सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ६ ] उत्तरकाण्डम् ५७

सर्गः ६ ] उत्तरकाण्डम् ५७

इदानीं गन्तुमिच्छामि व्येतु मातुश्च हृत्क्षपः । मातरं च समाश्वास्य सानुनीय च जानकीम् ॥५७॥
अगत्य पादौ वन्दित्वा तव यास्ये सुखं वनम् । इत्युक्त्वा तौ परिक्रम्य मातरं द्रष्टुमाययौ ॥५८॥
नत्वा स्वमातरं रामः समाश्वास्य पुनः पुनः । नत्वा प्रदक्षिणीकृत्या तामामन्त्र्य ययौ गृहम् ॥५९॥
सर्वं वृत्तं तु सीतायै कथयामास राघवः । सीतया लक्ष्मणेनापि वनं गन्तुं पुनः पुनः ॥६०॥
प्रार्थितश्च तथेत्युक्त्वा त्याजयामास राघवः । सर्वस्वं ब्राह्मणेभ्योऽदात् सीतयाऽभिसमन्वितः । ६१॥
पद्भ्यामेव शनैर्भ्रात्रा ययौ रामो नृपान्तिकम् । गच्छन्तं पथि श्रीरामं पद्भ्यां दृष्ट्वा पुरौकसः । ६२॥
परस्परं ते चूचे अज्ञा व्याकुलमानसाः । तद्दृष्ट्वाऽथान वामदेवः कथयामास सादरात् । ६३।
नारदागमनं रामप्रतिज्ञां रावणस्य च । वधादिकं सविस्तारं विष्णु मनुष्यरूपिणम् ६४।
पौराः श्रुत्वा गतक्लेशा बभूवन्पवित्रमन्धिताः ततो गत्वा नृपं रामः कैकेयीं वाक्यमब्रवीत् । ६५।
अम्बागतोऽहं विपिनं गन्तुं ज्ञां दातुमर्हसि । ततः सा वल्कलादीनि ददौ रामादिकांस्तदा । ६६
रामस्तान् परिधायाथ स्वयं मात्रावशिक्षयत् । तद्दृष्ट्वा कैकेयीं प्राह गुरुः कोपेन मन्मथन् । ६७॥
अहे पापिनि दुर्वृत्ते राम एव त्वया वृतः वनवासाय दुष्टे त्व सीतार्थे कि प्रदास्यसि । ६८॥
इत्युक्त्वा दिव्यरत्नाणि सीताय व गुरूर्ददौ । राजा दशरथोऽप्याह सुमन्त्रं रथमानय ॥६९॥
रथमारुह्य गच्छन्तु वनं वनचरप्रियाः रामः प्रदक्षिणं कृत्वा पितरौ रथमRUhet ॥ ७०॥
मातत्रा लक्ष्मणेनाथ चोदयामास सारथिम् । कौसल्यां च सुमित्रां च तातमाश्वास्य वै पुनः । ७१॥
समाश्वास्य जनान् सर्वान्नममानीन्मापयौ । माघमासे सिते पक्षे पञ्चम्यां परमेऽहनि । ७२।
प्राप्ते द्वादशमे वर्षे राघवाय महात्मने । आयातद्वनप्रयाणं हि सपूर्णांस्तममानटम् ॥७३॥


सान्त्वना देने ... कि मैं आपकी प्रतिज्ञा पूरी करके ... लौट जाऊंगा ॥ ५६ ॥ परन्तु इस समय तो मैं जाना ही चाहता हूँ। जिससे कि माता कैकेयीके हृदयका शोक दूर हो सके। माताको आश्वासन दे तथा सीताको समझाकर ये आ रहा हूँ। तब आपके चरणोंको प्रणाम करके सुखसे वनको प्रस्थान करूँगा। यह कहकर राम उन दोनोंकी परिक्रमा करके शांत करनेके लिये माता कौशल्याके पास गये ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ माताको नमस्कार करके बार बार समझाया और प्रदक्षिणा करके उनकी आज्ञा ले अपने महलमें गये ॥ ५९ ॥ वहाँ जाकर श्रीरामने सीताको सम्पूरन वृत्तान्त कह सुनाया। जब सीता और लक्ष्मण बारम्बार अपने साथ वनमें ले चलनेकी प्रार्थना की, तब 'अवश्य' कह तथा शीघ्र ब्राह्मणोंको सर्वस्व दान देकर सीता तथा अग्निको साथ लेकर भाई लक्ष्मणके साथ पैदल ही राजाके पास आये । रास्तेमें पुरवासीजन रामको पैदल आते देख तथा एक दूसरेसे सब वृत्तान्त जानकर बड़े चिन्तातुर हुए । तब वामदेव मुनिने प्रेमसे उन लोगोंको नारदका आगमन, रामकी प्रतिज्ञा, रावणका वध तथा विष्णुका मनुष्यरूप धारण करना आदि वृत्तान्त विस्तारसे कह सुनाया ॥ ६०-६४ ॥ राग्रेण सर्व पुरवासीजन उनकी यह बात सुनकर शान्त हो गये । रामने राजाके पास जा तथा उन्हें नमस्कार करके कैकेयीसे कहा ॥ ६५ ॥ हे अम्ब ! मैं वन जानेके लिए तयार हो गया हूँ। आप मुझे आज्ञा दें । तब उसने राम सीता तथा लक्ष्मणको पहिननेके लिये वल्कल वसन दिये ॥ ६६ । राम स्वयं उन परिधानकर सीताका वल्कल पहिनना सिखलाने लगे । यह देखकर मुनि वसिष्ठ क्रुद्ध होकर कैकेयीको धमकाते हुए कहने लगे-॥ ६७ । अरे पापिनि ! अयि दुर्वृत्ते ! तूने केवल रामके वनवासका वर माँगा है। तब सीताको पहिननेके लिये वल्कल क्यों देती है ? ॥ ६८ ॥ यह कहकर सीताके लिये उन्होंने दिव्य वस्त्र दिये। राजा दशरथ बोले-हे सुमन्त्र ! रथ ले आओ। उस रथपर सवार होकर वनचरोंके प्रिय ये तीनों वनको जायँगे । बादमें रामने माता पिताकी प्रदक्षिणा की और माता तथा लक्ष्मणको साथ लेकर रथपर सवार हुए । तब सुमन्त्रको रथ चलानेकी आज्ञा दी कौसल्या, सुमित्रा, पिता तथा अन्य जनोंको आश्वासन देकर राम चल पड़े और शीघ्र ही तमसा नदीके तीरपर जा पहुँचे । बारहवें वर्षके माघ शुक्ल पञ्चमीकी शुभ तिथिको महात्मा रामने अपने नगरसे चलकर तमसाके किनारेकी ओर प्रयाण किया था

५८आनन्दरामायणे[ सर्गः ६

इन्द्राद्या निर्जगाश्चक्रुस्तदा सन्मार्गमक्रियाम् । अभवन् शुभाश्च शकुना रामस्य व्रजतो वनम् ॥७४॥
उषंर्वशां निशां तत्र शृङ्गवेरपुरं ययौ । गुहेन मानितश्चापि तत्र रात्रिं निनाय सः ॥७५॥
गुहानीतैर्वटक्षीरैर्गन्धैश्च राघवौ जटाम्, प्रभाते संविधायाऽऽशु नौकारूढो लक्ष्मणेन सः ॥७६।
प्रेषयामास नगरं सुमन्त्रं नगरं प्रति । गुहस्तं वाहयामास नौकां स्वज्ञातिभिस्तदा ॥७७॥
गङ्गामध्यगतां गङ्गां प्रार्थयामास जानकी। देवि गङ्गे नमस्तेऽस्तु निवृत्त्या दण्डकावनात् ॥७८॥
रामेण सहिताऽहं त्वां लक्ष्मणेन सुपूजये । सुरामांसोपहारैश्च नानाबलिभिरावृता ॥७९॥
इत्युक्त्वा परकूलं तु गत्वा रामो गुहं तदा । विसर्जयित्वा तत्रैकां निशां नीत्वा शनैः शनैः ॥८०॥
भारद्वाजाश्रमं गत्वा तत्र्यासौ तेनातिमानितः । ततः प्रयागे यमुनां तीर्त्वा गत्वा महद्वनम् ॥८१॥
वाल्मीकेराश्रमं गत्वा तत्र्था तेनातिपूजितः । चित्रकूटो लक्ष्मणेन पर्णशालां मनोहराम् ॥८२॥
कृत्वा यांयेसुमांश्चैवान्वैर्दा हत्वा रघूत्तमः । तस्यां तस्यां मुद्य भ्रात्रा सीतया स्वगृहे यथा ॥८३॥
शयनार्सनपाकादिदेशानां पृथक् पृथक् तत्राभ्यन्तरविद्वाः शालास्तरुवनैर्विराजिताः ८४॥
ईर्मूलैर्वनेऽतन्मुनिमागंतकातिथिः । सुताँश्चरणानानित्य चकृन्ते स्वगृहे यथा ॥८५॥
कदा निद्रितं रामं भ्राताऽङ्के मन्दिरोशय् च । ऐन्द्रः काकस्वरूपाग्र्य चन्चूडेन चाशकत् ॥८६॥
सीतांगुष्ठं मृदु रक्तं विददारामिपाशया। निद्राभंगभयाद्भर्तुः सीतया न निवारितः ॥८७॥
सीतांगुष्ठं तु काकेन भिन्नं दृष्ट्वा रघूत्तमः । अभिष्ट्रतं रक्तार्यमक्षिकामं मुमोच यः ॥८८॥
कृतात्पर्यक्षतस्याप्रमयाद्ब्रह्मांडगोलके स्वत्राणमक्षमत्पश्यन् पुनरागाद्वचायतः॥८९.॥
ऐषिकास्त्रेण काकस्य विभेद नयनं क्षणात् । एव मन्मर्दिकुत्राणि कुर्वस्त्वद्यौ भुवि प्रभुः ॥९०॥

॥ ७१-७३ ॥ उस समय इन्द्रादि देवताओंने उनका सत्कार किया। वनमें जाते हुए रामका अनेक शुभ शकुन हुआ ॥ ७४ ॥ वहाँ एक रात्रि निवास करके शृङ्गवेरपुर प्राप्त हुए। निषादराजके द्वारा सम्मानित होकर उस रातको वहीं विताया ॥ ७५ ॥ सब प्रभात निषादके द्वारा लाये हुए वटवृक्षके दूधसे जटा बांधी। तदनन्तर सीता तथा लक्ष्मणके साथ नौके पर सवार हुए ॥ ७६ ॥ उद्दीन रथसहित सुमन्त्रको अयोध्या लौटा दिया तब निषादराजने अपने ज्ञातियोंके साथ मिलकर नावको लगा आरम्भ किया ॥ ७७ ॥ जानकीने वीच धारमें जाकर गङ्गाजीकी प्रार्थना की और कहा हे देवि गङ्गे ! आपका नमस्कार है। मैं राम तथा लक्ष्मणके साथ वनसे सकुशल लौटकर आऊँ तथा सङ्कल्पपूर्वक मांस-मदिरा आदिके उपहारसे आपकी पूजा करूंगी ॥ ७८-७९ ॥ इस पारे जा तथा वहाँ एक रात निवास करके रामने निषादको लौटा दिया और धीरे धीरे च लकर भारद्वाजके आश्रमपर जा पहुंचे। वहां उनका अत्यन्त आदर सत्कार हुआ। ततः प्रयागमें यमुनाको पार करके चले और महारन (चित्रकूट) में स्थित वाल्मीकिके आश्रममें जा पहुंचे। वहां उनसे पूजित होकर ठहरे। चित्रकूटमें रामने लक्ष्मणसे एक सुन्दर पर्णकुटी बनवायी ॥ ८०-८२ ॥ सुगन्धित घासोंको बाँध देकर रघूत्तम राम ने तात तथा भाईके साथ मण्डपके धरकी तरह उसमें रहने लगे ॥ ८३ ॥ शयनका बैठनेका, खानेका, अग्निहोत्र तथा पूजा आदिका स्थान विविध वेदी और वनसे शोभित निर्माण किया गया वे स्थान अति रमणीक स्थान था। ८४ । वहाँ उत्पन्न होनेवाले कंद मूल फल तथा मृगचाम आदिसे, जैसे अपने भवनमें मुनीश्वरोंका सत्कार करने थे वैसे ही सत्कार करने लगे ॥ ८५ ॥ एक समय सीताका गोदमें सिर रख-कर रामको सोते देख इन्द्रका पुत्र जयन्त कौवा बनकर वहाँ आया और अपने उस तीक्ष्ण चोंचसे बारम्बार सीताके पाँवके लाल अँगुठेका मांस खानेकी इच्छासे उस विदार्य करने लगा। सीताने पतिकी निद्रा भङ्ग हो जानेके भयसे उसको नहीं हटाया ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ जागनेके बाद रामने सीताके अंगूठेका कौएके द्वारा विदारित देखकर रक्त रञ्जित मुखवाले भागते हुएकौएपर सींकका अस्त्र छोड़ा ॥८८॥ ब्रह्माण्ड भरमें उस भयङ्कर भयसे जब किसीने जयन्तकी रक्षा नहीं की तब नारदके कहनेपर वह रामकी शरणमें आया। उस समय क्षणभरमें रामने सींकके अस्त्रसे जयन्तका केवल एक आँख फोड़कर उसे जीवनदान दे दिया। इस प्रकार सबके प्रभु राम विविध