श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १३ ] मनोहरकाण्डम् ७१३
सर्गः १३ ] मनोहरकाण्डम् ७१३
वामे करे वैरिभिरं वहंतं शैलं परं मुद्गलगहाप्रकम्पम् ।
इभाननाह्लाद्य सुपर्णवर्णं भजे ज्वलत्कुंडलमांजनेयम् ॥२४॥
पद्मरागमणिमंडलत्विषा पाटलीकृतकपोलमंडलम् ।
दिव्यदेहरुकदलीवनांतरे भावयामि पवमाननन्दनम् ॥२५॥
यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकांजलिम् ।
बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसांतकम् ॥२६॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि ॥२७॥
विवादे दिव्यकाले च द्यूते राजकुले रणे । दशवारं पठेद्रात्रौ मिताहारे जितेंद्रियः ॥२८॥
विजयं लभते लोके मानवेषु नरेषु च । भूते प्रेते महादुर्गेऽप्यथे सागरसंप्लवे ।२९।
सिंहव्याघ्रभये चैव शरशस्त्रास्त्रपातने । शृंखलाबंधने चैव कारागृहगियंत्रणे ॥३०।
कोपे स्तम्भे वह्निक्कत्रे क्षेत्रे घोरे सुदारुणे । शोके महार्णवे चैव ग्रहग्रहनिवाग्णम् ॥३१॥
सर्वदा तु पठेन्नित्यं जयमाप्नोति निश्चितम् । भूर्जे वा वमने रक्ते क्षौमे वा तालपत्रके ॥३२॥
त्रिगंधिना वा मष्या वा विलिख्य धारयेन्नरः । पत्रममत्रिलोहेर्यां गोभितः मर्दतः सुवर्णः ॥३३।
करे कट्यां बाहुमूले कंठे शिरसि धारितम् । सर्वान्कामानवाप्नोति सत्यं श्रीरामभाषितम् ॥३४॥
अपराजित नमस्तेऽस्तु नमस्ते रामपूजित । प्रस्थानं च करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥३५॥
इत्युक्त्वा यो व्रजेद्वामं देशं तीर्थांतरं रणम् । आपत्सिध्यानि शीघ्रं स संमहण्यो गृहं पुनः ॥३६॥
इति वदति विदेषपादराघवे राक्षसेद्रः प्रमुदितवरचित्तो रावणस्यानुजो हि ।
रघुवरपदपद्मं वदथानाम भूयः कृतमहितकृतार्थः सर्वद मन्यमानः ॥३७॥
मुखनख विराजमान उन रामदूत हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २३ ॥ जो बाँएं हाथमें शत्रुओंको मारने वाला पर्वत लिये हैं, जिनके कण्ठमें भालूलोका हार और देदीप्यमान सुवर्णका कुण्डल कानोंमे पड़ा हुआ है, मैं ऐसे हनुमानजीको प्रणाम करता हूँ ॥ २४ ॥ कुण्डलमें जड़े हुए पद्मराग मणिकी कान्तिसे जिनका कपोल पाटल वर्णका हो गया है, केलेके वनमें खड़े और दिव्य रूप धारण किये हनुमानजीका मैं ध्यान करता हूँ ॥ २५ ॥ जहाँ जहाँ रामकी कथा होती है वहाँ माथा झुका तथा हाथ जोड़कर जो खड़े रहते हैं और आँसूसे जिनके नेत्र भरे रहते हैं, राक्षसांका अन्त करनेवाले उन हनुमानजीको प्रणाम करो ॥ २६ ॥ मनके समान जिनका वेग है जिन्होंने इन्द्रियोंको जीत लिया है और जो बुद्धिमानोंमे श्रेष्ठ हैं, ऐसे वायुपुत्र एवं वानरयूथके मुखिया श्रीरामदूतको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ २७ ॥ किसीसे बहस करत समय, जुआ खेलते समय शपथ खात समय, राजकुलम, मग्राममें और रात्रिमें मिताहार हाकर जितेन्द्रियतापूर्वक दश बार जो इस कवचका पाठ करता है, वह सब मनुष्यों और नराधिपपर विजय प्राप्त कर लेता है । भूत, प्रेत, महादुर्ग, अरण्य और सागरमें बहु जानपर, सिंहव्याघ्र आदिका भय आ जानेपर, बाण तथा अस्त्र शस्त्रके गिरनेपर, जंजीरोंसे बँध जानेपर, कारागृहमें बन्द हो जानेपर जिसमें के कुपित होनेपर, अग्निकी लपटमें पड़ जानेपर किसी दारुण क्षत्रमें, शोकके भयमें, महायन्त्राणय और ग्रहादिशका निवारण करते समय इन सब समयोंमें इसका पाठ करना चाहिए ऐसा करनेसे उसकी विजय होती है। भूर्जपत्रपर, लाल कपड़ेपर, रेशमी वस्त्रपर, तालपत्रपर ॥ २८-३२ ॥ त्रिगंध अथवा स्याहीसे लिख एवं पत्र, ताम्र तथा त्रिलोहेसे बनी ताबीजमें रखकर हाथ, कमर, भुजा, कण्ठ या मस्तकऊपर जो मनुष्य इसे बाँधता है, उसकी सब कामनायें पूर्ण होती हैं। यह रामचंद्र कहा वचन कभी झूठ नहीं हो सकता ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ कभी भी पराजित नहीं होनेवाले और रामसे पूजित हे हनुमानजी ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मैं जिस कामसे बाहर जा
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| ७१४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३ |
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तं वेदशास्त्रपरिनिष्ठितशुद्धबुद्धिं शर्मप्रदं सुरमुनीन्द्रनुतं कपीन्द्रम् ।
कृष्णत्वचं कनकपिंगजटाकलापं व्यासं नमामि शिरसा तिलक मुनीनाम् ॥३८॥
य इदं प्रातरुत्थाय पठेत् कवचं सदा । आयुरारोग्यसंतानैस्तस्य स्तुत्यः स्तवो भवेत् ॥३९॥
एवं गिरीन्द्रजे श्रीमद्धनुमत्कवचं शुभम् । त्वया पृष्टं मया प्रीत्या विस्तराद्विनिवेदितम् ॥४०॥
श्रीरामदास उवाच
एवं शिवमुखाच्छ्रुत्वा पार्वती कवचं शुभम् । हनूमतः सदा भक्त्या पपाठ तन्मनाः सदा ॥४१॥
एवं शिष्य त्वयाऽप्यद्य यथा पृष्टं तथा मया । हनूमत्कवचं चेदं त्वदग्रे विनिवेदितम् ॥४२॥
इदं पूर्वं पठित्वा तु रामस्य कवचं ततः । पठनीयं नरैर्भक्त्या नैकमेकं पठेत्कदा ॥४३॥
हनुमत्कवचं चात्र श्रीरामकवचं विना । ये पठन्ति नराश्चात्र पठनं तद्वृथा भवेत् ॥४४॥
तस्मात्सर्वैः पठनीयं सर्वदा कवचद्वयम् । रामस्य वायुपुत्रस्य मद्भक्तैश्च विशेषतः ॥४५॥
इति हनुमत्कवचम्
अथ रामकवचम्
इदानीं रामकवचं शृणु शिष्य वदामि ते । परं गुह्यं पवित्रं च सर्ववांछितपूरकम् ॥४६॥
सुतीक्ष्णस्त्वेकदाऽगस्तिं प्रोवाच रहसि स्थितम् ।
भगवन् परमानन्द तत्त्वज्ञ करुणानिधे । गुरो त्वं मां वदस्वाद्य स्तोत्रं रामस्य पावनम् ॥४७॥
आजानुबाहुमरविन्ददलायताक्षमाजन्मशुद्धरमहारवपुष्प्रसादम् ,
श्यामं गृहीतनिशचापमुदाररूपं रामं सशरमभिरामनुस्मरामि ॥४८॥
शृणु वक्ष्याम्यहं सर्वं सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम । श्रीरामकवचं पुण्यं सर्वकामप्रदायकम् ॥४९॥
रहा हूँ, वह काम पूरा हो जाय ॥ ३५ ॥ ऐसा कहकर जो किसी दूसरे गाँवको जाता है, वह कुशलपूर्वक अपना काम पूरा करके शीघ्र लौटता है ॥ ३६ ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीके कहनेपर रावणके भ्राता विभीषण परम प्रसन्न हुए । उन्होंने रामके चरणोंकी वन्दना की और सपरिवार अपनेको धन्य माना ॥ ३७ ॥ समस्त वेदों और शास्त्रोंमें जिनकी बुद्धि प्रविष्ट है, देवता तथा मुनिगण जिनकी वन्दना करते हैं, ऐसे शुभदाता हनुमान्जी और जिनके शरीरकी त्वचा कृष्णवर्णकी है, सुवर्णके समान पीली जिनकी जटा है, ऐसे मुनियोंके अग्रणी श्रीव्यासजीको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ३८ ॥ जो मनुष्य सवेरे उठकर सदा इस कवचका पाठ करता है, उसे आयु आरोग्य और सन्तान आदि सब वस्तुय प्राप्त हो जाती हैं और सब लोग उसकी स्तुति करने लग जाते हैं ॥ ३९ ॥ हे गिरीन्द्रजे ! जैसा तुमने प्रश्न किया, उसके अनुसार मैंने तुम्हें हनुमत्कवच बतलाया ॥ ४० ॥ श्रीरामदास कहते हैं—हे शिष्य ! इस तरह शिवजीके मुखसे हनुमत्कवच सुनकर पार्वतीजीन उसी दिनसे तन्मयताके साथ उसका पाठ आरम्भ कर दिया ॥ ४१ ॥ जैसे तुमने पूछा, मैंने भी तुमको हनुमत्कवच कह सुनाया ॥ ४२ ॥ पहले इसका पाठ करके ही भक्तिपूर्वक श्रीरामकवचका पाठ करना चाहिये । अकेले किसी भी कवचका पाठ न करे ॥ ४३, जो लोग हनुमत्कवचका पाठ किये बिना रामकवचका पाठ करेंगे, उनका वह पाठ व्यर्थ हो जायगा ॥ ४४ ॥ इस लिए सब लोगोंको चाहिए कि सदा दोनो कवचोंका पाठ किया करें । रामके भक्त तो इस बातपर विशेष ध्यान रक्खें ॥ ४५ ॥ हे शिष्य ! अब तुमको रामकवच बतलाता हूँ । यह भी परम गोप्य, परम पवित्र और सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाला कवच है ॥४६॥ एक बार सुतीक्ष्णने अपने गुरु अगस्त्यको एकान्तमे देखकर कहा हे भगवन् ! हे परमानन्ददाता ! हे तत्त्वज्ञ ! हे करुणानिधे ! आज हमें श्रीरामचन्द्रजीका कोई पुनीत स्तोत्र सुनाइए ॥ ४७ । अगस्त्यने कहा कि आजानुपर्यन्त जिनकी बाहु हैं, कमलदलके समान जिनके विशाल नेत्र हैं, जन्मसे ही जिनका प्रसन्नमुख है, जिन्होंने धनुष और बाणको धारण कर रक्खा है, जिनका उदार रूप है, ऐसे अभिराम रामका मै ध्यान करता हूँ ॥४८॥ हे मुनिसत्तम