श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४७३
सर्गः १४ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ४७३
अवताराश्च बहवो धृता नो रिपवो हताः। शंखासुरो वेदहर्ता मत्स्यरूपेण दारितः ॥१२८॥
तथाऽस्माकं सुधां दातुं मज्जंतं मंदराचलम् । दृष्ट्वा स कूर्मरूपेण त्वया पृष्ठे धृतो गिरिः ॥१२९॥
मत्पृथ्वीति स्पर्द्धमानं हिरण्याक्षं निहत्य च। त्वया वाराहरूपेण जलात्पृथ्वी समुद्धृता ॥१३०॥
प्रह्लादवचनात्स्तम्भादाविर्भूय त्वया पुरा। नरसिंहस्वरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः ॥१३१॥
हृत्वा राज्यं हृतं दृष्ट्वा पुरा तु मघवतस्त्वया। बलिर्वामनरूपेण पाताले विनिवेशितः ॥१३२॥
नृपैरधर्मनिरतैरदृष्टा ध्यार्त्ता सुभृं पुरा। त्वयैकविंशद्वारं हि जामदग्न्यस्वरूपिणा ॥१३३॥
पितृवैरं पुरस्कृत्य निःक्षत्रो पृथिवी कृता। दशास्यकुम्भकर्णौ तौ रामरूपेण राक्षसौ ॥१३४॥
पत्नीवैरं पुरस्कृत्य त्वया दृष्टौ हताविह। उद्धारितौ तौ स्वगणौ द्विवारं देवशापतः ॥१३५॥
एकवारं पुनस्त्वग्रे त्वं तावेवोद्धरिष्यसि । तच्छ्रुत्वावचनं श्रुत्वा वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥१३६॥
सर्वं जानन्नपि ज्ञानान्मां प्रप्रच्छ तं विधिम् ॥१३७॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे
उत्तरार्धे रामहस्त्यप्रतिरोघो नाम त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥
चतुर्दशः सर्गः
( शंखचूड़िकी जन्मगाथा तथा बहुतेरे मंत्रोंका निरूपण )
श्रीरामदास उवाच
कौ गणौ देवशप्तौ तौ कथमद्धारितौ वद। पुरा द्विवारं रामेणाग्रे कथं वोद्धरिष्यति ॥१॥
तद्वसिष्ठवचः श्रुत्वा विधिः प्राह विहस्य तम्। सर्वं वेत्सि भवान् लोकान् ज्ञापितुं मां हि पृच्छसि ॥२॥
तदा वदाम्यहं सर्वं गणयोः शापकारणम्। एकदाऽथ महाविष्णुर्वैकुण्ठे रमया रहः ॥३॥
संस्थितश्च तदा द्वारि विष्णुं द्रष्टुं सुचेतसौ। तापसाश्विनीकुमारौ हि समाजग्मतुरुदगतौ ॥४॥
करनेके पश्चात् ब्रह्माने कहा—मैंने जो कुछ अपराध किया है, सो क्षमा करें । हे रघुकुलश्रेष्ठ ! आपका कर्त्तव्य है कि आप हमारी रक्षा करें। पहले भी आपने हमारी रक्षा करनेके लिए पृथ्वीतलपर कितने ही अवतार लेकर हमारे शत्रुओंको मारा है। वेदोंको चुरानेवाले शंखासुरको आपने मत्स्यका रूप धारण करके मारा था ॥१२८-१२९॥ हम सबोंको अमृत पिलानेकी इच्छासे, समुद्रमन्थनके समय जब मन्दराचल डूबा जा रहा था, तब कूर्मरूप धारण करके उसे अपनी पीठपर रखा था। "यह पृथ्वी मेरी है" इस प्रकार कहकर डींग मारनेवाले हिरण्याक्षको मारकर आपने वाराहरूप धारण करके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार किया ॥ १३० ॥ १३० ॥ प्रह्लादके वचनसे आप खम्भेसे प्रकट हुए और हिरण्यकशिपुका संहार किया। जब दैत्योंते इन्द्रसे राज्य छीन लिया था, तब आपने वामनरूप धारण करके भीख माँगी और बलिको पाताल लोक भेज दिया ॥१३१ १३२॥ जब इस पृथ्वीमण्डलमे पापी राजाओंका अत्याचार देखा तो परशुरामका रूप धारण करके पितृवैरके व्याजसे पृथ्वीको क्षत्रियविहीन कर दिया । रावण और कुम्भकर्णको आपने पत्नीवैरके बहाने यमपुर पहुँचाया। दो बार आपने देवताओंके शापसे अपने गणोंकी रक्षा की है और भविष्यमे फिर एक बार उनका उद्धार करेंगे। ब्रह्माकी बातको सुनकर सब कुछ जानते हुए भी वसिष्ठने ब्रह्माजीसे पूछा—॥ १३३-१३७ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्वित राज्यकांडे उत्तराद्धे त्रयोदशः सर्गः ॥१३॥
वसिष्ठजी कहने लगे—वे दोनों कौनसे गण थे, जिनको देवताओंका शाप प्राप्त हुआ था और रामने उनका उद्धार किया था और फिर भी उद्धार करेंगे, सो कहिए ॥ १॥ इस प्रकार वसिष्ठकी बातसुनकर ब्रह्माने हँसकर कहा—आप सब कुछ जानते हैं, किन्तु मुझे ज्ञान प्राप्त करानेके लिए मुझसे पूछ रहे हैं तो मैं भी उन गणोंके शापका कारण बतलाता हूँ। एक समय महाविष्णु एकान्तमें
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समागती देववैद्यौ तौ दृष्ट्वा द्वारगतौ । जयविजयात्मानौ तयोरग्रे बभूवतुः ॥ ६ ॥
ताभ्यां वैदौ तदा प्रोक्तौ विष्णुस्तिष्ठति वै रहः । नायं कालो दर्शनस्य तच्छ्रुत्वा प्रोचतुः सुरौ ॥ ६ ॥
अधुना द्रष्टुमिच्छामो विष्णुं कथयतां नरौ । तयोर्द्वियोगमनं युवां शृणुतं चेरितम् ॥ ७ ॥
इत्योर्वचनं श्रुत्वा तौ पुनः प्रोचतुर्गणौ । नगच्छावो महाविष्णुमस्मल्लक्ष्म्या रहःस्थितम् ॥ ८ ॥
एवं त्रिवारं ताभ्यां तौ प्रोक्तौ नैच्छतुर्गणौ । तदाऽश्विनीकुमारौ तौ प्रोचतुः क्रोधमूर्च्छितौ ॥ ९ ॥
आव्योर्वारणनं नैव युवाभ्यां हि श्रुतं गणौ । यतस्त्रिवारं तस्मात्तु युवां जन्मत्रयं भुवि ॥ १० ॥
कथयद्य न संदेहस्तच्छ्रुत्वा ह्यवरं तयोः । अथावति तयोः शापं ददतुर्देववैद्ययोः ॥ ११ ॥
विनापराधतः शापो यस्माद्दत्तस्तु चारयोः । एकवारं युवां क्वापि जन्मप्राप्स्यथु वै भुवि ॥ १२ ॥
एवं परस्परं शापं रुद्ध्वा हाहेति चक्रतुः । सदा कोलाहलश्चासीद्वाह्वायाम तान् हरिः ॥ १३ ॥
तद्वृत्तगसकलं श्रुतं प्रोचुस्ते जगदीश्वरम् । पश्चात्ते महताविष्णुं प्रार्थयामशुरादरात् ॥ १४ ॥
येन शीघ्रं विमुक्तिः स्यात्तन्नो वद महेश्वर ! ततः प्रोवाच तान् विष्णुर्मुक्तिः शीघ्रं शुभाऽत्र हि ॥ १५ ॥
मयि भक्त्या विरोधिन्या जायते नात्र संशयः । समञ्जस्यादरेणैव मद्भक्त्या जायते गतिः ॥ १६ ॥
युष्माकं रोचते या सा भक्तिः कार्याऽवनीतले । तद्विष्णोर्वचनं श्रुत्वा ते प्रोचुर्जगदीश्वरम् । १७ ॥
नोऽस्तु भक्त्या विरोघिन्या शीघ्रं नो दर्शनं पुनः । तथेत्युक्त्वा रमानाधस्तान् सर्वान् म व्यसर्जयत् १८ ॥
ते जन्मानि ततः प्रापुर्ब्रह्मर्ष्या सुनिनन्दनः । जयो जातो हिरण्याक्षो हिरण्यकशिपुस्तथा ॥ १९ ॥
बातोऽत्र विजयः पूर्वं तौ हतौ विष्णुना भुग । वाराहरूपिणाऽनेन हिरण्याक्षो विदारितः ॥ २० ॥
नरसिंहरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः । ततः पुनर्जन्म तौ हि द्वितीयं प्रत्यतुर्भुवि ॥ २१ ॥
लक्ष्मीके साथ बैठे थे। उसी समय उनके दर्शनार्थ अश्विनीकुमार वहाँ जा पहुँचे ॥ १-४ ॥ तब देववैद्योंको देखकर जय-विजय नामक दोनों द्वारपाल उनके सामने पहुँच और कहने लगे-इस समय भगवान् एकान्तमें हैं। अतएव आप लोग दर्शन नहीं कर सकेंगे। यह सुनकर वे दोनों देवता बोले-विष्णुभगवान्से जाकर कह दो कि हम अभी इसी समय आपका दर्शन करना चाहते हैं। देवताओ की बात सुनकर जय-विजयने कहा कि हम अभी उनके पास नहीं जायेंगे। वे लक्ष्मीके साथ एकान्तमें बैठे हैं ॥ ५-८ ॥ इस तरह तीन बार अश्विनीकुमारोंके कहनेपर भी जब जय-विजयने उनकी बात नहीं मानी तब क्रुद्ध होकर उन्होंने शाप देते हुए कहा कि तीन बार तुम लोगोंने मेरी बातका उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हें तीन बार पृथ्वीलोकमें जन्म लेना पड़ेगा । उनके इस शापको सुनकर जय विजयने भी अश्विनीकुमारोंको शाप देते हुए कहा कि बिना अपराध तुमने हमको शाप दिया है। इसलिए तुम दोनोंको एक बार पृथ्वीतलपर जन्म लेना पड़ेगा ॥ ९-१२॥ इस प्रकार आपसमें शाप पाकर वे चारों हाहाकार करके पछताने लगे और वैकुण्ठधाममें कोलाहल मच गया तब विष्णुभगवान्ने उनको अपने पास बुलाया ॥ १३ ॥ भगवान्ने उनका वृत्तान्त सुना। इसके अनन्तर आदरपूर्वक उन चारोंने भगवान्से प्रार्थना की - ॥ १४ ॥ हे महेश्वर ! जिससे हमलोग शीघ्र इस शापसे मुक्त हो जायें, इस बात वहीं उपाय बतलाइये । विष्णुभगवान्ने उन्हें समझाते हुए कहा कि घबड़ाओ नहीं, शीघ्र ही तुम लोग शापसे मुक्त हो जाओगे, किन्तु उपाय दो हैं। एक यह कि तुमलोग हमारी भक्तिसे विरोधभाव रक्खो। दूसरे उपायमें हमारी भक्ति करके मुक्ति पानेका विचार करो। यदि मेरी भक्तिमें विरुद्ध रहोगे तो शीघ्र मुक्ति मिल जायगी और भक्ति के साथ चाहोगे तो बहुत बार जन्म लेना पड़ेगा। इन दोनोंमेंसे जो उपाय अच्छा जंचे उसे चुन लो। इस प्रकार विष्णुकी बात सुनकर उन लागोंने उत्तर दिया कि हम आपकी भक्तिमें विरुद्ध भाव रक्खेंगे, जिससे शीघ्र मुक्ति हो जाय। भगवान्ने भी "अच्छा वैसा ही हो" यह कहकर उन लोगोंको विदा कर दिया ॥ १५-१८ ॥ तदनन्तर वे लोग मृत्युलोकमें आकर जन्मे। उनमें जय हिरण्याक्ष नामका तथा विजय हिरण्यकशिपु राक्षस होकर जन्मा। इसके अनन्तर वाराहरूप धारण करके विष्णुभगवान्ने हिरण्याक्षको मारा और नरसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका संहार किया ॥ १९ ॥ २० ॥ दूसरे जन्ममें