श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८९
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८९
लिङ्ग्यते चिन्त्यते येन भावेन भगवान् शिवः । लिङ्गरूपं स रामेति लिंगं चेति द्विनामकृत् ॥७०॥
बहूनि सन्ति नामानि रामेशस्य महात्मनः । रजांसि गणयेत्कोऽपि मूर्तेर्नावाखिलेशितुः ॥७१॥
तस्मिन्सर्वतोभद्रं हृदयं तन्प्रकीर्तितम् । तत्र पद्ममष्टदलं सकेसरमकणिकम् ॥७२॥
तन्मूर्त्यानं रामलिङ्गस्य ध्यानार्थं परिकल्पितम् । अन्यथा सर्वगण्यास्य कथं देशादिभेदता ॥७३॥
दिव्यैर्पातः परमात्मार्थं स्वमाययावशंगतः । धर्मार्थकाममोक्षार्थं सृष्ट्युपाधिं प्रविष्टवान् ॥७४॥
तस्य चैतन्यचन्द्रस्य षोडशैताः कलाः पराः । चित्प्रकाशा द्वयाभूता घटं दीपेन्द्रियादिवत् । ७५॥
प्रकाशयन्ति गृह्णन्ति सृजन्ति चम्प्रसारत' बुद्धिमन्मात्रमेतस्मिन् संभिकृष्टा श्चित्रम्मनः ॥७६॥
अतो ज्ञानप्रधाना मा नज्ज्ञानं चतुरो दरा प्रमत्तं मत्तप्रच्छादान् ज्ञानान् सुन्दरोदराः ॥७७॥
चतुर्दा वृत्तिभेदेन प्रोक्ता तत्त्वार्थदर्शिभि प्रयोजनं न तेनात्र प्रकृतं नाद्रविष्यते ॥७८॥
क्रियाप्रधानः प्राणश्च पञ्चधाऽसौ व्यवस्थितः । प्राणापानौ तथा व्यानः समानोदानकस्त्विति ॥७९॥
वागादिकर्मेन्द्रियेषु क्रिया प्राणाश्रया मता श्रोत्रं नयनं घ्राणं स्पर्शनेन्द्रियं तथा ॥८०॥
पञ्चैतानि चेन्द्रियाणि ज्ञानद्वाराणि वै विदुः । वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाणि च ॥८१॥
एव षोडशसङ्ख्यानं कलानामुच्यते बुधैः । तासु सर्वासु चैतन्यं रामनाथेति विश्रुतम् ॥८२॥
प्रविष्टं टीप्पने प्रज्ञाचेन विश्वं विचेष्टते । अनादिगगनावृत्तः कर्मनूरुफलात्मकः ॥८३॥
देहाभिमानिनो जीवाः फलभागाव पक्षिणः । यथारूपं सुखं दुःखं खादन्ति स्वस्वार्गपतम् ॥८४॥
कश्चिज्जन्मसहस्रेषु ज्ञानवान् जयते यदा । तदान्तस्थं रामरूपं ज्ञात्वा मोक्षी भवत्यलम् ॥८५॥
उन्मूलनमा प्रविर्भूत होते हैं। इसी कारण ऋचाओं ने आकाश के आगान इस परम व्योम कहा है ॥ ६९ ॥
जिस भावसे भगवान् शिवकी पूजा की जाती है, वे ही रूप शिव और राम इन दो नामोसे पुकार जात हैं
॥ ७० ॥ उन महात्मा रामके बहुतसे नाम हैं। सत्र रचना के सं प्राणी पृथ्वीके रजकणोंको भले ही गिन ले ।
किन्तु भगवान्के नामोंकी गणना कोई भी नहीं कर सकता ॥ ७१ ॥ उसमें जो सर्वतोभद्र है, वही हृदय जानना
चाहिए । उसमें आठ पत्तोंका केशर और पखुड़ियों युक्त जो कमल है, वह रामके लिङ्गका ध्यान करनेके
लिए ही बनाया जाता है। नहीं तो सर्वव्यापी अभेद इस देशदिनदता किस प्रकार मानी जाती
॥ ७२ ॥ ७३ । चिज्ज्योतिमंय वे परमात्मा अपनी मायाके वशीभूत होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस
चतुर्वर्गको साधन करनेके लिए ही समागम आये थे ॥ ७४ ॥ उस चैतन्य चन्द्रमा षोडश कलाएं सर्वश्रेष्ठ मानी
गयी हैं वे संसारको स्व वन्धुआप चित्प्रकाश करते हैं ॥ ७५ ॥ । वे स्वभावसे ही सबका प्रकाशित करते,
समय पड़नेपर फिर आह दबा ओर कमा कता सिर अण्डम नष्ट लिया करता है। पचित आत्मावालाक
लिए बुद्धिमात्र कला हैं ओर वह तबक पास रहती है ॥ ७६ ॥ इससे यह वस्तु बुद्धि रहित रही ज्ञानप्रधान
मानी जाती है। वह शब्दस्पर्शाय संसारके चेह हुए उपाय का अच्छी तरह जानता है ॥ ७७ ॥ यह वृत्तिभेदसे
चार प्रकारका मानी गयी है। यहाँ उसके विषयमे विशेष विवेचनकी काई आवश्यकता नहीं बान पड़ती ।
अतएव इस विषयमे वास्तविक विवेचना करत हैं ॥ ७८ । अपनी वृत्तिके अनुसार प्राणक्रिया प्रधान मानी
जाती है ओर इसके पाँच भेद है-प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान ॥ ७९ ॥ वाक् आदि कर्मेन्द्रियों
की सारी क्रियाएँ प्राणाश्रयी हुआ करती हैं। श्रवण, नयन, घ्राण (नाक), त्वचा और जीभ ॥ ८० ॥ ये
ही पाँच ज्ञानेन्द्री मानी गयी है। वाक्, पाणि (हाथ) पाद पायु (गुदा), उपस्थ (लिङ्ग), ये पाँच
कर्मेन्द्रियाँ है ॥ ८१ ॥ इसलिए कलाओकी सोलह सङ्ख्या कही गयी है। उन सबोंमें उन रमानाथकी चेतन्य
शक्ति, विद्यमान रहती है ॥ ८२ ॥ इन्हींके प्रवेशस यह संसार स्वायमान होता है और उन्हींकी चेष्टासे सचेष्ट
रहा करता है। वे अनादि संसाररूपी वृक्ष हैं और सबको कर्मानुसार फल देते हैं ॥ ८३ ॥ देहका अभिमान
करनेवाले जीव पक्षियोंकी तरह अपने प्रभुके दिये हुए सुख-दुःखरूपी कर्मोंको भोगते हैं ॥ ८४ ॥ हजारों
वार जन्म लेनेके बाद कही कोई ज्ञानवान् होता है और अपनी आत्माम स्थित रामका रूप जानकर मोक्षपद-
५१० आनन्दरहमायण [ सर्गः ४
इन्द्रियाणि पराण्याहुस्तेभ्यो बुद्धिः परा मता। ततः परः परमात्मा च सर्वव्यापी विनिश्चितः ॥८६॥
द्वौ सुपर्णावेकवृक्षं समाश्रित्य स्थितौ खगौ। एकः स्वादु फलं खादत्यन्यो विचक्षते ॥८७॥
त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोग्यञ्च यद्भवेत्
तेभ्यो विलक्षणः साक्षीन्माहं भाथवणी श्रुतिः ॥८८॥
यच्चास्त्रीह यत्स्फुरति यच्चानन्दयति स्वयम् । यस्मिंश्च महति प्रत्यये सर्वे वेदाः समन्विताः ॥८९॥
विषयादि श्रीपर्यन्तं जडं मतिमतामदः, सम्पर्के च प्रियं चैतमप्रमात्मा महाप्रियः । ९०॥
सर्वेषां प्राणिनां ह्यात्मा परप्रेमास्पदो मतः स तु स्वयंक एव नेह दानास्ति गच्छति । ९१॥
चिन्मयं हृद्गतं ज्ञात्वा योऽसौ सोऽहमितिप्रथा। आचारेऽन्यथा सम्यक् परलोकेऽन गतः । ९२॥
आत्मानमकृतार्थ्यात्फलानुमे परमात्मनि। अप्सद्वयं पुनस्तस्य न कार्यं विद्यते भवे ॥९३।
सर्वेऽप्युपायाः शास्त्रेषु यज्ज्ञानार्थं प्रयोजिताः। स चेत्सारसंसारेण इत्यादिः किं परं ततः ॥९४॥
दृष्टेऽस्मिन् रचिते भद्रे यस्य प्रविचायते वक्ष विषे परा प्रीतिर्जायते विदुषां सताम् ॥९५॥
नमो रामाय ज्ञानाय लिङ्गरूपधराय च शम्भवे विष्णवे तुभ्यं शङ्कराय शिवात्मने ।९६।
अथवाऽऽद्ये स्थले भद्रं कार्यं नवपदात्मकम्। तिर्यग् भद्रं षट्पदञ्च रक्तपातेऽत्र ते स्मृते ।९७।
द्विद्विपदात्मके कार्यं शेषं सर्वं हि पूर्ववत्। रामतोभद्रमेतच्च केवलं रामतुष्टिदम् ॥९८॥
स्थले द्वितीयभद्रं हि रक्तं विंशत्पदात्मकम् । तिर्यग् भद्रं नवपदैः पीतं चित्रे तु शुक्लके ।९९।
नन्वंशानं राममानन्दकन्दं मायातीतं निर्विकारं निरीहम् ।
विद्याधीशं षड्गुणाकाश्रयं च वश्यं भद्रं रामनामांकितं तत् ।१००।
को प्राप्त होता है .. ८५ , पहले तो इन्द्रियाँ ही प्रधान हैं, उनमें बुद्धि श्रेष्ठ है और उससे भी श्रेष्ठ सर्वसाक्षी परमात्मा है ।। ८६ ।। दो पक्षी एक वृक्षपर बैठे हैं, उनमें एक तो फलोंका फल खा रहा है दूसरा दूरपर देख रहा है ॥ ८७ ।। तीनों धामों में जो भोग्य वस्तु, भोक्ता तथा भोग्य पदार्थ हैं। उन सबसे साक्षी परमात्मा विचक्षण है यह अथर्व वेद कहता है ॥८८॥ इस संसारमें जो कुछ प्रकाश युक्त वस्तुएं हैं और जिससे सबोंको आनन्दकी प्राप्त होती है। उसको विषयमें स्वयं यह एकमत होकर कहता है कि विषयसे लेकर बुद्धिपर्यन्त सब वस्तुएं जड़ और ज्ञानहीन हैं। जिसके सम्पर्कसे वह सब प्रिय मालूम होते हैं, वह परमात्मा राम सर्वप्रिय है ।८९।९०॥ सब सब प्राणियोंका अपना आत्मा स्वयं सबसे बढ़कर प्रिय होता है, यद्यपि वह एक है, फिर भी अनेक प्रकार दिखलाई देता है ।९१। जो प्राणी सबमें इस भावनासे चिन्मय रामको अपने हृदयमें सदा वर्तमान समझकर आचरण द्वारा हुई ईर्ष्यासे रामकी उपासना करता है, वह परमात्माका दूर्वा अथवाके फलीभूत होनेपर अनेकों बार इस संसारमें जन्म लेता है, किन्तु जबतक दृढ़ हो जानेपर फिर संसारमें उसे कुछ करना बाक़ी नहीं रह जाता अर्थात् उसकी मुक्ति हो जाती है ।। ९२ ।। ९३ ।। शास्त्रोंमें जितने भी उपाय बतलाये गये हैं, उनका एकमात्र प्रयोजन ज्ञान प्राप्त करना है यदि वह सांसारिक उपायोंसे प्राप्त हो सके तो फिर क्या कहना । ९४ । यदि उक्त प्रकारसे बनाये हुए भद्रका आसन देखकर उसपर विचार किया जाय तो विद्वानांके हृदयम ईश्वरके प्रति महती प्रीतिका उत्पाद होता है ।। ९५॥ शान्ति, लिङ्गरूपधारी, शम्भु, विष्णु, शङ्कर तथा शिवात्मा रामको प्रणाम है ।। ९६ ।। यदि उक्त प्रकारका भद्र आपमकों न रुचे तो नौ पदका भद्र बनावे। इस तिरछे भद्रम छः पाद (कोष्ठक) होंगे और दो भद्र लाल और पीत रहेंगे ।। ९७ ।। फिर दूसरा लाल भद्र बीस पादका होगा। तिरछा भद्र नौ पादका होगा। इसका पीत रङ्ग रहेगा और कई रङ्गाक फलस इसमें दो-दो पादोंकी दा शृङ्खलाएं बनायी जायेंगी ॥ ९८ ॥ बाकी सब पूर्ववन् रहेंगी। इस भद्रका नाम रामतोभद्र है और यह केवल रामचन्द्रको प्रसन्न करनेवाला है ।। ९६ ।। आनन्दकन्द, मायातीत, निर्विकार, निरीह, विद्याके स्वामी और षड्गुणोंके एकमात्र आश्रय जिनका यह भद्र नहीं प्रसन्न कर सकता। इसलिए है
सर्गः ४ ] मत्स्येष्टकाण्डम् ५९१
प्रागुदग्वा द्विसप्तत्येकनवाधिका २९० च रेखाः समाः सुपरिकल्प्य पदेषु तासाम् ।
कोणांगणत्र उपगीदृशकुंकमस्यः २१ रीताश्च ते परिधयः परिकल्पनायाः ॥१०१
कोणाब्जशृङ्खललताः सितकृष्णपीत वर्णानि चित्ररचनान्यरुणानि तानि ।
मुद्राश्च नवतिप्रथमा सिताश्च रक्ताः सपरिघाश्च जलंयंत्रि [निं] मूर्तीनाम् ॥१०२।
मुद्रा तु षष्टिपदसहिता च तत्र पक्षौ विहाय यमवायवदिकनभस्थे ।
प्रत्येककोणकपदानि चतुष्टयादि पंक्तिद्वयं स्मृतगुणंक्रमजंनभश्च ॥१०३॥
कृत्वा पदैकमशनव्यय मप्रमात्स्वेनातिसुन्दरतरं परिभाति भाण्डम् ।
रामेति द्व्यक्षरमुमेशजपं निधानं प्राणप्रयाणसमये जपतां महोदयम् ॥१०४॥
रचयेदादितः सव्यम्पादैद्विशत्यन्तावधि पर्यन्तं राममुद्रासु मध्येषु परिधिद्वयम् ॥१०५॥
आदौ तन्त्वमिता मुद्राश्चे विशन्त्येतानस्ततः द्वाविंशतिर्विंशतिषट्पञ्चद्वयमाप्ताः ॥१०६॥
घट्चतुर्दशत्रयोदशद्वादशद्रकः नवसप्तषट्पञ्च त्रयैकश्चाप्यनुक्रमं तु ॥१०७॥
भद्रं षोडशपदं च त्रिंशन्त्रिंशत्षडधिकम् ।
चन्द्रकं तत्समितं त्रिशत्त्रिमिश्रुविंशकम् ॥१०८।
नन्वषडग्निनेत्रांषुनिशिविंशत्र्यंशाधिकम् ।
षट्त्रिंशत्पाण्डुरपदं तच्चदे त्रिशद्धिमिश्रुयुतम् ॥१००॥
विंशत्कोष्ठं कमादेवं भवेन्पार्श्वेऽनुपूर्पये एकविंशत्पदे अष्टमेकोष्ठे च वापिका ॥११०॥
चतुर्विंशत्पदा कार्या परिध्यन्तेऽरुणावृधम् । अदीवाणि यत्र यत्र पदान्युर्वरितानि च ॥१११॥
तिर्यक् भद्रशृङ्खलार्थं यथेच्छं पूरयेद्धिया मध्ये शृङ्खलाः पश्चपदैरेकादशी लता ॥११२।
त्रिपदश्च शशी ज्ञेयः परिधयो षड्ि क्रमान् । कृष्णरक्तशुकलपीताश्चतुर्दिक्षु समन्ततः ॥११३॥
एतदष्टास्रदशशतं १००८ ज्ञेयं रामस्य भद्रकम् ।
अथवा मनु १४ रेखानां वृद्धिं कृत्वा प्रकल्प्य च ॥११४॥
एक दूसरा भद्र बतला रहा हूं ॥ १००॥ बहल ... की ओर से २९० रेखा खींचें। उसमें २१ कोष्ठवाले पीले रंगका परिधियां बनाये ॥ १०१ ॥ काणमे कमल बनाकर रूप-२, काले और पीले रंगकी शृङ्खला और लताएं बनावे। उनमें सब गा रू भिन्न भिन्न प्रकारक ... करके रहें। उसमें बनी सफेद और काल रंगकी मुद्राय मूर्तियोंके मध्यम थी अमुग उत्पन्न किये बिना वही रहती ॥ १०२ ॥ इसमें साठ कोष्ठोंकी मुद्रा बनली जात, हे किन्तु दक्षिणमुख तथा दक्षिण काणके पंक्तिही सारी छोड़ दी जाती है। प्रत्येक कोणक चार पाद, दो पक्ति तथा छटी और चौथी पंक्ति काम रङ्गकी रहेंगी ॥ १०३। इसके अतिरिक्त सातवीं पंक्तिके नीच एक पाद काम रङ्गका बनायेगा। वह भद्रके भारका तरह बहुत ही सुन्दर लगेगा। राम यह दो अक्षर शिवजीके जपपुञ्जका एक बड़ा खजाना है। यदि प्राण निकलने समय इसका जप किया जाय तो बड़ा कल्याण हो ॥ १०४ ॥ आदिस लेकर बाईसवे कोष्ठक पर्यन्त भद्रकी रचना करता आय। हर एक राम-मुद्राके बीचमे दो परिधियाँ रहेंगी। १०५ ॥ फिर पश्चात् मुद्रा रहेंगी। इसके बाद बाईस, इक्कीस, बीस, अठारह, सत्रह, सोळह, चौदह, तेरह, बारह ग्यारह, नौ, आठ सात, छ, चार तीन, दो, एक ये मुद्रायें रहेंगी, ॥१०६॥१०७॥ इस भद्रमें बीस, तीस, छत्तीस, बान्ह, पच्चीस, बीस, बयालीस, बास, पच्चीस, छत्तीस, बयालीस ॥ १०८। १०९॥ इस प्रकार बीस बीस कोष्ठ च गे आए रहेंगे। इक्कीस कोष्ठका भद्र रहेगा और भी कोष्ठकोंकी बापी बनेगी ॥ ११० ॥ चौबीस कोष्ठोंमें परिधिके पास कमल बनेगा। जो पाद बाकी बचे हों, उन्हें अपनी बुद्धिस भरें। इसमें पांच पादोंकी शृङ्खला रहेगी और ग्यारह पादोंकी लताएं बनाया जायेंगी ॥ १११ ॥ ११२ ॥ तीन पादोंका चन्द्रमा बनेगा और उदक आस-पास चारों ओर काली, लाल, सफेद तथा
६९२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
परिधिस्तत्र लिङ्गानामेविंशाधिकं शतम् । वाप्यो भद्राणि षट्प्रादिवत्स्र्पार्वेषु योजयेत् ॥११५॥
चतुर्विंशपदं लिङ्गं वाप्यष्टशतपादिका । द्वे भद्रे नव नव पदे ह्यष्ट षट्पदानि षट् ॥११६॥
त्रिंशल्लिङ्गानि वाप्यस्तु सप्तविंशन्मिता मताः । एकस्मिन् पार्श्वके लिङ्गाधिक्ये भद्रे प्रकल्पयेत् ॥११७॥
षष्ट्यष्टपदे शेषाण्यंककोष्ठानि योजयेत् । लिंगं कृष्णं सिता वाप्याः शेषं सर्वं पुरोदितम् ॥११८॥
पदानि शेषभूतानि यत्र यत्रेह तानि च । भद्रश्रृङ्खलयोध्यानि तदर्थे विनियोजयेत् ॥११९॥
कृष्णरक्तशुक्लपीता अन्ते परिधयो मताः । एवं लिंगयुतं रामतोभद्रं परिकीर्तितम् ॥१२०॥
अनेन देवौ सुप्रीतौ रामेशौ सत्रतस्सिव्हदौ । रामस्य पूजनार्थं हि त्विदं प्रोक्तं वरासनम् ॥१२१॥
आचार्यान् ज्ञानसंपन्नम्नत्वा तेषां प्रसादतः । वक्ष्येऽहं रामतोभद्राकृतिं च संभ्रर्मयुताम् ॥१२२॥
प्रकृतिं रामतोभद्रं विकृतिं लिंगसंयुतम् । अन्ये विकृराः संज्ञेया ह्येवं कृतिस्त्रिधोच्यते ॥१२३॥
तिर्यगूर्ध्वमान्यधिकाः शतरेखाः प्रकल्पयेत् । तत्पदेषु परिधयः षट्पडन्ते पडेव तु ॥ १२४॥
पीताः कोणेषु त्रिपदः शुक्लेन्दुः शृङ्खलाऽसिता । पञ्चदशैकादशिका वल्ली भद्रसंकमात् ॥१२५॥
सिन्धुषोडशसूर्येन्दुयुगषोडशकोष्ठकम् ।
कल्पयेच्चतुष्कोणेषु राममुद्रां हि पूर्ववत् ॥१२६॥
अष्टौ षष्ठ च पञ्चैधिर्धुवद्विश्चन्द्रमिनाः शुभाः
तासां सीमापरिधयस्त्वेकान्तु लोहिताः १२७॥
रजनीशनेत्रमिधुपैंक्तिषु मध्यभाश्वपः । मर्यादाख्याः परिधयो भवंति द्विगुणीकृताः ॥१२८॥
अंतिम तु परिव्यन्ते सर्वतोभद्रकं लिखेत् । विशेषस्त्वत्र वापी तु चतुर्विंशपदान्मिका । १२९ ।
भद्रं नवपदं पद्मं परिष्यंतः सुलोहितम् । पीता नत्कर्णिका कार्या अन्ते परिधयोऽपि च ॥१३०॥
पीली परिधियां रहेंगी । ११३ । यह एक हजार आठ खानेका भद्र है। अथवा चौदह रेखाओको कल्पना
करके उनकी वृद्धि करे। उसमे एक सौ इक्कीस कोष्ठोंकी परिधि बनगो वापी-भद्र आदि पहलेकी तरह
समझ ॥ ११४ ॥ ११५ । चौबीस कोष्ठोंका लिंग बनेगा और अठारह पादकी वापी बनायी जायगी। दो
भद्र नौ-नौ पादके रहेंगे और दस-दस पादोंके छ भद्र बनाये जायेंगे । ११६ ॥ उनमें तीस तथा बीस पादोंके
लिंग रहेंगे और सत्त इस पादोंकी वापी बनायी जायगी जो कुछ बाका पाद बच उनमे दस दस पादोंसे दो
भद्रोंकी रचना करे ॥ ११७ ॥ बाकी नौ का कोष्ठो यथास्थान रक्खे। इसमें लिंग काला और बापी सफेद
रहेगी। बाकी सब पहलेके भद्रोंकी तरह ज्योके त्यों रहगे । ११८ । बाकी जितने पाद हैं, वे सब भद्र और
शृङ्खलाके काममे आ जायेंगे ॥ ११९ ॥ काल, लाल, सफेद और पीले रङ्गकी इसकी परिधियां रहेंगी इस
प्रकारके लिंगसे रामतोभद्रकी रचना बतलायी गयी ॥ १२० । इस भद्रसे राम तथा शिवजी दोनो प्रसन्न होते
हैं। यहाँ रामका पूजन करनेके लिय वरासन बतलाया गया ॥ १२१॥ अब मैं ज्ञानसम्पन्न आचार्योंको
प्रणाम करके उनकी कृपासे ह्मभ्रंयुक्त रामतोभद्रकी रचनाका प्रकार बतलाऊँगा ॥ १२२ ॥ इसमें रामतोभद्रको
प्रकृति विकृत रहती है और भी कई तरहकी विकृतियाँ इसमें होती हैं ॥ १२३ ॥ खड़ी और बेड़ी कुल
एक सो तीन रेखाएँ खींचे। इसमें भी छःछः पादकी परिधियाँ रहेंगी । १२४ ॥ कोनोमें तीन-तीन पाद
पीले रङ्गके रहेंगे। चन्द्रमा उज्ज्वल रहेगा और शृङ्खला काले रङ्गकी रहेगा। सोलह पादकी वल्लरी बनायी
जायगी । १२५ ॥ चार, सोलह, बारह छ, चार, सोलह पादके क्रमसे कोष्ठोंका पूर्ववत् राममुद्राकी रचना
करे । १२६। आठ, छ, पाँच, चार, तीन एक, इस पादक्रमसे इसको परिधियां बनेंगी और एक परिधि
लाल रङ्गकी रहेगी । १२७ । एक दो, चार और दस इनकी द्विगुणित क्रमसे मर्यादासंज्ञक परिधियां होतो
हैं ॥ १२८ ॥ अन्तिम परिधिके बीचम सर्वतोभद्र बनाना चाहिये । यहाँ यह विशेषता है कि इसमें चौब स
चौबीस कोष्ठोकी वापी बनायी जायगी ॥ १२९ ॥ नौ कोष्ठोंका भद्र बनेगा और परिधिके भीतर लाल