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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्ग १०] मनोहरकाण्डम् १७७

सर्ग १०] मनोहरकाण्डम् १७७

मार्गे छायां तु यः कुर्यान्म स्वर्गे च मदायते । मल्लिं मल्लारकां वाऽय यों लाथ मिच्छति ।५५।
व्यजनं व्यजनाकांक्षी दानमेतत्तु चैत्रके।

जलं छत्रं तु व्यजनं दानं मीने विशिष्यते । चैत्रे मासे तु सम्प्राप्ते ब्राह्मणाम् कुसुमोत्करे ।५६।
अल्पोदकद्रुमं तु चानको भुवि जायते । चैत्रे देयं जलं चान्नं तथा शय्या मनोरमा ।५७।
आदर्शदानं ताम्बूलगुडदानं प्रकारयेत् । गोधूममुद्गयोर्दानं दानं दध्यादनस्य च ।५८।
घृतयुक्तं कांस्यपात्रं दानमित्युत्तमस्य च । तथा श्रीफलदानं च दानं चाम्रफलस्य च ।५९।
सूक्ष्मवस्त्रमंचकयोः पानपात्रं कमण्डलम् । यतीनां दण्डदानं वै तैलदानं मठेषु च ॥६०।
जीर्णोद्धारं मठानां च घटानां करणं तथा । प्रासादकरणं चैव वापीकूपादिकं तथा ।६१।
मार्गस्थानां छत्रदानं मध्याह्ने ऽतिथिपूजनम् । कमपात्रं यतीनां च पदोपानं तु शक्तितोऽपि ।६२।
एतानि चैत्रमासे तु दानानि कथितानि हि । फल शाकं तु मूलं च कंदं पुष्पं तु चन्दनम् ॥६३।
उशीरः शीनलं द्रव्यं कर्पूरं कस्तुरी शुभा। दीपदानं धेनुदानं गोहदानं तथा ऽमृतम् ॥६४॥
गोरसानां पृथग्दानं पवित्राह्मणभोजनम् । सुवासिनीपूजनं च रामनामप्रलेखनम् ॥६५॥
पुस्तकानां तथा दानं तथा कुङ्कुमकेशरे । जात्राफलं लवंगाश्च जातिपत्रीशशांकके ।६६।
धातकीं नागरं धूपं बीजपूरं कलिंगकम् । जंबीरं पनसंबैवं कपित्थं मातुलुंगकम् ॥६७।
कूष्मांडदानमार्गमञ्जनं मार्गशोधनम् । नयोशानहदानं च गजवाजिभवं तथा ।६८।
एतानि चैत्रमासे तु दानानि कथितानि हि । यानि चैत्रे तु वर्ज्यानि तानि ते प्रवदाम्यहम् ॥६९॥
सर्वाणि चैव शाकानि क्षौद्रं मौर्य्याकं तथा राजमाषारुकं चापि चैत्रस्नायी प्रवर्जयेत् ।७०।
परान्नं च परद्रोहं परदारागमं तथा । तीर्थेन्तानि सर्वत्रैव चैत्रस्नायी प्रवर्जयेत् ।७१॥
द्विदलं विलतैलं च तथा ऽन्नं शल्यदूषितम् । भावदुष्टं शब्ददुष्टं चैत्रस्नायी तु वर्जयेत् ॥७२॥

छायाका प्रबन्ध करता है, वह स्वर्गलोकमें जाकर बहुवैभवके द्वारा पूजित होता है इस मासमें लोगोंको चाहिए कि जो मधुर पंखा चाहता हो, उसे पंखा दे। जो छाताका इच्छुक हो, उसे छाता दे। जो पानी चाहता हो, उसे पानी पिलावे। यह दान विशेष करके चैत्रमासके लिए बड़ा ही उपयोगी है। जो मनुष्य चैत्रमास आनेपर विप्रां कुटुम्बी ब्राह्मणको जलथरा शय्या नह देनों, वह परखर घातक होता है। इसलिए चैत्रमासमे जल अन्न तथा सुन्दर शय्याका दान देना चाहिये ॥ ५२-५७ ॥ इनके अतिरिक्त दर्पणका दान, ताम्बूल और गुड़का दान, गहूं, मूंग, दही, बादाम, घास भर हुए कांस्यपात्रका दान, आँवले रसका दान, बलका दान, आमका दान, महीन कपड़े और पलंगका दान, जल पीनेका पात्र, कमण्डलु तथा संन्यासियोंके लिये दण्डदान, मठोंमं तेलका दान, मठोंका जीर्णोद्धार, घंटाघर बनवाना, मकान बनवाना, कुआँ-बावली आदि बनवाना मार्गमें चलनेवालोंके लिय छत्रदान, दोपहरके समय अतिथियांका पूजन, यतियोंका कमण्डलु-दान और गोओंको ग्रासदान व चैत्रमासके दान बतलाये गये हैं। इनके अतिरिक्त चैत्रमासमें ये दान और बतलाये गये हैं। जैसे-फल शाक, मूल, कन्द, पुष्प, चन्दन ॥ ५८-६३। खस, इसी तरह और-और ठण्डी चीजें, कपूर, कस्तूरी, दीपदान धेनुदान गोदान, घासदान, यतियों और ब्राह्मणोंका भाजनदान, सोहागिन स्त्रियोंका पूजन, रामन मका लेखन, पुस्तकदान, कुमकुम और केशरका दान, आम्रफल, लौंग, जावित्री । ६४-६६ ॥ धातकी, नागरमोथा, धूप, बीजपूर, तरबूज, उम्बीर, नींबू, कटहल, कैंथा, कूष्माण्डदान, बगीचा लगाना, रास्ता साफ करवाना, जूनेका दान, हाथ एवं घड़ेका दान, ये सब दान चैत्रमासके लिए कहे गये हैं। अब मैं तुम्हें यह बतलाता हूँ कि चैत्रमासमें किन-किन वस्तुओंका परित्याग करना चाहिए ॥ ६७-६९ ॥ चैत्रस्नान करनेवालेको सब प्रकारके शाक, मधु, कांजी एवं राजमाष आदि वस्तुओंका परित्याग कर देना चाहिए ॥ ७० ॥ दूसरेका अन्न, दूसरेसे द्रोह और दूसरी स्त्रीके साथ समागम, चैत्रस्नायी इन कामोंको सर्वदाके लिए छोड़

६७८ आनंदरामायणे [ सर्गः १०

देववेदाद्विजानां च गुरुगोत्रतिनां तथा। स्त्रीराजमहतां निंदां चैत्रस्नायी विवर्जयेत् ॥ ७३॥
माषमांसं विषं चूर्णं फले जंबीरमासम्। धान्ये मयूरिका प्रोक्ता चान्नं पर्युषितं तथा ॥७४॥
ब्रह्मचर्यमधःसुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम्। चतुर्थकाले भुंजीत कुर्याद्दानं सदा व्रती ॥७५॥
संवत्सरप्रतिपदि तैलमभ्यंग तु कारयेत्। चैत्रस्नायी नरोऽन्यत्र तैलाभ्यंगं न कारयेत् ॥ ७६॥
अलाबुं वापि वृंताकं कूष्मांडं पूर्तीफलम्। श्लेष्मातकं कलिंगं च कपित्थं चैव वर्जयेत् ॥७७॥
रजस्वलां त्यजेन्म्लेच्छपतितान्त्यजकैः सह। द्विजाद्विट्‌वेदवाह्यैश्च न वदेन्म्यर्वदा व्रती ॥७८॥
पलांडु लशुनं चैव छत्राकं गृंजनं तथा। नालिकामूलकं शिग्रुं चैत्रस्नायी विवर्जयेत् । ७९।
एभिः स्पृष्टं शपाकेश्च सूतकान्नं च वर्जयेत्। द्विपाचितं च दग्धान्नं चैत्रस्नायी विवर्जयेत् ॥८०॥
एतानि वर्जयेन्नित्यं व्रती सर्वत्र तेष्वपि। कृच्छ्राद्यं च प्रकुर्वीत स्वशक्त्या रामतुष्टये ॥८१॥
क्रमान्कूष्मांडवृंताकछत्राकं मूलकं तथा। श्रीफलं च कलिंगं च फलं धात्र्याभवं तथा ॥८२॥
नारिकेलमलाबू च पटोलं बदरीफलम्। चर्मवृन्ताककं वल्लीशाकं तुलसिजं तथा । ८३॥
शाकान्येतानि वर्ज्यानि क्रमात्प्रतिपदादिषु । धात्रीफलं रवौ तद्वद्वर्जयेन्मर्वदा गृही ।८४।
एभ्योऽन्यद्वर्जयेत्किञ्चिद्रामप्रीत्यर्थे नरः। दत्त्वा व्रतान्ते विप्राय भक्षयेत्सर्वदैव हि ॥८५॥
फाल्गुनीपौर्णमारभ्य यावच्चैत्री तु पूर्णिमा । चैत्रस्नानं तु तावद्धि नरैः कार्यं च भक्तितः ॥८६।
जयवा मनिमगो मानुर्यावत्पात्रान्तमाचरेत् । दशमीं फाल्गुनीं शुक्लां समारभ्य यथोदिताम् ।८७॥
यावच्छ्वैत्र शुक्ल दशमी तावत्स्नानं प्रफारयेत् स्नानस्यैव त्रयो भेदाः शिष्य ते समुदीरिताः ॥८८॥
चैत्रशुक्लतृतीयाया यावद्वैशाखमन्त्रता । तृतीया शुक्लभक्षस्य ह्यक्षयेति स्मृताऽथ या ॥८९॥


है । क्योंकि ये तीर्थके सब पुण्योंको नष्ट करनेवाले उत्पन्न हैं ॥ ७१ ॥ दाल, तिनका दल, कंकड़-पत्थर मिला हुआ अन्न, भावसे दूषित और बहुपर्युषित अन्नाका चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय । ७२ ॥ देवता, वेद, ब्राह्मण, गुरुजन, गायत्री, स्त्री, राजा और अपनेसे बड़ेकी निन्दा का भी परित्याग कर देना चाहिए । ७३ ॥ प्र. थियाक, अलूका मांस, शममत्स्यका चूर्ण कञ्जम जंभार नावू, धान्यम मसूर और जूठा अन्न ये सब मांसतुल्य होते हैं, इसलिए इनको न खाय । ब्रह्मचर्य, पृथ्वीपर शयन, पत्तलमें भोजन और नौव प्रहरमें भ जन करता हुआ व्रती मनुष्य इन नियमांका बराबर पालन करे ॥७४-७५॥ केवल संवत्सरका मुख दिवाली प्रतिपदाका दिनमें तेल लगावे और किसी समय नहीं ॥ ७६ ॥ लौकी, भटा कुम्हड़ा, छोटा पपीता, लिसोढ़ा, तरबूज तथा कैथा इन वस्तुओंको न खाना चाहिए ॥७७॥ रजस्वला, चण्डाल, द्विजद्वेषी तथा वेदसे बहिष्कृत मनुष्योंसे बात भी न करे ॥७८॥ प्याज, लहशुन, छत्राक ( भुईंफोर), गाजर, मूली तथा सहिजन इन वस्तुओंको भी चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय ॥७९॥ ऊपर बतलाये पतितों, कुत्ते तथा शौण्ड से छुए एवं सूतकके अन्नका भी परित्याग कर देना चाहिए । दोबारा पकाया और जला हुआ अन्न भी चैत्रस्नायी मनुष्य न खाय ॥ ८० ॥ ऊपर बताये चीज न खाय और अपनेसे बन पड़े तो रामचन्द्रजीको प्रसन्न करनेके लिए कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत भी करे ॥ ८१ ॥ कुम्हड़ा, भंटा, भुईंफोड, मूली, बेल, तरबूज, आंवलेका फल नारियल, लौआ, परवल, बेर, चर्मवृन्ताक, बल्लीशक और तुलसी, इन्हे क्रमशः प्रतिपदा आदि तिथियोंको न खाय । उसी तरह रविवारको धात्रीफल (आंवला) न खाय ॥ ८२-८४ ॥ इनके अतिरिक्त भी रामको प्रसन्न करनेके लिए अपनी तरफसे कुछ वस्तुओंका परित्याग कर दे। किन्तु व्रतसमाप्तिके अनन्तर ब्राह्मणको उस वस्तु-का दान देकर खाय तो कोई हर्ज नही है ॥ ८५ ॥ फाल्गुनकी पूर्णिमासे लेकर चैत्रकी पूर्णिमा पर्यन्त भक्तिपूर्वक चैत्रस्नानका व्रत करना चाहिए ॥ ८६ ॥ अथवा जबतक सूर्य मीन राशिपर रहें, तबतक व्रत करता रहे फाल्गुण कृष्णपक्षकी दशमीसे लेकर चैत्रशुक्लकी दशमी तक स्नान करना चाहिए । इस तरह हे शिष्य ! इस चैत्रस्नानके भेद मैने तुमको बतलाये ॥८७।८८॥ चैत्रशुक्लकी तृतीयासे लेकर वैशाख शुक्लपक्षकी

सर्गः १०] प्रबोधकाव्यम् १७९

तावच्च शीतला गौरी स्नातव्या भूतलेऽमये । मीनाक्षीह तु नारीभिः पूजनीया च जानकी ॥९०॥
तृतीया या तु चैत्रस्य सितपक्षेऽथवा तथा । वैशाखशुक्लपक्षे या तृतीयाऽक्षय्यसंज्ञिका ॥९१॥
नारी या शीतलागौरींनैतन्नानपरायणा अन्यत्र मा करोत्वेवंनपोसिद्धिर्नान्यादिने कदा ॥९२॥
त्रिंशच्च तिथयः पुष्याश्चैत्रमासे महत्तमाः । तथापि हि विशेषोऽत्र तिथीनां वर्ण्यते मया ॥९३॥
चैत्रमासे कृष्णपक्षे पंचमी दशमी तथा । एकादशी द्वादशी च शिवरात्रिस्तथा तथा ॥९४॥
एताः शुभर्भवेत्कृष्णे महापातकनाशनाः । इदानीं चैत्रमासस्य भिक्षपक्षोद्भवाः शुभाः ॥९५॥
वर्ण्यन्ते तिथयः श्रेष्ठा नराणां हितकाम्यया । संवत्सरप्रतिपद्भारभ्य वज्रमीदिनम् ॥९६॥
यावत्ताबच्छुभाः शस्ताः स्नानदानादिकर्मणि । यत्कृतं च प्रतिपदि स्नानादानादिकं द्विज् ॥९७.
द्वितीयायां च तम्परोक्तं द्विगुणं नात्र संशयः । यत्कृतं च द्वितीयायां भक्त्या स्नानादिकं वरैः ॥९८॥
द्विगुणं तत्तृतीयायां चैत्रमासे नृपोत्तम । एवं सप्तांशु तिथयः शुल्काभ्यासमर्थाः शुभाः ॥९९॥
अत्र विशेषो ज्ञातव्यो यथा क्षीरादिसुखप्रदान् । यथा क्षीरादपि प्रोक्तं दध्नस्तु नवनीतकम् ॥१००॥
नवनीताद्घृतं यद्वत्तथाऽत्र निशिनिर्णयः । चैत्रश्च मत्सु मासानां तत्र पक्षः सितो वरः ॥१०१॥
सितपक्षे च चैत्रस्य यावत्सा नवमी तिथिः । तावदेकैकशः श्रेष्ठा नराशु नवमी वरा ॥१०२॥
यस्यां जातं रामचन्द्र धर्मस्थापनणाय हि । तस्मात्सर्वार्थदा या ब्रूया कर्मणेनेकसक्षमा ।१०३।
तस्यां दत्तं हुतं जप्तं यत्किञ्चिच्च कृतं शुभम् । सर्वं तदक्षयं विद्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥१०४॥
प्रतिपद्दिनमारभ्य नवराव्रमुपोषणेत । प्रच्छं सुपुरीम्य पूज चैत्रं कारयन् ॥१०५॥
संवत्सरप्रतिपदि ध्वजाः सौधोपरि स्थिताः । दिव्यवस्त्रेण सम्बध्य मण्डिताश्च मनोरमाः ॥१०६॥

नवमीदिन या तक इस संसारमें शीतला गौरीका निशाम रहता है। इसलिए स्त्रियोंको सुखके लिए सीताताभय जाकर स्नान तथा गौरीका पूजन करना चाहिए ॥८६॥ ९०॥ चैत्रशुक्लपक्ष तृतीया तथा वैशाखशुक्लकी तृतीया ये दोनों तृतीया अक्षय्यसंज्ञक माना गया है ॥९१॥ अथवा जो लोग शीतला गौरीका व्रत कर रही हो, उसे चाहिये कि इन दोनों तिथियोंको स्नान नभ त्यागे । इतर विचार और किसी अन्य दिनमें ऐसा करना वर्जित है ॥९२॥ वैसे तो चैत्रमासकी तीसों तिथियाँ पवित्र हैं । फिर भी इनमें जो विशेषता है, उसे मैं तुमको सुनाता हूँ ॥९३॥ चैत्र कृष्णपक्षका पंचमी दशमी एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, अमावास्या, ये चैत्र कृष्णपक्षकी तिथियाँ बड़ी पवित्र और महान् पापको नाश करनेवाली कही गया है। अब मैं चैत्रके शुक्लपक्षकी शुभ तिथियोंको गिनता हूँ ॥९४॥ ९५॥ इससे मनुष्योंका बड़ा कल्याण होगा। यह मेरा दृढ़ विश्वास है। संवत्सर-प्रतिपदा (प्रतिपद्) से लेकर नवमी पर्यन्त जितनी तिथियाँ हैं, वे सब स्नान-दान और कर्मोंमें शुभ कही गई हैं। उनमें भी प्रतिपदाको स्नान-दान आदि कर्मोंका जो फल शास्त्रमें कहा गया है उससे द्वितीय द्विगुणित फलदायक होता है। द्वितीयाको जो फल कहा है, उससे तृतीयामें द्विगुणित फल होता है। इस तरह नवमी तिथि पर्यन्त सब तिथियाँ शुभ हैं। इनमें इस प्रकारका विशेषत: है कि जैसे ऊँखका रस प्रथम मीठा होकर आदिसे श्रेष्ठतर क्रममें मीठा होता है। जैसे गोसे दूध होता है, दूधसे दही तैयार होता है, दही से मक्खन निकलता है और मक्खनसे घी तैयार होता है। उसी तरह यहाँ तिथियोंका भी निर्णय होता है। पहले तो सब मासोंमें चैत्रमास ही श्रेष्ठ है। उनमें भी शुक्लपक्ष श्रेष्ठ है और शुक्लपक्षमें भी प्रतिपदासे लेकर नवमी तकका तिथियाँ श्रेष्ठ हैं। उनमें भी नवमी तिथि सर्व-प्रधान तिथि है ॥९६-१०३॥ नवमी तिथिका धर्मकी रक्षाका करनेके लिए रामका जन्म हुआ था, इसीसे यह तिथि समस्त कर्मोंको नष्ट करनेवाला माना गयी है ।१०३। उसमें जो कुछ दान दिया जाता, हवन किया जाता, तप किया जाता अथवा जो कोई भी शुभ कर्म किया जाता है, वह सब अक्षय होता है; इसमें संशय कोई करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥१०४॥ इसलिए साधक चाहिये कि प्रतिपदा तिथिसे लेकर नौ रात्रितक उपवास करके रामचन्द्रजीका पूजन करें ॥१०५॥ संवत्सरकी प्रतिपदाको मकानके ऊपर दिव्य वस्त्र

६८०आनन्दरामायणे[ सर्ग १०

रामजन्ममहोत्सवार्थं प्रीत्यर्थं राघवस्य च । गृहे गृहे नरैः कार्याः पूजोपाया भक्तितः ॥१०७॥
गृहे देवालये वाऽथ गोष्ठे वृन्दावने शुभे । सम्मार्जनादिकं नित्यं कार्यं चन्दनवारिभिः ॥१०८॥
ततः पाथरजेश्चैव नानोपद्यादिकानि हि । लेखनीयानि भूम्यां तु नीलपीतादिवर्णकैः ॥१०९॥
अष्टोत्तरसहस्रस्य रामतोभद्रमुत्तमम् । शतास्यं वा लिखेद्भद्रमथवाऽन्यन्मनोरमम् ॥११०॥
तस्योपरि महत् रम्यंविचित्रवर्णश्च मण्डपः । देयो द्वाराणि चत्वारि कार्याणि तोरणानि च ॥१११॥
कदलीस्तंभयुक्तानि इक्षुदण्डयुतानि च । नानावण्टाकिङ्किणीभिर्ध्वनितान्युज्ज्वलानि च ॥११२॥
रम्यादाशर्मैडिनानि विचित्राणि शुभानि च । नानाचित्रवितानैश्च मुक्ताहारैर्युतानि च ॥११३॥
तस्यां षोडशमाषैश्च प्रतिमा काञ्चनोद्भवा ॥११४॥
द्विभुजा रामचन्द्रस्य सर्वलक्षणलक्षिता । चतुरुनिर्मापश प्रतिमा रजतोद्भवा ॥११५॥
कौशल्यायाः शुभा कार्या पूज्याया मनोरमा । यथावित्तानुसारोण पूजयप्रत्यहं नरः ॥११६॥
भेरीमृदङ्गनेयैश्च गीतनृत्यादि कम्पन । नानाप्रकारनैवेद्यैरुपचारैः सुपूजयेत् ॥११७॥
प्रतिपद्दिनमारम्य यावत्तु नवमीदिनम् । रामायणं तावदेव पठनीयमिदं शुभम् ॥११८।
यद्वै वाल्मीकिना गीतं श्रवणाम्भ्रमलप्रदम् । आनन्दसञ्ज्ञकं रम्य पठनीयं मनोरमम् ॥११९।
नव काण्डानि नवभिर्दिनैश्च पठन्नरः । दिवसे दिवसे काण्डं पठनार्थं प्रयत्नतः ॥१२०॥
अथवा प्रत्यहं सर्गाः पठितव्यास्तु द्वादश शतान्येकः कदा मध्येऽधिकः सोऽपि पठेन्नरः ॥१२१॥
अष्टोत्तरशतैः सर्गे रामकीर्तनमालिका । मेरुयुक्ता पठेद्देवं रामाग्रे नवभिर्दिनैः ॥१२२॥
सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वदानेषु यत्फलम् । रामायणस्य पठनात्तत्फलं नवरात्रके ॥१२३॥


और यान्ना आदिके अलंकृत ध्वजाराम रामजन्मकी सूचक लगा रामको प्रसन्न करनेके लिए घर-घर स्थापित करके भक्तिपूर्वक उनका पूजन करना चाहिए । १०७ । १०८॥ घरमें, देवालयमें गोशालामें तथा तुलसीकी बगीचा-में उन दिनों चन्दनके जलका छिड़काव करना चाहिए । १०८ ॥ इसके बाद पत्थरके रंगीन नील-पीत आदि वर्णोंवाले कमल आदि बनाने चाहिए । तदनन्तर अष्टोत्तरसहस्रात्मक रामतोभद्र या शतात्मक अथवा शेष छासठको अन्य उस भद्रका रचना कर १०९ । ११० । उसके ऊपर अतिशय सुन्दर चित्र-विचित्र वर्णोंका मण्डप कराये । उस मण्डपमें चार द्वार बनाये और स्थान-स्थानपर तोरणकी स्थापना करे । १११ ॥ जहाँ-तहाँ कदली खंभ तथा इक्षुदण्ड खड़ा करें । उनपर तरह तरहके घण्टा और किङ्किणी आदि लगा दे, जिनकी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ना रहे ॥११२॥ जहांतहां मुकुर और यन्त्र-यंत्र शीशे लगा दे विविध प्रकारके चित्र लगावे तरह तरहकी चन्दन कुकुम लगावे और मोतियोंके हार लटकावे । उसमें सुवर्णमय एवं रत्नमण्डित मंचकी रचनाकर और उसपर अरू भ्रात कल्पोद्भव स... रेशम का वस्त्र बिछावे । फिर उसपद सोरह मासेकी काञ्चनमयी प्रतिमा स्थापित करे ॥ ११३ ॥ ११४ । रामचन्द्र का यह सुवर्णमयी प्रतिमा सब सुलक्षणोंसे लक्षित होनी चाहिए। ६५० अकतया वीर्यस पत्यो रजतमा प्रतिमा कौसल्याकी बनाये और उसकी पूजा करें। जैसा अपने सामर्थ्य हो, अनु अनुसार प्रतिदिन पूजन करे ॥ ११५ ॥ ११६ । उनके सामने भेरी, मृदंग, तुरही आदि बाजा बजावे और नाच गाव । नाना प्रकारके नेवेद्यो और उपचारोंसे पूजन करे ॥ ११७ ॥ प्रतिपदा तिथिसे लेकर नवमी तिथि पर्यन्त इस आनन्दरामायणका पाठ करे । ११८॥ इसका बाल्मीकि मुनिने गान किया है। यह सुननेमें मङ्गलप्रद और सनातन है। इससे इसका पाठ आवश्यक है ॥ ११९ ॥ इसके नौ कांडोंको नौ दिनमे समाप्त करना चाहिए । पाठ करनेवालेको चाहिए कि प्रयत्नपूर्वक प्रतिदिन एक एक काण्डका पाठ करे । १२० ॥ यदि ऐसा न हो सके तो प्रतिदिन बारह सर्गोंका पाठ करे । ऐसा पाठ करनेस एक सर्ग बाकी बचेगा । उसे बीचमें किसी रोज पूरा कर देना चाहिए ॥ १२१ ॥ इस तरह अष्टोत्तरशत सर्गात्मक इस रामकीर्तन-मालिकाको नौ दिनोंमे रामचन्द्रजीके समक्ष पाठ करना चाहिए ॥ १२२ ॥ सब

सर्गः १० ] मनोहरकाण्डम् ६८१


श्लोकं वा श्लोकपादं वा यद्वाऽप्याधमक्षरम् । नवरात्रे पठिष्यन्ति चैत्रे ते मोक्षभागिनः ॥१२४॥
एवं हि प्रत्यहं कार्यं कौसल्यारामपूजनम् । मधुप्राशौ तु नारीणां तन्न कार्यं प्रपूजनम् ॥१२५॥
सपुत्रद्विजवर्गाणां विशेषान्पूजनं स्मृतम् । वस्त्रालङ्कारयुक्तं चित्रभोजनभोजनम् ॥१२६॥
एवं कृत्वा विधिं सर्वं नवम्यां च विसर्जनम् । पूजयित्वा रामचन्द्रं वाहनाङ्कसुनाटकम् ॥१२७॥
भेरीमृदङ्गघोषैश्च तूर्यदुन्दुभिनिःस्वनैः । वारस्त्रीणांनृत्यैश्च गायकानां च गायनैः ॥१२८॥
एवं नानामहोत्साहैर्दिनेन सहतोषितम् । चामरैर्वीज्यमानं च पुष्पके संस्थितं परम् ॥१२९॥
रामोद्यानिकं नीत्वा रथात्समुत्तरेत्ततः । स्नापयेद्रघुवीरं हि पुण्यतोयैरनेकशः परम् ॥१३०॥
रुद्रसूक्तैर्विष्णुसूक्तैः सहस्रैर्नामभिस्तु वा । मांगल्यद्रव्यमिश्रैश्चैवैक्षमाध्वीकमिक्षयेत् ॥१३१॥
कांगस्यवरद्रव्यैश्च युक्तं तन्मंगलाभिधम् । प्रोच्यते मङ्गलस्नानं सर्वक्षेत्रे दुर्लभं नृणाम् ॥१३२॥
तत्स्थानमुक्तीर्थं तु तीर्थमध्ये विनिक्षिपेत् । तत्र सर्वजनैः शीघ्रं स्नाप्तव्यं तदनन्तरम् ॥१३३॥
सहस्रामृतस्नानैर्यत्फलं प्राप्यते नरैः । तत्फलं रामचन्द्रस्य मङ्गलस्नानकारणात् ॥१३४॥
पुष्करादिषु तीर्थेषु गङ्गाद्यासु मनिन्सु च । प्राप्यते यत्फलं स्नानात्तन्मङ्गलात्प्लुत्य लब्धयेत् ॥१३५॥
एवं रामं तु संस्नाप्य सीतापृक्तं प्रपूज्य च । पुनः पूर्वोक्तवाद्यादि मङ्गलेनानयेद्गृहम् ॥१३६॥
गृहे रामं पुनः पूज्य समाप्यनकृतं वरम् । पारायणं समाप्त्यर्थं पुस्तकं पूजयेच्छुभम् ॥१३७॥
नानोत्सवैर्दिने नीत्वा कार्यं जागरण निशि । दशम्यां प्रातरुत्थाय भोजयित्वा द्विजान् बहून् ॥१३८॥
पूजयित्वा पुनः सर्वं गुरवे तन्निवेदयेत् । ततः स्वयं सुहृन्मित्रैः कृतभोजनमुत्सवम् ॥१३९॥
एवं व्रतं समाख्यातं चैत्रस्य नवरात्रके । अतस्तन्नवरात्रे हि श्रेष्ठं चैत्रं महत्तमम् ॥१४०॥
नवरात्रेष्वपि सा रामनवमी परमार्थदा । तन्ममात्रा विधिवन्मान्या चैत्रमासे शुभप्रदा ॥१४१॥


तीर्थोंमें और सब दानोंमें जो पुण्य है, वह फल नवरात्रमें इस रामायणका फल करनेमें है ॥ १२३ ॥ नवरात्रमें जो लोग एक श्लोक अथवा श्लोकके एक चरणका भी पाठ करेंगे, वे मोक्षके भागी होंगे ॥१२४॥ इस तरह प्रतिदिन कौसल्या और रामका पूजन करना चाहिए । उन समय पुत्रवान् स्त्रीके पूजनका विधान है ॥ १२५ ॥ इस सब परस्पर पुत्रवान् ब्राह्मणोंके भी पूजनका विधान मङ्गल माना गया है । पूजनके बाद उन विविधप्रकारके वस्त्र, अलङ्कार और तरह तरहके भोजन दे ॥ १२६ ॥ इस विधिसे नवरात्रका विसर्जनकर नवमः तिथिको वाहनपर आरूढ रामका पूजन करके भेरी, मृदंग, शहनाई, दुन्दुभी आदिके गम्भीर निनाद, गणिकाओंके नृत्य, गायकोंके गायन आदि नाना प्रकारके उत्साहसहित सुन्दर छत्रसे सुशोभित, चमरसे अलंकृत, पुष्पक विमानपर आरूढ रामचन्द्रजीको रामतीर्थपर ले जाकर रथपरसे चढ़ा तथा पवित्र जलसे स्नान करावे ॥ १२७-१३० ॥ स्नान कराते समय रुद्रसूक्त, विष्णुसूक्त अथवा सहस्रनामावलिका पाठ कराया जाय । पहले ही जलमें विविध प्रकारके मङ्गलमय द्रव्य मिला ले ॥ १३१ ॥ इस तरह मङ्गलद्रव्य मिले जलसे रचित कटोरेको मङ्गलस्नान कहते हैं । यह केवलमात्र किया जाता है और बडी कठिनतासे लोगोंको ऐसा सुयोग प्राप्त होता है ॥ १३२ ॥ उस स्नानके पश्चात्सुखो रित्तो व संडे डाल दे और पूज्यके जितन लोग सम्मिलित हुए हों, वे सब उस तीर्थमें जाकर स्नान करें । तभी प्राणोंका मङ्गलस्नानका फल प्राप्त होता है ।। १३३ ।। १३४ ॥ पुष्कर आदि तीर्थों तथा गङ्गा आदि नदियोंमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वह फल मङ्गलस्नान करनेवालेको प्राप्त होता है ॥ १३५ ॥ इस तरह सीता समेत रामको स्नान कराकर उनकी पूजा करे और पूर्वोक्त बाजे गाजेके साथ फिर उन्हें अपने घर ले जावे ॥ १३६ ॥ घरपर रामको लाकर उनकी पूजा करे । तदनन्तर आनन्दरामायणका पारायण समाप्त करके पुस्तककी पूजा करे ॥ १३७ ॥ नाना प्रकारके उत्सव मनाता हुआ दिन बितावे और रात-भर जागरण करे । दशमीको सबेरे उठे और निष्ठापूर्वक मिलकर बहुतसे ब्राह्मणोंको भोजन करावे ॥ १३८ ॥ इसके बाद गुरुकी पूजा करके उन्हें सब वस्तुयें दान दे । तत्पश्चात् सम्बन्धियों और मित्रोंके साथ स्वयं भोजन करे ॥ १३९ ॥ चैत्रके नवरात्रमें इस तरह व्रत करनेका विधान बतलाया गया है । इसीलिए लोगोंने चैत्रके

६८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०


अतः परं प्रवक्ष्यामि चैत्रोद्यापनकं विधिम् । यत्कृत्वा सफलं सर्वं चैत्रस्नानं तु जायते ॥१४२॥
चैत्रे मासि सिते पक्षे या चैकादशी तिथिः । सर्वासु तिथिषु श्रेष्ठा चोपोष्या व्रतकाङ्गिभिः ॥१४३॥
श्रेष्ठा सा द्वादशी ज्ञेया यस्यां तु यमपूजनम् कार्यं दध्योदनं दत्त्वा जलकुंभः प्रदीयताम् ॥१४४॥
तिस्रश्च तिथयः श्रेष्ठाश्चैत्रे मासि महत्ससाः । त्रयोदशी तथाभूता पौर्णमासी तथैव च ॥१४५॥
यासु स्नानञ्च दानं च सर्ववाञ्छितदायकम् । येनै स्नानं चैत्रमासे न स्नातं नवरात्रके । १४६॥
तैस्तु चांत्यादिने स्नात्वा चैत्रस्नानफलम्भजेत् । तासु श्रेष्ठा पूर्णिमा हि सर्वपातकनाशिनी ॥१४७।
तस्यामुद्यापनं प्रोक्तं चैत्रस्नानफल प्रये । उपोष्य च चतुर्दश्यां पूर्ववन्मण्डपादिकम् ॥१४८।
कृत्वा तस्मिन् धान्यराशीं कलशं वारिपूरितम् । स्थापयित्वा तदुपरि हेमपात्रं सुविस्तृतम् ॥१४९॥
पंचरत्नयुतं स्थाप्य वस्त्रेणाच्छादयेच्च तत् । तस्मिन्सीतायुतं रामं सौवर्णे विधिपूर्वकम् ॥१५०॥
भ्रातृभिर्वायुपुत्रेण सुग्रीवेण समन्वितम् । विभीषणाङ्गदाभ्यां तु जांबवन्महिते तथा । १५१।
पूजयेद्देवदेवेशं परं गुरुनुलया । उपचारैः षोडशभिर्नानाभक्ष्यसमन्वितैः । १५२॥
रात्रौ जागरणं कुर्याद्गीतवाद्यादिमङ्गलैः । ततस्तु पौर्णमाश्यां च सपत्नीकान् द्विजोत्तमान् । १५३॥
त्रिंशन्मितानथैकं वा स्वशक्त्या वा निमन्त्रयेत् । ततस्तान् भोजयेद्विप्रांन्नानाभक्ष्यान्नादिना व्रती ॥१५४।
अतो देवा इति ह्यर्चा जुहुयात्तिलसर्पिषा । प्रीणयेद् देवदेवेशं देवांश्च पृथक् पृथक् ॥१५५॥
दक्षिणां च यथाशक्त्या प्रदद्याच्च ततो नमेत् पुनर्देवं समभ्यर्च्य देवांश्च तुलसीं तथा ॥१५६॥
ततो गां कपिलां तत्र पूजयेद्विधिना व्रती । गुरुञ्चतोपयेद्वार वस्त्रालङ्कारमण्डनैः । १५७॥
सपत्नीकं समभ्यर्च्य ततो विप्रान् क्षमापयेत् । युष्मत्प्रसादाद्देवशः सुप्रसन्नोऽस्तु वै मम ॥१५८॥

नवरात्रको बहुत ही श्रेष्ठ माना है। १४०॥ नवरात्रमं तो रामनवम्या परमाह्लाददायिनी है इसके समान शुभव्रद तिथि चैत्रमास भरमे कोई भी नहीं है ॥ १४१॥ इसके अनन्तर चैत्रके उस उद्यापनका विधान बतलाते हैं, जिसके करनेसे चैत्रस्नान सफल हो जाता है ॥ १४२॥ चैत्रमासके शुक्लपक्षमें जो एकादशी पड़ती है, वह सब तिथियोंमें श्रेष्ठ होती है। इसलिए चैत्रव्रत करनेवालोंको यह एकादशीव्रत अवश्य करना चाहिए । १४३। इसी तरह चैत्र शुक्लपक्षकी द्वादशी भी श्रेष्ठ है। इस रोज दही-भातस यमका पूजन करके जलसे पूर्ण घड़ेका दान करना चाहिए ॥ १४४॥ चैत्रमास भरमें तीन तिथियाँ श्रेष्ठ हैं। जैसे-द्वादशी, त्रयोदशी और पूर्णिमा ॥ १४५॥ इनमें स्नान-दान करनेसे ये तिथियाँ सब कामनाओंको पूर्ण करती हैं। जिसने चैत्रस्नान नहीं किया और जो नवरात्रस्नान भी नहीं कर पाया, वह अन्तिम दिन अर्थात् पूर्णिमाको स्नान करके चैत्रस्नानका फल प्राप्त कर लेता है। क्योंकि चैत्र भरकी सब तिथियोंमें पूर्णिमा तिथि श्रेष्ठ है और सब पातकोंको नष्ट करती है । १४६ ॥ १४७॥ अतः चैत्रस्नानका फल पानेके लिए इस पूर्णिमामें ही उद्यापन करना चाहिए। इसका विधान यह है कि चतुर्दशीको उपवास करके पूर्ववत् मण्डप आदि बनावे और उसमें धान्यराशि तथा वारिपूर्ण कलश रखकर उसके ऊपर एक बड़ासा स्वर्णपात्र रक्खे ॥ १४८ । १४९ ॥ उसमे पंचरत्न डालकर वस्त्रस ढक दे। तदनन्तर सीता, लक्ष्मण आदि भ्राताओं, हनुमान्जी, सुग्रीव, विभीषण, अङ्गद तथा जाम्बवान् सहित रामकी सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करके गुरुकी आज्ञासे वेष वशेण रामकी षोडश उपचारों एवं विविध भक्ष्य पदार्थोंस पूजन करे ॥ १५०-१५२॥ रात्रि भर जागरण करता हुआ गावे-बजावे और सवेरे हाथ सपत्नीक ब्राह्मणों अथवा जैसा सामर्थ्य हो उसके अनुसार ब्राह्मणोंको बुलाकर खीर-पूरी आदि भोजन करावे ॥ १५३ । १५४॥ इसके बाद 'अतो देवा' इस मन्त्रके द्वारा तिल और घीसे हवन करे। इस हवनसे देवदेव राम तथा अन्यान्य देषत ओंको प्रसन्न किया जाता है ।॥ १५५॥ यह सब करनेके बाद ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा देकर प्रणाम करे। फिर समस्त देवताओं तथा तुलसी देवीक फिरस पूजन करके विधिपूर्वक कपिला गौका पूजन करे और नाना प्रकारके वस्त्र-आभूषण देकर बनके उपदेश सपत्नीक गुरुकी पूजा कर ॥ १५६ ॥ १५७॥ यह सब करनेके बाद ब्राह्मणोंसे क्षमाप्रार्थना करता हुआ

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ५८३


अतादस्माच्च यत्पापं सप्तजन्मकृतं मया । तत्सर्वं नाशमायातु स्थिरा मे चास्तु संततिः ॥ १५९॥
मनोरथास्तु सफलाः संतु नित्यं ममार्चनात् । देहांते वैष्णवं स्थानं मम चास्त्वतिदुर्लभम् ॥ १६०॥
इति क्षमाप्य तान् विप्रान् प्रसाद्य च विसर्जयेत् । तामर्चां गुरवे दद्याद्रत्नपुष्कां सदा व्रती ॥ १६१॥
ततः सुहृत्प्रियैर्युक्तः स्वयं भुंजीत भक्तिमान् । एवमुद्यापनविधिंश्चैत्रस्नानफलाप्तये ॥ १६२॥
सविस्तरश्च कर्तव्यश्चैत्रस्नानपरायणैः । एवं यः कुरुते सम्यक् चैत्रस्नानव्रतं नरः ॥ १६३॥
सर्वपापैर्विनिर्मुक्तो विष्णुमायुज्यमाप्नुयात् । सर्वव्रतैः सर्वतीर्थैः सर्वदानैश्च यत्फलम् ॥१६४॥
तत्कोटिगुणितं पुण्यं सम्यगस्य विधानतः । देहस्थितानि पापानि नाशमायांति तद्भयात् ॥१६५॥
क्व यास्यामो वदंत्येवं यच्चैत्रव्रतकृन्नरः । तस्मादवश्यमेवैतच्चैत्रस्नानं समाचरेत् ॥१६६॥
श्रीचैत्रव्रतकथनं पठन्ति भक्त्या ये वै तद्द्विजयतिवैष्णवान्वदिभिः ।
ते सम्यक् व्रतकरणात् फलं लभन्ते तत्सर्वं कलुषविनाशनं लभन्ते ॥ १६७॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे
आदिकाव्ये चैत्रमहिमवर्णनं नाम दशमः सर्गः ॥ १० ॥


एकादशः सर्गः

( चैत्रस्नानस्य माहात्म्य )

विष्णुदास उवाच
किमर्थं सर्वमासेषु चैत्रमासः स्मृतो वरः । तत्कारणं वदस्वाद्य गुरो संतोषहेतवे ॥ १ ॥

श्रीरामदास उवाच
शृणु शिष्य महाबुद्धे सम्यक् पृष्टं त्वया मम । ब्रह्मप्रार्थनया विष्णुर्र्यदा भूम्यां द्विजोत्तम ॥ २ ॥
अयोध्यापालकस्याथ राज्ञो दशरथस्य हि । कौसल्यायास्तु भार्याया जठरान्निर्गतो बहिः ॥ ३ ॥


कहे कि आप लोगोंकी कृपासे देवेश रामभद्रजी हमपर सदा प्रसन्न रहें ॥ १५८ ॥ मैंने सात जन्म तक जो पाप किये हों, वे इस व्रतसे नष्ट होजायँ और मेरी सन्तति स्थायी हो ॥ १५९ ॥ इस पूजनके प्रभावसे मेरे सब मनोरथ सफल हों और देहान्त होनेपर हम अतिशय दुर्लभ वैकुण्ठ धाम प्राप्त हो ॥ १६० ॥ इस तरह क्षमायाचना करके उन ब्राह्मणोंको प्रसन्न करता हुआ विदा करे और रत्न तथा प्रतिमा समेत पूजनकी सब वस्तुयें गुरुको दान दे दे ॥ १६१ ॥ इसके बाद नातेदारों और मित्रोंके साथ भोजन करे। इस तरह चैत्रमासका फल प्राप्त करनेके लिए उद्यापन करनेका विधान है ॥ १६२ ॥ जो लोग चैत्रमासके व्रतमें लगे हों, उन्हें विस्तारसे यह उद्यापन करना चाहिए । जो मनुष्य अच्छी तरह चैत्रस्नानका व्रत करता है, वह सब पातकोंसे छूटकर विष्णुभगवान्की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है। समस्त व्रतों, सब तीर्थों और समस्त दानोंसे जो फल प्राप्त होता है, उसका करोड़ोंगुना अधिक फल इस चैत्रमासके व्रतसे प्राप्त होता है। इसके भयसे चैत्रव्रतीके देहमें रहनेवाले समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं। वे पाप कहते हैं कि अब हम कहाँ जायें ? अतः चैत्रव्रत करनेवाले मनुष्यको चैत्रस्नान अवश्य करना चाहिए । १६३-१६६ ॥ जो लोग इस चैत्रव्रतकी कथाको पढ़ते या विप्र तथा संन्यासी वैष्णवोंको सुनाते हैं, वे अच्छी तरह व्रत करनेका फल पाते हैं और उनके समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ १६७ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत 'ज्योत्स्ना'-भाषाटीकासहिते मनोहरकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥

विष्णुदास बोले—हे गुरुदेव ! सब मासोंमें यह चैत्रमास क्यों श्रेष्ठ माना गया है ? सो मेरे सन्तोषके लिए कहिए ॥ १ ॥ श्रीरामदासने कहा-हे महाबुद्धिमान् शिष्य ! तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया है। मैं

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३८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

चैत्रे मासि सिते पक्षे नवम्यां परमे दिने । पुनर्वस्वृक्षसंयुक्त प्रोच्चस्थे ग्रहपंचके ॥ ४ ॥
मध्याह्ने प्रकटो जातः श्रीरामो राजसद्मनि । आनन्दश्च तदा जातः सर्वत्र जगतीतले ॥ ५ ॥
देवदुंदुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः शुभावपत् । राजसद्मनि वाद्यानां संघा नेदुः पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥
ननृतुर्वारनार्यश्च जगुर्गीतं मनोरमम् । तदा सर्वं हि भूमिस्या जना द्रष्टुं शिशुं शुभम् ॥ ७ ॥
प्रययुर्नृपजं बालं दृष्ट्वा मुदमवाप्नुयुः । नानाविमानमारूढा दिवि देवाः सवासवाः । ८ ॥
मिलित्वा राघवं द्रष्टुं कौसल्याजठरोद्भवम् । ब्रह्मा रुद्रश्च सूर्य्यश्च देवेंद्रोऽदितिसुताः शुभाः । ९ ॥
उत्सवान् विदधुः सर्वं तदा श्रीरामजन्मनि । एवमुत्साहसमये देवा हर्षाद्दिवि स्थिताः । १० ॥
नमस्कृत्य रामचन्द्रं तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः । प्रोचुस्तदा सुराः सर्वे हर्षाहर्षं रघूत्तमम् ॥ ११ ॥
अद्य धन्या वयं देव मुक्ताश्चासुरजद्भयात् । यन्निमित्तं त्वया देव ह्यवतारः कृतो भुवि , १२॥
अस्माकं हर्षकालोऽयं नैवदेव कृपानिधे । तस्मादयं सदा पुण्यः श्रेष्ठः कालो भविष्यति ॥१३॥
त्वं चाप्यंगीकुरुष्व द्य देह्यस्मै सुवहून् वरान् इति तेषां वचः श्रुत्वा देवानां राघवः शुभम् ॥ १४।
तुतोष नितरां तेषु वरंदेषु भगवान्हरिः ।

श्रीराम उवाच
सम्यक् प्रोक्तं सुराः सर्वे त्रैलोक्योपकारकम् १५।
भवद्भिः प्रार्थितोऽहं तु हर्षकाले महत्समे । शृणुध्वं वचनं मेऽद्य यद्वषांत्प्रोच्यते मया ।। १६ ।।
सर्वषामेव मासानां श्रेष्ठोऽयं भविष्यति । वैशाखात्कात्तिकः श्रेष्ठः कार्त्तिकान्माघ एव च । १७।
माधमासादथाद्य चैत्रमासो भविष्यति । चैत्रमासे कृतं दत्तं हुतं स्नातं विचितितम् । १८ ॥
सर्वं कोटिगुणं प्रोक्तमयोध्यायां विशेषतः । यत्पुण्यञ्च समेधेन यद्गोमेधेन वै फलम् ॥ १९।
यत्फलं सोमयागेन तच्चैत्रे स्नानमात्रतः । सूर्य्यग्रहे कुरुक्षेत्रे यत्पुण्यः स्नानदानतः । २० ।


उसका उत्तर देता हूँ सुनो-॥ २ । अयोध्या नगरीक पालक महाराज दशरथकी रानी कौमल्याके उदरसे चैत्रमासके शुक्लपक्षको नवमी तिथिको पुनर्वसु नक्षत्रमे जब कि पांच ग्रह केंच स्थानमे वैठे थे, तव मध्याह के समय अयोध्या दशरथक घरम श्रीरामचन्द्रजी अवतरे । उस समय जगततलमें सर्वत्र आनन्द छा गया ॥३-५॥
देवताभान दुन्दुभियां बजायी और पुष्पवृष्टि की । राजाके महलोंमें अलग-अलग विविध प्रकारके बाजे बजे ॥ ६ ॥ वेश्याय नाचन और गाने लगीं उस समय पृथ्वीमण्डलके प्रमुख मनुष्य उस बच्चेको देखनेके लिए आये और उस देख देखकर बड़ प्रसन्न हुए । उसो तरह नाना प्रकारके विमानोपर चढ़-चढ़कर इन्द्र आदि देवता भी एकत्र होकर कौसल्याके गभस उत्पन्न रामको देखनेके लिए आये । उस समय ब्रह्मा, रुद्र, सूर्य तथा देवेन्द्र आदि देवताओने श्रीरामचन्द्रजीके जन्मक उपलक्ष्यमे विविध उत्सव किये । इस तरह उत्साहके समय आकाशमे विद्यमान दबला रामको प्रणाम करके ना। प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति कर रहे थे । समय पाकर देवतालोंने रामसे कहा- । ७-११ ॥ हे देव ! अज हम लोग धन्य हैं । अब हम लोग राक्षसोंके भयसे मुक्त हो गये । क्योंकि इसीलिए आपने अवतार लिया है ॥ १२ ॥ हे देव ! हे कृपानिधे ! यह हम लोगोंके लिए महान् हर्षका समय है । इसीके कारण यह पवित्र समय सर्वश्रेष्ठ माना जायगा ॥ १३ ॥ आप भी इस बातको अङ्गीकार करते हुए इस समयको बहुतसे वरदान दीजिए । उनकी ऐसी बात सुनकर भगवान् रामचन्द्रजी उन-पर बहुत प्रसन्न हुए और कहा-हे देवताओ ! आपलोगोंने बड़ी अच्छी बात कही है और तीनो लोकोंके उपकार करनेवाले विविध स्तोत्रोंसे स्तुति की है। इससे मै बहुत प्रसन्न होकर कहता हूँ । १४-१६ ॥ यह मास सब मासोंमें श्रेष्ठ होगा । वैशाखसे कार्तिक श्रेष्ठ है, कार्तिकस माघ श्रेष्ठ है और माघस भी यह चैत्रमाह श्रेष्ठ होगा । इस मासमें किया हुआ दान, हवन, स्नान और ध्यान यह सब कर्म करोड़गुना फल देगा और अयोध्यामे तो उससे भी विशेष फल प्राप्त होगा जो फल अश्वमेधसे होता है, जो फल गोमेधसे होता है

६८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

चैत्रे मासि सिते पक्षे नवम्यां परमे दिने । पुनर्वस्वर्क्षसंयुक्त प्रोच्चस्थे ग्रहपंचके ॥ ४ ॥
मध्याह्ने प्रकटो जातः श्रीरामो राजसद्मनि । आनन्दश्च तदा जातः सर्वत्र जगतस्तले ॥ ५ ॥
देवदुंदुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः शुभावपत् । राजसद्मनि वाद्यानां संघा नेदुः पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥
ननृतुर्वारनार्यश्च जगुर्गीतं मनोरमम् । तदा सर्वं हि भूमिस्या जना द्रष्टुं शिशुं शुभम् ॥ ७ ॥
अययुर्नृपजं बालं दृष्ट्वा मुदमवाप्नुयुः । नानाविमानमारूढा दिवि देवाः सवासवाः ॥ ८ ॥
मिलित्वा राघवं द्रष्टुं कौसल्याजठरोद्भवम् । ब्रह्मा रुद्रश्च सूर्यश्च देवेंद्रायसुराः शुभाः । ९ ॥
उत्सवान् विदधुः सर्वं तदा श्रीरामजन्मनि । एवमुत्साहसमये देवा हर्षाद्दिवि स्थिताः ॥ १०॥
नमस्कृत्या रामचंद्रं तुष्टुवुविविधैः स्तवैः । प्रोचुस्तदा सुराः सर्वे हर्षार्हं रघूत्तमम् ॥ ११॥
अद्य धन्या वयं देव मुक्ताश्चासुरजाद्भयात् । यन्निमित्तं त्वया देव ह्यवतारः कृतो भुवि ॥ १२॥
अस्माकं हर्षकालोऽयं नैवदेव कृपानिधे । तस्मादयं मदा पुण्यः श्रेष्ठः कालो भविष्यति ॥ १३॥
त्वं चाप्यंगीकुरुष्व ह्य देह्यस्मै सुवहून् वरान् इति तेषां वचः श्रुत्वा देवानां राघवः शुभम् ॥ १४॥
तुतोष नितरां तेषु वरेषु भगवान्हरिः ।
श्रीराम उवाच
सम्यक् प्रोक्तं सुराः सर्वे त्रैलोक्योपकारकम् १५ ।
भवद्भिः प्रार्थितोऽहं तु हर्षकाले महत्समे । शृणुध्वं वचनं मेऽद्य यत्पर्वांप्रोच्यते मया ॥ १६॥
सर्वषामेव मासानां श्रेष्ठोऽयं भविष्यति । वैशाखात्कात्तिकः श्रेष्ठः कार्तिकात्माघ एव च ॥ १७॥
माधमासादथावाय चैत्रमासो भविष्यति । चैत्रमासे कृतं दत्तं हुतं स्नातं त्रिवितिनम् । १८॥
सर्वं कोटिगुणं प्रो क्तमयोध्यायां विशेषतः । यत्प्प्लवाश्व समेधेन यद्गोमेधेन वै फलम् ॥ १९ ।
यत्फलं सोमयागेन तच्चैत्रे स्नानमात्रतः । सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे यत्पुण्यः स्नानदानतः ॥ २०।

उसका उत्तर देता हूँ सुनो-॥ २ । अयोध्या नगरीके पालक महाराज दशरथकी रानी कौसल्याके उदरसे चैत्रमासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको पुनर्वसु नक्षत्रमें जब कि पाँच ग्रह ऊंच स्थानमें बैठे थे, तब मध्याह्नके समय अवधेश दशरथके घरमें श्रीरामचन्द्रजी अवतरे । उस समय जगततलमें सर्वत्र आनन्द छा गया ॥ ३-५॥ देवताओने दुन्दुभियां बजायीं और पुष्पवृष्टि की । राजाके महलोंमें अलग-अलग विविध प्रकारके बाजे बजे ॥ ६ ॥ वेश्याय नाचन और गाने लगीं उस समय पृथ्वीमण्डलके प्रमुख मनुष्य उस बच्चेको देखनके लिए आये और उस देख देखकर बड़ प्रसन्न हुए । उसी तरह नाना प्रकारके विमानोंपर चढ़-चढ़कर इन्द्र आदि देवता भी एकत्र होकर कौसल्याके गर्भस उत्पन्न रामको देखनके लिए आये । उस समय ब्रह्मा, रुद्र, सूर्य तथा देवेन्द्र आदि देवताओंने श्रीरामचन्द्रजीके जन्मक उपलक्ष्यमे विविध उत्सव किये । इस तरह उत्साहके समय आकाशमे विद्यमान दयता रामको प्रणाम करके नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति कर रहे थे । समय पाकर देवताओने रामसे कहा- । ७-११॥ हे देव ! आज हम लोग धन्य हैं। अब हम लोग राक्षसोंके भयसे मुक्त हो गये । क्योंकि इसीलिए आपने अवतार लिया है ॥ १२ ॥ हे देव ! हे कृपानिधे ! यह हम लोगोंके लिए महान् हर्षका समय है । इसीके कारण यह पवित्र समय सर्वश्रेष्ठ माना जायगा ॥ १३ ॥ अप भी इस बातको अङ्गीकार करते हुए इस समयको बहुतसे वरदान दीजिए । उनकी ऐसी बात सुनकर भगवान् रामचन्द्रजी उनपर बहुत प्रसन्न हुए और कहा-हे देवताओ ! आपलोगोंने बड़ी अच्छी बात कही है और तीनों लोकोंके उपकार करनेवाले विविध स्तोत्रोंसे स्तुति की है। इससे मैं बहुत प्रसन्न होकर कहता हूँ । १४-१६ ॥ यह मास सब मासोंमें श्रेष्ठ होगा । वैशाखसे कार्तिक श्रेष्ठ है, कार्तिकसे माघ श्रेष्ठ है और माघसे भी यह चैत्रमास श्रेष्ठ होगा । इस मासमें किया हुआ दान, हवन, स्नान और ध्यान यह सब कर्म करोड़गुना फल देगा और अयोध्यामे तो उससे भी विशेष फल प्राप्त होगा जो फल अश्वमेधसे होता है, जो फल गोमेधसे होता है