श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः २ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९५
सर्गः २ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९५
अस्माकं कल्पितं किंचिदसमस्तमथवा न वा ।
चिंतायुक्तोऽस्ति वा तूष्णीं संस्थितोऽन्यच्च किं कृतम् ॥३६॥
बहिः संपादितं सर्वं मया यद्यन्न याचितम् । रहः स्थितः सुवैर्दृष्ट्वा शीघ्रं त्वं याहि मां पुनः ॥३७॥
इत्येवमुक्त्वा मुनिं शिष्यः स ययौ रामसद्गृहम्। तत्र दृष्ट्वा कल्पवृक्षपारिजातौ सनिर्जरौ । ३८।
सनिर्जरेशं रामं च मुदितं सीतयाऽन्वितम् । ततस्तूर्णं ययौ शिष्यः परावृत्य मुनिं प्रति ॥३९॥
कथयामास सकलं यदाश्चर्यं निरीक्षितम् । तच्छ्रुत्वा शिष्यवचनं दुर्वासा विस्मयान्वितः । ४०॥
ययौ शिष्यैः परिवृतो विवेश नृपतेर्गृहम् । तं मुनिं राघवो दृष्ट्वा प्रत्युद्गम्य पुनः सुरैः ॥४१॥
नमस्कृत्य मुहुर्वेगाद्ददावासनमुत्तमम् । ततो मुनेः पूजनं स सशिष्यस्य रघूत्तमः ॥४२॥
चकार सीतया सार्द्धं लक्ष्मणारिभिरन्वितः । पारिजातप्रसूनानि नेक्षितान्यत्र मानवैः ॥४३॥
ददौ शंभोः पूजनार्थं रामो दुर्वाससे तदा । तानि दृष्ट्वा मुनिस्तूर्णं वैष्णवेश्वरार्चनम् ॥४४॥
ततः सर्वान्मुरानाहूय परिवेषणकर्मणि । चोदयामास श्रीरामो जानकीं लक्ष्मणेन सः ॥४५॥
तत सा जानकी वेगाद्दिव्यालंकारमण्डिता । कल्पवृक्षपारिजातौ सम्पूज्य नूपुरस्वना ॥४६॥
पात्राणि कल्पवृक्षाधः स्थापयामास कोटिशः । सीता तं प्रार्थयामास कल्पवृक्षं नगोत्तमम् ॥४७॥
क्षीरसागर्सम्भूत देवानां विहितप्रद । दुर्वाससे कल्पवृक्ष सशिष्याय च तोषय ॥४८॥
तन्मतान्यन्नं भूत्वा हेमपात्राणि कोटिशः । विविधैः पूरयामास क्षणात्कल्पतरुस्तदा ॥४९॥
तैरन्नैर्हेमपात्रेषु जानकी परिवेषणम् । शुश्रूषूञ्चकार मुहुः सुर्मिलाचंपिकादिभिः ॥५०॥
ततस्तुष्टो मुनिश्रेष्ठः शिष्यैरशनमादरात् । चकार रघुप्रीरेण प्रार्थितः स मुहुर्मुहुः ॥५१॥
ततः कृत्वा भोजनं हि कराशुद्धिं विधाय सः । तांबूलं दक्षिणां चापि ज्याह रघुनायकात् । ५२।
आसनपर जा बैठे ॥ ३४ ॥ उधर उत्सुक चित्त से दुर्वासाने अपना एक शिष्य भेजा और उससे कहा- "तुम जाकर देखो कि, राम इस समय क्या कर रहे हैं ॥ ३५ ॥ मैंने जो जो बतलाया था, उसमें कुछ अन्न तैयार है या नहीं । अथवा अभी तक चिंतामग्न हुए यूं ही चुपचाप बैठे हैं, ३६ ॥ यदि मेरे आज्ञानुसार काम कर रहे हैं तो अबतक क्या-क्या किया है। मैंने जैसा कहा था, वे सब चीजें इन्होंने इकट्ठी कर लीं या नहीं। कहीं छिपकर चुपचाप वह सब देखो और शीघ्र मेरे पास लौट आओ" । ३७ । "अच्छा" कहकर शिष्य रामचन्द्रजीके भवनमें जा पहुंचा। वहां कल्पवृक्ष, परिजात, इन्द्र, देवताओंकी मण्डली एवं प्रसन्न राम तथा सीताको देखकर फिर दुर्वासा मुनिके पास लौट गया और जैसा देखा था, सब समाचार कह सुनाया। शिष्यकी बात सुनकर दुर्वासाको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३८-४० ॥ इसके बाद शिष्योंको साथ लेकर वे रामचन्द्रजीके सुन्दर भवनमें पहुंचे । मुनि दुर्वासाको देख देवताओंके साथ उठकर रामचन्द्रजीने बड़े आदरके साथ समस्त शिष्यों समेत मुनिको प्रणाम किया और बैठनेके लिये उत्तम आसन देकर सीता तथा लक्ष्मणादिके साथ उनकी पूजा की। मत्र्यगण पारिजातके फूल नहीं देख पे ॥ ४१-४३ ॥ सो उन फूलोंको शिवपूजनके निमित्त मुनिके सामने रखा । दुर्वासाने उन्हें एक बार विस्मित नेत्रोंसे देखा और तुरताव शिव तथा सब देवताओंका पूजन किया ॥ ४४ ॥ इसके अनन्तर सम्यक्प्रकार से लक्ष्मण और जानकीको भोजन परोसनेकी आज्ञा दी ॥ ४५ ॥ तब दिव्यालंकारोंको धारण किये सीताने कल्पवृक्ष और पारिजातका पूजन करके करोड़ों बर्तन लाकर उनके नीचे रख दिया और इस प्रकार प्रार्थना करने लगी-॥ ४६ ४७ ॥ "हे क्षीरसागरसे जायमान तथा देवताओंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्ष ! आज शिष्यो समेत दुर्वास को आप सन्तुष्ट कर दीजिए" । ४८ । सीताकी प्रार्थना सुनकर क्षणभरमें कल्पवृक्षने करोड़ों पात्रोंको विविध प्रकारका बाञ्छतान्नपियोंसे भर दिया । उन अन्नोंको उर्मिलादिके साथ सीताने सुवर्णके पात्रोंमें परोसा और महर्षि दुर्वासा ने प्रसन्न होकर अपने समस्त शिष्योंके साथ रामचन्द्रजीके द्वारा प्रार्थित होनेपर भोजन करना आरम्भ किया ॥ ४९-५१ ॥ भोजन करनेके बाद उन्होंने
| ३९६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २ |
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ततः सुराणां पुरतो वेदवाक्यैः सविस्तरम् । दुर्वासा राघवं स्तुत्वा तमाहाऽऽनन्दनिर्भरः ॥५३॥
राम राजीवपत्राक्ष त्वं साक्षाज्जगदीश्वरः । अत्र रावणनाशार्थमवतीर्णोऽसि भूतले ॥५४॥
जनांस्त्वत्पौरुषं ज्ञातुं मयैतद्याचितं तव । विना गोवृद्धिमणिभिर्द्विजान्ने रघुनन्दन ॥५५॥
प्रभूतान्यन्नपात्राणि सान्नैर्व्यजनैस्तले । किं राम दुर्घटं तत्र यस्य भूभङ्गमात्रतः ॥५६॥
लयो ब्रह्मादिदेवानां जायते सम्भवोऽपि च । मन्दरं मज्जमानं तु दृष्ट्वा त्वं क्षीरसागरे । ५७ ।
कूर्म्मरूपेण जातोऽसि धर्तुं तु मन्दराचलम् । निष्कासितानि रत्नानि तदा देवैश्चतुर्दश ॥५८॥
तत्र साहाय्यमात्रेण सर्वं जानन्त्यहं प्रभो । लक्ष्मीः सोमः कामधेनुः कौस्तुभश्च सुधा विषम् । ५९ ॥
ऐरावतश्चाप्सरसः कल्पवृक्षो भिषग्वरः । उच्चैःश्रवाः पारिजातो सुरा ज्येष्ठेति राघवः । ६० ॥
चतुर्दश सुरत्नानि विभक्तानि पुरा त्वया । देवेभ्यो यानि तान्येते भोक्ष्यन्ति कृपया तव ॥६१॥
त्वदाज्ञापालिनः सर्वे शङ्कराद्याश्च निर्जराः । सर्वेषां जीवनोपायस्त्वयैव सर्वं पृथक् पृथक् ॥६२॥
कल्पिता येन रामेण तत्र किं दुर्घटं तव । ममाभिलषितं भोज्यं दातुं त्वत्कौतुकं मया ॥६३॥
अद्यावलोकितं राम जनानाग्रे प्रदर्शितम् । त्वं पाता सर्वलोकानां जनकोऽपि पालकः ॥६४॥
अस्माकं मतिदानाञ्च ये क्षमस्वाऽपराधिनम् । एवं नानाविधं स्तुत्वा तं प्रणम्य पुनः पुनः ॥६५॥
राममामन्त्र्य दुर्वासा ययौ शिष्यैः स्वाश्रमम् । अथ तान्निर्जरान् प्राह रामः कनकलोचनः ॥६६॥
कल्पवृक्षपारिजातौ गृहीत्वा सम्पदं दिवम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा बृहस्पतिः प्राह राघवम् ॥६७॥
यावत्कालं निवासाऽत्र भूम्यां तावन्नयात्मनः । अयोध्यायां विमुक्तस्तौ कल्पवृक्षसुहृत्तमौ ॥६८॥
त्वाय वैकुण्ठमायाने दिवं तौ यास्यतो ध्रुवम् । तथेति तमुद्गुरुं प्रोतिनद वचः प्रभुः ॥६९॥
हाथ पाया और राक्षस ताम्बूल दीजियेगा ॥ ५३ ॥ फिर उन देवताओंके सामने ही वेदवाक्यों द्वारा विस्तारपूर्वक रामचन्द्रजीकी स्तुति की और अत्यन्त प्रसन्न होकर कहने लगे ॥ ५४ ॥ हे राम हे कमलदल सदृश नेत्रवाले भगवन् ! मैं जानता हूँ कि तुम साक्षात् जगदीश्वर हो और रावणका विनाश करनेके लिए इस धरातलपर आये हो ॥ ५५ ॥ केवल प्रजाको तुम्हारा पौरुष दिखलानेके लिए ही मैंने गौ-वृद्धि और मणिसे न सिद्ध हुआ अन्न तथा मनुष्योन् न्हीं अनेक प्रकारके विभिन्न भाँति भाँति हे राम ! तुम्हारे लिए यह कुछ दुर्घट कार्य नहीं है तुम्हारे भूभंग मात्र से ही ब्रह्मादिक देवताओंका संहार विनाश एवं उद्भव होता है। जिस समय मंदराचलका क्षीरसागरमें तुमने डूबते देखा ॥ ५५ । ५६ ॥ तब कूर्मरूप धरकर उसे अपनी पीठपर उठा लिया था । उस समय एकमात्र तुम्हारी सहायतासे ही देवताओंने क्षीरसागर से चौदह रत्न निकाले थे ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ जिनके नाम हैं—लक्ष्मी, चन्द्रमा कामधेनु, कौस्तुभ, सुधा, विष, ऐरावत, अप्सराएँ, कल्पवृक्ष, धन्वन्तरि, उच्चैःश्रवा, पारिजात, सुरा और मद्य ॥ ५९ ॥ ६० ॥ उन चौदहो रत्नोंको तुमने चौदह देवताओंको बाँट दिया और तुम्हारी ही कृपासे वे सब आनन्दपूर्वक उनका उपभोग कर रहे हैं ॥ ६१ ॥ शंकरादिक समस्त देवता तुम्हारी ही आज्ञाका पालन करते हैं। इस जगत् में स्थित सब प्राणियोंका जीवनका उपाय तुम्हीं करते हो ॥ ६२ ॥ तब यदि तुमने हमारे इच्छानुसार भोजनकी सामग्रियें जुटा दीं तो इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। यह तो तुमने इन साधारण अज्ञानी मनुष्योंको तुम्हारा कौतुक दिखलाया था, सो दिखा दिया । ६३ ॥ हे राम ! तुम्हीं समस्त लोकोंके रक्षक, स्रष्टा तथा संहारक ज्ञापक हो ॥ ६४ ॥ तुम्हीं हमारे गतिदाता हो । मुझसे जो कुछ त्रुटि हुई हो सो क्षमा कर दो । इस तरह नाना प्रकारके वाक्यों द्वारा स्तुति करके दुर्वासाने बारम्बार प्रणाम किया और रामचन्द्रजीकी आज्ञा लेकर सब शिष्योंको साथ लिये हुए अपने आश्रमको चल दिये । इसके अनन्तर रामचन्द्रजीने उन देवताओंसे कहा—कल्पवृक्ष और पारिजातको लेकर अब आप लोग भी अपने लोकको चले जायें । इस प्रकार रामकी बात सुनकर देवगुरु बृहस्पति कहने लगे ॥ ६५-६७ ॥ "जबतक आप भूमण्डलमें रहेंगे, तबतक कल्पवृक्ष तथा पारिजात ये दोनों भी इस अयोध्यामें ही रहेंगे ॥ ६८ ॥ जब आप अपने वैकुण्ठ लोकको जाने लगेंगे, तब ये भी आपके साथ चले
सर्गः ३ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९७
पुष्पके स्थापयामास कल्पवृक्षसुरद्रुमौ । ततस्ते राघवं नत्वा ययुरिन्द्रादिकाः सुराः ॥७०॥
स्वर्गलोकं सुसंतुष्टा राघवेणातिपूजिताः । एवं प्राप्तौ कल्पवृक्षपारिजातौ भुवं दिवः ॥७१॥
तयोरेतत्त्वकारणं ते प्रोक्तं पृष्टं यथा त्वया । तदारभ्य सुरतरू पुष्परथौ विरेजतुः ॥७२॥
साकेते सीतया रामस्ताभ्यां सुखमवाप सः । कल्पवृक्षतले दिव्यपर्यङ्के सीतया सह ॥७३॥
नानाभोगावाप्तचन्द्रः स बुभोज चिरं सुखम् । अतः पूर्वं मया रामध्यानं कल्पतरोः स्थले ॥७४॥
सहस्रनामसङ्केते प्रोक्तं शिष्य तवाग्रतः । तदारभ्य पारिजातवृक्षांशाः शतशो भुवि ॥७५॥
पारिजातनगा जाता वर्तन्तेऽद्यापि तेऽत्र हि । नानेन सदृशं पुष्प वर्तते रामतोषद्म् ॥७६॥
कल्पवृक्षांशरूपाश्च ज्ञातव्यास्तत्र मानवैः । अश्वत्थाः सेवनाद्यैश्च सर्ववाञ्छितदायकाः ॥७७॥
पुण्याधिक्येन सेवन्ते रोपेक्षन्ते शुभाश्रये । पापाधिक्येनापि सेवां नरा वाञ्छन्ति नो कलौ ॥७८॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे
चम्पिकास्वयंवरो नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
तृतीयः सर्गः
( रामोपासक तथा कृष्णोपासक का परस्पर मधुर विवाद )
विष्णुदास उवाच
रामदास गुरो भूपां रामकृष्णौ परौ भुवि । मया दशावतारेषु ह्यवतारवुभौ पुरा ॥ १ ॥
तयोरपि च कः श्रेष्ठस्तन्मे वद ममाग्रतः । यं श्रुत्वा सर्वदा दस्य श्रोष्येऽहं चरितं शुभम् ॥ २ ॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं विष्णुदास सावधानमनाः शृणु । रामावतारः श्रेष्ठोऽत्र विशेयः सर्वदा नरैः ॥ ३ ॥
अस्मिन्नर्थे पूर्ववृत्तां कथां शृणु मनोहराम् । द्विजाभ्यां वादरूपेण कीर्तितां पुण्यदायिकाम् ॥ ४ ॥
कार्यंत। रामने सुरगुरु बृहस्पतिकी बात स्वीकार कर ली ॥ ६९॥ देवताओने उन दोनोंको पुष्पक विमानमें रखकर भगवान्को प्रणाम किया और राम द्वारा पूजित होकर सब अपने अपने लोकको चल गये । ७० ॥ इस प्रकार कल्पवृक्ष और पारिजात स्वर्गसे मृत्युलोकमें आय , उनके आनेका जो कारण था, वह तुम्हारे प्रश्नानुसार मैंने कह सुनाया। तभीसे दोनों सुरतरु पुष्पकमे विराजमान रहे ॥ ७१ । ७२ ॥ अयोध्यामें सीताके साथ रामचन्द्रजी उन्हीं वृक्षोंके नीचे दिव्य पर्यङ्कपर कार विहार करत हुए विविध प्रकारके सुखोंको भोगते थे ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ इसलिए मैंने रामसहस्रनामक कथन करत समय कल्पवृक्षके नीचे रामका ध्यान करनेको कहा था। तभीसे पारिजातके सैकड़ो अंश पृथ्वीतलमें उत्पन्न हुए और वे आज भी इस धरातलमे विद्यमान हैं। इसके समान रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेवाला कोई दूसरा फूल नहीं है ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ कल्पवृक्षके अंशसे पीपल वृक्षकी भी उत्पत्ति हुई है उसकी आराधना करनेसे सब प्रकारका कामना पूर्ण होती है ॥ ७७ ॥ अन्य युगोंमें पुण्य अधिक था। इस कारण लोग पीपलके वृक्षकी आराधना करते थे। किन्तु कलियुगमे पापकी अधिकता होनेके कारण लोग उसका पूजन नहीं करना चाहत ७८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचितायां 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते राज्यकांडे पूर्वार्द्ध द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
विष्णुदासने कहा--हे गुरो ! भगवान्के दश अवतारोंम राम-कृष्ण दो अवतार श्रेष्ठ माने जाते हैं । यह मैंने बहुसे कई बार सुना है ॥ १ ॥ अब आप हमको यह बतलाइए कि इन दोनों अर्थात् राम और कृष्णमें कौन बड़ा है। जिसको आप श्रेष्ठ बतलायेंगे, मै सर्वदा उसीका चरित्र सुना करूँगा ॥ २ ॥ श्रीरामदासने कहा- हे विष्णुदास ! तुमने ठीक प्रश्न किया है सावधान मन होकर सुनो। इन दोनों अवतारोंमें मनुष्यको रामका अवतार ही श्रेष्ठ समझना चाहिए ॥ ३ ॥ इसके लिए एक मनोहर कथा आपसमें दो ब्राह्मणोंके
| ३९८ | आनन्दरामायण | [ सर्ग ३ |
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अयोध्याविषये कश्चिद्विजो रामाह्वयस्त्वभूत् । द्वारकायां तथा विप्रः कृष्णाख्योऽभूत्परः सुधीः ॥ ५ ॥
भक्त्या संसक्तौ चोभौ सर्वदा रामकृष्णयोः । तावेकदा माधवमासे प्रयागे मिलितौ द्विजौ ॥ ६ ॥
उभौ स्नात्वा त्रिवेण्यां हि माधवं परिपूज्य च । कथां पौराणिकमुखाच्छ्रोतुं तत्पुरः स्थितौ ॥ ७ ॥
शुश्रुतुः कथास्तत्र प्रसङ्गाद्राघवस्य च । रामाख्यो रामभक्तःस श्रुत्वा राघवसत्कथाम् ॥ ८ ॥
तुष्टस्तं पूजयामास मुदा पौराणिकं तदा । कृष्णाख्यः क्रोधसंयुक्तस्तदा वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
किं क्लेशिनोऽद्य रामस्य कथां श्रुत्वाऽतिहर्षितः ।
पूजितोऽपि वृथा व्यासस्त्वं मूढोऽसीति वेद्म्यहम् ॥ १० ॥
नान्यस्यैवं कस्यापि पावनं श्रुतिदोषहम् । यथा कृष्णस्य मे रम्यं नानाक्रोडापुरःसरम् ॥ ११ ॥
तत्कृष्णवचनं श्रुत्वा रामाख्यः प्राह सस्मितः ।
रामोपासक उवाच
रामः क्लेशी कथं प्रोक्तस्त्वया कृष्णः कथं सुखी ॥ १२ ॥
कथं कृष्णस्य ते रम्यं चरितं दुश्चिन्तापहम् । कथं रामस्य मे रम्यं चरितं नेरितं त्वया ॥ १३ ॥
वदाद्य विस्तरेणैव शृण्वन्त्वेते सभासदः ।
कृष्णोपासक उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया राम सावधानमनाः शृणु ॥ १४ ॥
वदामि राघवस्याथ कृष्णस्य चरितं महत् । क्लेशदं तोषदं नृणां शृण्वन्त्वेते सभासदः ॥ १५ ॥
तत्र रामस्य जन्मादौ जातः शापः पितुः पुरा । शापस्यादावपि पुरा तद्वेत्तो रावणेन हि ॥ १६ ॥
लंका वन्दितरौ नादौ प्रारम्भे दुःखमीदृशम् । मम कृष्णस्य जन्मादौ तद्विप्री-सौख्यदायकैः ॥ १७ ॥
विवाहमङ्गलैः कंसः पूजयामास सादरम् ।
विवादरूपां कही गयी थी। वह कथा परम पुण्यदायिता है, उस सुनो । १ एक समय अयोध्यामे राम नामका एक ब्राह्मण रहा करता था। उसी तरह द्वारकापुरीम कृष्ण नामका विद्वान् विप्र रहता था ॥ ५ ॥ वे दोनों सदा राम और कृष्णकी उपासना किया करते थे। एक समय माध म मेवे त्रिवेणी के तटपर उन दानोकी भेंट हुई ॥ ६ । उन्होंने त्रिवेणीम स्नान किया और वेणीमाधवकी पूजा करके दिशा करके एक पौराणिकके पास कथा सुननेकी इच्छासे जा बैठे ॥ ७ ॥ दानां कथा सुन रहे थे। उनम कही राघवका प्रसग आ गया। उसे सुनकर वह राम नामवाला ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और हर्षपूर्वक पौराणिकका भली भांति पूजा की। इससे कृष्ण नामवाला ब्राह्मण मार क्रोधके लाल हो गया और कहने लगा उत्सुका कष्ट देनवाले रामकी कथा सुनने-से तुम्हें क्या लाभ हुआ, जो तुम इतने प्रसन्न हुए और तुमने व्यासकी ऐसी पूजा की ? मेरी समझम तो यही आता है कि तुम बडे मूर्ख हो ॥ ८-१० ॥ मुझे तो और किसोका चरित्र इतना सुन्दर नहीं लगता, जितना श्रीकृष्णका। क्योंकि उस चरित्रमें त्रिविध प्रकारकी लीलाएं भरी हुई हैं ॥ ११ । कृष्ण नामक ब्राह्मणकी यह बात सुनकर रामोपासक मुसकाता हुआ कहने लगा कि तुमने रामचन्द्रको कैसे दुःखी बतलाया और कृष्णको सुखी ॥ १२ ॥ तुमने कृष्णचरित्रको कैसे पापनाशक बतलाया और रामचन्द्रजीका नाम लेना भी पसन्द नहीं किया। तुम इसे विस्तारपूर्वक कहो । जिससे ये सभासद भी सुनें। कृष्णोपासकन कहा-हे राम ! तुमने बहुत ठीक प्रश्न किया है। अब सावधान होकर सुनो ॥ १३ ॥ १४ ॥ मै रामचन्द्र तथा कृष्णचन्द्र इन दानोका चरित्र सुनाता हूँ। उनम रामचरित्र कैसा क्लेशप्रद और कृष्णचरित्र कितना सुखकर है, सो सब सभासद सुनते जायें ॥ १५ ॥ तुम्हारे रामके जन्मके पहले ही उनके पिताको श्रवणके पिताका शाप मिल चुका था। उसके भी पहले उनके माता-पिताको रावण अपनी लंकामे उड़ा ले गया था। इस प्रकार रामके जन्मके पहले उनके माता-पिताको
सर्गः ३] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ३०९
रामोपासक उवाच
रे रे शृणु त्वं दुर्बुद्धे न स शापो वरोऽर्पितः । १८॥
यत्प्रसादादपुत्रस्य नृपस्य तनयश्चतुः । तथा मद्रावमीत्या हौ नीतावपि विसर्जितौ ॥ १९॥
दशास्येन तत्पितरौ जन्मार्दो पौरुषं त्विदम् । तव कृष्णस्य जन्मादौ पित्रोः कारागृहस्थितिः ॥ २०॥
राजभोगनिषेधार्थं शापो यदुकुलाय च । जन्मापि बहिशालायां वियोगश्च तयोरपि ॥ २१॥
सहोदरवधश्चापि उद्वेगोर्मातुलेन हि । न बाहुजश्च वैश्यश्च यस्य तातावुभौ स्मृतौ ॥ २२॥
गोरक्षकस्य तनयः प्रवासः शैशवेऽपि च ।
परेण पोषितश्चापि कनीयान् बलभद्रतः । एव नानाविधं दुःखं तव कृष्णस्य नो सुखम् ॥ २३॥
कृष्णोपासक उवाच
आत्मार्थं तव रामेण त्राटिका स्त्री विदारिता । नार्थाद्विमोचितो बाणः पित्रोः खेदो वियोगतः ॥ २४॥
रामोपासक उवाच
द्विजघ्ना निहता दुष्टा मम रामेण ताटिका । मुनियज्ञरक्षणार्थं मुदा राज्ञाऽर्पितो शिशुः ॥ २५॥
तव कृष्णेन रक्षार्थमात्मनः पूतना हता । तथाऽऽत्मार्थं प्राणिहिंसा बहु तेन कृता ब्रजे ॥ २६॥
गोपैश्च सङ्गतिस्तस्य तथैव गोरक्षणम् । गोवधः सर्पघातश्च स्रगवाजिबधस्तथा ॥ २७॥
रासभवृषघातश्च चौर्यं द्यूतं वनेऽटनम् । कंबलाव्रणं शीतोपर्जन्योग्रप्रपीडनम् ॥ २८॥
क्षुत्तृड्भ्यां पीडनं नित्यं गोपालोच्छिष्टसेवनम् । आत्मार्थे याचितं चान्नं द्विजस्त्रीभ्यो वने मुहुः ॥ २९॥
इन्द्रध्वजपूजनं दिष्ट्वाचाप्रलोपनम् । परस्त्रीगमनं ज्येष्ठनारीभिः क्रीडनं चिरम् ॥ ३०॥
कितना क्लेश हुआ। इसके विपरीत हमारे कृष्णके जन्मके पहले कंसने उनके माता-पिताको वैवाहिक तथा मङ्गलमयी सामग्रियास पूजा की थी। रामोपासकने कहा— अरे दुर्बुद्धे ! वह रामचन्द्रके पिताको शाप नहीं, बल्कि वरदान मिला था। जिसके प्रभावस्वरूप निपुत्र महाराज दशरथके घरमें रामचन्द्रादि चार भाइयोका जन्म हुआ और हमारे मन्दराजके डरसे ही रावण उनके माता-पिताको ले जाकर भी अयोध्यामे लौटा गया था। १८-१९ ॥ जन्मके पहले ही मेरे रामचन्द्रजीमे इतना पौरुष था। तुम्हारे कृष्णके जन्मके प्रथम ही उनके माता-पिता कारागारमे बन्द थे। दूसरे यदुकुलको राजभोगनिषेधके निमित्त पहले ही शाप प्राप्त हो चुका था। उनका जन्म भी हुआ तो जेलखानेमे और वहा थोड़ी ही देरमे माता-पितासे वियोग हो गया। कृष्णके कितने ही सगे भाई मामाके द्वारा पहले ही मार डाले गये। उनको जो कृत्रिम माता-पिता मिले थे, वे न तो क्षत्रिय थे और न वैश्य ॥ २०-२२ ॥ तुम्हारे कृष्ण एक ग्वालेके लड़के बने। इस प्रकार वे शैशवावस्थामें ही प्रवासी हो गये। औरोन उनकी रक्षा की और तुम्हारे कृष्ण बलरामसे छोटे थे। इसीलिए कृष्णको अनेक प्रकार का दुःख मिला, सुख कुछ भी नहीं। २३ । कृष्णोपासक बोला—अपनी रक्षा करनेके लिए तुम्हारे रामने ताड़का नामवाली एक स्त्रीका वध किया और रामके वियोगसे उनके माता पिताको महान् क्लेश हुआ ॥ २४॥ रामोपासकने कहा— हमारे रामन ब्राह्मणांकी हत्या करनेवाली स्त्री ताड़काको मारा था और द्विज यज्ञरक्षाके लिए उन्हें पिता दशरथने प्रसन्नतापूर्वक मुनिके साथ भेजा था। २५। किन्तु तुम्हारे कृष्णने रक्षाके लिए पूतनाको मारा था। इसी प्रकार उन्होंने आत्मरक्षामे लिए ब्रजमे और भी बहुत सी प्राणिहिंसाएं की थीं ॥ २६॥ गोप-ग्वालोंका साथ था और वे गायोंकी ही रक्षा करते थे। उन्होंने गौ (धेनुकासुर) पक्षी (बकासुर) घोड़ा (केसी), रासभ तथा वृष आदिको मारा, चोरी की, जुआ खेले और वनोंमे इधर-उधर घूमत रहे। शीत वर्षा तथा आतपसे बचनेके लिए अपने ऊपर केवल एक कम्बल डाले रहते थे ॥ २७-२८ ॥ भूख-प्याससे दुखी होकर ग्वालोंका जूठन खाते थे अपने लिए उन्होंने वनमें ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंसे बार-बार अन्न माँगा। २९ ॥ इन्द्रध्वज-पूजन आदि वृद्धोंकी कुलपरम्परासे चलनवाली प्रथाका उन्होंने लोप किया। वे परस्त्रियोंके साथ घूमते
| १४० | आनन्दरामायणे | [ सर्ग ३ |
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नग्नस्त्रीदर्शनं वह्निप्राशनं दामबन्धनम् । उन्मूलनं च यमयोर्धूपर्युषितसेवनम् ॥३१॥
रोदनं नवनीतार्थं मृन्मात्रा प्रताडनम् । गोपोपिकासु चास्नेहः पूर्वस्थलविसर्जनम् ॥३२॥
कृता रजकहत्या च युद्धं क्षत्रियवत् कृतम् । गजहत्या मल्लहत्या युद्धं मातुलमर्दनम् ॥३३॥
नैष्ठुर्यमाप्तवर्गेषु राज्यप्राप्तिस्तथैव च । नृपाज्ञायतनं चापि क्रीडा दास्या कुरूपया ॥३४॥
युद्धात्पराजयाश्चापि रिपवे पृष्ठदर्शनम् । गिरौ दग्धः परैर्ज्ञातः स्वांयस्थलविमोचनम् ॥३५॥
अब्धितीरनिवासश्च परस्त्रीहरणं कृतम् । भौमासुरपरद्रव्यहरणं परखनूनतः ॥३६॥
स्वीयगोत्रवधार्थं हि पांडवाग्र्योपदेशितम् । स्तेनैः स्तेयापरोपाश्च वृक्षार्थं सङ्गरः सुरैः ॥३७॥
कृष्णोपासक उवाच
किं त्वं जल्पसि शृण्वद्य तव रामस्य कामिनः । कस्य सा दुहिता ब्रूहि कुतः स वर्णसङ्करः ॥३८॥
शिवचापस्य भङ्गेन शिवस्याप्यपराधितम् । जामदग्न्यमानभङ्गकरणं मुद्गलस्य च ॥३९॥
आज्ञां विना लक्ष्मणेन तदन्वयलटिताः शुभाः । सदारण्यचरः स्वार्थं पशुहिंसापरायणः ॥४०॥
वनाश्रमी वन्यजीवी मांसाहारी धनुर्धरः । व्याधकर्मरतः शीतपर्जन्योष्णप्रपीडितः ॥४१॥
पादगामी चर्मवासा जटावल्कलशाखवी । श्मश्रुधारी तरुच्छाय श्रयी पात्रविवर्जितः ॥४२॥
राक्षसेन हृता पत्नी तव रामस्य कानने । पत्न्यर्थं हि कृतः शोकस्तथा दास्या प्रपूजितः ॥४३॥
रामोपासक उवाच
शरेण मोचिता पत्नी कृता छायामयी पुरा । न सा दासी तु शबरी मुनिसेवनतत्परा ॥४४॥
और अपनेसे बड़ी स्त्रियोंके साथ खेलते फिरते थे। वे नङ्गी नारियोंको देखते थे। उन्होंने मिट्टी खायी और कितने ही बार तो लोगोंके जूठन तक खाये थे। रस्सीसे बाँधे गये तो यमल-अर्जुन नामके दो वृक्षोंको उखाड़ डाला ॥ ३० ॥ ३१ ॥ घोटसे माखनके लिए रोने लगते थे और माता यशोदाके द्वारा बार बार पीटे भी गये। अन्तमें अपनेसे अतिशय प्रेम रखनेवाली गोपिकाओंके प्रति निष्ठुरता करके उस पवित्र वृन्दाबनको छोड़ दिया ॥ ३२ ॥ मथुरामें रजककी हत्या की और (ग्वाले होकर ) क्षत्रियोंके समान युद्ध किया। उन्होंने गजहत्या और मल्लहत्या करक मामाकी भी हत्या की ॥ ३३ ॥ अपनोंके साथ निष्ठुराई करके उन्होंने राज पाया। फिर भी एक दूसरे राजाकी आज्ञामे बंधकर रहे । बादमे एक कुरूप दासीके साथ क्रीड़ा की ॥ ३४ ॥ युद्ध हुआ तो उसम पराजित होकर शत्रुको पीठ दिखायी और पर्वतपर जाकर छिपे। शत्रुओंने अपनी समझसे उन्हें जला ही दिया था। फिर अपन स्थान मथुराको छोड़कर समुद्रके किनारे जाकर रहन लगे। वहाँ भी बरबस बहुतेरी स्त्रियोंका हरण किया। भौमासुरके द्रव्योंका उन्हांने चुराया ॥ ३५ । ३६ ॥ अपन भाइयो तथा कुटुम्बियोंको मारनेके लिए पाण्डवोंको उपदेश दिया। लोगोंपर उन्ह स्यमन्तक मणिकी चोरी लगायी। एक वृक्षके लिए उन्होंने देवताओंके साथ संग्राम किया ॥ ३७ ॥ कृष्णोपासक बोला—क्या व्यर्थ बकवास करते हो, सुनो। आज मैं तुम्हारे कामी रामकी करनी तुम्हें सुनाता हूँ। बताओ, जिसको उन्होंने अपनी भार्या बनायी थी वह वर्णसंकर कन्या थी या नहीं ? ॥ ३८ ॥ शिवजीका धनुष तोड़ करके शिवका अपराध किया। परशुरामका मान भङ्ग किया। मुद्गलकी आज्ञाके बिना ही लक्ष्मण द्वारा उन्होंने लतायें तोड़ मंगवाईं। जङ्गलमे इधर-उधर घूमते हुए पेट भरनेके लिए पशुहिंसा करते थे ॥ ३९ ॥ ४० ॥ बहुत दिनों तक वनमें आश्रम बनाकर रहे। वनके फल-मूल तथा मांस खाने और धनुष धारण किये बहेलियाका काम करते रहे। सर्वदा बेचारे शीत-आतप तथा मेहके सताये रहते थे ॥ ४१ ॥ पैदल चलते, चमड़ा पहिनते, बड़े-बड़े नख तथा जटा-वल्कल धारण किये रहते थे। बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूँछ रखाये पेड़ोंकी छायामें रहकर समय बिताते थे। उनके पास एक पात्र भी नहीं रहता था कि जिसमे खा-पी सकें ॥ ४२ । वनमें उनकी स्त्रीको एक राक्षस चुरा ले गया। उसके लिए विविध प्रकारका विलाप करते रहे और उनकी पूजा एक दासी शबरीने की ॥ ४३ ॥ रामोपासकने