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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् ३३९

सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् ३३९

ततस्ता दुद्रुवुः सर्वाः सर्वैर्भिलाषिता नृपाः । व्यजनेनैर्विजयामासुः स्वं स्वं कांतं सुलज्जिताः ॥६७॥
एवं नानाकोतुकारि भोजनायनकर्मसु । कारयामास वैदेह्या बंध्वादीनां रघूत्तमः ॥६८॥
अथ रामो वसिष्ठं च एकदा वाक्यमब्रवीत् । कुशस्याथ लवस्यापि व्रतबन्धो विधीयताम् ॥६९॥
तथेति गुरुणा प्रोक्तस्ततो रामः शुभे दिने । गणकान् स समाहूय मंत्रयामास सादरम् ॥७०॥
कुशाय पंचमं वर्षं किञ्चिन्न्यूनं लवाय च । ज्ञात्वा ते गणकाः सर्वे गुरुशुक्रादिकं बलम् ॥७१॥
दृष्ट्वा पंचांगपट्टेषु राघवं वाक्यमब्रुवन् । ब्राह्मणस्याष्टमे प्रोक्तो द्वादशे क्षत्रियस्य च ॥७२॥
वैश्यस्य षोडशे वर्षे व्रतबंधो मुनीश्वरैः । जन्मात् षष्ठे तथा गर्भात्सप्तमेऽब्दे नृपस्य च ॥७३॥
व्रतबंधो विधातव्यो यन्मनश्च यथाविधिः । ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यों विप्रस्य पंचमे ॥७४॥
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्यार्थार्थिनोऽष्टमे । विद्वद्भिचोपनयनमेव शास्त्रेषु निर्णयः ॥७५॥
अतो गर्भाच्च षष्ठेऽब्दे पुत्रयोर्धर्म रन्दन । मुखं कुरुपनयनं मुहूर्त्तं शृणु सादरम् ॥७६॥
अद्यप्रभृत्य पंचदशदिने दर्श कुशाय ह । पश्चात्परेण च श्रुत्वा मुहूर्त रघुनंदनः ॥७७॥
गणकान् धनवस्त्राद्यैः पूज्य लक्ष्मणमब्रवीत् । आकारणीया राजानः सुहृदश्च मुनीश्वराः ॥७८॥
सांतःपुराः सर्वराज्ञः स्वस्वजानपदैः सह । शृङ्गारणीयोऽयोध्याथ वसिष्ठैः सह सादरम् ॥७९॥
शोधनीयास्तथा मार्गाश्चमूहैषु सुधाः शुभाः । दृश्या चित्राणि लेख्यानि प्रासादेषु समंततः । ८०॥
देवालयेषु सर्वेषु सुधा देया मनोरमा । लेखनीयानि चित्राणि स्थाप्यतां दल्पयः पृथक् ॥८१॥
बन्धनीयाः पताकाश्च रोषणीया ध्वजा अपि । मयतश्चस्तोरणानि बंधनीयानि लक्ष्मण । ८२॥


सीताने कहा-अब उर्मिला, श्रुतकीर्ति तथा माण्डवी अपने-अपने पतियोंको पंखा झलें ॥ ६६ । इस बातको सुनकर वे स्त्रियाँ लज्जाके मारे वहाँसे भागने लगीं । किन्तु सखियां रोककर उन्हें पकड़ लायीं और अन्तमें उन्हें रामके आज्ञानुसार अपने-अपने पति ऊपर पंखे झलने पड़े ॥ ६७ ॥ इस तरह भोजन, आचमन तथा शयनके समय रामचन्द्रजी सीता तथा भ्राताओंके साथ विविध प्रकारके कौतुक किया करते थे । ६८ ॥ कुछ दिन बीतनेपर एक दिन वसिष्ठसे रामने कहा-अब कुश और लवका व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत-संस्कार) कर डालना चाहिए ॥ ६९ ॥ वसिष्ठने कहा-अच्छी बात है । एक पवित्र दिवसको रामने बहुतसे ज्योतिर्विदोंको बुलाकर सलाह की ॥ ७० ॥ जब ज्योतिर्विदोंको यह बात मालूम हुई कि कुशका पाँचवां वर्ष चल रहा है और लवका कुछ कम है । तब उन्होंने गुरु शुक्रादिका बलाबल देखा ॥ ७१ ॥ पंचांगमें सब देख-सुनकर उन्होंने रामसे कहा-ब्राह्मणका उपनयन आठवें वर्षमें, क्षत्रियका बारहवें वर्षमें और वैश्यका सोलहवें वर्षमें यज्ञोपवीत-संस्कार होना चाहिए । यह बड़े-बड़े ऋषियोंने कहा है । अपना वर्चस्व बढ़ानेकी इच्छा रखनेवाले विप्र-को गर्भसे पाँचवें वर्षमें, बलवृद्धिकी कामनावाले राजाको छठे वर्षमें एवं धनवृद्धिकी इच्छा रखनेवाले वैश्यको आठवें वर्षमें ही उपनयन-संस्कार करना उचित है । यह शास्त्रोंका निर्णय है ॥ ७२-७५ ॥ अतएव हे रघुनन्दन ! आपके बच्चोंका गर्भसे लेकर यह छठां वर्ष चल रहा है । इसलिए इस समय इनका व्रतबन्ध करना अतिशय श्रेयस्कर है । अब बच्चोंके व्रतबन्धके लिए सुन्दर मुहूर्त बतलाता हूँ, सो सुनिए ॥ ७६ ॥ आजसे पन्द्रहवें दिन कुशके यज्ञोपवीतका पवित्र मुहूर्त मिलता है । इस प्रकार एक पक्षके बाद यज्ञोपवीतका मुहूर्त सुनकर राम-चन्द्रजीने अनेक प्रकारके धन-वस्त्रसे उन गणकोंकी पूजा की और लक्ष्मणसे कहा कि समस्त राजाओं, मित्रों तथा मुनियोंके पास निमन्त्रण भेजकर कहला दो कि सब लोग अपनी स्त्रियों, पुरवासियों तथा देशवासियोंके साथ इस उपनयनसंस्कार के उत्सवमें मेरे यहाँ पधारें । इस अयोध्या नगरीको अच्छी तरह सजवाओ । इसके आस-पासकी गलियोंको साफ करवा दो ॥ ७७-७९ ॥ महलोंको चूनेसे पुतवा दो । कटहरियों और दीवारोंपर नाना प्रकारके चित्र बनवाओ । अयोध्याके समस्त देवालयोंको चूनेसे पुतवाकर उनमें नाना प्रकारकी चित्रकारियां करवाओ और तरह-तरहके पूजनका प्रबन्ध कर दो ॥ ८० ॥ ८१ ॥ चारों ओर पताका

३४० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

वेद्याः कार्या ह्यसमग्रग्यो वस्त्रैर्नानाथ मंतपाः भूषणीया ह्ययोध्यायाश्चत्वराः सदसस्तथा ॥८३॥
अन्यच्चापि यथायोग्यं यद्यज्जानासि लक्ष्मणः । तत्कुरुष्व त्वया नैव मया तत्र रघूत्तम ॥८४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा च लक्ष्मणः । तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण शिक्षितः ॥८५॥
ततो मुहूर्ते श्रीरामः स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम् । कृत्वा कुमारैर्देव्या च पुत्रैश्चैव वधूभिः ॥८६॥
नानालंकारवस्त्राणि परिधायाथ तैः सह । पुण्याहवचनं चक्रे गुरुं पूज्य ऋषींस्तरान् ॥८७॥
नांदीश्राद्धादिकं कृत्वा प्रतिष्ठां देवतास्य च । चकार मङ्गलैस्तूर्यैर्नादैः सीतासमन्वितः ॥८८॥
ततो ययुः कोटिशस्ते पार्थिवाश्च मुनीश्वराः । यमद्रोपांतस्त्स्याश्च यच्छोभाः सराङ्गनाः ॥८९॥
तैः साऽयोध्या तदा व्योम्ना विरेजे नितरां यदा । ततो महूतेदिवसे वसिष्ठो ब्राह्मणैर्युतः ॥९०॥
रामस्याथ कुशस्याथ मध्ये धृत्वा वरं पटम् । उवाच मन्त्रान्तेऽथ सुस्वरैर्मधुरक्षरैः ॥९१॥
ध्यान्ता श्रीगणनायकं विधिसुतां शंभुं विधिं माधव
लक्ष्मीं शैलसुतां विधेस्तु दयितामिन्द्रं सुरैस्नान् ग्रहान् ।
पुण्यान्स्थावरनिम्नगाश्च मुमुनीन्भूमीपां कुलस्यांबिकां
तात मातग्मादरेण वटवे भूयात्सदा मङ्गलम् ॥९२॥
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव नागबलं चन्द्रबलं तदेव ।
विद्याबलं दैवबलं तदेव सीताफ्तेर्यत्स्मरणं विधेयम् ॥९३॥
इति नानामंगलवाद्यैस्तूर्यघोषैर्मनोहरैः । ॐकारघोषैः स गुरुर्मुमोचांतःपटं तदा ॥९४॥
ततस्तं राघवस्याङ्के निवेश्य हवनादिकम् । विधिं कृत्वाय कौपीनं दण्डं चाथ कमण्डलुम् । ९५॥
बबन्धौदी रुक्मजां मौञ्जीं बबन्धेणाजिनं तदा । ततः कुशाय स गुरुर्गायत्रीमुपदिश्यरात् ॥९६॥
ब्रह्मचर्यव्रतादीनि स कुशायापदिश्यवान् । कुव्वोक्तावोघेता श्वीच कुर्यादाचमनं तथा ॥९७॥

लगवाओ और जगह-जगहपर ध्वजा आरोपित करो। सुवर्णकी वेदियाँ बनवायी जावें ॥ ८२ । ८३ ॥ इनके
सिवाय भी जो-जो बात तुम्ह मालूम हो और मैंने न बतलायी हो, उन्हें भी ठीक कर देना ॥ ८४ ॥ इस प्रकार
रामकी बात सुनकर 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर लक्ष्मण चल गये और रामने जैसा बतलाया था, वह सब
प्रबन्ध कर दिया ॥ ८५ ॥ जिस दिन मुहूर्त था, उस रोज उबटन लगाकर उन कुमारों तथा सीता और
भाइयोंके साथ रामने स्नान किया। नाना प्रकारके वस्त्र-अलंकारोको पहन । ब्राह्मण तथा निमन्त्रणमें
आय हुए ऋषियोंका पूजन करके पुण्याहवाचन नान्दीश्राद्ध, देवताओंकी स्थापना आदि कार्य गृहकी
और नगाडेके मङ्गलमय निनादके साथ राम तथा सीताने सम्पादित किय ॥ ८६-८८ ॥ इसके बाद सातों
द्वीपोंके करोड़ों राजे तथा ऋषि अपने-अपने परिवार एवं वाहनाके साथ वहाँ आ पहुंच। उन लोगोसे सारी
अयोध्या भरकर बड़ी सुन्दर मालूम पड़ने लगी। पञ्चोपवीत मुहूर्तके अवसरपर बहुतसे ब्राह्मणोके साथ
बसिष्ठजी राम ओर कुशके मध्यमे एक सुन्दर कपड़ेका पर्दा बाँधकर मांड़े तथा स्पष्ट स्वरमें मङ्गलपाठ
करने लगे ॥ ८६-६१ ॥ उन मङ्गलमय श्लोकोंका अर्थ इस प्रकार है-गणेश, सरस्वती, शिव, ब्रह्मा, विष्णु,
लक्ष्मी, पार्वती, ब्रह्माणी, इन्द्र, समस्त देवता, सम्पूर्ण ग्रह, पवित्र पर्वत तथा नदियाँ, अच्छे-अच्छे ऋषि, अपनी
कुलदेवी तथा माता पिता इन सबको प्रणाम करके आपलोग प्रार्थना करें कि जिस बच्चेका यज्ञोपवीत संस्कार
होनेवाला है, उसका कल्याण हो ॥ ९२ ॥ वही लग्न लग्न है, वही दिन दिन है, वही विद्याबल तथा दैवबल
है, जिसमें सीतापति रामचन्द्रका स्मरण किया जाय। ९३ । इस तरह विविध प्रकारके मङ्गलमय मन्त्रोंका
पाठ करके गुरु वसिष्ठने ॐकार शब्दके साथ पर्दा डाल दिया। तदनन्तर वसिष्ठने लव-कुशको रामकी गोदमें
बिठाकर हवनादि विधियोंको सम्पन्न किया । इसके अनंतर कुशका मुञ्जक तागस बनी करधनी पहनायी,
मृगचर्म बाँधा और कौपीन पहनायी । फिर उस ब्रह्मयज्ञ कराके वसिष्ठजीने कुशको गायत्री मन्त्रका उपदेश
दिया । ६४-९६ ।। फिर ब्रह्मचर्यव्रतके नियम आदि बतलाते हुए कहने लगे कि शास्त्रोम जो नियम बतलाये

सर्गः ९ ] उत्तरकाण्डम् २४१


दन्तान् जिह्वां विशोध्याथ कृत्वामलविशोधनम् । स्नात्वाऽऽप्यैर्वर्तयेन्मन्त्रैः प्राणानायम्य यत्नतः ॥९८॥
उपस्थानं रवेः कृत्वा संध्ययोरुभयोरपि । अग्निकार्यं ततः कृत्वा ब्राह्मणानभिवादयेत् ॥९९॥
अमुकशर्मन्गोत्रोऽहमभिवादय इत्यपि । धारयेन्मेखलां दण्डापवीताजिनमेव च ॥१००॥
अनिन्द्यं चरेद्भैक्ष्यं ब्राह्मणेभ्याऽमत्सये । वाग्यतो गुर्वनुज्ञातो भुञ्जीतान्नमकुत्सयन् ॥१०१॥
एकान्नं च समश्नीयाच्छ्राद्धेऽश्नीयान्नचाऽऽपदि । द्विवारं नैव भुञ्जीत दिवा कापि द्विजोत्तमः ॥१०२॥
सायंप्रातर्द्विजोऽश्नीयादग्निहोत्रविधानवित् । मधु मांसं प्राणिहिंसां नास्तङ्गलोकनं जले ॥१०३॥
स्त्रियं स्पृष्टिनोच्छिष्टं परिवादं विवर्जयेत् । यथेष्टचेष्टो न भवेद्गुरोर्नयनगोचरे ॥१०४॥
न नाम परिगृह्णीयात्परोक्षेऽप्यविशेषणम् । गुरुनिन्दा भवेद्यत्र परिवादस्तु यत्र च ॥१०५॥
श्रुती विधाय स्थातव्यं गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ।
न मात्रा न पितुः स्वस्रा न स्वस्रैकान्तवांस्तथा ॥१०६॥
बलवंतीन्द्रियाण्यत्र मोहयन्त्यपि कोविदान् । एवमादीन्यनेकानि ब्रह्मचारिव्रतानि हि ॥१०७॥
तस्मै गुरुरुपदिश्य ददौ दानान्यनेकशः । भोजयामास तं मात्रा सह मानोत्सवैस्तदा ॥१०८॥
कारयित्वाऽथ पालाशपूजनं विधिवत्पूर्वकम् । तेनापि कुशहोत्रेण देवकस्य विसर्जनम् ॥१०९॥
चकार राघवश्चैव सीतया स गुरुस्तदा । ततो रामो नृपतिभिर्जनकेनापि पूजितः ॥११०॥
चकार धनवस्त्राद्यैस्तुष्टान् विप्रान्नृपादिकांन् । आचांडालांन्सदा रामस्तोषयामास सादरम् ॥१११॥
एवं नानामहोत्सवैर्यन्मासमेकं विनाय सः । रामो विसर्जयामास तत्रत्यान्नृपार्थिकादिकान् ॥११२॥
एवं कालांतराद्रामो व्रतबंधं लवस्य च । चकार पूर्ववत्सर्वान्समाहूय नृपादिकान् ॥११३॥


गये हैं, उनके अनुसार शौचसे निवृत्त होकर दाँत तथा जीभ साफ कर लेनेके बाद वरुण दैवत्य से सम्बन्ध रखनेवाले मन्त्रोंका पाठ करता हुआ स्नान करे । फिर आचमन-प्राणायामादि करके दोनो समयको सूर्यका उपस्थान करना चाहिये । इसके पश्चात् हवन करके ब्राह्मणोंका प्रणाम करे ॥ ९७-९९ ॥ प्रणाम करते समय यह भी कहना जाय कि अमुक नामका अमुक व्यक्ति मैं आपको प्रणाम करता हूँ । उच्च जातिके लोगों अथवा जहाँतक हो सके, सुपात्र ब्राह्मणोंके यहाँसे भिक्षा माँगकर अपनी जीविका चलाय । किसीकी निन्दा न करे तथा मौनव्रतका पालन करे और जब गुरुकी अनुमति मिल जाय, तभी भोजन करे ॥ १०० ॥ १०१ ॥ सदा केवल एक समयका भोजन करे । श्राद्धोंमें तथा किसी आपत्समय कायक आ आनेपर भी दिनमें दो बार भोजन न करे । ब्राह्मणको चाहिये कि केवल सुबहशाम भोजन करे । मधु तथा मांसका आहार, प्राणिहिंसा, जलमें सूर्यके प्रतिबिम्बका दर्शन, स्त्रीप्रसंग, बासी और जूठा भोजन तथा दूसरेकी निन्दा इन कामोंको छोड़ दे । गुरुके सामने अपने इच्छानुसार जो चाहै, सो न कर डाल ॥ १०२-१०४ ॥ परोक्षमें भी बिना विशेषण लगाये गुरुका नाम न ले । जहाँपर गुरुकी निन्दा हो रही हों अथवा उनकी ठठोली की जाती हो, वहाँ कान ढांककर बैठे या वहाँसे उठ जाय । अपनी माता, बुआ अथवा बहिनके साथ भी एकान्तमें न बैठे ॥ १०५ ॥ १०६ ॥ क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं। वे बड़े बड़े पण्डितोंको भी बातकी बातमें विचलित कर देता है। इस प्रकार गुरुने बहुतसे ब्रह्मचर्य व्रतसम्बन्धी नियम बतलाये ॥ १०७ ॥ इसके अनन्तर अनेक तरहके दान दिये गये । कुशको माताके साथ भोजन कराया गया ॥ १०८ ॥ तब विधिवूर्वक पलाशका पूजन कराया । फिर कुश, होता तथा रामके द्वारा आहूत देवताओंका पूजन कराया ॥ १०९ ॥ इसके बाद बहुतसे राजाओं तथा जनकजीने रामका पूजन किया । रामने बहुतसे धन-वस्त्रों द्वारा आये हुए राजाओं तथा ब्राह्मणोंको प्रसन्न करके अयोध्यानिवासी चाण्डालसे लेकर ऊँचसे ऊँचे कुल तकके लोगोंको आदर प्रसन्न किया ॥ ११० ॥ १११ ॥ इस तरह नाना प्रकारके उत्सवोंके साथ एक महीनेका समय बिताकर मेहमानीमें आये हुए राजाओं और ऋषियोंको विदा किया ॥ ११२ ॥ कुछ समय बीतनेके बाद उसी तरह कुशकेही

२४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

ततस्तौ बालकौ रम्यौ वेदाध्ययनमुत्तमम् । चक्रतुर्गुरुसन्निधौ विधिवद् द्विसत्तमौ ॥११४॥
एवं तेषां तु बालानां सर्वेषां रघुनन्दनः । व्रतबन्धविधानानि यथाकाले महोत्सवैः ॥११५॥
चकार गुरुणा विप्रैः समाहूय नृपादिकान् । विशेषं निजपुत्राभ्यां चकार स महोत्सवैः ॥११६॥
अकरोदधिकं किञ्चिन्न न्यूनमकरोद्विभुः । ततस्ते बालकाः सर्वे ब्रह्मचर्यव्रते स्थिताः ॥११७॥
चक्रिरे गुरुसान्निध्ये वेदाध्ययनमुत्तमम् । अथ रामोऽपि तैर्दृष्ट्वा बालकैः परिवारितः ॥११८॥
विरेजे स्कन्दगणपादिभिर्देव्यै यथा शिवः । अथ ते बालकाः सर्वे कृत्वाऽध्ययनमुत्तमम् ॥११९॥
वेदादीनां गुरुस्यानुज्ञया ज्ञानं गुरोस्ततः । जग्मुस्तीर्थानि वै कर्तुं सेनया गुरुवह्निभिः ॥१२०॥
पृथिव्यां भरते खण्डे यानि तीर्थानि यानि ते । कृत्वा समाप्त्यैः पञ्च मासैः स्वां नगरीं शनैः ॥१२१॥
बालान्समागताञ् श्रुत्वा शोभयित्वा निजां पुरीम् ।
प्रत्युज्जगाम सौमित्रिः पुरस्कृत्याथ वारणम् ॥१२२॥
ते दृष्ट्वा लक्ष्मणं नेमुस्तेनालिङ्गिता अपि । नानोत्सवैर्ययुर्हत्वा अयोध्यायां गृहं प्रति ॥१२३॥
मार्गे मार्गे पुरस्त्रीभिः सौधस्थाभिस्तु वर्षिताः । वृष्टिभिः कुसुमादीनां दीपैर्नीराजिता अपि ॥१२४॥
ततस्ते बालकाः सर्वे सभायां रघुनन्दनम् । नेमुस्तेनालिङ्गिताश्च ययुः सीतागृहं ततः ॥१२५॥
एतस्मिन्नन्तरे सीतोर्मिला माण्डवी तथा । श्रुतकीर्तिश्च वेगेन चक्रुर्नीराजनं पृथक् ॥१२६॥
दध्योदनैर्यवार्दिद्यैः पक्वान्नैस्तैलपाचितैः । सर्षपैर्लवणैर्माषैस्तोयकुम्भैश्च सादरम् ॥१२७॥
ततस्ते बालकाः सर्वे नेमुः सीतां पृथक् पृथक् ।
ततो नेमुः स्वमातॄंश्च पश्चा नत्वा पितामहीः ॥१२८॥
ततस्ते बालकाः सर्वे ददुर्दानान्यनेकशः
ब्राह्मणान् भोजयामासुः कोटिशस्ते पृथक् पृथक् ॥१२९॥


साथ सब लोगोंको बुलाकर लवका यज्ञोपवीतसंस्कार किया ॥११३॥ फिर वे दोनों बालक गुरु वसिष्ठके पास विधिपूर्वक वेदाध्ययन करने लगे । इसी रीतिसे रामचन्द्रने समय-समयपर लक्ष्मण भरत आदिके बच्चों-का भी व्रतबन्ध-संस्कार कराया और अपने लड़कोंसे बढ़कर उत्सव-दानादि किये । उसमें किसी प्रकारकी न्यूनता नहीं होन दी वे बच्चे भी संस्कृत होकर विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यके नियमोंका पालन करते हुए गुरुके पास वेदाध्ययन करने लगे। यह सब ही ज्ञानके साथ-साथ सदा पुत्रोंके साथ बैठे हुए रामचन्द्रजी पार्वती, गणेश तथा स्वामिकार्तिकेयके साथ बैठे शिवजीके सदृश सुन्दर लगते थे । इसके बाद सब उन बालकोंने अच्छी तरह विद्याध्ययन कर लिया तो एक विशाल सेना, गुरु तथा कितने ही मन्त्रियोंको साथ लेकर तीर्थयात्रा करनेको निकले ॥११४-१२०॥ पृथ्वीके भरतखण्डमें जितने तीर्थ हैं, उन करके पांच महीनेमें वे सब बालक अयोध्या वापस आ गये ॥१२१॥ लक्ष्मणने जब सुना कि लड़के तीर्थयात्रासे अयोध्या लौट आये हैं तो बहुतसे बाजे-गाजे तथा हाथीयोंको साथ लेकर अगवानी करने गये ॥१२२॥ जब उन्होंने लक्ष्मणको देखा तो मस्तक झुका-झुकाकर प्रणाम किया और लक्ष्मणने उनको अपनी छातीसे लगा-लगाकर आलिंगन किया । फिर अनेक प्रकारके उत्सवोंके साथ उनका महलोंमें ले चले । रास्तेमें अयोध्याकी नारियां अट्टारियोंपर चढ़-चढ़कर उनपर फूलोंकी वर्षा करतीं और आरती उतारती थीं । इसके बाद बालकोंने राजदरबारमें जाकर रामको प्रणाम किया और वहाँसे सीताके महलोंको गये । वहाँ पहुंचनेपर सीता, उर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकीर्तिने अलग-अलग उन बालकोंकी आरती उतारी पक्वान्न, दही, भात तैलके बने पक्वान्न, सरसों, नमक, उड़द तथा पानी भरे कलश आदि हरकाफर बलि दी गयीं। इसके बाद उन सबोंने कौशल्या आदि तथा पिता और भाइयोंको प्रणाम करके सीता आदि माताओंको प्रणाम किया ॥१२३-१२८॥ इसके बाद उन बालकोंने भाँति-भांतिके दान दिये और अलग-अलग करोड़ों ब्राह्मणोंको भोजन कराया।