श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२७
सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२७
सीतया पूजिताः सर्वास्तां नत्वामन्त्र्य जानकीम्। पंचस्नान मथाप्याय जग्मुः स्वं स्वं स्थलं प्रति ॥१६॥
अथैकदा गुरोरास्याद्भावाग्रे संस्थितो लवः। शृण्वन्पुराणं पप्रच्छ श्रोतॄ सर्वान् ज्ञानान्गुरूम् ॥१७॥
शृण्वे ते प्रष्टुमिच्छामि तन्मे वद मुनीश्वर । पुस्तकेषु च सर्वत्र पत्रे पत्रे पृथक् पृथक् ॥१८॥
एकत्र लिख्यते श्रीति रामेत्येकत्र लिख्यते । किमर्थं धारवैन्तन्मे कथयस्व माम् ॥१९॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा गुरुस्तं वाक्यमब्रवीत् ।
वसिष्ठ उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स लोकसंदेहहन्परम् । २०॥
श्रीरामचरितं पूर्वं व्यासेन मुनिना पृथक् । अष्टादश पुराणानि तथोपपुराणानि च ॥२१॥
कृतान्यन्यैश्च मुनिभिः षट्शास्त्रादीन्यनेकशः । श्रीरामचरितादेव श्लोकमात्रमपीह यत् ॥२२॥
सर्वमस्तीति दृष्ट्वैवमुभयोरेकत्र श्रीति च । विनिश्चयैकत्र रामेति तन्मध्येषु परिलिख्यते ॥२३॥
अनया संज्ञया सर्वे ज्ञास्यन्त्यग्रे जना भुवि । श्रीराम मध्ये लिखितं श्रीरामचरितादिदम् ॥२४॥
कृतमस्ति पृथक् भिन्नं पुरा व्यासादिभिस्त्विति । एतत्सन्कामनाद्वाल सूचनार्थं विलिख्यते ॥२५॥
श्रीरामेति पृथक् पत्रे सर्वत्र जगतीतले । अन्यच्च कारणं वच्मि तच्छृणुष्व प्रियो लव ॥२६॥
अशुद्धं लिखितं पश्चादज्ञानतो भ्रान्तिशोऽपि हि । पत्र तच्चाप्यतिशुद्धं हि भवत्विति मनीषिणा ॥२७॥
श्रीरामेति च सर्वत्र पत्रे पत्रे विलिख्यते । यदङ्कितं श्रीरामेति नाम्ना पत्रं तु लेखकैः ॥२८॥
ज्ञेयं तच्चाति शुद्धं हि गतदोषस्तु लेखकः । सर्वत्र्यत्र जगत्त्यां हि सत्यं लव वदाम्यहम् ॥२९॥
इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं वसिष्ठं प्रणिपत्य च । लवः स गतसन्देहस्तूष्णीमासीन्मुदान्वितः ॥३०॥
एकदा रघुनाथस्तु मंचकोपरि संस्थितः । मुखात्ताम्बूलस्य रक्तं प्रथमे दोषकारकम् ॥३१॥
त्यक्तुकामो न ददर्श पात्रं निष्ठीवनस्य सः । तस्यांतिके स्थिता दासी नाम्ना वै सुगुणेति च ॥३२॥
प्रसन्न हुईं और उन्होंने फिरस सीताका पूजन किया ॥ १५ ॥ साताने भी फिर उनका पूजन किया और वे सीताको प्रणाम करके और उनसे आज्ञा लेकर पंचस्नान समाप्त हो जानेपर अपने-अपने घर चली गयीं ॥ १६ ॥ इसके बाद एक दिन गुरु वसिष्ठ बड़े पुराणोंकी कथा सुना रहे थे। रामचन्द्रजी और लव भी बैठे हुए थे । कथा सुनते-सुनते लवने सब बातोंको ज्ञान प्राप्त करनेके लिए वसिष्ठसे कहा—॥ १७ ॥ हे गुरो ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ, सो बताइए । प्रायः ऐसा देखा जाता है कि सब पुस्तकोके पन्ने-पन्नेमें एक ओर 'श्री' और दूसरी ओर 'राम' ऐसा लिखा जाता है। लोग ऐसा क्यों करते हैं? यह कृपया हमें बता दीजिये ॥ १८ ॥ १९ ॥ इस प्रकार लवका प्रश्न सुनकर वसिष्ठने कहा—हे वत्स तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। इससे बहुतोंका सन्देह दूर हो जायगा ॥ २० ॥ पहले व्यास मुनिने श्रीरामचन्द्रके चरित्रात्मक अट्ठारह पुराण और अट्ठारह ही उपपुराण बनाये ॥ २१ ॥ उसी तरह और-और ऋषियोंने षट्शास्त्र आदि बनाकर तैयार किये । सब ग्रंथोंके सभी श्लोक श्रीरामचरित्स बने हैं। इसी बातको बतलानेके लिए प्रत्येक पन्नेमें 'श्री' लिखकर 'राम' लिखा जाता है ॥ २२ ॥ २३ ॥ इस संकेतसे संसारके मनुष्य पुस्तक देखकर यह समझेंगे कि ये सब ग्रंथ श्रीरामचरितके अन्तर्गत हैं, हे वत्स ! श्रीराम लिखनेका एक कारण यह है, जो बता चुका । दूसरा भी बतलाता हूँ—हे लव ! सो भी सुन लो ॥ २४-२६ ॥ अज्ञानतासे वा भ्रमवश ग्रन्थमें जो कोई शब्द अशुद्ध लिखा गया हो, वह पन्ना अत्यन्त शुद्ध हो जाय । इस विचारसे भी पन्नेमें लेखकगण श्रीराम लिखते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥ ऐसा करनेसे अशुद्ध भी शुद्ध हो जाता है और लेखकको कोई दोष नहीं लगता। हे लव ! मैं तुमको यह सब सच्ची बातें बतला रहा हूँ ॥ २९ ॥ इस प्रकार समाधान सुनकर लवका सन्देह निवृत्त हो गया और वे चुपचाप बैठ गये ॥ ३० ॥ एक बार राम मंचपर बैठे थे । मुखमें ताम्बूल था । ताम्बूलका प्रथम रस दोषकारक होता है, इस ख्यालसे उन्होंने थूकना चाहा । किन्तु निष्ठीवनपात्र (पीकदान) नहीं दिखायी पड़ा । रामके पास ही खड़ी सुगुणा नामकी दासी रामकी इच्छा
५२८ आनन्दरामायणे [सर्गः २१
तादृशं राममालोक्यं पात्रं दूरं विलोक्य च । कृत्वा पात्रं स्वहस्ताभ्यामंजलावथ तद्ग्रसम् ॥३३॥
रामेण मुक्तमास्याच्च जग्राह वेगतोभृशं । ततः सा प्राशनं रामोच्छिष्टं दासी चकार तत् ॥३४॥
महाप्रसादं तं मत्वा देवालब्धं विचिन्त्य च । तदाऽतितुष्टः श्रीरामस्तस्यै तत्कर्मणाऽब्रवीत् ॥३५॥
वरयस्व वरं दासि यत्ते मनसि वर्तते तद्रामवचनं श्रुत्वा दासी प्राह रघूत्तमम् ॥३६॥
एकपत्नीव्रतं तेऽस्ति सांप्रतं विह जन्मनि जन्मांतरे त्वया संगं वाञ्छामि रघुनायक ॥३७॥
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् । यदाऽग्रे कृष्णरूपेण गोकुलेऽवतराण्यहम् ॥३८॥
तदा राधेति नाम्नी त्वं गोपिकासु भविष्यसि । तदा मया चिरं क्रीडां त्वं भोक्ष्यसि न संशयः ॥३९॥
सदा ममातिप्रीता त्वं गोपिकासु भविष्यसि । इति दासी रामचन्द्राद्वरं लब्ध्वा तुतोष सा ॥४०॥
अन्यच्छृणु विष्णुदास रामचन्द्रकथानकम् । सम्प्रोच्यते मया तेऽग्रे महत्कौतुककारकम् ॥४१॥
एकदा राघवः श्रीमान्त्सभायामासनोपरि । मन्त्रिभिर्बन्धुभिः पुत्रैर्मन्त्रिभिः पूज्यसंनिधौ ॥४२॥
एतस्मिन्नन्तरे कश्चिद्ब्रह्मचारी समाययौ युवा दण्डधरः श्रेष्ठः कमंडलुकरः शुचिः ॥४३॥
ऐणकृष्णाजिनधरः काषायवसनो व्रती तं दृष्ट्वा राघवः श्रीमानुत्थाय वरासनात् ॥४४॥
प्रत्युद्गम्याथ तं नत्वाऽऽसने समुपवेश्य च । पूजयामास विधिना धेनुमग्रे निवेद्य च ॥४५॥
ततः सम्पूजितं विप्रं राघवो वाक्यमब्रवीत् । अद्य धन्योऽस्म्यहं विप्र यत्ते दर्शनं मम ॥४६॥
कार्यमाज्ञाप्यतां किंचिद्यदर्थं भवनाऽऽगतम् । तद्राघववचः श्रुत्वा ब्रह्मचारी वचोऽब्रवीत् ॥४७॥
वाल्मीकिना प्रेषितोऽहं यस्त्वात्तच्छृणु राघव । चिकीर्षामी महायज्ञं स वाल्मीकिर्महामुनिः ॥४८॥
त्वामाकारयितुं मां स्वानिकटे वरात्मजम् । प्रेषितवानतस्त्वं हि सीतया बन्धुभिः सह ॥४९॥
प्रस्थानं कुरु राजेन्द्र मुहूर्तस्त्वद्य वर्तते । एवं वदति श्रीरामं भूसुरे सदसि स्थिते ॥५०॥
समक्ष गयी, किन्तु पात्र दूर था। इसलिए ग्रासको रोकनेके लिए उसने अपनी अञ्जली फैला दी
॥ ३१-३३॥ रामने भा वह ग्रास उसके हाथम फेंक दिया। दासी उसको लेकर तुरन्त खा गयी।
उसने मनम सोचा कि यह महाप्रसाद है और भगवन्न आज मुझे मिल गया है। उसके इस व्यवहारसे
राम बडे प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा - ॥ ३४। ३५ ॥ अरी दासी तेरा जो इच्छा हो, वह वर मांग ले।
रामकी बात सुनकर उसने कहा - इस समय आप एकपत्नीव्रती हैं। इसलिए हे रघुनायक मैं दूसरे
जन्मस आपके साथ एकान्त सहवास करना चाहती हूँ। ३६ । ३७॥ उसकी यह बात सुनकर रामने कहा
कि अगले जन्मम मैं कृष्णरूपस गोकुलम अवतार लूँगा, तब तुम राधा नामस विख्यात एक गोपपत्नी
होओगी। उस समय बहुत दिना तक तुम मेरे साथ क्रीडाका सुख भोगोगी, इसम कोई संशय नहीं है
॥ ३८। ३९ । सूतका सारा गोपियम तुम मुझे भत्रमे प्रिय होओगी। दासी इस तरह रामचन्द्रजीसे
वरदान पाकर प्रसन्न हो गया । ४० । हे विष्णुदास रामचन्द्रजीकी एक दूसरी कथा भी मैं तुम्हारे आगे कह
रहा हूँ, वह बड़ा कौतुकजनक है। ४१ ॥ एक समय राम भगवान सिंहासनपर भाइयों, पुत्रों तथा मन्त्रियोंके
साथ बैठे थे ॥ ४२ ॥ उसो समय एक युवा ब्रह्मचारी दण्ड धारण किये और हाथमें कमण्डलु तथा पवित्र
मृगछाला लिये और काषाय वस्त्र धारण किये वहाँ आ पहुंचा। उसे देखते ही श्रीमान् रामचन्द्रजी आसनसे
उठ खड़े हुए। थोड़ा आगे बढ़कर उसे प्रणाम किया और एक अच्छे आसनपर बिठलाया। फिर गोदान
देकर उन्होंने उसका पूजा का । ४३-४५ ॥ पूजन कर लेनेके पश्चात् रामने कहा-हे विप्र ! आज आपके दर्शन-
से मैं अपनेको धन्य समझता हूँ ॥ ४६ । अच्छा, अब आप मुझे वह आज्ञा दीजिए कि जिसके लिए आप यहाँ
आये हों। रामकी यह बात सुनकर ब्रह्मचारी कहने लगा । ४७ । श्रीवाल्मीकिजीने मुझे आपके पास भेजा
है। वे एक महायज्ञ करना चाहते हैं। इसीलिए आपको बुलानेके लिए मुझे भेजा है। हे राजेन्द्र ! आज बड़ा
अच्छा मुहूर्त है। अतएव सीता तथा अपने भ्राताओंके साथ आप शीघ्र प्रस्थान कर दीजिए। इस प्रकार वह
सर्गः २१] गद्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५२९
समाययौ ब्रह्मचारी द्वितीयो गाधिजाश्रमात् ।
तं दृष्ट्वा पूर्ववद्रामः प्रत्युद्गम्य द्विजोत्तमम् ॥५१॥
आसनेऽन्ये चोपवेश्य पूजयामास सादरम् ।
ततस्तत्पुरतः स्थित्वा स प्रचच्छ रघूत्तमः ॥५२॥
यदर्थं श्रामितोऽसि त्वं तन्ममाज्ञापयन् इतः ।
तद्राघववचः श्रुत्वा ब्रह्मचारी बभाषिवान् ५३।
राम त्वां गाधिजेनार्त्तं प्रेषणाऽस्मि जवेन हि ।
यत्कर्त्तारौ महायज्ञं विश्वामित्रोऽस्ति राघव । ५४ ।
त्वं तेनाकारितश्चासि प्रस्थानं कुरु सत्वरम् ।
ब्रह्मचारिणोस्तद्वाक्यमृषयोः स रघूत्तमः । ५५।
श्रुत्वा विहस्य प्रोवाच द्विताभ्यां वै तथेति च
तदाश्चर्यं जनाः प्रापुः शृण्वन्ते नु परस्परम् ५६।
कथंमयोमयोः सक्तं रामो गच्छति सत्वरौः ।
केचिदूचु गघवाय किमशक्य तथाऽत्र हि । ५७।
यथा स्त्रीणां वने पूर्वं यथाऽस्माकं हि दर्शनम् ।
यथा गतोऽस्ति लङ्कायाः पुनः भरतदर्शने ॥५८
भिन्नरूपेण रामेण सर्वेषामर्पितं पृथक् ।
तद्वदत्रापि द्विविधा भूत्वा गन्ता न तन्मयी । ५९।
किमाश्चर्यमिदं चाद्य किमशक्यं परात्मनि ।
एवं वदत्सु पौरेषु लक्ष्मणं प्राह राघवः । ६०॥
अद्यैवाहं गमिष्यामि मे जनान्तं च बहिः ।
वासो गेहानि नेयानि बहिः सेनां प्रबोधय ॥६१।
आज्ञापनीयं वाद्यानां ध्वनिं कर्तुं हे सेवकान् ।
तद्राघववच श्रुत्वा तथेत्युक्तवां स लक्ष्मणः ॥६२॥
कारयामास वाद्यानां ध्वनिं तूर्णं भृशमान् ।
सँश्च प्रचोदयामास वहिर्वासोगृहाण्यपि ॥६३।
नेतुमाज्ञापयामासुर्देतास्ते निन्युरादरात् ।
ततो रामोऽपि विप्राभ्यां गृहं गत्वा विदेहजाम् ॥६४॥
सर्वं वृत्तं निवेद्याशु कृत्वा विप्रैर्हि भोजनम् ।
सीतां च करिणीपृष्ठे बंधूनाऽऽरोहयन् प्रभुः ॥६५॥
पुष्पके पौरनारीश्च करिण्युर्मिलादिकाः ।
समारोप्य-तुरागमः स्वयं तस्यां गजोपरि । ६६॥
लक्ष्मणाद्या गजेष्वेव ते समारुरुहुस्तदा ।
निनेदुश्चाथ वाद्यानि ननृतुर्नार्योऽपिचः ॥६७॥
ब्राह्मण कह ही रहा था कि इतनेमें एक दूसरा ब्रह्मचारी विश्वामित्रके आश्रमसे आ पहुँचा । पहलेकी तरह रामने उसका भी स्वागत किया । ४८-५१॥ उस एक दूसरे आसनपर बिठाकर श्रीयुत उसको भी उसी तरह पूजा की । इसके अनन्तर उसके भी आगे बैठकर उन्होंने कहा कि जिस कामके लिए आपने कष्ट किया हो, मुझे आज्ञा दीजिए। रामकी बात सुनकर ब्रह्मचारीने कहा -॥ ५२ ॥ ५३ ॥ हे राम ! मुझे विश्वामित्र-जीने आपके पास भेजा है। वे एक महायज्ञ करना चाहते हैं। उसमें उन्होंने आपको बुलाया है, इसलिए आप शीघ्र प्रस्थान कीजिए। रघूत्तम राम उन दोनों ब्रह्मचारियोंके सन्देश सुनकर मुस्कराए ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ उन दोनोंसे कहा - अच्छा चलेंगे'। इस बातको सुनकर सभाके लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे परस्पर कहने लगे--॥ ५६ ॥ राम इन दोनोंके साथ जाकर कैसे उन दोनों यज्ञोंमें सम्मिलित हो सकेंगे। किसीने कहा कि रामके लिए असम्भव कौन सा काम है, वे क्या नहीं कर सकते ? ॥ ५७॥ जैसे वनमें उन्होंने उन हजारों स्त्रियोंको हजारों रूपोंमें दर्शन दिया था। जिस प्रकार लंकासे लौटकर आनेपर भरत-मिलापके समय प्रत्येक मनुष्यसे मिले थे ॥ ५८ ॥ उसी तरह इस समय भी राम अपना दो रूप बनाकर दोनों जगह चले जायेंगे ॥ ५९ ॥ इसमें आश्चर्य करनेकी बात ही कौन-सी है, जिनका आत्मा इतने ऊँचे दर्जेपर पहुँच गयी है और जो साक्षात् परमात्मा है, उनके लिए असम्भव कोई काम नहीं है। इस तरह लोग आपसमें बातचीत कर रहे थे, तभी रामने लक्ष्मणसे कहा-॥ ६० ॥ लक्ष्मण ! आज ही भोजन करनेके पश्चात् हमलोग बाहर चलेंगे तम्बू कनात आदि भेजवा दो और सेना भी तैयार करवाओ ॥ ६१ ॥ वाद्य बजानेके लिए सेवकोंको आज्ञा दे दो। रामकी आज्ञा सुनकर लक्ष्मणने "एवमस्तु" कहा । ६२ । तत्काल उन्होंने तूर्योको सुदुरी बजानेकी आज्ञा दी। लक्ष्मणके आज्ञानुसार सेवक सब सामान ठीक करने लगे। इसके अनन्तर राम उन दोनों ब्रह्मचारियोंके साथ सीताके महलोंमें गये ॥६३॥ ६४॥ जानकीजी को भी निमन्त्रणका समाचार सुनाया और दोनों ब्राह्मणोंके साथ भोजन किया। फिर बन्धुओंके साथ सीताको हाथीपर सवार कराया। बाकी पुरवासिनी नारियोंको पुष्पक विमानपर एवं ऊर्मिलादिको हाथीपर बिठाया। उन सबको सवारियोंपर बिठाकर स्वयं भी एक हाथीपर सवार हुए और लक्ष्मणादि भी हाथीपर बैठे, इस समय विविध प्रकारके बाजे बजने लगे और
| ५३० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २१ |
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तुष्टुवुर्मार्गगाद्याश्च प्रजगुः सुस्वरं नटाः । एवं प्रशंस्यो रामस्तदा नामोद्ग्राह्याणि सः ॥ ६८ ॥
तां रात्रिं समतिक्रम्य प्रभाते रविनन्दनः । स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा गजारूढोऽभवत्पुनः ॥ ६९ ॥
क्रोशद्वयं गतो गत्वाऽग्रे द्वौ मार्गौ निरीक्ष्य च । चक्रे वै द्वे निजे देहे चकार रघुनन्दनः ॥ ७० ॥
सदा द्वयोर्मार्गयोश्च गच्छन्तौ सीतया सह । पुत्राद्यैर्बन्धुभिर्युक्तौ द्वौ रामौ सकला जनाः ॥ ७१ ॥
ददृशुः पुष्पकं द्वे च द्वौ जातौ ब्रह्मचारिणौ । मन्त्री विप्रश्चैकः स स्वं गृहं ययौ ॥ ७२ ॥
विश्वामित्राश्रमं चान्यः श्रीरामेण युतः मुदा । वाल्मीकेश्चाश्रितश्चैकः स स्वं गृहं ययौ ॥ ७३ ॥
वाल्मीकेश्छात्र चान्यः श्रीरामेण युतः मुदा । एवं तौ राघवौ तत्र सर्वद्रव्यैर्युतावुभौ ॥ ७४ ॥
द्विजान्वि ददृशुस्तत्र गच्छन्तौ राघवावुभौ । तयोर्मार्गे हि तयोर्मुन्न्योस्तदाश्रमे ॥ ७५ ॥
ससैन्यौ सीतया युक्तौ बन्धुपुत्रवधूर्जनैः । सम्पूज्य मुनिभिर्हृष्टैः प्रत्युत्थानादिपूजितौ ॥ ७६ ॥
तयोर्यागं विधायाथ परितुष्टौ पुनः पुनः । समाजग्मुः श्रीरामौ ससैन्यौ पूर्ववन्मुदा ॥ ७७ ॥
यत्र द्वे निजदेहे वै कृते तत्र रघूत्तमो । समागत्य पुनश्चैकं निजदेहं चकार सः ॥ ७८ ॥
वाल्मीकीयो ब्रह्मचारी विश्वामित्राङ्घ्रिसम्भवः । भिन्नदेहे स्वैकरूपं भजतस्स्म तदा द्विजौ ॥ ७९ ॥
ससैन्यं पुष्पकं चापि बभूवैकं तु पूर्ववत् । ततः श्रीरामचन्द्रश्च विवेश नगरीं निजाम् ॥ ८० ॥
तदा निनेदुर्वादित्राणि ननृतुर्वारयोषितः । पौरनार्यो विमानस्था ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ ८१ ॥
तुष्टुवुर्मार्गगाद्याश्च प्रजगन्तं भटादयः । एवं नानाकौतुकानि पश्यन्मार्गे शनैः शनैः ॥ ८२ ॥
ययौ निजगृहं रामः सभायां संविवेश ह । सीताऽपि निजगेहं मा प्रविवेशोर्मिलादिभिः ॥ ८३ ॥
एवं भूरूप रामेण कौतुकानि महान्ति च । अमानुषाणि यान्यत्र कृतानि च सहस्रशः ॥ ८४ ॥
वाल्मीकिना विस्तरेण वर्णितानि हि कृत्स्नशः । सारं सारं मया तेभ्यः संगृह्याद्य कथानकम् ॥ ८५ ॥
वेश्यायें नाचने लगीं ॥ ६५-६७ ॥ बन्दीजन रामकी विरुदावली सुनने तथा नटगण मीठे-मीठे स्वरोंमें गाने लगे । इस प्रकार अपने रामभवनमें प्रस्थान करके राम रास्तेमें बने हुए डेरेपर पहुंचे ॥ ६८ ॥ वह रात्रि रामने वहीं बितायी । सवेरे उठे तो स्नानादि नित्यक्रिया को और फिर हाथीपर बैठकर चल दिये ॥ ६९ ॥ दो कोस आगे जानकर जहांसे विश्वामित्र तथा बाल्मीकिके आश्रमके रास्ते अलग होते थे, वहांसे उन्होंने सेना समेत आत्मा दो स्वरूप बना लिया ॥ ७० ॥ उस समय दोनों रास्तेमें राम सेना, सीता तथा पुत्रवधू आदिये युक्त होकर चले। उस समय जितने भी मनुष्य गाय थे, वे सब रामने दो दिखायी दिये ॥ ७१ । पुष्पक विमान भी दो हो गया और दोनों ब्रह्मचारियोंमेंसे एक रामको विश्वामित्रके आश्रमकी ओर ले चला, दूसरा बाल्मीकिके आश्रमको ॥ ७२ । ७३ । उस समय मनुष्यसे लेकर सांपके कुले तक दो-दो होकर दिखाई दे रहे थे। वे लोग उन दो शरीरोंको सब देखकर बड़े विस्मित हुए ॥ ७४ ॥ इस प्रकार वे दोनों राम अपनी-अपनी सेना, सीता और बन्धुओंके साथ दोनों आश्रमोंको चले । जब कि आश्रमपर पहुंचे तो दोनों ऋषियोंने अगवानी करके उनकी पूजा की ॥ ७५ ॥ इस प्रकार पहुंच-पहुंचकर उन दोनोंका यज्ञ समाप्त हो जानेपर फिर वे दोनो राम पहलेकी तरह अयोध्याको लौटे । ७६ ॥ ७७ ॥ जाते समय जिस स्थानपर रामने अपना दो रूप बनाया था, वहां पहुंचकर फिर एक हो गये । विश्वामित्रका ब्रह्मचारी तथा बाल्मीकिका ब्राह्मण ये दोनों भी एक ही एक हो गये । ७८ । ७९ । उसी तरह पुष्पकविमान और सेना भी एक हो गयी। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी आनन्दपूर्वक अपनी अयोध्या नगरमें प्रविष्ट हुए ॥ ८० ॥ उस समय भी नाना प्रकारके बाजे बजे और वेश्यायें नाचीं । पुरवासियोंने नारियल द्वारा विमानसे रातभर फूलोंकी वर्षा की, बन्दीजनोंने स्तुति की और गानेवालोंने अच्छे-अच्छे राग गाये । इस प्रकार रास्तेमें तरह-तरहके कौतुक देखते हुए धीरे-धीरे ॥ ८१ ॥ ८२ । वे अपने भवनमें गये और प्रणाम परचकर राजसिंहासनपर बैठे । सीता उर्मिला आदिके साथ महलके भीतर गयीं ॥ ८३ ॥ हे शौनक ! रामने संसारमें एकान्तके जिन महान् और अलौकिक कामोंको किया था, उनको बाल्मीकिने विस्तृत वर्णन किया है और मैंने तो उसमेंसे सारभागमात्र लेकर सब कथा सुनायी