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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २० ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१९

सर्गः २० ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१९

न देहेन न निष्कामं तपश्चर्याव्रतं कृतम् । न देहः श्रमितस्तस्य शीतोष्णसहनादिभिः ॥ ९ ॥
एतादृशस्तस्य देहो बहुब्राह्मणहिंसकः । लङ्कायां ज्वलनेऽद्यापि निष्पापां भूयतेऽग्रसः ॥ १० ॥
ज्वालानां भस्त्रवच्छब्दो यः पृष्टो मां त्वया लव । जनशब्दादिने नैव श्रूयतेऽत्र जनैः सदा ॥ ११ ॥
चितायां यस्य चाद्यापि वायुपुत्रेण प्रत्यहम् । काष्ठभारशतं नीत्वा लङ्कायां क्षिप्यते मुहुः ॥ १२ ॥
यदा तस्याघशान्तिः स्यात्तदा भस्मीभविष्यति । अन्यत्ते कारणं वच्मि तच्छृणुष्व द्विजो लव ॥ १३ ॥
देहान्ते रावणेनापि रामाय याचितो वरः । वरेण येन लोकानां स्मरणं मे भविष्यति ॥ १४ ॥
न त्वया मे वरो देयस्तच्छ्रुत्वा राघवोऽब्रवीत् । त्वद्देहज्वलिनी ज्वालाशब्दः सर्वे जना भुवि ॥ १५ ॥
श्रोष्यन्ति सप्तद्वीपेषु तेन ते स्मरणं सदा । भविष्यति हि सर्वेषां ब्रह्मांडान्तनिवासिनाम् ॥ १६ ॥
एवं लब्ध्वा दशास्यः स वरं रामे लयं ययौ । एवं यच्च त्वया पृष्टं तन्मयं कथितं मया ॥ १७ ॥
गुरोरिति वचः श्रुत्वा तं नत्वा स लवोऽपि च । स्वगेहं गतसंदेहः प्रययौ शिविकास्थितः ॥ १८ ॥
एकदा बन्धुभिर्गेहं पुत्राभ्यां सीतया सह । मुनिभिर्गुरुणा रामः संस्थितः प्राह हर्षितः ॥ १९ ॥

श्रीरामचन्द्र उवाच

शृण्वंतु मुनयः सर्वे सर्वे शृण्वंतु बान्धवाः । पुत्रौ सीता मन्त्रिणश्च सखीः शृण्वन्तु मातरः ॥ २० ॥
यथा यथाऽवतारेऽस्मिन् सुखं भुक्तं द्विमान्वयाः । न तथाऽन्येषु सर्वेषु ह्यवतारेषु वै कदा ॥ २१ ॥
अवतारास्तु बहवः शतशोऽथ मया धृताः । नानाकार्याणि वै कर्तुं तेषां संख्या न विद्यते ॥ २२ ॥
सप्तावतारास्तेष्वेव श्रेष्ठाश्चात्र मया धृताः । ईदृशं न सुखं तेषु कदा भुक्तं मया भुवि ॥ २३ ॥
शंखासुरो महादैत्यः पूर्वं जातो महोदधौ । येन वेदा हृताः सर्वे सत्यलोकात् कृते युगे ॥ २४ ॥
तदर्थं मत्स्यरूपेण ह्यवतारो मया धृतः । तं हन्त्वा क्षणमात्रेण विष्णुरूपं मया धृतम् ॥ २५ ॥


चुका था, किन्तु शरीरसे उसने कभी देवताओंको नमस्कार भी नहीं किया ॥ ६ ॥ ॥ ७ ॥ न कभी देवमन्दिरकी सफाई की, न उस शरीरसे तीर्थयात्रा की, न अपने शरीरसे कोई निष्काम तपश्चर्या की और न शीत उष्णको ही सहन करके शरीरसे परिश्रम किया। बहु ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाली उसकी देह आज भी लङ्कामें जल रही है। उसका शब्द प्रत्येक मनुष्यको सुनाई देता है। ज्वालाकी धकधकाहटका निनाद धौंकनीकी तरह सुनाई पड़ता है ॥ ८ ॥ १० ॥ दिनके समय मनुष्योंके कोलाहलमें वह शब्द नहीं सुन पड़ता। वायु की हनुमान्जीको रोज सौ भार लकड़ा उसकी चितामें डालनी पडती है ॥ ११ ॥ १२ ॥ जब उसके पाप नष्ट होंगे, तब कहीं उसका शरीर जलेगा। हे वत्स लव ! मैं एक दूसरा कारण भी बतलाता हूँ सो सुनो। १३ ॥ अपने देहान्तके समय रावणने रामसे यह वरदान माँगा था कि आप मुझे कोई ऐसा वर दीजिए, जिससे संसारके लोग मेरा भी स्मरण किया करें ॥ १४ ॥ रामने कहा कि तुम्हारी देह जलानेवाली आगका धक् धक् शब्द सातों द्वीपोंके हर एक व्यक्तिको सुनाई पड़ता रहेगा। इसीसे सबको तुम्हारी याद आती रहेगी ॥ १५ ॥ १६ ॥ इस प्रकारका वरदान पाकर वह रामके शरीरमें लीन हो गया। इस तरह तुमने हमसे जैसा प्रश्न किया, सो सब कह सुनाया ॥ १७ ॥ गुरुकी बात सुनकर लवका सन्देह निवृत्त हो गया और वे पालकीमें बैठकर अपने घर चले गये ॥ १८ ॥ एक दिन सब भाइयों, पुत्रों सीता तथा गुरुके साथ रामचन्द्रजी बैठे थे। प्रसङ्गवश हर्षित होकर राम कहने लगे -॥ १९ ॥ समस्त ऋषि, मेरे सब भाई, दोनों बेटे, सीता, समस्त मन्त्री और माताएं सब लोग मेरी बात सुनें। २० ॥ मैंने इस अवतारमें सीताके साथ जितना सुख भोगा है, उतना किसी भी अवतारमें नहीं भोगा ॥ २१ ॥ विविध प्रकारके कार्यसाधन करनेके लिए मैंने इतने अवतार लिये, जिनकी कोई संख्या नहीं है ॥ २२ ॥ फिर भी मेरे सात अवतार मुख्य हैं, लेकिन उन सातोंमें भी मैंने इतना आनन्द नहीं पाया ॥ २३ ॥ आजसे बहुत दिनों पहले महोदधिमें एक शंखासुर नामका दैत्य हुआ था जो सत्यलोकसे चारों वेदोंको चुरा ले गया था। उसके लिये मैंने मत्स्यरूप धारण किया और उसे मारकर फिर विष्णुरूपधारी बन गया ॥ २४ ॥ २५ ॥ उस मत्स्य तथा तिर्यक् (वराह) योनिमें कोई विशेष सुख नहीं था।

५७० आनन्दरामायणे [ सर्गः २०

किं सुखं ह्यवतारोऽयं हि तिर्यग्योनावपि मयि । अतश्चास्मिन्नवतारे न स्थितं हि चिरं मया ।२६।
ततः समुद्रमथने मज्जन्तं मन्दराचलम् । दृष्ट्वा धृत्वा कूर्मरूपं स्वपृष्ठे पर्वतो धृतः ॥२७॥
तत्रापि गर्हितं रूपं मया ैव विचार्य तत् । किं चाग्निरजस्त्वां हि सुखं तत्र भवेज्जले ॥२८।
ततो दृष्ट्वा सागरे हि मज्जन्तीं पृथिवीं मया । क्रोडरूपं महत्कृत्वा दंष्ट्रायामवनिर्धृता ॥२९॥
मम पृथ्वीति मन्यधी हिरण्याक्षो मया हतः किं सुखं पशुयोन्यौ हि गदितायां भवेज्जले ॥३०।
अतश्चास्मिंश्चावतारे न लब्धं ह सुखं मया । प्रह्लादवचनात्स्तम्भाच्चाऽनिसिंहस्वरूपधृक् ॥३१।
अवतीर्णस्त्वहं भूम्यां हिरण्यकशिपुः क्षणात् मया तदा हतः क्रोधात्तद्वयमतिभास्वरम् ।३२।
यद्द्रष्टुन्निकटे कोऽपि प्रह्लादाच्च विनाऽपरः । न मानवः स्थितो भूम्यां तत्र वार्ता सुखस्य का ।३३।
तदाऽतिक्रोधरूपेण सिंहयोन्या तु किं सुखम् । मयाऽनुभूतं विपुलं सुखेच्छामुपिमाप न ।३४।
ततो बलेर्मोहनार्थं खर्वरूपं तु वामनम् । धृत्वा कृत्वा त्रिपद्याञ्च भूमेः पातालतः कृतः ।३५।
तत्र किं मुनिदेहेन वने मौर्य्य भरेन्मम । न यत्रास्ति यथायोग्यं देहमप्यतिसुन्दरम् । ३६ ।
तत्र का सुखवार्ताऽस्ति भूम्यां मे ब्रह्मचारिणः । अश्वमेधैः सहमा नाकलोकं गतं मया ॥३७॥
पुनर्विप्रोद्भवेनैव जामदग्न्यस्वरूपिणा । एकविंशतिवारं हि निःक्षत्रा पृथिवी कृता ॥३८॥
सहस्रार्जुननामा च महावीरो हतस्तदा । तत्रापि क्रोधसंयुक्तं मुनिरूपं मया धृतम् ॥३९॥
सुखवार्ता मुनीनां हि का तत्र वनचारिणाम् । ज्ञात्वैवं जन्मना तेन तपश्चर्या मया कृता ॥४०॥
किं सुखं तपसस्तत्र वने मे जनमुत्तमम् । एवं षड् वै धृताः पूर्वमवतारा मया भुवि ।४१।
न ज्ञाता सुखवार्ताऽपि तत्र क्वापि मुनैःसखाः । द्वपरेऽद्य कृष्णरूपं गोकुलेऽत्र करोम्यहम् । ४२॥


इसलिये उस अवतारमें उस रूपमें मैं ज्यादा दिनोंतक नहीं रहा ॥ २६ ॥ इसके बाद समुद्रमन्थनके समय जब मैने मन्दराचल पर्वतको डूबते देखा, तब कूर्म (कछुआ) का रूप धारण करके उस पर्वतको अपनी पीठपर धारण किया ॥ २७ ॥ उस स्वरूपको भी अच्छा न समझकर मैं अधिक दिनोंतक उस रूपमें नहीं रहा । भला जलचर जाति तथा जलमें रहकर मैं सुखी कैसे हो सकता था ? ॥ २८ ॥ तदनन्तर पृथ्वोको समुद्रम डूबती देखकर मैने क्रोड (शूकर) रूप धारण करके पृथ्वोको अपने दाँतोंपर रखकर उठाया । २९ । इस पृथ्वीपर मेरा राज्य है। अतएव यह पृथ्वी मेरी है। इस प्रकार दुर्बुद्धि मानवाले हिरण्याक्ष नामक असुरका मैंने संहार किया। पशुयोनिमें रहकर भी मुझे कोई विशेष सुख नहीं मिला। इसलिए उस रूपको भी जल्दी ही त्याग दिया, फिर प्रह्लादके वचनानुसार नृसिंहम्प धारण करके खम्भेसे निकलना पड़ा ॥ ३० । ३१ उस समय अवतार लेकर मैंने क्षणमात्रमें हिरण्यकशिपुको समाप्त कर दिया। मेरा वह रूप बड़ा तेजस्वी था ॥ ३२ ॥ उनके डरसे प्रह्लादके सिवाय मेरे पास जानेकी सामर्थ्य किसीमें नहीं थी तो बताओ, ऐसी योनिमें मैं सुखो कैसे रह सकता था । उस समय मेरा वह क्रोधपूर्ण रूप था, दूसरे सिंहकी योनि थी। इस योनिको मैने अनुभव कर लिया। इच्छा थी कि इस रूपमे मैं कुछ आनन्द पाऊँ, लेकिन नहीं पा सका ॥ ३३ । ३४ ॥ तत्पश्चात् बलिको नीचा दिखानेके लिए मैने बहुत ही छोटा वामनका रूप धारण किया और तीन पैरोमें सारी त्रिलोकी नापकर बलिको पाताल लोकमे भेज दिया। ३५ ॥ उस समय भी एक तो मुनिका भेष, दूसरे वनोमे रहना, तीसरे शरीर भी जितना चाहिए उतना सुन्दर नहीं था । ३६ । ब्रह्मचारी बनकर पृथ्वोपर रहकर सुख कहाँ था ? इसी लिए उस रूपको भी शीघ्र त्यागकर मैं स्वर्गलोकको लौट गया ॥ ३७॥ फिर मैंने ब्राह्मणरूपसे परशुरामका अवतार लेकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियशून्य कर डाला। उसी समय महावीर सहस्रार्जुनका वध किया। उस समय भी एक क्रोधी मुनिका रूप धारण करना पड़ा था ॥ ३८। ३९ ॥ वनमें रहनेवाले मुनियोंको भला कब सुख मिल सकता था। यह समझकर मैंने उस जन्मम भी तपस्या ही की ॥ ४० ॥ उस तपस्वी जीवनमें वनोंमें रहकर मुझे क्या सुख मिला होगा इसका आप लोग भी अनुमान कर सकते हैं। इस तरह मैने छः

सर्गः २० ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२१


नेदृशं तत्र भोक्ष्यामि सुखं शृणुत विस्तरात् । कारागृहस्थितिः पित्रोर्जन्मन्दावेव मे भवेत् ॥४३॥
मातृपितृविहीनश्च तदा स्थास्यामि शैशवे । परकीये नन्दगेहे वृद्धिं गच्छामि गोकुले ॥४४॥
गोपवेषस्य किं सौख्यं गोरक्षे भ्रमणं मम । स्त्रीगोनागाश्वपश्यादि बहूँस्तत्र निहन्म्यहम् ॥४५॥
देवपत्नीवरान्कुर्यां वस्त्रौघमयनादिकम् । जनार्यचोरि दुष्कर्म कृत्वाहं गोकुले ततः ॥४६॥
मथुरायां हनिष्यामि सजं कंसमातुलम् । तत्र दास्या रतिं कुर्यां नैष्ठुर्यं गोपिकादिषु ॥४७॥
सङ्कोचा गोपिकाः सर्वा रामो बन्धुर्मोक्ष्यति । अन्यच्च बाल्यवनशयान्मे हि पराश्रयः ॥४८॥
न पराश्रयतो दुःखं किञ्चिदस्ति जगत्त्रये । ततोऽहं स्वस्थलं त्यक्त्वा तटाके सागरस्य च ॥४९।
स्थास्यामि स्वल्पकालं हि चिरकालं न मे स्थितिः । न स्थलं मध्यदेशे हि न राज्यं मे भविष्यति ॥५०।
विना राज्येन किं सौख्यं परभावप्रवर्त्तिनः । छत्रादिराज्यभोगाश्च तस्मिन्न जन्मनि मे न हि ॥५१।
बह्वर्णामेकदेस्तदाङ्गं मे भविष्यति । सदा कामा सुखं देयं दुःखं कासां तदा मया ॥५२।
एवं मदा व्यग्रचित्तस्तासां रंजनकर्मणि । सङ्ग का सुस्वप्नानांऽपि निशया भ्रमणो मम ।५३।
घटिकायां च षट्त्रिंशच्छयनाद्गेहानि हि । पञ्चेटन्पञ्चविंशांग्रैर्गेहानि तदा मम ।५४।
शेषावि गंतु नैवास्ति कालो भानुदयेष्यति । विप्रदट्टीमयी रात्रिश्चत्वेवं मे मा यिष्यति ॥५५॥
बदा मे भ्रमतो रात्री कुतो निद्रा कुत सुखम् । यदा भवेन्निद्रावृद्धिः किंचिद्विठो तदाऽऽनुयाम् ॥५६॥
यस्येच्छाऽत्यन्तदुःखं हि हि मे ऽनेन नरेण हि । कर्त्तव्या बह्वयः पत्न्यो द्रष्टव्यं तत्फलं ततः ॥५७॥
एवं भवेन्न मे सौख्यं द्वापरे कृष्णजन्मनि । भविष्यत्यवतारश्च ममापिविधिणोद्यतः ॥५८॥


अवतार लिये ॥४१॥ लेकिन उन छहोंमें मुझे सुखका नाम भी नहीं मिला। आगे द्वापर युगमें इस पृथ्वीपर गोकुलमें कृष्णरूप में अवतार लूंगा ॥४२॥ लेकिन ऐसा सुख उस अवतारमें भी नहीं पा सकूंगा। सुनिए, उस अवतारका विशेप विस्तारपूर्वक आप लोगोंको बतलाता हूँ। जन्मके पहले ही मेर माता पिता कारागारम रहेंगे ॥४३॥ शैशव समयमें ही माता-पितासे वियुक्त होकर एक अन्य व्यक्ति (नन्द) के घर गोकुलमें रहकर पहूंगा। उस गोपवेषमें गौओंके पीछे-पीछे घूमनेमे मुझे क्या सुख मिलेगा ? फिर गो (वत्सासुर), स्त्री (पूतना), नाग (कालिया), अश्व (केशी) तथा पक्षी (बकासुर) को मारूँगा ॥४४॥४५॥ देवस्त्रियोंके वरदानरू पश्चशोभन आदि (वस्त्र) हरूँगा। फिर गोकुलमें चोरी आदि दुष्कर्म कर लेनेके बाद मथुरा जाकर हाथी कुवलयापीडके साथ मामा कंसको मारूँगा। वहाँ मुझे गोपिकांके साथ निष्ठुरई करके दासी (कुब्जा) के साथ विलास भी करना पड़ेगा ॥४६॥४७॥ जिन गोपियोंको मैंने भोग होगा, भविष्यमें बलभद्रजी उन्हें भोगेंगे। फिर बाल्यवयसके वयमे मुझे परान्त भी होना पड़ेगा ॥४८॥ पराश्रयसे बढ़कर संसारमें और कोई दुःख नहीं हो सकता। फिर समुद्रके किनारे अपना निवासस्थान बनाकर कुछ दिनों तक वहां ही रहूँगा। यह निश्चित है कि उस अवतारम भी मैं अधिक दिनतक संसारमे न रहूँगा। मध्य देशमें निवासस्थान न रहनेके कारण मेरे पास कोई राज्य भी नहीं रहेगा ॥४९॥५०॥ राज्यरहित होकर दूसरेकी आज्ञामें रहनमे भला क्या सुख मिल सकता है ? उस जन्ममे राजाओंको उपभोग्य वस्तुएं छत्र चमर आदि भी मेरे पास नहीं रहेगे ॥५१॥ बहुत सी स्त्रियोंके बीच मेरा अकेला शरीर रहेगा। उस समय रात-दिन यही चिन्ता रहा करेगी कि इनमेंसे किसे सुख दें और किसे दुःख। सदा मुझे उनका अनुहार करना पड़ेगा। भला रातभर एक घरसे दूसरे घरकी दौड़ मारनमें मुझे क्या सुख मिल सकता है ? ॥५२॥५३॥ उस समय एक घड़ीमें पाँच सौ छतीह घरोंका चक्कर लगानेपर भी अट्ठाईस घर छूट जायेंगे और यही सोचना पड़ेगा कि सूर्योदयका समय हो रहा है, अब किसीके यहाँ जानेका समय नहीं है। इस तरह तीस वर्षोंकी रातें बीतेंगी ॥५४॥५५॥ उस समय रातभर घूमनेमें निद्रा तथा सुख क्योंकर मिल सकेगा ? हाँ, जब रात कुछ बड़ी होगी तो चाहे बड़ी आधी घड़ी सोनेके लिये समय मिल जाय ॥५६॥ जिस मनुष्यको संसारमें दुःख भोगनेकी इच्छा हो, वह कई स्त्रियोंको रख ले और फिर देख उसका फल ॥५७॥ भाव यह है कि मुझे उस अवतारमें भी कुछ सुख

५२२आनन्दरामायणे[ सर्गः २०

ततो दैत्यान्यज्ञकर्मसक्तान्दृष्ट्वा पुनस्त्वहम् । कलावग्रे बुद्धरूपं धरिष्याम्यतिमोहनम् ॥५९॥
निजवाक्यैर्मतिंस्तेषां दैत्यानां यज्ञकर्मतः । परावर्त्य कियत्कालं स्थास्यामि जगतीतले ॥६०॥
तदाऽहं मौनमाश्रित्य मलिनः केशलोञ्चकः । यूकादिजीवधारी च सर्वेषामुपदेशकत् ॥६१॥
अहिंसनंवनं सर्वान् दर्शयिष्याम्यहं जनान् । तज्जन्मन्यतिदुःखं मे केशयूकामलादिना । ६२॥
ततोऽग्रेऽहं धरिष्यामि कल्किरूपं महन्मखेः । अंते दृष्ट्वा जनानां च सर्वत्र वर्णसंकरम् ॥६३॥
भूत्वाऽत्र विप्रदेहेन खङ्गधारी हयस्थितः । संहारं क्षणमात्रेण दुष्टानां हि करोम्यहम् ॥६४॥
सोऽवतारो नातिचिरं मम स्थास्यति भूतले । न तत्र सुखलेशोऽपि मे भविष्यति भूसुराः ॥६५॥
प्रवर्तिष्यति पुनस्ततोऽग्रे तत्र कृतं युगम् । पूर्ववच्च पुनस्तत्र ह्यवतारान्करोम्यहम् ॥६६॥
एवं नवावतारेषु न सुखं हि सुखं मया । अतस्त्वस्मिन्नवतारे सुखं भुक्तं यथेच्छया ॥६७॥
नानेन सदृशः कश्चिदवतारोऽवनीतले । पूर्वं भूतो मयाग्रेऽपि न भविष्यति वै कदा ॥६८॥
सप्तलोकाधिपत्यं च नारी सीता च वर्तते । यत्रेमौ बालको पुत्रौ महारथौ धनुर्धरौ ॥६९॥
यत्र श्वेते बंधवश्च त्रैलोक्यजयिनः शुभाः । कामधेन्वादिरत्नानि सप्त यत्र ममान्तिके । ७०॥
साक्षादयं वेदरूपो वसिष्ठस्त्वस्ति मे गुरुः । आर्यावर्ते पुण्यदेशेऽयोध्यायां वसतिर्मम ॥७१॥
राज्यभोगादिभोगानां मत्ताऽऽह म्त्वत्र नोद्भवः । यत्र सत्यव्रतं मेऽस्ति यत्रैकदपिताव्रतम् ॥७२॥
यत्रैकेनैव बाणेन मया बाल्यादिका हताः । यत्रैकैव हि सीताया मम शय्या न चापरा । ७३॥
यत्राप्रतिहताज्ञा मे त्रैलोक्ये हि मुनीश्वराः । यत्र यानं पुष्पकं तु यत्र दूतोऽञ्जनीसुतः ॥७४॥
सुग्रीवराक्षसेन्द्रां च यत्र मित्रे ममांतिके । कोदण्डमदृशं चापं यत्र मेडारिनिषूदनम् ॥७५॥
सूर्यवंशे यत्र जन्म ततो दशरथो वरः । कौसल्या यत्र जननी यत्राहं स्ववशः सदा ॥७६॥

नहीं मिलेगा । अन्तमें ब्राह्मणके शापसे मेरे उस अवतारकी समाप्ति होगी । ५८ । इसके अनन्तर कलिमें दैत्यों को यज्ञकर्म करते देखकर मैं अतिशय मनोमोहक बौद्ध अवतार लूँगा ॥ ५९ ॥ अपनी बातोंस उन दुष्टोंकी मति यज्ञकी ओरसे फेरकर कुछ दिनों तक मैं संसारमें रहूँगा ॥ ६० । उस समय मैं मौनव्रत धारण करके मैले-कुचैले कपड़े पहने ओर कितने ही जू आदि जीवोंको शरीरमें पाले हुए सारे संसारके लोगोंको उपदेश दूँगा । सबकी अहिंसाव्रतका अभिनय दिलाऊँगा । उस जन्ममें दाढ़ीमें पड़े हुए जूँएं, कपड़ोंके फोलर तथा खटमल आदिके महान् दुःख उठाना पड़ेगा ॥६१॥ ६२॥ फिर कलियुगके अन्तमें सब लोगोंको वर्णसंकर होत देखकर मैं कल्कि अवतार लूँगा ॥ ६३ ॥ उस जन्ममें एक विप्रके यहाँ उत्पन्न हो ओर घोड़ेपर सवार होकर क्षणमात्रमें दुष्टोंका संहार कर डालूँगा ॥ ६४ ॥ हे ब्राह्मणों ! वह अवतार भी चिरस्थायी नहीं होगा । अतएव उसमें भी मे कुछ सुख नहीं भोग सकूँगा ॥ ६५ ॥ उसके बाद फिर सत्ययुग आ जायगा ओर मैं पहलेकी तरह फिर अवतार लेता रहूँगा ॥ ६६ ॥ इस तरह नौ अवतारोंमें कुछ सुख नहीं मिलेगा । किन्तु इस अवतारमें मैने अपने इच्छानुसार सुख भोग लिया है ॥ ६७ ॥ इस अवतारके समान कोई अवतार अवनीतलम न हुआ है, न होगा ॥ ६८ ॥ जिसमे सातों द्वीपोंका प्रभुत्व, सीता जैसी स्त्री, कुश-लव जैसे महारथ र और धनुर्धारी पुत्र, तीनों लोकोंको जीतनेवाले भ्राता और कामधेनु आदि सात रत्न विद्यमान हैं । ६९ । ७० ।। जहाँ वेदके साक्षात् स्वरूप वसिष्ठ जैसे गुरु हैं आर्यावर्त जैसे पवित्र देशमें निवासस्थान है, राज्यभोगादि करनेवाला और कोई नहीं है, जहाँ सत्यका व्रत है, जहाँ अटल एकपत्नीव्रत है ॥ ७१ । ७२ । जहाँ केवल एक वाणसे शत्रुको मारनेकी सामर्थ्य है, जहाँ सीताकी और हमारी एक शय्या है ॥ ७३ ॥ जहाँ मुनिगण बेरोक-टोक जहाँ चाहें वहाँ आ जा सकते हैं जहाँ कि पुष्पकविमान जैसा सवारी है ॥ ७४ ॥ सुग्रीव और विभीषण जैसे मित्र हैं, शत्रुओंका नाश करनेवाला कोदण्ड जैसा धनुष है ॥ ७५ सूर्यवंशमें जन्म हुआ है, दशरथ जैसे पिता और कौसल्या जैसी