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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ६०३

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ६०३

अथवाऽष्टपदे मुद्रां विधाय तन्मलिङ्गकम् । स्वयंव्यक्तस्यके तुर्य भद्रं विश्रन्दाभ्यहम् ॥२८७॥
सर्वत्र सममुद्रामु मध्ये च परिधित्रयम् मुद्रा सीमांगलान्ता श्चत्वार्दा तुर्यकोष्ठका ॥२८८॥
लिङ्गस्कन्धगता कोष्ठा वर्करिष्ठैः प्रकल्पयेत् । वह्निवाप्योरनेष्ण्यानि पदान्युक्तांस्त्व तु ॥२८९॥
भद्रसङ्ख्यायोग्यानि तदर्थं त्नानयोजनम् अथवाऽष्टौ दश मुद्रा सीमापरिव्यवस्थया ॥२९०॥
भद्रमर्कपद मध्ये परिधी द्वे प्रकल्पयेत् । एवमग्र परिव्यस्तैस्तैषट्त्रिंशत् मुद्रिकाः ॥२९१॥
चतुष्पादात्मकं भद्र पश्च मुद्राश्च पञ्चच प्रकल्प्याश्चक भद्र नात्र तु परिधी स्मृतौ ॥२९२॥
सममेऽग्रिमिता मुद्रा भद्र तुर्यपदाम्मकम् । द्वये त्रयोदशैकाश्च वाप्यश्चापि चतुर्दश ।२९३।
भद्रं तत्त्वमितं तुर्ये वनेशा दश वापिका । भद्रं तत्त्वमितं षष्ठे पंचेशा वापिकाश्च षट् ॥२९४।
भद्रं तत्त्वमितं शेषं यथापूर्वं प्रकल्पयेत् । अथवाऽग्रे पञ्चदश शिवा नत्रेऽष्ट मुद्रिकाः ।२९५॥
त्रिवद्वयं त्रिपदपाद त्रिपद्पादा च मुद्रिकाः । षट्नुर्ये पंच मुद्राः स्युर्वापि त्रिसुमितास्तथा ॥२९६।
पृष्ठे द्वे मुदिके मुद्रा मिंगे मुद्रा गजेन्धवा । शिवद्वयं वापिक च मममान्नं भद्रमिदम् ।२९७॥
भद्रमानं तत्तारेष्ट्र षट्पदमुदरिंतु च । वियने दशविधापि क्रमेणैव प्रकल्पयेत् ।।२९८।
यद्वा द्वौ मुद्रिके येकां मध्यांग प्रकल्पयेत्, भद्रमिदुतूलं कृत्वा वहिङ्ग रमयेद्धजे ॥२९९।
मद्रे गजे तत्त्वकोष्ठ शेषं सर्व तु पूर्ववत् अथवाऽग्रिपङ्क्तिषु पञ्चाङ्गानिमेनाऽञ्जाना।३००॥
मुद्रामध्ये नियोज्यं च मर्यादां परिधिंस्तथा । भद्रसंख्या न प्रथमा षट्पदा च द्वयार्थिका ।३०१।
द्वितीया त्रिंशत्कोष्ठामु कुण्डैर्वह्त्योश्चलिंगके अनयेनार्थयोः सम्यक् शेषं सर्वं पुरोदितम् ।।३०२।।
अथवोक्ताः प्रथमतः मग वटाश्चतुर्षकाः । वह्निन्द्रवन्द्रमुद्राः सीमापर्याप्यमन्यथा ।।३०३,
षट्त्तु स्थानेषु च शिश्वास्तूर्णिमगा मुन्द्रा । विशेषत्तु लिंगद्वय वर्णीत्रिपट् त्रिपद् पदम् ।।३०४।।


अथवा आठ पादक मुद्रा बनाकर बांध रूप में लिंगका रचना करे और नम पादका भद्र बनावे ॥ २८७ ॥
जितनी समसंख्य मुद्रा हैं, उन सब रूप मे दो परिधि बनावे । लिंगकी सीमामें मुद्रा चार चार पादकी
वापी बनावे ॥ २८८ ॥ लिंगके कन्धेके पासके अपने इच्छानुसार किसी रूपमें रख दे । बाबी और वापीके
बीचवाले बच काष्ठकाका, पदव भद्र नया गिरद। रचनामें भद्र ही ता उस उसके कामम ले आवे । अथवा
आदिकी दस मुद्राओ्रं ओर सीमाकी परिधिकोका अग्रिम व्यतीत कर दे । २८९ ॥ २९० ॥ मध्यम बारह पादका
भद्र बनावे और द पां विपाकी रचन करे । इस तरह तीस मुद्रिन केवल भद्र मुद्राओंकी योजना करे
॥ २९१ ॥ चार पादका भद्र बनाव और पांच त्य नय मुद्रान्दे यथाक्षर बारह पादक भद्र बनावे । विशेषता
केवल इतनी होगी कि इनम दो परिधियाँ नहीं रहेंगी। और चार पादका भद्र बानगा। इनमें पन्द्रह भद्र और
चौदह वापियों बनेंगी । २९२। २९३॥ चौदह पद भद्र बनेगा, ती ईमें पच्चीस दस वापी बनेंगी और २५
भद्र बनेंगे। छठमें पांच ईश, छ बापी, पच्चास भद्र, ब का सब पूर्ववत रहेगा। अथवा अग्रिम पन्द्रह शिव अट्ठाइस
मुद्रार, नौ पादक दा शिव ओर नौ ही पाद की मुद्राय बनेगे। चौदह छ पा पीव मुद्रायें, पांचवेम सात मुद्रायें,
छठवे दो मुद्राय, सातवेमें एक मुद्र, आठवेमे एक मुद्रा, दी शिव और दो दापी रहेगा। यह कम आदिसे लेकर
सातवे स्थान तक चलेगा । २९४-२९७ ॥ ईनम भद्रका मान पच्चीस, छः सोल्ह, बारह, दस, सोलूह, दस
प्रकार है । बनानेवाकका चाहिए कि दशरा इसके मानना करे ॥२९८॥ अथवा दू मुद्राये बनाकर एकको लिंग-
के मध्यमें रखे और सोल्ह क उत्कीका भद्र बनाकर सनवेस लिङ्गकी रचना करे । २९९ । मातवमं पच्चीस
काष्ठकोका भद्र बनावे ब का सब पूर्ववत् रखे । अथवा आफ्रिक तान पंक्तियोंम पांच, सात तीन, मण्डलां
का शिव बनावे ।। ३०० । मुद्राके मध्यमे मर्यादा और परिधिकी रचना करे। भद्रकी संख्या पहले जित ती ही
रहेगी और छ, दो या बारह पाद उनम रहेगा । ३०१ दूसरा पंक्ति बस कोष्ठक रहेगी और लिंगके बगलमें
दो वापियाकी रचना कर ब की सब पूर्ववत् रहेगा । ३०२ ॥ अथवा आदिसे लेकर छठी पंक्ति तथा सात, छः,

६०४] आनन्दरामायणे [सर्गः ५

वाच्योऽपि तन्मिताः कार्या भद्राणि वक्ष्यमाणतः तच्चकोष्ठं कला कोष्ठं तुर्यकोष्ठं च षट्पदम् ॥३०५॥
षट्पदं च कलाकोष्ठं शेषं सर्वं पुरोदितम् । अथवा प्रथमाद्यावत्पञ्चमस्थानकाद्वि ॥३०६॥
षट् षट् पञ्च तुर्यवह्निक्षुद्राश्च मध्यशङ्करान् । तुर्यनैऋतिनेत्राक्षिमर्यादापरिधींस्तथा ॥३०७॥
विशेषस्तु लिंगद्वयं वार्ण. षट् त्रिपदं पदम् । भद्रसङ्ख्येन्दुकलेन्दुकलाचतुरस्रम्भिकान् ॥३०८॥
प्रकल्प्यारचयेद्बुद्ध्या शेषं सर्वं पुरोदितम् । एवं नानाविधा भद्रा बहवः सन्ति भो द्विजः ॥३०९॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे श्रीरामदासविष्णुदास-
सम्वादे सबहुरामतोभद्रविस्तारो नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

( रामलिंगतोभद्र तथा अनेक लिंगतोभद्रोंका रचनाप्रकार )

श्रीरामदास उवाच

पूर्वोक्तक्षेत्रसुदीर्घे रामतोभद्रविस्तरान् । वदान्यहं तवाग्रे हि विष्णुदास शृणुष्व तान् । १ ॥
तिर्यगूर्ध्वरक्तरेखा एकषष्टिमिताः शुभाः । अन्तःकृष्णान्तरुक्शुक्लपीताः परिधयः क्रमात् । २ ।
द्वादशांते पीतकृष्णाक्तशुक्लाः पुनः स्मृताः । पञ्चमः पीतवर्णोऽपि सर्वतोभद्रमालिखेत् । ३ ।
बहिः पंक्तौ द्वादशांते सीमापरिधयः स्मृताः । पीता वा लोहिता कार्या मध्ये द्वौ परिधी स्मृतौ । ४.।
ततो मध्यगृहयोर्द्वे मुदिके वेदवर्णके । चतु पार्श्वेषु चत्वारि नामानि पूर्ववल्लिखेत् ॥ ५ ॥
कोणगेहेषु कार्णन्दुस्त्रिपदः शुक्लवर्णकः । एकादशपदा कृष्णा शृङ्खला पीतवर्णका । ६ ।
दशपदा शृङ्खलाऽन्या बह्विगे हरिता स्मृता । एकोनविंशत्पदजा भद्रं रक्त नवान्तकम् । ७ ॥

चार पाँच, तीन, दो अथवा एक मुद्रा बनावे और सम्मुख परिधियोंकी ओर छट्ठे स्थानोंमें चार-चार शिवोंकी रचना करे । विशेषता केवल इतना रहेगा कि पाँच वा नौ-नौ पदोंके लिंग बनेंगे। बाधियाँ पूर्वोक्त संख्याके अनुसार ही रहेगा, किन्तु भद्रका सङ्ख्या वक्ष्यमाण संख्याके अनुसार रहेगा। कुछ भद्र पच्चीस कोष्ठकका, कुछ सोलह कोष्ठकोंके, कुछ चार कोष्ठकके, कुछ छ कोष्ठकोंके, फिर छः कोष्ठको, कुछ सोलह कोष्ठकोंके, इस प्रकार भद्र बनेंगे। बाकी सब पहलेके समान ही होंगे। अथवा पहली पंक्तिसे पाँचवी पंक्ति पर्यन्त ॥ ३०२-३०६ ॥ छः, पाँच, चार, तीन मुद्राएं बनावे क्रमशः चार, व, दो, दो, दो शिवोंकी रचना करे और मर्यादा तथा परिधियोंको ठीकसे बन कर रखव ३०७, विशेषता इतना है कि पांच, तीन, छ, तीन, छः पदका लिंग बनावे । इसमें भद्रकी संख्या सोलह, सोलह तथा छः रहेगा इस तरह कल्पना करके अपनी बुद्धिसे रचना करे। बाकी सब पूर्ववत् रहेगा। इस प्रकार हे द्विज! इस भद्रके बहुतेरे भेद हैं, ॥ ३०८ ॥ ३०९ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे चतुर्थ सर्ग ॥ ४ ॥

श्रीरामदास कहते हैं - हे विष्णुदास ! अब मैं तुम्हारे आगे पूर्वोक्त रामतोभद्रका विस्तार बतलाता हूँ। उसे तुम सावधान मनसे सुनो ॥ १ ॥ भद्र बनानेके लिए चाहिए कि बड़ा लोट सावों ६१ रेखायें खींचे। बन्तमें काली, लाल, सफेद तथा पीली परिधियाँ बनावे ॥ २ । बारहवीं पंक्ति के आगे पीत, कृष्ण, रक्त तथा शुक्ल रङ्गकी सीमापरिधियाँ रहेंगी। चाहे तो पाँचवां स्थान पीले रङ्गसे भी बना सकता है। बारहके बाद बाहरकी पंक्तिमें पीले या लाल रङ्गकी परिधि रहेगा। बीचम और दो परिधियां बनेंगी ॥ ३ ॥ ४ । इसके अनन्तर मध्यके दोनों घरोंमें चार रङ्गोंको दो मुद्राएं बनेंगी। इसके अनन्तर चारों बगल पूर्ववत् चार नाम लिखने चाहिए ॥ ५ ॥ कोणवाले कोष्ठकमें तीन पाद और शुक्लवर्णका इन्दु बनावे। ग्यारह पादकी शृङ्खला बनावे और उसे कृष्ण वर्णकी रखे । दस पादकी एक दूसरी शृङ्खला पीले रङ्गसे बनावे । हरे रङ्गसे उन्नीस पादकी