्यगतां स्वां राजधानीमोध्यां सप्तद्वीपेश्वरैः परिवेष्टितोऽनुययौ । ८० । ततो रामोऽयोध्या-
निकटं गत्वा दूतैः स्वागमनं सुमंत्रं सूचयामास । ८१ ।
समायातं रामचंद्रं श्रुत्वा स मंत्रिसत्तमः । अयोध्यां भूषयामास पताकाध्वजतोरणैः । ८२ ।
वारणेन्द्रं पुरस्कृत्य पौरैर्जानपदैः सह । प्रत्युद्गम्य रामचन्द्रं नत्वाऽयोध्यां निनाय सः । ८३ ।
तदा निनेंदुर्वाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः । तुष्टुवुर्मार्गधाद्याश्च नटा गानं प्रचक्रिरे । ८४॥
रामागमनमाकर्ण्य पौरनार्यः सुलंकृताः । प्रासादाजिरमारूढा ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । ८५॥
राजद्वारं विमानेन शनैः स रघुनन्दनः । गृह्णन् पौरौपायनानि स्त्रीभिर्नीराजितः पथि ॥ ८६॥
ययौ यानादवरुह्य सभायां निज आयतः । तस्थौ समन्ततः सर्वैर्नृपैश्च परिवेष्टितः । ८७॥
दत्त्वा स्थलानि सर्वेषां वस्तुमाज्ञाप्य लक्ष्मणम् । दक्षिणाद्यादि सम्पाद्य कृतकार्यममन्यत ॥८८॥
आत्मानं सकलान्पृथ्वीस्थितान् जित्वा समुद्धतान् । ततस्तैः सप्तद्वीपस्थैः पार्थिवैः परिपूजितः ॥८९॥
रामः स्वभ्रातरं विप्रेर्मंत्रं भारताधिपम् । चकार पार्थिवैर्युक्तं लक्षणानुमतेन सः ॥ ९०॥
आदावेव वसिष्ठेन ह्युक्तं भरतनाम तत् । विचिंत्येदं भावि वृत्तं जातकर्मणि निश्चितम् । ९१॥
पूर्वमाज्ञापितं स्वाप्तसेवकं भरतस्य च । रक्षणे तं रामचन्द्रः कार्यान्तरमकल्पयत् । ९२॥
चारों दिशाओंमें ऋषभ, पुण्डरीक, पुष्करचूड, कुमुद, वामन, मुखदन्त, अपराजित और सुप्रतीक ये सभी
लोकोंको अपने सिरपर धारण करनेवाले आठ दिग्गज विद्यमान हैं । ७६ । उसी पर्वतके ऊपर परममहा-
पुरुष और महाविभूतिपति भगवान् समस्त संसारके हितकी कामनामे वास करते हैं ॥ ७७ । इसके आगे
विशुद्ध योगेश्वरोकी ही गति है, ऐसा लोग कहते हैं ॥ ७८ ॥ इस प्रकार सब मिलाकर पचास करोडगुना
विस्तृत भूगोल है उनमेंसे पचीसको अपने वशमे करके राम आकाशमार्गसे लौटकर सम्विक विविध द्वीपो-
को देखते हुए जम्बूद्वीपके भारतवर्षमध्य अयोध्या नामकी अपनी राजधानीमे सातो द्वीपोके राजाओोके साथ
वापस आये ।७९-८१। अयोध्याके समीप पहुँचकर रामने एक दूत द्वारा सुमन्त्रको अपने आगमनकी सूचना दी ।
सुमंत्रने रामका आगमन सुना तो पताका, ध्वजा तथा तोरणादिकसे अयोध्याको सज्जित करवाया । ८२ ॥
फिर एक बडे भारी हाथीको आगे करके पुरवासी लोगोंके साथ रामके समक्ष पहुंच और उन्हें प्रणाम करके
अयोध्या लाये ॥ ८३ । उस समय अनेक प्रकारके बजे बाजे अप्सराएं नाचीं गायकोने गाने गाये और
बन्दीजनोंने स्तुति की । ८४ । रामका आगमन सुनकर अयोध्याकी स्त्रियां भांति-भांतिके वस्त्राभरण पहनकर
अपने कोठोंपर चढ गयीं और वहाँसे फूलोंका वर्षा करने लगीं । ८५ । रामचन्द्रजी धीरे-धीरे पुरवासियोंकी
भेटें स्वीकार करते हुए पुष्पक विमान द्वारा अपने राजद्वारपर पहुंचे। रास्तेम स्त्रियोने रामकी आरती
उतारी ॥ ८६ ॥ राजद्वारपर पहुंच ता पुष्पक विमानसे उतरकर सभाभवनमें गये और अपने सिंहासनपर
बैठे । उनके साथ जो राजा आये थे, वे भी सिंहासनके चारो ओर बैठ गये ॥ ८७ ॥ इसके अनन्तर
सब मेहमानोंको ठहरनेके लिए स्थान बतलानेके निमित्त लक्ष्मणसे कहकर राम दक्षिणाद्यादि कार्योंमें
लग गये, इस प्रकार पृथ्वीपर रहनेवाले उद्दण्ड राजाओका परास्त करके रामने अपनेको कृतकृत्य समझा।
इसके अनन्तर उन सातो द्वीपके राजाओने फिरसे रामकी पूजा की ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ तदनन्तर लक्ष्मणसे
सलाह लेकर रामने भरतको भारतवर्षका अधिपति बना दिया ॥ ९० ॥ इस भावी बातको सोचकर ही
वसिष्ठने भरतका नाम भरत रक्खा था ॥ ९१॥ पहले जिस सेवकको रामचन्द्रजीने भरत देशकी रक्षाके