श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ६ ] विलासकाण्डम् २७७
सर्गः ६ ] विलासकाण्डम् २७७
उपबर्हणसंस्पृष्टः सीतारामाश्रितो मुदा । हस्त्यश्वोष्ट्रमृगैर्गजदन्तैः कृत्रिमनिर्मितैः ॥ ११॥
हेमरत्नहस्तिदन्तमधुरैर्गजचित्रितैः । क्रीडो मृदुवनेनैव चकार सीतया सुखम् ॥ १२॥
ततः पक्षिगणैः सर्वैः पञ्जरस्थैः समानया । क्रीडां चकार श्रीरामौ दासीभिर्वीजितो मुहुः ॥ १३॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सीतयाऽऽकारिताः पुरः । समावपुर्वरनार्यो ननृतुः शतशस्तदा ॥ १४॥
चक्रुर्गीतं सुस्वरं ताः षड्जस्वरमयन्वितम् । ततस्ताभ्यो ह्यलङ्कारान् दत्त्वा स्वमञ्चितं जनकी १५॥
विसर्जयामास ताः सर्वास्ततो राममब्रवीत् । स्थिता प्रासादपर्येऽद्य कौतुकं द्रष्टुं त्वया ॥ १६॥
द्रष्टुमिच्छाम्यहं राम शीघ्रमुत्तिष्ठ गच्छ । तत्सीतासहितोरामः प्रासादं प्रति नीतया ॥ १७॥
गत्वा दिव्यासने स्थित्वा गवाक्षे रुक्मभूषितेः । रत्नोद्भवकपाटैश्च मुक्ताजालविराजिते ॥ १८॥
राजवीथ्यां दृष्टवान् दृश्यं जनौघौसुकम् । सीतायै दर्शयामास कौतुकानि स राघवः ॥ १९॥
स्वीयदक्षिणहस्तस्य तर्जन्या मुदिताननः । एतस्मिन्नन्तरे दृष्टे द्विजपत्नी तु सीतया ॥ २०॥
दृष्ट्वालङ्कारवस्त्रार्थैर्रहीना कटिपृष्ठायका । गच्छन्ती राजमार्गेण कृशा भिक्षार्थमुद्यता ॥ २१॥
तां तादृशीं निरीक्ष्याथ दास्याह्वय विदेहजा । प्रप्रच्छ भूषणाद्यैस्त्वं किमर्थं रहिता ह्यसि ॥ २२॥
सा प्राह तीर्थयात्रार्थ त्यक्त्वा मां तानकालिना । गतोगेहे गतो भर्ता ततोऽपि जरठो मृतः ॥ २३॥
गुरुगेहेऽवंतिकायां वर्त्तते भ्रातरो मम । न पोषकः कोऽपि गेहेऽधुना सीतेऽस्ति वै मम । २४॥
तस्मान्न सन्त्यलङ्कारावासांसि जनकात्मजे । इति तस्या वचः श्रुत्वा रामरूप सन्निरीक्ष्य सा २५॥
निजालङ्कारवासांसि ददौ तस्यै विदेहजा । ब्राह्मणी सा पुनः प्राह गच्छ त्वं लक्ष्मणं प्रति ॥ २६॥
हेममुद्रा लक्ष्मितस्त्वं गृहाण शमतपा । तथेति जानकी पृष्टा सा ययौ लक्ष्मणं तदा ॥ २७॥
६ ॥ १० ॥ रामकी पीठपर तकिया लगा था और सीता रामके वामभागमें बैठी थीं। वहाँ नकली हाथी, घोड़े, ऊँट मृगी और राजदूत आदिके खिलौने रक्खे हुए थे इनके साथ राम तथा सीताने बहुत देरतक खेल-कूद किया। इनमे बहुतसे खिलौने सुवर्ण, हाथीदाँत एवं रत्नोंके बने हुए थे और उनपर बढ़िया नक्काशी की हुई थी ॥ ११ ॥ १२ ॥ इसके अनन्तर पिंजड़ामें बैठे हुए बहुसंख्यक पक्षियोंके साथ रामने क्रीड़ा की उस समय भी रानियाँ पंखा झल रही थीं ॥ १३ ॥ इसके बाद सीता द्वारा बुलाई हुई बहुसंख्यक नर्तकियाँ आकर वहाँ नाचने-गाने लगीं । १४ ॥ वे सबबार षड्जस्वरमय सुन्दर गीत गा-गाकर बहुत देर तक उन्हें लुभाती रहीं। इसके बाद सीताने उनको बहुतसे वस्त्र-अलंकार आदि देकर विदा किया ॥ १५ ॥ उनको विदा करके सीता रामसे कहने लगीं - आज हमारी यह इच्छा है कि आपके साथ छतपर बैठकर बाजारका कौतुक देखूँ ॥ १६ ॥ उत्तिए और जल्दी चलिए। तदनुसार राम सीताके साथ प्रासादपर गये । १७ । वहाँ एक दिव्य आसनपर बैठकर स्वर्णके बने हुए झरोखोंमें जिसमें विविध प्रकारके रत्नोंके दरवाजे लगे थे और मोतियोंकी झालरें लटकी हुई थीं ॥ १८ । उनमेंसे ही वे राजमार्गके जनसमुदायका कौतुक देखने लगे और सीताको भी दाहिने हाथकी तर्जनी अंगुलीके संकेतसे दिखाने लगे ॥ १९ ॥ इसी बीच सीताने देखा कि एक ब्राह्मणकी पत्नी वस्त्र, अलङ्कारकी त्यागे नङ्गी चली आ रही है। उसकी कमरपर एक बच्चा है, उसकी दुबली-पतली देह है और उसके हावभावसे मालूम पड़ता है कि वह भिक्षा माँगनेके लिए बाजार आयी है ॥ २० ॥ २१ ॥ उसकी यह दशा देखकर सीताने दासी द्वारा उसे अपने पास बुलवाया और पूछा कि तुम इस तरह बिना वस्त्र और आभूषणके हजारमें किसलिए घूम रही हो ? ॥ २२ ॥ उसने कहा कि मेरे पतिदेव घरमें मुझे अकेली छोड़कर तीर्थयात्राके लिए चले गये। मैं अपने पिताकी बड़ी दुलारी बेटी थी । इसलिए अपना घर छोड़कर पिताके पास गयी तो वहाँ पिताजी वृद्धावस्थाके कारण परलोक चले गये थे ॥ २३॥ अवन्तीपुरीम मेरे पिताके कई छोटे छोटे बच्चे अर्थात् मेरे भाई हैं, किन्तु मेरा तथा बच्चोंका पालन करनेवाला इस संसारमें कोई नहीं है २४ ॥ इसी कारण हे जनकात्मज ! मेरे पास वस्त्र और आभूषण नहीं हैं जिन्हें मैं पहनूँ। इस प्रकार उसकी बातें सुनकर सीताने एक बार रामको ओर देखा और अपने सब वस्त्राभूषण उतारकर उस विप्रपत्नीको
| २७८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ६ |
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पूर्वाधिकानलङ्कारान् स्वदेहे जानकी पुनः । दधार दिव्यवासांसि हेमतन्तूद्भवानि सा ॥२८॥
लक्ष्मणं ब्राह्मणो गत्वा सीतावाक्यं न्यवेदयत् । ददौ तस्मै लक्ष्मणोऽपि हेममुद्रास्तथैव सः ॥२९॥
सीतावाक्यानुभूमिता मृषा मेने न तद्वचः । कः समर्थो रामराज्ये मृषां वक्तुं भवेदिति ॥३०॥
अथ सीताऽपि सौमित्रिं स्त्रीदासीप्रेषणेन तदा । अयोध्यायां तदा राष्ट्रे घोषयामास दुन्दुभिम् ॥३१॥
सप्तद्वीपेषु सर्वत्र पूषवच्चेयु सादरम् । काचिन्नारी पुमान् वापि विना सद्भूषणैर्नः ॥३२॥
रत्नक्षारैर्मया ज्ञातो यद्देशे यत्पुरे कदा । तद्राज्ञश्चास्तु मे दण्डो रामस्यापि विशेषतः ॥३३॥
इति मच्छासितं ज्ञात्वा स्वकोशैः सर्ववरन्नृपैः । वस्त्राद्यलङ्कारभूषाभिर्भूषणीया द्विजातयः ॥३४॥
सप्तद्वीपनृपतमयैश्च सीतामुद्दिशितम् । गजदुन्दुभिघोषेण श्रुत्वा चक्रुस्तथैव च ॥ ३५॥
तदारभ्य जगन्त्यां न कश्चिद्दिगतभूषणः । नारी वा पुरुषो वाऽऽसीत् कुत्राप्यवनिजाप्रभात्॥३६॥
एवं नाना कौतुकानि भूम्यां सीताऽकरोद्बहुश अथ रामः सभां गत्वा पुनर्नामे चतुथके ॥३७॥
चकार राजकर्माणि धर्मेणैव स्वबन्धुभिः नटनाटकवेश्यानां कौतुकानि महांसि च ॥३८॥
ददर्श स सभामध्ये स्तुतो मागधवंदिभिः । ततः सर्वान्विसृज्याथ ययौ सीतागृहं प्रभुः ॥३९॥
सायंसन्ध्यादिकं कृत्वा हुत्वा होमं यथाविधि । ततो गन्धादिभि पूज्य ब्राह्मणांश्चापि राघवः ॥४०॥
नानोपहारनैवेद्य दत्त्वा तेभ्यः स्वयं प्रभुः । कुन्जोपहारं श्रीरामः शुश्राव पौराणिकीं कथाम् ॥४१॥
कीर्तनैर्हरिदासानां वेश्यानां नर्तनैरपि पौरोदिताभिर्वार्ताभिर्गायकानां च गायनैः ॥४२॥
सार्धयामां निशां नीत्वा ययौ निद्रास्थलं शनैः । ततो रत्नप्रकृष्टार्थैः स जगाम जानकीं प्रति ॥४३॥
दे दिये और कहा कि तुम लक्ष्मणके पास चले जाओ और उनसे मेरे आज्ञानुसार एक लाख स्वर्णमुद्रा ले लो । 'बहुत अच्छा' कहकर वह ब्राह्मण लक्ष्मणके पास गया ॥ २५-२७॥ इसके अनन्तर सीताने फिर उससे दूने गहने पहन लिये और सुवर्णके तागेसे बने हुए बहुमूल्य सुन्दर वस्त्रोंको भी धारण किया। २८॥ उधर ब्राह्मण लक्ष्मणके पास गयो और सीताजीकी आज्ञा सुनायी । लक्ष्मणने जानकीके कथनानुसार उसे एक लाख स्वर्णमुद्रायें दे दीं ॥२९॥ ब्राह्मणकी बातपर लक्ष्मणको कुछ भी संदेह नहीं हुआ। क्योंकि रामचन्द्रजीके राज्यमें किसका झूठ बोलनेका साहस ही कैसे हो सकता था ॥ ३०॥ इसके पश्चात् सीताने लक्ष्मणके पास एक दासी द्वारा यह कहला भेजा कि मेरी आज्ञासे अयोध्याके समस्त राज्यमें ढिंढोरा पिटवा दो और सातों द्वीप तथा भिन्न-भिन्न देशोंमें भी कहला दी कि कोई स्त्री और पुरुष ऐसा न दिखायी दे कि जिसके शरीरपर बढ़िया वस्त्र और आभूषण न हो ॥ ३१॥ ३२॥ मेरे गुप्तचर इस बातकी टोह लेनेको सर्वत्र घूमते रहें। यदि कहीं किस देश या किस राष्ट्रमें कोई वस्त्र-भूषणविहीन देखा जायगा तो उस देशके राजाको मेरा तथा रामचन्द्रजीका आज्ञाके अनुसार घोर दण्ड भुगतना पड़ेगा । ३३॥ मेरो यह आज्ञा सुनकर सब राजे अपने देशकी प्रजाको अपने खजानेके द्रव्यसे उत्तम वस्त्राभूषण तैयार करवाकर बंटवा दें। समस्त ब्राह्मणादि द्विजातियोंको अच्छे-अच्छे वस्त्र-अलङ्कारोंसे अलंकृत करावें ॥ ३४॥ तदनुसार सातों द्वीपके नृपतिमान राजदुन्दुभि द्वारा घोषित सीताजीकी उस घोषणाको सुन-सुनकर विधिवत् उसका पालन किया ॥ ३५॥ तबसे सीताके अच्छे जगत्तलमें कोई ऐसा मनुष्य नहीं दिखाई देता था, जो सुन्दर वस्त्राभूषण न पहने हो ॥ ३६॥ इस प्रकार सीताजीने पृथ्वीमण्डलमें न जाने कितने कौतुक किये। तदनन्तर चौथे प्रहर रामचन्द्र अपने भ्राताओंके साथ सभाभवनमें गये ॥ ३७॥ वहाँ धर्मपूर्वक राज्यके आवश्यक कार्य सम्पन्न किये। फिर नटोंके नाटक और वेश्याओंके विविध प्रकारके नृत्य देखे, वन्दीजनोंकी स्तुतियां सुनीं और सबको विदा करके फिर सीताजीके भवनको लौट गये ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ शामको सन्ध्यादिक नित्यकृत्य करके विधिवत् हवन किया, गन्धादिक अनेक उपचारोंसे शिवजी तथा ब्राह्मणों- की पूजा की ॥ ४० ॥ उन सबको विविध पकवानोंका नैवेद्य देकर स्वयं भोजन किया। पुराणोंकी कथायें सुनीं। तदनन्तर भगवद्भक्तोंका कीर्तन सुना और वेश्याओंके नृत्य देखे। जनपदवासियोंके कुशल-प्रश्न पूछे और
सर्गः ७] विलासकाण्डम् १७९
साऽपि प्रत्युद्यतानाथं रत्नदीपैः सखीयुता । ततः स सीतया रामः पर्यङ्के रत्नचित्रिते ॥४१॥
चकार मांसया क्रीडां रंजयामास जानकीम् । ततस्तौ दंपती निद्रां चक्रतुर्वीजितौ मुहुः ॥४२॥
दासीभिर्व्यजनैश्चित्रैश्चामरैर्हेमभूषितैः । एवं रामेण सा सीता सुखमाप पतिव्रता ॥४३॥
सीतया राघवश्चापि सुखमाप विशेषतः । एवं नाना कौतुकानि प्रत्यहं रघुनंदनः ॥४४॥
चकार सीतया सार्द्धं परिपूर्णमनोरथः । कदा चंद्रस्य ज्योत्स्नायामङ्गणे सप्रभः प्रभुः ॥४५॥
चकार सीतया निद्रां कदा प्रासादमस्तके । कदा प्रासादान्तरे वाऽपि गवाक्षपवनैः शुभैः । ४६॥
सुखमाप कदा रामः कदा रहसि मंदिरे । कदा कनकमुक्तालावितारसुमंचके ॥४७॥
कदा द्राक्षामंडपाधो जलयंत्रसमीपतः । काचभूम्यां रुक्मभूम्यां मणिभूम्यां कदाऽपि वा ॥४८॥
स्फटिकादिसुभूम्यां हि कदा सुष्वाप राघवः । कदा स पुष्पके वाऽपि रंगशालान्तरे कदा ॥४९॥
कदा स चित्रशालायां कदोशीरमये गृहे । कदा पुष्पमये गेहे कदा रंभावने वरे ॥५०॥
कदा पुष्पवाटिकायां कदा वृक्षोर्ध्वसद्मनि । शृङ्खलाक्षौमसंबद्धदोलके रत्नचित्रिते ॥५१॥
कदा काष्ठमये दिव्ये मंचके रत्नभूषिते । कदा चकार तुलसीवाटिकायां रघूत्तमः ॥५२॥
निद्रां जनकनन्दिन्या सभायामथवा कदा । कदा द्वारोर्ध्वप्रासादे कदै कस्तम्भसद्मनि ॥५३ ।
कदा स्वगृहदेहल्यां कदा वृन्दावनेऽपि वा । एवं स सीतया रेमेऽयोध्यायां रघुनंदनः ॥५४ ।
इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डे वाल्मीकीये
सीतारामयोर्दिनचर्यावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
सप्तमः सर्गः
(रामके द्वारा देवांगनाओंको वरदान)
श्रीरामदास उवाच
एकदा राघवं द्रष्टुं तथा स्नातुं मथावपि । स्त्रियैः समागयौ व्योम्नो मुनिभिः परिवेष्टितः ॥ १ ॥
गायकोंके गायन सुनते-सुनते आधी रात बिताकर वे शयनागारमें शयन करनेको चले। हीरे आदि रत्नों द्वारा प्रकाशित मार्गसे चलते हुए राम सीताके पास पहुँचे ॥ ४१-४३ ॥ सीता भी रत्ननिर्मित दीपोंके प्रकाशमें अपनी अनेक सखियोंके साथ रामचन्द्रके पास गयीं और राम सीताके साथ एक रत्नजटित पलङ्गपर बैठ गये ॥ ४४ ॥ रामने कुछ देर तक सीताको प्रसन्न करनेके लिए कुछ खेल किया। फिर दोनो सो गये और दासियाँ पंखा झलने लगीं ॥ ४५ ॥ इस तरह रामके द्वारा सीता तथा सीताके द्वारा राम विविध प्रकारका आनन्द लूटते रहे। जिनकी समस्त कामनाएं पूर्ण हो चुकी थीं, ऐसे भगवान् रामचन्द्रजीकी यह नित्यकी दिनचर्या थी। उनके यहाँ नित्य ऐसे-ऐसे कौतुक हुआ करते थे। कभी विशाल भवनके आँगनमे, कभी प्रासादपर और कभी खिड़कीदार बढ़िया कमरेम राम सोते थे ॥ ४६-४९ ॥ कभी जहाँ अनेक प्रकारके मणियोंकी शृङ्खलायें लटकती थीं ऐसे चाँदनीवाले किसी एकान्त कमरेके सुन्दर मंचपर, कभी अंगूरकी झाड़ीके नीचे, कभी जलयन्त्रके समीप, कभी कांचभूमिपर और कभी स्फटिकादिसे निर्मित सुन्दर मणिभूमिपर रामचन्द्रजी शयन करते थे ॥ ५० ॥ ५१ ॥ कभी पुष्पक विमानपर कभी रङ्गशालार्मे, कभी चित्रशालामें, कभी खसकी टट्टियों-वाले घरोंमें, कभी फूलके घरमें, कभी कदलीवनमें, कभी पुष्पवाटिकावे, कभी वृक्षके ऊपर बनी हुई झोपड़ीमें, कभी वृक्षपे बँधी जंजीरोसे बने हुए झूलपर, कभी काठोंके बने हुए दिव्य मंचपर ओर कभी तुलसीकी बनी हुई वाटिकाने रामचन्द्रजी शयन करते थे ॥ ५२-५५॥ कभी रामचन्द्रजी सीताके साथ सभामण्डपमें, कभी द्वारके किसो एक ऊँचे प्रासादपर, कभी केवल एक स्तम्भपर बने हुए मकानमें, कभी अपने घरकी देहलीपर और कभी वृन्दावनमें सीताके साथ शयन करते थे ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते विलासकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
| २८० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ७ |
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समागतां मुनिं श्रुत्वा तं प्रत्युद्गम्य राघवः । ननाम शिरसा भक्त्या निनाय निजमन्दिरम् ॥ २ ॥
दृष्ट्वाऽऽगमनं तस्मै द्विजेभ्यश्चापि वै पृथक् । दत्त्वाऽऽसनानि दिव्यानि चकार पूजनं पृथक् ॥ ३ ॥
कामधेनूद्भवै रत्नैरुपविष्टां मनोरमैः । व्यासं तं भोजयामास मुनिभिर्मांनकीपतिः ॥ ४ ॥
तांबूलं दक्षिणां दत्त्वा प्रबद्धकरसम्पुटः । पप्रच्छ कुशलं तस्मै व्यासाय रघुनन्दनः ॥ ५ ॥
सीता तं वीजयामास श्यामं पत्त्यवतीसुतम् । एतस्मिन्नन्तरे व्यासो रामाय कुशलं निजम् ॥ ६ ॥
निवेद्य पृष्ट्वा तत्क्षेमं तमाह कौतुकात्पुनः । राम राम महाबाहो यथा राज्यं त्वया भुवि ॥ ७ ॥
भुज्यते न तथाऽन्येन केनापि पृथिवीभृता । पुरा भुक्तं न कोऽप्यग्रे भोक्ष्यते पृथिवीपतिः ॥ ८ ॥
अन्यच्चैतन् महद्वैर्यमेकपत्नीव्रतं शृतं । दृष्ट्वातिविस्मयोचित्ते जायते मे रघूत्तम ॥ ९ ॥
कः सहेताव तारुण्यकामदावानलं नृपः । पदस्थे यौवने क्वापि त्वमेवास्मिन्मने क्षमः ॥१०॥
इति व्यासवतः श्रुत्वा राघवो व्यासमब्रवीत् । मया त्रयः कृताः सन्ति नियमा मुनिसत्तम ॥११॥
मुखाद्विनिर्गतं वाक्यमेकमेव सुनिश्चितम् । न क्रियते मृषा तच्च नोच्यते ह्यपरं पुनः ॥१२॥
अन्यन्सीतां विनाऽन्या स्त्री कोमलामलशीतला । न क्रियते परा पत्नी मनसाऽपि न चिन्त्यते ॥१३॥
तथा यं हन्तुमिच्छामि बाणेनैकेन कोपतः । निहन्म्येवं तदैकेन नान्यं बाणं सृजाम्यहम् ॥१४॥
इत्थं त्रयः कृताः पूर्वं नियमाश्च मया भो मुने । मय्या एव भवत्प्रेम्णाऽविनास्त्व वाक्यतः ॥१५॥
तथैवास्त्विति मोऽप्याह व्यासः श्रीराघवं तदा । पुनराह मुनिः धीमान् व्यासः श्रीराघव प्रति ॥ १६ ॥
एकपत्नीव्रतस्यास्य फलेनापरजन्मनि । त्वं कृष्णरूपेण बह्वीर्नारीर्भोक्ष्यसि राघव ॥१७॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा विहस्य राघवोऽब्रवीत् । यद्यस्ति कामिनां भोक्तुं कृष्णरूपधरोऽप्यहम् ॥१८॥
श्रीरामदास उवाच—एक बार रामचन्द्रजीका दर्शन करने तथा चैत्र रामनवमीको स्नान करनेके लिए अपने शिष्योंके साथ व्यासजी अयोध्यामें आये। उनके साथ बहुतसे मुनि भी थे ॥ १ ॥ मुनिका आगमन सुनकर राम स्वयं अगवानी करनेके लिए गये। उनके पास पहुँचकर रामचन्द्रजीने बड़ी भक्तिके साथ प्रणाम किया और अपने भवनमें ले गये ॥२॥ उन्होंने व्यासजीको एक उत्तम आसनपर बिठाया। इसके पश्चात् अन्य ऋषियों एवं शिष्योंको भी सुन्दर आसनपर बैठाकर और विधिपूर्वक कामधेनु तथा रत्नों द्वारा उत्पन्न वस्तुओंसे उन मुनियोंकी अलग अलग पूजा की और सब मुनियोंके साथ व्यासजीको रामने भोजन कराया । ३ ॥ ४ ॥ बादमें ताम्बूल और दक्षिणा दी। तब रामने हाथ जोड़कर भगवान् व्याससे कुशल-मङ्गल पूछा ॥ ५ ॥ सीताजी उस समय व्यासजीका पवन झाल रही थीं। इसके बाद व्यासजीने रामको अपना कुशल-मङ्गल सुनाया और बहुत लगे—हे महाबाहो राम ! आप जैसा राज्य इस धराधामपर कर रहे हैं, वैसा किसी राजाने नहीं किया और भविष्यमें भी कोई नहीं करेगा ॥ ६-८ ॥ इसके अतिरिक्त आप जैसे महिपालका एक पत्नीव्रत पालन करना देखकर मेरे हृदय तो बड़ा आश्चर्य होता है ॥ ९ ॥ इस जगत्में ऐसा कौन राजा है, जो तरुनाईमें कामरूपी दावानलको सहनेमें समर्थ हो । ऐसे ऊंचे पदपर रहकर कंदर्पके समररूपमे एकपत्नीव्रतधारी केवल आप ही हैं ॥ १० ॥ इस प्रकार व्यासजीकी बात सुनकर रामने कहा हे मुनिसत्तम ! मैंने अपने लिए तीन नियम बना लिये हैं। एक यह कि—॥ ११ । एक बार मेरे मुखसे जो बात निकल जाय वह ध्रुव होती है। प्राणसङ्कट आनेपर भी बात नहीं बदलती। दूसरी बात यह कि—सीताजी छोड़कर संसारकी समस्त स्त्रियां मेरे लिये कौसल्याके समान माता हैं, दूसरी स्त्रीको मैं अपने मनमें भी नहीं चाहता । १२ ॥ १३ ॥ तीसरी बात यह कि—मैं जिसे क्रोध करके मारना चाहता हूँ उसपर केवल एक बाण छोड़ता हूँ। उसी से उसे मार डालता हूँ, दूसरा बाण नहीं उठाता ॥ १४ । हे मुनिराज ! ऐसा मैंने नियम बना रक्खा है। आपके आशीर्वादसे मेरे ये नियम अविरत भावसे चल रहे हैं। तब व्यासने कहा—हे राजन् ! जैसी आपकी इच्छा है, वैसा ही होगा। और सुनिये, जो आप इस जन्ममें एकपत्नीव्रतका पालन कर रहे हैं इसके फलसे दूसरे जन्ममें आप बहुत-सी स्त्रियाँ पायेंगे ॥ १५-१७॥ इस पर व्यासजीकी बात सुनकर रामने कहा—हे महामुने !
सर्गः ७] विलासकाण्डम् २८१
द्वारिकायां यदाऽहं हि द्वापरे मुनिसत्तम । येन व्रतेन दानेन नियमेनाथवा मुने ॥१९॥
बहुनारीर्निभयेन प्राप्स्यामीति वदस्व तत् । इति रामवचः श्रुत्वा व्यासो राघवमब्रवीत् ॥२०॥
सम्यक्पृष्टं त्वया राम दानं ते वच्म्यहं परम् । एकपत्नीव्रतादेव यथाऽत्र च सर्वदा ॥२१॥
लभिष्यसि तथाऽयद्य दानं तव वदाम्यहम् । सानाश्चामरणेन मुनिमेकां रघूत्तम ॥२२॥
एवं षोडशमूर्तीश्च कारय त्वं पृथक् पृथक् । देहि त्वं मर्यूनद्यास्तीरे विप्रेभ्य आदरात् ॥२३॥
वस्त्राद्यलङ्कारभूषाद्यैर्दिग्भाभिश्च ताः शुभाः । अनेन बहुनारीश्च लभिष्यस्येव जन्मनि ॥२४॥
तथेति राघवश्चापि मूर्तीः कृत्वा मनोरमाः । ददौ ताः सम्प्रयत्नेन ब्राह्मणेभ्यस्तु षोडश ॥२५॥
ततस्ते ब्राह्मणास्तुष्टा रामायाशीर्वदुर्मदाः । दत्तमंशगुणं राजन् सहस्त्रगुणितं पुरा ॥२६॥
अस्माकं वचनाद्दानफलं तव भविष्यति । षोडशसहस्राणि त्वं लभिष्यसि निर्भयम् ॥२७॥
तथास्त्वित्याह रामोऽपि ततो विप्रान्व्यसर्जयत् । प्रणम्य पूजितं व्यास ददावाज्ञां रघूद्वहः । २८ ।
अथैकदा रामचन्द्रः सीतया सरयूतटे । मधुमासे वस्त्रगेहे स्थितः क्रीडां चकार सः ॥२९॥
एतस्मिन्नंतरेऽयोध्यां नानादेशनिवासिनः । रामतीर्थे मधौ स्नातुं समागम्युः सहस्रशः । ३० ।
सुरा यक्षाः किन्नराश्च गन्धर्वाः पन्नगा नगाः । बह्वयश्च सरितः सर्वास्तीर्थानि मुनयो नृपाः । ३१ ।
अप्सरसः पन्नगाश्च खगाः क्षेत्राणि वानराः । अथैका देवपत्न्यो ज्ञात्वाऽस्पृर्द्धया विदेहजाम् । ३२ ।
परस्परं ताः समाहूय दर्शायर्थे राघवं प्रति । समाजग्मुर्दिव्यवस्त्ररत्नाभरणभूषिताः । ३३ ।
रामसौंदर्यसंभ्रान्ताः कामबाणप्रपीडिताः । ता दृष्ट्वा रामदूतान्ते पप्रच्छ वस्त्रगेहस्थिताः । ३४ ।
यूयं किमर्थं संप्राप्ता निर्भयेऽत्र भयावहे । कथयध्वं हि नः सर्वं मा शङ्कां कुरुतत्र हि । ३५ ।
ता ऊचु राघवं द्रष्टुं सपायाता वयं स्त्रियः । अधुना चेत्राद्यत्रम्प दर्शनं न भविष्यति । ३६ ।
मैं द्वापर कृष्णरूपसे तो बहुत सी स्त्रियोंके साथ भोग करूँगा सही, लेकिन वह कौन-सा ऐसा व्रत अथवा दान है जिससे करनेसे अगले जन्ममें बहुत सी नायिकाओं को सकूंगा ॥१८।१९॥ यह सुनकर व्यासजी बोले— हे राम ! आपने बहुत ठीक प्रश्न किया है । मैं आपको वह दान बतलाता हूँ। यद्यपि एक नारीव्रतके पुण्यसे ही आपको कितनी ही स्त्रियाँ मिलेंगी । तथापि वह दान बतलाये देता हूँ। सोने के समान भारक सुवर्णकी एक मूर्ति बनवाइये। फिर उसी तरह सोलह मूर्तियाँ तैयार करा के और उन्हें विचित्र प्रकारके वस्त्रों-भूषणोंसे भूषित करके सरयू नदीके तटपर ब्राह्मणोंको दान दे दीजिये। २०-२४॥ ऐसा करनेसे आप अगले जन्ममें बहुत सी स्त्रियाँ पावेंगे । २४ । रामचन्द्रने इसे स्वीकार किया । तदनुसार उन्होंने सावाके सोलह मूर्तियाँ बनवायीं और सरयू नदीके तटपर ब्राह्मणोंको दान दिया। २५॥ उन ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर रामको यह आशीर्वाद दिया कि आप इस समय जो कुछ हम लोगोंको दे रहे हैं सो सहस्रगुणा होकर आपको प्राप्त हो ॥२६ । हम लोगोंके आशीर्वादसे आपको यह फल अवश्य प्राप्त होगा । इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आपको भविष्यमें सोलह हजार स्त्रियाँ मिलेंगी ॥२७॥ रामजीने भी कहा कि 'तथास्तु' 'एवमस्तु' और उन विप्रोंको तथा व्यासजीको भली भाँति पूज करके बिदा किया । २८॥ एक बार राम चैत्रमासमें सरयू-तटपर सीताजीके साथ पटगृह (तम्बू) में विहार कर रहे थे । तभी चैत्र रामनवमीपर सरयूस्नान करनेके लिये हजारों यात्री अयोध्या आ पहुँचे ॥२९।३०॥ बहुतसे देवता, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, पन्नग, पर्वत, नदियाँ, समस्त तीर्थ, मुनि, राजे अप्सरायें, खग, क्षेत्र, वानर आदि वहाँ स्नान करनेके निमित्त आये ।
एक दिन देवताओंकी स्त्रियाँ जब कि सीता जी अधिक रूपवती थीं, तब आपसमें सलाह करके विविध प्रकारके वस्त्राभूषण पहनकर रामचन्द्रजीके पास गयीं ॥३१।३२। वे सबकी सब रामके सौन्दर्यको देखकर पागल हो गयी थीं। उन्हें देखकर रक्षकों ने पूछा—॥३३।३४॥ तुम लोग कौन हो ? आधी रातके समय यहाँ किस लिये आयी हो ? साफ-साफ बतला दो, घबड़ाओ नहीं ॥३५॥ उन्होंने कहा कि हम सब स्त्रियाँ रामचन्द्रका
| २८२ | आनन्दरामायणे | [ सर्ग ७ |
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जातो यस्तस्तदाऽस्माकं जीवितानि नदीजले इति तासां वचः श्रुत्वा दूतास्ते राघवं जवात् ॥३७॥
दास्या निवेदयामासुः स्त्रीवृत्तं तन्मविस्तरम् । श्रुत्वा दासीमुखाद्रामः सैकते मञ्चके स्थितः ॥३८॥
समाहूय स्त्रियः सर्वा ददर्श रघूनायकः । ताश्चापि दृष्ट्वा श्रीरामं मेनिरे कृतकृत्यताम् ॥३९॥
नत्वा राघवं गत्वा लज्जयाऽधोमुखाः स्त्रियः । पाडिताः कामवाणैश्चतस्थुः श्रीरामसन्निधौ ॥४०॥
ताः पप्रच्छ राघवोऽप्यागमनेऽत्राथ कारणम् । ता गणव तदा प्रोचुः सर्वं वेत्सि त्वमीश्वर ॥४१॥
ज्ञात्वा तासां रामचन्द्रो हृद्गतं प्राह ताः पुनः । एकपत्नीव्रतं मेऽस्ति चैतज्जन्मनि भोः स्त्रियः ॥४२॥
न ज्ञेयं मे मृषा वाक्यं गम्यतां स्वस्थलं जवात् माऽभूदधर्मो मद्राज्ये राज्ञां वै निरयप्रदः ॥४३॥
इति राघववाग्बाणैर्भिन्नमर्मस्थलाः स्त्रियः । ययुर्मूर्च्छां क्षणदेव मिकतार्या सहस्रशः ॥४४॥
ता मूर्च्छाविह्वला दृष्ट्वा रामो विह्वलमानसः । नारीः संतोपयन् प्राह हे नार्यः श्रूयतां मम ॥४५॥
वाक्यं खेदापहं वोऽद्य द्वापरे कृष्णरूपधृक् । अहं ब्रजे भविष्यामि नन्दगोपेशपालिते ॥४६॥
तदा देवास्तु गोपाला भावि मद्वरदानतः । भविष्यन्ति सुरेशश्च नन्दसूनुर्भविष्यति ॥४७॥
भविष्यथ तदा यूयं गोपिकाः सकला व्रजे । युष्माकं पूरयिष्यामि यथेच्छं वाञ्छितं तदा ॥४८॥
रासक्रीडां हि युष्माभिः करिष्यामि न संशयः । बृन्दावन तु कालिंद्यां सैकते निशि वै चिरम् ॥४९॥
भवध्वं स्वस्थचित्ताश्च गच्छध्वं स्वस्थलं मुतः । इति रामवचोऽमृतसुधया जीविताः स्त्रियः ॥५०॥
किञ्चित्सन्तुष्टहृदो रामं नत्वा जम्मुर्निजं स्थलम् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र मधुस्नानार्थमादरात् ॥५१॥
मायापुर्याः समायाता रम्या गुणवती शुभा ।
श्रीरामचन्द्र उवाच
का सा प्रोक्ता गुणवती किशीला कस्य कन्यका ॥५२॥
देखनेके लिए आयी हैं। यदि इसी समय हमको रामके दर्शन नहीं मिलेगे तो हम सब इस सरयू नदीमें कूदकर अपने प्राण दे देंगी, ऐसी बात सुनकर दूतगण तुरन्त रामके पास दौड़े ॥ ३६ । ३७ ॥ वहां पहुंचकर उन्होंने दासियों द्वारा रामचन्द्रजीके पास सब समाचार कहलाया और स्त्रियोंके उस वृत्तान्तको दासियोने विस्तारपूर्वक रामको सुना दिया। दासियोंके मुखसे यह सुनकर रामने उन सब देवाङ्गनाओको बुलवाया। पास पहुंचकर स्त्रियोने भगवान्को देखा। देवाङ्गनाओने उनकी उस स्वरूप छबिको देखकर अपनेको कृत-कृत्य समझा ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ... होकर लज्जित होकर भगवानको प्रणाम किया और कामबाणसे पीडित होकर वहींपर बैठ गयीं ॥ ४० ॥ रामने उनके आगमनका कारण पूछा। उन्होंने कहा-आप सबके ईश्वर हैं, भला आपसे कौन बात छिपी रह सकती है। आप सब कुछ जानते हैं ॥ ४१। उनके मनकी बात जानकर रामने कहा-हे हे स्त्रियो इस जन्ममे तो मैं एकपत्नीव्रतधारी हूँ ॥ ४२। मैं जो कह रहा हूँ उसे मिथ्या मत समझना। अच्छा, अब तुम लोग अपने-अपने डेरेपर जाओ। ऐसा करो कि जिससे मेरे द्वारा किसी प्रकारका अधर्म न हो क्योंकि जिस राजाके राज्यम अधर्म होता है, उसे नरकगामी होना पड़ता है ॥ ४३ । इस तरह रामकी बातें सुनकर कामबाणसे पीडित वे हजारों स्त्रियाँ क्षणमात्र मूर्छित हो गयीं ॥ ४४ ॥ उनको मूच्छित देखकर विह्वलमस्तक रामचन्द्रजी उनका सन्ताप दूत हुए कहने लगे -हे नारियो ! मेरी बात सुनो, इस तरह अधैर्य मत होओ ॥ ४५ ॥ जो मै कहता हूँ, उसे सुनकर तुम्हारा सब खेद दूर हो जायेगा। द्वापरमें मै कृष्णरूपसे नन्द गोपेश द्वारा पालित व्रजमें जन्म लूँगा। उस समय समस्त देवता मेरे आशीर्वादसे गोप होंगे इन्द्र नन्दरूपसे जन्म लेंगे और तुम सब उन गोपालोंकी गोपियाँ होओगी। उस समय मैं तुम लोगोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करूँगा ॥ ४६-४८ ॥ वृन्दावनम यमुनाकी रेतीमें रात्रिके समय तुम लोगोंके साथ मै रासक्रीड़ा करूँगा । ४९ । अब तुम लोग स्वस्थ होकर अपने-अपने स्थानको जाओ। इस तरह रामके वचन-रूपी सुधासे जीवित और किंचित् सन्तुष्ट होकर वे अपने-अपने स्थानको लौट गयीं इसके अनन्तर माया
तद्वदस्व सविस्तारं कस्यासीन्ममदा पुरा । इति शिष्यवचः श्रुत्वा रामदासोऽब्रवीत्पुनः ॥५२॥
इति श्रीशङ्करदिग्विजयसंक्षेपे श्रीमदानन्दराघवे वाल्मीकीये विलासकाण्डे
दम्पतीवरप्रदानं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
अष्टमः सर्गः
( पिंगला वेश्याके कारण शपथा सीताका कोष )
श्रीरामदास उवाच
आसीत्कृतयुगस्यान्ते मायापुर्यां द्विजोत्तमः । आत्रेयो देवशर्मेति वेदवेदांगपारगः ॥ १ ॥
आश्विनेशेऽश्विनीशुक्लौ मक्षिरुक्षपदगणः । सूर्येभागश्चतन्मध्ये सद्धर्मोऽभूत् त्रपापरः ॥ २ ॥
तस्यातिवयसापत्येन्नाम्ना गुणवती सुता । अपुत्रः स स्वशिष्याय चन्द्रनाम्ने ददौ सुताम् ॥ ३ ॥
तमेव पुत्रमन्मेने स च तं पितृवद्वशी । तौ कदाचिद्वनं यातौ कुशेध्महरणाय वै ॥ ४ ॥
हिमाद्रिपादं वेगेन चरंस्तत्रातिदानवः । ताभ्यां दृष्टश्च घोरास्यस्तेषां पुरःस्थितम् ॥ ५ ॥
अथविह्वलसर्वाङ्गौ तद्भयात्
२८४ आनन्दरामायणे [ सर्ग ८
ततो गुणवती श्रुत्वा राक्षसा निहतावुभौ । पितृभर्तृजुगुप्साती निललाप भृशातुर ।१२।
सा गृहात्स्फारान्धंनन्विक्रीय शुभकर्मकृत् । व्ययोश्चक्रे यथाशक्ति परलोकक्रियां तदा ।१३।
तस्मिन्नेव पुरे वास चक्रे प्रसूनजीविनी । विष्णुपक्तिरता शान्ता सत्यशौचा जितेन्द्रिया ।१४।
व्रतान्येक नया सम्यगानन्दमरणान्वितम् । एकादशीव्रत सम्यक् सेवन कात्तिकस्य च ।१५।
माघे चत्रे माघवेश्चि स्नानानि प्रतिवत्सरम् । संमार्जन विष्णगेहे स्वस्तिकादिनिवेशनम् ।१६।
नित्यं विष्णो पूजन च भक्त्या तन्परमानसा । इत्थं व्रताष्टक सम्यक सा चकाराविभक्तितः ।१७।
एकदा सा गुणवती पौराणिकमुखेन हि । श्रुत्वा महत्फलं शिष्य साकेते सरयू जले ।१८।
चैत्रस्नानस्य कैवल्यदायक जनसंयुता ययो श्रीरामसगरी रामतीर्थऽवमज्जुमा ॥१९॥
म॑रुदा शयनं द्रष्टुं सरयूसैकतस्थितम् । वासोगेहे रहः पन्त्या ययौ वेशुममनिन्तम् ॥२०॥
पूजापात्राणि हस्ताभ्यां बिभ्रती द्वारमध्यगा । प्रतीहारेण रामाय वेदिता सा विवेश ह ॥२१॥
वासोगेहे ददर्शाय सीतया रघुनायकम्, स्नन्मंचकमलग्रं घृतार्थीकोपवर्धनम् ।२२।
क्रीडन्तं सारिभिः साश्चेः सीतया लक्ष्मणेन च । कैकेयीतनयाभ्यां च सखीभिः परिवारितम् ।२३।
मयूरपिच्छसम्भूतचामरैः परिवारितम् । रत्नचित्रितकमडरे नूपूरे पदयोर्बरे ॥२४॥
विभ्रन्तं रशनां कट्यां रत्नरुम्मविभूषिताम् । रत्नरुक्ममयं दिव्यकङ्कण कायोर्वरे ॥२५॥
विभ्रन्तं भुजयोर्दिव्यकेयूरे रत्नमूर्पिते । कण्ठदेशे हौस्तुभ च हृदि चिन्तामणिं शुभम् । २६॥
विभ्रन्तं विविधान्हारान् रत्नमाणिक्यनिर्मितान् । नयाजल रुष जांश्च मुक्ताहारान् विचित्रितान् २७॥
ये दानो वैकुण्ठभुवनमे रहने लगे उन्हें विमानकी सवारी मिलती थी और सूर्यके समान उनका तेज था। विष्णुके समान उनका रूप था और उनके शरीरमें दिव्य चन्दन लगा रहता था ॥ ११ ॥ इसके पश्चात् जब गुणवतीने सुना कि मेरे पिता और पति दोनों किसी राक्षस द्वारा मार डाले गये हैं। तब उसे अतिशय दुःख हुआ और वह विलाप करने लगी ॥ १२ ॥ फिर घरमें जो कुछ माल-मताह था, सब बेच डाला और अपनी शक्तिके अनुसार उनका पारलौकिकी क्रिया कराया। तवसे वह पुष्प बेंचकर खाती हुई उसी नगरमें रहकर अपना जीवन बिताने लगा। गुणवती विष्णुकी भक्ति करती हुई सत्य-शौच जितेन्द्रियतादि गुणोंसे पूर्ण हो गयी ॥ १३ । १४ ॥ उसने अपने जीवन भरमें केवल आठ व्रत किये थे। वह एकादशी व्रत, कात्तिकका सेवन मार्गशीर्ष, चैत्र तथा माघमें प्रतिवर्ष स्नान किया करता थी। वह विष्णुके मन्दिरमें बुहारी देती तथा स्वस्तिकादि रचती थी ॥ १५ ॥ १६ ॥ भक्तिसे और सावधान हृदयसे वह नित्य विष्णुका पूजन करती थी। इस तरह इन आठों व्रतोंको श्रद्धासमेत करती रही। हे शिष्य ! एक दिन उसने एक पौराणिकसे सुना कि चैत्रमासमें अयोध्याके सरयूजलका बडा माहात्म्य है और चैत्रमासमें तों वहाँ स्नान करनेसे महज ही में मुक्ति मिल जाती है। यह सुनकर बहुतसे आदमियोंको साथ लेकर गुणवती चैत्रस्नानके लिए अयोध्या आयो और उसी पावन नगरोमें टिक गयी । १७-१९ ॥ एक दिन गुणवती जहाँ सरयूकी रेतीमें रामचन्द्रजी डेरा डाले हुए थे, वहाँ जा पहुँचा। उस समय रामचन्द्रजी पटगृहके किसी एकान्त कमरेमें लक्ष्मण और सीताके साथ बैठे थे फाण्कपर पहुंचकर गुणवतीने प्रतीहारी द्वारा सन्देशा भेजा और स्वयं पूजापात्र हाथमें लिये बाहर ही खड़ी रहा। प्रतीहारीके लौटनेपर वह अन्दर गयी ॥ २० ॥ २१ ॥ वहाँ पहुंचकर उसने देखा कि रामचन्द्र सीताके साथ रत्नजटित मञ्चपर बैठे थे और तकिया लगी थी ॥ २२ ॥ भगवान् राम सीता, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न मारिका और पांसेके साथ खेल रहे थे सखियाँ चारों ओरसे घेरकर खड़ी थीं । २३ । मयूरके पङ्खनांके बने हुए पंखे चल रहे थे। उनके दोनों पाँवोंमें रत्नजटित नूपुर और कमरमें रत्नजटित मेखला पड़ी थी । दोनों हाथोंमें जड़ाऊ कंकण पड़े थे । २४ ॥ २५ ॥ हाथोंमें सुवर्णके रत्नपूरित दिव्य केयूर थे । कंठमे कौस्तुभमणि तथा हृदयमे चिन्तामणि था । राधे विविध रत्नोंके जड़ाऊ हार पहन थे। सुनहले तथा चित्र विचित्र मोतियोंके हार उनके गलेमें पड़े थे ॥ २६ । २७ ॥