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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४११

सर्गः ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४११

निर्मिता विधिना पूर्वं निद्रानाम्नी त्वहं प्रभो । दत्तं तेन मम स्थानं कुम्भकर्णे चिरं सुखम् ॥६७॥
यावत्कालं स्थिता राम स त्वया निहतो रणे । ततो मद्भवनान्नाशं गता शीघ्रं विधिं प्रति ॥६८॥
तेन त्वां प्रेषिता राम ततः प्राप्ता त्विमां पुरीम् । सोमाचारमयादस्यां नगर्यां न गतिर्मम ॥६९॥
अत्रैव संस्थिता राम शोचंती सरयूतटे । मे स्थानं वद रामाद्य यत्र स्वाप्यामहं सुखम् ॥७०॥
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् । स्मृत्वा दूतकृतं पूर्वं तदा क्रोधेन बोदितः ॥७१॥
निद्रे शृणु वचो मेऽद्य ते स्थानं कीर्तयाम्यहम् । पापात्मानो नरा भूम्यां ये शृण्वंति हि कीर्तनम् ॥७२॥
पुराणश्रवणं वेदपठनं पूजनं जपम् । तपो ध्यानं च होमादि यद्यत् कुर्वन्ति पापिनः ॥७३॥
तेषु त्वं तिष्ठ मद्धाक्याद्धीनदेवनरेष्वपि । जडे बालेऽथ गुर्विण्यामुपवासाप्रभोजने ॥७४॥
तथा विद्यार्थिनि भ्रांते नर्ते जागरूकामुके । एतेषु ते स्थलं दत्तमेतान्मोहय मद्धरात् ॥७५॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सा तुष्टा प्रणनाम तम् । ययौ रामः स्वनगरीं सुखं निद्रां चकार वै ॥७६॥
तदारभ्य पुरोक्तेषु दाने निद्राऽकरोन्मुखम् । पापात्मनामतो निद्रा बाधते पुण्यकर्मसु ॥७७॥
तदारभ्य सेवकेषु नरेष्वप्यवनीतले । निद्राप्रस्तेषु पुण्यात्मा सङ्ख्येऽपि कश्चन ॥७८॥
शुश्राव संकीर्तनादि चकार पूजनादिकम् ।

श्रीरामदास उवाच
अथान्यां सम्प्रवक्ष्यामि कथां सीतापयस्कराम् ॥७९॥
कुम्भकर्णस्य पुत्रस्य निकुम्भस्य च गर्भिणी । प्रसूत्यर्थं पितुर्गेहं गता द्वीपांतरं प्रिया । ८०॥
रावणादिक्षये जाते तस्यां जातस्तु पोलुकः । मायापुर्यां सनक्रिश्च प्रतयदन्तरः पुनः ॥८१॥


हे प्रभो यह बहुत समयकी बात है कि जब ब्रह्माने मुझे बनाया था । मेरा नाम निद्रा है और ब्रह्माने मुझपर दया करके कुम्भकर्णके देहम रहनेका स्थान दिया । तब मैं बड़े आनन्दसे उसमें रहन लगी ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ लेकिन आपने उसे भी मार डाला । मेर रहनेका एक अखाड़ा था, उसे भी आपने उजाड़ दिया । ऐसा व्यवस्थान रहतो-करावली हुई में ब्रह्माक पास गया और उन्ह अपनी गाथा सुनायी । उन्होंने मुझ आपके पास भेजा ओर मै इस जगह आ पहुंची। सगरक्षाकोंके भयस इस नगराम घुसनका माहस नहीं हुआ । इसलिए इसा सरयूके किनारे बैठी बैठी विलाप किया करती हू । हे राम ! अव आप कृपा करके मेर रहनक लिए कोई स्थान बतला दीजिए, जहाँ मै रह सकूं ॥ ६८-७० ॥ इस प्रकार उसकी बात सुनकर रामचन्द्रको पहले दूतकी बातें सोचकर कुछ गुस्सा आ गया और विद्वास बाल-॥ ७१ । हे निद्रे ! सुना, मै तुम्हें तुम्हारे रहनेके लिए स्थान बतलाता हूँ । जो पापी मनुष्य मेरा कीर्तन सुनने जायँ और वे पुराणश्रवण, वेदपाठ, पूजन, जप, ध्यान आदि जो कुछ भी करने लगें, उनमें तुम अपना रङ्ग जमाओ जो लोग हीन प्रकृतिक हों, न चाहे देता हों या मनुष्य, जड़, बालक, गर्भिणी स्त्री, अत्रोसर भोजन करनेवाल, विद्यार्थी और थके हुए मनुष्योंमें तुम रहो । जो लोग उसकी भगत हों, उन लोगोंमे मे तुम्हें रहनक लिए स्थान देता हूँ । मेर बरदानसे तुम इन्होंपर अपना मोहजाल फैलाओ ॥ ७२-७५ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर वह प्रसन्न हुई और उसने भगवान्-को प्रणाम किया । उधर रामचन्द्र भी अपनी नगरीमं लोट आये और रातभर खूब अच्छी तरह सोये ॥ ७६ ॥ तभीसे ऊपर कहे हुए लोगांम निद्रा निवास करने लगी । इसीलिए यदि पापी मनुष्य कोई पुण्यकर्म करने लगता है, तब उसे निद्रा सताती है ॥ ७७ ॥ तभीसे पृथ्वीमण्डलमें निद्राने सेवकोंपर अपना मोहजाल फैलाया । सहस्त्रों निद्रानु अनुरक्तोंमें कहीं एक मनुष्य ही मुश्किलसे ऐसा मिलेगा, जो श्रवण-कीर्तन आदि शुभ कर्म करनेवाला पुण्यात्मा हो ॥ ७८ ॥ श्रीरामदास कहने लगे—अब मै सीताके यशसे भरी एक दूसरी कथा सुना रहा हूँ ॥ ७९ ॥ कुम्भकर्णके बेटे निकुम्भकी गर्भिणी स्त्री बच्चा पैदा करनेके लिए किसी दूसरे द्विपमें रहनेवाले अपने पिताके घर गयी थी ॥ ८० ॥ जब रामके साथ युद्ध करके रावण वंश समेत नष्ट हो

४१२आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

घ्राणानदीतटे चक्रेऽद्रावणः सौरमादरे । महाकायश्चतुर्हस्तश्चोद्वेजयन्निवा विभीषणम् ॥८२॥
शताननेन वै सार्धं लङ्काराज्यं चकार स । ततो विभीषणो रामं गत्वा सर्वं न्यवेदयत् ॥८३॥
सीताविभीषणाभ्यां वै रामो लङ्कां ययौ द्रुतम् । निहत्य रावणं सैन्या युद्धे रामे जितेऽथ तम् ॥८४॥
विभीषणाय तां लङ्कां दत्त्वा तं पौण्ड्रकं दृढौ । अथैकदा सभामध्यं स्वधाम विभीषणः ॥८५॥
ययौ विषण्णः सचिवैश्चतुर्भिः संयुतः क्षितौ । नत्वा रामं साश्रुनेत्रश्चाऽब्रूवं कपितत्परः ॥८६॥
उवाच सकलं वृत्तं लङ्कायाः प्रम्लवद्गिरः । राम राजीवपत्राक्ष त्राहि मां शरणागतम् ॥८७॥
मूलर्क्षे कुम्भकर्णस्य जातः पुत्रः पुरा वने । दैवोत्पन्नो वृक्षवृक्षे बालस्तत्र शयिनः ॥८८॥
मक्षिकाभिः स्ववमनजलस्य बिंदुभिर्मुदुः । पालितो रहसः श्रुत्वा न्यक्तेनैश्वर्यकुलक्षयम् ॥८९॥
तपसा तोष्य ब्रह्माणं नडरेणानिर्गजितः । पातालस्थै राक्षसैश्च लंकायां समुपागतः । ९० ।
मया सेन तु षण्मासं कृतं युद्धं महत्तमम् । मां जित्वा म पुरीं धास्ताददात् सचिवैः श्शिशौ ॥९१॥
मधुत्रौ गुप्तमार्गेण भ्रामर्जन पलायिनः । शनैर्विश्रमर्गेण लङ्काया योजनोपरि । ९२ ।
रात्रौ बहिर्निर्गत्य विडान्तरं समागतः । मूलर्क्षे यः समुत्पन्नस्तन्मूले विवर्द्धितः ९३॥
मूलकासुरनाम्नाऽतः पगं ख्यातिं गतोऽधुना । सगरं तेन मामुक्तमादौ त्वां तु विभीषणम् । ९४।
हत्वा लङ्कापुरीं पश्चात् ततो गच्छामि राघवम् । यन्विना निहतो येन विहतं सकलं कुलम् । ९५॥
त राम सगरं हत्वाऽऽनृण्यं गन्ताऽहह पितुः । आगमिष्यति सोऽत्रापि त्वां योद्धं रघुनन्दन । ९६।
इदानीं यद्धितं यत्र तस्कुरुष्व मृत्तम । ततस्य सकलं वृत्तं श्रुत्वा रामोऽतिविस्मितः ॥९७॥
लक्ष्मणं प्राह बेगेन वारिपन्तु जगतातले । स्वस्वरूपावस्थितन्वमन्वर्गकारवाधुना ॥९८॥

भया ना इस गर्भ पौण्ड्रक नामका पुत्र उत्पन्न हुआ, ८१॥ दण्डकारण्यके अन्दर मायापुरी नामकी नगरी-में एक सौ सिरवाला रावण रहता था उसके १०० सुतायें थीं। पौण्ड्रकने उस रावणकी सहायतासे विभीषण-को परास्त कर दिया और शतानन रावणके साथ लङ्काका राज्य स्वयं करने लगा। उस समय विभीषण रामके पास गये और उन्होंने अपना सब वृत्तान्त सुनाया ॥८२-८३॥ मिसकी इस दुःखभरी कहानीको सुनकर राम सीता और विभीषणके साथ लङ्काको चल दिये। वहाँ पहुंचकर उन्होंने उस सौ मूँहवाले रावण तथा पौण्ड्रकको मारा और फिर विभीषणको लङ्काके सिंहासनपर बिठाकर अयोध्या लौट आये। इसके बाद एक दिन राम अपनी सभामें बैठे थे। उस सभामें स्त्री, पुत्र तथा मन्त्रियक साथ विषण्ण भावसे बैठे हुए विभी-षणने कहा-हे राम, हे राजीवपत्राक्ष ! मैं आपकी शरणमें हूँ, मेरी रक्षा कीजिए । ८४-८७ ॥ बहुत दिनों-की बात है, जब मूल नक्षत्रम कुम्भकर्णक एक पुत्र हुआ था । कुम्भकर्णने दुष्टों द्वारा उस लड़केको जङ्गलमें छोड़वा दिया। वहीं मधुमक्खियोंने उसके मुंहमें मधुकी एक-एक बूंद टपकाकर उसकी रक्षा की। वह इस समय बड़ा हुआ है। जब उसने लोगोंके मुंहसे यह सुना कि रावण और पिता तथा कुटुम्बियोंका नाश किया है ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ तब उग्र तपस्या द्वारा उसने ब्रह्माको सन्तुष्ट करके वर प्राप्त कर लिया। वरके प्रभावसे गर्वित होकर पातालनिवासी राक्षसोंकी सहायतासे उसने लङ्कापर चढ़ाई कर दी। मैंने छह महीने तक उसके साथ घमासान युद्ध किया। अन्तमें उसने मुझे परास्त करके लङ्कापर अधिकार कर लिया। ऐसी अवस्थामें मैं आधी रातको अपने पुत्र, स्त्री एवं मन्त्रियोंके साथ एक गुप्तमार्गसे गमभ्य भागा ॥ ९०-९२ । एक योजन दूर भाग आनपर ठहर गया जब रात्रि व्यतीत हो गयी। तब आगे बढ़ और आपके पास आ पहुँचा। वह मूल नक्षत्रमें पैदा हुआ तथा वृक्षोंके नीचे उसका पालन-पोषण हुआ है। इसीलिए लोग इसे मूलकासुर कहते हैं। युद्ध करते-करते एक बार उसने मुझसे कहा था कि इस रणभूमिमें पहले तुझको मारकर लङ्कापर अधिकार कर लेने-के बाद मैं उस रामके पास आऊँगा, जिसने मेरे पिता तथा मेरे कुलका संहार किया है ॥९३-९५॥ रणाभूमिमें तुझको मारकर मैं अपने पितृऋणसे उऋण हो जाऊँगा। हे रघुनन्दन मैं अनुमित जानता हूँ, शीघ्र ही वह आप-से भी युद्ध करनेके लिए आयेगा ॥ ९६ ॥ ऐसा अवस्यामे आप जो उचित समझे सो कर । विभीषणका हाल