श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ३ } मनोहरकाण्डम् ५७५
सर्गः ३ } मनोहरकाण्डम् ५७५
नमः सत्याय शुद्धाय बुध्द्याय ज्ञानरूपिणे । गृहाणाचमनं देव सर्वलोकैकनायक ॥८१॥
ब्रह्मांडोदरमध्यस्थैस्तीर्थेश्च रघुनन्दन । स्नापयिष्याम्यहं भक्त्या त्वं गृहाण जनार्दन ॥८२॥
संतप्तकांचनप्रख्यं पीतांबरमिमं हरे । संगृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥८३॥
श्रीरामाच्युत यज्ञेश श्रीघनानन्द राघव । ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण रघुनायक ॥८४॥
किरीटहारकेयूररत्नकुंडलमेखलाः । ग्रैवेयकौस्तुभं हारं रत्नकंकणनूपुरान् ॥८५॥
एवमादीनि सर्वाणि भूषणानि रघूत्तम । अहं दास्यामि ते भक्त्या संगृहाण जनार्दन ॥८६॥
कुंकुमागकुकस्तूरीकर्पूरेणमिश्रचन्दनम् । तुभ्यं दास्यामि विश्वेश श्रीराम स्वीकुरु प्रभो ॥८७॥
तुलसीकुन्दमन्दारजातिपुन्नागचम्पकैः । कदंबकरवीरैश्च कुसुमैः शतपत्रकैः ॥८८॥
नीलांबुजैर्बिल्वदलैः पुष्पमाल्यैश्च राघव । पूजयिष्याम्यहं भक्त्या संगृहाण नमोऽस्तु ते ॥८९॥
वनस्पतिरसैर्दिव्यैर्गन्धाढ्यैः सुमनोहरैः । रामचन्द्र महीपाल धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥९०।
ज्योतिषां पतये तुभ्यं नमो रामाय वेधसे । गृहाण दीपकं राजंस्त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥९१॥
इदं दिव्यान्नममृतं रसैः षड्भिरन्वितम् । श्रीराम राजराजेन्द्र नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥९२॥
नागवल्लीदलैर्युक्तं पूगीफलसमन्वितम् । तांबूलं गृह्यतां राम कर्पूरादिममन्वितम् ॥९३॥
मङ्गलार्थं महीपाल नीराजनमिदं हरे । संगृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥९४॥
अथ नमस्काराष्टकमन्त्राः
ॐ नमो भगवते श्रीरामाय परमात्मने । सर्वभूतान्तरस्थाय सीतीताय नमो नमः ॥९५॥
ॐ नमो भगवते श्रीराम रामचन्द्राय वेधसे । सर्ववेदांतवेद्याय सीताय नमो नमः ॥९६॥
ॐ नमो भगवते श्रीविष्णवे परमात्मने । परात्पराय रामाय सीताय नमो नमः ॥९७॥
किये हुए इस पूजनको ग्रहण करिए ॥८०॥ सत्य, शुद्ध, बुद्ध्य और ज्ञानस्वरूप सत्यवान्को प्रणाम है । हे देव ! हे सर्वलोकैकनायक ! मेरे दिये हुए इस आचमनको आप ग्रहण करें ॥८१॥ ब्रह्माण्डमें जितने तीर्थ हैं, उनके जलसे मैं आपको स्नान कराऊँगा सो आप स्वीकार करें ॥८२॥ हे हरे ! अच्छी तरह तपाये हुए सुवर्णके समान इस पीताम्बरको आप ग्रहण कीजिए । हे जगन्नाथ ! हे रामचन्द्र ! आपको प्रणाम है ॥८३॥ हे श्रीराम ! हे अच्युत ! हे यज्ञेश ! हे श्रीघनानन्द ! हे राघव ! हे रघुनायक ! उत्तरीय वस्त्रके साथ दिये हुए मेरे इस यज्ञोपवीतको आप ग्रहण करें ॥८४॥ किरीट, हार, केयूर, रत्नजड़ित कुण्डल, मेखला, माला, कौस्तुभका हार, रत्नजटित कंकण, नूपुर, इस प्रकार सब तरहके आभूषण मैं आपको भक्तिपूर्वक दूंगा, सो आप ग्रहण करिए ॥८५ । ८६॥ कुमकुम, अगरु, कस्तूरी तथा कपूरसे मिश्रित चन्दन हे विश्वेश ! हे श्रीराम ! हे प्रभो ! मैं आपको दूंगा। सो आप स्वीकार करें ॥८७॥ तुलसी, कुन्द, मन्दार, जूही, पुन्नाग, चम्पक, कदम्ब, करवीर तथा शतपत्रके फूल, नीलकमल, बिल्वपत्र और पुष्पमाल्यादिसे मैं आपका पूजन करूँगा । उसे आप ग्रहण करें। मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥८८ । ८९॥ वनस्पतिके दिव्य रसों और सुगन्धसे मिश्रित दिव्य धूप आपको आघ्रापन कराऊँगा हे रामचन्द्र, हे महीपाल ! आप इसे ग्रहण करें ॥९०॥ संसारके सारे ज्योतिर्मय पदार्थोंके पति हे राम ! हे वेध ! आपको नमस्कार है । हे राजन् ! तीनोंलोकका अंधकार नष्ट करनेवाले इस दीपकको आप ग्रहण करिए । छः रसोंसे युक्त तथा अमृतके समान सुस्वादु यह दिव्यान्न तैयार है । हे श्रीराम ! हे राजराजेन्द्र ! आप इस नैवेद्यको ग्रहण करिए ॥९१ । ९२॥ पानके पत्तोंसे जोड़े हुए, सुपारी तथा कर्पूरादि मसालोंसे युक्त इस ताम्बूलको आप ग्रहण करें ॥९३॥ हे महीपाल ! हे हरे ! मङ्गलके निमित्त दिये हुए मेरे इस नीराजनको आप ग्रहण करें। हे जगन्नाथ ! हे रामचन्द्र आपको प्रणाम है ॥९४॥ अब आठ नमस्कार बतलाते हैं । भगवान्, श्रीराम, परमात्मा, सब प्राणियोंके भीतर रहनेवाले, सीताके माप रामचन्द्रज- को प्रणाम है ॥९५॥ भगवान् श्रीरामचन्द्र, ब्रह्मा और सब वेदांत जाननेवाले सीताके पति रामको प्रणाम है ॥९६॥ भगवान् विष्णु, परमात्मा, परात्पर एवं सीताके साथ विराजमान रामको प्रणाम है ॥९७॥
५७६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
ॐ नमो भगवते श्रीरघुनाथाय शार्ङ्गिणे । चिन्मयानन्दरूपाय ससीताय नमो नमः ॥९८॥
ॐ नमो भगवते श्रीराम श्रीकृष्णाय चक्रिणे । विशुद्धज्ञानदेहाय ससीताय नमो नमः ॥९९॥
ॐ नमो भगवते श्रीवासुदेवाय धीविष्णवे । पूर्णानन्दरूपाय ससीताय नमो नमः ॥१००॥
ॐ नमो भगवते श्रीराम रामभद्राय वेधसे । सर्वलोकशरण्णाय ससीताय नमो नमः ॥१०१॥
ॐ नमो भगवते श्रीरामयामिततेजसे । ब्रह्मानन्दैकरूपाय ससीताय नमो नमः ॥१०२॥
इति नमस्काराष्टकमन्त्रा ।
नृत्यगीतादिवाद्यादिपुराणपठनादिभिः । राजोपचारैर्निखिलैः सन्तुष्टो भव राघव ॥१०३॥
विशुद्धज्ञानदेहाय रघुनाथाय वेधसे । अन्तःकरणशुद्धिं देहि मे रघुनन्दन ॥१०४॥
नमो नारायणानंत श्रीराम करुणानिधे । मामुद्धर जगन्नाथ घोरान्संसारसागरात् ॥१०५॥
रामचन्द्र महेश्वास शरणागतवत्सर । त्राहि मां सर्वलोकेश तापत्रयमहाबलात् ॥१०६॥
श्रीकृष्ण श्रीकर श्रीश श्रीराम श्रीनिधे हरे श्रीनाथ श्रीमहारिष्णो श्रीनृसिंह कृपानिधे ॥१०७॥
गर्भजन्मजराव्याधिघोरसंसारसागरात् मामुद्धर जगन्नाथ कृष्ण विष्णो जनार्दन ॥१०८॥
श्रीराम गोविन्द मुकुंद कृष्ण श्रीनाथ विष्णो भगवन्नमस्ते ।
प्रौढारिषड्वर्गमहाभयेभ्यो मां त्राहि नारायण विश्वमूर्ते । १०९ ॥
श्रीरामाग्रज यज्ञेश श्रीधरानन्द राघव । श्रीगोविन्द हरे विष्णो नमस्ते जानकीपते ॥११०.।
ब्रह्मानन्दैकविज्ञनं त्वन्नामस्मरणं नृणाम् । स्वत्पादाम्बुजसद्भक्तिं देहि मे रघुपल्लभ । १११ ।
नमोऽस्तु नारायण विश्वमूर्ते नमोऽस्तु ते शाश्वत विश्वयोने ।
त्वमेव विश्वं सचराचरं च त्वामेव सर्वं प्रवदन्ति सन्तः ॥११२॥
नमोऽस्तु ते कारणकारणाय नमोऽस्तु कैवल्यफलप्रदाय
नमो नमस्तेऽस्तु जगन्मयाय वेदान्तवेद्याय नमो नमस्ते ।११३
भगवान् श्रीरघुनाथ, शार्ङ्गी चिन्मयानन्दरूप और सीतासहित रामको प्रणाम है । ९८ ॥ भगवान् श्रीरामकृष्ण चक्री, विशुद्ध ज्ञानदेहधारी, सीता के साथ रामको प्रणाम है, ९९ ॥ भगवान् श्रीवासुदेव-स्वरूप विष्णु पूर्णानन्दरूप सीताके साथ रामको प्रणाम है ॥१००॥ भगवान् श्रीरामभद्र, वेधा (ब्रह्मा) और सब लोगोंके शरणदाता सीताके साथ रामको प्रणाम है ॥१०१॥ जो अनन्त तेजधारी भगवान् रामचन्द्रजी हैं। उन ब्रह्मानन्दके एकमात्र रूपधारी सीताके साथ रामको प्रणाम है ॥१०२॥ हे राघव ! मेरे नृत्य, गीत, वाद्य तथा पुराण पठन आदि समस्त राजोचित उपचारांसे आप प्रसन्न हो । १०३ ॥ विशुद्ध ज्ञानरूप देह धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजीको प्रणाम है। हे रघुनन्दन ! आप हमें अन्तःकरणकी शुद्धि प्रदान करिए । १०४॥ हे नारायण ! हे अनन्त ! हे श्रीराम ! हे करुणानिधे ! आपको प्रणाम है। हे जगन्नाथ ! हमारा घोर संसारसागरसे उद्धार करें ॥१०५॥ हे रामचन्द्र ! हे महेश्वास ! हे शरणागतवत्सल ! हे सर्वलोकेश ! इस तापत्रयरूपी महानलसे बचाइए ॥१०६॥ हे कृष्ण ! हे श्रीश ! हे श्रीराम ! हे श्रीनिधे ! हे श्रीनाथ ! हे महाविष्णो ! हे श्रीनृसिंह ! हे कृपानिधे ! गर्भ, जन्म, जरा तथा व्याधिरूप घोर संसारसागरसे मुझे उद्धारिए ! हे जगन्नाथ ! हे कृष्ण ! हे विष्णो ! हे जनार्दन ! १०७-१०८॥ हे श्रीराम ! हे गोविन्द ! हे मुकुन्द ! हे कृष्ण ! हे श्रीनाथ ! हे विष्णो ! हे भगवन् ! आपको नमस्कार है । हे नारायण ! हे विश्वमूर्ति ! प्रौढ़ अरिषड्वर्गके महाभयसे मेरी रक्षा करिए । १०९ हे श्रीराम ! हे अग्रभुन ! हे यज्ञेश ! हे श्रीधरानन्द राघव ! हे गोविन्द ! हे हरे ! हे विष्णो ! हे जानकीपत, आपको नमस्कार है । ११० ॥ हे रघुपल्लभ ! आपका नामस्मरण ब्रह्मानन्दक विज्ञानको उत्पन्न करता है। आप हम अपने चरणकमलकी सद्भाक्ति प्रदान करिए ॥ १११ ॥ हे कारणोंके भी कारण ! आपको नमस्कार है। हे कैवल्य फल प्रदान करनेवाले प्रभो ! आपको प्रणाम है । हे जगन्मय ! हे वेदान्तवेद्य ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ११२ ॥ हे भरतके अग्रज !