श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १३ ] मनोहरकाण्डम् ७०१
सर्गः १३ ] मनोहरकाण्डम् ७०१
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया । विभीषणाय रामेण प्रेम्णा दत्तं च यत्पुरा ॥ ४ ॥
कवचं कपिनाथस्य वायुपुत्रस्य धीमतः । गुह्यं तत्ते प्रवक्ष्यामि विशेषाच्छृणु सुन्दरि ॥ ५ ॥
उद्यदादित्यसंकाशमुद्दण्डभुजविक्रमम् । कन्दर्पकोटिलावण्यं सर्वविद्याविशारदम् ॥ ६ ॥
श्रीरामहृदयानन्दं भक्तकल्पमहीरुहम् । अभयं वरदं दोर्भ्यां कलये मारुतात्मजम् ॥ ७ ॥
हनुमानञ्जनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबलः । रामेष्टः फाल्गुनसखः पिंगाक्षोऽमितविक्रमः ॥ ८ ॥
उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः । लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा ॥ ९ ॥
एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः । स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत् ॥१०॥
तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत् । राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन ॥११॥
उल्लङ्घ्य सिन्धोः सलिलं सलीलं यः शोकवह्निं जनकात्मजायाः ।
आदाय तेनैव ददाह लङ्कां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम् ॥१२॥
ॐनमो हनुमते सर्वग्रहान् भूतभविष्यद्वर्तमानान् समीपस्थान् सर्वकालदुष्टबुद्धीनुच्चाटय
परबलान् क्षोभय मम सर्वकार्याणि साधय साधय ॐहां ह्रीं ह्रूं फट् । घे घे घे ॐभ्रिवसिद्धिं
ॐहां ॐह्रीं ॐह्रूं ॐहैं ॐहौं ॐह्रः स्वाहा । परकृतयन्त्रमन्त्रगदकवचभूतप्रेतपिशाचदृष्टिशिवविघ्न-
दुर्जनचेष्टाकुविद्यासर्वोपद्रवानि निवारयनिवारय बन्ध बन्ध लुठ लुठ विलुंध विलुंध किलि किलि किलि
सर्वकुयन्त्राणि दुष्टवाचं ॐफट् स्वाहा । ॐअस्य श्रीमद्हनुमत्कवचस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः ।
श्रीहनुमान् परमात्मा देवता । अनुष्टुप्छन्द । मारुतात्मज इति बीजम् । अञ्जनासूनुरिति शक्तिः ।
लक्ष्मणप्राणदातेति कीलकम् । रामदूत इत्यङ्गम् । हनुमान् देवता इति कवचम् । पिंगाक्षीऽमित-
विक्रम इति मन्त्रः । श्रीरामचन्द्रप्रेरणया रामचन्द्रप्रीत्यर्थं मम सकलकामनासिद्धयर्थं जपे विनि-
योगः । प्रथांगुलिन्यासः । ॐहां अञ्जनासुताय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐह्रीं रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐह्रूं रामदूताय मध्यमाभ्यां नमः ॐहैं वायुपुत्राय अनामिकाभ्यां नमः। ॐहौं आञ्जनेयाय कनिष्ठि-
काभ्यां नमः । ॐह्रः ममासनिवारणाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयाद्यङ्गन्यासं कृत्वा ।
अथ ध्यानम्
ध्यायेद्वालदिवाकरद्युतिनिभं देवारिदर्पापहं
श्रीमहादेवजीने कहा हे देवि ! मैं संसारकी कल्याणकामनासे तुम्हें वह हनुमत्कवच बतलाता हूँ, जिसे
रामने विभीषणको दिया था यद्यपि यह एक गुप्त वस्तु है, फिर भी मैं तुम्हें बतलाता हूँ। हे सुन्दरि !
सुनो ॥ ४ ॥ ५ ॥ उदयकालीन सूर्यके समान प्रकाशवान्, लम्बी भुजाओं और अनुपम पराक्रमवाले, करोड़ों
कामदेवके समान सुन्दर, सब विद्याओंमें विशारद, श्रीरामजीके हृदयको आनन्द देनेवाले, भक्तोंके लिए
कल्पवृक्षके समान भयरहित एवं वरदाता हनुमत्जीकी मैं हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ ॥ ६ ॥ ७ ॥
हनुमान्, अञ्जनीपुत्र, वायुसूनु, महाबलवान्, रामके प्रिय, अर्जुनके मित्र, पीली आंखोंवाले, अनन्तबल-
शाली, समुद्रको लांघनेवाले, सीताका शोक नष्ट करनेवाले, लक्ष्मणके प्राणदाता, रावणका अभिमान दूर करने-
वाले, इन बारह नामोंको जो मनुष्य सोते या जागते समय अथवा कहीं जाते समय पढ़ता है, उसे
कहीं किसी प्रकारका भय नहीं रह जाता और संग्राममें उसकी विजय होती है। राजद्वार,कन्दरा आदि किसी
भी स्थानमें उसे किसी प्रकारका भय नहीं रहता। जिसने समुद्रके जलराशिको खेल-खेलमें लांघकर सीताजीके
शोकरूपी आगको लेकर उसीसे सारी लंका जलाकर राख कर डाली, ऐसे हनुमन्जीको मैं हाथ जोड़कर
प्रणाम करता हूँ ॥ ८-१२॥ इस प्रकार प्रणाम करनेके अनन्तर 'ॐनमो हनुमते सर्वग्रहान्' यहाँसे लेकर
एवं 'हृदयाद्यङ्गन्यासं कृत्वा' तकके मन्त्रोंका उच्चारण करता हुआ विनियोग और अंगन्यास आदि करे । प्रातः-
| ७१० | आनन्दरामायणे | [ सर्ग १३ |
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देवेन्द्रप्रमुखं प्रशमयन्तं देदीप्यमानं रुचा ।
सुग्रीवादिममस्तवानरयुतं सुव्यक्ततत्त्वप्रियं
सक्ताहारणलोचनं पवनजं पीताम्बरालंकृतम् ॥ १ ॥
उद्यन्मार्तण्डकोटिकरुचियुतं चारुवीरासनस्थं
मौञ्जीयज्ञोपवीताभरणरुचिशिखं शोभितं कुण्डलांकम् ।
भक्तानामभीष्टदं तं प्रणतमुनिजनं वेदनादप्रमोदं
ध्यायेदेवंविधेयः प्लवगकुलपतिं गोष्पदीभूतवार्धिम् ॥ २ ॥
वज्रांगं पिंगकेशाख्यं स्वर्णकुण्डलमंडितम् । निगदमुपमगम्यं पारावारपराक्रमम् ॥ ३ ॥
स्फटिकामं स्वर्णकांतिं द्विभुजं च कृतांजलिम् । कुण्डलद्वयमंशोभि सुत्नांभोजं हरिं भजे ॥ ४ ॥
सव्यहस्ते गदायुक्तं वामहस्ते कमण्डलुम् । उद्यद्दक्षिणदोर्दण्डं हनुमंतं विचिंतयेत् ॥ ५ ॥
अथ मंत्रः
ॐ नमो हनुमते शोभिताननाय यशोऽलंकृताय अञ्जनीगर्भसम्भूताय रामलक्ष्मणानन्दाय कपिसैन्यप्रकाशनाय पर्वतोत्पाटनाय सुग्रीवसाहाय्यकारणायोच्चाटनाय कुमारब्रह्मचर्यगंभीरशब्दोदाय ह्रीं सर्वदुष्टग्रहनिवारणाय स्वाहा । ॐ नमो हनुमते एहि एहि एहि सर्वग्रहभूतानां शाकिनीडाकिनीनां विषमदुष्टानां सर्वेषामाकर्षयाकर्षय मर्दय मर्दय छेदय छेदय मन्मथान्मारय मारय शोषय शोषय प्रज्वल प्रज्वल भूतण्डलात्पिशाचमण्डलाद्विद्रावय भूतज्वरप्रेतज्वरचातुर्थिकज्वरब्रह्मराक्षसपिशाचछेदनक्रियाविष्णुज्वरमहेश्वरज्वरान् छिंधि छिंधि भिंधि भिंधि अक्षितले त्रिकोणयन्त्ररे क्षितितले गुल्मतले विद्रुतले नगरराक्षसकुलचवलनागदुलवेधनिंविषं झट ने प्रविशि ॐ ह्रीं फट् घे घे स्वाहा । ॐ नमो हनुमते पवनपुत्र वैश्वानरमुखवापहद्विहनुमते ॐ आम्राफुरे स्वाहा । स्वगृहे द्वारे पठूकं तिष्ठ तिष्ठति तत्र रोगभयं राजकुलभयं नास्ति तस्योच्चारणमात्रेण सर्वे ज्वरा नश्यन्ति । ॐ हां ह्रीं हूं फट् घे घे स्वाहा ।
कालके सूर्य सरीखा जिनका तेजस्वी स्वरूप है, जो राक्षसोंका अभिमान दूर करनेमें समर्थ हैं और जो देवताओंमें एक प्रमुख देवता माने उन हैं, जिनका प्रसन्न यश तीनों लोकमें फैला हुआ है । जो अपनी असाधारण शोभासे देदीप्यमान हो रहे हैं। सुग्रीव आदि बड़े बड़े वानर जिनके साथ हैं। जो सुव्यक्त तत्त्वके प्रेमी हैं। जिनकी आंख अतिशय लाल लाल है। पीले वस्त्रोंसे अलंकृत उस हनुमान्जीका मैं ध्यान करता हूँ ॥ १ ॥
उदय होते हुए करोड़ों सूर्यके समान जिनका प्रकाश है। जो सुन्दर वीरासनसे बैठे हुए हैं। जिनके शरीरमें मौञ्जी यज्ञोपवीत आदि पड़े हैं और उनकी किरणोंसे जो और भी शोभासम्पन्न दीख रहे हैं। जिनके कानोंमें पड़े हुए कुण्डल अपना मनोहर शोभा दिखा रहे हैं। भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले, मुनिजनान वन्दित, वेदके मंत्रोंकी ऋचा सुनकर प्रसन्न होनेवाले, वानरकुलके अग्रणी और समुद्रको गौके खुर भर जलवाला बना देनेवाले हनुमान्जीका ध्यान करना चाहिए ॥ २ ॥
वज्रके समान कठोर जिनका शरीर है, मस्तकपर पीला केश सुशोभित हो रहा है और कानोंमें सुवर्णके कुण्डल पड़े हैं, ऐसे हनुमान्जीका मैं अतिशय आग्रहके साथ ध्यान करता हूँ। क्योंकि उनके पराक्रमरूपा समुद्रकी कोई थाह नहीं है ॥ ३ ॥
स्फटिकमणिके समान अथवा सुवर्ण सरीखी जिनकी कान्ति है, दो भुजायें हैं, जो हाथ जोड़े खड़े हैं, दोनों कानोंमें पड़े हुए सुवर्णके कुण्डल सुशोभित हो रहे हैं ऐसे कमलके समान सुन्दर मुखवाले हनुमान्जीका मैं ध्यान करता हूँ ॥ ४ ॥
जिनको दाहिनी भुजामें गदा है, बाय हाथमें कमण्डलु है और जिनकी दाहिनी भुजा कुछ ऊपर उठी हुई है, ऐसे हनुमान्जीका ध्यान करना चाहिये ॥ ५ ॥
अथ मन्त्रः—"ॐ नमो हनुमते" यहाँसे लेकर 'हा, हा, हू, फट् घे घे स्वाहा" यहाँ तक हनुमत्कवचमन्त्र कहा गया है।
सर्गः १३ ] मनोहरकाण्डम् ७११
श्रीरामचन्द्र उवाच
हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः । पातु प्रतीच्यां रक्षोघ्नः पातु सागरपारगः ॥ १ ॥
उदीच्यामूर्ध्वतः पातु केसरीप्रियनन्दनः । अधस्तु विष्णुभक्तस्तु पातु मध्यं च पावनिः ॥ २ ॥
लङ्काविदाहकः पातु सर्वापद्भ्यो निरन्तरम् । सुग्रीवसचिवः पातु मस्तकं वायुनन्दनः ॥ ३ ॥
भालं पातु महावीरो भ्रुवोर्मध्ये निरन्तरम् । नेत्रे छायापहारी च पातु नः प्लवगेश्वरः ॥ ४ ॥
कपोलौ कर्णमूले च पातु श्रीरामकिङ्करः । नासाग्रमञ्जनीसूनुः पातु वक्त्रं दरास्यहृत् ॥
वाचं रुद्रप्रियः पातु जिह्वां पिङ्गललोचनः ॥ ५ ॥
पातु दन्तान् फाल्गुनेष्टश्चिबुकं दैत्यदर्पहा । पातु कण्ठं च रक्षोहा स्कन्धौ पातु सुरारिहा ॥ ६ ॥
भुजौ पातु महातेजाः करौ च चरणायुधः । नखान् नखायुधः पातु कुक्षी पातु कपीश्वरः ॥ ७ ॥
वक्षो मुद्रपहारी च पातु पार्श्वे भुजायुधः । लङ्काविभञ्जनः पातु पृष्ठं मे निरन्तरम् ॥ ८ ॥
नाभिं च रामदूतस्तु कटिं पात्वानिलात्मजः । गुह्यं पातु महाप्राज्ञो लिङ्गं पातु शिवप्रियः ॥ ९ ॥
ऊरू च जानुनी पातु लङ्काप्रासादभञ्जनः । जङ्घे पातु कपिश्रेष्ठो गुल्फौ पातु महाबलः ॥
अचलोद्धारकः पातु पादौ मर्कटलोचनः ॥ १० ॥
अङ्गान्यमितसत्त्वाढ्यः पातु पादाङ्गुलींस्तथा । सर्वाङ्गानि महावीरः पातु रोगाच्च सर्वदा ॥ ११ ॥
हनुमत्कवचं यस्तु पठेद्विद्वान्विचक्षणः । स एव पुरुषश्रेष्ठो भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ १२ ॥
त्रिकालमेककालं वा पठेन्मन्त्रमिमं सदा । सर्वान् रिपून क्षणाज्जित्वा सपुत्रान् श्रियमवाप्नुयात् ॥ १३ ॥
मध्यरात्रे जले स्थित्वा सप्तवारं पठेद्यदि । क्षयापस्मारकुष्ठादितापत्रयविनाशनम् ॥ १४ ॥
अब हनुमत्कवच प्रारम्भ होता है । श्रीरामचन्द्र बोले-हनुमान् पूर्व दिशाकी रक्षा करें, पवनात्मज दक्षिण दिशाकी रक्षा करें और रक्षोघ्न (राक्षसोंका नाश करनेवाले) नैऋत्य कोणकी पश्चिम दिशाकी रक्षा करें । १ । समुद्रको पार करनेवाले हनुमान्जी उत्तर दिशाकी रक्षा करें, केसरीप्रियनन्दन ऊर्ध्व भागकी, विष्णुभक्त अधो भागकी रक्षा करें, पवननन्दन मध्यभागकी रक्षा करें । २ । सब प्रकारकी आपत्तियोंसे लङ्काको जलानेवाले रक्षा करें, सुग्रीवके मन्त्री मस्तककी रक्षा करें, वायुनन्दन मस्तककी रक्षा करें, महाबल महाभागकी भालकी रक्षा करें, छायाका अपहरण करनेवाले दृष्टिफलकी रक्षा करें । ४ ॥ कपोलोंकी श्रीरामके दास रक्षा करें, श्रीरामचन्द्रजीके सेवक कानके मूल भागकी रक्षा करें, नासिकाके अग्रभागका अञ्जनीसूनु रक्षा करें, मुखपर मुखकी रक्षा करें ॥ ५ ॥ रुद्रप्रिय वाक्यकी रक्षा करें, पिङ्गललोचन जिह्वाकी रक्षा करें, अर्जुनके मित्र श्रीहनुमान्जी चिबुकभागकी रक्षा करें, दंतोंकी रक्षा करें, राक्षसोंका नाश करें, चरणसे आयुधका काम लेनेवाले हाथोंकी रक्षा करें, नखके आयुध धारण करनेवाले नखोंकी रक्षा करें, कपियोंके ईश्वर कुक्षिकी रक्षा करें ॥ ६ ॥ ७ ॥ मुद्रिका अपहरण करनेवाले हृदयकी रक्षा करें, भुजाओं ही शस्त्रका काम लेने-वाले पार्श्वभागकी रक्षा करें, लङ्काका विनाश करनेवाले मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ ८ ॥ रामके दूत नाभिभाग-की रक्षा करें, वायुके पुत्र कटिभागकी रक्षा करें, महाबुद्धिमान्जी गुह्यभागकी रक्षा करें शिवके प्रिय लिंगकी रक्षा करें ॥ ९ ॥ लंकाके प्रासादोंका नाश करनेवाले दोनों तथा जानुभागकी रक्षा करें, कपिश्रेष्ठ जंघेकी रक्षा करें, महाबलवान् गुल्फभागकी रक्षा करें ॥ १० ॥ पर्वतोंको उठानेवाले मेरे दोनों पैरोंकी रक्षा करें, सूर्यके समान कपिराज श्री हनुमान्जी मेरे समस्त अंगोंकी रक्षा करें, अमित बलवान् हनुमान्जी मेरे पैरकी अंगुलि-योंकी रक्षा करें, महाशूरवीर मेरे सब अङ्गोंकी रक्षा करें, ज्ञानाग्नि जलनेवाले हनुमन्जी मेरे शरीरको समस्त रोगोंसे रक्षा करें ॥ ११ ॥ जो भी विद्वान् विद्वान् इस हनुमत्कवचका पाठ करता है, वही सब पुरुषोंमें श्रेष्ठ होता है और सारी मुक्ति-मुक्ति सबको मिलती है ॥ १२ ॥ जो मनुष्य तीनों काल अथवा एक ही कालमें इस हनुमत्कवचका पाठ करता है, वह सब शत्रुओंको पराजित करके अतुल लक्ष्मीका भंडार प्राप्त करता है ॥ १३ ॥ यदि आधी रातके समय जलमें खड़ा होकर सात बार इस कवचको पाठ करे तो क्षय, अपस्मार, कुष्ठ एवं दैहिक, दैविक और भौतिक ये तीनों प्रकारके ताप दूर हो जाते हैं ॥ १४ ॥
७१२ आनन्दरामायणे [ सर्ग १३
अश्वत्थमूलेऽर्कवारे स्थित्वा पठति यः पुमान् । अचलां श्रियमाप्नोति संग्रामे विजयं तथा ॥१५॥
बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोगताम् । सुदृढ्यं वाक्यपुष्टत्वं च हनुमत्स्मरणाद्भवेत् ॥१६॥
मारणं वैरिणां सद्यः शरणं सर्वसम्पदाम् । शोकस्य हरणे दक्षं वन्दे तं रणदारुणम् ॥१७॥
लिखित्वा पूजयेद्यस्तु सर्वत्र विजयी भवेत् । यः करे धारयेन्नित्यं स पुमान् श्रियमाप्नुयात् ॥१८॥
स्थित्वा तु बन्धने यस्तु जपं कारयति द्विजैः । तत्क्षणात्मुक्तिमाप्नोति निगडात् तथैव च ॥१९॥
ईश्वर उवाच
माणिक्योद्भासपादद्वितययुगलं कौपीनमौञ्जीधरं काञ्चीश्रेणिधरं दुकूलवसनं यज्ञोपवीताजिनम् ।
हस्ताभ्यां धृतपुस्तकं च विलसद्धारावलिं कुण्डले वक्षस्थलं विस्तीर्णं प्रसन्नवदनं श्रीवायुपुत्रं भजे ॥२०॥
यो वारांनिधिमल्पपल्वलमिवोल्लङ्घ्य प्रतापान्वितो वैदेहीघनशोकनापहरणो वैकुण्ठभक्तप्रियः ।
अक्षायोजितराक्षसेन्द्रमदहा रणे सोऽयं वानरपुङ्गवोऽवतु सदा योऽस्मान् समीरात्मजः ॥२१॥
वज्रांगं पिंगनेत्रं कनककनकमलत्कुण्डलाक्रान्तगण्डं
दम्भोलीस्तंभसारं प्रहरणमुखरीभूत रक्षोधिनाथम् !
उद्यल्लांगूलसप्तप्रचलचलधरं भीममूर्तिं कपीन्द्रं
ध्यायेत्तं रामचन्द्रं अमरवरकरं सञ्चसारं प्रसन्नम् ।२२।
वज्रांगं पिंगनेत्रं कनककमलम्-कुण्डलै शोभनीयं
सर्वाधीशंय दिनाथं करतलत्रिधृतं पूर्णकुम्भं दृढं वा ।
भक्तानामिष्टकारं विदधति च सदा सुप्रसन्नं हरीशं
त्रैलोक्यत्रातुकामं सकलभुवि गतं रामदूतं नमामि ॥२३॥
जो मनुष्य रविवारको पीपलके नीचे बैठकर इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसे अचल लक्ष्मी प्राप्त होती है और वह विजयी होता है । १५ ।
बुद्धि, बल, यश, धैर्य निर्भीकत्व, अरोगिता, दृढता और वाक्यचापल्य, ये सब हनुमान्जीके ध्यानसे प्राप्त हो सकते हैं ॥ १६ ॥
जो सब वैरियोंको मारनेवाले और सब संपत्तियोंके निदान हैं, जो शोकका अपहरण करनेमें अतिशय कुशल हैं, मैं उन रणदारुण हनुमान्जीको प्रणाम करता हूँ ॥ १७ ॥
जो मनुष्य लिखकर इस कवचका पूजन करता है, वह सर्वत्र विजयी होता है और जो अपनी भुजाओंमें हमेशा बाँधे रहता है, उसे लक्ष्मी प्राप्त होती है ॥ १८ ॥
यदि प्राणी किसी तरह बन्धनमें पड़ गया हो, वह ब्राह्मणों द्वारा इस कवचका जप कराये तो तत्क्षण बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥
शिवजी बोले—सूर्य और चन्द्रमाके समान शोभासम्पन्न जिनके चरणकमल हैं, जो कौपीन और मौञ्जी धारण किये हैं, जो कांची श्रेणियों को पहने हैं, वस्त्र धारण किये हैं यज्ञोपवीत तथा मृगचर्म अलग सुशोभित रहा है, जो हाथमें पुस्तक लिये हैं और चमकता हुआ हार जिनके वक्षस्थलपर सुशोभित हो रहा है ऐसे प्रसन्न मुखवाले वायुपुत्रको मैं प्रणाम करता हूँ ।
जो समुद्रको एक साधारण तलैया समझकर लाँघ गए, जिन्होंने सीताके महाशोक और तापको हर लिया, विष्णु भगवान्को भक्तिके प्रेमी, संग्राममें अक्षयकुमार आदि उद्दण्ड राक्षसोंके दर्पको दूर करनेवाले वानर पुंगव तथा वायुके पुत्र हनुमान् हमारी रक्षा करें।
जिनका वज्रके समान शरीर है, पीली-पीली आँखें हैं, सुवर्णमय कुंडलोंसे जिनका कपोलभाग भरा हुआ है, वज्रके स्तंभके समान जिनका मजबूत शरीर है, रावणका मारनेके लिए जिन्हें तुरन्त शस्त्र मिल गया था, उन पूंछ ऊपर उठाये सात पर्वतोंको लादे और भयङ्कर रूपधारी हनुमान्जीका ध्यान करना चाहिये । साथ ही उन श्रीरामचन्द्रजीका भी ध्यान करना उचित है, जो सब सत्त्वोंके सार हैं और सदा प्रसन्न रहते हैं । २०–२२ ॥
वज्रके समान कठिन जिनकी देह है सुवर्णके कुंडल जिनके कानों में पड़े हैं, जो सब आभूषणोंके स्वामी हैं, जिन्होंने अपनी हथेली में पूर्णकुम्भको धारण कर रक्खा है, जो भक्तोंकी कामना पूर्ण करते हैं, जो सर्वदा प्रसन्न रहते हैं और तीनों लोकोंकी रक्षा करनेकी कामना रखते हैं, समस्त भुवनमें