श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् १९७
सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् १९७
प्रोक्तं गोत्रादिभिर्लिङ्गैर्वर्तते चेद्वदस्व माम् । इति शंभुः पितुर्दुःखं श्रुत्वा मूर्छां जगाम ह ॥२१६॥
आश्वासितश्च भिल्लेन विप्रः प्रोवाच तं पुनः । भो भोः कर्पटिकश्रेष्ठ न ममोऽस्ति नरोऽधमः ॥२१७॥
यस्त्वया पृच्छ्यते शम्भुः सोऽहं विद्धि न संशयः । मया पुत्रेण न कृतं स्वपितुर्मुक्तिदायकम् ॥२१८॥
जन्नदानादिकं कृत्यं विधिषङ्गेमेऽयं वृथा भवः । इदानीं तव वाक्येन दास्याम्यत्र मया पितुः ॥२१९॥
एवं शम्भुः कर्पटिकाय चोक्तवाऽयोध्यां रम्यां दृष्ट्वे वै ददर्श ।
ते प्रणेमुर्जनां दम्पतीर्थाथभिल्लास्ततः शंभुश्चावदन्कर्पशं सः ॥२२०॥
शंभुरुवाच
पश्य पश्य महाप्राज्ञ मद्यायोध्यापुरीं शुभाम् । यस्यां स्नातुं समयाता दृश्यन्ते कोटिशो जनाः ॥२२१॥
जनीघानां ध्वनिरियं श्रूयते मेघशब्दवत् । नानाध्वजपताकाश्च दृश्यन्ते चेन्द्रचापवत् ॥२२२॥
यद्वा वाय्वग्निहोत्रस्य श्रूयते हि मनोहरः अग्रिहोत्रात्रिधूमैर्यन्त्यामं पश्य नभोऽङ्गणम् ।
कैलासगिरिसङ्काशानि पश्य सौधानि सर्वशः ॥२-३॥
| सरप्रतीकौपरिखावलयीकृतमेखलाम् । | सुबृहद्धर्म्यां विलसत्पताकाशतसंकुलाम् ॥२२४॥ |
| अभ्रंलिहमहापीतसुवर्णकलशोज्ज्वलाम् । | पश्यैषां पाद्यपूर्णां श्रेष्ठा मयपूरीरनादिताम् ॥२२५॥ |
| हाटकाद्याटिता रत्नखचितैर्वा कपाटर्कैः । | सुसंवृतैर्निवृतैः संसर्पिसर्पणीव लक्ष्यते ॥२२६॥ |
| दीधूयमानैररुना पताकांचलपुस्तैः । | आह्वयन्तीव पुरतो लक्ष्यन्ते पथिकान् जनान् ॥२२७॥ |
| अधःकृताधोभुवना जेतुमेकामरावतीम् । | प्रासादशलव्याजेन मन्वद्रैवाथ लक्ष्यते ॥२२८॥ |
| पवित्रे ऽस्मिन्महाक्षेत्रे निवसन्ति निरोगिताः । | ब्रह्मेशबर्हगादिः मरुद्गणास्ते कायगोपकाः ॥२२९॥ |
| कुबेरस्पर्द्धया यत्र चिन्वन्ति वसुमन्यवान् । | दानु मोक्तुं जनाः सर्वे स्वधर्मनिरताः सदा ॥२३०॥ |
| गेहे गेहे सदानन्द एवार्याद्यत्र वै पुरि । | पेषां प्रक्षालयन्ति स्म चरणान्नवापवादिकाः ॥२३१॥ |
इस तरह अपने पिताका वृत्तान्त सुनकर शम्भु मूच्छिर्त हो गया । २१६-२१५ । उसकी यह दशा देखकर उस भील और ब्राह्मणने उसे बहुत कुछ आश्वासन दिया । होशमें आकर शम्भुने कहा- हे कर्पटिकश्रेष्ठ ! जिस शम्भुके बारेमें आप पूछ रहे हैं, वह मैं ही हूँ । मेरे बराबर अधम और कोई नहीं हो सकता । मुझ अधम पुत्रने अपने पिताको मुक्ति के लिए कुछ भी अनुष्ठान नहीं किया । मेरे जन्मपर धिक्कार है; मैं अब आपके कथनानुसार इस तीर्थस्थान में अवश्य अन्नदान दूँगा । २१६ - २१७ - २१८ ॥ २१९ ॥ ऐसा कहकर शम्भु चल पड़ा और रम्य अयोध्या नगरीको दूरसे देखकर उस गृहस्थ, उक्त पथिक एवं भीलने प्रणाम किया और शम्भुने पथिकसे कहा - हे महाविज्ञ, इस अयोध्यापुरीको देखो जिसमें स्नान करनेके लिए करोड़ों मनुष्य आये हुए हैं ॥ २२० ॥ २२१ ॥ महान् जनसमुदायका ध्वनि मेघगर्जनके समान सुनायी दे रही है। उड़ती हुई विविध प्रकारकी पताकायें इन्द्रधनुषके समान देख पड़ रही हैं, अग्निहोत्री मनोहर ध्वनि सुनायी देती है। अग्निहोत्रके धूमसे सारा आकाक्षमण्डल भर गया है। हे हर्यक्ष ! यहाँ कैलासशिखरके समान उज्ज्वल और ऊँचा अट्टलिकायें दीख रही हैं । २२२ - २२३ । दीपों अटालियों और परिखाओंसे सारी नगरी घिरी हुई है। ऊँचे ऊँचे भवन बने हैं और उनपर सैकड़ों पताकायें फहरा रही हैं। आकाशको छूनेवाले बड़े बड़े भवनोंपर सुवर्णके कलशोंसे मयं अयोध्यापुरी शोभित हो रही है। सोने, चाँदीके और मणियोंसे मण्डित दरवाजोंसे भरा नगरी उनके खुलने और बन्द होनेपर ऐसा लगता है कि वह खल्क खींच छोड़ रही है। पताकाओंके अंचल चालन द्वारा उसपर ज्ञात होता है कि यह नगर दूर हाल में पथिकोंको बुला रहा है ॥ २२४-२२७ । इस नगरीने अपनी शोभासे पाताललोकको भी नीचा दिखा दिया है। अब केवल अमरावती पुरीको जीतना बाकी है। सो ऐसा लगता है कि प्रासादरूपी शुण्डको लिये हुए यह पूरी इंद्री श्री जीतनेकी तैयारी कर रही है। इस पुनीत क्षेत्रमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवके साथ-साथ सब देवता और ऋषि गुप्तरूपसे निवास करते हैं । २२८ । २२९ ॥ यहाँके निवासी कुबेरको मातनेके लिए और दान तथा त्यागके सामने सर्वदा बद्धीर रहते हैं ॥ २३० ॥ इसी पुरीमें
३९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११
ते द्विजाः कस्य नो वन्द्या अयोध्यानागरीस्थिताः । औदार्ये कल्पतरवो गांभीर्ये सागरा इव ॥२३२॥
क्षमया क्षमया तुल्या जंगमा निगमा इव । दैन्यग्राहमहाग्रामाधिपामगस्त्यमहर्षयः ॥२३३॥
निवसंति द्विजा यत्र षड्धाः सर्वमहीभुजाम् । चतुर्वर्गफले पेत चतुरश्रममुज्ज्वलम् ॥२३४॥
चातुर्वर्ण्यमिहैवास्ते चतुरम्नायमाश्रगम् । कृमिकीटपतङ्गानां विना ज्ञानमयाभिभिः ॥२३५॥
अत्र निर्वाणपदवी सुलभाऽस्ति वनैचर । एतःपानघटान् भोक्तुं तरगान्कुश्यानिव ॥२३६॥
बिभर्ति धरणीतोयं निःश्रेणिर्योगमोक्षयोः । पश्य स्फाटिकसोपाननिविष्टमुनिसंस्तुताम् ॥२३७।
सरयूनदीमुत्तराशां कुतामिव पुरन्दरा । इन्द्रनीलमहातुंगप्रतोलीचारुदर्शनाः ॥२३८॥
रामचन्द्रस्य दिव्योऽयं प्रासादस्तुलितारुणः । प्रतोली यस्य घटिता काश्मीरुपलैर्वरैः ॥२३९॥
सीतायाश्च महानैष प्रासादो रत्नतोरणः । नानारत्नैर्मण्डितश्च हेमस्तंभविराजितः । २४०॥
स्फटिकैरुपलैश्चित्रः मण्यूटीरसंश्रितः । रामतीर्थसमीपेऽयं सीतारामस्य वै पर ॥२४१॥
प्रासादो विमलो भाति तप्तकांचननिर्मितः । पताकाभिविचित्राभिः कलशैः सुविराजितः ॥२४२॥
उभयंजांबनदरत्नकुम्भः प्रवालवैदूर्यनिबद्धभूमिः ।
हेमप्रतोलीरचितः स एष प्रासादवर्योऽस्ति हि लक्ष्मणस्य । २४३ ।
चातुर्यं यत्र विश्रान्तं सकलं विश्वकर्मणः । सोऽयं भरतराजस्य प्रासादो हेमतोरणः । २४४ ।
तथा देदीप्यमानोऽयं रत्नभित्तिविनिर्मितः । प्रसादो दृश्यते रम्यः शत्रुघ्नस्य शुभावहः ।२४५।
स्फटिकैर्भित्तिभिर्भित्तः प्रोच्चः कनकगेहिनः । प्रासादो वायुपुत्रस्य दृश्यतेऽयं महोज्ज्वलः, २४६।।
य एष मुक्ताफलजालशोभी सुदर्शनार्कः खगराजकेतुः ।
कुशस्य रम्यस्त्वयमाविरास्ते प्रासादकुग्म किमु बालसूर्यः । २४७।
सदा आनन्द छाया रहता है। जहाँके निवासी ब्राह्मणोंके पैर इन्द्रादि देवता भी धोया करते हैं, तब व भला किसके वन्दनीय न होंगे। यहाँके विप्र उदारताम कल्पवृक्ष, गम्भीरतामें समुद्र, क्षमामे पृथ्वी, जंगमोंमें वेद तथा दरिद्रतारूपी महान् समुद्रके शोषणम अगस्त्यके सदृश हैं। संसारके सब राज इनकी मस्तक झुकाकर प्रणाम करत है। इनको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पदार्थांमें किसकी भी कमी नहीं रहती। ये आनन्दके मध्य ब्रह्मचर्य, गृहस्थ वानप्रस्थ एवं संन्यास, इन चारो आश्रमोंका उपभोग करत है ॥ २३१-२३४ ॥ यहाँपर चारों वेदोंके अनुसार चार वर्णके लोग निवास करत हैं। हे वनचर यहाँ ज्ञान और समाधिके बिना ही कीट-पतङ्ग आदिकोके लिए भी मुक्ति सुलभ है। यहाँ पापरूपी घड़ोंका जल पीनेके लिए योग और मोक्षकी निसेनी बनकर सरयूका जल शोभित हो रहा है। देखो न स्फटिक मणिकी बनी सीढ़ियोंपर मुनिगण बैठै हुए स्तुति कर रहे हैं। अयोध्याका उत्तर दिशामे इन्द्रनीलमणिसे बने मार्गके समान सुन्दर सरयू नदी बह रहा है । २३५-२३८ ॥ यह रामचन्द्रजीका दिव्य और ऊँचा प्रासाद है, जिसमें ऊँच कंगूरे बने हुए हैं। इसके आस-पासके मार्ग कश्मीरीक पत्थरोंस बने हैं ॥ २३६ ॥ इस ओर सीताका महाभवन दिखाई पड़ता है। जिसमें रत्नके तोरण और सुवर्णके स्तम्भ लगे हुए हैं ॥ २४० ॥ जहाँ तहाँ स्फटिक मणिके पत्थर लगे हैं, जिससे यह चित्र-विचित्र मालूम पर रहा है। रामतीर्थके पास ही सीता-रामका एक दूसरा भवन सुवर्णसे बना है। उसमें भी विचित्र प्रकारकी पताकाएं लगी हैं और सुन्दर कलश सुशोभित हो रहे हैं ॥ २४१ ॥ २४२ ॥ जिसमें उभारे सुवर्ण तथा रत्नोंके कलश हैं सुन्दर प्रनाल और वैदूर्यमणिकी दीवारें बनी हैं। इसके भी आस पास सुवर्णके माग बने हैं। यह श्रीलक्ष्मणजीका भवन है ॥ २४३ ॥ वह सामनेका भवन जिसके बनानेमें विश्वकर्माकी सारी चातुरी समाप्त हो चुकी है, श्रीभरतजीका भवन है। इसमें भी सुवर्णके तोरण लगे हुए हैं ॥ २४४ ॥ रत्नोंसे बनी दीवारवाला यह रम्य प्रासाद शत्रुघ्नजीका है । २४५ ॥ चांदीका कोठा ओर स्फटिक मणिसे बनी दीवारका यह सुवर्णमय प्रासाद वायुपुत्र श्रीहनुमान्जीका है ॥ २४६ .