श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१५
सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१५
जनागमान्वितां दृष्ट्वा दृष्ट्वेष्यांडिरिङ्गिताम् । शनैर्ययौ प्रभुर्गोष्ठं नानाधेनूर्ददर्श सः ॥८६॥
तां सम्प्रेक्ष्य गृहं मातुः स्वदासीपरिवेष्टिताम् । द्वारान्निर्गत्य ययौ रामस्तत्र ते लक्ष्मणादयः ॥८७॥
चक्रुः प्रणामं श्रीरामे तैः सहैव शनैः शनैः । वाजिशालां ययौ रामो दृष्ट्वा तत्र स वाजिनः ॥८८॥
गजशालामुष्ट्रशालां दृष्ट्वा रामः शनैः शनैः । ददर्श शस्त्रागारांश्च व्याघ्रशालां प्रभुर्ययौ ॥८९॥
दृष्ट्वाऽथ शिविकाशालां माहिषेयीं विलोक्य च । महिषादृष्टवानां च रथशालां ददर्श सः ॥९०॥
आरुह्य स्यन्दने रामः शनैः सर्वैरनिर्ययौ । सप्तकक्षाः समुल्लङ्घ्य तत्रस्थाः पूर्ववज्जनैः ॥९१॥
सर्वैर्युक्तब्रह्मचर्य्यां तां श्रेष्ठां कक्षां ददर्श सः । तत्र यन्त्राणि श्रेष्ठानि शतघ्नीः सङ्कटस्थिताः ॥९२॥
तृणकाष्ठादिमत्तानि दूतस्थानान्यपश्यत । ततो नवमकक्षायां ददर्श रघुनन्दनः ॥९३॥
शस्त्रपाणीन्गजान्स्थांश्च तुङ्गस्थाननेकशः । रक्षयन्ति हि ये सर्वे स्वीयं गेहं त्वहर्निशम् ॥९४॥
एवं स नवरक्षाश्च समुल्लङ्घ्य रघूत्तमः । बहिः समाचनो दृष्ट्वा परिखाः सजला नव ॥९५॥
शनैः पश्यन्नयोध्यां तां राजमार्गं मुदान्वितः । शीघ्रं ययौ पुरद्वारं ददर्श द्वाररक्षकान् ॥९६॥
नवकक्षास्त्वयोध्यायाः समुल्लङ्घ्य शनैः प्रभुः । परिखाश्च नरापश्वनौषयन्त्रादिसंरिताः ॥९७॥
ततो नानावनारामकौतुकानि रघूत्तमः । पश्यन्म बन्धुपुत्रैश्च सरय्वास्तीरमाययौ ॥९८॥
तत्र स्थित्वा सुनीकायां क्रीडां कृत्वा कियत्क्षणम् । नद्यास्तटे सभायां म तन्व्यों सैन्यवृतः प्रभुः ॥९९॥
यत्रापि वारयोषितां पश्यन्कल्याणनि राघवः । कियत्कालमतिक्रम्य ययौ शीघ्रं ततः पुरम् ॥१००॥
ततः शनैः सभां गत्वा पूर्वकिङ्करसंयुतः । लक्ष्मणाद्यैः सेवितश्च तव्यां सिंहासनेोपरि ॥१०१॥
ततः कृत्वा ह्यनेकानि नानाकार्याणि राघवः । आज्ञाप्य बन्धुपुत्रांश्च पूर्ववन्म गृहं ययौ ॥१०२॥
फौवार आदि दखत थे ॥ ८३ ॥ ८४ ॥ फिर पोकराम पान हुए पौलपका दखत थ। सन्चभूत होकर मार्गमे सर्वोच्य प्रासादपर चढ़ जाते और बट्टभि वनों और बगीचास अलंकृत, बावली तथा गंजोसे अतिरंजित अपनी अयोध्यापुरीको देखत थ। फिर बार-वारे गोशालास जात और वहांपर गौओका देख्या करते थे। ८५ ॥ ॥ ८६ ॥ इसके अनन्तर दासियो सम्त सीताका घर नल दन और म्वयं पाहरका आर जाते थे। वही लक्ष्मण आदि भ्राता रामका संविभ्रम प्रणाम करत थ ॥ ८७ ॥ फिर उनका साथ लेकर राम धीरे-धीरे अश्वशालाका जाते । वहाँ पाशेका देखकर ॥ ८८ ॥ गजशाला और उष्ट्रशालाका देखत हुए अस्त्रशाला तथा व्याघ्रशालाका अवलोकन करते थे ॥ ८६ ॥ फिर शिविकाशाला और महिषीशालाम जाकर शिविकाओं तथा भैंसोको देखकर बाद रथशाला दखत थे ॥ ९० ॥ तत्पश्चात् एक रथपर सवार होकर बनै बनै बाहरकी तरफ जाया करते थे । सातवे महलके सातों चौकाका लाघत एव पहनेक तरह उपस्थित सब लोगी दखत हुए आठवें फाटकवाले आँगनम पहुंचते थ। वहाँपर लट्टध्याय काम आनवाल कितन ही यन्त्र तथा बहुत-सी तोपे रक्खी रहती थी ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ उण्टे दक्सर दूतके निवासस्थान तथा तृण काष्ठ दिके सग्रहभवनका देखनेके अनन्तर नव आँगनम पहुंचते थे ॥ ९३ ॥ वहीं यह दखत थे कि हाथम शस्त्र लिये पाठ और हाथोपर सवार होकर सिपाही रात-दिन अपने अपने स्थानो की रक्षा कर रहे है ॥ २४ ॥ इस प्रकार नया कक्षाओका लांघकर कोटके चारों ओर जलसे भरी बाहरकी नौ साइरोका देखत थे ॥ ९५ ॥ इसके बाद राजमार्गम चलकर अयोध्याको देखत हुए शीघ्र पुरद्वारपर पहुँचत और वहाँपर रहनेवाले द्वाररक्षकोभी देख-रेख करते थे ॥ ९६ ॥ फिर अयोध्याकी नौ कक्षाओंको लांघकर जल और अग्निस परिपूर्ण नौ परिखाएँ और अनेक बाग-बगीचेके कौतुक देखते हुए अपने भाइयो और पुत्रोके साथ सरयूके तीर पहुंचते थे ॥ ९७। ९८ ॥ वहीं एक अच्छी नौकापर बैठ तथा कुछ देरतक तैर करके सेनके शिबिरमे जाते और सैनिकोके साथ सभा में बैठते थे ॥ ९९ ॥ वहाँ कुछ समय तक वेश्याओक नृत्य देखकर पुरमें लोट आया करते थे ॥ १०० ॥ तदनन्तर सभामे जाते ओर पूर्वमे जो कह भये है, उन सबके साथ लक्ष्मणादि भ्राताओसे संवित होकर सिंहासनपर बैठते थे ॥ १०१ ॥ वहाँ कनक कार्योंको करनेके पश्चात् भइओं और पुत्रोको अपने-अपने घर जाने-
५१६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
सायंकाले ततः संध्यां कृत्वा हुत्वा यथाविधि । गंधाद्यैरुपचारैश्च शिवं सम्पूज्य भक्तितः ॥१०३॥
कृतोपहारं निर्वेद्य पुत्राभ्यां बन्धुभिः सह । शिविकायां पुनः स्थित्वा देवयानेषु च ॥१०४॥
साकेतस्थेषु श्रीरामोगत्वा नत्वा शिवादिकान् । नानाविधान्देवगणान् फलैः पुष्पैर्ह्यपूजयत् ॥१०५॥
देवालयेषु सर्वेषु सुराणां तेषु राघवः । शृण्वन्नानाकीर्तनानि वारस्त्रीनर्तनान्यपि ॥१०६॥
पश्यन्नानाकौतुकानि परां मुदमवाप सः । वाहना रूढ देवान् मपश्यत्कौतु कानि च ॥१०७॥
ततो ययौ ब्राह्मणेन दृढमार्गेण राघवः । रत्नदीपप्रकाशैश्च विवेश निजमंदिरम् ॥१०८॥
क्षणे नानागथाभिश्च वार्त्ताभिः पुत्रबन्धुभिः । सार्द्धयामां निशां नीत्वा रतिगेहे विवेश सः ॥१०९॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सीताऽग्रे रतिमन्दिरे । पुष्पशय्यादि सम्पाद्य तन्प्रतीक्षां चकार सा ॥११०॥
तावदायांतमालोक्य सहसोत्थाय जानकी । धृत्वा हस्ते रामचंद्रं रतिशालां निनाय सा ॥१११॥
सर्वा विसर्ज्य दासीश्च मुक्ताजालान्यनेकशः । समततो विमुच्याथ तस्थौ रामः स मंचके । ११२॥
ततस्तां मैथिलीं धृत्वा मंचके संन्यवेशयत् । नाना क्रीडां विधायाथ तस्थौ रामः स मंचके ॥११३॥
ततस्तुष्टं रमानाधं जानकी लज्जिताऽब्रवीत् । राम राजोदवत्राक्ष किंचिन्पृच्छामि मे वद ॥११४॥
कुशजन्मानन्तरं हि कथं गर्भो मयान वै । धार्यते कारणं स्वस्य किमस्ति तद्वदस्व माम् ॥११५॥
तत्सीतावचनं श्रुत्वा सस्मित प्राह राघवः । हे सीते कञ्जनयने सम्यक् पृष्टं त्वया मम । ११६॥
तत्सर्वं ते वदाम्यद्य तच्छृणुष्व सुमध्यमे । किमर्थं च बहून् पुत्रांस्त्वमत्र वाञ्छसि प्रिये ।॥११७॥
सदृशे बहवः पुत्रा न योग्यास्त्वत्र वै भुवि । कुर्दकस्य दुराचारात्कुलस्य लांछनं भवत् ॥११८॥
अतएव ममेच्छा न बहुपुत्रेषु मैथिलि । मदिच्छया त्वया गर्भो धार्यते न कदाचन ॥११९॥
पुत्रस्त्वेकः प्रतीक्ष्यो हि यः कुल भूपयेद्गुणैः । किं भ्रात्रा बहवः पुत्रा दुष्टास्ते कुमयो यथा । १२० ।
की आज्ञा देकर स्वयं भी अपने घर चले जात थे ॥१०२॥ सायंकालके समय विधिवृर्वक सन्ध्या और हवन करके धूप-दीप-गन्धादि उपचारोंस भक्तिपूर्वक शिवजीकी पूजा करते थे । १०३ । फिर भोजन करके पुत्रों तथा बान्धवोंके साथ पालकीमें बैठकर देवताओंके मन्दिर को जाते थे ॥१०४॥ साकेतपुरी (अयोध्या) के सब मन्दिरोंमें जाकर शिवाटिक देवताओंको नमस्कार करके फल-फूलसे पूजन करते थे ॥१०५॥ उन्हीं देवालयोंमें थोड़ी देर तक हरिकीर्तन सुनने तथा गणिकाओंका नृत्य देखने थे ॥१०६॥ इस प्रकार विविध कौतुकोंको देखकर राम बहुत प्रसन्न होते थे। तदनन्तर देवताओंका सवारोक कौतुक देखते थे। १०७॥ इसके बाद सवारीपर बैठकर रत्नके बने दीपकोंके प्रकाशमें चलते हुए राजमार्गेसे अपने घर जाते थे ॥ १०८ फिर पुत्रों तथा भ्राताओंके साथ कुछ देरतक इधर उधरकी बात करते और डेढ़ पहर रात बीतनेक बाद रतिशालामें प्रविष्ट होते थे। १०९। उधर सीता अपना रतिशालामे फूलोंकी शय्या बिछाकर रामके आनेकी प्रतीक्षा करती रहती थीं ॥ ११० ॥ वे शमको आते देखती तो तुरन्त आगे बढ़ती और उनका हाथ पकड़कर रतिशालाके भीतर ले जाती थी ॥ १११ ॥ वहाँ सीताका सेवाम उपस्थित दासियोंको बिदा करके रामचन्द्र कमरेकी सारी खिड़कियां खोलकर शय्यापर बैठते थे ॥ ११२ । इसके बाद सीताका हाथ पकड़कर उन्हें भो बैठाते और विविध क्रीड़ा करके सीताको प्रसन्न करने लग जाते थे । ११३ ॥ इस प्रकार प्रसन्न रामको देख-कर एक दिन सीताने लज्जित भावसे कहा- हे राजोवपत्राक्ष राम ! मैं आपसे यह पूछना चाहती हूँ कि कुशके जन्म लेनेके बाद फिर मेरे गर्भ क्यों नही रहता ? इसका कारण बतलाइये ॥ ११४-११५ ॥ इस प्रकार सीता का प्रश्न सुनकर मुस्कुराते हुए राम कहने लगे-हे कञ्जनयनी सीते ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। मैं सब कारण बतलाता हूं । ११६ ॥ हे सुमध्यमे ! तुम सावधान होकर सुनो । हे प्रिये ! पहले मुझे यह बतलाओ कि तुम अधिक पुत्र क्या चाहती हो ? ॥ ११७ ॥ इस संसारके अच्छे कुलम अधिक पुत्र होना ठीक नहीं है। बहुतरे पुत्रोंमें यदि एक पुत्र भी दुराचारी निकल गया तो सारे कुलपर लाञ्छन लग जाता है ॥ ११८ । इसलिये हे मैथिलि ! मुझे अधिक पुत्नोंकी इच्छा नहीं है। मेरी इच्छा न रहनेके कारण ही तुम्हें गर्भ नहीं रहता ॥११९॥
सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१७
दौहित्रार्था कदाचित्तु यथा नेत्रे भुजौ यथा । यथा तौ मणिसूनू च यथाऽहं लक्ष्मणस्तथा ॥१२१॥
तथापि अङ्कौ द्वौ पुत्रौ माऽभूद्भूयोऽपि सन्ततिः । अतः परं पुनः संविन्न जाता दुहितापि वा ॥१२२॥
एकादपि कारणं तत्र कियदिति तदुच्यते मया । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा जानकीं प्राह राघवः ॥१२३॥
स्वकन्या च मया कस्मै देयाऽत्र जगत्त्रये । मत्समो नृपः कोऽत्र मन्त्रीशाऽर्कनिखण्डनात् ॥१२४॥
यस्य पादौ नृपाः सर्वे शिरसा नम्रतां गताः । को योग्यः सन्न मे जामातुश्चरणेऽमृतात् ॥१२५॥
मद्दानवाणां चरणीं विनाऽहं यस्य वै ददाम् । अतस्त्वं सर्वलोकेऽस्मिन्मातृणाम् परा प्रिये ॥१२६॥
कुशादीनां तु याः कन्याश्चामन्द्रे कन्यकेव नित्यशः । किं यावन्मदङ्गात् प्राप्ताऽसि भुवि ले ॥१२७॥
आश्चर्यं विष्णुमायायास्त्रैलोक्यजननीमिति । पदत्रं दिव्यं काम्यं रूपञ्चेह परात्परम् ॥१२८॥
पौरुषं दृश्यते यच्च तत्त्वं सर्वं समाहितम् । अत्र त्वां पृच्छामि ये च मे पुत्रदुहितारस्त्व ॥१२९॥
यष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् । इति यद्वचनं माने मामन्यं विद्धि नो वरम् ॥१३०॥
एकः स तनयो धन्यः कुलं यस्त्वेषयेन्नृषु । कुलेन्धनाय ते पुत्राः शतशो दुष्टमार्गगाः ॥१३१॥
इति यद्वचनं दीने वसिष्ठे तत्स्मृतं नृपैः । अन्यच्चे कारणं वच्मि यस्मान्न बहवः सुताः ॥१३२॥
मया नैवार्पितास्त्वत्र तच्छृणुष्व शुचिस्मिते । विनोदान्न वदाम्यद्य माऽन्यथा कुरु मद्द्वचः ॥१३३॥
बहुपुत्रैश्च नारीणां तारुण्यं व्याहन्यते न हि । मय्यतो नह तारुण्यच्छेदिनी बहुसन्ततिः ॥१३४॥
न मयाऽत्रापिता भीते शुभं विद्धीति मे प्रिये । यदीच्छाऽस्त्येव बहूनां ने तनयानां विदेहजे ॥१३५॥
तर्हि वै द्वापरे कृष्णरूपेण द्वापरूपिणे । दश पुत्रान् प्रदास्यामि तदा तेषां सुखं भव ॥१३६॥
केवल एक ऐसे पुत्रकी इच्छा करना चाहिए कि जो अपने अनोखे गुणसे कुलको विभूषित कर सके। काठोंकी तरह व्यर्थ जन्म लेनेवाले बहुतसे दुष्ट पुत्रोंसे क्या लाभ ॥१३०॥ बस, ये दोनों चिरञ्जीव रहे। ये मेरे दो नेत्र, दो भुजा, चन्द्र, सूर्य और हमारे तथा लक्ष्मणके सदृश हैं। तुम्हारे दो बेटा तो हो गये हैं, अब और सन्तति न हो यही ठीक है। फिर सात न कहा—अग्रिम हमारा कोई कन्या क्यों नहीं हुई ? ॥१२१॥ १२२। इसका क्या कारण है ? सो हमसे कहिये। सीताका यह प्रश्न सुनकर रामने कहा कि यदि तुम्हारा कन्या होती तो मैं किसको देता ? संसारमें कौन ऐसा है, जो मेरा जामाता बन सके ? हमारे बराबर कौन राजा है, जो सातों द्वीपोंका अधीश्वर है ॥१२३॥ १२४॥ जिसके चरणोंको नृप मस्तक झुकाकर प्रणाम कर सकें। संसारमें कौन ऐसा वर मिल सकता है कि सिवा इसके जिसके पैर से अमृत द्रायता हुआ था। इसी कारण मैंने पुत्रीकी इच्छा नहीं की ॥१२५॥१२६॥ फिर कुश आदिके जो कन्याएँ उत्पन्न हुई हैं, वे क्या तुम्हारी नहीं हैं ? हे सीते ! यौवन के मदसे तुम पागल तो नहीं हो गयीं हो ? ॥१२७॥ आश्चर्यकी बात है कि माता होकर भी ऐसी कटपटाती बात कर रही हो। इस संसारमें जितना स्वास्थ्य दिखता है, वह सब तुम्हारे ही अंगसे प्राप्तमान हुआ है ॥१२८॥ संसारमें जितना भी पुरुषरूप है, वह पर प्रधान उत्पन्न हुआ है। यहाँ जितने पुरुष रूप हैं, वे सब तुम्हारे लड़के और लड़कियाँ हैं ॥१२९॥ शास्त्रमें भी यह बात कही गयी है कि ‘एक ही नहीं, मनुष्यको कई पुत्र उत्पन्न करनेकी इच्छा रखनी चाहिए। सम्भव है कि उनमेंसे कोई ऐसा सपूत निकल आये, जो गयामें श्राद्ध करके कुलका उद्धार करे।’ यह एक साधारण बात है। यह कोई श्रेष्ठ उक्ति नहीं कही जा सकती ॥१३०॥ मेरा रायमें तो अपने कुलका विस्तार करनेवाला केवल एक पुत्र ही। दूषित मार्गपर चलनेवाले काँटेकी तरह उत्पन्न सैकड़ों बेटोंसे कोई लाभ नहीं ॥१३१॥ मैं जिस बातको कह रहा हूँ, बहुवस विद्वानों ने उसे श्रेष्ठ माना है। दूसरा कारण यह बतलाता हूँ कि मैंने तुमसे कई पुत्र क्यों नहीं उत्पन्न किये। हे शुचिस्मिते ! मैं विनोदवश इस बातको कह रहा हूँ। इसे व्यर्थ मत जाने देना, ठीकसे समझना ॥१३२॥ बहुत पुत्रोंके होनेसे स्त्रीका तरुनाई नहीं रह जाती। बहुत सन्तान होनेसे तुम्हारे यौवनका नाश हो जाता ॥१३३॥ १३४॥ यही सोचकर मैंने अधिक सन्तति नहीं उत्पन्न की। यह युक्त स्वरूप जानना। हे विदेहजे ! फिर भी बहुत सन्तान पानेकी ही तुम्हारी इच्छा हो तो द्वापरमें कृष्णरूपसे मैं तुम्हें...
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५१८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २०
कन्यामपि तथैकां तेऽहं दास्यामि न संशयः । तदा ते बहुपुत्रैश्च तारुण्यं स्वास्यते न हि ॥ १३७॥
अत स्त्रीणां सहस्राणि षोडशैकशतं पुनः । तथा मुख्याष्टम्यश्च नार्यस्त्वया सह करीम्यहम् ॥१३८॥
तदा बहूनां पुत्राणां स्नुषाणां त्वं सुखं भज । अहं चापि बहुस्त्रीणां तदा सौख्यं भजामि वै ॥१३९॥
इति रामवचः श्रुत्वा तदा सीता स्मितानना । राघव हर्षिता प्राह वाक्चातुर्यं कृतः प्रभो ॥१४०॥
एतल्लक्ष्ण त्वया राम येन रञ्जयसीह माम् । एवं प्रोक्ता मया शिष्य दिनचर्या रमापतेः ॥१४१॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे
उत्तरार्द्धे रामदिनचर्यावर्णनं नामैकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥
विंशः सर्गः
( भगवान्के विविध अवतार )
श्रीरामदास उवाच
अथैकदा वसिष्ठं हि प्रभाते क्षत्रवोद्भवः । किञ्चित् प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वद मुनीश्वर । १ ॥
सर्वं यद्यपि जानामि वाल्मीकेश्च प्रसादतः । तथापि लोकान्सकलान् ज्ञातुं पृच्छामि तेऽद्य हि ॥२।
यदाऽस्माभिर्निद्रायां हि सर्वैर्निद्रा विधीयते । तदा संश्रूयते कर्णे भस्मचक्रस्य वै ध्वनिः ॥ ३ ॥
अमुं मत्संशयं छिन्धि परं कौतूहलं गुरो । लवस्येति वचः श्रुत्वा वसिष्ठस्तमथाब्रवीत् ॥ ४ ॥
बह्व्यश्च ब्रह्महत्याश्च रावणेन कृताः पुरा । येन देहेन सोऽद्यापि लंकायां ज्वलते लव ॥ ५ ॥
रात्रौ रामहस्तेन वधान्मुक्तिं गतः क्षणात् । रामचिंतनपुण्येन वैरबुद्ध्या कृतेन च ॥ ६ ॥
आत्मना सकलं पापं तेन दग्धं पुरैव हि । देहेन न कृतं तस्य देवानां नमनं पुरा ॥ ७ ॥
सम्मार्जनादिकं कर्म देवागारेऽपि नो कृतम् । न कृता तीर्थयात्रा हि तेन देहेन भक्तितः ॥ ८ ॥
दस बेटे दूँगा । उस समय तुम बहुत सन्तानका भी सुख भोग लेना । १३५ ॥ १३६ ॥ उस समय मै तुम्हे एक कन्या भी दूँगा । इसमे कोई संशय नही है । किन्तु इतना अवश्य होगा कि अधिक सन्तान होनेसे तुम्हारा यौवन ढल जायगा । १३७ ॥ इसी कारण मुझे सोलह हजार एक सौ स्त्रियोके साथ विवाह करना पड़ेगा और तुम्हारे साथ आठ मेरो मुख्य स्त्रियो भी होंगी ॥ १३८ ॥ उस समय तुम बहुतसे पुत्रो और बहुओंका सुख भोगीयो और मै भी बहुतसी स्त्रियोका सुख भोग दूँगा ॥ १३९ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर स हाते मुसकाकर कहा— हे प्रभो ! तुमने बातचीत करनेका इतना चतुराई कहाँस सीखा ? जिससे इस तरह मेरा मनोरंजन कर रहे हो । इस तरह रामने बहुत देर तक आपसमे बातें की और दोनों एक दूसरेका आलिङ्गन करके आधी रातके समय सो गये । हे शिष्य ! मैने इस प्रकार तुम्हे रामचन्द्रकी दिनचर्या सुनायी । १४० ॥ १४१ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पण्डितरामतेजशास्त्रिकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहितं राज्यकाण्डे उत्तरार्धे एकोनविंशः सर्गः ॥१९॥
श्रीरामदास कहने लगे—एक दिन सबेरे लवने वसिष्ठसे कहा कि हे मुनीश्वर ! मै आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ उसे आप बताइए । १ । यद्यपि वाल्मीकिजीकी कृपासे मै सब कुछ जानता हूँ । फिर भी संसारी लोगोंको ज्ञान प्राप्त करानेके लिए आज आपसे पूछ रहा हूँ ॥ २ ॥ जब कि रात्रिमें हम लोग सोते हैं, तब कानमें कोंकणीकी तरह किसकी ध्वनि सुनायी देती है ॥ ३ ॥ मेरे इस संशयका निवारण करिए । इसका मुझे बड़ा कौतूहल है । लवकी बात सुनकर वसिष्ठने कहा— ॥ ४ ॥ रावणने जिस देहसे बहुत सी ब्रह्महत्याएं की थीं हे लव ! वह देह आज भी लंकामे जल रही है ॥ ५ ॥ रामके हाथो वध होने, रामका स्मरण करने और उनके साथ वैरबुद्धि रखनेसे रावण क्षण भरमें मुक्त हो गया । आत्माके सारे पापोंको वह पहले ही जला