श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १२] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४६९
सर्गः १२] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४६९
सुमन्त्रो राघवं नत्वा सेनया तं मृगं ययौ । तावच्छश्वत्पाषाणौघैर्गन्तुं न स क्षमः ॥६०॥
ततो राघवभीत्या स शनैः सैन्येन सम्पुरः । ययौ तावन्मृगोद्भूतैः पाषाणैस्ताडितोऽपतत् ॥६१॥
सुमन्त्रं पतितं दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत् । अयोध्यायां च सर्वत्र तद्भङ्गमिवाभवत् ॥६२॥
सुमन्त्रं पतितं श्रुत्वा पुत्राभ्यां रघुनन्दनः । सैन्येन प्रेषयामास शत्रुघ्नं तं मृगं पुनः ॥६३॥
ततस्तत्कौतुकं श्रुत्वा पौरनार्यः सहस्रशः । प्रासादशिखराङ्कारूढा उच्चांड्य च व्यलोकयन् ॥६४॥
तर्जन्या दर्शयामासुः प्रोत्थ्यश्वेति ता मिथः । वामहस्तं भ्रुवोः स्थाप्य रवितीक्ष्णनिवारकम् ॥६५॥
कुञ्चितानलकाम्नेत्रपतितान् करपल्लवैः । स्त्रियो निवार्य प्रासादात्पुरुषाञ्जसम्मुखान् ॥६६॥
निद्रासंभ्रान्तनयनान्नान्योन्यं दर्शयन्मृगम् । एवं तन्नगरं सर्वं चकितं चाभवत्तदा ॥६७॥
शत्रुघ्नोऽथ पुराद्वात्रात्सैन्येन निर्गतो बहिः । तावत्तद्रथवाहाश्च संस्थिता एव ते पथि ॥६८॥
ताडिता अपि सूतेन नोत्तस्थुस्तुरगोत्तमाः । कुशस्याथ लवस्यापि रथवाहास्तथैव च ॥६९॥
ताडिता रुरुमद्देन नोत्तस्थुः पथि संस्थिताः । आश्चर्यञ्च तदद्भुतं राघवाय न्यवेदयन् ॥७०॥
रामोऽपि श्रुत्वा चकितस्तदा चिन्तैश्चिन्तयन् । विचारः करणीयाऽत्र ह्यविचारोऽद्य नोचितः ॥७१॥
अन्यत्र कारणं किञ्चि-द्रष्टव्योऽद्य पुरोहितः । जानन्नपि स्मादावः स्वयं सर्वं तथापि सः ॥७२॥
मानुषं भावमाश्रित्य पुरोहितमथाद्वयत् । सोपि समागत्याशु धेन्वां मयां प्रययौ गुरुः ॥७३॥
प्रत्युद्गम्य गुरुं रामो दद्यावासनमुत्तमम् । ततः सम्पूज्य विधिवत्सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥७४॥
तच्छ्रुत्वा राघवं प्राह वसिष्ठो मुनिसत्तमः । वाल्मीकिम्प्वद्य प्रष्टव्यो येन ते चरितं कृतम् ॥७५॥
तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा वाल्मीकिं स समाह्वयत् । सोऽपि समागत्य शीघ्रे ययौ श्रीराघवं प्रति ॥७६॥
मृस्तकके मुखकाटनेके लिए भेजा। सुमन्त रामको प्रणाम करके उसमृगकी ओर वढे। किन्तु वहांसे थोड़ी
दूरपर ही थे। इतनामें पत्थरोंका वर्षा होने लगी। जिससे उस मृगके पासतक नहीं पहुँच सके ॥ ५९ ॥ ६० ॥
लेकिन रामके भयसे सुमन्त पीछे न लौटकर आगे ही बढ़ते गये और उधरसे बराबर पत्थरोंकी वृष्टि होती
रही। जिससे वे घायल होकर गिर पड़े ॥ ६१ ॥ सुमन्तको गिरते देखा तो सेनामें बड़ा कोलाहल होने लगा।
सारे अयोध्यानवासियोंका वह एक अनहोना-सा बात मालूम पड़ा । ६२ ॥ सुमन्तको घायल सुना तो रामने
अपने दोनो पुत्रोंके साथ एक बड़ी सेना भेजी ॥ ६३ ॥ इस कौतूहलको सुना तो नगरकी बहुत-सी स्त्रियाँ
अपनी-अपनी अट्टालिकाओंपर चढ़कर मस्तक ऊँचा कर उस मृगको देखने लगीं और धूपके प्रकाशका निवारण
करनेके लिए अपना बायां हाथ भौंहापर रख-रखकर एक दूसरेको उसपर उँगलियोंसे वह मृग दिखाने
लगीं ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ नेत्रके सामने आये हुए केशोंको हटाती हुई वे स्त्रियाँ मकानकी छतों, कंगूरों
और अटारियोंपर अधिक-से-अधिक संख्यामें एकत्र हो गयीं ॥ ६६ ॥ कितनोंकी आंखें उस मृगका निहारते-
निहारते नींदका भ्रममें यांझिल हो गया। इस तरह उस समय सारा नगर विस्मित हो रहा था । ६७ ॥
उधर शत्रुघ्न अपनी सेना लेकर चले । नगरसे बाहर निकले ही थे कि उनके रथवाले घोड़े रास्तेमें बैठ गये
और कोचवानके बार-बार मारनेपर भी नहीं उठे यही दशा कुश और लवके भी रथको हुई । उनके घोड़े
भी रास्तेमें बैठ गये और कितने ही डंडे छानपर भी नहीं उठे तो वे सब लौटकर आश्चर्यके साथ रामके पास
पहुँचे और यह हाल बताया ॥ ६८-७० ॥ यह सुना तो वे मनमे विचारने लगे कि इस विषयमे पूर्णतया
विचार करके काम करनेकी आवश्यकता है आज अविचारित काम नहीं फलनेका है ॥ ७१ ॥ इसमे अवश्य
कोई कारण है। अतः पहल पुरोहितको बुलाकर पूछ लेना जरूरी है। यद्यपि रामचन्द्रजी सब कुछ जानते थे,
फिर भी मनुष्यभावसे उन्होंने पुरोहितको बुलवाया। रामके आज्ञानुसार तुरन्त गुरुजी राजसभामे जा पहुँचे।
तब राम गुरुके आगे गये और एक उत्तम आसनपर बिठाकर पूजन करनेके अनन्तर सारा वृत्तान्त कह
सुनाया ॥ ७२-७४ । यह सब सुनकर गुरु वसिष्ठने कहा कि इस विषयमें आप वाल्मीकिजीसे पूछ-ताछ करें
तो अच्छा होगा। क्योंकि उन्होंने ही आपके चरित्रको बनाया है ॥ ७५ ॥ गुरुके आज्ञानुसार रामने वाल्मीकि
४७० आनन्दरामायणे [सर्गः १३
प्रत्युद्गम्य मुनिं रामो ददावासनमुत्तमम् । नत्वा सम्पूज्य विधिवत् सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥७७॥
ततो विहस्य वाल्मीकिः प्रोवाच रघुनन्दनम् । सर्वं वेत्सि भवान् राम किमर्थं मां तु पृच्छसि ॥७८॥
स्वचेत्पृच्छसि रामात्र मानुष्यं भावमाश्रितः । तर्हि ते कथयाम्यद्य शृणुष्व रघुनन्दन ॥७९॥
त्वयाऽत्र वर्जितं हास्यं त्वद्विद्या मर्कलर्जनैः हास्यकारीणि कर्माणि संत्यक्तान्यवनीतले ॥८०॥
विवाहादिसमुत्साहाः कथावार्त्तादिकौतुकम् । मङ्गलोन्माहगीतानि नृत्यं यज्ञादिसंक्रियाः ॥८१॥
यात्राः संस्तम्भरोन्माहास्त्यक्ताः पञ्चशतानि तु यद्यत्कर्म तोषकारि हास्यकारि च तन्नरैः ॥८२॥
एकसंवत्सरं नात्र क्रियते रघुनन्दन उन्माहदेवताः मत्तास्तथा कर्माङ्गदेवताः ॥८३॥
इन्द्रादिलोकपालाश्च दृष्ट्वा स्वांप प्ररोजनम् । तुम भूप्रां ततो गम तद्रूपं कथयन्विधिम् ॥८४॥
ततो विधिश्च तच्छ्रुत्त्वादसमर्थस्त्वायं निवेदितुम् । मयि कुटेशमामन्त्र्य योऽश्वत्थे सप्रवेशितः ॥८५॥
हितार्थं निर्जगाणां स सोऽद्य तिष्ठति पिप्पल त्राजकर्तृपद्रवान् राम छन्प्रुकमजु वशामनान् ॥८६॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवः क्रोधमाययौ । अहमेवाद्य गच्छामि भारं पश्यामि ब्रह्मणः ॥८७॥
कथं नाम रघुश्रेष्ठः स्वशिक्षां परिवर्त्तयेत् । इत्युक्त्वाज्ञापयामास स्वांयां सेनां तदा प्रभुः ॥८८॥
ततस्तं बोधयामास वाल्मीकिर्मुनिसत्तमः ।
क्रोधं त्यज रघुश्रेष्ठ शृणुष्व वचनं मम । सच्चिदानन्दसम्पन्नस्त्वमानन्दघनो नृप ॥८९॥
भवाऽस्ति चरितं राम तव किञ्चित्पुत्रयोर्मुखात् । त्वयाऽपि यज्ञसमये श्रुतं यल्ललटे पुरा ॥९०॥
यस्य संश्रवणाद्ब्रह्मानन्दरूपी भवेन्नरः । हास्यं वस्त्वेति चेत्त्वाह ते च्छास्तं त्त्रिदम् ॥९१॥
न जनाः कीर्त्तयिष्यन्ति मुखरूपं स्मितं विना । अन्यत् किंचित् प्रवक्ष्यामि प्रभो ब्रूश तवग्रतः ॥९२॥
शतकोटिमितं तेऽत्र चरितं यन्मया कृतम् । पुरा त्वया विविक्तं यत् सर्वमे रघुनन्दन ॥९३॥
का बुलवाया । यह सन्देश पाते ही वाल्मीकि रामके मिलनक चल दए ॥ ७६ ॥ तहाँ पहुंचतहीर रामन उठ-
कर उनका अगवानी की और एक सुन्दर आसनपर बिठाकर पूजन किय । फिर जो कुछ वृत्तान्त बताना
था, सो बताया ॥ ७७ ॥ यह सब सुना तो हंसकर वाल्मीकिने कहा- हे राम ! आपसे कुछ छिपा नहीं है,
आप सब जानते हैं । फिर हमसे क्यों पूछते हैं ? ॥ ७८ । हाँ यदि मानवभावका आश्रय लेकर आप हमसे
पूछते हैं तो बताता हूँ, सुनिए ॥ ७९ । आपने अपने राज्यमें हंसीको मनाही कर दी है। इससे सब लोगोंने
ऐसे शुभ कार्योंका करना बन्द कर दिया है, जो हंसी-खुशीसे ही सम्पन्न होसकते हैं ॥ ८० । विवाह, कथावार्ता,
खेल-तमाशे, नाच-गान, यज्ञादिक सत्क्रियाएं, यात्रा और सांवत्सरिक उत्सव आदि सब कामलोगोंने बन्द कर दिये हैं।
कहनेका मतलब यह कि जितने कार्य हृदयको आनन्दित करनेवाले हैं, वे सब आज एक वर्षसे बन्द हैं । इससे
व्याकुल होकर समस्त उत्साहदेवता, कर्माङ्गदेवता तथा इन्द्रादि लोकपाल भूमण्डलपर अपनी प्रजाको दुःखी
होते देख ब्रह्माके पास गये और उन्हें अपना दुःख सुनाया ॥ ८१-८४ ॥ इसके बाद ब्रह्माजी आपसे कुछ
कहने-सुननेमें असमर्थ होकर उस पीपल-वृक्षमें गुप्त रूपसे प्रविष्ट हो गये हैं। देवताओंकी कल्याण-कामनासे
वे आज भी उसमें बैठे हुए हैं । जो कोई उस वृक्षको काटनेके लिये जाता है, वे उसपर पत्थर बरसाते हैं
॥ ८५ ॥ ८६ ॥ मुनिराज वाल्मीकिके मुखसे यह हाल सुनकर रामको क्रोध आ गया और उन्होंने कहा कि आज
मैं स्वयं जाकर ब्रह्माका पराक्रम देखता हूँ । रघुवंशका एक श्रेष्ठ क्षत्रिय अपने आदेशमें किसी प्रकार का उलट-
फेर नहीं कर सकता। इतना कहकर रामने अपनी सेना तैयार करनेकी आज्ञा दी ॥ ८७ । ८८ । तब वाल्मीकि
समझाने लगे—हे रघुश्रेष्ठ ! इस प्रकार क्रोध न करके मेरी बात सुनिये। आप साक्षात् सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म
हैं और आपका चरित्र लोगोंको आनन्दित करनेवाला है। उस दिन ही बनाकर आपके पुत्रोंके मुखसे
यज्ञशालामें सुनवाया था, उसे आपने भी सुना है। जिस जिसके सुनने मात्रसे मनुष्य आनन्दमग्न हो जाता है,
ऐसे पुनीत चरित्रको लोग यदि आपने हंसीका नियम रक्खेंगे तो नहीं सुन सकेंगे। क्योंकि कथा सुनकर
आनन्दको प्राप्त लोग हंसे बिना नहीं रह सकेंगे। इसके सिवाय हे प्रभो ! मुझे आपसे कुछ और भी कहना