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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७३१

सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७३१


आदौ नरैर्मारुतेश्च पठित्वा कवचं शुभम् । ततः शत्रुघ्नकवचं पठनीयमिदं शुभम् ॥८२॥
पठनीयं भरतस्य कवचं परमं ततः । ततः सौमित्रिकवचं पठनीयं सदा नरैः ॥८३॥
पठनीयं ततः सीताकवचं भाग्यवर्द्धनम् । ततः श्रीरामचन्द्रस्य कवचं सर्वशोभनम् ॥८४॥
पठनीयं नरैर्भक्त्या सर्ववांछितदायकम् । एवं षट् कवचान्यत्र पठनीयानि सर्वदा ॥८५॥
पठनं षट्कवचानां श्रेष्ठ मोक्षैकसाधनम् । ज्ञात्वाऽत्र मानवैलैक्त्या कार्य यः पठनं सदा ॥८६॥
अशक्तेनात्र चत्वारि पठनीयानि सादरम् । मारुतेश्च सौमित्रेः सीताया राघवस्य च ॥८७॥
इमानि पठनीयानि चत्वारि कवचानि हि । चतुर्णां कवचानां च पठने मानवस्य च । ८८।
न यद्यत्रावकाशश्चेत्तदा त्रीणि पठेन्नरः । मारुतेश्चाथ सीतायास्तथा श्रीरामकस्य च ॥८९॥
त्रयाणां कवचानां च न पाठावसरो यदा । पठनार्थं मानवस्य तदा द्वे कवचे स्मृते ॥९०॥
मारुतेश्चाथ रामस्य सीताया राघवस्य वा । नैकमेव पठेच्चात्र श्रीरामकवचं शुभम् ॥९१॥
अवकाशे कवचानां षट्कमेव सदा नरैः । पठनीयं क्रमेणैव कर्त्तव्यो नालसः कदा ॥९२॥
यदाऽवकाशो नास्त्येव तदा तेषां सुखप्रदे । मया विशेषः प्रोक्तोऽयं न सर्वेषां मयेरितः ॥९३॥

इति शत्रुघ्नकवचम् ।

श्रीरामदास उवाच

एवं शिष्य त्वया यद्यत्पृष्टं तत्तन्मयोदितम् । अन्यत्किंचित्प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्वाद्य सादरम् ॥९४॥
गीतैः प्रनृत्यैः श्रीरामः सदा गेयोऽत्र मानवैः । वीणावाद्यादिभिर्भक्त्या नृत्त्यन्त्यापि समाचरेत् ॥९५॥
दशरथनंदनेति पूर्वमुक्त्वा ततः परम् । मेघश्यामेति वै चोक्त्वा तथा रविकुलेति च ॥९६॥
मंडनराजारामेति ह्यतिप्रीत्याऽन्वहं जपन् । मनुः सदा जपनीयो वीणावाद्येन सुस्वरम् ॥९७॥

दशरथनंदन मेघश्याम रविकुलमंडन राजाराम इति मनुः ।

कीर्तनेऽस्य मनोर्नैव कार्यों न्यासो जपे स्मृतः । एवं सर्वेषु मंत्रेषु बोद्धव्यं मानवैर्भुवि ॥९८॥


जो चाहता है, सो उसे मिलता है ॥ ८० ॥ इस भूमण्डलमें शत्रुघ्नकवच बड़ा उत्तम है। अतएव मनुष्यको अवश्य इसका पाठ करना चाहिए ॥ ८१ ॥ लोगोंको चाहिए कि पहले हनुमत्कवचका पाठ करके इस शत्रुघ्न-कवचका पाठ करें । ८२ ॥ इसके बाद भरतकवच और भरतकवचके बाद सौमित्रकवचका पाठ करें ॥ ८३ ॥ इसके बाद भाग्यको बढ़ानेवाले सीताकवचका पाठ करके श्रीरामकवचका पाठ करें ॥ ८४ । इस तरह सब वांच्छित फल देनेवाले ६ कवचोंका प्रतिदिन पाठ करते रहें ॥ ८५ ॥ इन छहों कवचांका पाठ श्रेष्ठ और मोक्षका साधन है। ऐसा समझकर लोगोंको सर्वदा इनका पाठ करते रहना चाहिए ॥ ८६ ॥ यदि ऐसा न कर सकें तो हनुमत्जी, लक्ष्मण, सीता तथा रामके कवचका पाठ करें । यदि इन चारोके पाठ करनेका समय किसी प्राणीको न मिले तो हनुमत्जी, सीता तथा रामके कवचका ही पाठ करें ॥ ८७-८८ ॥ यदि तीन कवचके पाठ करनेका भी अवसर न मिल सके तो हनुमान तथा राम इन दोनों कवचोंका ही पाठ करे। किन्तु इतना अवश्य ध्यान रक्खे कि ऊपर बतलाये कवचोंमेंसे किसी एकका अथवा रामकवचका ही पाठ करके न रह जाय ॥ ९० ॥ ९१ ॥ जब समय मिले, तब छहों कवचोंका क्रमशः पाठ करे । आलस्यवश टाल न दे ॥ ९२ । यदि किसी विशेष अडचनके कारण कुछ भी समय न मिल सके, तबके लिए यह परिहार बतलाया गया है। यह सब समय और सबके लिए लागू नहीं है ॥ ९३ ॥ रामदासने कहा-हे शिष्य ! तुमने मुझसे जो पूछा, वह सुनाया । अब और कुछ बाते बतला रहा हूँ, उन्हें आदरपूर्वक सुनो ॥ ९४ । लोगोंको यह भी चाहिए कि सदा गीत-कविता आदिसे रामचन्द्रजीका गुण गान करें और वीणा आदि बजाकर साथ भक्तिपूर्वक नाचें ॥ ९५ ॥ पहले 'दशरथनन्दन' ऐसा कहकर 'मेघश्याम' फिर 'रविकुलमण्डन' ऐसा कहकर 'राजाराम' कहते हुए "दशरथनन्दन मेघश्याम रविकुलमण्डन राजाराम" इस मन्त्रका कीर्तन और जप किया करें ॥ ९६ ॥ ९७ ॥ इस

७१२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १६

रामजयेति चोक्त्वा तु द्विवारं चाथ सुस्वरम्। रामेति द्वेऽक्षरे त्वन्ते सोक्त्वा वीणास्वरेण च ॥९९।
चतुर्दशाक्षराख्यं कीर्तनार्थं मयोदितः ॥१००॥
राम जय राम जय राम जय राम इति मनुः।
मंत्रशास्त्रेषु ये मंत्रास्ते जपार्थं प्रकीर्तिताः। इमे मंत्राः कीर्तनार्थं तावद्गीया मानवोत्तमैः ॥१०१।
एतेषामपि चेद्भक्त्या मंत्राणां च जपः कृतः। तदा भस्मीभवन्त्येति तेषां पापानि वै क्षणात् ॥१०२॥
अन्यान् मंत्रान् प्रवक्ष्यामि तान् शृणुष्व द्विजोत्तम, राजीवलोचनेत्युक्त्वा मेघश्याममिति वै ततः ॥१०३।
तथा सीतारञ्जनेति राजारामेति वै ततः। एकोनविंशद्वर्णश्च राममंत्रस्त्वयं स्मृतः ॥१०४।
राजीवलोचन मेघश्याम सीतारञ्जन राजाराम इति मन्त्रः।
अयं मंत्रः सुस्वरेण कीर्तनाद्यो मुहुर्मुहुः। वीणास्वरेण सयुक्तश्चासने गमनेऽपि च ॥१०५॥
श्रीशब्दपूर्वं जयशब्दमध्यं जयद्वयेनापि पुनः प्रयुक्तम्।
त्रिःसप्तकृत्वो रघुनाथनाम जपं निहन्त्याशु द्विजकोटिहत्याः ॥१०६॥
त्रयोदशाक्षराख्यं राममंत्रः शुभावहः। जपनीयः कीर्तनीयः सर्वदाऽयं मुहुर्मुहुः ॥१०७।
श्रीराम जय राम जय जय राम इति मनुः।
अयं मंत्रः सुस्वरेण तथा वीणाम्बगादिना। कीर्तनीयो मुदा मर्यैर्मंत्रशास्त्रेऽप्ययं स्मृतः ॥१०८।
तस्मात्सदा जपनीयः सर्वसिद्धिप्रदायकः। अष्टादशाक्षर मंत्र त्वन्य शृणु शुभावहम् ॥१०९।
उक्त्वा सीतारञ्जनेति मेघश्यामेति वै ततः, कौसल्यासुतेत्युक्त्वाथ राजारामेति वै ततः ॥११०
सीतारञ्जन मेघश्याम कौसल्यासुत राजाराम इति मनुः।
अष्टादशाक्षराख्य कीर्तनीयो महामनुः। वीणास्वरमनुश्च कलकण्ठ सुस्वरः ॥१११।
रविकुलजातं वन्दे चेति प्रकीर्त्य च। सुरभूसुरेन्युक्त्वान्तेऽग्रे गीतं चेति ततः परम् ॥११२।

मन्त्रका जप करते समय न्यास आदि करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रहती। इसी तरह आगे बतलाये जानेवाले मन्त्रोंके भी विषयमें जानना चाहिए ॥९८॥ 'रामजय' ऐसा तीन बार कहकर वीणाके स्वरसे "राम" इस दो अक्षरोंका उच्चारण करना चाहिये। यह चौदह अक्षरोंवाला मन्त्र मनोंको कीर्तन करनेके लिए बतलाया है। "राम जय राम जय राम जय जय राम" यह मन्त्र है। मन्त्रशास्त्रोंमें जितने मन्त्र बतलाये गये हैं, वे सब जप करनेके लिए हैं। किन्तु ये मन्त्र कीर्तन करनेके लिए भी लिखे गये हैं ॥९९-१०१॥ यदि भक्तिपूर्वक इनका जप भी किया जाय तो क्षणभरमें जप करनेवालेके सारे पातक जल जायेंगे ॥१०२॥ हे द्विजोत्तम ! तुम्हें मैं और भी बहुतसे मन्त्र बतलाऊँगा। 'राजीवलोचन' ऐसा कहकर 'मेघश्याम' तथा 'सीतारञ्जन' और 'राजाराम' ऐसा कहे। यह उन्नीस अक्षरोंका मन्त्र है ॥१०३॥१०४॥ राजीवलोचन मेघश्याम सीतारञ्जन राजाराम' यह मन्त्र है। अच्छी तरह मीठे स्वरसे बारम्बार इस मन्त्रका कीर्तन करता रहे। चलते फिरते उठते बैठते सदा इस मन्त्रका कीर्तन करे ॥ १०५॥ आदिमें 'श्री' उसके बाद 'जय' फिर दो जयके बीचमें 'राम' इक्कीस बार नाम जपनेवाला मनुष्य करोड़ों ब्रह्महत्याके पातक नष्ट कर देता है ॥ १०६॥ यह त्रयोदशाक्षर राममंत्र बड़ा कल्याणदायक है। इसलिए लोगोंको चाहिए कि बारम्बार इस मन्त्रका जप और कीर्तन करते रहें ॥१०७॥ 'श्रीराम जय राम जय जय राम' यह मन्त्र है। लोगोंका उचित है कि इस मन्त्रको वीणा आदिके स्वरके साथ साथ प्रीतिपूर्वक कीर्तन करें। मन्त्रशास्त्रमें भी इस मंत्रका उल्लेख है ॥ १०८॥ इसलिए सर्वदा इस मंत्रका जप भी करना चाहिए। क्योंकि यह सब प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाला है। अब मैं एक और अष्टादशाक्षर मंत्र बतला रहा हूँ वह भी बड़ा मान्यकारी है ॥ १०९ ॥ 'सीतारंजन' ऐसा कहकर "मेघश्याम" फिर "कौसल्यासुत" कहकर 'राजाराम' कहना चाहिए ॥११०॥ "सीतारंजन मेघश्याम कौसल्यासुत राजाराम" यह मन्त्र है। इस अष्टादशाक्षर महामन्त्रका कीर्तन करना चाहिए। कीर्तन वीणाके स्वर-के साथ तथा कोकिलके समान मीठे स्वरोंमें होनेसे विशेष लाभदायक होता है॥ १११॥ "रविवरकुलजातं

सर्गः १८ ] मनोहरकाण्डम् ७३३


सप्तदशसुवर्णश्च राममन्त्रस्त्वयं शुभः। कीर्त्तनीयः सुस्वरं हि वीणावाद्यध्वनादिना ॥११३॥
रविकुलजातं वन्दे सुरगुरुगणितम् इति मनुः।
विष्णोदासशृणुष्वन्यान् राममंत्रान् शुभप्रदान्। येषां स्मरणमात्रेण महन्पापं लयं व्रजेत् ॥११४॥
कौसल्यासुतेत्युक्त्वाथ रामेति द्वयक्षरे तथा तथा सीताराजनेति मेघश्यामेति वै ततः ॥११५॥
षोडशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः शुभावहः। वीणास्वाद्यपूर्वकञ्च कलकण्ठेन सुस्वरः ॥११६॥
कौसल्यासुतराम सीताराजन मेघश्याम इति मनुः।
षोडशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः सदा नरैः। सर्वपापक्षयकरः सर्ववांछितदायकः ॥११७॥
दशरथनन्दनेति पूर्वमुक्त्वा ततः परम्। मेघश्याममिति वै चोक्त्वा सीतेति द्वयक्षरे ततः ॥११८॥
राजनेति ततोक्त्वा राजारामेति वै ततः। विंशाक्षरपद्युभायं महापातकनाशनः ॥११९॥
दशरथनन्दन मेघश्याम सीताराम राजाराम इति मनुः।
अयं विंशाक्षरो मन्त्रः कीर्तनीयः सुखप्रदः। वीणास्वरसमेतश्च महापुण्यप्रदः स्मृतः ॥१२०॥
वन्दे रघुपतीरमिति चोक्त्वा चैत्र ततः परम्। उक्त्वा सीताकान्तमिति रणधीरमितिक्रमात् ॥१२१॥
चतुर्दशाक्षराश्रयं राममंत्रः शुभावहः। कीर्तनीयो जनैर्भक्त्या महामङ्गलकारकः ॥१२२॥
वन्दे रघुपतीं सीताकान्तं रणधीरम् इति मनुः।
जय राम जय राम संकीर्त्य सुस्वरं ततः। जय जयोत्र संकीर्त्य रामेति द्व्यक्षरे पुनः ॥१२३॥
चतुर्दशाक्षराश्राय तृतीयः कथितो मनुः। कीर्तनीयो जनैर्नित्यं महापातकनाशनः ॥१२४॥
जय राम जय राम जय जय राम इति मनुः।
मनुः सीतामाधवेति पंचवर्णात्मकः स्मृतः। जपनीयः कीर्तनीयो वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१२५॥
सीतामाधव इति मनुः


वन्दे' इसका उच्चारण करके "सुरगुरु" ऐसा कहकर 'जात' का उच्चारण करे ॥११२॥ सत्रह सुन्दर वर्णों-
से इस शुभ राममन्त्रका रचना की गयी है। लोगोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ मीठे स्वरसे
इस मंत्रका कीर्तन किया करें ॥ ११३॥ 'रविकुलजातं वन्दे सुरगुरुगणितम्' यह मन्त्रका स्वरूप है। राम-
दास कहते हैं कि हे विष्णुदास ! अब मैं और बहुतसे शुभ मन्त्र तुझसे बता रहा हूँ, सुनो। जिनके
स्मरणमात्रसे बड़े बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ११४ ॥ 'कौसल्यासुत' ऐसा कहकर 'राम' इसका उच्चारण
करे। तदनन्तर 'सीताराजन' और उसके बाद 'मेघश्याम' कहे ॥ ११५ ॥ यह षोडशाक्षर मंत्र बड़ा शुभ है।
इसीलिये लोगोंको चाहिए कि भली आवाज़से बाजा आदि वाद्योंके साथ-साथ इसका कीर्तन करे ॥ ११६ ॥
'कौसल्यासुत राम सीताराजन मेघश्याम' यहो मंत्रका स्वरूप है। इस षोडशाक्षर मन्त्रका लोग सर्वदा कीर्तन
करें। क्योंकि यह समस्त पापोंका नाशक और सब प्रकारका अभिलषित कामनाओंको पूर्ण करनेवाला महामंत्र
है ॥ ११७ ॥ "दशरथनन्दन" ऐसा कहकर पहले 'मेघश्याम" और उसके बाद "सीता" इन दो अक्षरोंको
कहकर 'राजन" ऐसा कहते हुए 'राजाराम' कहे। यह बीस अक्षरोंवाला राममंत्र बड़े-बड़े पातकोंका
नाशक है ॥ ११८॥ ११९॥ 'दशरथनन्दन मेघश्याम सीताराम राजाराम' यही इस मन्त्रका स्वरूप है।
जनोंको चाहिए कि सब प्रकारका सुख देनेवाले इस विंशाक्षर मन्त्रका मीठे स्वर तथा वीणा आदि वाद्योंके
साथ कीर्तन करें। क्योंकि यह बड़ा पुण्यदायक मन्त्र है ॥१२०॥ "वन्द बारं रघुवारम्' ऐसा कहकर "सीताकान्तम्"
तथा 'रणधीरम्' ये वाक्य कहे ॥ १२१ ॥ यह परम फलदायक चतुर्दशाक्षरात्मक राममंत्र है। लोगोंको उचित
है कि महामंगल करनेवाले इस मन्त्रका भक्तिपूर्वक कीर्तन करें ॥ १२२ ॥ 'वन्दे रघुपतीं सीताकान्तं रणधीरम्'
यह इस मंत्रका स्वरूप है। 'जय राम जय राम' ऐसा कहकर "जयजय" ऐसा कहते हुए 'राम' के दो
अक्षर कहें। 'जय राम जय राम जय जय राम' यह इस मन्त्रका स्वरूप है। चतुर्दशाक्षर मंत्रोंमें यह तीसरा
मंत्र है। लोगोंको चाहिए कि महापातकोंका नाश करनेवाले इस मंत्रका कीर्तन किया करें ॥ १२३ । १२४॥

७३४आनन्दरामायणम्[ सर्गः १५

भजेति द्व्यक्षरे पूर्वं सीताराममिति क्रमात् ।
मानसेति ततश्चोक्त्वा भजेति द्व्यक्षरे पुनः ॥१२६॥

ततो राजाराम इति मंत्रः पञ्चदशाक्षरः ।
कीर्तनीयो मनुष्याय वीणावाद्येन सुस्वरः ॥१२७॥
भज सीताराम मानस भज राजारामम् इति मनुः ।

श्रीसीताराममित्युक्त्वा वन्दे चोक्त्वा ततः पुनः ।
श्रीराजाराममिति च कीर्तयेत्सुस्वरं मुहुः ॥१२८॥

द्वादशाक्षरमंत्रोऽयं कीर्तनीयः सदा जनैः ।
वीणावाद्यादिना पुण्यः सर्ववांछितदायकः ॥१२९॥
श्रीसीतारामं वन्दे श्रीराजारामम् इति मनुः ।

रावणमर्दनत्युक्त्वा रामेत्युक्त्वा ततः परम् ।
राघवति ततश्चोक्त्वा वाली चेति ततः क्रमात् ॥१३०॥

मर्दनेति पुनश्चोक्त्वा रमाठ द्व्यक्षरे पुनः ।
स्मृतोऽष्टादशवर्णोऽथ द्वितीयोऽथ मनुः शुभः ॥१३१॥
रावणमर्दन राम राघव वालीमर्दन रामेति मनुः ।

अयं मंत्रः कीर्तनीयः सर्वदा मानवोत्तमैः ।
श्रीसीताराममिति च मानसेति ततः परम् ॥१३२॥

भजेति द्व्यक्षरे चोक्त्वा रामेति द्व्यक्षरं पुनः ।
राममिति द्व्यक्षरे च मंत्रोऽयं परमः शुभः ॥१३३॥

चतुर्दशाक्षरश्चायं चतुर्थश्च प्रयोगतः ।
कीर्तनीयः सुस्वरेण वीणावाद्यपुरःसरः ॥१३४॥
श्रीसीताराम मानस भज राजाराम् इति मनुः ।

सीताराम जयेत्युक्त्वा राजरामेति वै ततः ।
अयं दशाक्षरो मन्त्रः कीर्तनीयोऽथ सुस्वरः ॥१३५॥
सीताराम जय राजाराम इति मनुः ।

श्रीसीताराममिति च वन्दे राममिति क्रमात् ।
जय रामं ततश्चैव त्रयोदशाक्षरो मनुः ॥१३६॥

कीर्तनीयः सदा मर्त्यैः सर्वपातकनाशनः ।
वीणावाद्यादिना नित्यं द्वितीयोऽथ मनुः स्मृतः ॥१३७॥
श्रीसीतारामं वन्दे रामं जय रामम् इति मनुः ।

मां पाहीति चोक्त्वादौ दीनं राघव चेति हि ।
त्वत्पदयुगलीनं वै चेत्येष षोडशाक्षरः ॥१३८॥


'सीताराघव' यह पंचवर्णात्मक राममंत्र है। सुस्वर मीठे स्वर और वीणा आदि वाद्योंके साथ इस मंत्रका कीर्तन और जप करे ॥१२५॥ "सीताराघव" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। पहले 'भज' यह शब्द कहकर 'सीतारामम्' कहे। उसके बाद "मानस" यह शब्द कहकर 'भज राजारामम्' ऐसा कहे। यह पंचदशाक्षरात्मक राममंत्र है। इसे भी जप या मीठे स्वर तथा वीणा आदि वाद्योंके साथ कीर्तन करे ॥१२६-१२७॥ "मन्त्र सीताराम मानस भज राजारामम्" यह इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'श्रीसीतारामम्' ऐसा कहकर 'वन्दे' कहे और उसके बाद 'श्रीराजारामम्' कहकर इस मंत्रका कीर्तन करे यह द्वादशाक्षरात्मक मंत्र है । 'श्रीसीतारामं वन्दे श्रीराजारामम्' यह इस मंत्रका स्वरूप है। लोगोंको उचित है कि सब प्रकारकी कामनायें पूर्ण करनेवाले इस मंत्रका जप और कीर्तन करें ॥१२८-१२९॥ पहले 'रावणमर्दन' फिर 'राम' उसके बाद "राघव" फिर 'वालीमर्दन' तदनन्तर 'राम' ऐसा कहे। अष्टादशाक्षर मंत्रोंमें यह दूसरा मंत्र है। 'रावणमर्दन राम राघव वालीमर्दन राम" यह इस मन्त्रका स्वरूप है। सज्जनोंको चाहिए कि सर्वदा इस मन्त्रका जप किया करें। पहले 'सीतारामम्' उसके बाद 'मानस' फिर 'भज' और उसके पश्चात् 'राजारामम्' ऐसा कहें। यह बड़ा पवित्र मन्त्र है॥ १३०-१३४॥ चतुर्दशाक्षरात्मक मंत्रोंमें यह चौथा मन्त्र है। इसका भी वीणा आदि वाद्योंके साथ कीर्तन तथा जप करना चाहिए। 'श्रीसीताराम मानस भज राजाराम' यही इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'सीताराम जय' फिर 'राजाराम' ऐसा कहे। यह दशाक्षर राममंत्र है। लोगोंको चाहिए कि मीठे स्वरसे इस मंत्रका भी कीर्तन किया करें। ॥१३५॥ 'सीताराम जय राजाराम' यही इस मंत्रका स्वरूप है। पहले 'सीतारामम्' फिर 'वन्दे रामम्' और इसके बाद 'जय राम' ऐसा कहे। यह त्रयोदशाक्षर राममंत्र है। संसारके प्राणियोंको चाहिए कि वीणा आदि वाद्योंके साथ नित्य इस मन्त्रका कीर्तन करें । १३६ ॥ १३७ ॥ 'श्रीसीतारामं वन्दे रामं जय रामम्' यह मंत्रका स्वरूप है। पहले 'मा पाहि इति'