श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६५७
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६५७
प्रविश्य तु महारण्यं रामो गजबलैश्वरः । विराधं राक्षसं हत्वा सुभगं ददर्श सः ॥ ४१ ॥
सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च ह्यगस्त्यभ्रातरं तथा । अगस्त्यवचनाच्चैव जग्राहैन्द्रं शरासनम् ॥ ४२ ॥
खङ्गं च परमप्रीतस्तूणी चाक्षयसायकौ । वनेष्ववसतस्तस्य समञ्च वनचरैः सह ॥ ४३ ॥
ऋषयोऽभ्यागमन् सर्वे वधाया सुररक्षसाम् । स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां वधाय च ॥ ४४ ॥
प्रतिज्ञातश्च रामेण वधः संयति रक्षसाम् । ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासिनाम् ॥ ४५ ॥
तेन तत्रैव वसता जनस्थाननिवासिनी । विरूपिता शूर्पणखा राक्षसी कामरूपिणी ॥४६॥
ततः शूर्पणखावाक्यादुद्युक्तान् सर्वराक्षसान् । खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ॥४७॥
निजघान रणे रामस्तेषां चैव पदानुगान् । वने तस्मिन्निवासराञ्जनस्थाननिवासिनाम् ॥४८॥
रक्षसां निहतान्यासन्सहस्राणि चतुर्दश । ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥४९॥
सहायं वरयामास मारीचं नाम राक्षसम् । वार्यमाणः सुबहुशो मारीचेन स रावणः ॥५०॥
न विरोधो बलवता क्षमो रावण तेन ते । अनादृत्य तु तद्वाक्यं रावणः कालचोदितः ॥५१॥
जगाम सहमारीचस्तस्याश्रमपदं तदा । तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ ॥५२॥
जहार भार्यां रामस्य हत्वा गृध्रं जटायुषम् । गृध्रं च निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम् ॥५३॥
राघवः शोकसंतप्तो विललापाकुलेन्द्रियः । ततस्तेनैव शोकेन गृध्रं दग्ध्वा जटायुषम् ॥५४॥
मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं स ददर्श ह । कबन्धं नामरूपेण विकृतं घोरदर्शनम् ॥५५॥
तं निहत्य महाबाहुर्ददाह स्वगतश्च सः । स चास्य कथयामास शबरीं धर्मचारिणीम् ॥५६॥
श्रमणां धर्मनिपुणामभिगच्छेति राघव । सोऽभ्यगच्छन्महातेजाः शबरीं शत्रुसूदनः ॥५७॥
शबर्या पूजितः सम्यग्रामो दशरथात्मजः । पम्पातीरे हनुमता सङ्गतो वानरेण ह ॥५८॥
राम वहाँ नित्य गन्धर्वादिसे पूजित होकर दण्डकारण्यको चल पड़े ॥ ३९ । ४० ॥ कमलोंके सदृश नेत्रवाले रामने उस महा वनमें जाकर विराधको मारा और सुभगको पवित्र किया । ४१ ॥ उस वनमें सुतीक्ष्ण, अगस्त्य तथा अगस्त्यके भाई अगस्तिसे मिले। वहीं इन्द्रके दिये हुए इन्द्रधनुष, तलवार, तरकस तथा बाण ग्रहण किये और वनचरोंके साथ निवास करने लगे ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ एक दिन वहाँके सब ऋषि राक्षसोंके वधका अनुरोध करनेके लिये रामके पास आये। तदनन्तर रामने दण्डकारण्यनिवासी उन अग्निके समान तेजस्वी ऋषियोंके सम्मुख युद्धमें सब राक्षसोंका वध करनेकी प्रतिज्ञा की ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ वहीं ही रामने जनस्थाननिवासिनी तथा कामरूपिणी राक्षसी शूर्पणखाकी नाक-कान काटकर कुरूप किया ॥ ४६ ॥ तदनन्तर रामने शूर्पणखाके दुःखसे आये हुए खर-त्रिशिरा सहित खर, त्रिशिरा तथा दूषणादि राक्षसोंको मारा और जनस्थाननिवासी चौदह हजार राक्षसोंको यमलोक पहुँचा दिया। इस प्रकार अपनी जातिका संहार होना सुनकर रावण क्रोधसे मूर्च्छित हो गया और उसने सहायताके लिए मारीच नामक राक्षसको बुलाया। मारीचने अनेक प्रकारसे समझाते हुए कहा- हे रावण ! बलवान्के साथ विरोध करना ठीक नहीं है, किन्तु कालप्रेरित रावणने उसकी एक भी बात नहीं मानी और उसके साथ रामके आश्रमपर पहुँचा। वहाँ वह मायावी मारीच मृग बनकर राजा दशरथके पुत्र राम और लक्ष्मणको दूर भगा ले गया । ४७-५२। इसी बीचमें रावण जटायु नामके गिद्धको मारकर रामकी भार्याको हर ले गया। गिद्धको मरा हुआ देख एवं सीताका हरण सुनकर राम अत्यन्त संतप्त होकर विलाप करने लगे और उसी शोकावस्था में जटायुको अपने हाथोंसे जलाकर परम पद पहुँचाया ॥ ५३ । ५४ । वनमें सीताकी खोजमें ढूँढ़ते रामने एक महाभयङ्कर तथा विचित्र रूपवाले कबन्ध नामक राक्षसको देखा ॥ ५५ ॥ महाबाहु रामने उस मारकर जला दिया। जब वह स्वर्गको जाने लगा तो उसने धर्मचारिणी शबरीका पता बताया ॥ ५६ ॥ और कहा-हे राघव ! वह धर्मनिपुणा श्रमणा नामकी शबरी है, आप उसके पास जाइये। तदनुसार महातेजस्वी एवं शत्रुविनाशकारी रामचन्द्रजी शबरीके पास गये ॥ ५७ ॥ शबरीने रामका बड़ा आदर किया। वहींसे पम्पासरोवरपर जाकर राम हनुमान्जीसे मिले ॥५८॥
५५८ आनन्दरामायणे [सर्गः १
हनुमद्वचनाच्चैव सुग्रीवेण समागतः। सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबलः ॥५९॥
आदितस्तद्यथावृत्तं सीतायाश्च विशेषतः। सुग्रीवोऽपि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानरः ॥ ६०॥
चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम्। ततो वानरराजेन वैरानुकथनं प्रति ॥६१॥
रामायावेदितं सर्वं प्रणयाद्दुःखितेन च। प्रतिज्ञातं च रामेण तदा वालिवधं प्रति ॥६२॥
वालिनश्च बलं तत्र कथयामास वानरः । सुग्रीवः शक्तिमथापीक्ष्य वीर्येण राघवे ॥६३॥
राघवप्रत्ययार्थं तु दुन्दुभेः कायमुत्तमम्। दर्शयामास सुग्रीवो महापर्वतसन्निभम् ॥६४॥
उत्स्मयित्वा महाबाहुः प्रेक्ष्य चास्थि महाबलः। पादाङ्गुष्ठेन चिक्षेप संपूर्णं दशयोजनम् ॥६५॥
बिभेद च पुनस्तालान्सप्तैकेन महेषुणा। गिरिं रसातलं चैव जनयन्प्रत्ययं तदा ॥६६॥
ततः प्रीतमनास्तेन विश्वस्तः स महाकपिः। किष्किन्धां रामसहितो जगाम च गुहां प्रति ॥६७॥
ततोऽभर्जद्धरिवरः सुग्रीवो हेमपिङ्गलः। तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वरः ॥६८।
अनुमान्य तदा तारां सुग्रीवेण समागतः । निजघान च तत्रैनं शरेणैकेन राघवः ॥६९॥
ततः सुग्रीववचनाद्धत्वा वालिनमाहवे। सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत् ॥७०॥
स च सर्वान्समानीय वानरान्वानरर्षभः । दिशः प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम् ॥७१ ।
ततो गृध्रस्य वचनात्सम्पातेर्हनुमान्बली । शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे लवणार्णवम् ॥७२।
तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम्। ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकां गताम् ॥७३।
निवेदयित्वाऽभिज्ञानं प्रवृत्तिं च निवेद्य च । समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम् ॥७४।
पञ्च सेनाग्रगान्दृष्ट्वा सप्त मन्त्रिसुतानपि। शूरमक्षं विनिष्पिष्य ग्रहणं समुपागमत् ॥७५॥
हनुमान्जीके कहनेपर राम सुग्रीवसे मिले और महाबली रामचन्द्रजीने उसे अपना सारा हाल कह सुनाया ॥ ५९॥ रामने भी शुरूवसे अपना सब वृत्तान्त कहा और सीताहरणका हाल विशेषरूपसे वर्णन किया । सो सुनकर सुग्रीवने प्रसन्नचित्तसे अग्निको साक्षी देकर रामसे मित्रता की और वानरराज सुग्रीवने भी बालिके साथ अपने वैरका हाल बतलाया ॥ ६०। ६१ । दुःखित सुग्रीवने बड़ी नम्रता तथा प्रेमपूर्वक रामसे अपना सब हाल कहा। यह सुनकर रामने बालिका मारनका प्रण किया । ६२। तब सुग्रीवने बालिके बलका वर्णन किया क्या कि उसे सन्देह था कि वे बालिका भार सकेंगे या नहीं ॥ ६३ । तत्पश्चात् सुग्रीवने रामकी परीक्षा लेनेके लिए पर्वतके समान लम्बा चौड़ा दुन्दुभि राक्षसका कङ्काल दिखाया ॥ ६४ ॥ महाबाहु रामने मुस्कराकर उसे देखा और उस राक्षसके ठठंगोका पैरके अँगूठेसे उठाकर दश योजन दूर फेंक दिया ॥ ६५ ॥ फिर सात तालके वृक्षोंको एक ही बाणसे काट तथा पर्वत और रसातलको भेदकर उस वक्त हृदयमें यह दृढ़ विश्वास उत्पन्न कर दिया कि हम वालिको मारनस समर्थ हैं । ६६ । रामके पराक्रमको देखा तो विश्वास करके सुग्रीव बड़ी प्रसन्नतापूर्वक रामके साथ किष्किन्धा नामके पर्वतकी गुफाके द्वारपर पहुंचा ॥ ६७ ॥ वहाँ पहुंचकर सुवर्णके समान पीतवर्ण वानरश्रेष्ठ सुग्रीवने घोर गर्जना की । उस भयङ्कर गर्जनको सुनते ही बन्दरोंका राजा बालि किष्किन्धाके बाहर निकल आया । ६८ ॥ उस समय ताराकी बात न मानते हुए और उसका अनादर करके बालि सुग्रीवके साथ युद्ध करनेके लिए आया और एक ही बाणसे उसे रामने यमपुर पहुंचा दिया । ६९ । सुग्रीवसे की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार वचनबद्ध होनेके कारण रामने बालिकी मृत्युके पश्चात् किष्किन्धाका राज्य सुग्रीवको दे दिया ॥ ७० । इसके अनन्तर कपिराज सुग्रीवने सीताका पता लगानेके लिए दसों दिशाओमें व सम बंदरोंको भेजा ॥ ७१ ॥ सम्पाती गिद्ध द्वारा सीताका पता पाकर महाबली हनुमान्ने सौ योजन विस्तृत क्षारसमुद्रक लांघकर पार किया ॥ ७२ ॥ रावणसे सुरक्षित लङ्कामें जाकर हनुमान्ने अशोक वनमें बैठी तथा रामका ध्यान करती हुई सीताको देखा ॥ ७३ । तब हनुमान्जीने सीतासे रामका सारा समाचार एवं सन्देश कहा । सीताको आश्वासन देकर रणमें पाँच सेनापतियों, सात मन्त्रिपुत्रों और परमवीर अक्षयकुमारको मारकर स्वयं ब्रह्मापाशमें बंध गये