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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १७ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५०१

सर्गः १७ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५०१

तपसश्च फलैस्तत्र ममासन्सर्वसंपदः अदृष्ट्वा भक्षितुं किंचिन्मया पृष्टः सुरेश्वरः । ७१॥
वर्तन्ते विविधास्तत्र मम भोगाः सुदुर्लभाः । कथं नास्तीहभक्ष्यार्थं कथं मेऽत्र सुखं भवेत् ॥७२॥
इति मद्वचनं श्रुत्वा मामिंद्रः प्राह सस्मितः । नैव दानं त्वया भूमौ कृतं राज्यमदेन हि ॥७३॥
अदत्तं लभ्यते नैव नृप पुण्यैः कदेतरैः । अतस्त्वं प्रत्यहं गत्वा विमानेन सरोवरम् ॥७४॥
भक्षयस्व शवं पुष्टं मिष्टान्नौः पोषितं च यत् चिरकालं भवेत्तच्च क्षुध यास्यात नैव तत् ॥७५॥
इतींद्रवचनं श्रुत्वा स पृष्टश्च पुनर्मया दिव्यान्नानि कथंचाहमाप्नुयां तद्वदस्व माम् ॥७६॥
इति मद्वचनं श्रुत्वा सेंद्रैः प्राह मां पुनः अधुना दण्डकारण्यं वर्तते हीनमानुषम् ॥७७॥
विन्ध्यवृद्धिनिरोधार्थमगस्तिः सुरयाचितः यदा यास्यति पन्त्या वै मुक्त्वा काशीं हि दण्डकम्॥७८।
सरस्यस्मिंस्तदा स्नात्वा स्थितं पश्यसि तं मुनिम् । तदा तस्मै कंकणं स्वं देहि तोयैः परिप्लुतः ॥७९॥
तेन कंकणदानेन दिव्यान्नंः प्राप्स्यसे नृप । इतींद्रवचनं श्रुत्वा तदारभ्य चिरं मुने । ८०.।
अत्रागत्य शवाहारः क्रियते वै सदा मया एतावत्कालपर्यंतं नात्र कश्चिन्मयेक्षितः । ८१॥
मया दृष्टस्त्वमेवात्र वेद्मि त्वां कुम्भसंभवम् । अद्य त्वया तारितोऽहं दानं स्वीकुरु मे त्विदम् ॥८२॥

#### अगस्त्य उवाच
इत्थं स्वर्गी स मामुक्त्वा ददौ कंकणमुज्ज्वलम् मद्य सार्द्धं ततः स्वर्गं ययौ स्वर्गी मुदा युतः । ८३॥
तदारभ्य शवं तोयात्सद्विहस्तन्न ययौ कदा । दिव्यान्नानि तु संप्राप नाकलोके यथामुखम् ॥८४॥
इति यत्कंकणं लब्धं मया लव पुरा वने । अर्पितं राघवायेदं तेन तच्चापि तेऽर्पितम् ॥८५॥

#### श्रीरामदास उवाच
इत्यगस्त्यवचः श्रुत्वा लवः पप्रच्छ तं पुनः । किमर्थं दण्डकारण्यं तद्बभूव विजनं वद ॥८६॥

#### अगस्त्य उवाच
इक्ष्वाकुवंशसंभूतोऽभून्नृपो विन्ध्यदक्षिणे । नाम्ना दण्डकेति ख्यातः पापकर्मरतः सदा ॥८७॥

सब चीजें तो विद्यमान थीं, लेकिन खानेके लिए कुछ नहीं था। तब मैने इन्द्रसे कहा- हे देवेन्द्र ! यहाँ मेरे भोगनेके लिए तो और सब कुछ है, किन्तु खानेके लिए कुछ भी नहीं दीखता। बताइए, इस तरह मैं क्योंकर सुखी रह सकूँगा ॥ ६९-७२ ।। मेरा बातको सुनकर मुस्कराते हुए इन्द्र कहने लगे- तुमने राज्यमद वश पृथ्वीपर कोई दान नहीं किया था । बिना दिये कुछ भी नहीं मिलता। इसलिए तुम प्रतिदिन विमानसे जाकर उस मिष्टान्नसे परिपुष्ट अपने शरीरको खा जाया करा। वह बहुत दिनों तक नष्ट न होकर ज्योंका त्यों बना रहेगा ।। ७३-७५ ।। इस प्रकार इन्द्रकी बात सुनकर मैने कहा- यह बतलाइये कि मुझे स्वर्गीय अन्न किस तरह प्राप्त होगे ? मेरा बात सुनकर इन्द्रने उत्तर दिया कि अभी तो दण्डकारण्य मनुष्यविहीन है। जब विन्ध्य पर्वतकी वृद्धि रोकनेके लिए अगस्त्यजी देवताओंके प्रार्थना करनेपर काशी छोड़कर दण्डकारण्यको जायेंगे, तब तुम इसी सरोवरमें स्नान करके अपना कंकण उन ऋषिकों दे देना ।।७६-७९ ।। उस कंकणके दानसे तुम्हे स्वर्गीय अन्न मिलने लगेगा। अतएव इंद्रके आज्ञानुसार मै बहुत दिनोंसे आकर यह शव खाया करता हूँ। इतने दिन बीत गये, किन्तु यहाँ मुझ कोई नहीं दिखायी पड़ा ॥ ८० ॥ ८१ ॥ आज तुम्ही दीख रहे हो। इससे ज्ञात होता है कि तुम अगस्त्य ऋषि ही हो। आज तुमने मेरा उद्धार कर दिया। अब कृपा करके मेरे दानको स्वीकार करो ॥ ८२ ॥ अगस्त्यने कहा कि इस तरह कहकर उस स्वर्गीय प्राणीने अपने कंकण उतारकर हमें दे दिये और प्रसन्न मनसे विमानपर सवार होकर स्वर्गलोकको चला गया। तबसे वह शव उस सरोवरमें कभी नहीं उतराया और वह स्वर्गी स्वर्गलोकमें दिव्य अन्नोंको पाने लगा। हे लव ! मैने जिस कङ्कणको उस समय दण्डकारण्यमें पाया था, उसे रामको दिया और रामने आज आपको दे डाला है। श्रीरामदासने कहा- तब लवने अगस्त्यसे पूछा कि उस वनका दण्डक यह नाम क्यों पड़ा ? अगस्त्य कहने

५०१ ] आनन्दरामायणे [ सर्गः १७

एकदा स वनं यातो मृगयार्थं स्वसेनया । ततो दृष्ट्वा मृगं राजा मृगपृष्ठे ह्यद्रुदुवे ॥८८॥
एकाकी हयमारूढो देशान्देशान्तरं ययौ एवं हि गच्छतस्तस्य मृगोऽन्तर्धानमन्वगात् ।८९।
ततः सोऽतितृषाक्रान्तः प्रययौ वै जलाशयम् । तत्र पीत्वा जलं स्वच्छं स राजा साममन्तके ॥९०॥
अज्ञात्वा स्वगुरोर्वेश्म भृगोराश्रममाययौ । तत्र तां वदतां सामग्न्यङ्कां भृगोः सुताम् ।९१।
दृष्ट्वा चन्द्राननां राजा सोऽभूत्कामविमोहितः । ततस्तां प्रार्थयामास रम्यार्थे साऽब्रवीन्नृपम् ।९२।
स्वत्रशा नून नैवाहं ताताधीनाऽस्मि साम्प्रतम् । बहिर्भूतोऽद्य गुरुरन्तस्त्वया वेद्योऽहं नृपम् ९३॥
यदि मामिच्छसि त्वं हि तर्हि तं स्वगुरुं भृगुम् । प्रार्थयित्वा मज सुखं मां पत्नीं त्वं विधाप च । ९४ ।
इत्युक्तोऽपि तया राजा दण्डस्तां कामपीडितः । भुक्त्वा सुखं बलादेव जगाम नगरीं निजाम् ॥९५।
ततोऽरजस्का सा बाला दृष्ट्वा तातं समागतम् । श्रावन्ती सकलं वृत्तं श्रावयामास विह्वला ॥९६।
तद्वृत्तं स मुनिः श्रुत्वाऽक्ष्णोः क्रुद्धो जलं कुधा । अब्रवीन्मत्सुतां बालां मां नयन् रक्तलोचनः ॥९७।
दण्डेन सह दण्डस्य राज्यं वै शतयोजनम् । भस्मस्य भगवाद्दर्ष मद्वाक्याच्च समन्ततः ।९८॥
हीनोदकं तथा वास्तु तथा नष्टचरानरम् । इति तच्छापमाकर्ण्य तात सम्प्रार्थ्य बालिका ॥९९॥
प्रार्थयामास शापस्य सप्तावधिं विनयान्विता । ततो भृगुः सुतामाह यदा यास्यति कुंभजः ॥१००॥
मुनिः काश्यास्तूर्णं देशं तदाऽयं मजलो भवेत् । देशस्याऽस्य दासं हि करिष्यति मुनीश्वरः ॥१०१॥
अरण्यं दण्डकादीहि जातं तस्मान्तदा नराः । अमुं देशं वदिष्यन्ति दण्डकारण्यमेव हि ॥१०२॥
यदा भविष्यत्यग्रेऽत्र रामागमनमुत्तमम् । भविष्यन्ति तदाऽग्रेऽत्र नानाक्षेत्राणि दण्डके ॥१०३॥
रामप्रसादात् क्षेत्राणि भविष्यन्ति ततो जनाः । रामक्षेत्राभिधं सदा वदिष्यन्ति हि दण्डकम् ॥१०४॥
मुनिराप्रप्रसादाच्च देशोऽयं पुनःपुनः । भविष्यत्युत्तमं पुण्यंः सौख्यदश्च मनोरमः ॥१०५।

रुवे—इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न दण्डक नामका एक बड़ा भारी राजा था। वह सदा पापकर्मम रत रहा करता था ॥८१-८७॥ एक बार वह शिकार खेलनेके लिए अपनो सेनाके साथ वनमें गया। वहाँ एक मृगके पीछे राजाने अपना घोड़ा दौड़ाया। वह अकेला ही उस मृगके पीछे पीछे भागता हुआ देशान्तरमें आ पहुंचा और वहाँ वह मृग गायब हो गया। इसके बाद बहुत प्यासा वह राजा एक जलाशयके तटपर गया। वहाँ जल पिया, किन्तु उस यह नहीं ज्ञात हुआ कि मैं अपने गुरु भृगुके आश्रमपर पहुंच गया हूँ। वहाँ भृगुकी कन्या थी। जिसका कि अभी रजोधर्म नष्ट हुआ था उस चन्द्रमाके सदृश मुखवाली (चन्द्रानना) कन्याको देख-कर राजा काममोहित हो गया और उसके समीप जाकर रतिके लिए प्रार्थना की। कन्याने उत्तर दिया कि हे राजन् ! मैं स्वातन्त्र नहीं हूँ। इस समय मेरे ऊपर पिताका अधिकार है और भृगु (मेरे पिता) इस समय कही बाहर गये हुए हैं मैं बापको जानता हूँ ॥८८-९३। यदि आप मुझे चाहते हों तो अपने गुरु (भृगु) के जाकर कहें और मुझे अपनी पत्नी बनाकर आनन्दके साथ भोग करें। उसके ऐसा कहनेपर भी राजाने एक न सुनी और हठात् उसके साथ भोग करके अपनी नगरीको लौट गया। इसके अनन्तर जब उसके पिता भृगु घर आये तो विलाप करती हुई उस अरजस्का कन्याने सारा समाचार कह सुनाया। इस वृत्तान्तको सुनते ही भृगु मार क्रोधके लाल हो गये और अञ्जलीमें जल भरकर कन्याको सान्त्वन देते हुए उन्होंने शाप दिया कि दण्डकके साथ-साथ उसका सौ योजन राज्य चारों ओरसे जलकर भस्म हो जाय ॥९४-९८॥ उतनी जगहपर जल भी न रहे और न कोई जीव ही निवास करे इस प्रकार शाप सुनकर कन्याने विनय-पूर्वक प्रार्थना की कि अपने इस शापकी अवधि भी नियत कर दीजिये। कन्याके प्रार्थना करनेपर भृगुने कहा कि जब अगस्त्य महर्षि काशी छोड़कर विन्ध्यके उस पार चले जायेंगे। उस समय वह स्थान सजल हो जायगा और वहाँ बड़े-बड़े ऋषि निवास करेंगे। राजा दण्डकके दुराचारसे उस देशकी ऐसी दशा हुई है। इसीलिए लोग उसे दण्डकारण्य कहा करेंगे ॥९९-१०२॥ आगे चलकर जब रामचन्द्रजी इस देशमें जायेंगे तो उसमें कितने ही क्षेत्र बन जायेंगे और तबसे लोग उसो दंडकारण्यको रामक्षेत्रके नामसे पुकारेंगे ॥१०३॥ १०४॥ अगस्त्य

सर्गः १८] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५०३

देशेभ्यः सकलेभ्यश्च सुपूज्यं दण्डकं भवेत् । दण्डकेन समो देशो न भूतो न भविष्यति ॥१०६॥
इति तां बालिकांमुक्त्वा भृगुस्तस्माद्धमालयम् । ययौ तां मुनये दत्त्वा विधिना मुनिसंयुतः ॥१०७॥
भृगोः शापाच्च दण्डेन दग्धं तद्राज्यमुत्तमम् । शतयोजनमानं तदभवद्वि समंततः ॥१०८॥
मद्रामागमनारम्यं भवतः स्वस्थं नभूद् तत् । पूर्ववद्दण्डकारण्यं चराचरसमाकुलम् ॥१०९॥
इति त्वया यथा पृष्टे तया लव मयोदिते । कंकणस्य दण्डकस्य विचित्रे त्वां कथानके ॥११०॥

श्रीरामदास उवाच
इत्यगस्तिमुखाच्छ्रुत्वा लवस्तुष्टोऽभवत्तदा । नत्वा मुनिं च श्रीरामसेवायांतत्परोऽभवत् ॥१११॥
अथ रामश्चोत्सवेन तस्मै चित्रांगदाय ताम् । हेमा ददौ विवाहेन महामंगलपूर्वकम् ॥११२॥
पारिबर्हं ददौ कोटिमितं वारणादिकम् । महामहोत्सवश्चासीदयोध्यायां प्रमोगृहे ॥११३॥
ततो विसर्जयामास चोग्रबाहुं नृपं प्रभुः । मुनयः पार्थिवाश्चापि ययुः स्वं स्वं स्थलं प्रति ॥११४॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्धे
हेमास्वयंवरो नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥


अष्टादशः सर्गः

( राम द्वारा ब्राह्मणोंको रामनाथपुर राज्यका दान )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामस्त्वयोध्यायां रंजयामास जानकीम् । जुगोप मेदिनीं कृत्स्नां सप्तसागरमेखलाम् ॥ १ ॥
राममुद्रां विना कस्य साकेते शस्त्रधारिणः । नैवासीत्तुप्रवेशश्च रामराज्ये कदाचन ॥ २ ॥
नैवासीन्निर्गमश्चापि विना मुद्रां कदा बहिः । राममुद्रांकितं पत्र गृहीत्वा ते नृपोत्तमाः ॥ ३ ॥
समप्रगश्ने चक्रूर्म्यां कुत्राप्यकुण्ठिताः । राममुद्रास्वरूपं च ते वदामि शृणुष्व तत् । ४ ॥


मुनि तथा रामचन्द्रकी कृपासे वह देश फिर उसीका त्यों हो जायगा और वहाँके लोग सुखी ही जायेंगे। फिर वहाँ सुन्दरता दिखायी देने लगेगी वह पृथ्वीके समस्त देशोंसे पवित्र देश माना जाने लगेगा ॥ १०५ ॥ उस बालिकासे भृगुने कहा-भविष्यमे लोग कहेंगे कि दण्डकारणयके समान न कोई देश हुआ है और न होगा ॥१०६॥ ऐसा कहकर भृगुने उसे एक मुनिको सौंप दिया और स्वयं बहुतसे ऋषियोंके साथ तपस्या करनेको हिमालय-पर्वतपर चले गये। इस प्रकार भृगुके शापसे दण्डकका सौ रोजन राज्य जल-भुनकर राख हो गया । १०७ ॥ ॥ १०८ । हुम्हार और रामके आगमनसे यह फिर पूर्ववत् हो गया और उसमें विविध प्रकारके जीव-जन्तु आकर निवास करने लगे । इस प्रकार हे लव ! तुमने हमसे जो प्रश्न किये, सो दण्डकारण्य तथा इस कंकण-विषयक कथानक वह सुनाया ॥ १०९ । , ११० ॥ श्रीरामदासने कहा-इस तरह अगस्त्यकी बात सुनकर लव परम प्रसन्न हुए और अगस्त्यजीको प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रकी सेवाम लग गये ॥ १११ ॥ इसके अन्तर रामने उत्सवके साथ उस हेमा कन्याका विधिवत् ससमारोह विवाह करके चित्राङ्गदको दे दिया। उन्होंने कन्याके विवाहमें दहेजस्वरूप बहुतसे हाथा-घोडे आदि करोडोंकी सम्पत्तिका दान दिया । इसके बाद महाराज उग्रबाहुको विदा किया और निमंत्रणमें आये हुए राजे तथा ऋषिगण अपने-अपने स्थानको लौट गये ॥ ११२-११४॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'-भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्धे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

श्रीरामदास बोले—इसके बाद रामचन्द्र सीताको प्रसन्न करते हुए सप्तसागर मेखालाबाली पृथ्वीको रक्षा करते रहे। रामके राज्यमें कोई भी शस्त्रधारी मनुष्य विना राममुद्रा-अंकित पत्र लिये नहीं आता था और बिना मुद्राके कोई बाहर भी नहीं जाने पाता था । राममुद्रासे चिन्हित पत्र लेकर संसार भरके राजे जहाँ चाहूँ

५०४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १८

तिर्यग्रूपं पञ्चदश रक्ता रेखाः प्रकल्पयेत् । पीता प्रथमिका पंक्तिश्चतुर्दिक्षु प्रकारयेत् ॥ ५ ॥
पंक्तिर्द्वितीया शुक्लैव सातव्या च तथाष्टमी । नवम्यैशानिदारभ्य तृतीयायां प्रकल्पयेत् ॥ ६ ॥
वक्ष्यमाणपदान्येव कृष्णानि हि समाचरेत् । आरभ्योत्तरस्यां हि समाप्तिर्दक्षिणे स्मृता ॥ ७ ॥
पश्चिमाभिमुखा स्थाप्या मुद्रा तत्रात्मसम्मुखा । पूर्वास्थेन सदा स्थेयं तदा कर्त्रा विनिश्चयात् ॥ ८ ॥
प्रथमं हि द्वितीयं च चतुर्थं पञ्चमंस्तमे । अष्टमं नवमं चैव तथैकादशमुच्यते ॥ ९ ॥
सप्तमस्तृष्ट्यां पंक्तौ हि चतुर्थं षष्ठमष्टमे । तथैकादशमं ज्ञेयं पञ्चमायाः क्रमोऽधुना ॥ १० ॥
प्रथमं हि द्वितीयं च चतुर्थं पञ्चमंस्तमे । नवमंैकादशे चापि षष्ठायाश्च क्रमोऽधुना ॥ ११ ॥
प्रथमं हि द्वितीयं च चतुर्थं षष्ठमुत्तमम् । नवमैकादशे चापि सप्तमो सकलाऽसिता ॥ १२ ॥
नवम्याः प्रथमं कृष्णं द्वितीयं हि चतुर्थकम् । षष्ठं हि सप्तमं चापि नवमं दशमं स्मृतम् ॥ १३ ॥
तथैव द्वादशं चापि दशम्याश्च क्रमोऽधुना । चतुर्थं च तथा षष्ठं सप्तमार्कं तथाऽसिते ॥ १४ ॥
एकादश्याश्च प्रथमं द्वितीयं हि चतुर्थकम् । पञ्चमंनवमान्येव दशमार्कं यथाऽसिते ॥ १५ ॥
द्वादश्याः प्रथमं कृष्णं द्वितीयं हि चतुर्थकम् । षष्ठं च सप्तमं चापि राष्टमं नवमं तथा ॥ १६ ॥
दशमार्कं तथा प्रोक्ता कृष्णा कृष्णता त्रयोदशी । एव बुद्ध्या पूरयित्वा राजा रामेति वै स्फुटम् ॥ १७ ॥
सितवर्णं शमनाममुद्रायां हि निर्गसयेत् । एवं राममुद्रिकायाः स्वरूपं ते मयोदितम् ॥ १८ ॥
एवं मुद्रांकितां रामाः शिलां विप्रेश्य आदरात् । ददौ साद्यापि भूम्यां हि रामनाथपुरेऽस्ति हि ॥ १९ ॥

विष्णुदास उवाच

किमर्थं भूसुरेभ्यश्च राघवेण समर्पिता । रामनाथपुरे पूर्वे स्वीयमुद्रांकिता शिला ॥ २० ॥
हत्सर्वं विस्तरेणैव कथयस्वाद्य मा गुरो । आश्चर्यं त्वतया प्रोक्तं श्रोतुमिच्छामि त्वन्मुखात् ॥ २१ ॥

श्रीरामदास उवाच

एकदा राघवं श्रुत्वा विप्रा अञ्चितदायिनम् । ह्योद्विबह्मपुरम्प्रान्ते दाक्षिणात्या द्विजोत्तमाः ॥ २२ ॥


आते-जाते कहीं भी उन्हें रोक नहीं थी, अब मैं तुम्हें राममुद्राका स्वरूप बताता हूँ, सो सुनो ॥ १-४ ॥
लाल रंगकी खड़ी-बेड़ी पन्द्रह रेखाएँ खींचे। उनके चारों ओरकी पहली पंक्ति पीले रंगसे रंगे ॥ ५ ॥ दूसरी
और आठवीं पंक्ति सफेद ही रहने दें। इसके बाद ईशानकोणसे लेकर तीसरी रेखातक आगे कही जानेवाली
पंक्तियाँ काले रंगसे लिंपे। लिखवट उत्तरकी तरफसे प्रारम्भ करके दक्षिणमें समाप्त करनी चाहिए। ६-७॥
मुद्राका मुख सदा सामने अर्थात् पश्चिमाभिमुख बनाये और स्वयं पूर्वकी ओर मुख करके बैठे। ८ । पहली,
दूसरी, चौथी, छठवीं, सातवीं, आठवी, नवी, ग्यारहवीं और पाँचवीं रेखाके चौकियों तथा पहली, दूसरी, चौथी,
छठवीं, नवीं, ग्यारहवी तय सातवीं चौकी यह सब काले रंगकी रहेंगी। ९-१०। फिर नवौं रेखाकी पहली, दूसरी,
चौथी, छठी और आठवी चौकी का काले रंगकी रहेंगी। ६-११ फिर ग्यारहवी रेखाकी पहली, दूसरी, चौथी,
छठीं, आठवीं, नवीं तथा दशवीं चौकी भी काले रंगकी रहेगी। बारहवीं रेखाकी पहली, तीसरी, दूसरी, चौथी,
छठी, सातवी, आठवी, नवीं दसवीं, बारहवीं तथा तेरहवी चौकी भी काले रंगकी रहेंगी। इस प्रकार अपनी
बुद्धिसे उपर्युक्त कोष्ठकोंको पूर्ण करनेसे 'राजा राम' यह शब्द साफ-साफ सफेद वर्णमें लिख जायगा
॥ १२-१७ ॥ इस तरह मैंने तुम्हें राममुद्राका स्वरूप बतलाया। इस प्रकारकी मुद्रासे चिह्नित शिला रामने
ब्राह्मणोंको दानस्वरूप दी थी जो आज भी रामनाथपुरमें रहनेवाले ब्राह्मणोंके पास विद्यमान है। १८-१९॥
विष्णुदासने पूछा कि रामने रामनाथपुरवाले उन ब्राह्मणोंको वह अपनी मुद्रासे अंकित शिला किस लिये दी
थी? यह सब कथा विस्तारपूर्वक हमें बतलाइये। आपने यह आश्चर्यभरी बात कह दी। इसका पूरा विवरण
मैं आपके ही मुखसे सुनना चाहता हूँ। २०॥ २१॥ श्रीरामदास कहने लगे कि एक समय रामचन्द्रकी यह