श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् उत्तरार्द्धम् ५४७
सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् उत्तरार्द्धम् ५४७
तावत्त्वया तु पूर्णायुर्नरो नेयो न चेतरः ।
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्याह यमस्तदा ॥७७॥
ततः प्राप्ते सुदशमे दिने स्त्रीभिर्गताध्व मः । सुमन्त्रो राघव नत्वा तदग्रे जीवितं जहौ ॥७८॥
ततः स दिव्यदेहाभिः स्वस्त्रीभिर्दिव्यदेहभृत् ७९॥
सुमन्त्रः पूजितः सर्वैर्विमाने प्रस्थितो बभौ । रामाग्रे मरणादेव सुरैः सर्वत्र वेष्टितः ॥८०॥
ततः दृष्ट्वा रवी रामं यमेन स्वस्थलं ययौ ।
ययौ सुमन्त्रः स्वस्त्रीभिर्वैकुण्ठं निर्जरा दिवम् ॥८१॥
रामः सुमन्त्रपुत्रेण यत्क्रियादि सुमन्तुना । कारयित्वा यथाशास्त्रं तत्पदे तं न्यवेशयत् ॥८२॥
ततो रामो लक्ष्मणैव पृथिव्यां घोषयन्मुहुः ।
गजन्यतां दुन्दुभिं स्वां पाताळध्वजशोभिताम् ॥८३।
तथेति लक्ष्मणश्चापि दूतानाज्ञापयत्तदा । दूतास्तेऽथ गजारूढाः सप्तद्वीपान्तरेषु हि । ८४।
रामाज्ञां श्रावयामासुर्नानन्दुन्दुभिनिःस्वनैः । अपूर्णायुर्मृतः कश्चिन्नैवान्यो राज्यस्य प्रति ॥८५॥
पौराणिकाः स्थापनीया गेहे ग्रामे पृथक् पृथक् ।
नित्यनैमित्तिकं कर्म न त्याज्यं वै कदाचन ॥८६॥
नावमान्या भूसुराश्च द्वेषः कार्यो न कस्यचित् । द्रव्यं कस्य सदा देयं दण्डन याश्च तस्कराः ॥८७॥
शासनीया दुराचारतत्परा ये जना भुवि । वन्दनीया सदा माता वन्दनीय सदा पिता ॥८८॥
पूजनीयाः सदा देवाः कार्यो धर्मो निरन्तरम् ।
नेत्रस्नानं सदा कार्यमयोग्यायामथापि वा ॥८९।
रामतीर्थेषु सर्वत्र कार्या धर्मा विशेषतः ।
द्वारकां सदा गत्वा कार्यं वैशाखमज्जनम् ॥९०।
ऊर्जे कार्या पञ्चतपदे स्नातव्यं विधिवत्कदा । गत्वा प्रयागं प्रत्यब्दं कर्तव्यं माघमज्जनम् ॥९१॥
कर खड़ा किया । तदनन्तर रामने यमराजस कहा कि जबतक में पृथ्वीपर शासन करता रहूँ, तबतक तुम उन्हीं मनुष्योंको अपने लोकमें ले जाओ जिनकी आयु पूर्ण हो गयी हो और किसीको नहीं। रामकी बात सुन-कर यमराजने कहा कि "ऐसा ही होगा" । ७५-७७। इसके पश्चात् दशव दिन स्त्रियोंको साथ लेकर सुमन्त्रने रामको प्रणाम करके उनके सामने ही प्राण त्याग किया । ७८॥ सुमन्त्रकी स्त्रियोने भी उसी समय प्राण त्याग दिया और उन स्त्रियोंके साथ दिव्यहूप धारण करके सुमन्त्र सब लोगोंसे पूजित होते हुए विमान-पर बैठकर अतिशय शोभित हुए । रामके समक्ष मरनेसे वे समस्त देवत.ओँके साथ देवलोकको गये ॥ ७९ ॥ ॥ ८० ॥ इसके पश्चात् सूर्य भी रामसे आज्ञा लेकर यमके साथ लौट पड़े। रामने सुमन्त्रके पुत्र सुमन्तुके हाथों सुमन्त्रकी क्रिया करवायी और पिताके आसनपर उसी पुत्रको बिठाला । ८१ ॥ ८२ ॥ तदनन्तर रामने लक्ष्मणको पृथ्वीतलमें इस बातकी घोषणा करनेकी आज्ञा दी ॥ ८३ ॥ लक्ष्मणन भा "बहुत अच्छा" कहकर दुन्दुभी बजानेवालोँको आज्ञा दे दी। वे हाथीपर सवार हो तथा सातोँ द्वीपोम जा जाकर नगाड़े बजाते हुए रामकी आज्ञा सुनाने लगे । उन्होंने कहा—राजा रामचन्द्रका आदेश है कि यदि मेरे राज्यमें कोई मनुष्य बिना आयु पूर्ण हुए ही मरे तो उसे मेरे पास ले आया जाय ॥ ८४ । ८५ ॥ घर-घर तथा गाँव-गाँवमें पुराणों-को जाननेवाले पौराणिक रक्खे जायें। कोई मनुष्य अपने नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको न छोड़े ॥ ८६ ॥ ब्राह्मणोंका कोई अपमान न करे, कोई किसीके साथ द्वेषभाव न रक्खे, कोई किसीके द्रव्यको न ले और चोरोँको दण्ड दे ॥ ८७॥ जो लोग दुराचारी हों, उनपर कड़ा शासन किया जाय । धर्म कर्म सदा होता रहे । अयोध्यामें अथवा किसी अन्य रामतीर्थमें जाकर लोग नेत्रस्नान किया करें । ८८ । ८९ ॥ विशेषतः
५४६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २४
चातुर्मास्यव्रतादीनि कर्त्तव्यानि व्रतानि हि । प्रत्यंगणेषु तुलसी पूजनीया हि सर्वदा ॥९२॥
न निराकरणीयोऽत्र स्वातिथिश्च कदाचन ।
न विप्रयाच्ञा कर्तव्या मृषा क्वापि कदाचन ॥९३॥
यदीच्छेन्स ततो देयं सर्वस्वं ब्राह्मणाय वै । ग्रामे गृहे क्वचिच्चैव कलहं तु समाचरेत् ॥९४॥
सदा गुरुर्वन्दनीयः कर्णपर्व श्रवं सदा । प्रातःस्नानं सदा कार्यं होतव्या विहिताग्नयः ॥९५ ।
कार्यो जपः शंकरस्य ध्येयो नित्यं महेश्वरः । एकांते हि तपः कार्यं द्वाभ्यामध्ययनं तदा । ९६॥
त्रिभिर्गीतानि कार्याणि चतुर्भिर्विचरेत्पथि ।
परदाररतिस्त्याज्या नावलोक्याऽन्यकामिनी । ९७ ।
परलक्ष्म्याः स्पृहा कार्या न नरैश्च कदाचन । तीर्थं विना पुण्यकाले न स्नातन्ये गृहेष्वपि ॥९८॥
न द्वेष्या गणका वैद्यास्ते पोष्याश्च पुरे पुरे । न वेश्यागमनं कार्यं न दासीं स्वहषेद्बुदि ॥९९॥
नित्यकर्म यथाकाले कर्तव्यं भवदा नरैः ।
नावमान्या हि गुरवः परनिंदा न कारयेत् ।१००॥
जलाशया वने कार्या रोपणीया गणाः पथि । धर्मशालाः पृथक्कार्या न नग्नां वीक्ष्यद्वधूम् ॥१०१॥
अन्नसत्राणि कार्याणि पुरे ग्रामे वने तथा । प्रकुर्वन्तु वने रक्षां मार्गस्थानां वनेचराः ॥१०२॥
भयं साऽस्तु वने क्वापि निशायां मार्गगामिनाम्
वैश्येभ्यस्तु करो ग्राह्यो नेतरेषां कदाचन ॥१०३।
पादद्योः पादुके धुन्वा तीर्थे देवं गुरुं प्रति । मातु वृन्दावने होमशालां गच्छेन्न सर्वदा ॥१०४॥
पारायणानि ग्रंथानां वेदानां च सदा नरैः ।
कर्तव्यानि तु निष्कामं ग्रामकार्याणि कारयेत् ॥१०५॥
होत धर्मकर्म करते रह। द्वारकापुरीमे जाकर लोग वैशाखस्नान कर ॥ ६० ॥ कार्तिक मासमे काशीका पञ्चगङ्गामे और प्रतिवर्ष माघमासम प्रयाग जाकर स्नान करं ॥ ९१ ॥ चातुर्मास आदिका व्रत करते रहे। हर एक घरके आँगनमे तुलसीकी पूजा होती रहनी चाहिए ॥ ९२ ॥ भर राज्यम कभी कोई आये हुए अतिथि-का अनादर न करे । कभी कोई किसी ब्राह्मणकी मति व्यर्थ न कर ॥ ९३ ॥ यदि वह चाहता हो तो ब्राह्मणके लिये अपना सर्वस्व दे डाले । किसी घर या गाँवमें कोई लड़ाई झगड़ा न करे ॥ ९४ ॥ सदा गुरुकी वन्दना करे, उनसे सर्वदा धर्मग्रंथ सुनता रह, नित्य प्रातःस्नान कर और विधिवक अग्निहोत्र करता रहे ॥ ९५ ॥ नित्य शिवजीका ध्यान और जप करता हुआ एकान्तम तपस्या करे । दो व्यक्ति साथ बैठकर अध्ययन करें, तीन मनुष्य साथ बैठकर गायें-बजायें और चार मनुष्य साथ होकर टहलने निकले । दूसरोकी स्त्रीसे प्रेम न करे, दूसरी स्त्रीको देखे भी नहीं ॥ ९६ ॥ ९७ ॥ दूसरोंकी लक्ष्मीका पानेकी इच्छा न करे, किसी पर्वकालके समय घरमें स्नान न करे, बल्कि किमा तीर्थस्थानपर चला जाय ॥ ९८॥ ज्योतिषी तथा वैद्यके साथ कोई विगाड़ न करे । यदि किसी दूसरे गाँवम भा रहते हों तो उनका पालन करे । न कोई वेश्यागमन करे और न दासीस प्रेम कर ॥ ९९ ॥ ठीक समयपर लोग अपने नित्यकर्म करते रहें । गुरुजनोका अपमान कभी न करे और न दूसरोकी निन्दा ही कर । वनमें जलाशय बनवाये । अलग-अलग धर्मशालायें बनवाये । कभी नङ्गी स्त्रीको न देखे ॥ १०० ॥ १०१ ॥ पुर, ग्राम और वनोंमें जहाँ-तहाँ अन्नक्षेत्र खोले । बनचर मनुष्य वनमें पहुँच हुए पथिकोकी रक्षा करें ॥ १०२ ॥ रात्रिके समय भी चलनेवालोको वनमे किसो प्रकारका भय न रहे, केवल वैश्योंसे कर लिया जाय और लोगोंसे नहीं ॥ १०३ ॥ पाँवमे जूता पहिनकर किसी तीर्थस्थान देवता तथा गुरुके पास न जाय । गोशाला तथा तुलसीकी बगीचीमें भी जूता पहिनकर न जाय ॥ १०४ ॥ धर्मग्रंथों और वेदोका पारायण सर्वदा सब लोग निष्कामभावसे करते रहें ॥ १०५ ॥