श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १ ] विलासकाण्डम् २६३
सर्गः १ ] विलासकाण्डम् २६३
कार्याक्रियाकाशमप्रमेय कविं पुराणं कमलोयताक्षम् ।
कुमारवेषं करुणाभयं तं कल्पद्रुमं राममहं भजामि ॥ ५४ ॥
त्रैलोक्यनाथं मधुकैटभारिं दयानिधिं द्वन्द्वविनाशहेतुम् ।
महावलं खेटनिधिं सुरेशं सनातनं राममहं भजामि ॥ ५५ ॥
वेदान्तवेद्यं कविरश्मिवाग्मनादिमध्यमचिन्त्यमाद्यम् ।
अगोचरं निर्मलमेकरूपं परात्परं राममहं भजामि ॥ ५६ ॥
अशेषवेदान्तसमादिरूपमनं हरिं राममनन्दरूपिणम् ।
अपारमव्यक्तमवेक्ष्य नमामि रामं तमसः परस्तात् ॥ ५७ ॥
सत्त्वस्वरूपं पुरुषं पुराणं स्वतेजसा पूरितविश्वमेकम् ।
राजाधिराजं रविमण्डलस्थं विश्वेश्वरं राममहं भजामि ॥ ५८ ॥
योगीन्द्रवर्गैरपि सेव्यमानं नारायणं निर्मलमादिदेवम् ।
सदाऽऽत्म नित्यं जगदेकनाथं हरिं चिदानन्दमयं मुकुन्दम् ॥ ५९ ॥
अशेषविद्याधिपतिं नमामि रामं पुराणं तमसः परस्तात्
विभूतदं विश्वसृजं परञ्च सर्वद्रष्टारं रघुनन्दनाथम् ॥ ६० ॥
अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तरूपं ज्योतिर्मयं राममहं भजामि
अशेषसंसारविकारहीनमानन्दरूपं सुखवाग्भिगम्यम् ॥ ६१ ॥
नारायणं विष्णुमहं भजामि समन्तमार्ति तमसः परस्तात् ।
मुनीन्द्रगुह्यं परिपूर्णमेकं कलानिधिं कल्मषनाशहेतुम् ।
परात्परं यत्परमं पवित्रं नमामि रामं महतो महान्तम् ॥ ६२ ॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च देवेन्द्रो देवतास्तथा । आदित्यादिग्रहाश्चैव त्वमेव रघुनन्दन ॥ ६३ ॥
तापसा ऋषयः सिद्धाः साध्याश्च गुरवस्तथा विप्रा वेदाश्च यज्ञाश्च पुराण धर्माङ्गिनाः ॥ ६४ ॥
सच्चिदानन्द सुखस्वरूप, सत्य, शिव सजीव के हृदयमें निवास करनेवाले और परमानन्दस्वरूप रामचन्द्र-
जीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५३ ॥ श्लोक कार्यादि कारण अगम्य, कवि, धारणाकार, पुराण पुरुष, कमलसरोखे
विशाल नयनों युक्त, नित्य कुमाररूपधारी, करुणामय तथा कल्पवृक्षके समान सबका अभिलाषा पूर्ण करनेवाले
हे, इन रामचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५४ ॥ त्रिलोकके नाथ मधुकैटह (कमल, के समान नयनोंवाले, दयानिधि द्वन्द्व
विनाशक एकमात्र हेतु, महाबलके निधान, सुरेश और सनातनस्वरूप रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता
हूँ ॥ ५५ ॥ वेदान्तवेद्य कवि दृष्टान्त, आदिमध्य और अन्तसे रहित, अचिन्त्य, सबके आदिमें उत्पन्न
होनेवाले, चक्षुरादि इन्द्रियाम अगोचर, निर्मल एकरूप और परात्परस्वरूप रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता
हूँ ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ तत्त्वस्वरूप, पुराण पुरुष, केवल अपने प्रकाशसे समस्त विश्वको प्रकाश देनेवाले, राजा-
धिराज, रविमण्डलमें निवास करनेवाले और विश्वेश्वरस्वरूप रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ। योगीन्द्रोंके
समूहसे सेव्यमान, नारायण, निर्मल, आदिदेव, नित्य, जगत्के एकमात्र स्वामी, हरि, चिदानन्दमय और
मुकुन्दस्वरूप रामचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५८-५९ ॥ समस्त विद्याओंके भण्डार, तमसे परे, पुराणपुरुष,
सम्पत्तियांको देनेवाले, जगत्के विधाता पुरुष, और सबका आनन्द देनेवाले रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम
करता हूँ ॥ ६० ॥ ६१ ॥ नारायण विष्णुको मूर्खतासे तमसे परे ऋषियोंके ध्यानमें भी कठिनाईसे आनेवाले,
परिपूर्णरूप एक, कलानिधि, कल्मषके नाशक, परम पवित्र और बड़ोंसे भी बड़े रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता
हूँ ॥ ६२ ॥ हे रघुनन्दन ! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, देवेन्द्र देवता तथा आदित्यादि ग्रह सब कुछ तुम्ही हो । तपस्वी,
२८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १
वर्णाश्रमस्तथा धर्मा वर्णधर्मास्तथैव च । नाग यक्षाश्च गन्धर्वा दिक्पाला दिग्गजा दिशः॥६५॥
वसवोऽष्टौ त्रयः काला रुद्रा एकादश स्मृताः । तारका द्वादशादित्यास्त्वमेव रघुनायक ॥६६॥
सप्त द्वीपाः समुद्राश्च नदा नद्यस्तथा द्रुमाः । स्थावरा जंगमाश्चैव त्वमेव रघुनन्दन ॥६७॥
देवतिर्यङ्मनुष्याणां दानवानां दिवौकसाम् । माता पिता तथा भ्राता त्वमेव रघुनन्दन ॥६८॥
सर्वेशस्त्वं परं ब्रह्म त्वद्रूपं विश्वमेव च । त्वमक्षरं परं ज्योतिस्त्वमेव रघुपूंगव ॥६९॥
शान्तं सर्वगतं सूक्ष्मं परं ब्रह्म सनातनम् । राजीवलोचनं रामं प्रणमामि जगत्पतिम् ॥७०॥
ततः प्रसन्नः श्रीरामः प्रोवाच वृषभध्वजम् ।
श्रीराम उवाच
तुष्टोऽहं गिरिजाकांत वृणीष्व वरमुत्तमम् ॥७१॥
श्रीशिव उवाच
यदि तुष्टोऽसि देवेश श्रीराम करुणानिधे । तवाद्य दर्शनेनैव कृतार्थोऽहं न संशयः ॥७२॥
धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं पुण्योऽहं पुरुषोत्तम । अद्य मे सफलं कर्म अद्य मे सफलं तपः ॥७३॥
अद्य मे सफलं ज्ञानमद्य मे सफलं श्रुतम् । अद्य मे सफलं सर्वं त्वत्पदाम्भोजदर्शनात् ॥७४॥
अद्वैतं विमलं ज्ञानं स्वमन्नामस्मरणं तथा । त्वत्पदाम्भोरुहद्वन्द्वे सद्भाक्तिं देहि राघव ॥७५॥
ततः परं सुसंप्रीतो रामः प्राह सदाशिवम् । गिरिजेश महाभाग पुनरिष्टं ददाम्यहम् ॥७६॥
श्रीशिव उवाच
वरं न याचे रघुनाथ युष्मत्पदाम्बुजभक्तिः सततं ममास्तु ।
इदं प्रियं नाथ वरं प्रयच्छ पुनः पुनस्त्वामिदमेव याचे ॥७७॥
श्रीरामदास उवाच
इत्येवमीडितो रामः प्रादानस्मै वरान्तरम् । तेनोक्तस्त्ववराजाय ददौ नानावरान् बहून् ॥७८॥
ऋषि, सिद्ध, साध्य, मुनि, विप्र, वेद, यज्ञ पुराण तथा धर्मोंके सहित ये सब तुम्हीं हो ॥ ६३ ॥ ६४ ॥
हे रघुनायक ! वर्ण आश्रमधर्म, वर्णधर्म, नाग, यक्ष, गन्धर्व, दिक्पाल, दिग्गज, दिशाएं, वसु, तीनों काल, एकादश रुद्र ताराएं और द्वादश आदित्य ये सब तुम्ही हो ॥ ६५, ६६ ॥ सातो द्वीप, समुद्र, नद, नदियाँ तथा वृक्ष आदि स्थावर जङ्गम समस्त वस्तु तुम्ही हो । देव, तिर्यक् मनुष्य, दानव, देवता, माता, पिता, भ्राता, ये भी सब तुम्हीं हो । ६७ ॥ ६८ । तुम्हीं सर्वेश हो, परब्रह्मरूप ब्रह्म हो, यह संसार भी तुम्हारा ही रूप है, तुम अक्षर हो, परम प्रधान ज्योति हो । और मैं कहाँ तक बतलाऊं हे रघुपूङ्गव ! यह सब कुछ एकमात्र तुम्ही हो ॥ ६९ ॥ शान्त, सर्वगत, सूक्ष्म, परब्रह्म सनातन, जगत्पति और राजीवलोचन रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ । इस प्रकारकी स्तुति सुनकर रामचन्द्रजीने शिवजीसे कहा-हे गिरिजाकांत ! मैं तुम्हारे ऊपर परम प्रसन्न हूँ। जो भी चाहो, सो उत्तम वर मांग लो ॥ ७० ॥ ७१ । श्रीशिवजीने कहा हे राम ! हे करुणानिधे ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मैं आपको इस प्रसन्न मूर्तिको ही देखकर कृतार्थ हो गया ॥ ७२ ॥ हे पुरुषोत्तम ! मैं धन्य हूँ और अतिशय पवित्र हूँ । आज मेरे सब कार्य सफल हो गये । मेरी तपस्याएं सफल हुईं, मेरा ज्ञान सफल हो गया और शास्त्रोंका श्रवण करना भी सार्थक हो गया । आपके इन चरणकमलोंके दर्शनसे ही मेरा सब कुछ सफल हो गया ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ हे रघुनाथ ! यदि आपको वर ही देना हो तो मुझे अपना अद्वैत तथा विमल ज्ञान दीजिए । मुझे अपने नामका कीर्तन करानेकी शक्ति और अपने इन चरणकमलोंका सद्भाक्त दीजिए ॥ ७५ ॥ इसके अनन्तर अतिशय प्रसन्न होकर रामचन्द्रजीने शिवजीसे कहा-हे गिरिजेश ! हे महाभाग ! मैं तुम्हारे अभिलषित वरोंको देनेके लिए प्रस्तुत हूँ, मांगों ॥ ७६ ॥ शिवजीने कहा-हे रघुनाथ ! मैं कोई वरदान नहीं चाहता । मैं चाहता यही हूँ कि सदा आपके चरणोंमें मेरी भक्ति बनी रहे । हे नाथ ! मुझे यही वर प्रिय है और यही देनेके लिए मैं आपसे बारम्बार अनुरोध करूँगा