सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २] मनोहरकाण्डम् ५६७

सर्गः २] मनोहरकाण्डम् ५६७


तदा ह्यहं मानुषीन्द्रमन्य जन्म्यां घटेन्न मे । यदाहं मानुषी नैव न चैवान्या कदाचन ॥१०९॥
मानुषी राक्षसी चैवीत्यादि नामानि यानि च । देहापेक्षेण वर्त्तन्ते देहस्तु नश्वरः स्मृतः ॥११०॥
देहाद्भिन्नोऽस्मि काष्ठेभ्यो यथा वह्निर्विवेकिनाम् । धार्यमाणोऽथ भूत्वाऽहं धारये चेति वेद्म्यहम् ॥१११॥
इदानीं तु मया ज्ञातं यथा विष्णुस्तथा त्वहम् । नानारूपाणि सोऽप्यत्र मत्स्यादीनि दधाति हि ॥११२॥
तथा नानाम्वरूपाणि धार्यन्तेऽत्रापि वै मया । एवमेव हि वस्त्वस्ति नहि मे तस्य चान्तरम् ॥११३॥
स्वतन्त्रोऽस्ति महाविष्णुस्त्वहं विष्णुवशा गता । अतो विष्णोः कला चाहं मन्येयं मदाशयः ॥११४॥
विष्णोर्मे नैव भेदोऽस्ति यथा गङ्गाजले घटे । तत्रैवाssपत्य तद्गच्छे द्विश्वगेवाह्यमस्मि हि ॥११५ ।
अहमेव यदा विष्णुस्तदा किं चावशेषितम् । व्यष्टव्यं न ममाद्य जीवन्मुक्ताऽहमस्मि वै ॥११६॥
एवं सुमित्रा संचिन्त्य गताज्ञाना मुदान्विता । अतिलङ्घ्य निशां सा भा प्रभाते राघवं ययौ ॥११७॥
गत्वा रामं तदा प्राह मया सर्वं विचिन्तितम् । का त्वं पृष्टो मया पूर्वं तदहं ननु राघव ॥११८॥
स्वतो नान्यच्च प्रष्टव्यं त्वद्विद्वाऽहं कदापि न । इत्युक्त्वा सा यथा गेहे निश्चित्य हृदि मद्रितम् ॥११९॥
तत्सर्वं श्रावयित्वा तं जीवन्मुक्ताऽभवत्तदा सुमित्रां राघवोऽप्याह गच्छाय यथा विचिन्तितम् १२०।
जीवन्मुक्ताऽसि चाध्वन्त्वं गच्छ गेहं सुखं वस । ततः सुमित्रा नमस्कृत्य गच्छेण नृपसत्तम ॥१२१॥
सीतां चापि पृथक् नीत्वा ययौ लक्ष्मणगेहकम् । एवं विचार्य मया प्रोक्तं काऽहं चेति विचारणः ॥१२२॥
जीवन्मुक्ता सुमित्रा सा बभूव सुवनिर्मला । अन्यच्च ते वदाम्यद्य तच्छृणुष्व द्विजोत्तम ॥१२३॥

रामने हमसे यही पूछा है न कि मै कान हूं ? सो इसका क्या उत्तर दे । आखिर मै देवी हूं, दानवी हूं, राक्षसी हूं या मानुषी या क्या हूं ? यदि रामसे जाकर कहूं कि मै मानुषी हूं, तो भी नहीं बनता । क्योंकि ऐसा कहना हम नाटकक पात्रका तरह अनेक रूप धारण करने वाले हैं । इससे निश्चय हुआ कि मैं न मानुषी हूं, न और हो कुछ । पूर्वापर बात मानुषी आदि सारे शरीरों हम देखती हूँ और यह देह नाशवान् पदार्थ है। इससे यह मालूम होता है कि इन समस्त पूर्व्व हो मै धारि हूं और पूर्वापर तरह तरहके रूप धारण करती हूँ। लेकिन यह जो मैं हूँ वह तो नहीं नष्ट जान पड़ता ॥ ११० - १११ ॥ हाँ, सब यह ज्ञात हुआ। जिस तरह भगवान् अनेक रूप धारण करके इस दृष्टिमण्डलमे आते हैं ठीक उसीकी तरह मै भी हूं । वे भी मत्स्य-कूर्म आदि कितने अवतार धारण करके आते हैं तो मैं भी इस समय मनुष्य विवेचक प्रकारक रूप धारण करके जगतम मै भी जाती आती हूं । फिर हम और विष्णु भगवान्‌मे अन्तर ही क्या है ? ॥११२॥११३॥ अन्तर यही है कि विष्णु स्वाधीन है और मै विष्णुभगवान केही अधीन हूं। अतएव यह निश्चय हुआ कि मै विष्णुभगवान्‌की एक कला हूँ ॥ ११४ ॥ अब यह भी निश्चित हो गया कि हममे और भगवानमे कोई भेद नहीं है। जिस तरह गङ्गाका जल गङ्गाके प्रवाहस बहता हुआ गङ्गाजल रहता है, उसी तरह घटमे आकर भी गङ्गाजल ही रहता है। इसका सार यह निकला कि हममें और भगवान्‌में कोई भेद नहीं है। हम और भगवान् एक ही है। जब मै स्वयं विष्णुभगवान् हूं तो बाकी क्या रहा जो जाकर रामसे पूछूं । मैं तो जीवन्मुक्त हूँ ॥११५॥११६॥ इस प्रकार विचार करनेसे उनका अज्ञान नष्ट हो गया। वह रात्रि बिताकर सवेरे प्रसन्नतापूर्वक रामके पास पहुंचीं । ११७ ॥ वहां रामको प्रणाम करके सुमित्रा कहने लगीं-कल आपने मुझसे जो पूछा था कि मै कौन हूं ? सो विचार करनेपर मुझे मालूम हुआ कि मैं साक्षात् ब्रह्म ही हूं ॥ ११८ ॥ अब मुझे आपसे कुछ भी नहीं पूछना है । क्योंकि मैं आपसे पृथक् हूँ ही नहीं ऐसा कहकर रात्रिमे उन्होंने अपने हृदयमें जैसा विचार किया था सो कह सुनाया । वह सब सुनकर वह वास्तवमे जीवन्मुक्त हो गयी यह सीखकर रामने कहा- हे माता ! तुमने बहुत ठीक विचार किया है ॥ ११९ ॥ १२० ॥ अब तुम जीवन्मुक्त हो गयी। जाकर आनन्दसे अपने घरमे निवास करो। इससे सुमित्राका मोह नष्ट हो गया और वे राम तथा सीता दोनोंको अलग अलग प्रणाम करके लक्ष्मणके यहां चली गयी। हे शिष्य ! इस विचारसे कि मै कौन हूं, सुमित्रा जीवन्मुक्त हो गयीं और उनके आनन्दका ठिकाना नहीं रहा। हे द्विजोत्तम ! मै तुम्हें एक और वृतान्त बतलाता हूं, सो सुनो

५१८आनन्दरामायणे[ सर्गः २

एकदा राघवं दृष्ट्वा कौसल्या जानकी रहः । आसने चित्रशालायां सीतया सह संस्थितम् ॥ १२४॥
एकान्तेऽथ समेत्याथ श्रीरामं सान्त्व्य विष्णुमव्ययम् । राम त्वं महतामहो किञ्चिदुपदिशस्व माम् ॥ १२५॥
तन्मातृवचनं श्रुत्वा श्रीरामो विस्मयं ह्यगात् । चाप्रभाते समुत्थाय गन्ता गोष्ठं कियान्क्षणम् ॥ १२६॥
धन्या गोस्तनदुग्धाशनिमग्नास्ता न संशयः । मयात्रिकथ्यते नाहि त्वमस्य वचनान्मम ॥ १२७॥
उपदेशं करिष्यामि नतोऽहं तव वत्सलः । इत्याद्यं वचनं श्रुत्वा कौसल्या विस्मिता तदा ॥ १२८॥
मत्वा रामं ममार्तं न तूर्णमेव गृहं ययौ । ततो निजं समभ्यर्च्य कौसल्याऽथारुणोदये ॥ १२९॥
गोष्ठं गत्वा क्षणं स्थित्वा धेनुवत्सरवाञ्च सा । अह मा नित्विति श्रुत्वा सुश्रवा वै मुहुर्मुहुः ॥ १३०॥
तानि वाक्यानि वत्सानां श्रुत्वा चित्तेऽविचारयत् । अह मानित्विति रुतस्य किं भवेदिति सुस्पष्टुम् ॥ १३१॥
इमानि किं बोधयन्ति मां वत्साश्च मुहुर्मुहुः । इत्यात्माराममथ ध्यात्वा हृदि सम्यग्विचार्य च ॥ १३२॥
वत्सवक्यार्थं कौसल्या गताऽथात्मारामं ययौ । तत्र गत्वाऽथ तं रामं नत्वा तं प्राह हर्षिता ॥ १३३॥
राम विष्णो रमानाथ वनदाऽहं परात्मने । भव्यंऽहं रामचन्द्र गताज्ञानाऽस्मि राघव ॥ १३४॥
तवोपदेशवाञ्छा मे न किञ्चिद्रामचन्द्र मयि । लब्धत्वाज्ज्ञानं मया रामावनावस्मिन् कदापि न ॥ १३५॥
तन्मातृवचनं श्रुत्वा कौसल्यां प्राह राघवः । वत्सानां वैः कथं लब्धं त्वया ज्ञानं वदस्व माम् ॥ १३६॥
तद्राघववचनं श्रुत्वा कौसल्या प्राह राघवम् । अह मानित्वि वाक्यानि तेषां श्रुत्वा रघूत्तम ॥ १३७॥
इमानि किं बोधयन्ति मां वत्सोक्तिरिति वै मुहुः । एवं विचारितं ध्यात्वा क्षणं स्वहृदये मया ॥ १३८॥
वाक्यार्थश्च मया ज्ञातस्त्वहं मानं करोति जनः । यस्तस्माद्देव वेश्यन्ति न ज्ञानेन जनेन्सु यत् ॥ १३९॥
अहङ्कारी देहपदो यदा स्यात्सो व्यर्थश्च हि । अतः देहि वह मावा चेति बुद्धिर्गता मम ॥ १४०॥


॥ १२१-१२३ ॥ एक दिन सीताके साथ रामको चित्रशालामें देखकर उनकी माता कौसल्या उन एकान्त स्थानमें रामके पास आ गई और उस प्रकार सन्मान किया और कहने लगी— हे महाबाहो राम ! मुझे भी कुछ उपदेश दे दो। तुम साक्षात् प्रभु जुझ भक्तोंकी भक्ति ही जानते ॥ १२४॥ १२५॥ माताकी ऐसी बात सुनी तो उन्होंने मुस्कराकर कहा कि आप गोशालामें जाइए और वहांपर कुछ देर तक बछड़ोंकी आवाज सुनकर उसपर ध्यानकर के विचार कर फिर मेरे पास आइए। उस समय इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मैं आपको उपदेश दूंगा। रामका यह वचन सुनकर कौसल्या विस्मित भावसे सोचा और रामको प्रणाम करके अपने महलमें चली गईं। तदनन्तर अपने नित्यकर्म समाप्तकरके अरुणोदयके समय कौसल्या गोशालेमें पहुँचीं, वहाँ थोड़ी देर तक उन्होंने बछड़ोंकी आवाज सुनी। बछड़े "अहंभा-अहंमा" की आवाज लगा रहे थे और कौसल्या शान्त चित्तसे विचारने लगीं ॥ १२६-१३० ॥ बछड़ोंके इन वाक्योंको सुनकर उन्होंने अपने मनमें विचार किया कि यह बछड़ा बार-बार "अहं मा" कह कर चिल्ला रहा है इसका क्या मतलब है। ये बछड़े बार-बार चिल्ला कर क्या शिक्षा सीख रहे हैं। ऐसा सोचकर कौसल्या ने थोड़ी देर तक ध्यानपूर्वक इन बातोंपर विचार किया जिससे क्षणभरमें उनका अज्ञान नष्ट हो गया और प्रसन्न मनसे रामके पास पहुंचीं। वहाँ रामको प्रणाम करके कहने लगीं ॥ १३१-१३३ ॥ हे रमानाथ ! हे राम ! हे विष्णो ! आपके कथनानुसार मैंने बछड़ोंकी आवाज सुनी जिससे मेरा अज्ञान नष्ट हो गया, इससे अब हमें आपका उपदेश सुननेकी इच्छा नहीं है। इस प्रकार अज्ञान दूर होनेपर मैं जन्म और मरणसे कोई भय नहीं देखती ॥ १३४, १३५ ॥ इस प्रकार कौसल्याके वचन सुनकर रामने उनसे कहा कि उन बछड़ोंके शब्दसे तुमने ज्ञान किस प्रकार प्राप्त हुआ, कृपाकरके बताइए ॥ १३६ ॥ रामके वचन सुनकर कौसल्याने कहा कि जबके 'अहं मानित्वं' इस प्रकारके मुहुर्मुहुः कहते हैं कि ये बछड़े अपने वाक्यसे किस बातका बोध करा रहे हैं। तदन्तर मैंने अपने मनमें विचार किया ॥ १३७, १३८ ॥ तब मुझे उसका अर्थ ज्ञात हो गया। जिसका तात्पर्य यह था कि हे संसारके लोगों ! 'अहं मा वद' मैं हूँ, ऐसा अहंकार मत करो। ये बछड़े सदा लोगोंको यह पुकार उपदेश देते रहते हैं। फिर भी लोग नहीं समझ पाते ॥ १३९ ॥ मैंने

सर्गः २ ] मनोहरकाण्डम् ५९


देहबुद्धिर्यदा नष्टा तदा किं शेषमस्ति हि । सुखं दुःखं तु देहस्य न मे किञ्चिद्भवेन्नर ॥४१॥
तिष्ठन्त्वयं वा पततु देहो भोगाश्रयः प्रभो । अहं स्वदंश एवात्र पृथगुपाधिकः स्मृताः ॥४२॥
यथा कुम्भे गर्भिण्यो दृश्यन्तेऽत्र ह्युपाधितः । तथोऽहं ... भिन्ना व्योमवद्व्यापको ह्यहम् ॥४३॥
इति तन्मातृवचनं श्रुत्वा रामः स्मिताननः । कौशल्यां प्राह जननीं मुक्ताऽस्म्यत्र न संशयः ॥४४॥
मयाप्येवं स्थितं चित्ते द्वावद्याप्यर्थं विमृश्य । गच्छ पितुः सुतं गेहे नित्यं बुद्धिं दृढां कुरु ॥४५॥
किमर्थं न मया पूर्वं युष्मभ्यमुपदेशनम् हि । उपदेशः गुरुर्ज्ञेयः सन्मर्त्ये न्य निक्षिपम् ॥४६॥
उपदेशो गुरुर्ज्ञेयो युष्माकं तनयोस्म्यहम् । कथं युष्मास्वत्र मान्यन्माह चोपदि शाम्यहं ॥४७॥
स्त्रीणां पतिर्गुरुर्ज्ञेयः श्रीनिर्मान्यो गुरुः सदा । कार्यस्तस्मान्मया नैव युष्मभ्यं स्वाम्योपदेशिकम् ॥४८॥
पौराणां च गुरुश्वात्तथा स्वीयपुरोहितः । अननेन यदि नया स्वान्दास्योपदेशिकम् ॥४९॥
परार्थ्यरेव पृथक्काप्युपदेशः कृतो मया । गच्छ गेहे पुरा तिष्ठ सदा मां परिचिन्तय ॥५०॥
इदं रामवचनं श्रुत्वा कौशल्या तुष्टमानसा । रामं नत्वा ययौ गेहं प्रहृष्टा संस्थिता सुखम् ॥५१॥
एवं ता रामचन्द्रेण प्रेषिता मातरः शुभाः । स्वस्वान्तःपुरे सर्वे सर्वाः व्यहेतान्मुमुदुः सुखम् ॥५२॥
रामसान्निध्यमात्रेण विमुक्तास्तन्मयास्थिताः । रामु गन्तुं वैकुण्ठं राघवेश्चैव संस्तुताः ॥५३॥
शिष्य तासां महद्रूपं यासां गणादिनिर्मिभिः । एतन्ले करादिस कर्मक हर्योऽभवन्निर्विषाः ॥५४॥
एवं शिष्य मया प्रोक्ता नामामृतमगोश्वर । उपदेशस्तथा तासां प्रोक्ताश्चाग्रेव ते मया ॥५५॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे ... सर्गः ॥ २ ॥


जब यह समझ लिया है कि यह 'देह' मेरा देहम् रूपान्तर अथवा छू-आत्मभाव से तबसे मैंने इसका परित्याग कर दिया है। परमात्माके रूपसे मेरा यह द्वैतबुद्धि भी नष्ट हो गयी है कि मे इनकी हूँ ॥४०॥ जब कि यह बुद्धि नष्ट हो गयी, तब फिर बची ही क्या वस्तु । हे रघुनन्दन ! मैने समझा है कि म... के भोग हेतु इस देह रहे हैं अथवा गिर पड़े ।४१। भोगोंका आश्रयस्वरूपिणी यह काया रहे अथवा गिर जाय। हे प्रभो ! वास्तवमें तो मैं आपका एक अंश हूँ । माताभाव तो केवल उपाधिमात्र है ॥ ४२ ॥ जिस तरह ईश कि घामने घट रख देनेपर उसमें एक सूर्य और दिख... देने लगता है आपस के म... के व... म... भी पृथक् ही नही सकती । मै ही ब्रह्मा हूँ । ॥४३॥ इस प्रकार ... माता के वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी मुस्कराते हुए बोले माता ! तुम आज मुक्त हो गयीं। ... मे भी यही स्थिति थी ... । इस विषय पर बहुत देरतक विचार किया है। अब जाओ, आनन्दसे घरपर रहो और अपनी इस बुद्धि को दृढ बनाये रक्खो ॥४४, ४५॥ हे मातेश्वरी ! जब आप लोगोंने मुझसे उपदेश सुनना चाहा था और मैने कुछ काल टाल दिया ... जब उपदेश दिया, उसका भी कारण सुनो ॥ ४६ ॥ इसमें यह भेद है कि स्वामि... मान्य होता है, किन्तु मै आपका पुत्र हूँ । ऐसी दशामें उपदेश कैसा हो ? ॥४७॥ स्त्री...का भी कहना है कि पतिको ही गुरु मानती हैं, और किसी को अपना गुरु न बनाए । इसीलिये मैने आपको अपने मुंहसे कुछ भी उपदेश नहीं दिया । ४८, ४९॥ प्रत्येक दूसरेको के द्वारा उपदेश दिलाया। जाओ परम आनन्दपूर्वक बैठे और निरन्तर मेरा ध्यान करती रहो ।५०। रामकी बात सुनकर कौशल्या प्रसन्न मनसे अपने घरपर चली गयीं और सुखपूर्वक रहने लगीं ॥५१॥ इस तरह रामचन्द्रजीके द्वारा उपदेश पाकर वे अपनी बहुओं सहित सब अन्तःपुरमे लौट आयीं और साधु-ध्यानमे लीन होकर इन दिन व्यतीत करने लगीं ॥५२॥ रामके नाम स्मरणके प्रभावसे मुक्तप्राय होकर वे सब वैकुण्ठधाम गयीं ॥५३॥ हे शिष्ये ! इन माताओंके इस भव्य चरित्रको सुनकर प्राणी अनेक प्रकारके दुःखदायी पापोसे छूट जाते है और मुक्त हो जाते हैं । ॥५४॥ इस प्रकार ... माताओं के नामस्मरणके माहात्म्य तथा उपदेश आदि कह सुनाया ॥५५॥ इति श्रीमत्कोटिकल्पचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहित मनोहरकाण्डे द्वितीयः सर्गः । २

५७० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३


तृतीयः सर्गः

( रामपूजाका विस्तार )

विष्णुदास उवाच

कथं श्रीराघवस्यात्र रामोपासकमानवैः। कार्या वै मानसी पूजा बहिःपूजा तथा शुभा ॥ १ ॥
कथं वोपासना ग्राह्या गुरो श्रीराघवस्य च । का श्रेष्ठोपासना चात्र कः श्रेष्ठोऽत्र गुरुस्तथा ॥ २ ॥
के के मन्त्रा राघवस्य भक्तानां सिद्धिकायकाः । तिथिभेदेन तस्य किं किं तत्तोषवर्द्धनम् । ३ ॥
कः श्रेष्ठोऽत्र वरो देवो यस्य ग्राह्या ह्युपासना । तन्मे विस्तरेणैव गुरो त्वं वक्तुमर्हसि । ४ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु। सर्वं तद्विस्तरेणाथ त्वदग्रे कथ्यते मया ॥ ५ ॥
आदौ गुरु परीक्ष्यात्र तच्चिह्नैश्च द्विजोत्तम । उपदेशस्ततस्तस्माद्ग्राह्योऽतीर्थे विधानतः ॥ ६ ॥
गुरोश्चैवात्र चिह्नानि तत्रादौ प्रवदाम्यहम् । क्रोधी कुष्ठी महारोगी मलिनो निर्घृणो जडः ॥ ७ ॥
अपण्डितो निन्दकश्च लोलुपो विषयातुरः । दांभिको गर्वसंयुक्तः पापात्मा दुष्टवंशजः । ८ ।
घाती परद्रोहकर्ता परद्रव्यापहारकः । अजितात्मा वेदवाह्यः परदाररतः सदा ॥ ९ ॥
परदोषारोपकश्च कृपणश्चाजितेन्द्रियः । वेददैवद्विजातीनां यतितीर्थगवामपि ॥१०॥
तुलसीवह्रिसूर्याणां द्वेष्टा योग्यो गुरुर्न हि । वेत्ता सकलधर्माणां शास्त्रेषु परिनिष्ठितः ॥११॥
सत्यवाङ् मितभुग्ज्ञानी कुलाभिज्द्विजोत्तमः । सत्कर्मनिष्ठो धर्माणांमुपदेष्टा सुबुद्धिदः ॥१२॥
योगाभ्यासकलाभिज्ञो योगवान्समदर्शनः । कृतकर्मा तीर्थसेवी धर्माधर्मविवेचकः ॥१३॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः । स्वाश्रमाचारसनिष्ठो बुद्धिमान्विजितेन्द्रियः ॥१४॥


विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! इस संसारम रामकी उपासना करनेवालोंको रामकी मानसी पूजा किस प्रकार करनी चाहिए ? ॥ १ ॥ और फिर गुरुके पासस उपासना किस प्रकार ग्रहण करनी चाहिए ? समस्त उपासनाओंमें सर्वश्रेष्ट उपासना कौन-सी है और श्रेष्ठ गुरु कैसा होता है भा भो बतला दीजिए॥ २ ॥ साथ ही यह भी बतलाइए कि रामके कौन कौनसे ऐसे मन्त्र हैं जिनसे भक्तोका आनन्द प्राप्त होता है। कौन-कौनसी तिथियां ऐसी हैं, जिनसे भक्तोंका मन्न सन्तुष्ट होता है । ३ । इस संसारमें कौन श्रेष्ठ देवता है, जिसकी उपासना की जाय । हे गुरो यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइए ॥ ४ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमन बहुत अच्छी बात पूछी है। मै तुम्हारे प्रश्नके अनुसार सारी बातें विस्तारपूर्वक कहता हूँ। सावधान होकर सुनो ॥ ५ ॥ लोगोको चाहिये कि पहले गुरुकी परीक्षा करके उनके चिह्न समझ । इसके अनन्तर किसी पवित्र तीर्थम उनसे विधिवत् उपदेश ग्रहण करे ॥ ६ ॥ प्रकृतूवश पहले मै तुम्हें गुरुके लक्षण बतलाता हूँ। जो क्रोधी, कुष्ठी, महारोगका रोगी (जिसको भूत-वेताल आदि लगत हों), मैला कुचैला, निर्दयी, जड़ ॥ ७ ॥ अपण्डित, अच्छा बुरा न जाननेवाला), निन्दक. लोलुप, विषयी, पाखण्डी, अभिमानी, पापी दूषित कुलमें उत्पन्न ॥ ८ । विश्वासघाती दूसरेसे द्रोह करनेवाला, दूसरेका धन अपहरण करनेवाला, अजितात्मा (जिसने अपनी आत्माको नहीं जीता है) वेदसे बहिष्कृत (नास्तिक, दूसरेकी स्त्रीसे प्रेम करनेवाला ॥ ९ ॥ दूसरेपर दोषारोप करनेवाला, कृपण (कंजूस) तथा वेद, देवता, ब्राह्मण, सन्त, तीर्थ, गौ, तुलसी, अग्नि और सूर्य इनसे द्वेष रखनेवाला हा ऐसोको भूलकर भी गुरु नहीं बनाना चाहिए। जो सब धर्मोका ज्ञाता, शास्त्रोपर विश्वास करनेवाला ॥ १० ॥ ११ ॥ सत्य बोलनेवाला, मिताहारी, ज्ञानी, कुलाबिद ब्राह्मणके वंशम उत्पन्न अच्छे कामोम लगा हुआ, धर्मका उपदेश अच्छी बुद्धि देनेवाला ॥ १२॥ योगाभ्यासकी कलाओंका ज्ञाता, योगी, सबको समान दृष्टिसे देखनेवाला, केवल उपदेश न देकर स्वयं कर्म करनेवाला, तीर्थसेवी, धर्म अधर्मकी विवेचना करनेमे निपुण ॥ १३॥ ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थाश्रमी, योगी,

सर्गः ३ ]
मनोहरकाण्डम्
५७१


धर्मी कृपालुर्मृदुवाक् सुमुखः सौम्यदर्शनः । अनिशं समुद्योगी शान्तात्मा परतोषकः ॥१४॥
औदार्यवान् ज्ञाननिष्ठः शुचिरुत्पन्नसंग्रहः । इत्यादिगुणयुक्तो यः स गुरुः परमोत्तमः ॥१५॥
तस्य सेवां चिरं कृत्वा सेवया तं प्रसाद्य च । तस्मादुपासना ग्राह्या सुतीर्थे विधिपूर्विका ॥१६॥
उपासनास्त्रयः सन्ति सात्त्विकी राजसी तथा । तामसी च तृतीया सा गर्हिताऽत्र निगद्यते ॥१७॥
भूतवेतालकूष्माण्डपिशाचानामुपासना । सा ज्ञेया तामसी घोरा देवानां सात्त्विकी स्मृता ॥१८॥
यक्षाणां राक्षसानां च या ज्ञेया सा तु राजसी । शैवा शौरेश्च गाणेशाः शाक्ताश्च वैष्णवास्तथा ॥१९॥
अवतारस्तदस्मत्याः पञ्चानां सन्ति भूतले । तेषामुपासना ग्राह्या गुरोरास्याद् द्विजन्मभिः ॥२०॥
पञ्चानामवतारेषु विष्णोरेव वदाम्यहम् । चतुश्चत्वारिंशन्मितानवतारान्महत्त्वमान् ॥२१॥
पुरुषोत्तमो विधिश्चैव रुद्रो नारायणस्तथा । हंसोऽथ दत्तात्रेयश्च कुमारो ऋषभस्तथा ॥२२॥
हयग्रीवस्तथा मत्स्यः कूर्मो वाराह एव च । नारसिंहो वामनश्च जामदग्न्यस्तथैव च ॥२३॥
रामः कृष्णस्तथा बौद्धः कल्किर्यज्ञो हरिश्च सः । वालखिन्योऽथोड्डारङ्कश्च पृथुर्धन्वन्तरिस्तथा ॥२४॥
मोहिनी नारदो व्यासः कपिलः केशवस्तथा । माधवाख्य गोविन्दो मधुसूदन एव च ॥२५॥
त्रिविक्रमः श्रीधरश्च पद्मनाभस्तथा स्मृतः । दामोदरस्तथा सङ्कर्षणः प्रद्युम्न एव च ॥२६॥
अनिरुद्धोऽच्युतश्च शङ्खनाथ जनार्दनः । उपेन्द्र हृषीकेशश्चैते ज्ञेया महत्तमाः ॥२७॥
मत्स्याद्या अवताराश्च दशैतेष्वपि चोत्तमाः । दशावतारमध्येऽपि रामकृष्णौ महत्तमौ ॥२८॥
ताभ्यामपि वरः पूर्णः सत्यसन्धो रघूत्तमः । एकपत्नीव्रतो वीरस्त्वेकबाणो नृपोत्तमः ॥२९॥
सहस्रौघपतिः श्रीमांश्छत्रचामरमण्डितः । एवं ज्ञात्वोपासनाऽत्र ग्राह्या श्रीरामचन्द्र च ॥३०॥
गुरूपदिष्टविधिना सुमुहूर्ते शुभस्थले । अथवा तन्नरेन्द्राणां ग्राह्या तज्जन्ममस्तियो ॥३१॥


जिस आश्रममें हो उसके नियमोंका पालन करनेवाला बुद्धिमान्, इन्द्रियोंका वशमें रखनेवाला, ॥१४॥ क्षमाशील, कृपालु मधुरभाषी, अच्छे मुखवाला, सौम्यदर्शी, कम सानेवाला, सदा उद्योगमें लगा हुआ, शान्तात्मा, दूसरोंका प्रसन्न करनेवा लाहो, ॥१५॥ उदार ज्ञाननिष्ठ पवित्र और दान आदि ग्रहण करनेमें पराङ्मुख, इन गुणोंसे विभूषित पुरुष ही उत्तम गुरु होता है ।१६।। ऐसे गुरुका बहुत दिनोंतक सेवा करके उसे प्रसन्न करे । तब किसी अच्छे तीर्थमें उससे विधिपूर्वक उपासनाका उपदेश ग्रहण करे ।।१७।। उपासना भी तीन प्रकारकी होती है। सात्त्विकी, राजसी और तामसी । इनमेंसे तामसी उपासना निन्दित मानी गयी है ।। १८ ।। भूत, वेताल, कूष्माण्ड और पिशाच आदिकी घोर उपासना तामसी कही गयी है। देवताओंकी उपासना सात्त्विकी कही जाती है ॥१९॥ यक्षों और राक्षसोंकी उपासना राजसी उपासना कहलाती है शिव, सूर्य, गणेश, शक्ति तथा विष्णु इन पाँचों देवोंके अगणित अवतार हैं। लोगोंको चाहिये कि गुरुके मुखसे इन्हीं पाँच देवतामसे किसी एककी उपासना ग्रहण करें ।। २० ।। २१ ।। ऊपर कहे गये देवताओंमें से यहाँ विष्णु भगवान्के बडे बडे चौतालीस अवतार बतला रहा हूँ ।। २२ ।। पुरुषोत्तम, गरुड नारायण, हंस, दत्तात्रेय, कुमार, ऋषभ हयग्रीव, मत्स्य, कूर्म वराह नृसिंह वामन परशुराम, । २३ । २४ ।। राम कृष्ण, बौद्ध, कल्कि, यज्ञ, हरि, बालखिल्य, उद्धारक पृथु, धन्वन्तरि मोहिनी, नारद व्यास, कपिल, केशव, माधव, गोविन्द, मधुसूदन, ।२५।। २६ । त्रिविक्रम श्रीधर, पद्मनाभ, दामोदर, संकर्षण प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, अच्युत, शङ्खुन जनार्दन, उपेन्द्र और हृषीकेश ये श्रेष्ठ अवतार माने गये हैं। इन अवतारोंमें भी मत्स्य-कूर्मादि दस अवतार श्रेष्ठ माने जाते हैं और इन दशोंमें भी राम और कृष्ण श्रेष्ठ माने गये हैं । २७ ।। २८ ।। २९ । इन दोनोंमें भी सत्यप्रतिज्ञ रामचन्द्र सबसे श्रेष्ठ हैं। क्योंकि ये एकपत्नीव्रती वीर एक बाणधारी और सब राजाओंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ३० ॥ ये साठौ हौघेके अधिपति, श्रीमान्, छत्र और चमरसे सुशोभित हैं। ऐसा समझकर भक्तोंको चाहिए कि गुरुके द्वारा उपदिष्ट विधिके अनुसार अच्छे मुहूर्त तथा पवित्र स्थानमें श्रीरामचन्द्रजीकी उपासनाका मन्त्र लें। अथवा ऊपर गिनाये देवताओंमेंसे जिनपर जिसकी रुचि हो, उसको

५७२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३


चैत्रे मासि दिने पक्षे नवम्यां रामजन्मनि । उपासनान्तरं हि रामं भक्त्या प्रपूजयेत् ॥ ३३ ॥
एवं यस्यानतारस्य गृहीतोपासना नरैः । वैस्तस्य जन्मदिवसे कार्या पूजा महोत्सवैः ॥ ३४ ॥
अथो दशावताराणां शिष्य जन्मदिनानि ते । प्रोच्यन्तेऽत्र शृणुष्व त्वं येषु सम्पूजयेन्नरः ॥ ३५ ।
चैत्रे तु शुक्लपञ्चम्यां भगवान्मीनरूपधृक् । ज्येष्ठे तु शुक्लद्वादश्यां कूर्मरूपधरो हरिः ॥ ३६ ।
चैत्रे कृष्णनवम्यां तु हरिवाराहरूपधृक् । वैशाखेऽभूच्चतुर्दश्यां शुक्लपक्षे नृकेसरी . ३७ ।
मासि भाद्रपदे शुक्ले द्वादश्यां वामनोऽभवत् । वैशाखे जामदग्न्यस्तु तृतीयायां सिते त्वभूत् । ३८ ।
चैत्रे शुक्लनवम्यां तु मध्याह्ने राघवस्त्वभूत् । कृष्णाष्टम्यां श्रावणे हि कृष्णोऽभून्मधुरापुरि ॥ ३९ ।
पौषे शुक्ला सप्तमी या बुद्धजन्मतिथिस्तु सा । माघे शुक्लतृतीया तु कल्किनः सा तिथिः स्मृता ॥ ४० ॥
अह्नो मध्ये वामनो राघवो मौ मत्स्यः क्रोडश्चापराह्णे विभागे ।
कूर्मः सिंहो बुद्धकल्कौ च सायं कृष्णो रात्रौ कालसाम्ये च पूर्वे ॥ ४१ ॥
एवं तज्जन्मकालञ्च ज्ञात्वा तेषामुपासकैः । उत्सवः परमः कार्यस्तत्तद्देवप्रपूजने ॥ ४२ ॥
नित्यपूजा प्रकर्तव्या भक्त्या तैस्तूपुपासकैः । विशेषतज्जन्मदिवसे कार्य तन्पूजनं मुदा ॥ ४३ ।
गुरोर्गृहीतो यो मन्त्रस्तं नित्यं हृदये जपेत् । राममन्त्रास्त्वनेकाश्च शतान्येकत्रिंशन्मतो मनुः ॥ ४४ ।
पञ्चाशद्वर्णकश्चापि द्विचत्वारिंशदक्षरः द्वात्रिंशदक्षाश्च सप्तविंशाक्षरस्तथा ॥ ४५ ॥
पञ्चविंशद्वर्णकश्च चतुर्विंशाक्षरस्तथा एकविंशद्वर्णकश्च विशद्वर्णात्मकस्तथा । ४६ ।
अष्टादशवर्णकश्च षोडशाक्षर एव च । पञ्चदशवर्णकश्च चतुर्दशाक्षरस्तथा ॥ ४७ ॥
त्रयोदशाक्षरश्चापि द्वादशाक्षर एव च एकादशाक्षरश्चापि तथा मन्त्रो दशाक्षरः ॥ ४८ '
नवाक्षरोऽष्टवर्णश्चापि सप्ताक्षरमनुस्तथा । षडक्षरो राममन्त्रस्तथा पञ्चाक्षरो मनुः ॥ ४९ ।

जन्मतिथिपर उसकी उपासना ग्रहण करे । ३२ ॥ ३३ । रामकी उपासना ग्रहण करनेवालोको चाहिए कि चैत्रमासके शुक्लपक्षमें नवमी (रामजन्म) के दिन उपासना ग्रहण करे । उसके बाद भक्तिपूर्वक रामका पूजन करे ॥ ३३॥ इस तरह जिस अवतारकी उपासना ग्रहण करती हो, उसके जन्मदिनपर महान् उत्सवके साथ पूजा करना चाहिए ॥ ३४ ॥ हे शिष्य ! अब मैं तुम्हे दशो अवतारोंके जन्मदिवस बतलाता हूँ। जिसमें नरको अपने उपास्य देवताका पूजन करना चाहिए । ३५॥ चैत्र शुक्ल पञ्चमीको भगवान् मत्स्यावतार लिया था । ज्येष्ठ शुक्लपक्षकी द्वादशीको भगवान् कूर्मरूप धारण किया था । चैत्र कृष्ण नवमीको भगवान्ने बाराहरूप धारण किया था । वैशाख शुक्ल चतुर्दशीको नृसिंहरूप धारण किया था । ३६ ॥ ३७॥ भाद्रपद शुक्ल द्वादशीको वामनरूप धारण किया था । वैशाख शुक्ल तृतीयाको वे परशुराम बने थे । ३८ ॥ चैत्र शुक्ल नवमीको मध्याह्नकालमें भगवान्ने रामका अवतार लिया था । भाद्रपद कृष्णपक्षकी अष्टम को भगवान्ने मधुरामें कृष्णरूपस अवतार लिया था । ३९ । पौष शुक्ल सप्तमीको बुद्धकी जन्मतिथि होती है । माघ शुक्ल तृतीयाको कल्कि भगवान्की जन्मतिथि होती है । ४० । दोपहरके समय वामन, राम और कल्कीका जन्म हुआ था । मत्स्य वाराह इन दोनोंका जन्म दिनके तीसरे पहर हुआ था । कूर्म, नृसिंह, बुद्ध और कल्कीका अवतार सन्ध्याके समय हुआ था और श्रीकृष्णचन्द्रजीका जन्म आधी रातको हुआ था । ४१॥ इस प्रकार अपने अपने उपास्य देवोका जन्मकाल जानकर उस समय महान् उत्सव मनाते हुए उनकी पूजा करनी चाहिए ॥ ४२ ॥ उपासकोको उचित है कि नित्य अपने आराध्य देवकी पूजा करें । विशेषकर उनके जन्मदिवसकी उत्सव और पूजन अवश्य करना चाहिये ॥ ४३ ॥ गुरुसे जो मन्त्र मिले, हृदयमें सर्वदा उसका जप करता रहे । राममन्त्र भी अनेक प्रकारके हैं । उनमेंसे एक सौ अक्षरोंका, एक पचास अक्षरोंका, एक बयालिस अक्षरोंका, एक बत्तीस अक्षरोंका, एक सत्ताइस अक्षरोंका, एक चौबीस अक्षरोंका, एक इक्कीस अक्षरोंका, एक बीस अक्षरोंका, ॥ ४४-४६॥ एक अठारह अक्षरोंका, एक सोलह अक्षरोंका, एक पन्द्रह अक्षरोंका, एक चौदह अक्षरोंका, एक तेरह अक्षरोंका, एक बारह अक्षरोंका, एक ग्यारह अक्षरोंका, एक दश