सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७७९

सर्गः ९ ] पूर्णकाण्डम् ७७९

शङ्खो बभूव भरतः शार्ङ्गपा० मध्यवन्तरं ।
रामे करे बभूवाथ शत्रुघ्नश्च सुदर्शनम् ॥१६॥
दैवेषु विविशुः सर्वे ये चाग्रे ह्यवागताः ।
चांडालकृमिकीटांस्ता अयोध्यापुरवासिनः ॥१७॥
प्रापुस्ते दिव्यदेहानि विमाने संस्थिता बहुः ।
तदा निनदुर्वादित्राणि देवानां गगनांगणे ॥१८॥
स्वर्पुर्दैवपत्यश्च पुष्पवृष्टिमिदंगताः ।
ननृतुश्चाप्सरो नगुर्गन्धर्वकिंनराः ॥१९॥
प्रणनाम तदा तार्क्ष्यः श्रीविष्णुं रश्मिसुप्रभम् ।
देहानि मुमुचुः सर्वे श्रोभिः सोमादिकाश्च ते ॥२०॥
पतिदेहानि चालिंग्य तदा ता ऊर्मिलादिकाः ।
इदामन्यौ जहुः सर्वा रम्ये भागीरथीजले ॥२१॥
अथ ता देवकन्याश्च रत्नदीपैः सहस्रशः ।
विष्णुं नीरजवासाद्यमलक्ष्मीयुक्तं महाभुजम् ॥२२॥
विष्णुनन्तोऽब्रवीद्वाक्यं पद्मजं मधुरं शनैः ।
प्रयोभ्यावासिनः सर्वे तिर्यङ्स्थावरद्रवः शुभाः ॥२३॥
एते समागता ब्रह्मण्तेषां स्थानं वदाधुना ।
तद्विष्णोर्वचनं श्रुत्वा तदा ब्रह्माऽब्रवीद्वचः । २४॥
मल्लोकादुपरिष्टाच्च लोकाः सांत्वानिकाऽभिधान् ।
इमे यांतु जनाः सर्वे मद्दद्दर्शनमलोन्मखाः ॥२५॥
ततः प्राह पुनर्विष्णुर्योऽप्याया! मृताश्च ये ।
अग्रे तेऽपि समायांतु लोकान्सान्त्वानिकाञ्छुभान् । २६॥
एवेति म गिरिः प्राह महाविष्णुं मुदाम्वितः ।
ततस्ते दिव्यदेहाश्च सर्वेऽयोध्यावासिनः ॥२७॥
नानाविमानमारूढाश्च दिव्यवस्त्रविभूषिताः ।
दिव्यलंकारसंयुक्ता दप्सरोभिस्केपिताः ॥२८॥
ताननुगंधगधर्वाद्यैश्यामरैर्जिताः ।
विरेचुर्गगने चन्द्रवदना रतिमानुगाः ॥२९॥
ततो ब्रह्मादयो देवाः प्रणेमुर्विष्णुमादरात् ।
तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैर्वेदघोषैर्महर्षयः ॥३०॥
तदा तुष्टाव शत्रुघ्नं विष्णुं त्रैलोक्यपालकम् ।
वनमालां दधानं तं दिव्यचन्दनचर्चितम् ॥३१॥

रूपमें और लक्ष्मण फणीश सुशोभित रूप भगवान्‌के स्वरूपमें परिणत हो गये ॥ १५ ॥ भरतजी शंखके रूपमें परिवर्तित होकर विष्णुभगवान्‌के दाहिने हाथमें जा विराजे । शत्रुघ्नजी विष्णुके सुदर्शनचक्र बनकर बांये हाथमें जाके जमा लिया ॥ १६ ॥ यहाँपर जितने बंदर थे, वे सब जल भये अपने अपने अंशरूपमें देवलोक शरीरोंमें प्रविष्ट हो गये । चाण्डालसे लेकर कृमि-कीट पर्यन्त सभी अयोध्यानिवासी अपने-अपने शरीरोंको छोड़कर दिव्य देह धारण करके विमानोंपर सुशोभित होने लगे । उस समय गगनांगणमें देवताओंके विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे । १७-१८॥ देवांङ्गनाएं प्रेमपूर्वक कुसुमवर्षा कर रही थीं, अप्सरावें नाच रही थीं और गन्धर्वगण तरह-तरहके गायन गा रहे थे । १९ ॥ उसी समय गरुडन आकर भूमण्डलमें देदीप्यमान भगवान्‌को दण्डवत् प्रणाम किया। उधर सब बर्गि राजाओंने भी अपना स्त्रियों समेत अपने-अपने शरीरोंको छोड़ दिया ॥२०॥ इन सागार परम धाम बजे जानक बाद ऊर्मिला, माण्डवी तथा श्रुतकान्तिने अपने-अपने पतिके शरीरका आलिंगन करके चितामें जलकर शरीर छोड़ दिया ॥ २१ ॥ उधर समस्त देवताओंकी स्त्रियोंने हजारों रत्न-मय दीपक जलाकर लक्ष्माके हसन विष्णुभगवान्‌की आरती उतारी ॥ २२ ॥ कुछ देर बाद विष्णुभगवान्‌ने ब्रह्मासे कहा कि मेरे साथ जो अयोध्याके सब पुरवासी तथा तिर्यंचयानि तकके प्राणी यहाँ आये हैं, इनके लिए कोई स्थान बतलाइए । विष्णुभगवान्‌की बात सुनकर ब्रह्माजी बोले कि आपके दर्शनसे ये पवित्र प्राणी मेरे लोकके भी ऊपर एक सान्त्वानिक लोक है-वहीं हो जाकर निवास करें ॥ २३-२५ ॥ इसके बाद विष्णु भगवान्‌ने फिर कहा कि इनके अतिरिक्त भी जो प्राणी अयाध्यामें शरीर त्याग करें वे सब सान्त्वानिक लोक प्राप्त करें ॥२६॥ ब्रह्माजीने भगवान्‌की यह बात भी स्वीकार कर ली। इसके अनन्तर वे सब अयोध्यावासी दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकारके विमानोंपर जा बैठे। उस समय वे लोग अच्छे-अच्छे पहने-कपड़े पहने थे और कितनी ही सुन्दर अप्सरा। उनके शरीरोंसे सुगन्ध डाल रहा थी। उनपर दिव्य चमर चल रहे थे। सुर्यके समान देदीप्यमान तथा चन्द्रमुखी नारियाँ सब प्रकारकी सेवायें कर रही थीं ॥ २७-२९ ॥ तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवताओंने विष्णुभगवान्‌को प्रणाम किया और बड़े-बड़े ऋषि वेदकी ऋचाओंसे भगवान्‌की स्तुति करने लगे ॥ ३० ॥ उस लागोंके बाद श्रीशत्रुघ्नजी त्रैलोक्यरक्षक विष्णुभगवानकी स्तुति करने लगे। उस

७८० आनंदरामायणे [ सर्गः ६

शंभुरुवाच

१२३ करुणाकरं भयनाशनं दुरितापहं माधव मखसंस्थितं नलसंस्थितं परमेश्वरम् ।
पालकं जगतामकं भवतारकं रिपुमारकं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३२॥

ध्रुवंच वनमालिनं मनरूपिणं धरणीधरं श्रीहरिं त्रिगुणात्मकं तुलसीधरं वपुस्स्वम् ।
अर्ककं शरणप्रदं मधुमारकं बहुपालकं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३३॥

गोकुलं मथुरःस्थितं रजकांतकं गजमारकं मन्सुतं बकमारकं वृकवानरं तुंगाह्वयम् ।
नन्दजं वसुदेवजं बलिपोषणं सुरपालकं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३४॥

केशवं काकघातिनं कपिमार्क मृगमर्दनं सुंदर द्विजपालकं दिनिजार्द्दनं दनुजार्द्दनम् ।
श्रावकं खरमर्द्दनं ऋषिपूजितं मुनिचिंतितं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३५॥

शंखजं जलशायिनं कुशपालकं रथवाहनं सुरनूतं प्रियपुष्पकं प्रियभूसुरं लवपालकम् ।
श्रीधरं मधुसूदनं भरताग्रजं गरुडध्वजं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३६॥

गोप्रियं गुरुपुत्रदं वदतां वरं करुणानिधिं सव्वंपं जनतोषदं सुरपूजितं श्रुतिभिः स्तुतम् ।
शुक्तिदं जनमुक्तिदं जनरंजनं नृपनन्दनं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३७॥

चिद्वनं गिरजाधवन् प्राणशालि- वरदानमुद्य श्रीधरं धृतपद्मकं चक्रहस्तकं गतिदायकम् ।
शान्तिदं जनतारक, शङ्खधारिणं गजगामिनं त्वां भजे जगदीश्वर नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥३८॥

शार्ङ्गिणं कमलाननं कमलादृशं पदपंकजं श्यामलं शरणागतं शशिगोमदं करुणाकरम् ।


समय भगवान् वनमाला धारण किये थे और उनके गान्धर्व दिव्य चन्दनका लेप किया हुआ था ॥ ३१ ॥ प्रशंसाजनकहे रघुनन्दन तुम्हारे भजन कर, भवौघ प्राप्तगमन मुक्त करनेवाले, पापनाशकारक, लक्ष्मीके पति, जगत्के परमेश्वर, सबer पालक, भक्तोंका नाशन्वान, भवसागर नाशक, शमसंहारकारी नररूप- धारी हे जगदीश्वर रघुनन्दन मै आपका प्रणाम करता हूँ ॥ ३२ ॥ ध्रुवरति वनमालाधारी, मधुनामक राक्षसका संहारक, ब्रजके पालक नवीन मेघके समान श्यामवर्ण, पृथ्वीकी रक्षा करनेवाले, सत्त्व, रज और तम इन तीनो गुणोंसे युक्त तुलसीके पति, शंकरस्वरूप आपकी विस्तार करनेवान, नररूपाधारी जगदीश्वर हे रघुनन्दन ! मै आपका भजन करता हूँ। ३३ । द्विद्गवले मथुरामें निवास करनेवाले, रजकमारी गजास्तकारी, सज्जनोंम संस्तुत, बकासुर, वृकासुर और कङ्काको मारनेवाले, नन्दसुवन वसुदेवके पुत्र पातालमे बलिके यज्ञम जानेवाले देवताओंके पालक, नररूपधारी हे जगदीश्वर रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ३४ ॥ केशव, बाणसेके घिरे हुए, बालि वानरका मारनेवाले, मृगरूपधारी मारीचको मारनेवाले, सुन्दर, ब्राह्मणीके रक्षक राक्षसोंका संहार करनेवाले, सर्वदा बाल्मीकिदूत, खरको मारनेवाले, ऋषियोंसे पूजित, मुनियों द्वारा चिन्तित ओर नररूपधारी हे जगदीश्वर रघुनन्दन ! मै आपका भजन करता हूँ ॥ ३५ ॥ संसङ्गरूप बाणपण करनेवाले, तिलक शुक जैसे यशस्वी बालक हैं, रथ जिसकी सवारी है, सम्पूर्ण स्वर्ग जिनको नमस्कार करती है, जिसके सेवक विमान त्रिपथ प्रिय है, जो ब्राह्मणोमे अतिशय प्रेम रखते हैं एवं नामका जिनका बालक है जो लंकाका नाश करते हैं, जिन्होने मधुनामक दैत्यका संहार किया था जो भरतके बडे भ्राता है ओर जिनकी ध्वजामें गरुडका चिह्न बना हुआ है, ऐसे नररूपधारी हे जगदीश रघुनन्दन ! हम आपका भजन करते है ॥ ३६ ॥ जिनको गौ विशेष प्रिय है, जो यमलोकसे गुरुपुत्रको लौटा लाये थे, जो वक्ताओंमे श्रेष्ठ हैं, जो करुणाके समुद्र हैं जो सब तरहसे अपने भक्तोंकी रक्षा करते हैं, जो अपने भक्तोको प्रसन्न रखते हैं, देवतागण जिनका पूजन करते हैं चारों वेद जिसकी स्तुति करते हैं, जो सब प्रकारके भोग प्रदान करते हैं और जो अपने भक्तोंको मुक्ति प्रदान करते हैं, महाराज दशरथके पुत्र हे जगदीश्वर रघुनन्दन मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ३७ ॥ चिद्घनरूप में, गिरजाजी मणियोकी माला धरण करनेवाले, प्राण-युक्त, श्रीधर, धैर्य प्रदान करनेवाले, गतिकारक, चक्रहस्तधारी, शान्तिदाता जनतारक, शङ्ख धारी, गजगामी, नररूप धारण करनेवाले हे जगदीश्वर रघुनन्दन ! मै आपका भजन करता हूँ ॥ ३८ ॥ धनुष

[सर्गः ६] पूर्णकाण्डम् ७८१

सत्पतिं नृपवालकं नृपवन्दितं नृपतिप्रियं त्वां भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ३९॥
निर्गुणं सगुणात्मकं नृपमण्डनं यतिवन्द्यवन्द्यपदं पुरातनमं परमेष्ठिनं स्मितभाषिणम् ।
ईश्वरं हनुमन्नुतं कमलाधिपं जगदार्त्तिहन्तृ भजे जगदीश्वरं नररूपिणं रघुनन्दनम् ॥ ४०॥
ईश्वरोक्तमेतद्गुणाष्टादशच्छन्दनामकं यः पठेद्भुवि मानवस्त्वद्भक्तिमांस्त्वन्नोदये ।
स्वत्पदं निजबन्धुदारसुतंयुतश्चिरमेत्य नो मोदन्तु ते पदसेवने बहुवत्सरी मम वाक्शतः ॥ ४१॥
इति स्तुत्वा महाविष्णुं प्रोवाच गिरिजापतिः । आरुहस्व गरुडेश गरुडोपरि वेगतः ॥ ४२॥
वैकुण्ठारोहणस्यायं कालो वाल्मीकिना कृतः एकादश सहस्राश्च वत्सरान्वेकादशैश्च च ॥ ४३॥
तथैकादश मासाश्च दिनान्येकादशैव च । तथैकादश नाडीश्च पलान्येकादशैव च ॥ ४४॥
गतानि तेऽत्र भूम्यां हि जन्मारभ्य राघव । वसन्तपञ्चमीनाम्नी तिथिर्वैत्रासिताऽद्य हि ॥ ४५॥
पुण्येऽह्नि स्वपदं गन्तुं स्वर्गं कुरु रमेश्वर । तदा विसृज्य शालिवाहुर्वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम् ॥ ४६॥
समालिंग्य मुनीन्पृष्ट्वा तस्थौ स गरुडोपरि । ध्वनत्सु देववाद्येषु स्तुवत्सु नारदादिषु ॥ ४७॥
पुष्पैर्वर्षत्सु देवेषु प्रनर्त्तन्तीष्वप्सरःसु च । नानाविमानयानैश्च समन्त परिवेष्टितः ॥ ४८॥
ययौ विष्णुः स वैकुण्ठं लोकान्पश्यन्जनैः मुनैः। वैकुण्ठे स्वपदे स्थित्वा विससर्ज शिवादिकान् ॥ ४९॥
तस्थौ लक्ष्म्याऽऽनन्दमयः परिपूर्णमनोरथः । खगेशश्चारुमत्पादः सेवानत्पर्तिभूषणः ॥ ५०॥
अयोध्यावासिनः सर्वे ययुः सातानकं पदम् । ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं स्थल प्रति ॥ ५१॥
रामवाक्यान्याऽजमीढः सांत्वयामास तं कुशम् । स्वर्गारोहण वृत्तार्थ कथयामास तं कुशम् ॥ ५२॥


धारण किये, कमलके समान मुखवान्, कमलके भाँति नेत्रवाले, कमलके ही समान चरणकमलवाले, श्याम वर्ण, सूर्यके समान देदीप्यमान, चन्द्रमाकी मुख दूतवाल, करुणाके समुद्र एक अद्वितीय प्रभु राजाओंके रक्षक, राजाओंसे वन्दित, राजाओंके प्रिय और नररूपधारी जगदीश्वर रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ३९ । निर्गुण होते हुए भी सगुणरूपधारी, राजाओंके मुकुटभूषण बुद्धिवर्द्धनकर्त्ता, परम पूजनीय, मुसकराकर बोलनेवाले, जगत्के प्रभु, हनुमानजीके द्वारा स्तुत लक्ष्मीके पति और नररूपधारी हे जगदाधार रघुनन्दन ! मैं आपका भजन करता हूँ ॥ ४० । इस प्रकार स्तुति करते हुए शिवजीने अन्तमें कहा कि प्रातःकाल सूर्योदयके समय जो कोई श्रद्धा भर वह हुए इस छन्दनामाष्टमीका पाठ करेगा, वह मेरे आशीर्वादसे अपने बन्धुओं तथा स्त्री पुत्रऽदिकके साथ यहाँ आकर बहुत कालतक आपके चरणोंकी सेवाका सुयोग पायेगा ॥ ४१ ॥ इस प्रकार स्तुति करनेके पश्चात् शिवजी ने कहा—हे रमानाथ आप शीघ्र गरुडपर आरूढ़ हो क्योंकि वाल्मीकिजीने आपके वैकुण्ठ गमनका यही समय अपने रामायणमें निर्धारित किया है। इस समय ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष, ग्यारह महीना, ग्यारह दिन, ग्यारह नाड़ी तथा ग्यारह पल पूरे हो रहे हैं। आज चैत्र शुक्लाष्टमीकी पञ्चमी तिथि है ॥ ४२-४५ ॥ इस पवित्र दिवसका आप परमधाम जानेके लिए प्रस्थान करिए। उस समय प्रभु भुजबन्धु । उन्होंने मुनिपुङ्गव वाल्मीकि के शिक्षा हृदयसे लगाया, ऋषियोंसे आज्ञा माँगी और गरुडके ऊपर सवार हो गये, तब देवताओंने विविध प्रकारके बाजे बजाये, नारद आदि महर्षियोंने स्तुति की, देवतागण आकाशपर फूल बरसाने लगे और अप्सरायें नाचने लगीं ॥ ४६-४८ ॥ इस तरह गरुडपर बैठकर भगवान् राम सब लोगके देखते-देखते वैकुण्ठलोकको चले गये। उस धाममें पहुंचकर वे अपने विश्वामित्रके बंद और शिव आदि देवताओंका विदा कर दिया। वे आनन्दमय महाप्रभु हर प्रकारसे परिपूर्ण मनोरथ होकर लक्ष्मीके साथ आनन्दपूर्वक वहीं रहने लगे। उस समय गरुड़ भगवान्के चरणोंकी सेवा करते थे और वे विष्णु भगवान् शेषकी शय्यापर मान थे ॥ ४९-५० ॥ वे सब अयोध्यावासी भगवान्के कथनानुसार सान्तानिक लोकमें जा विराजे। इसके अनन्तर भगवान्का स्वर्गारोहण देखनेके लिए आये हुए ऋषि भी अपने अपने आश्रमोंको चले गये ॥ ५१ ॥ रामचन्द्रजीके कथनानुसार हास्तिनापुरके राजा अजमीढ़ अयोध्यामें कुशके पास गये और भगवान्का परमधामगमन-सम्बन्धी

७८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

कुशेन मानितः सोऽपि ययौ स्वांय रजाव्हयम् । लब्ध्वा कुमुद्वतीं तस्यां कुशः पुत्रान्न निर्ममे ॥५३॥
एवं श्रीरघुनाथस्य स्वर्गारोहणकौतुकम् । ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या तेऽपि स्वर्गं प्रयान्ति हि ॥५४॥
वैकुण्ठारोहणाख्यायमिमं नित्यं पठेत्तु यः । सोऽन्ते गच्छति वैकुण्ठं रामचन्द्रप्रसादतः ॥५५॥
इति श्रीमन्महोदिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीय पूर्णकाण्डे वैकुण्ठारोहणं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तमः सर्गः

( सूर्यवंशवर्णन )

श्रीरामदास उवाच
एवं त्वया यथा पृष्टं स्वर्गारोहणप्रद्वयम् । श्रीरामस्य मया चैतत्तथाऽऽशु निवेदितम् ॥ १ ॥
किमन्यच्छ्रोतुमिच्छाऽस्ति तान्वं वद वदाम्यहम् । एव गुरुर्वचः श्रुत्वा विष्णुदासस्तमब्रवीत् ॥ २ ॥

विष्णुदास उवाच
कुशात्तः सूर्यवंशोऽत्र गुरो पूर्वं त्वयोदितः । कुशाग्र श्रोतुमिच्छामि सूर्यवंशं सविस्तरम् ॥ ३ ॥

श्रीरामदास उवाच
विष्णोरास्भ्य कथिता एकषष्टितमाः पुरा । एकषष्टिनृपा ह्यग्रे तान्वदामि सविस्तरम् ॥ ४ ॥
श्रीरामस्य कुशः पुत्रोऽतिथिः पुत्रः कुशस्य सः । निषधस्त्वतिथेः पुत्रो निषधस्यात्मजो नभः ॥ ५ ॥
नभाञ्जातो पुंडरीकः क्षमधन्वा तु तत्सुतः । देवानीकस्त्वमृताऽभूद्देवानीकसुतो महान् ॥ ६ ॥
अहीनः प्राप्यतस्तद्वत् पारियात्रस्तत्सूनु स्मृतः । पायात्रस्य बलः पुत्रः स्थलः पुत्री बलस्य हि ॥ ७ ॥
स्थलस्य वज्रनाभस्तु खगणस्तस्य चात्मजे । खगणाद्विधृतिर्जातो विधृतेस्तनयः शुभः ॥ ८ ॥
जातो हिरण्यनाभस्तु तस्य पुत्रः प्रकाल्पत । पुष्यास्त ध्रुवसंधिस्तु ध्रुवसंधः सुदर्शनः ॥ ९ ॥
सुदर्शनादाग्रवर्णस्तस्माच्छाधः प्रकीर्त्यत । शीघ्राज्जातो मरुः पुत्रो मरोश्च प्रश्वतः सुतः ॥ १० ॥
प्रश्रुतस्य च सन्धाई सचे पुत्रस्तु मषणः । मषणस्य महस्वाथ विश्वसाहश्च तत्सुतः ॥ ११ ॥


सब बात बतलायी और समझा दिया कि आप किस प्रकारका शक न करें ।। ५२ ।। कुशने भी अजमीढ़का भरपूर आदर-सत्कार किया । कई दिना अयोध्यामे रहकर वे हस्तिनापुर को चले गये । कुछ दिनों बाद कुशको कुमुद्वती नामकी एक दूसरी भार्या प्राप्त हुई । उससे कुशके बहुतसे पुत्र हुए ।। ५३ ।। इस प्रकार भगवान्‌के स्वर्गारोहण-वार्ताको जो लोग भक्तिपूर्वक सुनते हैं, वे भी स्वर्गलोक प्राप्त करते हैं ।। ५४ ।। जो प्राणी वैकुण्ठारोहणके इस सर्गका नित्य पाठ करता है, वह रामचन्द्रजीकी कृपासे अन्तमे वैकुण्ठ धामको प्राप्त करता है ।। ५५ ।। इति श्रीमत्काशिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतनुपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहित पूर्णकाण्ड षष्ठ सर्गः ॥ ६ ॥

श्रीरामदासने कहा- हे शिष्य ! तुमने जिस तरह हमसे भगवान्‌का स्वर्गारोहणवृत्तांत पूछा, वह मैने कह सुनाया । अब तुम क्या सुनना चाहते हो सो कहो । वह भी मैं बतलाऊँगा । इस तरह गुरुकी बात सुनकर विष्णुदास कहने लगे-हे गुरुवर ! आपने नृपतक सूर्यवंशका वर्णन किया, सो मैने सुना । अब यह जानना चाहता हूं कि कुशके आगे कौन-कौन राज हुए सो हए विस्तारपूर्वक बतलाइए ॥ १ ३ ॥ श्रीरामदास बोले-हे शिष्य, विष्णुभगवान्‌से लेकर एकसठ राजाओंका चरित्र मैने पहले सुनाया है। उनके बाद जो एकसठ राजे और हुए हैं, उन्हें मैं विस्तारपूर्वक बतलाता हूं ॥ ४ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके पुत्र कुश, कुशके पुत्र अतिथि, अतिथिके निषध, निषधके नभ, ॥ ५ ॥ नभके पुण्डरीक, पुण्डरीकके क्षेमधन्वा, क्षेमधन्वाके देवानीक, देवानीकके अहीन, अहीनके पारियात्र, पारियात्रके बल, बलके पुत्र स्थल ॥ ६ ॥ ७ ॥ स्थलके वज्रनाभ, वज्रनाभके खगण, खगणके पुत्र विधृत, विधृतिके हिरण्यनाभ, हिरण्यनाभके पुष्य, पुष्यके ध्रुवसंधि, ध्रुवसंधिके सुदर्शन, ॥ ८ । ९ ।। सुदर्शनके अग्निवर्ण, अग्निवर्णके पुत्र शीघ्र, शीघ्रके मरु, मरुके पुत्र प्रश्वुत,

सर्गः ७ ] पूर्णकाण्डम् ७८३


तस्मात्प्रसेनजित्प्रोक्तस्तस्माज्जातस्तु तक्षकः । बृहद्रणस्तक्षकस्य तस्माज्जातो बृहद्रणः ॥ १२॥
तस्मादुरुक्रीयः प्रोक्तो वत्सबृहत्तु तत्सुतः । वत्सबृहदस्य व्योमस्तु व्योमाद्भानुः प्रकीर्त्यते ॥ १३॥
भानोः पुत्रो दिवाकस्तु सहदेवश्च तत्सुतः । सहदेवात्तथा वीरो वीरस्य तनयः शुभः ॥ १४॥
बृहदश्व इति ख्यातस्तस्य पुत्रस्तु भानुमान् । भानुमतः प्रतीकाशः सुप्रतीकश्च तत्सुतः ॥ १५॥
सुप्रतीकस्य पुत्रोऽभून्मरुदेव इति स्मृतः । मरुदेवात्सुनक्षत्रः सुनक्षत्राच्च पुष्करः ॥ १६॥
पुष्करस्यांतरिक्षश्च सुतपा अंतरिक्षजः । सुतपास्तनयो मित्रो मित्रजित्सुतः शुभः ॥ १७॥
बृहद्राज इति ख्यातस्तस्य बर्हिः सुतो बुधैः । ख्यातो कृतंजयः पत्रस्तस्य पुत्रो रणंजयः ॥ १८॥
रणंजयस्य तु संजयः संजयाच्छाक्य उच्यते । शाक्यपुत्रस्तु शुद्धोदः शुद्धोदाल्लांगलः स्मृतः ॥ १९॥
प्रसेनजित्लांगलस्य तत्पुत्रः क्षुद्रकः स्मृतः । क्षुद्रकाद्रणकः प्रोक्तो रणकात्सुमुखः स्मृतः ॥ २०॥
सुमुखात्तनयो जातस्तनयस्य सुतो महत् । नाम्ना सूर्यस्य धामः पूर्णो वंशस्ततः परम् ॥ २१॥
पूर्वमुक्तो मरुदिति नाम्ना यो नृपनिमिया । कलापग्राममाश्रित्य हिमाद्रौ बद्रिकाश्रमे ॥ २२॥
स तपश्चिरकालं हि करोत्यत्र समाधिमान् । कृते युगे पुनः प्रेत्ये सूर्यवंशं करिष्यति ॥ २३॥
एवं मया समाख्यातः सूर्यवंशो मनोहरः । विष्णोरारभ्य कथित एकाषष्टितमो मया ॥ २४॥
एकषष्टिनृपाणाञ्च मध्ये रामो विराजते । त्रयोविंशोत्सप्तशतं विष्णोर्मयोदिताः ॥ २५॥
एवं यथा त्वया पृष्ट शिष्य वंशानुकीर्तनम् । तन्मया कथितं सर्वं श्रवणात्पुण्यवर्धनम् ॥ २६॥

विष्णुदास उवाच
गुरो मया श्रुतं कस्यचिन्मुनेर्मुखतः पुरा । रामायणं सविस्तारं तच्चेदं नैव भासते ॥ २७॥
तस्मादत्रांतरं प्रोक्तं त्वया सर्वत्र मां गुरो । संदेहोऽनेन मे जातःतं त्वं छेत्तुमर्हासि ॥ २८॥

श्रीरामदास उवाच
पुनः पुनः कल्पभेदाज्जाताः श्रीराघवस्य च । अवताराः कोटिशोऽत्र तेषु भेदः क्वचित्क्वचित् ॥ २९॥


॥ १० ॥ प्रद्युम्नके संर्षि, संर्षिके पुत्र मर्षेण, मर्षेणके महत्वाना, महत्वानाके विश्ववाह ॥ ११ । विश्ववाहके प्रसेनजित्, प्रसेनजित् के तक्षक तक्षकके बृहद्रण बृहद्रणके उरुक्रीय उरुक्रीयके वत्सवृद्ध, वत्सवृद्धके व्योम, व्योमके भानु ॥ १२ ॥ १३ । भानुके पुत्र दिवाक, दिवाकके सहदेव, सहदेवके वीर, वीरके पुत्र बृहदश्व, बृहदश्वके भानुमान्, भानुमान्के प्रतीकाश, प्रतीकाशके पुत्र सुप्रतीक १४ ॥ १५ । सुप्रतीकके मरुदेव, मरुदेवके सुनक्षत्र, सुनक्षत्रके पुष्कर, ॥ १६ पुष्करके अन्तरिक्ष, अन्तरिक्षके सुतपा, सुतपाके पुत्र मित्र, मित्रके मित्रजित् ॥ १७ मित्रजित्के बृहद्राज, बृहद्राजके बर्हि, बर्हिके कृतंजय कृतंजयके पुत्र रणंजय ॥ १८ । रणंजयके संजय, संजयके शाक्य शाक्यके शुद्धोद शुद्धोदके लाङ्गूल ॥ १९ । लांगलके पुत्र प्रसेनजित् प्रसेनजित्के क्षुद्रक क्षुद्रकके रणक, रणकके सुमुख ॥ २०. सुमुखके तनय और तनयके पुत्र सुमित्र हुए। बस, यहां ही तक चलकर सूर्यवंश पूर्ण हो जाता है। २१ । पूर्वमें हम मरु नामक राजाका नाम गिना आये हैं। वे हिमा- लयपर बद्रिकाआश्रममें तप कर रहे हैं। सत्ययुग आनेपर वे फिर सूर्यवंशका विस्तार करेंगे ॥ २२ । २३ ॥ इस तरह मैंने विष्णुभगवान्से लेकर एकसठ राजाओं तक सूर्यवंशका वर्णन किया ॥ २४ । एकसठ राजाओंके मध्यमें भगवान् रामचन्द्रजी विराजमान हैं और उनके आगेवाले एकसठको लेकर कुल एक सौ तेईस राजे हुए ॥ २५ ॥ इस तरह हे शिष्य ! मैंने तुझे सूर्यवंशका विवरण कह सुनाया। इसके सुननेसे पुण्यकी वृद्धि होती है ॥ २६ ॥ विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! मैंने किसी मुनिसे सुना था कि रामायण इससे भी विस्तृत है, किन्तु पूरी रामायण इस संभागमें विद्यमान नहीं है। फिर आपने जो रामायण सुनायी है, वह तो सब रामायणोंसे भिन्न है, यह एक प्रकारका सन्देह मेरे हृदयमें उत्पन्न होता है। कृपा करके आप इसका निवारण करिए ॥ २७ । २८ । श्रीरामदासने कहा कि कल्पभेदसे रामके कितने ही अवतार हुए हैं और

७८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

कृतोऽस्ति राघवेशेन न सर्वे सदृशाः कृताः । रामायणान्यपि तथा पुरा वाल्मीकिनैव हि ॥ ३० ॥
अनेकान्यत्तरेणैव कीर्तितानि सविस्तरात् । शतकोटिमता तेषां सर्वेषां गणना कृता ॥ ३१ ॥
तस्मात्त्वया न संदेहः कार्यः शिष्य़ात्र बुद्धिमान् । यन्मया कथितं ते हि तत्सत्यं विद्धि नान्यथा ॥ ३२ ॥
यात्रोत्तरखंडांतर्गतरामायणात्पुरा । नारदादिपुराणानि व्यासेनात्र कृतानि हि ॥ ३३ ॥
हेतु भत्कथितं चेदं सम्यग्विस्मारितं द्विज । तव जातो यथा शिष्य संदेहोऽत्र कथांतगत् ॥ ३४ ॥
भविष्यति तथाऽन्येषामग्रे यदि कदा क्वचित् । नारदादिपुराणेषु दर्शनीयं हि दुर्जनैः ॥ ३५ ॥
दृष्ट्वा मदुक्तं सर्वेषु पुराणेषु पंडितैः । त्यक्तव्याः संशयम्देहाः सत्यं ज्ञेयं मयेरितम् ॥ ३६ ॥

इति शतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये पूर्णकाण्डे
सूर्यवंशवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( आनन्दरामायणकी सर्गानुक्रमणिका )

श्रीविष्णुदास उवाच

गुरोऽधुना वदस्व त्वं यन्मया पृच्छ्यते तव । अनुक्रमणिकासर्गं तथा पाठादिभिः फलम् ॥ १ ॥
कांडसंख्यां सर्गसंख्यां श्लोकसंख्यां सविस्तराम् । उद्यापनं ग्रन्थदानफलं वै शकुनेक्षणम् ॥ २ ॥
अनुष्ठानविधानं च श्रोतुं कालविनिर्णयम् । कांडानां च पृथक् संख्यां सर्वं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥

श्रीमद्दास उवाच

अनुक्रमणिकासर्गः प्रोच्यतेऽयं मयाऽधुना । यस्याः संश्रवणात्प्रोक्तं सर्वग्रंथफलं शुभम् ॥ ४ ॥
सर्गेऽत्र प्रथमे प्रोक्तं कौसल्यायाः स्वयंवरम् । रामादीनां सुजन्मानि द्वितीये कीर्तितानि हि ॥ ५ ॥
सीतास्वयंवरं प्रोक्तं तृतीये मिथिलापुरि । शृगालादिकथनं चतुर्थे मुद्रलेन हि ॥ ६ ॥


उन अवतारोंमें कुछ न कुछ भेद पड़ ही गया है। यद्यपि सबकी लीलाएं प्रत्येक रामायणमें वर्णित हैं, किन्तु उन सबमें कुछ न कुछ भेद है। स्वयं वाल्मीकिजीने जो शतकोटि श्लोकात्मक रामायण बनायी है, उसमें भी भेद विद्यमान हैं। इस कारण हे शिष्य ! तुम किसी प्रकारका सन्देह न करके मैंने जो कुछ कहा है, उसे सच मानो ॥ २६-३२ ॥ भरतखण्डके अन्तर्गत विद्यमान रामायणके भागके ही आधारपर व्यासजीने नारदादि विविध पुराणोंका रचना की है। उसी खण्डके सहारे मैंने भी इस सविस्तर आनन्द-रामायणका वर्णन किया है। जिस तरह आज तुमने मेरा यह कथा सुनकर सन्देह उत्पन्न हुआ है, उसी तरह यदि आगे चलकर और किसी श्रोता-वक्ताको सन्देह हो तो उसे चाहिए कि उन नारद आदि पुराणोंको देखकर सन्देह निवृत्त कर लें ॥ ३३-३५ ॥ पण्डितोंको भी उचित है कि सब पुराणोंको देख और उनमें मेरी कही बातें देखकर अपना सन्देह मिटा लें और समझ लें कि मैं जो कुछ कहता हूँ, वे बातें सच हैं या नहीं ॥ ३६ ॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योतिष्मतीभाषा-टीकासहिते पूर्णकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

विष्णुदासने कहा-हे गुरु ! अब आप हमें इस रामायणकी सर्गानुक्रमणिका तथा इसके पठनका फल बताइए ॥ १, साथ ही इसकी काण्डसंख्या, सर्गसंख्या और श्लोकसंख्या आदि भी विस्तारपूर्वक कहिए। इसका उद्यापन, ग्रन्थके दानका फल, शकुनदर्शनविधान, अनुष्ठानविधि, इसके श्रवणका समय और काण्डोंकी संख्या आदि भी कहिए ॥ २, ३ ॥ श्रीरामदासने कहा-अब मैं तुम्हें इस रामायणकी सर्गानुक्रमणिका बताता हूँ। जिसके श्रवणमात्रसे समस्त रामायणके श्रवणका फल मिल जाता है ॥ ४ ॥ सारकाण्डके पहले सर्गमें कौसल्याका स्वयंवर, दूसरेमें राम आदिका जन्म, तीसरे सर्गमें जनकपुरमें सीताका स्वयंवर, चौथे