श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ९ ]
सर्गः ९ ]
मनोहरकाण्डम्
६७१
वसुकामो वसून् रुद्रान्वीर्यकामोऽथ वीर्यवान् । अन्नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्गकामोऽदितेः सुतान् ॥१६२॥
विद्वान् वेदान् राज्यकामः साध्यान्मंत्रांश्च विश्रुतम् ।
आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टिकाम इलां यजेत् ॥१६३॥
प्रतिष्ठाकामः पुरुषो रोदसी लोकमातरौ । रूपाभिकामो गंधर्वांस्त्रीं कामोऽप्सर उद्भिताम् ॥१६४॥
आधिपत्यकामः सर्वेषां यजेत परमेष्ठिनम् । यज्ञं यजेद्यशस्कामः कोशकामः प्रचेतसम् ॥१६५॥
विद्याकामस्तु गिरिशं दांपत्यार्थमुमां सतीम् । धर्मार्थं उत्तमश्लोकं तंतुं तन्वन पितॄन् यजेत् ॥१६६॥
रक्षार्थामः पुण्यजनांस्तेजस्कामो मरुद्गणान् राज्यकामो मनून्देवान् निर्ऋतिं त्वभिचर्यजेत् ॥१६७॥
कामकामो यजेत्सोममकामः पुरुषं परम् । अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ॥१६८॥
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत रघुनन्दनम् । रामेण सदृशो देवो न भूतो न भविष्यति ॥१६९॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रामचन्द्रं प्रपूजयेत् । तस्याद्यवर्णसामर्थ्याद्यद्वस्तुचव रादिकम् ॥१७०॥
परं श्रेष्ठतमञ्चात्र विस्तारेण वदाम्यहम् । रुक्मं रत्नं रथो रामा रक्षसो रजतं रजः ॥१७१॥
रक्षा रणो रमा रक्तं रजको रागरामठौ, राजं रोगो रवि रात्री राज्यं रजस्वला तथा । १७२।
एवमादीन्यनेकानि श्रेष्ठान्येवात्र भो द्विज । रुक्मं पीतं महार्हं च रत्नं रम्यं सुदुर्लभम् ॥१७३॥
रथो यानं श्रेष्ठेषु च रामा यस्या इदं जगत् । राक्षसो देवत्रस्तो रजतं तन्मुदुर्लभम् ॥१७४॥
रजः साक्षात्परमाणुर्नित्यः सोऽत्र प्रकीर्त्यते । रक्षा रक्षाकरी ज्ञेया रणो जयकरः स्मृतः ॥१७५॥
कामना पूर्ण करनेकी अभिलाषा हो तो इन्द्रकी, सन्तानकी इच्छा हो तो प्रजापतिकी, श्रीवृद्धिकी इच्छा हो तो मायादेवीकी तेजवृद्धिकी अभिलाषा हो तो सूर्याभगवतीकी, धनवृद्धिकी इच्छा हो तो आठो वसुओकी, पराक्रमकी अभिलाषा हो तो रुद्रभगवान्की, अन्न आदिकी इच्छा हो तो अदितिकी, स्वर्गकी इच्छा हो तो अदितिके पुत्रों अर्थात् देवताओंका ॥ १६१ । १६२ ॥ राज्यकी इच्छा हो तो इलाको, प्रतिष्ठा चाहनेवालेको लोकमताओको, सौन्दर्यकी अभिलाषा हो तो गन्धर्वोको, स्त्रीकी कामना हा तो उर्वशी आदि अप्सराओंकी और आधिपत्यकी इच्छा हो तो सब देवताओंका पूजा करे । जिसे यश पानेकी इच्छा हो उसे यज्ञ करना चाहिये । कोषकी इच्छा हो तो वरुणकी, विद्याकी इच्छा हो तो शिवका दम्पत्यसुखकी इच्छा हो तो पार्वती जीकी, धर्मकी अभिलाषा हो तो उत्तमश्लोक (विष्णु भगवान्) की और वंशविस्तारकी इच्छा हो तो पितरोंकी पूजा करनी चाहिए १६३-१६६। आत्मरक्षाकी इच्छा हो तो पुण्यजनोंकी तेजोट्रद्धिकी अभिलाषा हो तो मरुद्गणोंकी राज्यकी इच्छा हो तो चौदह मनुओका आभिचारिककी दिश करनी हा तो राक्षसों-की, अभीष्टविषयिउ काम पूर्तिरी इच्छा हो तो चन्द्रमाका, निष्काम होनेकी अभिलाषा हो तो परम पुरुष परमेश्वरकी, अकाम या सकामभावसे मोक्षकी कामना रखता हो तो उसे चाहिए कि तीव्र भक्तियोगसे रघुनन्दन रामचन्द्रकी पूजा करे । रामचन्द्रजीके समान न कोई देवता हुआ है और न होना ॥ १६७-१६९ ॥ अतएव हर तरह प्रयत्न करके रामचन्द्रर्ज पूजा करे । उनके नामके आदिम वर्ण 'र' की सामर्थ्यसे संसारमें जितनी वस्तुएं रकारादि हैं, वे सब अतिशय श्रेष्ठ मानी गया हैं। उन वस्तुओंको अब मै विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ। जैसे-रुक्म (सुवर्ण), रत्न, रथ, रामा (स्त्री), राक्षस (विद्याधर आदि), रजत (चाँदी), रज (धूलि), रक्षा, रण, रमा (लक्ष्मी), रक्त, रजक (धोबी), राग, रामठ (हींग), राजा, रोग, रवि (सूर्य), रात्रि, राज्य, रजस्वला आदि अनेक नाम श्रेष्ठ मान गये हैं। ऊपर बताया हुआ रुक्म (सुवर्ण) पीतवर्णको बहुमूल्य धातु है। रत्न देखनेमें सुन्दर लगता है और कठिनाईसे प्राप्त होता है। रथ एक श्रेष्ठ सवारी है! रामा (स्त्री) वह वस्तु है, जिससे जगत् उत्पन्न हुआ है। राक्षस ऐसे भयानक होते हैं, जिनसे देवता भी भयभीत रहा करते हैं। रजत (चाँदी) भी एक दुर्लभ वस्तु है। रज (धूलि) साक्षात् परमाणु और नित्य है, रक्षा रक्षाकारी है। रण (संग्राम) विजयदायक होता है ॥ १७०-१७५ ॥
६७२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
रमा सा दुर्लभा मत्र्ये रन्तेऽस्मिन् रक्तता परा । रजको निर्मलकरो रागः प्रीतिः सुखप्रदा ॥१७६॥
रामठः शुद्धिदोऽन्नस्य रुचिश्च प्रकीर्तितः । राज्यं सौख्यकरं श्रेष्ठं पुत्रदा सा रजस्वला ॥१७७॥
एवं यद्यद्रराद्यं तत्तच्छ्रेष्ठं भुवि स्मृतम् । रामाद्यवर्णसाम्यैर्वा द्विजपुत्राय मयेरितम् ॥१७८॥
अन्यच्चाथ शृणुष्व त्वं यन्मया कथ्यते तव । यथा प्रेम्णाऽमनाममुद्रा तव मया शुभा ॥१७९॥
वैशी नान्यस्य देवस्य नाममुद्रा प्रजायते । रामनाम विना नाममुद्रिकातो स्फुटाक्षरम् ॥१८०॥
न रुटा रुटाने स्पष्टमेतच्च महदद्भुतम् । अत्र प्रभावो रामस्य न्व सिद्धि द्विजपुत्रत्र ॥१८१॥
अतएव रामनाम काश्यां विश्वेश्वरः सदा । स्वयं जन्तोपदिशति जन्तूनां मुक्तिहेतवे ॥१८२॥
म अर्णवममग्नं नरं यस्तारयेन्मनुः । स एव तारकस्तत्र राममन्त्रः प्रकथ्यते ॥१८३॥
तारकाख्यस्त्वयं रामनाममन्त्रो न चेतरः । अत एवान्तकालेऽपि मनुकामानरम्य च ॥१८४॥
कर्णे सर्वत्र देवेशरामनामोपदिश्यते । अन्तकाले नृणां रामस्मरणं च मुहुर्मुहुः ॥१८५॥
इति कुर्वन्त्युपदेश मानवा मुक्तिहेतवं । अन्येष्वपि शववाहैं सदा लोकैर्मुहुर्मुहुः ॥१८६॥
रामनामेव मुख्यस्थं शवस्य पथि कीर्त्यते । रामनाम्नः परो मंत्रो न भूतो न भविष्यति ॥१८७॥
रामनाम्ना जपो नित्यं क्रियते शंभुनापि च । पार्वत्या नारदेनापि वायुपुत्रादिभिः सदा ॥१८८॥
रमयदि जनान् रामो रमते न मदात्मनि । राक्षसानां मारणाद्वा रामनाम महन्महत् ॥१८९॥
रमाल्हादकारो हि त्वकारोऽवनि संभवः । मर्हलोकान्मकारश्च त्रिवर्णात्मकमुच्यते ॥१९०।
रकारेण निजं भक्तं भवाब्धेः परिरक्षति । अकारेणानिमाँख्यं हि स्वस्वरूपं करोतियत् ॥१९१॥
मनोरथान्मकारेण ददाति भ्वजनस्य यत् अथवा निजभक्तस्य मरणादि मुहुर्मुहुः ॥१९२॥
रमा (लक्ष्मी) इस संसारमें दुर्लभ है । रक्तमें एक असाधारण लालिमा विद्यमान रहा करती है । रजक (धोबी) मलोंको धोकर साफ करता है । राग प्रीतिका नाम है जिसने सारे संसारको अपनी मुट्ठीम कर रक्खा है ॥१७६॥ रामठ (हींग) अन्नकी पवित्र करनेवाली और एक रुचिकर वस्तु है । राज्य सुखकारी होता है। रजस्वला स्त्री पुत्रदायिनी होती है इस तरह जितने भी रकारादि वर्णन नाम हैं, वे सब श्रेष्ठ माने गये हैं। हे द्विजपुत्र ! जैसा मैंने तुम्ह बताया है, इन सबोंके श्रेष्ठ होनेका कारण वही रामके आदिम वर्णकी समानता है । १७७ । १७८ । हे शिष्य, अब दूसरी बात तुमसे कहता हूं, उसे सुनो । जिस तरह पढ़ने में तुम्हें रामनामकी मुद्रा वतन्वा आता है वैसी नाममुद्रा और किस' देवताकी नहीं है । रामनामके बिना किसी नाममुद्राम इस प्रकार र ज(राम) जैसा स्फुट अक्षर नहीं बनता । यह एक अद्भुत बात है । हे द्विजपुत्रत्र ! इसमें तुम रामका ही प्रभाव जानो । १७९-१८१ । इसीलिए काश म विश्वनाथजी राम-नामका जप करक प्राणियोका मुक्त होनेका उपदश म्वय दिया करते हैं ॥ १८२ ॥ जा मन्त्र संसाररूपी समुद्रमें डूबे हुए मनुष्य को तार सके उसी राममन्त्रको तारक सज्ञा है । १८३॥ एकमात्र यह रामका नाम ही तारक है इसीलिए सर्वत्र किसीके मरत समय उसके कानम रामनामका ही उपदेश दिया जाता है । मुमुर्खु प्राणीकी मुक्तिके लिए उससे बार-बार यही कहा जात है कि 'राम' का स्मरण करो । मत्रकों से जानेवाल लोग राम नामका ही कीर्तन करते हैं । रामनामसे श्रेष्ठ कोई मन्त्र न आज तक हुआ है और न होगा ॥ १८४-१८७ । स्वयं शिवजी भी नित्य रामनामका ही जप किया करते हैं। उसी तरह हनुमान्जी, नारद तथा पार्वतीजी भी सदा रामनामका जप करतो हैं ॥ १८८ ॥ भक्तोंके हृदयमे विहार करने या नित्य रमण करन अथवा राक्षसोंका संहार करनेके कारण ही रामनाम सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ॥ १८९ ॥ 'राम' इस शब्दमें रकार स्मादक लादसे, मकार भूमण्डळसे एवं मकार महर्लोकस आया है। इसी कारण यह त्रिवर्णात्मक रामनाम है । १९० ॥ वे श्रीरामचन्द्रजी रक रके द्वारा भवसिधुस अपने भक्तकी रक्षा करत हैं। अकारसे निज भक्तोको अतिशय सौख्य प्रदान करत है। मकारस अपने भक्तोंकी कामना पूर्ण करत है अथवा मकारसे बार-बार अपने भक्तोंकी मरण आदि बाधाएँ दूर करते रहते हैं ।
सर्गः १० ] | मनोहरकाण्डम् | ६७१
निवारयति तत् शीघ्रं रामनाम वरं ततः अयमेव सदा जप्यो रामेति द्वयक्षरो मनुः ॥१९३॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे
उत्तरार्द्धे विशेषकालपरत्वेन पूजाविस्तारो नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
दशमः सर्गः
( अयोध्यामें चैत्रमासकी महिमाका वर्णन )
श्रीरामदास उवाच
एवं शिष्य त्वया पूर्वं ये ये प्रश्नाः कृताः शुभाः । श्रीरामविषये ते ते मयोक्ताः परसादरात् ॥ १ ॥
इदानीं ते पुनः श्रोतुमिच्छाऽस्ति तां वदस्व माम् । यद्यम्पृच्छसि भो वत्स तत्सर्वं ते वदाम्यहम् ॥२॥
श्रीमहादेव उवाच
एवं गुरोर्वचः श्रुत्वा विष्णुदासोऽब्रवीन्पुनः ।
विष्णुदास उवाच
गुरो त्वयाऽयोध्यायां चैत्रमासफलं महत् ॥३॥
प्रोक्तं तद्विस्तरेणाथ कथयस्व ममांतिकम् । किं दानं किं फलं तत्र कमुद्दिश्य चरेद्व्रतम् ॥४॥
को विधिश्च कदारंभः सर्वं विस्तरतो वद । यत्सरय्वां रामतीर्थे स्नातव्यं चेति कीर्तितम् ॥५॥
श्रीरामदास उवाच
साधु साधु महाप्राज्ञ शुभः प्रश्नः कृतस्त्वया । अधुना चैत्रमासस्य महिमा प्रोच्यते मया ॥६॥
मासानां प्रथमो मासश्चैत्रमासः प्रकीर्त्यते । मातेव सर्वजीवानां सदैवष्टफलप्रदः ॥७॥
दानयज्ञव्रतसमः सर्वपापप्रणाशनः । धर्मसारः क्रियासारस्तपःसारः सदार्चितः ॥८॥
विद्यानां वेदविद्येव मंत्राणां प्रणवो यथा । भूरुहाणां सुरतरुर्धेनूनां कामधेनुवत् ॥९॥
इसलिए रामनाम सर्वश्रेष्ठ मंत्र है । अतएव लोगोंको चाहिए कि 'राम' इस दो अक्षरके मंत्रको सदैव जपते रहें ॥ १९२ ॥ १९३॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
श्रीरामदास बोले—इस तरह हे शिष्य ! अबतक तुमने हमसे रामविषयक जो-जो प्रश्न किये, मैने उनका उत्तर आदरपूर्वक दिया ॥ १ ॥ अब तुम्हें जो कुछ सुनना हो, सो कहो । हे वत्स ! हमसे तुम जो भी पूछोगे, वह सब मैं तुम्हें बतलाऊँगा ॥ २ ॥ श्रीशिवजी बोले—अपने गुरुके इन वचनोंको सुनकर विष्णुदास फिर बोले । विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! आप अयोध्यामे चैत्रमासका बड़ा फल कह आये हैं । अब उसे विस्तारपूर्वक कहिए । उसमें क्या दान करना चाहिए, इसके करनेसे क्या फल होता है और किस उद्देश्यसे वह व्रत किया जाता है। इस व्रतको करनेकी क्या विधि है। इसे कब आरम्भ करना चाहिए। यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइए । सरयूके रामतीर्थमें स्नान करना चाहिए, यह जो आप कह चुके हैं । इसका भी विधि-विधान बता दीजिए ॥ ३-५॥ श्रीरामदासने कहा-ठीक है, हे महाबुद्धिमान् शिष्य ! तुमने बहुत ही सुन्दर प्रश्न किया है। अब मैं चैत्रमासकी महिमा बतला रहा हूँ ॥ ६ ॥ सब मासोंमें चैत्रमास वर्षका सर्वप्रथम मास माना गया है। यह मास सब प्राणियोंका माताके समान हितकारी है और सबका अभीष्ट फल देता है ॥ ७ ॥ यह समस्त दानों यज्ञों और व्रतोंके समान फलदायक है। यह सब धर्मोंका सार, समस्त क्रियाओंका सार और सब प्रकारकी तपस्याओका सार है ॥ ८ ॥ यह मास सब विद्याओंमें (वेदविद्याके समान, सब मन्त्रोंमें प्रणव ( ॐकार ) मन्त्रके समान, वृक्षोंमें पारिजातके समान, गोओमें काम-
| ६७४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १० |
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श्रेष्ठस्सर्वनागानां पक्षिणां गरुडो यथा । देवानां तु यथा विष्णुर्वर्णानां ब्राह्मणो यथा ॥१०॥
प्राणश्चप्रियवस्तूनां भार्यैव सुहृदां यथा । आपगानां यथा गंगा तेजसां तु रविर्यथा ॥११॥
आयुधानां यथा वज्रं धातूनां कांचनं यथा । वैष्णवानां यथा रुद्रो रत्नानां कौस्तुभो यथा ॥१२॥
पुण्येषु च यथा धर्म स्सतां मानसं यथा ।
मासानां धर्महेतूनां चैत्रमासस्तथा स्मृतः । नानेन सदृशो लोके विष्णुप्रीतिविधायकः ॥१३॥
चैत्रस्नाने च खिन्ने मीने प्रातर्भूर्योदयात् । लक्ष्मीसहायी भगवान्प्रीतिं तस्मिन्करोत्यलम् ॥१४॥
जन्तूनां प्रीणनं यद्वदन्नेनैव हि जायते । तद्वच्चैत्रे च स्नानेन विष्णुः प्रीणात्यसंशयः ॥१५॥
यश्चैत्रस्नाननिरतान् जनान् दृष्ट्वाऽनुमोदते । तावन्मात्रेऽपि विमुक्ताघो विष्णुलोके महीयते ॥१६॥
सकृत्स्नात्वा मीनगस्थे सूर्ये प्रातः कृतह्निकः । महापातैर्विमुक्तोऽसौ विष्णोःसायुज्यमाप्नुयात् ॥१७॥
स्नानार्थं चैत्रमासे यः पादमेकं चलेद्यदि । सोऽश्वमेधाऽयुतानां च फलं प्राप्नोत्यसंशयः ॥१८॥
अथवा कूटचित्तस्तु कुर्यात्सङ्कल्पमात्रकम् । सोऽपि क्रतुशतं पुण्यं लभत्येव न संशयः ॥१९॥
यो गच्छेद्धनुषांयावत् स्नातुं मीनगते रवौ । सर्वबंधविनिर्मुक्तो विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् ॥२०॥
त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि ब्रह्मांडान्तर्गतानि च । तानिसर्वाणि भो शिष्य मयि बाह्येऽनेऽल्पके ॥२१॥
तावंत्तुवन्ति पापानि गर्जन्ति यमशासने । यावन्न कुरुते ऽतुर्थेक्षेत्रे स्नानं जलाल्पप ॥२२॥
तीर्थाधिदेवताः सर्वाश्चैत्रे मयि द्विजोत्तम । बहिर्जले ममाश्रित्य यदा सन्निहिताः शिशो ॥२३॥
सूर्योदयं समारभ्य यावत् षड्घटिकावधि । तिष्ठति चाज्ञया विष्णोस्तद्गणां हितकाम्यया ॥२४॥
तथाप्यकुर्वतां स्नानं शापं दत्त्वा सुदारुणम् । स्वस्थानं यांति भो शिष्य तस्मात्स्नानं समाचरेत् २५॥
श्रेष्ठके समान, सर्पोंमें शेषनागके समान, पक्षियोंमें गरुडके समान, देवताओंमें विष्णुभगवान्के सदृश और वर्णोंमें ब्राह्मणके समान श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥ १० । संसारकी प्रिय वस्तुओंमें प्राणकी भांति, मित्रोंमें भार्याकी तरह, नदियोंमें गङ्गाकी तरह, तेजस्वियोंमें सूर्य की नांई, शस्त्रोंमें वज्रकी तरह धातुओंमें सुवर्णकी तरह, वैष्णवोंमें रुद्रभगवान्के समान, रत्नोंमें कौस्तुभ मणिकी तरह पुण्योंमें कमलकी तरह मानवोंमें मानकरोक्तकी तरह धर्महेतुक सब मासोंमें यह चैत्रमास सर्वश्रेष्ठ है । भगवान्के प्रति प्रीति बढ़ानेवाला और कोई मास नहीं है ॥ ११-१३ ॥ जब कि मीन लग्नपर सूर्य हो, ऐसे चैत्रमासमें अरुणोदयके पहले स्नान करनेसे लक्ष्मीके साथ-साथ विष्णुभगवान् भी प्रसन्न होते हैं ॥१४॥ जिस तरह संसारके प्राणी अन्नसे तृप्ति तथा प्रसन्न रहते हैं। उसी तरह चैत्रमासमें स्नान करनेसे विष्णुभगवान् तृप्त होते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है ॥१५॥ जो मनुष्य किसी-को चैत्रस्नानमें संलग्न देखकर उसका अनुमोदन करता है तो शीघ्र ही उसके सब पाप छूट जाते हैं और वह प्राणी विष्णुलोकमें सम्मान पाता है ॥ १६ ॥ जब कि सूर्य मान राशिपर हों, ऐसे समय केवल एक बार प्रातःकालके समय स्नान और नित्यकर्म करनेवाला प्राणी बड़े बड़े पापोंसे मुक्त होकर विष्णुभगवान्की सायुज्य मुक्ति पाता है । १७ ॥ चैत्रमासमें स्नानके निमित्त जो मनुष्य एक पग भी चलता है वह दस हजार अश्वमेध यज्ञका फल पाता है । १८ ॥ जो प्राणी स्थिर चित्तसे चैत्रस्नानका सङ्कल्पमात्र करता है, वह भी सैकड़ों यज्ञ करनेका फल प्राप्त कर लेता है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १९ । मीनगत सूर्यके समय जो प्राणी एक धनुष विस्तृत मार्ग भी चैत्रस्नानके लिए चलता है, वह सब बंधनोंसे छूटकर विष्णुकी सायुज्य मुक्ति पाता है ॥ २० ॥ त्रैलोक्य या ब्रह्माण्डके अन्तर्गत जितने भी तीर्थ हैं वे सब उस समय यहाँके थोड़ेसे जलमें विद्यमान रहते हैं ॥ २१ ॥ जब तक प्राणी चैत्रमासमें किसी जलाशयमें स्नान नहीं करता, तभीतक यमराजके आज्ञानुसार सब पातक गरजते हैं । २२ ॥ हे शिशो सब तीर्थ और सब देवता चैत्रमासमें जलके बाहर आकर ठहर जाते हैं । २३ ॥ सूर्योदयसे लेकर छः घडी दिन चढ़े तक विष्णुभगवान्के आज्ञानुसार सब देवता मनुष्योंके कल्याणार्थ जलके बाहर बैठे रहते हैं । २४ । उस समय भी यदि कोई स्नान नहीं करता तो