श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ४ ] उत्तरकाण्डम् २०७
सर्गः ४ ] उत्तरकाण्डम् २०७
चतुर्थः सर्गः
( वाल्मीकिके आश्रममें लव-कुशका जन्म )
श्रीरामदास उवाच
अथ गङ्गातटं गत्वा लक्ष्मणोऽचिन्तयद्धृदि । स्वेच्छया कौतुकास्मीनौ मया शुद्धां स त्यक्तवान् ॥ १॥
स्वीयकामप्रशान्त्यर्थं शास्त्राज्ञां प्रतिपालयन् । एवं सति पुनस्तेन किं ममाज्ञापितं रहः ॥ २ ॥
वनात्सीताभुजं छित्त्वा नयस्वेत्यतिदुर्घटम् । मयापि शपथं बन्धा न पृष्टः स विचिन्त्य च ॥ ३ ॥
अधुना किं करोम्यत्र कथं रामं प्रगम्यते । सीताभुजं विना दृष्ट्वा रामो मां किं वदिष्यति ॥ ४ ॥
छेत्तुं सीताभुजं शक्तो भविष्यामि कथं त्वहम् । ययाऽहं पुत्रवन्नित्यं पालितो लालितस्त्वपि ॥ ५ ॥
अधुनाऽग्निं विशाम्यत्र रामापास्यं न दर्शये । एवं निश्चित्य सौमित्रिश्चितां कर्तुं मनो दधे ॥ ६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र विश्वकर्मा विधेर्गिरा । कुठारहस्तो विपिने बभ्राम तक्षकपृथक् ॥ ७ ॥
तं दृष्ट्वा लक्ष्मणः प्राह त्वं मे साहाय्यमाचर । कुठारेण तरूंश्छित्त्वा चितार्थं देहि मां जवात् ॥ ८ ॥
यथेष्टं वस्तु दास्यामि त्वामहं नियमेन हि । सोऽप्याह लक्ष्मण वीर चितार्थं वदस्व माम् ॥ ९ ॥
सौमित्रिः कथयामास पूर्ववृत्तं सविस्तरम् । तच्छ्रुत्वा मद्दल तक्षः सौमित्रिं प्राह सस्मितः ॥ १० ॥
अल्पार्थे स्वोपकुरुष मा मुञ्चस्व स्वमायुज । अहं सीताभुजं कृत्वाऽधुना दास्यामि ते क्षणात् ॥ ११ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं कृत्वा जानकीभुजमुत्तमम् । सद्रुर्मामास्थिनायुक्तपूरितं कञ्चुकोयुतम् ॥ १२ ॥
सीतालङ्कारसहितं सद्यश्चाविर्विवाहिनम् । ददौ लक्ष्मणहस्ते तं स्वयमन्तर्दधे क्षणात् ॥ १३ ॥
सीताभुजं समादाय लक्ष्मणोऽपि पुरीं ययौ । गतश्रियं निरुत्साहां वात्यातितृणितुशराम् ॥ १४॥
ददर्श नगरीं स्वीयां नारीहीनगृहोपमाम् । विवेशाथोसृजः सूर्य नत्वा महसि राघवम् ॥ १५॥
श्रीरामदास बोले उत्तर गङ्गातट के समीप पहुंचकर लक्ष्मण अपने मनमें सोचा कि यद्यपि लङ्कासे लौटनेपर मैंने ही अग्निमें डालकर सीताको पवित्र किया था। फिर भी रामचन्द्रजीने सीता माताका परित्याग कर दिया है ॥ १ ॥ इसका दो कारण है। एक तो रामचन्द्रजीको अपनी कामवासना कम करनी है, दूसरे शास्त्रकी आज्ञाका पालन करना है। परन्तु, रामके आज्ञानुसार मैने सीताका परित्याग तो कर दिया, किंतु एक और आज्ञा थी कि 'लौटते समय सीताकी एक भुजा भी काटकर लेते आना'। यह बहुत ही कठिन काम है। उस समय रामजीने कसम रचा दिया था, इसलिए विशेष बातचीत भी नहीं कर सका ॥ २ ॥ ३ ॥ अब मैं क्या करूँ ? कैसे प्रभुक पास लौटकर जाऊँ ? सीताके बिना हाथ लिये मुझे लौटते देखेंगे तो क्या कहेंगे और फिर यदि हाथ काटना चाहूँ तो कैसे काटूँ । जिन्होंने अपने बच्चेके समान मेरा दुलार किया, उन सीताके साथ यह कस ईका काम करनेके लिये मैं क्योंकर आगे बढ़ सकूँगा ॥ ४ ॥ ५ ॥ इसलिए सबसे अच्छा उपाय यह है कि यहीं आगमे जलकर मर जाऊँ। रामको मुंह ही न दिखाऊँ तो अच्छा हो । इस प्रकार विचार करके लक्ष्मणने चिता बनानेका निश्चय किया ॥ ६ ॥ इसी बीचमें ब्रह्माके आज्ञानुसार विश्वकर्मा एक बढ़ईका रूप धारण करके हाथमें कुल्हाड़ी लिये वनमें घूमते फिरते वहाँ आ पहुंचे । ७ । तब लक्ष्मणने उससे कहा—कृपया आप अपनी कुल्हाड़ासे थोड़ीसी लकड़ी काटकर मुझे चिता बनानेको दे दीजिये ॥ ८ । आप जितना धन माँगेंगे, दूँगा। बढ़ईने कहा—हे वीर आप अपने लिये चिता बनानेका कारण तो हमें बताइये ॥ ९ । लक्ष्मणने आद्यन्त अन्ततक सारा वृतान्त बता दिया। उसे सुनकर मुसकराते हुए विश्वकर्माने कहा ॥ १० ॥ इतनी सी बातके लिये आप अपने इस बहुमूल्य शरीरको आगमें मत जलाइये। मैं अभी क्षणभरमें सीताका हाथ बनाकर आपको देता हूँ ॥ ११ ॥ तदनुसार तनिक ही देरमें विश्वकर्माने सीताका ऐसा हाथ बना दिया, जिसपर रुधिर बह रहा था, मांसके लोथड़े झूल रहे थे और कञ्चुकी चढ़ी हुई थी ॥ १२ ॥ सीताके उस हाथमें सब चिह्न विद्यमान थे और अलङ्कार पड़े थे। उस हाथको लक्ष्मणके हाथमें देकर विश्वकर्मा अन्तर्धान हो गये ॥ १३ ॥ तब लक्ष्मण वह भुजा लेकर अयोध्यापुरीकी
३०८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
दर्शयामास सीताया भुजं कङ्कणमण्डितम् । तं निरीक्ष्य भृतं रामोऽधोमुखः प्राह लक्ष्मणम् ॥ १६॥
कैकेयीं सुहृदः पौरान्त् सर्वान् जानपदान् बहून् । सीताभुजां दर्शनीयस्त्वयाऽद्य मम शासनात् ॥ १७॥
तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपेमं चकार यथोदितः । भुजं संस्थापयामास पेटिकायां निधाय सः ॥
कैकेयी तं भुजं दृष्ट्वा तुतोष नितरां हृदि । १८॥
रामोऽपि सीतारहितः परात्मा विज्ञानहस्तस्त्वथ चादिदेवः ।
मत्स्येव भोगानखिलान्विरक्तो मुनिव्रतोऽभून्मुनिसेवितांघ्रिः ॥ १९॥
अथ सीताऽपि वाल्मीकेर्मुनिपत्नीभिगाश्रमे । प्रत्यहं पूजिता वन्यैः सुखं तस्यौ मुदान्विता ॥ २० ॥
एवं मासद्वयं तत्र नीत्वा सीताऽऽश्रमे मुनेः । सुदिने सुषुवे रात्रौ पुत्ररत्नं रविप्रभम् । २१॥
एतस्मिन्नन्तरे रात्रौ ज्ञात्वा तं ससखं प्रभुः । राघवः किङ्किणीमालाघटां शुश्रावऽथ वपुना ॥ २२॥
पुष्पकस्य ततस्तस्मिन् स्थित्वाऽकाशपथा ययौ । वाल्मीकेराश्रमे वेगाल्लक्ष्मणञ्चानं ननाम सः । २३॥
ततो वाल्मीकिना विप्रैर्गर्भनेरेव रघूत्तमः । जातकमादिसंस्कारांश्चकार विधिपूर्वकम् ॥ २४॥
मातायाः पुरतः पुत्राननमलोकयन्मुदा । ददौ दानान्यनेकानि वस्त्रस्वाभरणान्यपि । २५॥
चकार विविधन्नाडं पुत्रजन्महडोत्सवे । देवदुन्दुभयो नेदुर्देवर्षूः पुष्पवृष्टिभिः । २६॥
सुराः सीतां शिशुं रामं ननृतु खे सुरस्त्रियः नेदुर्जनकवायानि ननृतुर्वारयोषितः ॥ २७॥
तुष्टुवुमागधाद्याश्च सीतां रामं शिशुं मुहुः । ऋषिपत्न्यः शिशुं सीतां रामं दीपः प्रपूषितः । २८॥
प्रथैर्नीराजनं कृत्वा जगुर्गीतं हि सुस्वरम् । वस्त्राद्यैः पूजयामास ताः प्रत्रा रघुनन्दनः ॥ २९॥
सीतारामौ विदेहोऽपि पूजयामास विस्तरान् । वाल्मीकिस्तु कुतं. शांतिं चकार विधिना शिशोः ३०॥
कर चल पड़े। अयोध्यामें घुसते ही लक्ष्मणने देखा कि, 'एव ही दिनमें अयोध्यापुरी सर्वथा श्रीहीन हो गयी है। उनिहूँ ... उठ रहा है और चारों ओर उदासी दीखती है। यह सब देखकर उस दिन अयोध्यापुरी ऐसी लग रही थी, जैसे बिना स्वाका दिना घर । लक्ष्मण जान जाते महलोंमें पहुंचे और २ मचन्द्रज को सोताका हाथ दिखलाया। उस कङ्कण विभूषित सीताके भुजाको देखकर रामने अपना मुस नीचा किया और- १४-१६। इस न जाकर माता कैकेयी, मेरे मित्रो, राजाओं एवं पुरवासियो- को दिखला दो, यह मेरी आज्ञा है॥ १७ । 'तथास्तु' कहकर लक्ष्मणने भी आज्ञाका पालन किया और एक पेटामे सम्हालकर सीताकी भुजा रख ली। १८॥ कंकणन माताका भुजा देखा तो बहुत प्रसन्न हुई। इधर र मचंद्रजीने सासस वियुक्त होकर सब सांसारिक भोगाक त्याग दिया और तपस्वियोके समान अपना जीवन विताने लगे, १९॥ उधर मलाजी भी वल्मीकिके आश्रमपर वहाँकी मुनिपत्नियोंस पूजित होती हुई सानन्द जीवन विताने लगीं ॥ २०॥ इस तरह दो महीना बीतनेपर साताने शुभ दिन और शुभ घड़ीमें एक पुत्ररत्नका जन्म दया ॥ २१॥ उसी समय गभनन्दका था यह समाचार मिल गया और रात्रिको अपन पुष्पक विमानपर चढ़कर लक्ष्मणजीक साथ आकाशमार्गस श्रीवाल्मीकिजीके आश्रमपर जा पहुंचे और लक्ष्मण तथा रामने मुनिका प्रणाम किया। २२। २३॥ इसके अनन्तर वाल्मीकिने आश्रममें उपस्थित बड़े२ ब्राह्मणोंक साथ बन्लक विधिवत् जातकर्मादि संस्कार किया ॥ २४ ॥ सीताक समझ राम- चन्द्रने हर्षपूर्वक बेटेका मुख देखा और अनेक प्रकारक वस्त्र-आभरण आदि दान करके ब्राह्मणोंको दिये ॥ २५ ॥ उस पुत्र-जन्मके प्रसन्नताम रामने नान्दीमुख-श्राद्धादि किया। देवताआन प्रसन्न होकर दुन्दुभी बजायो और उनपर फूल बरसाये । २६॥ सीता और साताके पुत्रका मुख देखकर देवांगनाय नाचने लगीं । उधर जनकजाक द्वारा नियुक्त बजाये बाजा बजाने लगे और वेश्याएं नाचन लगीं । २७॥ वन्दीजन सीता और रामका स्तुति करन लगे । ऋषिपत्नियोंने सुन्दर थालमें दीपक टपक जलाकर राम, सीता तथा नवजात शिशुक आरती उतारी और विविध प्रकारके मङ्गलगान गाये । रामन अनेक तरहके वस्त्र, भूषणोंसे उनका सत्कार किया ॥ २८ ॥ २९ ॥ महाराज जनकने भी राम और सीताका विधिवत् पूजन किया और वाल्मीकिने
सर्गः ४ ] जन्मकाण्डम् ३०९
शान्त्यर्थं प्रोक्षितो दम्भाङ्कुरुतैर्ब्राह्मणैस्ततः । सर्वार्थिनां शमार्थाय निर्मितो बालकृन्त्य हि ।३१।
एवं नानाममुन्नीय नीत्वा तत्र निशां सुखम् । प्रत्युषस्य मुदानाह समत्रागमनस्य हि ।३२।
दस्माद्वार्ता बहिर्गच्छेद्धाभपादस्य वै मुनेः । स यं दण्ड्यो भवेदेव शङ्कारूपा न संशयः । ३३।
इत्युक्त्वा सकलांस्तृष्टा मुनीन्नत्वा पुनः पुनः । सीतामादाय श्रीरामो यान भ्रात्राऽऽरुरोह सः ॥३४॥
विहायसा क्षणात्प्राप साकेतं रघुनन्दनः । प्रवरेश विपानास्य पुरप्रविद्रिता गृहे ॥३५॥
अथ रामो वाजिमेधशतं कर्तुं मनो दधे । कृत्वा सौवर्णमयीं सीतां नानालङ्कारभूषिताम् ॥३६॥
पापिनीं मलिनां दुष्टां भर्तृनिन्दापरायणाम् । भर्तुर्विद्वेषिणीं शूरां चांशुकमातृ तन्मनाम् ॥३७॥
भर्तारं घातुमिच्छन्तीं सदा कलहकारिणीम् । बन्धुक्तां दारुणां भर्तुर्विपरीतार्थगामिनीम् ॥३८॥
स्वीयेच्छानुवर्तिनीं नष्टां मृतां नांतो गतां श्रियम् । त्यक्त्वा कुशमयीं विप्रैः कार्या पत्नी स्वकर्मसु ॥३९॥
हैमी कार्या क्षात्रैश्च वैश्यैः कार्या तु राजती । शूद्रैः कार्या ताम्रमयी स्वस्वकर्मप्रसिद्धये । ४०॥
अथवा सर्ववर्णैश्च कार्या पत्नी तु कांचनी । रामोऽपि कृत्वा सौवर्णीमग्निहोत्रं चकार सः । ४१।
रावणेन यदा नीता सीता सा दण्डके तदा । हेम्नोऽभावात्कुशमयी कृता रामेण जानकी ॥४२॥
अन्ये कुशमयीं पत्नीं विधाय गृहमेधिनः । अग्निहोत्रमुपासन्ते विरहस्यानलोग्नर्हितः ॥४३।
व्यभिचारवती पाषा भर्तुर्विद्वेषिणी तथा । अभाने वा परित्याज्यान वान्येऽप्या सर्वतोऽश्राद् । ४४॥
पक्षे पक्षे नवम्यां हि एकनं शरभृथाविधम् । कर्तुं निश्चितवान् रामस्तदा विप्रैः पुरोधसा ॥४५॥
भागीरथ्युत्तरे तीरे यज्ञभूमिं चकार सः । श्रयथाच्छाम्मुद्गलस्याश्रामो यावदुद्द दक्षिणे ॥४६॥
विधिपूर्वक कुशासे अभिषेक करते हुए शार्डित-बाट किया ॥ ३० ॥ बालिकाके निमित्त दाहिनाकिन कुशासे शान्ति की थी। इसीलिये उन्होंने रामक सामच ही उस बच्चाका नाम कुश रक्खा ॥ ३१ ॥ इस तरह नाना प्रकारके उत्सवमें वह रात वहीं बितायी और पिछली रातको रामने आश्रमके लोगोंसे कहा कि जो कोई मनुष्य मेरे यहाँ आनेका समाचार किसोसे कहेगा, वह मेरा शत्रु होगा और मैं उसको दंड दिये बिना न रहूँगा ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ऐसा कहकर सबने सबाथका याराम आनन्द लिए लोटने लगे। सीता और मुनियोंको प्रणाम किया। फिर सीताम एटककर रामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ विमानपर आरूढ़ हुए और थोड़ा देरम अयोध्या जाकर नियतका दृष्टि अपना अरण्यपर सा गया ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ कुछ दिन बीतनेके बाद रामने ही अश्वमेध यश करनेका विचार किया । उस समय सीता तो था नहीं । इसलिए रामने सुवर्णकी सीता बनाकर यज्ञ करना निश्चित किया । क्योंकि शास्त्रमें लिखा है कि पापिन मैली कुचैली, दुष्ट स्वभावकी, निन्दा करनेवाली, पतिसे लडाई करनेवाली, क्रूर प्रकृतिक्री, चोट्टिन, स्वामीको मारनेकी इच्छा रखनेवाली, सदा लडाई करनेवाली, कुलटा, स्वामीके बताये प्रतिकूल चलनेवाली और स्वच्छन्दाचारिणी स्त्री यदि खो जाय, मर जाय या किसीके द्वारा भगा ली जाय अथवा स्वर्ग प्राप्त जाय तो उसको त्यागकर ब्राह्मण कुशकी क्षत्रिय सुवर्णकी, वैश्य चाँदीका और शूद्र ताम्बेकी स्त्री बनाकर यज्ञ द्वि कर्म करे ॥ ३६-४० ॥ अथवा सामर्थ्य अनुसार सब जातिके लोग सुवर्णकी नारी बनाकर अपना काम चलायें । इन्हीं शास्त्रीय आज्ञाओंस रामने सुवर्णकी सीता बनाकर अपना यज्ञ प्रारम्भ किया ०४१ ॥ पहले जब दण्डक वनमें सीता हर ली गयी थी और रातको रामेश्वर स्थापनके समय साताकी आवश्यकता पडी थी, तब उन्होंने सुवर्णके अभावसे कुशकी ही सीता बनाकर रामेश्वरका स्थापन का थी ॥ ४२ ॥ कुछ गृहस्थ नारीके अभावमें कुशकी स्त्री बनाकर अग्निहोत्र करते हैं, वह भी ठीक है। कहनेका मतलब यह कि स्त्रीके अभावमें किसी प्रकारकी स्त्री अवश्य बना लेनी चाहिए। क्योंकि स्त्रीके बिना कोई भी याज्ञिक कार्य सम्पन्न नहीं होता । कुछ आचार्योका मत है कि - "व्यभिचारिणी, पापिनी तथा स्वामीसे द्रोह करनेवाली स्त्रीका सदाके लिए परित्याग कर देना चाहिए' कुछका यह मत है कि "परित्याग न भी करे तो कोई हानि नहीं" ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ रामने प्रत्येक नवमीको एक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करनेका निश्चय किया और भागीरथीके उत्तरी तटपर यज्ञशाला बनानेकी बात
२१० आनन्दरामायणे [सर्ग ४
अकृष्टपक्तताञ्चकार स्वर्णलाङ्गलैः। यस्याश्रमस्य सान्निध्ये भागीरथ्यप्युदङ्मुखा ॥४७॥
रुक्ममय्याऽथ जानक्या यज्ञारम्भं चकार सः। अज्ञातसंख्यां द्रष्टुं वै चकार स्वर्णनिर्मिताम् ॥४८॥
वामांगस्थां शुभरूपां शान्तहृद्यञ्च सात्त्विकीम्। विभ्रन्देवैः श्रीरामो जानकीं लोकमातरम् ॥४९॥
यज्ञान्ते स्वर्णजां सीतां ददौ स्वगुरवे प्रभुः। एवं यज्ञशतैश्चत्र गुरवे शतमूर्तयः ॥५०॥
याः समर्पिता रामेण तासां दानफलेन हि षोडशस्त्रीसहस्रेभ्योऽप्यूर्ध्वं स्त्रीणां शत पुनः ॥५१॥
द्वारकायां कृष्णरूपो विग्रहेनोद्वहिष्यति । प्रतियज्ञं श्यामकर्णमश्वं रामो मुमोच ह ॥५२॥
चतुर्दिनाच्चतुर्दिक्षु परिक्रम्य ययौ हयः। एवं सर्वेषु यज्ञेषु वयौ वाजी पृथग्जवात् ॥५३॥
पुष्पकस्थः स शत्रुघ्नो हयरक्षां चकार वै। एवं सदा यजराजे विरेजे दीक्षया विभुः ॥५४॥
एवं च नवतिसंख्या रामेण नर वै कृताः। सप्तमस्यापि प्रारभ्य रामो यज्ञस्य सोऽकरोत् ॥५५॥
गंगाया दक्षिणे तीरे मुद्गलस्याश्रमोऽस्ति हि तत्र नद्यान्तिके गंगोदक्तीरे च तद्गृह् ॥५६॥
दिनानि दश वाल्मीकिर्निशायां सन्ध्ययोरपि । भोगमङ्गल्या चक्रे बालकस्र्याभिमंत्रणम् ॥५७॥
कुशं नाम तदा चक्रे मुनिरेकादशे दिने चकार सर्वसंस्कारान् मुनिः श्रीराघवाज्ञया ॥५८॥
एवं स बालकस्तत्र ववृधे मातृलालितः जनकश्च सुमेधा च नानावस्त्रैः सुभोजनैः ॥५९॥
तोषयामास दौहित्रं नानाश्चाश्चन्नखादिभिः । बालोऽपि रंजयामास स्वक्रीडा भर्विदेहजाम् ॥६०॥
एकदा निद्रितं प्रेखे दृष्ट्वा बालं मुनेः पुरः अन्यकर्मणि व्यग्रा साऽथ सीताऽस्मातम् ॥६१॥
जनक वापि सा सीता दृष्ट्वा मत्रीं बहिर्गतान्। आश्विने रविवारे च नदीं स्नातुं समुद्यता ॥६२॥
मुनिं तं बालरक्षार्थं कृत्वाऽथ तमसां ययौ । दृष्ट्वा मार्गेण गच्छन्ती ददर्श पथि वानरीम् ॥६३॥
कटिसंस्थमथस्कंधेषु बिभ्रतीं पञ्च बालकान् तां दृष्ट्वा स्वशिगुं स्मृत्वाऽचितयज्जानकी हृदि ॥६४॥
ठहराया गया। प्रयागस लेकर मुद्गल मुनिके आश्रमपर्यन्त जितना स्थान था, वह सुवर्णके हलसे जोता गया। जानकी उस यज्ञशालाके पास न गई थीं। उक्त उनका और बढ़ रहा था । ॥४१-४७॥ इसके अनन्तर अपने सुवर्णमयी सीताके साथ यज्ञकार्य प्रारम्भ किया वह सुवर्णकी सीता अज्ञानी लोगोंको देखनेके लिए रखी गयी थी, किन्तु अज्ञानियोंका दृष्टिम तासीवको जानकी सदा रामके वामभागम निवास करती थी ॥४८-४९॥ प्रत्येक यज्ञके समाप्त हो जानेपर राम वह स्वणमयी सीता अपने गुरु वसिष्ठको दान दे दिया करते थे। इस प्रकार प्रत्येक यज्ञकी पूर्णतापर स्वर्णमयी सीता दानकरके मत सीताओका दान किया। उस दानके फलस्वरूप आगे कृष्णावतारम उनका मान्दुह हजार एक सो नियटी मिली। प्रत्येक यज्ञम राम अपना श्यामकर्ण घोड़ा दिग्विजयके लिए छोड़त थ। वह चार दिनों में चारों ओर घूमकर लौट आया करता था। साथमे शत्रुघ्न पुष्पक विमानपर बैठकर घाड़की रक्षाके लिए जाया करते थे और रामचन्द्रजी दीक्षा लेकर यज्ञशालामें बैठे रहते थे ॥ ५०-५४ । इस प्रकार रामचन्द्रजीने निन्यानवे यज्ञ पूर्ण किया और अन्तिम सोवां यज्ञ का प्रारम्भ कर दिया । ५५ ॥ गंगाक दक्षिण तटपर मुद्गल नामक एक ऋषिका आश्रम था और उत्तरवाहिनी गंगाके तटपर ही बाल्मीकि सन्ध्या के समय रामके पुत्र कुशका रामरक्षामन्त्रस अभिषेक कर रहे थे ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ ग्यारहवें दिन वाल्मीकिन बालकका नामकरण करके रामके आज्ञानुसार सब सस्कार किया ॥ ५८ ॥ बच्चा भी बड़े लाड़-प्यारक साथ समय बिताता हुआ बढ़ने लगा । जनक और सुमेधा अनेक प्रकारके सुन्दर वस्त्रों और स्वादुअन्न आदि तरह तरहके बहुमूल्यवान् आहुत करत रहत थे । बच्चा अपन कौतुक से जानकीजीको प्रसन्न किया करता था । एक दिन कुश वाल्मीकिक पास पालनेपर सो गया । सखियां अन्य कामम व्यस्त थीं । सीताके माता-पिता कहीं घूमन चल गये थ । उस रोज आश्विन मासके रविवारका दिन था। इसलिए सीताने नदाम स्नान करनकी इच्छा की । सीताने वाल्मीकिजीसे बच्चेको दखने रहनेके लिए कह दिया और स्वयं एक दासीको साथ लेकर तमसाकी ओर चल पड़ी । रास्ते में सीतान देखी कि एक वानरी अपने पाच बच्चोंको कमर-कन्धे और मस्तकपर बैठाये चली जा रही है। उसे