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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४१३

सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४१३


ततो विप्रान्नृपान् वैश्यान् समाहूय रघूत्तमः ।
या यस्य दुहिता नारी या यस्य पुत्रपुत्रिका ॥ ९९ ॥
तस्मै तस्मै ददौ तां तामेवं सर्वा व्यसर्जयत् ।
वस्त्रालङ्कारभूषाद्यैः शोभयित्वा पृथक् पृथक् ॥ १०० ॥
ते विप्राद्याः पुनर्जाता मेनिरे निजबालिकाः ।
सतः स्वं स्वं पुरं नीत्वा भृशं वैश्याः प्रमोदिताः ॥ १०१ ॥
नृपपुत्रैर्विप्रपुत्रैस्तासां चक्रुः सुमङ्गलम् । रामप्रसादात्ताः प्रापुः पतिमग्र्यसुखं स्त्रियः ॥ १०२ ॥
ताश्चापि द्विजपुत्र्यस्तु पितृगेहमेव सर्वसु ।
निन्युः स्त्रीयायुषं तत्र व्रतचर्यादिभिः सुखम् ॥ १०३ ॥
विवाहकालानतिक्रमणात्न ता उद्वहिता द्विजैः ।
जन्मान्तरेण ता सर्वाः कृष्णः पत्नीः करिष्यति ॥ १०४ ॥
अथ रामः सुबाहोश्च पुत्रस्य मथुरां पुरीम् । विवाहार्थं सीतया स पौरांजनपदैर्ययौ । १०५॥
तत्र वैवाहिकं कर्म मपाद्य रघुनन्दनः । तस्थौ तत्र द्विपन्कालं मथुरायां यथासुखम् ॥ १०६॥
एकदा जानकीवाक्यात्कालिन्द्याः सङ्गमे शुभे । निशायां हेमपर्यङ्के सुखं सुष्वाप राघवः ॥ १०७॥
एतस्मिन्नन्तरे दासीर्दासान् दृष्ट्वा विनिद्रितान् ।
स्त्रीरूपेणाथ कालिंदी समांघ्रि संस्पृशच्छनैः ॥ १०८ ॥
ततो रामः प्रबुद्धाऽभूददर्श पुरतः स्थिताम् ।
सूर्यस्य तनयां पुण्यां कालिंदी कंजलोचनाम् ॥ १०९॥
दिव्यालङ्कारवस्त्राढ्यां दिव्यगन्धसुगन्धिताम् । नीलोत्पलदलश्यामां हेमकुंभपयोधराम् ॥ ११०॥
स्मिताननां सुरूपांरु किंकिणीजालमालिकाम् ।
केयूरकुंडलाढ्यां तां प्रोन्नत्तस्तनां वराम् ॥ १११॥

सैनिकोंको साथ लेकर अपने शिविरको लौट आये । इस प्रकार सात दिन वनमें रहते हुए अनेक तरहके सुखोंका उपभोग करके राम अपनी अयोध्यापुरीको लौट पड़े ॥ ९३ ॥ ९८ ॥ इसके अनन्तर दुन्दुभी द्वारा हरण की हुई उन कन्याओंको जो जिसकी पुत्री थी, उन-उन राजाओं, ब्राह्मणों तथा वैश्योंको बुलाकर दे दी और उन बालिकाओंको वस्त्राभूषणादिसे अलंकृत करके विदा कर दिया ॥ ९९ । १०० ॥ वे ब्राह्मणादिक अपनी कन्याओंका पुनर्जन्म मानकर रामके आज्ञानुसार अपन-अपन घरोंको ले गये और नृपों तथा वैश्योंने अच्छे वरोंके साथ उनका विवाह कर दिया । रामचन्द्रजीकी कृपासे उन सबको पतिके साथ विहार करनेका सुख प्राप्त हुआ ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ उनमेंसे जो ब्राह्मणों की कन्यायें थी, वे विवाहकाल व्यतीत हो जानेके कारण विवाह न करके यूं ही पिताके घरपर व्रत-उपवासादि करके अपना जीवन यापन करने लगीं । क्योंकि उनको यह विश्वास हो गया था कि दूसरे जन्ममें स्वयं श्रीकृष्णचन्द्रजी मेरे पति होंगे ॥ १०३ ॥ १०४ ॥ कुछ दिनों बाद सुबाहुका विवाह करनेके लिये रामचन्द्रजी सीताके साथ मथुरापुरी गये ॥ १०५ ॥ वहाँपर विवाहका सारा कार्य सम्पादन करके कुछ दिन मथुरामें ही रहे ॥ १०६ ॥ एक दिन सीताके कहनेसे रामचन्द्रजी यमुनाके तटपर सोये । उस समय वहाँके सब दासों और दासियोंको निद्रित देखकर एक स्त्रीका रूप धारण किये यमुना स्वयं रामके पास गयी और जोरसे उनका पैर पकड़ा ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ उसके ऐसा करनेपर रामचन्द्रजी जाग गये और सामने सूर्यकी पुत्री तथा कमलके समान नेत्रोंवाली कालिन्दीको देखा ॥ १०९ ॥ उस समय उसके शरीरमें दिव्य वस्त्राभूषण पडे थे । पैरोंमें सुन्दर नूपुर छनछना रहे थे । नील कमलकी पंखुड़ियोंके समान उसका रङ्ग था और सुवर्णकलशके समान उसके स्तन थे ॥ ११० ॥ मुस्कुराता हुआ मुख

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तां तादृशीं प्रसमीक्ष्य क्षणं तूष्णीं व्यचिन्तयत् । धन्यो विधाता येनेयं कालिन्दी रचिता पुरा ॥११२॥
इत्याश्चर्यमना भूत्वा तत्सौंदर्यं व्यलोकयत् । अथ रामः स तां प्राह वदागमनकारणम् ॥११३॥
सा प्राह तं विलज्जन्ती सर्वं त्वं वेत्सि राघव । ततो रामोऽब्रवीद्भद्रे चैकपत्नीव्रतं मम ॥११४॥
इह जन्मनि कालिन्दि त्वं याहि स्वस्थलं जवात् ।
यावत्सीता प्रबुद्धा न जायेत तावदेव हि ॥११५॥
सा रामवाक्यैर्वज्रैरिव भिन्नमरुत्स्थला भुवि । मूर्च्छामापाथ तत्रैव तां दृष्ट्वा सोऽब्रवीत् पुनः ॥११६॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ कालिन्दि शृणु त्वं वचनं मम । द्वापरे कृष्णरूपेण त्वां करिष्याम्यहं स्त्रियम् ॥११७॥
विवाह्यैव मयासार्धं तदा भोक्ष्यसि मन्सुखम्
इति श्रुत्वा रामवाक्यं किंचित्तुष्टमना नदी ॥११८॥
नत्वा रामं ययौ तूष्णीं रामध्यानपरायणा ।
ततो रामोऽपि सैन्येन सीतया स्वपुरीं ययौ ॥११९॥
एवं स केतवनगरे रामः स्त्रीवधुरेहजैः ।
चरित्राण्यकरोन्नाना पापनाशानि श्रवादिना ॥१२०॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे
षोडशसहस्रस्त्रियवकालिन्दीप्यवश्रीत्वदर्शनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥


था, केलेके खम्भेकी तार्ह उसकी जंघायें थीं किङ्कणी केयूर कुण्डल आदि आभूषण अपनी छटा दिखा रहे थे ॥ १११ । इस प्रकारकी एक अपरिचित नारीको अपने सामने देखकर राम थोडी देर तक यह सोचते रहे कि विधाता धन्य है, जिसने कालिन्दी जैसी नारीकी रचना की है । ११२ ॥ इस प्रकार विचार करते हुए वे उसका सौन्दर्य देखते रहे। इसके अनन्तर उससे कहने लगे-तुम अपने आनेका कारण बतलाओ ॥ ११३ ॥ रामकी बात सुनकर सकुचाती हुई कालिन्दीने कहा- हे राघव ! तुम सब कुछ जानते हो। फिर रामने कहा कि हे कालिन्दी ! इस जन्ममें मैंने एकपत्नीव्रत धारण कर रक्खा है। इसलिये सीता जाग जाय, इसके पहले ही तुम यहाँसे चली जाओ ॥ ११४ । ११५ ॥ रामके ये वाक्य वज्रके समान उसके हृदयमें लगे, जिससे वह वहींपर मूच्छित होकर गिर पड़ी। फिर रामने कहा कालिन्दी ! उठो-उठो, मेरी बात तो सुनो। द्वापर-युगमें मैं कृष्ण होकर तुम्हें अपनी स्त्री बनाऊँगा, आज तुम लौट जाओ। जन्मान्तरमें तुम मेरे साथ विहार करके सुखी होओगी। इस प्रकारकी बात सुनकर यमुनाको कुछ सन्तोष हुआ ॥ ११६-११८ ॥ तदनन्तर रामको प्रणाम करके उनका ध्यान करती हुई वह लौट गयी। उधर राम भी अपनी सेना तथा सीताके साथ अयोध्या चले गये ॥ ११९ । इस तरह रामचन्द्रजी साकेतपुरमें अपने पुत्रों तथा सीताके साथ अनेक लीलायें किया करते थे, जिनका श्रवण करनेसे समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १२० ॥ इति शतकोटि-रामचरितामृते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

॥ इति राज्यकाण्डं पूर्वार्द्धं समाप्तम् ॥

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु ।

श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्


राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्)

त्रयोदशः सर्गः

( राम द्वारा राज्यभरमें हास्यपर प्रतिबन्ध )

श्रीरामदास उवाच

अथैकदा रमाजानिः सुहृद्भिः सदसि स्थितः । वीजितश्चामरेणैव लक्ष्मणेनातिशोभितः ॥ १ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र पौरः कश्चिद्रमार्थितः । वाराङ्गनानां नृत्यादि दृष्ट्वा हास्यं चकार सः ॥ २ ॥
तद्धास्यं राघवः श्रुत्वा सस्मार पूर्वचेष्टितम् । लङ्कायां युद्धसमये रावणस्य शिरोऽपि खात् ॥ ३ ॥
रामबाणान्स्मृतिं लब्ध्वाऽस्माभिश्चेति विहस्य च । श्रीपादं वन्दनं कर्तुं पतन्ति स्म प्रभुं पुनः ॥ ४ ॥
तेषां विकरालतां दृष्ट्वा दंतादीनां रघूत्तमः मद्भक्षुं हि पुनर्यान्ति शिरांस्येतानि खादिति । ५ ॥
रामो भीत्या पुनस्तानि खे शिरांस्त्यक्षिपच्छरैः । एकोत्तरशतान्येव वारं वारं स्वरान्वितः । ६ ॥
तदृष्ट्वा राघवः स्मृत्वा किं दशास्यस्य वै शिरः समागतं सभामध्येत्येति पार्श्वेष्वलोकयत् ॥ ७ ॥
मायाविनो राक्षसाश्च सन्त्यत्रेति विचिन्त्य च । एवं यदा यदा हास्यं स शुश्राव रघूत्तमः ॥ ८ ॥


श्रीरामदासजी बोले—एक दिन रामचन्द्रजी अपने मित्रोंके साथ सभामें बैठे थे। उस समय रामपर चँवर चल रहे थे और लक्ष्मण रामके पास बैठे हुए थे। इसलिए रामकी शोभा कईगुना अधिक दिखायी दे रही थी ॥ १ ॥ इसी समय सभाका कोई नागरिक वेश्याओंका नृत्य देखकर जोरोंके साथ हँस पड़ा ॥ २ ॥ उस हास्यको सुना तो रामको उस समयकी एक बात याद आ गयी, जब वे लङ्कामें रावणके मस्तकोंको अपने बाणोंसे काटकर आकाशमें उड़ा देते थे तो वे मस्तक यह समझकर कि रामके बाणोंसे मेरी बुद्धि ठिकाने आयी है। इस भावसे हँसते हुए ऊपरसे फिर नीचे आकर रामके चरणोंमें लोटते हुए वन्दना करने लगते थे ॥ ३ ॥ ४ ॥ उनके दाँतों आदिकी विकरालता देखकर रामको यह ख्याल होता था कि ये मस्तक मुझे खाने आ रहे हैं। इस लिए उन्हें फिर बाणों द्वारा आकाशमें उड़ा दिया करते थे। यह उपाय रामको एक दो बार नहीं पूरे एक सौ एक बार करने पड़े थे ॥ ५ ॥ ६ ॥ उसी बातको स्मरण करके रामने सोचा कि कहीं रावणके मस्तक ही तो इस सभामें आकर अट्टहास नहीं मार रहे हैं। इस भावसे उन्होंने अपने आस-पास विस्मयभरे नेत्रोंसे देखा । ७ ॥ क्योंकि उनका ख्याल था कि राक्षस मायावी होते हैं, शायद यहाँ भी आ जायें तो क्या आश्चर्य है। इस तरह राम जब कभी किसीका हास्य सुनते

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तदा तदा पूर्ववृत्तं स्मृत्वा पार्श्वं व्यलोकयत् । ततो रामः श्रुतं किञ्चि द्विनयामास सादरम् ॥९॥
यदा यदा श्रूयतेऽत्र हास्यं केनापि यत्कृतम् सदा तदा दन्तपङ्क्त्या दिष्टं हास्यं स्मराम्यहम् ॥१०॥
मायाविनो राक्षसास्ते मां विप्रतार्य पुनश्चित्रात् । माममुत्र यास्यन्ति त्विति मत्वा सचेतसि ॥११॥
अन्यच्च निंदितं हास्यं नीतिशास्त्रेषु सर्वदा । अतो हास्यं वर्जयामि सर्वेषां भूनिवासिनाम् ॥१२॥
इति निश्चित्य हृदये लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् । दुन्दुभिं घोषयस्वाद्य पुर्यां राष्ट्रेऽवनीतले ॥१३॥
स्मिताननो नरः कश्चिन्नारी वाप्यथ सुहृच्च यः । सीता वा तनयो बंधुः स मे दृश्या भवेदिति ॥१४॥
तथेति रामवाक्येन घोषयामास दुन्दुभिम् । पौरा जानपदाः सर्वे श्रुत्वा शिक्षाध्वनिं प्रभोः ॥१५॥
रामदण्डभयात् सर्वे न चक्रुस्ते स्मिताननम् । वारांगनानृत्यगीते नटगीतप्रवर्तने ॥१६॥
स्त्रीभिः सुहृद्भिर्मित्रैश्च विनोदानुत्सवोत्सवान् वरान् । मांगल्यानि च कर्माणि हास्यकारीणि नाचरात् । १७॥
वस्त्रसंग्रहकाभिश्च कौतुकानि हि यानि च । तूर्यघोषादिमाङ्गल्यकर्माणि विविधाः कथाः ॥१८॥
मात्रव्यंग्योत्सवान् सर्वान् यात्रायज्ञोत्सवान् शुभान् । कौतुकानुत्सवांश्चैव विवाहादिषु कर्मसु ॥१९॥
कांश्चित्कथञ्चापि न चक्रुश्च कदा जनाः । ययौ नावश्यककार्याद्विना सदसि कः प्रभुम् ॥२०॥
पुराणानीतिहासांश्च न पठन्ति स्म केचन । गर्भाधाने पुंसवनेनामकर्मादिषूत्सवान् ॥२१॥
पौरा जानपदाः सर्व मप्रष्टांगनिवासिनः । एतानि हास्यकारीणि नानाकर्माणि भूतले ॥२२॥
रहस्यपि न चक्रुस्ते रामदण्डभयात् कदा । एवमासीद्वर्षमेकं तदा भूम्यां कदापि हि ॥२३॥
स्मिताननं कस्य नारीन्न वक्त्रमंडनादिकम् । तदोग्यहृद्देवताश्च नानाकर्मोद्भवेववाः ॥२४॥
इन्द्राय कथयामासुस्तद्वृत्तं जगतीभवम् । इंद्रादीनां सुराणां च कर्माद्यरुचनादि हि । २५॥
नासीद्यदा जगत्त्यां हि तदेंद्रोऽकथयद्विधौ । तदा सुरु विविः प्राह न समाश्चेवरू हि नः ॥२६॥

तो उनका ध्यान उसी ओर आकृष्ट हो जाया करता था और अपने अगल-बगल निहारने लगते थे। इस समय रामने उस हास्यको सुनकर क्षणभर विचार किया और लक्ष्मण कहने लगे—॥८॥ ९ ॥ जब कभी मैं किसीका हास्य सुनता हूँ तो मुझे रावणकी हंसी स्मरण आ जाया करती है और यह ख्याल होता है कि वे मायावी राक्षस जिनको कि मैंने मार डाला है, धोखा देकर मुझे लानेके लिए फिर तो नहीं आ गये हैं ॥ १० ॥ ॥ ११ ॥ दूसरे नीतिशास्त्रम भी हास्यकी निन्दा की गयी है । इसीलिए आजसे मैं भूतलपर रहनेवालोंको हंसनेकी मनाही करता हूं । इसके बाद लक्ष्मणसे बोले कि मेरे राष्ट्र तथा पृथ्वीतल भरम डुगी पिटवाकर कहला दो कि कोई स्त्री पुरुष, मेरा मित्र, स्वयं सीता तथा मेरे बेटा या भाई भी न हँसे । जो इस आज्ञाके विपरीत चलेगा, उसे दण्ड भुगतना पडेगा ॥ १२-१४ ॥ लक्ष्मणने रामके वाक्यनुसार सारे और दुंदुभी बजवा-कर रामकी यह आज्ञा घोषित करा दी। जितने पुरवासी अथवा देशवासी थे, उन्होंने प्रभुकी इस शिक्षाध्वनि को सुनकर दण्डक भयसे हमेशाके लिये हँसना छोड़ दिया । वेश्याओके नृत्य, गान, नाटक, स्त्रियों या मित्रोंके साथ हंसी-दिल्लगी आदि ऐसे सब काय बन्द कर दिये गये, जिनमें हँसा आनेका अन्देशा रहता था ॥ १५-१७ ॥ उस समय बाँसपर चढ़कर नाचने आदिकी कथा, दुन्दुही-नगाड़े आदिके बाज, गाना, गान सावत्सरिक उत्सव, विवाह आदि मङ्गल कार्योंम भी हंसी आनेवाले खेल-कूद और गप शप आदि बातोंको बन्द कर दिया और बिना किसी विशेष कामके काई रामकी सभा में भी नहीं जाता था । १८-२० । लोगोंस पुराण-इतिहास आदिका भी पढ़ना छोड़ दिया । गर्भाधान, पुंसवन, नामकर्म आदि उत्सवोंमें हंसी न आने देनेका पूरा पूरा ध्यान रक्खा जाता था। मतलब यह कि सारे पुरवासी एवं देशवासी हास्योत्पादक कामोंको नहीं करते थे। रामके दण्डभयसे कोई एकान्तमे भी नही हँसता था। यह अवस्था एक वर्ष तक चलतीरही। इस बीचमे भूतलनिवा सियोंमेसे किसीका भी मुखमण्डल मुसकराता हुआ नहीं दीखा और किसीने भी अपना शृङ्गार आदि नहीं किया। ऐसी अवस्था में जितने ही कर्माङ्गदेवता और बहुतसे उत्साहोद्भवता एकत्रित होकर इन्द्रके पास गये ॥ २१-२४ ॥ उन्होंने पृथ्वीतलके उस समाचारको कह सुनाया । जब इन्द्रने सुना कि हम देवताओं-

सर्गः १२] गद्यकाव्यम् (उत्तरार्द्धम्) ४६७


नैवोपदेटुं योग्यः स ममापि जनरुच्युपः। युक्त्या कार्यं साधयामि येन वोऽद्य हितं भवेत् ॥२७॥
इत्याश्वास्य सुरान् सर्वान्विधिर्भूण्डलं ययौ। अयोध्यायाश्च सीमायां दृष्ट्वा वृक्षं सुविस्तृतम् ॥२८॥
स्वयं दिव्येण रूपेणो दृष्ट्वा पामरान् जहाश सः। एतस्मिन्नन्तरे कश्चिल्लक्कड़हारहः पुमान् ॥२९॥
श्रुत्वा पिप्पलहास्यं अनेन दीर्व जहाह सः। ततः स मतवाहश्च ययौ दृष्टं प्रमोः पुरेऽथ ॥३०॥
काष्ठभारक्रियाथै तत्र स्मृत्वा स्मितं हृदि। बणपुत्रस्य सोऽप्युच्चैर्न समर्थो निरोधितुम् ॥३१॥
द्वारपालस्य हास्यं तद्भावदूतोऽथ शुश्रुवे। राजदूतौ जहामोच्चैर्न समर्थो निरोधितुम् ॥३२॥
राजदूतः सभां गत्वा द्वारपालस्य यत् स्मितम्। हृदि स्मृत्वा जहामोच्चैरन्तस्स्थास्ते समासदः ॥३३॥
सभायां बहुगुः सर्वे रुन्द्ध्वा राघवोऽपि गः। उच्चैर्जहास सदसि दर्शितहामने स्थितः ॥३४॥
रामो विचारयामन्त किमर्थं हसितं मया। यस्मिस्रं सदा दण्डं वीगन् जानपदान्द्विजान् ॥३५॥
अहं करोमि सोऽप्यहं सभायां हसितः कथम्। दण्डयिष्यति मा कोऽप्य किंवां पौरा वदन्ति हि ॥३६॥
अस्माकमेव शिक्षाऽस्ति सर्वदा राघवस्य ना। न कथं हसितस्याथ सर्वैर्वा पुरत स्फुटम् ॥३७॥
शिक्षां करिष्यति विभोः कोऽप्य मिति वदंति ते। मानयिष्यति नाऽस्मते सभाणे शिक्षित जनाः ॥३८॥
अमंतव्यं व्रतं योग्यमिति रामस्त्वमन्यत। पुनर्जेहस श्रीगमस्तन्निरोद्धुं न सक्षमः ॥३९॥
ततो रामोऽब्रवीत्पौरान् सभास्थान्स्स्मितान्नभः। किमर्थं हसिता यूष मेम्बो हास्य मनापि हि ॥४०॥
प्रणागतं सभाणध्ये पौराः प्रोचुर्नृपोत्तमम्। दृष्ट्वा स्वदूतहाम्य हि तेनास्माक मनागतम् ॥४१॥
तत् पौरवचनं श्रुत्वा दूतमह रघूत्तमः। त्वया किमर्थं हसितं सोऽब्रवीत्पृष्ठनन्दनम् ॥४२॥


के क्योंकि पुत्रदादि मत्कार्य लुप्त होने जा रहे हैं तो ब्रह्माके पास जाकर यह बात बतायी। ब्रह्माजी कह कि रामचन्द्रजीके आगे हम बोलने कुछ भो शक्ति नहीं है ॥२५॥ २६॥ मैं उन्हें उपदेश नहीं दे सकता। क्योकि वे मेरे ईश हैं। इसलिए मैं किसी युक्ति अपना कार्यसाधन करूंगा कि जिससे आप लोगोंका कल्याण हो ॥२७॥ इस प्रकार उन्हें आश्वासन देकर ब्रह्माजी भूमण्डलकी ओर चल पड़े अयोध्याका सीमायार एक विशाल पिप्पल वृक्षको देखकर वे स्वयं उसके भीतर प्रविष्ट हो गए और उस रास्तेसे जाने-आनेवाले लोगोंको देख-देखकर जोरोंसे हंसने लगे। उसी समय एक लकड़हारा लकडोका बोझ माथेपर रखे हुए वहां आ पहुंचा। उसे यों देखकर पीपलके भीतर बैठे हुए ब्रह्माजी हंसे ॥२८॥२९॥ पीपलका हास्य सुनकर लकड़हारा पुने जोरोंसे हँसा और लकड़ोका बोझ लिए हुए अयोध्या नगरमें जा पहुंचा। गस्तमें उस पीपलकी हँसीवाली बात याद आ गयी और ठहाका मारकर हंस पड़ा। लेकिन क्षण भर बाद उसे रामको आज्ञाका स्मरण हो आया जिससे बेचारा शंकित हो उठा ॥३०॥३१॥ लकड़हारेकी हँसी सुनकर ओरपर-पर खड़ा सिपाही भी अपनी हँसी नहीं रोक सका । ३२॥ सिपाही सभामें गया तो उसे वहीं लकड़हारेकी हँसी याद आ गयी, जिससे वह हंस पड़ा। सिपाहीको हँसते देखा तो सभामें बैठे हुए लोग भी अपनी हंसी नहीं रोक सके और वे भी हंसने लगे ॥ ३३॥ इसपर सभामें लोगोंका हंसते देखकर रामचन्द्रका या हंसन गये । ३४॥ तब रामचन्द्रजी तुरन्त हंसी रोककर सोचने लगे—और लोग हंसे तो हंसे, मैं क्यों हंसा? जब मैं सारे भूमण्डलवासियोंका इस कामसे रोक रहा हूँ और दण्ड देता हूँ। तब मैं क्यो हंसा ? मुझे कौन दण्ड देगा ? और ये पुरवासी क्या कहेंगे ? यही न कि राम दूसरोंको ही शिक्षा देते हैं, प्रजाके वास्ते ही दण्डविधान करते हैं और स्वयं जो मनमें आता है सो कर डालते हैं। सब लोगोंके लिए जो हंसनेकी मनाही कर दी है, किन्तु स्वयं हजारों मनुष्योंके सामने ठठाकर हँसते हैं ॥३५-३७॥ इसका परिणाम यह होगा कि ये भविष्यमें मेरी बात नहीं मानेंगे। यह सब विचारकर रामने यह ठहराया कि मैंने बड़ी भारी भूल की है। लेकिन क्षणभर बाद ही रामको फिर हंसी आ गयी। पूरी चेष्टा करके भी वे हँसनेसे नहीं रुक सके ॥३८॥ तब रामचन्द्रजी सभाके लोगोंसे कहने लगे-आपलोग किस बातपर हंसे ? आप लोगोंको हंसते देख-कर मैं भी हंस गया। सभामें बैठे हुए पुरवासियोंने उत्तर दिया कि आपके सिपाहीको हंसते देखकर हमें

४५८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३

भारवाहस्य हास्यं तन् स्मृत्वा प्रहसितं मया । तद्भूतवचनं श्रुत्वा भारवाहं तदा प्रभुः ॥४३॥
दर्शनीयं सदसि तमाह रघुनन्दनः । मा भीतिं भज प्रत्यक्षं सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः ॥४४॥
हेतुं किमर्थं हसितं त्वयाऽथ कथयस्व माम् । स भारवाहकश्चकितः शुष्ककंठोष्ठतालुकः ॥४५॥
वेपमानः स्खलद्वाचा राघव वाक्यमब्रवीत् । अयोध्यायाश्च सीमायामश्वत्थस्य मयाऽद्य हि । ४६॥
दृष्ट्वा प्रहसितं राजन् हेतुं हास्यं तथा श्रुतम् मद्दूर्वा तद्विद्रं स प्रभुः श्रुत्वा मुविस्मितः । ४७॥
दूतानुवाच भोऽगच्छध्वनेनेन सह वेगतः । यूयं गत्वाऽद्य द्रष्टव्यं किं सत्यं कथ्यते न वा ॥४८॥
अनेन भारवाहेन ते तथेति त्वरान्विताः । गत्वाऽश्वत्थमथोपरि दृष्ट्वातुस्ने स्मितं मुहुः ॥४९॥
तदाश्चर्यञ्च ते दूताः प्रहसंन्तोऽतिवेगवन्तः । अश्वत्थमद्रितं सर्वं गत्वा सर्वं न्यवेदयन् ॥५०॥
तद्भूतवचनं श्रुत्वा राघवश्चातिविस्मितः । राज्ये ममैतद्दुश्चिह्नं मे शिक्षा ले मुप्तमुत्थम् ॥५१॥
इति निश्चित्य मनसि दूताँश्चाज्ञापयन्तदा । छिद्यतां चलपत्रः स ममाज्ञाभङ्गकारकः ॥५२॥
तद्रामवचनादेव शतशोऽथ सहस्रशः । कुठारपाणयः शीघ्रमप्रययु दुर्द्रुमन्तदा । ५३।
हास्यमानं नगं दृष्ट्वा ते सर्वेऽतीव विस्मिताः । कुठारैरनं तदा छेत्तुमुद्यता राघवाज्ञया ॥५४॥
ताञ्छेत्तुकामान् सकलान् ग्राव्नान् स्वनिकट विधिः । क्षित्वाऽमन्त्रान्त समापोरात्स्वेध्वनिनर्र्तैः । ५५॥
उपलैश्छिन्नभिन्नाङ्गास्ते दूता लोहिताङ्किताः । कोलाहलं प्रकुर्वन्ता रामं द्रुतं न्यवेदयन् ॥५६॥
ततोऽतिविस्मितो रामः पुनर्दूतान् सहस्रशः । प्रेषयामास तं छेत्तुं धनुर्बाणसिधारिणः ॥५७॥
तेऽपि गत्वा नगं तेन ताड़िता उपलैर्दृढम् । छिन्नाङ्गा राघवं वेगात्सर्वं वृत्तं न्यवेदयन् ॥५८।
ततो रामोऽतिमक्रुद्धः सुमंत्र सेनया युतम् । प्रेषयामास तं वृक्षं छेत्तुं बुद्धिपुरःसरम् ॥५९।

हँसी आ गयी ॥ ३९-४१ ॥ पश्चात्कि सी बात सुनकर गमन सिपाहीसे पूछा कि तुम क्यों हँसे ? उसने कहा कि एक लकड़हारेका हँसना देखकर मुझे हँसी आ गयी । दूतका बात सुनकर रामने दूतों द्वारा लकड़हारको पकड़वा मगाया और उससे कहा कि किस प्रकारका भय न करके मुझ यह बतलाओ कि तुम काम्राश्चर्य क्यों हंस थे ? ॥ ४२-४५॥ वह उस नामका बात सुनकर चौकन्ना हो गया । उसके कंठ, ओष्ठ और तालू सूख गये, थरथर कांपन लगा और भयभीत हुए स्वरसे उसन उत्तर दिया कि अयोध्याके समीप ही एक पीपलका वृक्ष है। मैने बाजार आते समय उस वृक्षकी हंसी सुना और हंस पड़ा। नगरमें आया तो यहाँ भी एकाएक वह बात याद आ गयी और चेष्टा करके भी मे हंसीको नहीं रोक सका । उसकी यह बात सुनकर मुसकराते हुए रामचन्द्रजीने दूतोंको आज्ञा दी कि तुम लोग इसके साथ जाकर देखो कि यह जो कह रहा है, वह ठीक है या नहीं ॥ ४५-४८॥ उस भारवाहकके साथ-साथ दूत चले, पीपलके समीप गये और उसकी हंसी सुनी तो स्वयं खूब हंसे और लौटकर उसका वहाँका सच्चा वृत्तांत सुना दिया ॥ ४६॥ ५० ॥ दूतों-की बात सुनकर राम बहुत विस्मित हुए और सोचने लगे कि हमारे राज्यम यह एक बड़ा दुश्चिह्न उत्पन्न होकर मेरे शासनको ही लुप्त कर देना चाहता है। इस प्रकार विचार करके रामने दूतोंको आज्ञा दी कि उस पीपलके वृक्षको काट डालो। क्योंकि यह मेरी आज्ञा भङ्ग कर रहा है ॥ ५१॥ ५२ ॥ रामके आज्ञानुसार सैकड़ों हजारो व्यक्ति कुठार ललेकर उस वृक्षकी ओर चल पड़े । उस समय भी उस वृक्षका हंसन देखकर वे सब उसे काटनेको उद्यत हो गये । उनको देखकर बहुत उस वृक्षपरसे ही पत्थरके टुकड़े फेंक फेंककर मारन लगे । इस अपकारसे कितनों ही लोगोंका गहरी चोट आयी । रुधिरसे उनका शरीर भीग गया और चिल्लाते हुए उन्होंने रामके पास पहुंचकर वहाँका हाल बतलाया । ५३-५६ ॥ सो सुनकर रामको और भी आश्चर्य हुआ और फिर हजारो दूतांका वह वृक्ष काटनेके लिए भेजा । धनुष बाण एवं तलवार धारण किये हुए वे दूत जब वृक्षके पास पहुंचे तो फिर प्रयागे पत्थर फेंक फेंककर मारा, जिससे भिन्नमस्तक हो उन सबने लौटकर रामको यह समाचार सुनाया। ५७ ॥ ५८ ॥ सब रामने कुपित होकर बहुत सी सेनाके साथ