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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ९ ] विवाहकाण्डम् १७९

सर्गः ९ ] विवाहकाण्डम् १७९

अथ सप्त कुमारांश्च लवाद्याः स्वस्ववेश्मनि । पत्न्यः क्रीडां पृथक् सौख्यां कुर्वन्प्रियाऽकरोत् ॥१३॥
चंपिकायां दुहितरः कुशजाताः शुभा नव । कुशस्याग्रे कुमुद्वत्यां भविष्यंस्त्वष्ट सूनवः ॥१४॥
भविष्यति नृपा कन्या ज्येष्ठा चंपकमालिनी । कुशेन्द्रः कुशलोचेति विश्रुतिं नाम्ना राज्यं करिष्यति ॥१५॥
चतुर्दश सुमात्याद्याः स्त्रियः सर्वाः क्रमेण हि । सुषुवुस्तनयानष्ट कन्येकाऽपि पृथक् पृथक् ॥१६॥
स द्वादशशतं पौत्रान्पौत्रीश्चैव मनोरमाः । त्रयस्त्रिंशद्रामचन्द्रो लालयामास सीतया ॥१७॥
कुमुद्वतीभाविसुपुत्रसहिताः शिशवः शुभाः । विंशच्छामावसने तथा षोडशचण्डिकास्तथाः ॥१८॥
बहूविद्यन्निताश्रासन समाश्लेषाद्विते नृपैः तथा श्भागम्पौत्रैश्च नृपकन्या अनेकशः ॥१९॥
काश्चित्स्वयंवरैरेव काश्चिद्राक्षसयोगतः । काश्चिद्गान्धर्वयोगेन काश्चिद्देवैस्तुकर्मणा ॥२०॥
परिणीताः पौरुषेण तासां संख्या न विद्यते । तासां हि संततिं वक्तुं कः समर्थो भवेदिह ॥२१॥
एवं स युपकेतोश्च विवाहश्चम. शुभः । सपद्य नारदः श्रीयामश्चभार्यां रघुनन्दनम् ॥२२॥
रामनामसहस्रेण संगीतैनानभालकृतः । मुक्त्वा अगत्य पृष्टा ययावाकाशवर्त्मना ॥२३॥
श्रीरामदास उवाच
एवं रामण साकेतपुर्यां भोगाश्चिरं सुखम् । भुक्तास्तेषां वर्णनेऽद्य कः समर्थो भवेन्नरः ॥२४॥
एक एव समर्थोऽभूद्वाल्मीकिस्तपसां निधिः । शतकोटिमितं येन नानालीकादिभिर्युतम् ॥२५॥
वर्णितं रामचरितं महामंगलकारकम् । यत्स्मृत्याऽपि मया किंचिच्छ्रेयो वर्णितम् ॥२६॥
एव समस्त्र्यवस्थाया पुतैः पौत्रैः समन्त्रितः । प्रपौत्रै पौत्रपौत्रैश्च रञ्जयामास जानकीम् ॥२७॥
एवं विवाहकाण्डं च शिष्य मया परिवर्णितम् । समग्रं पवित्रं च श्रवणान्मंगलप्रदम् ॥२८॥
विवाहकाण्डं परमं ये शृण्वन्तीह मानवाः । न तेषांभः पुत्रपौत्रैश्च वियोग नाप्नुवंति हि ॥२९॥

सम्पादियोंका धन आदि देकर पूजा की और स्वेच्छा अपने घर जानेकी अनुमति दी ॥१२॥ इसके बाद लव आदि सातो भाई अपना-अपना स्त्रियोंके साथ अपने-अपने महलमें विहार करने लगे और कुश अपनी स्त्री चम्पिकाके साथ केलि करने लगे ॥१३॥ इस तरह कुश प्रिया चम्पाके द्वारा चम्पिकानाम नौ कन्यायें उत्पन्न कीं। कुमुद्वतीसे आठ पुत्र और चम्पकमालिनी नामक एक पुत्रीका सादृश्य उत्पन्न होगी। कुशका सबसे बड़ा पुत्र अतिथि अयोध्याका राज्य करेगा ॥१४।१५॥ इसके सिवाय सुमति आदि चौदह स्त्रियोंने क्रमशः आठ-आठ पुत्र और एक-एक कन्यायें उत्पन्न कीं ॥१६॥ इस तरह राम सीताके साथ बारह सौ पौत्रों तथा तैंतीस सुंदर पौत्रियोंका प्रतिपालन करने लगे ॥१७॥ इस प्रकार कुमुद्वतीके भावी पुत्रो पौत्रांको भी मिलाकर बीस सौ पौत्र और चौबीस पौत्रियां हुईं ॥१८॥ जिनको रामने अच्छे-अच्छे राजाओंके साथ विवाह कर दिया और रामके पौत्रोंका विवाह जनक राजकुमात्रियोंके साथ हुआ ॥१९॥ उससमय कुछ कुमारियां स्वयंवरसे आयीं, कुछ राक्षसविवाहसे, तथा कुछ गान्धर्वविवाहसे विवाहमें आयी और उनका शुभ विवाहसम्बन्ध हुआ ॥२०॥ इसके सिवाय पौत्रोंके गुणवान पुत्रादि मणिकूट नामक महलोंमें आयीं, जिनकी कोई संख्या ही नहीं है। ऐसी स्थितिमें उनका सन्तानोका कौन गिन सकता है ॥२१॥ इस प्रकार यूथकेतुका अन्तिम शुभ विवाह सम्पन्न हो जानेपर नारदने समाप्त सुनकर फिर रामचन्द्रनामसे युक्त प्रीतिपूर्वक रामकी स्तुति करके जानेकी आज्ञा मांग ली और आकाशमार्गसे चले गये ॥२२।२३॥ श्रीरामदासने कहा- इस तरह रामने बहुत समय तक सुख भोगा, उसका वर्णन करनेमें कोई भी प्राणी समर्थ नहीं हो सकता ॥२४॥ बस एकमात्र तपस्वी वाल्मीकिजी इसके वर्णनमें समर्थ हुए थे जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें नाना प्रकारकी कथाओं सहित रामचरित्रका वर्णन किया। यह रामचरित परम मङ्गलात्मक है। इसका स्मरण करके ही मैं तुम्हारे समक्ष कुछ कहनेमें समर्थ हुआ हूँ ॥२५।२६॥ इस प्रकार राम अपनी वयोवृद्धावस्था में पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र एवं प्रपौत्राके पुत्रोंके साथ रहते हुए सीताको आह्लादित करते रहे ॥२७॥ हे शिष्य ! इस तरह मैने नौ सर्गयुक्त पवित्र विवाहकाण्डका वर्णन किया, जो सुननेमें सर्वथा मङ्गलदायक है ॥२८॥

३८० आनन्दरामायणे [सर्गः ९

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्मं धनार्थी धनमाप्नुयात् । कामनार्थी लभेत् कामान् मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ॥ ३०॥
स्त्रीकामुकैरयं नित्यं पठनार्थं प्रयत्नतः । विवाहकाण्डं परमं प्राप्नुयुश्चात्र ते वधूः ॥ ३१॥
पतिकाम्या कुमारी चेच्छृणुयाद्भक्तिभाविता । विवाहकाण्डमेतद्वै मनोज्ञं पतिमाप्नुयात् ॥ ३२॥
ममार्थं यः पठेदेतच्छृणुयाद्वाऽथ भक्तितः । इह स्त्रिया सुखं भुक्त्वाऽप्सरोगोष्ठ्या दिवि मोदते ॥ ३३॥
सधवा शृणुयादेतद्या नारी कांतमुत्तमम् । विवाहकाण्डं कुत्रचित्तं वियोगं नाप्नुयात्तु सा ॥ ३४॥
सप्तदशदिनैरस्य कार्यं स्त्रीकामुकैर्मुहुः । अनुष्ठानं वर्षमेकं शृण्वन्नपि स्त्रियमाप्नुयात् ॥ ३५॥
प्रथमे दिवसे सर्गं पठेद्द्वाँ च परschemaऽहनि । त्रयमेव दिने सर्गान्क्रमेण संपठेन्नव ॥ ३६॥
दशमे दिवसेऽष्टैव ह्येकमेकेन वै क्रमात् । एवं सप्तदशाद्दिनैरनुष्ठानं स्मृतं बुधैः ॥ ३७॥
अथवा सकलं काण्डं प्रथमे दिवसे पठेत् । परेऽह्नि द्विगुणं हि नवमे दिवसे क्रमात् ॥ ३८॥
नववारं पठेतच्चेद् दशमे दिवसे ततः । अष्टवारं पठेत्तावद् ह्ययमेकेन क्रमान्नृपः ॥ ३९॥
एवं नरो वर्षमेकमुणुनानांस्त्रियं लभेत् । विमलबक्त्रां च सुनासां दिव्यरूपों मनोहराम् ॥ ४०॥
विवाहकाण्डं परमं पवित्रमानन्ददं मङ्गलकारकं च ।
स्त्रीदं मनोज्ञं श्रुतिसौख्यदं वै नरैः सदा सश्रवणीयंमेतत् ॥ ४१॥
आनन्दरामायणमध्यसंस्थं विवाहकांडं परमं हि रम्यम् ।
शृण्वंति भक्त्या भुवि मानवास्ते लभन्ति कामानखिलान्मनोऽज्ञान् ॥ ४२॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे राज्यवर्णनो नाम नवमः सर्गः ॥ ९॥
विवाहकाण्डस्य सर्वानन्दरामायण सर्वज्ञ ज्ञायतय । पञ्चशताष्ट संख्या श्लोकाश्चाप्युत्थिनाः ॥ १ ॥

जो मनुष्य विवाहकाण्डका श्रवण करते हैं, वे अपना गया हुआ पुत्र, धन व कार्य में निपुण नेहा ज्ञान ॥ २९ ॥
इसका सुननेसे धर्मार्थी धर्मको, धनार्थी धनको, काम कामको और मोक्षार्थी मोक्षको प्राप्त करता है ॥ ३० ॥ जो
लोग स्त्रीकी इच्छा रखते हों, उन्हें चाहिये कि निरन्तर इस विवाहकाण्डका पाठ किया करें। इससे उन्हें स्त्री
अवश्य प्राप्त होगी ॥ ३१ ॥ अच्छे पतिकी कामना इच्छा रखनेवाली कुमारी यदि भक्तिपूर्वक इस काण्डको सुने
तो सुन्दर पति पावेगी ॥ ३२ ॥ जो सम्यक् रूप मनुष्य इस काण्डको पढ़ता या सुनता है सो वह इस जन्ममें स्त्रीके
साथ सुख भोगकर स्वर्गमें अप्सराओके साथ विहार करता है ॥ जो सधवा नारी इस काण्डको सुनती है वह
कभी पतिवियोगका दुःख नहीं पाती । जो लोग स्त्री चाहते हों वे सत्रह दिनमें इस आवृत्तिके क्रमसे एक वर्ष
पर्य्यन्त अनुष्ठान करें ऐसा करनेसे मूढ मानव भी स्त्री प्राप्त कर सकता है ॥ ३३-३५ ॥ उसका क्रम इस तरह
है- पहिले दिन एक सर्ग, दूसरे दिन दो सर्ग तीसरे दिन तीन सर्ग इस क्रमसे नवें दिन नौ सर्गोंका पाठ करे।
फिर दसवें दिन आठ सर्ग और ग्यारहवें दिन सात सर्ग इस एक-एक घटाता हुआ सत्रह दिनमें पूर्ण करे। विद्वा-
नोंने यही अनुष्ठानकी विधि बतलाई है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ अथवा बन पड़े तो पहिले रोज विवाहकाण्डका एक बार
पाठ कर जाय, दूसरे रोज दो बार, तीसरे रोज तीन बार, इस रीतिसे बढ़ाता हुआ नवमें दिन नौ बार इस
काण्डका पाठ करे और ग्यारहवें रोज सात बार इस विधानसे घटाता हुआ सत्रहवें दिन
केवल एक बार पाठ करे ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ इस तरह एक वर्ष तक अनुष्ठान करनेसे वह चन्द्रमाके मुखी, अच्छी
नासिका और दिव्य रूपवाली मनोहर स्त्री पाते हैं ॥ ४० ॥ लोगोंको चाहिए कि इस परम पवित्र, आनन्ददायक,
द्युतिसुखदायी तथा आनन्द देनेवाल विवाहकाण्डको नित्य पढ़कर ॥ ४१ ॥ आनन्दरामायणके अन्तर्गत इस छरे
विवाहकाण्डको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनते हैं वे अपनी सब कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४२ ॥ इति श्रीम-
त्काशिनाथचरणकमलार्त्त श्रीमदानन्दरामायण वाङ्मयकार्यं... रामतेजपाण्डेयविरचित ज्योत्स्ना भाषाटीका-
सहिते विवाहकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
इस विवाहकाण्डमें कुल नौ सर्ग हैं और उनमें पाँच सौ दस मा श्लोक कह गये हैं ॥ १ ॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डं समाप्तम् ।

श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽलंकृतम्

राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्)

प्रथमः सर्गः

( रामसहस्रनाम )

विष्णुदास उवाच

रामदास गुरो प्रोक्तं त्वया पूर्वं ममांतिके । विवाहकाण्डचरमसर्गेऽत्र पातकापहे ॥ १ ॥
रामनामसहस्रेण नारदेन महात्मना । सूर्यलोके सभायां स रामचन्द्रः स्तुतस्त्विति ॥ २ ॥
तत्कीदृशं रामनामसहस्रं मां प्रकाशय । कथं सूतेन कथितं मुनीनामग्रतः पुरा ॥ ३ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक्पृष्टं त्वया शिष्य सावधानेमनाः शृणु । रामनामसहस्रं च सुश्लोकं प्रवदामि ते ॥ ४ ॥
यथा त्वया कृतः प्रश्नः शौनकेन तथा कृतः । सूतः प्राह तदाकर्ण्य शौनक नैमिषे वने ॥ ५ ॥

श्रीसूत उवाच

एकदा सुखमासीनौ पार्वतीपरमेश्वरौ । अन्योन्याश्लिष्टहृद्वाहू लोकरक्षणतत्परौ ॥ ६ ॥
इन्द्रादिलोकपालैश्च सेवितौ च परात्परौ । पार्वती परिपप्रच्छ तदा धर्माननुक्रमात् ॥ ७ ॥

पार्वत्युवाच

मन्नाथ जगतो नाथ सर्वज्ञ परमेश्वर । त्वत्प्रसादान्मया ज्ञातं धर्मशास्त्रमनुत्तमम् ॥ ८ ॥
प्रायश्चित्तं तु पापानां श्रुतं सर्वमशेषतः । ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं वक्तुमर्हसि ॥ ९ ॥


विष्णुदासने कहा—हे गुरो रामदास अभी अभी आप मुझसे कह चुके हैं कि पातकोंको नष्ट करनेवाले विवाहकांडमें नारदने सुलोक रामसहस्रनामक सभायें रामचन्द्रजीकी स्तुति की थी ॥ १ ॥ २ ॥ वह रामसहस्रनाम कैसा है और किस प्रकार सूतजीने मुनियोंके समक्ष उसे प्रकट किया था। सो आप मुझसे कहें ॥ ३ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है, सावधान चित्त होकर सुनो ! मैं तुम्हे सूतका कहा हुआ रामसहस्रनाम सुनाता हूँ । आज जिस तरह तुम मुझसे पूछ रहे हो, उसी तरह शौनकन सूतजीसे पूछा था । उनका प्रश्न सुनकर नैमिषारण्यम सूतजीने शौनकसे कहा—एक समय कैलासमें तत्पर शिव और पार्वती गलबहियाँ डाले हुए आनन्दपूर्वक बैठे थे ॥ ४-६॥ सर्वश्रेष्ठ देवता शिव और पार्वतीकी सेवामें इन्द्रादि लोकपाल उपस्थित थे उस समय शिव-पार्वतीमें कोई धार्मिक चर्चा चल रही थी । समय पाकर पार्वती ने शिवजी से कहा-हे हमारे प्रभु जगत्के प्रभु, सर्वज्ञ एवं परमेश्वर ! आपकी कृपासे मैने समस्त धर्मशास्त्र जान लिया। पापोंका प्रायश्चित्त किस तरह हो सकता है, सो भी सुन चुकी ।

१८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

श्रीमहादेव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत् । सनत्कुमारविघ्नेशसंवादं पापनाशनम् ॥१०॥
उपविष्टं गणाध्यक्षमेकान्ते प्रणिपत्य च । सनत्कुमारः पप्रच्छ सर्वधर्मविदां वरम् ॥११॥

सनत्कुमार उवाच
भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वविघ्नविनाशन । द्विजहत्याहरं धर्मं वक्तुमर्हसि मे प्रभो ॥१२॥
विना भवन्तं धर्मस्य वक्ता नास्ति जगत्त्रये ।

श्रीगणेश उवाच
साधु पृष्टं त्वया ब्रह्मन्सर्वलोकोपकारकम् ॥१३॥
मया चिरं कृतं कर्म स्मारितं भवताऽनघ पुराऽहं गजरूपेण जातः पर्वतसन्निभः ॥१४॥
रुतो वृक्षान्समुत्पाट्य मुनिहिंसां समारभम् । तदा मया मुनिगणा निहता बहवो बलात् ॥१५॥
हाहाकारो महानासीद्ब्राह्मणानां समन्ततः । तदा ह्यत्याहृतेन चेष्टितः पतितोऽस्म्यहम् ॥१६॥
निःसंज्ञं मृततुल्यं मां पतितं वीक्ष्य मे पिता । अराधयज्जगतामीशं रामं सर्वहृदि स्थितम् ॥१७॥
प्रत्यक्षमकरोद्देवं मद्हेतो रघुनन्दनम् । तदा प्रोवाच भगवान् श्रीरामः पितरं मम ॥१८॥

श्रीराम उवाच
प्रसन्नोऽस्मि महादेव किं मां प्रार्थयसे प्रभो दास्यामि यदभीष्टं ते त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥१९॥

श्रीमहादेव उवाच
द्विजहत्यासमाविष्टं मम पुत्रमिमं प्रभो । निष्पापं कुरु देवेश यद्यस्ति मयि ते दया ॥२०॥

श्रीगणेश उवाच
तथेत्युक्त्वा तदा तेन कृपादृष्ट्याऽहं निरीक्षितः । तत्क्षणाल्लब्धचैतन्यो निर्मलज्ञानबुद्धिदः ॥२१॥
बहुभिर्गद्यपद्यैश्च स्तुत्वा तं प्रणतोऽभवम् ।

अत आप मुझपर कृपा करके ब्रह्महत्यादि महापापोंके निष्कृतिका कोई उपाय बतलाइए। श्रीशिवजी बोले—
हे देवि ! मैं तुम्हें अतिशय गुह्य तथा पापनाशक सनत्कुमार और गणपति का सम्वाद सुनाता हूँ ॥ ७-१० ॥ एक
समय जब कि गणेशजी एकान्तमे बैठे हुए थे तब सनत्कुमारने जाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा-हे
भगवन् ! समस्त धर्मोंको जाननेवाले तथा विघ्नके विनाशक हे प्रभो मुझ ब्रह्महत्याका विनाश करनेवाला
कोई कर्म बतलाइए ॥ ११ । १२ ॥ आपके सिवाय तथा लाख्या कोई सा धमका वक्ता मुझे नहीं दीखता ।
गणपतिने कहा-हे ब्रह्मन् ! तुमने मुझसे बहुत ठीक प्रश्न किया है। इससे सारे संसारका उपकार होगा ॥ १३ ॥
तुमने एक ही बातसे पूर्वमे किये हुए मेरे सब कर्मोका स्मरण दिला दिया है। पूर्वकालमे मैं गजरूपसे संसारमें
जन्मा था और पर्वतकी भाँति लम्बा चौड़ा मेरा डील डौल था । १४ । उस समय मैने पहले तो बहुतसे वृक्ष
उखाड़े । फिर मुनियोंकी हिंसा आरम्भ कर दी। मैने अपने अपरिमय बलसे कितन ही मुनियोंका बघ कर
पापी बन बैठा ॥ १५ । १६ ॥ मेरे होश-हवास ठिकाने न रह तथा एक मृतककी नाईं मेरी आकृति हो गयी ।
मेरी दशा देखकर मेरे पिताने संसारके महाप्रभु रामकी आराधना की, इससे प्रसन्न होकर रामचन्द्रजी मेरे पिता-
के सम्मुख आये और कहने लगे। रामचन्द्रजी बाले हे महादेव ! मै तुम्हारे ऊपर अति प्रसन्न हूँ । बतलाओ,
तुम किसलिए इस प्रकार मेरी प्रार्थना कर रहे हो ? तुम्हारा कामना यदि तीन लोकमे दुर्लभ होगा तो भी मै
उसे पूर्ण करूँगा ॥ १७-१९ ॥ श्रीशिवजीने कहा-हे प्रभो ! मेरे पुत्र गणेशको ब्रह्महत्या लग गयी है। हे देवेश !
यदि आपकी मुझपर दया हो तो उसे निष्पाप कर दीजिए ॥२०॥ श्रीगणेशजी सनत्कुमारसे कहने लगे-इसप्रकार मेरे
पिताकी बात सुनकर रामचन्द्रने अपनी कृपाभरी दृष्टिसे एक बार मेरी ओर देखा। उनके देखते ही मैं चैतन्य हो
गया। घेरेमें एक निर्मल ज्ञानका प्रकाश संचार हो गया ॥ २१ ॥ तब बहुतसे गद्य-पद्यों द्वारा मैने भगवान्की