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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १० ] | सारकाण्डम् | ९९

सर्गः १० ]सारकाण्डम्९९

तेनैव किं पुनरसौ परिष्वङ्गतो रामेण वायुतनयः कृतपुण्यपुञ्जः ।३११॥
रामे स मारुतिः प्राह भीतभीतोऽतिकम्पितः मयाऽपराधितमिति मुद्रावृत्तं मुनेर्वचः ॥३१२॥
तच्छ्रुत्वा रामचन्द्रोऽपि विहस्योवाच मारुतिम् । मयैव दर्शितं मार्गे कौतुकं मुनिरूपिणा ॥३१३॥
त्वद्गर्वपरिहारार्थं मुद्रिकां मन्करे स्थिताम् । कनिष्ठिकायां त्वं पश्य समानीतां त्वयाद्य वै ॥३१४॥
तां राममुद्रिकां दृष्ट्वा श्रीरामस्य करांगुलौ । ननाम गतवर्गः स रामं विष्णुममन्यत ॥३१५॥
मय्यप्यस्यैव कृपया पौरुषं चेत्यमन्यत । एवं गिरीन्द्रजे प्रोक्तं चरित्रं सुंदरमभिधम् ॥३१६॥
रामार्थं वायुपुत्रेण कृतं सर्वार्थदायकम् ॥३१७॥

इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
सुन्दरचरित्रे सीताशुद्धिर्नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥


दशमः सर्गः

( राम-रावणसेनाका संघर्ष )

श्रीशिव उवाच

अथाह मारुतिं रामो मां वदस्व सविस्तरम् । लंकास्वरूपं ज्ञात्वा च प्रतीकारं करोम्यहम् ॥ १ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा कथयामास मारुतिः । लंका दिव्यपुरी देव त्रिकूटशिखरे स्थिता ॥ २ ॥
स्वर्णप्राकारसंविना स्वर्णाट्टालकमण्डना । परिखाभिः परिवृता पूर्णानिर्मलोदकैः ॥ ३ ॥
नानोपवनशोभाढ्या दिव्यवापीभिरावृता । गृहैर्विचित्रशोभाढ्यैर्मणिस्तंभमयैः शुभैः ॥ ४ ॥
पश्चिमद्वारमापाद्य गजारूढाः सहस्रशः । उत्तरद्वारे तिष्ठन्ति वाजिवाहाः सपत्तयः ॥ ५ ॥
दशकोटिमिता सेना विविधाद्युधमण्डिता । लंकायाः परितो व्याप्ता सत्तर्का रक्षते पुरीम् । ६ ॥


करके मनुष्यमात्र विष्णुके अनुपम पदको प्राप्त करता है। उन्हीं साक्षात् रामके द्वारा आलिङ्गित होकर वायुपुत्र हनुमान् यदि महान् पुण्यशाली बन जायें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ॥ ३११ ॥ तदनन्तर डरके मारे कांपते हुए मारुतिने रामसे अपना गर्वरूपी अपराध, मुद्रिकाका वृत्तान्त तथा मुनिका वचन कह सुनाया ॥ ३१२ । यह सुना तो रामचन्द्रने हंसकर कहा कि यह कौतुक मैने ही मार्गमें मुनिरूप वारण करके दिखलाया था ॥ ३१३ ॥ यह काम मैने तुम्हारे गर्वको छुड़ानेके लिये ही किया था। यह देखो, जिस मुद्रिकाको तुम ले आये थे, वह तो मेरे हाथकी कनिष्ठिका अंगुलीमें विद्यमान है ॥ ३१४ । रामके हाथमें रामकी अगूठो देखो तो गर्व छोड़कर हनुमान्ने नमस्कार किया और उन्हें साक्षात् विष्णु माना ॥ ३१५ ॥ और यह भी माना कि इन्हींकी कृपासे मुझमें भी पौरुष आ गया है। हे गिरीन्द्रजे ! रामके लिये वायुपुत्रके द्वारा किया हुआ सर्वार्थसाधक सुन्दर चरित्र मैने तुमको इस प्रकार कह सुनाया ॥ ३१६ ॥ ३१७॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे भाषाटीकायां सुन्दरचरित्रं सीताशुद्धिर्नाम नवम सर्गः ॥ ९ ॥

शिवजी बोले—हे पार्वती ! रामने मारुतिसे कहा—तुम हमको विस्तारसे लंकाका स्वरूप बताओ। लङ्काका स्वरूप जानकर मैं प्रतीकारका उपाय सोचूँगा ॥ १ ॥ रामकी बात सुनकर मारुतिने कहा—हे देव ! त्रिकूट पर्वतके शिखरपर बद्ध लङ्का नामकी दिव्य पुरी बसी हुई है ॥ २ ॥ उसके चारों ओर सोनेका गढ़ है तथा वह सोनेके अटारियोंवाले भवनोंसे सुशोभित है। निर्मल जलसे परिपूर्ण खाईसे वह नगरी घिरी हुई है ॥ ३ ॥ अनेकानेक उपवनोंसे सुन्दर, दिव्य बावलियोंसे आवृत तथा चित्र विचित्र शोभावाले मणियोंके खम्भोंवाले सुन्दर महलोंसे सजी हुई है ॥ ४ ॥ उसके पश्चिमी द्वारपर हजारों गजारूढ़ तथा अश्वारूढ सिपाही खड़े रहते हैं ॥ ५ ॥ दस करोड़ पैदल तथा सवार सैनिक विविध शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित होकर लङ्काका

१००आनन्दरामायणे[ सर्गः १०

नियुत्यर्बुदसंख्याना गजाश्चाश्वस्तथैव च । रक्षन्ति सदा लङ्कां नानामुखशराः प्रजाः ॥७॥
प्रकारैर्विविधैर्लङ्का शतघ्नीभिश्च संयुता । एवं स्थितायां देवेश शृणु त्वद्दासचेष्टितम् ॥८॥
दशाननबलांशस्य चतुर्थांशो मया हतः । दग्ध्वा लङ्कापुरीं स्वर्णप्राकारं धर्षितं मया ॥९॥
शतघ्न्यः संक्रमाश्चैव नाशिता मे रघूद्वह । देव त्वद्दर्शनादेव लङ्का भस्मीभवेत्पुनः ॥१०॥
सुवेलाद्रिश्चोत्तरेऽस्ति पतंगश्चाऽस्ति पश्चिमे । निकुम्भिला दक्षिणेऽस्ति तत्रास्ते योगिनीवटः ॥११॥
पूर्वे च लघुलङ्काऽस्ति सा मध्ये चातिशोभिता । त्रिकूटाद्रेश्चरे रम्ये मन्पुच्छानलधर्षिता ॥१२॥
प्रस्थानं कुरु देवेश गच्छामो लवणार्णवम् । तन्मारुतेर्वचः श्रुत्वा सुग्रीवं प्राह राघवः ॥१३॥
मृगांश्चमनिकान् सर्वान्प्रस्थानायाभिनोद्य । इदानीमेव विजयो मुहूर्त्तश्चाद्य वर्तते ॥१४॥
आश्विनी शुक्लदशमी श्रवणर्क्षसमन्विता । शुभाऽद्य वानरश्रेष्ठ गच्छामो लवणार्णवम् ॥१५॥
रक्षन्तु यूथपाः सेनामग्रे पृष्ठे च पार्श्वयोः । नलो भवेत्तथाऽग्रतः पृष्ठे नीलोऽथ रक्षतु ॥१६॥
सुषेणः सव्यपार्श्वे मे जांबवांस्तरे मम । गजो गवाक्षो गवयो मैदश्चैतेऽथ वानराः ॥१७॥
वह्निनेऋतिवायव्य ईशानदिक्षु समन्ततः । रक्षन्तु वानरीं सेनां द्विविदाद्यास्तथाऽपरे ॥१८॥
मदग्रे गच्छन्तु मवैत्र सेनायाः कुलघातिनः । आरुह्य मारुतिं चान्यद् गच्छत्यग्रतोऽङ्गदं सतः ॥१९॥
आरुह्य लक्ष्मणो यातु सुग्रीव त्वं मया सह । आगच्छध्वमिति चाज्ञाप्य ह्यांगदामः सलक्ष्मणः ॥२०॥
प्रतस्थे दक्षिणाशायां सेनामध्यगतो विभुः । तदा ते कपयश्चक्रुर्भुङ्कारान् भयानकान् ॥२१॥
वाद्यामासुर्वाद्यानि पञ्चवानकगोमुखैः । वारणेंद्रनिभाः सर्वे वानराः कामरूपिणः ॥२२॥
गतस्तदा दिवारात्रं क्वचित्सस्थुर्न ते क्षणम् । अभवञ्छुभशकुना लङ्कां गच्छतो राघवस्य हि ॥२३॥
ते सर्वं समतिक्रम्य मलयं च तथा गिरिम् । आययुश्चानुपूूर्व्येण ते सर्वे दक्षिणार्णवम् ॥२४॥

भागों पर पहरा कर रहे हैं ॥७॥ उसमें विविध सुरंगें लगी हैं और उसके गङ्गपर अनेक तोपें भी रखी हुई हैं । हे देवेश ! इस दशा में भी आपके इस दास ने वहाँ जाकर जो कुछ किया, सो सुनाइये॥७॥८॥ मैंने वहाँ जाकर रावणकी चौथाई सेना मार डाली है। लङ्कापुरीको जलाकर स्वर्णप्राकार गिरा दिया है ॥९॥ हे रघूद्वह मैंने तोप सदा संक्रम तोड डाली है। हे देव ! अब आपके नाममात्रसे ही लङ्का पुनः भस्म हो जायगी ॥१०॥ उस लङ्काके उत्तर सुवेलाद्रि है। पश्चिम पतंग है। दक्षिण निकुम्भिला है। जहाँपर योगिनीवट विद्यमान है। ११॥ पूर्वकी ओर लघु लंका है, जिसका मध्यभाग बड़ा ही रमणीक है। उस त्रिकूटके शिखरपर बसी हुई लङ्काको मैंने अपनी पूँछके आगसे जला दिया है ॥१२॥ हे देवेश ! अब आगे प्रस्थान करें, इस लाम क्षार समुद्रकी ओर चलें। मारुतिको बात सुनकर रामन सुग्रीवसे कहा-॥१३॥ हे सुग्रीव समस्त योनिकोको प्रस्थान करनेके लिए आज्ञा दे दो । आज इसी समय विजयप्राप्तिका शुभ मुहूर्त है ॥१४॥ आज श्रवणनक्षत्रसे युक्त आश्विन शुक्ल दशमीकी शुभ तिथि है। हे वानरश्रेष्ठ ! हमलोग आज लवणसागरकी ओर अवश्य प्रस्थान करें ॥१५॥ बड़े बड़े यूथपति वानर सेनाकी आगे पीछे और वागल रक्षा करें। आगे नल तथा पीछे नील रक्षा करे ॥१६॥ सुषेण मेरा बाई ओर तथा जाम्बवान् मेरी दहिनी बगलमें रहे। गज गवाक्ष, गवय और मैंद ये सब वानर अग्निकोण, नैऋत्यकोण वायव्यकोण तथा ईशानकोणमे रहकर वानरी सेनाकी चौतरफा रक्षा करें । शत्रुओंका मारमेमें निपुण द्विविद आदि वानर भी सेनाको सब ओरसे घेरकर चलें। मारुतिके कन्धेपर सवार होकर मैं आगे चलता हूँ और मेरे पीछे अंगदके कन्धेपर सवार होकर लक्ष्मण चलें। हे सुग्रीव ! तुम भी मेरे साथ चलो। इसी प्रकार अन्य सब वानरोंको 'चलो' ऐसी आज्ञा देकर लक्ष्मण सहित राम सेनाके बीच होकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये। उस समय वे वानर भयानक भूङ्कार करने लगे ॥१३-२१॥ वे ढोल, मृदंग तथा गौके मुख सदृश बाजे बजाने लगे । कामरूप धारण करनेवाले तथा श्रेष्ठ हाथियोंके समान वीर सब वानर क्षणभर भी विश्राम न करके चलने लगे। लंकाके लिए प्रस्थित रामको अच्छे-अच्छे शकुन दीख पड़े ॥२२॥२३॥ वे मलयपर्वत तथा

सर्गः १०] सारकाण्डम् १०१

कृतः सेनानिवेशश्च राघवेणार्धिमद्भुते । चक्रुर्मन्त्रं सागरस्य तरणार्थं प्लवङ्गमाः ॥२५॥
लङ्कायां वायुपुत्रेण कृतं दृष्ट्वा स रावणः । प्रहस्तादींस्तदा प्राह कथमग्रे भविष्यति ॥२६॥
एकेन कपिनाऽस्माकं पुरतो ज्वलिता पुरी । दृष्टा सीता वनं भग्नं राक्षसा निहता रणे ॥२७॥
ममातिलालितः पुत्रः कनीयानभितो रणे । तदा ते मन्त्रिणः सर्वे दुर्धर्षं दशाननम् ॥२८॥
राजन्नुपेक्षितोऽस्माभिर्मर्कटोऽयमिति स्फुटम् । वयं तवाज्ञया कुर्मो जगत् कृत्स्नमवानरम् ॥२९॥
कुम्भकर्णस्तदा प्राह रावणं राक्षसेश्वरम् । त्वया योग्यं कृतं नैतद्यद्धृता जानकी हृता ॥३०॥
यद्यप्यनुचितं कर्म त्वया कृतमजानता । सर्वं समं करिष्यामि स्वस्थचित्तो भव प्रभो ॥३१॥
देहि देव ममानुज्ञां हत्वा रामं सलक्ष्मणम् सुग्रीवं वानरांश्चैवागमिष्यामि पुनः क्षणात् ॥३२॥
कुम्भकर्णवचः श्रुत्वा तदा प्राह विभीषणः । महाभागवतः श्रीमान् रामभक्त्यैकतत्परः ॥३३॥
विलोक्य कुम्भश्रवणादिदैत्यान्मत्तप्रमत्तानविशेषयेन ।
विलोक्य कामानुगमप्रमत्तं दशाननं प्राह विशुद्धबुद्धिः ॥३४॥
न कुम्भकर्णेन्द्रजितौ च राजंस्तथा महापार्श्वमहोदरौ तौ ।
निकुम्भकुम्भौ च तथाऽतिकायः स्थातुं न शक्ता युधि राघवाग्रे ॥३५॥
सीतां च संकृत्य महाधनेन दत्त्वाऽभिरामाय सुखी भव त्वम् ।
नोचेन्न रामेण विमोक्ष्यसे त्वं गुप्तः सुरेन्द्रैरपि शङ्करेण ॥३६॥
एवं शुभं रावणः स विभीषणवचो हितम् । आत्मनः प्रतिजग्राह नैवाग्रे मौढ्यकारणात् ॥३७॥
कालेन नोदितो दैत्यो विभीषणमथाब्रवीत् । बन्धुरूपेण शत्रुस्त्वं जातो नास्त्यत्र संशयः ॥३८॥
योऽन्यस्त्वेवंविधं ब्रूयाद्वाक्यं हन्मि तदैव तम् । उत्तिष्ठ गच्छ दुर्बुद्धे धिक् त्वां राक्षसकुलाधम । ३९॥
रावणेनैवमुक्तः स रुष्टेष विभीषणः । चतुर्भिर्मन्त्रिभिर्युक्तो ययौ श्रीराघवान्तिकम् । ४०॥


अग्रसर होते हुए क्रमशः दक्षिण समुद्रपर जा पहुँचे ॥ २४ ॥ रामने उस वानरी सेनाको समुद्रके किनारे स्थान ठहरा दिया और सब वानर मिलकर समुद्रके पार करनेकी समस्यापर विचार करने लगे ॥ २५ ॥ उधर लङ्कामें वायुपुत्र हनुमानके कृत्यको देखकर रावणने प्रहस्तादि मन्त्रियोंको बुलाकर पूछा कि अब आगे क्या होगा ? ॥ २६ ॥ एक ही वानरने हमारी सम्पूर्ण लंका नगरी जला दी। उसने सीताको देख लिया, वनको उजाड़ा और राक्षसोंको मार डाला । २७ ॥ मेरा अतिशय प्रिय छोटे पुत्रको भी रणमें उसने समाप्त कर दिया । तब सब मन्त्री दशाननको घेर दिलासा देते हुए कहने लगे ॥ २८ ॥ हे राजन् ! यह तो हम लोगोंने वानर समझकर उसकी उपेक्षा कर दी थी । अब यदि आप आज्ञा दें तो हम समस्त संसारको वानरशून्य कर दें ॥ २९ ॥

कुम्भकर्णने राक्षसेश्वर रावणसे कहा—आपने यह उचित नहीं किया, जो जाकर जानकीको उठा लाये ॥ ३० । यद्यपि आपने अनजानमें यह अनुचित काम किया है। तथापि मैं सब कुछ ठीक कर दूँगा। हे प्रभो ! आप निश्चिन्त रहें । ३१ । आप मुझको आज्ञा दें तो लक्ष्मणसहित राम, सुग्रीव और सब वानरोंको मारकर क्षणभरमें लौट आऊँ ॥ ३२ ।

कुम्भकर्णकी बात सुनकर भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ तथा भगवान् रामकी भक्तिमें लीन विभीषणने प्रमत्त कुम्भकर्ण आदि दैत्योंकी ओर दृष्टि डालते हुए कामानुर दशाननसे विचारपूर्वक कहा—॥ ३३ ॥ ३४ ॥ हे राजन् ! कुम्भकर्ण, महापार्श्व, महोदर, निकुम्भ, कुम्भ और अतिकाय भी युद्धमें रामके सामने नहीं ठहर सकते । ३५ । इसलिए आप रामका प्रचुर धनसे सत्कार करें और उन्हें सीता समर्पण करके सुखसे रहें। नहीं तो सुरेन्द्र तथा शंकरका शरणमें जानेपर भी आपको ये जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥ ३६ ॥

इस प्रकार शुभ तथा हितकर विभीषणके वाक्यको भी रावणने अपने प्रतिकूल ही समझा ॥ ३७ ॥ कालके प्रेरित दैत्य रावणने विभीषणसे कहा—निःसन्देह तू बन्धुरूपमें मेरा शत्रु है ॥ ३८ ॥ यदि और कोई मुझसे ऐसा कहता तो मैं उसको उसी समय मार डालता । ओ दुर्बुद्धे ! अरे राक्षसाधम ! तुझे धिक्कार

१०२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०

राघवश्चापि तं ज्ञात्वा तेन सख्यं चकार सः । हनुमतोदधेस्तीरे लंकां च सिकतोद्भवाम् ॥४१॥
कारयित्वा रघूत्थस्त्वं मित्रं निर्मायथाङ्गदम् । लंकायाश्चैव राज्यार्थे वानरैरभ्यषेचयत् ॥४२॥
तदा विभीषणं प्राह रामचन्द्रो विदस्य च । न्यासभूता त्वियं लंका तावत्कालं तवास्ति मे ॥४३॥
यावता रावणं हत्वा तव दास्याम्यहं शुभाम् । हनुमत्कालङ्केत्येवं नाम्ना लङ्का ख्यातिं गमिष्यति ॥४४॥
हनुमल्लङ्काब्धेश्चस्तारे वर्ततेऽद्यापि पार्वति । विभीषणोद्धाराणन्ते रामस्तां मोचयिष्यति ॥४५॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र गगनस्थः शुकोऽब्रवीत् । प्रेषितो रावणेनैव सुग्रीवं प्राह वेगतः ॥४६॥
त्वामाह रावणो राजा तव नास्त्यर्थविप्लवः । अह यद्यहरं भार्यां राजपुत्रस्य किं तव ॥४७॥
किष्किन्धां याहि हरिभिस्त्वं वैरं कुरु मा मया । तं धृत्वा वानराः शीघ्रं बबन्धुर्लाङ्गलबन्धनैः ॥४८॥
शार्दूलश्चापि सेनां तां दृष्ट्वाऽथभयमाययौ । तच्छ्रुत्वा रावणश्चापि दीर्घचिन्तापरोऽभवत् ॥४९॥
रामः समन्त्रयामास तद्वैकान्ते स्थितः क्षणम् । विभीषणेन सुग्रीवमरुतिभ्यां समन्वितः ॥५०॥
तीत्वार्थं जलधेर्गुल्मं संस्थितो धन्वना पुरः । सर्वथा वचनं श्रोतुं राघवस्याथ सागरः ॥५१॥
मेघवद्गर्जनं कुर्वन् वामहस्तेन धिक्कृतः । अद्यापि सागरस्त्वत्र तूष्णीमेव न विद्यते ॥५२॥
अतः संमन्त्र्य रामस्तु तदा सागररोधसि । प्रायोपवेशनं चक्रे दर्भानास्तीर्य वेगतः ॥५३॥
दिनद्वयमतिक्रम्य तृतीयदिवसे तदा । उत्थाय दर्भशयनात्पुनर्लक्ष्मणमब्रवीत् ॥५४॥
पश्य लक्ष्मण दुष्टोऽसौ वारिधिर्मामुपागतम् । नाभिन्दति दुष्टात्मा दर्शनार्थं ममानघ ॥५५॥
जानाति मानुषोऽयं मां किं करिष्यन्ति वानराः । अद्य पश्य महाबाहो शोषयिष्यामि वारिधिम् ॥५६॥
पद्मयामेवाद्य गच्छन्तु वानरा विगतज्वराः । इत्युक्त्वा चापमाकृष्य संदधे बाणमुत्तमम् ॥५७॥

है । उठ, यहाँसे निकल जा ॥ ३६ ॥ रावणके इस प्रकार धिक्कारनेपर विभीषण अपने चार मन्त्रियोंको साथ
लेकर श्रीरामके समीप चला गया ॥ ४० ॥ रामने परिचय पूछकर उसके साथ मित्रता कर ली । तदनन्तर
रामने हनुमत् समुद्रके किनारे रेतीकी लंका बनवाकर उसम अपने मित्र विभीषणका लंकाके राज्यके
पदपर वानरो द्वारा अभिषेक करवा दिया ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ तब रामने हंसकर विभीषणसे कहा—मित्र ! यह
लंका तुम्हारे पास तबतक धरोहररूपमे रहेगा । ४३ ॥ जबतक मै रावणको मारकर तुम्हे लंका न दे
दूँ, यह लंका हनुमालङ्का नामसे प्रसिद्ध होगी ॥ ४४ ॥ हे पार्वती ! वह हनुमालङ्का लंका अभी भी समुद्रके
किनारे विद्यमान है । रावणका अन्त हो जानेपर राम उस विभीषणसे छुड़ा लेंगे ॥ ४५ ॥ तदनन्तर आकाश-
मे स्थित शुक बोला—हे सुग्रीव ! मुझे बड़ा संभ्रान्त से रावणने तुम्हारे पास भेजा है ॥ ४६ ॥ राजा रावणने
कहा है कि हमन तुम्हारा कोई हानि नहीं की है । यदि मै राजपुत्र रामकी स्त्रीका हरण कर लाया तो इससे
तुम्हारी क्या हानि हुई ॥ ४७ ॥ उसने कहा है कि तुम हमारे साथ शत्रुता न करके बंदरोंको लेकर
किष्किन्धा लौट जाओ । इतना कहना था कि वानरोंने इस राक्षसको पकड़कर लंगोटीकी जडमें जकड़
दिया ॥ ४८ ॥ उसके साथ गुप्तसूपसे आया हुआ दूसरा शार्दूल नामका राक्षस उस विशाल सेनाको देखकर
रावणके पास गया और वानरी सेनाका पराक्रम कह सुनाया । सो सुनकर रावण बड़ी भारी चिन्ता-
में पड़ गया । ४९ । इधर रामचन्द्रजी भी एकान्तम जाकर विभीषण, सुग्रीव तथा हनुमान्के साथ मंत्रणा करने
लगे ॥ ५० ॥ तदनन्तर वे समुद्रके जन्म कुछ दूर जाकर सबका बात सुननेके लिये खड़े हो गये । बादमें रामने
मेघकी तरह गर्जन करके बायें हाथसे सागरको धिक्कारा और कहा कि तू अभी तक चुप ही है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥
मंत्रणा पूर्ण करके राम सागरके किनारेपर आये और कुशा बिछाकर अनशन करने लगे ॥ ५३ ॥ दो
दिन बिताकर तीसरे दिन कुशासनसे उठ खड़े हुए और लक्ष्मणसे कहा— । ५४ ॥ हे अनघ लक्ष्मण ! देखो,
यह दुष्टात्मा वारिधि मुझे यहाँ आया जानकर भी मुझसे मिलने या मेरा दर्शन करने नहीं आया ॥ ५५ ॥
यह समझता है कि यह मनुष्यमात्र है । यह मेरा क्या कर लेगा और ये वानर भी क्या कर लेंगे । हे महा-
बाहो ! देखो, मैं आज इसको सुखा लूंगा ॥ ५६ ॥ तब वानर बिना किसी कठिनाईके पाँवसे चलकर उस पार

सर्गः १०] सारकाण्डम् १०३


तदा चचाल वसुधा दिशश्च तमसावृताः । चुक्षुभे सागरो वेलां भयाद्योजनपञ्चकम् ॥५८॥
तिमिप्रभृतयो भीताः प्रतप्ताः परितस्त्रसुः । एतस्मिन्नन्तरे साक्षान्सागरो दिव्यरूपधृक् ॥५९॥
शङ्खपाद्येन रामं समर्च्य प्रपणाम सः । अथ तुष्टाव दीनात्मा प्रार्थयामास राघवम् ॥६०॥
अभयं देहि मे राम स्वकामा मार्गं ददामि ते । इति तद्वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह सागरम् ॥६१॥
अमोघोऽयं महाबाणः कस्मिन्देशे निपात्यताम्। लक्ष्यं दर्शय मे शीघ्रं बाणस्यास्य पयोनिधे ॥६२॥

सागर उवाच

रामोत्तरप्रदेशोऽस्ति द्रुमकुल्य इति श्रुतः । प्रदेशस्तत्र बहवः पापान्मानो दिवानिशम् ॥६३॥
बाधन्ते मां रघूश्रेष्ठ तत्र ते पात्यतां शरः । रामेण मुक्तो बाणोऽसौ क्षणादाभीरमण्डलम् ॥६४॥
हत्वा पुनः समागम्य तूणीरे पूर्ववत्स्थितः । ततोऽब्रवीद्रघुश्रेष्ठं सागरो विनयान्वितः ॥६५॥
मयि सेतुं कारयस्व नलेनोपलनिर्मितम् । विश्वकर्मसुतश्चायं वरो लब्धोऽस्त्यनेन हि ॥६६॥
द्विजस्य जाह्नवीतोये शालिग्रामस्त्वनेन हि । त्यक्तस्तदा तेन शप्तः पषाणादि तरिष्यति ॥६७॥
त्वद्धस्तादिति शापोऽयं वरश्चात्र समून्तः । इत्युक्त्वा राघवं नत्वा ययौ विधुरदृश्यताम् ॥६८॥
नलमाज्ञापयामास सेत्वर्थं रघुनन्दनः । सेतुप्रथमकल्पेतु विघ्नेशं स्थाप्य राघवः ॥६९॥
नवग्रहाणां पूजार्थं पाषाणांश्च सादरम् । नलहस्तेन संस्थाप्य पूजं तत्र महोदधौ ॥७०॥
ततः सागरसंयोगे स्वनाम्ना लिङ्गमनुत्तमम् । स्थापयिष्याति निश्चित्य मारुतिं वाक्यमब्रवीत् ॥७१॥
काशीं गत्वा शिवलिङ्गमानयेहमनुत्तमम् । मुहूर्तमध्ये नोचेन्मे मुहूर्ता त्क्रमो भवेत् ॥७२॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स मारुतिः । ययावाकाशमार्गेण क्षणाद्वाणमयीं मम ॥७३॥


जा सकूँगा। इतना कहकर रामने धनुषपर बाण चढ़ाकर डोरी खींची ॥५७॥ उस समय पृथिवी कांप उठी, सब दिशाओंमें अंधेरा छा गया, समुद्र भयसे क्षुब्ध होकर अपने किनारंसे चार कोस आगे बढ़ गया ॥५८॥ मीन, तिमि तथा अन्य नामकी मछलिये और मगरमच्छ आदि जलजन्तु सन्तप्त तथा व्याकुल हो गये। तब समुद्र दिव्य रूप धारण करके प्रकट और रामको रत्नोंकी भेट दे तथा नमस्कार करके दीनभावसे प्रार्थनापूर्वक कहने लगा- ॥ ५९ । ६० । हे राम ! कृपा करके आप मुझे अभयदान दे । मैं आपको लङ्का जानेका रास्ता अभी देता हूँ। उसके वचनको सुनकर रामने कहा- ॥ ६१ ॥ हे पयोनिधे ! यह मेरा महाबाण अमोघ है, टाले नहीं जा सकता। बतलाओ इसे कहाँपर गिराऊँ। इस बाणका कोई लक्ष्य बताओ ॥ ६२ ॥ सागरने कहा हे राम ! उत्तर दिशामें द्रुमकुल्य नामका देश है। वहाँ बहुतपर पापी आभीर रहते हैं। वे मुझको रात-दिन सताते हैं। हे रघूश्रेष्ठ ! आप इस बाणको वहीं ही गिराइए। तदनन्तर रामने बाण छोड़ा तो उसने जाकर क्षणभरम समस्त आभीरमण्डलको मार डाला और पुनः वापस लौटकर रामके तरकसमें पूर्ववत स्थित हो गया। बादम सागरने विनयपूर्वक रघुश्रेष्ठ रामजीस कहा-॥ ६३-६५॥ हे राघव ! आप मेरे ऊपर नलके द्वारा पत्थरोका पुल बँधवाएं । नल विश्वकर्माका पुत्र है। उसने जलपर पत्थर तैरानेका वर प्राप्त किया है ॥ ६६ ॥ एक बार इसने एक ब्राह्मणका पूज्य शालिग्राम उठाकर गङ्गाजीके जलम्ये फेंक दिया था। तब उसने शाप दिया कि जा, तेरा डाला पत्थर भी पानीमे तैरेगा । ६७ ॥ यह शाप भी वर माना जायगा। इतना कह तथा रामको नमस्कार करक समुद्र अदृश्य हो गया ॥ ६८ ॥ तदनन्तर रघुनन्दन रामने नलको पुल बाँधनेकी आज्ञा दी। सेतु बाँधत समय पहिले गणेशजीकी स्थापना की गयी ॥ ६९ ॥ पश्चात् नवग्रहांकी पूजाके लिए नलके हाथसे सादर नौ पाषाणोंकी समुद्रमे स्थापना करवाई गयी ॥ ७० ॥ इसके बाद 'अपने नाम-से मैं सागरके सङ्गमपर उत्तम शिवलिङ्ग स्थापित करूँगा' ऐसा निश्चय करके रामने मारुतिसे कहा-॥ ७१ ॥ हे हनुमन् ! तुम काशी जाकर शिवजीसे एक उत्तम लिङ्ग मुहूर्तमात्रमें माँग ले आओ। नहीं तो मेरा यह शुभ मुहूर्त टल जायगा ॥ ७२ ॥ रामकी आज्ञा सुनकर हनुमान्ने 'तथास्तु' कहा और क्षणभरमें उड़कर

१०४आनन्दरामायणे[सर्गः १०

तत्रागत्याथ मां नत्वा रामकार्यं न्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वाऽथ मया देवि राघवाय हनूमते ॥७४॥
द्वे लिङ्गे अर्पिते श्रेष्ठे ततोऽहं कपिमब्रुवम् । मयाऽपि दक्षिणे गंतुं पूर्वमेव विनिश्चितम् ॥७५॥
अगस्तिना विशेषेण यास्यामि राघवाज्ञया । एवं तद्वचनं श्रुत्वा मारुतिः प्राह मां पुनः ॥७६॥
कदा विनिश्चितं पूर्वं त्वयाऽत्र कुम्भजन्मना । तत्सर्वं मां वदस्वाद्य कृपां कृत्वा ममोपरि ॥७७॥
तन्मारुतिवचः श्रुत्वा ततोऽहमब्रुवं कपिम् । मारुते त्वं शृणुष्वाद्य पूर्ववृत्तं वदामि ते ॥७८॥
कदाचिन्नारदः श्रीमान्स्नात्वा श्रीनर्मदांऽभसि । श्रीमदोंकारमभ्यर्च्य सर्वदं सर्वदेहिनाम् ॥७९॥
व्रजन्विलोकयांचक्रे पुरो विन्ध्यं धराधराम् । संसाराघप्रसन्हारि रेवावारिपरिकृतम् ॥८०॥
रूपद्वयेन कुर्वन्तं स्थावरेण चरेण च । माभिख्येन यथार्थाख्यामुर्व्वरीमुर्व्वरीनिमाम् ॥८१॥
अथ तं नारदं दृष्ट्वा विन्ध्यः प्रत्युज्जगाम सः । गृहमानाय विधिवत्पूजयामास सादरम् ॥८२॥
गतश्रममथालोक्य बभाषेऽवनतो गिरिः । अद्यमद्यः परितृप्तस्त्वदंघ्रिरजसा मम । ८३॥
त्वदङ्गमणिमहसा महमाप्याततं तमः । मङ्गलार्थकरं चाद्य सुदिनं चाद्य मे मुने । ८ ॥
प्राक्तनैः सुकृतैरद्य फलितं मे जिगमिषोः । धराधरत्वं कुलिषु मान्यं मेऽद्य भविष्यति ॥८५॥
इति श्रुत्वा तदा किंचिदुच्छ्वस्य स्थितवान्मुनिः । पुनरुचे कुलिवरः सश्शमापन्नमानमः ॥८६॥
उच्छ्वासकारणं बदन् वद्दि सर्वाथकोविद । त्वाहं मार्जयाम्यद्य हृत्स्थेदं क्षणमात्रतः ॥८७॥
धराधराणामसमर्थ्यं मेत्रादीन् पूर्वपूरुषैः । दध्यंते समुदायानदहमेको दधे धराम् ॥८८॥
गौरीगुरुत्वाद्विमवात्राधिपत्याच्च भूसुताम् । सम्बन्धिन्वात्पशुपतेः स एको मानभूत्सताम् ॥८९॥
न मेरुः स्वर्णपूर्णत्वाद्वन्मानुनयाऽथवा । सुग्यङ्गतया वाऽपि कापि मान्यो मतो मम । ९०॥


आकाशमार्गसे ( पिछली ) वाणाशा ( काशां ) नगरीमे आया ॥ ७३ ॥ वहाँ आकर उन्होंने मुझको नमस्कार करके रामके कार्यके लिये निवेदन किया । हे देवि ! उस निवेदनको सुनकर मैने रामके लिए हनुमान्‌को दो उत्तम लिग दिये और कहा कि हे कपि ! मैन भी दक्षिण दिशाम जानका बहुत दिनाम निश्चय कर रक्खा है । ७४ ॥ ७५ ॥ यह निश्चय अगस्त्य मुनिक साथ हुआ था । पर बादमें सोचा कि जब विशेष-रूपसे रामकी आज्ञा होगी तभी जाऊँगा । मेरे मुखस यह सुनकर मारुतिने मुझसे फिर प्रश्न किया— । ७६ ॥ आपने पहिले कब और कहाँपर कुम्भजन्म ( अगस्त्य ) क साथ यह निश्चय किया था । यह सब हाल कृपा करके कह ॥ ७७ ॥ मारुतिकी बात सुनकर मैन कहा हे मरुते ! मै तुमको पूर्ववृत्तान्त बताता हूँ, सुनो ॥ ७८ ॥ एक समय श्रीमान् नारदमुनि नर्मदा नदीक पवित्र जलमे स्नान करके समस्त देहधारी प्राणियोंको सब कुछ देनेवाले ओंकारेश्वर शिवकी पूजा करके जा रहे थे । रास्तेमे संसार भरके पापको दूर करने-वाला तथा रेवाके जलसे परिकृत विन्ध्यपवंत सामने दिखाई दिया ॥ ७९ । ८० ॥ वह स्थावर तथा जंगम इन दो रूपोसे इस वसुमती पृथ्वोको यथार्थ नाम प्रदान कर रहा था । ८१ ॥ नारदको देखकर वह पर्वत सामने आया तथा उन्हे अपन घरपर ले जाकर सादर विधिवत् पूजन किया ॥ ८२ ॥ नारदजीका श्रम दूर हो जानेपर विन्ध्याचल विनम्र होकर कहने लगा कि आपके चरणरजसे मेरा पापपुञ्ज नष्ट हो गया ॥ ८३ ॥ हे महामुने ! आपके दैहिक तेजके संगसे अन्तःक मनोव्यथा पैदा करनेवाला मेर हृदयका अन्धकार दूर हो गया । आज मेरे लिए बडा शुभ दिन है ॥ ८४ । चिरकालसे उपार्जित मेरे प्राकृत पुण्य आज सफल हो गये । आजसे मै पर्वतोमें माननीय पर्वत माना जाऊँगा । ८५ ॥ यह सुनकर मुनिने कुछ लम्बी साँस ली । यह देखा तो घबराकर पर्वतने कहा हे सब अर्थोको जाननेवाले ब्रह्मन् ! इस उच्छ्वासका क्या कारण है ? आपने हृदयका खेद मै क्षणभरमे मार्जित कर दूंगा ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ पूर्व पुरुषोंने मह आदि सब पर्वतोंको मिलाकर पृथ्वोको धारण करनेमें समर्थ बतलाया है, पर मैं अकेला ही उसको धारण कर सकता हूँ ॥ ८८ ॥ यद्यपि गौरीका पिता होनेसे पर्वतोका अधिपति होनेसे तथा पशुपति शिवका सम्बन्धी होनेके कारण केवल हिमालय ही सज्जनोंके मानका पात्र है ॥ ८९ ॥ मेरी समझमें तो सोनेसे भरा हुआ तथा रत्नमय शिखरोंवाला