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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ५] मनोहरकाण्डम् १९९

सर्गः ५] मनोहरकाण्डम् १९९

अन्यानि शेषभूतानि पदानि पूरयेद्धिया । यथेच्छं वै परिध्रित्य कुर्याद् वेदिमिता बहिः ॥ २५०॥
पञ्चविंशतिसंख्यैस्तैः प्रकारैर्द्वा मयोदितौ । अतिप्रियौ शङ्कराय शान्तयो द्विजसत्तम ! ॥२५१॥
नमस्कृत्य महद्वक्ष गुरुपादारविन्दयोः संसारात्मकं वक्ष्ये कथामध्यात्मसङ्ग्रहाम् ॥२५२॥
पञ्चविंशतिसंख्याक लिङ्गतोभद्रमीरितम् । केनांचित् कल्पितं तन्किं तन्च वक्तुमुच्यते स्फुटम् २५३॥
लिङ्गतोभद्रमित्येतस्मिकन्नपर्थेऽद्भवेत् । लिङ्गं गमकमिथ्याहुर्ज्ञानं ज्ञापकमित्यपि ॥२५४॥
पीयूषवापनाद्वार्वी भद्रं भद्रमभीप्सताम् । माध्यशब्दाः प्रसिद्धा हि वर्तन्ते साधनेष्वपि । २५५॥
तस्मिन् शुक्लमुखं नीलमित्यादिश्रुतिसम्मतात् । कूर्चा अपि परिभ्रम्यमाणार्थे भवन्ति हि ॥ २५६॥
सङ्कल परम् लिङ्गं मङ्गलं भद्रवाचकम् । मङ्गलं मङ्गलानां च शिवं शान्तमिति स्फुटम् ॥२५७॥
लीयते यत्र भूतानि निगच्छन्ति यतः पुनः । तेन लिङ्गं परं व्योम निष्कलः परमः शिवः ॥२५८॥
सत्त्वं रजस्तमोवर्णत्रय मायामु दीरितम् । मनश्चन्द्रो महामोहः शृङ्खला स्नेहवल्लिका ॥ ५९॥
तैरिदं सर्वतरङ्गैश्च वेष्टितं घटव्योमवत् । तिर्यगूर्ध्वमहङ्कारः प्रसूतः पञ्चतन्तुवन् । २६०॥
तेन स्थानानि जातानि लक्षाणां चतुरशीति । गुणास्तेषु प्रपूर्यन्ते यथा चित्रपटो भवेत् ॥२६१॥
आसीदेकं पुरा तत्त्वं तस्मिन्कामाविनियोगतः । कामो बहुधा भवति भवेयमिति सादरम् ॥२६२॥
एकः सन्निभि चान्यान् स्वयमकुरुतेति च । इन्द्रो मायाभिरिति च एकधा बहुधेति हि ॥२६३॥
ऊनूश्च श्रुतयः प्राप्यो ब्रह्मणो भवन प्रति । तज्जनानिति च श्रुत्या न ततोऽस्मि हि क्रिञ्चन ॥२६४॥
यद्यप्येदं तथाप्यस्मिन् स्थितिर्ब्रह्मणो भवेत् । यावदहंकृतो भादनावगम्यर आयतः ॥२६५॥
भिद्योऽहमिति हृद्ग्रन्थो न समस्तस्तदाशयः । रावेने जगद्यंनु याति स्वप्नो निद्रानुगो यथा । २६६॥

भावेंगे ॥ २४८ ॥ २४९ ॥ बाकी जितने कोष्ठ खाली बचें, उन्हें अपने इच्छानुसार रङ्ग दे। बाहरकी ओट स्वच्छ से चार परिघियां बनाये । २५०। ये दोनों प्रकार मैने पच्चीस शिवके बतलाये हैं। हे द्विजसत्तम ! ये दोनों यह शिवके गो परम प्रसन्न करनेवाले हैं ॥ २५१ ॥ अब मै अपने गुरुके महत्पदाश्रयम्प चरणकमलको प्रणाम करके संसारात्मक एक आध्यात्मिक कथा सुनाऊंगा । २५२। किसीने पञ्चविंशति लिङ्गतोभद्र- का रचना क्यों की ? अब उसका स्पष्ट तत्त्व बतलाता हूँ ॥ २५३ ॥ पहले 'लिङ्गतोभद्र' इस शब्दका अर्थ बताते हुए कहते हैं कि लिङ्ग गमक, ज्ञान अथवा ज्ञापक नामसे पुकारा जाता है। २५४ ॥ पीयूष (अमृत) का वपन करनेसे वाणीका वाणी 'भद्र नाम पड़ा है। भद्र यानी कल्याणका समीक्षण करनेसे 'भद्र' का भद्र नाम रक्खा गया है। प्रत्येक मन्त्रनाम उक्त साध्य शब्द बतलाये जाते हैं ॥ २५५ ॥ "तस्मिन् शुक्लमुखं नीलम्" आदि श्रुतियोंके कथनानुसार उपमन्त्रोंके विशेषणोंकी आवश्यकता पडती है ॥ २५६ ॥ वह परतत्त्व ही लिङ्ग एवं मङ्गलमय, वह भद्र शब्दसे अभिहित होता है। मङ्गलका भी मङ्गल करनेवाला शिव अर्थात् शान्त कहलाता है । २५७ ॥ प्रलयके समय जिसमें सब प्राणी लय हों और सृष्टिकालमें उसीमेसे निकल आयें उसीको 'लिङ्ग' कहते हैं। ऐसा कौन है ? वह परम व्योम, कलारहित तथा परम मङ्गलकारी शिव है ॥ २५८॥ सत्त्व, रज और तम ये तीन वर्ण मायाके जान्स वेष्टित है। इसमें मन चन्द्रमा, महामोह शृङ्खला और स्नेह वल्लिकायें हैं ॥ २५६। इन सबसे अन्तः इसी तरह वेष्टित है, जैसे व्योम (आकाश) से घट-पट आदि जगत्के पदार्थ वेष्टित रहते हैं। उनपर भी रङ्गके समान अहङ्कारने उसे चारो ओरसे घेर रक्खा है । २६०॥ इसीसे चौरासी लख योनियोंकी उत्पत्ति हुई है। उनमें गुणका उसी तरह समावेश हो जाता है, जैसे एक कपड़ेपर कई रङ्ग बना दिये जायें जिसमें उसका रङ्ग विचित्र प्रकारका हो जाय । २६१॥ सृष्टिके पहले केवल एक तत्त्व वाली वस्तु था। आगे चलकर उससे बहुत प्रकारकी कामनायें उत्पन्न हुई। तब उसे अकेले बहुतसे मायायोगोंसे अपने इच्छानुसार उस अकेले रूपसे बहुतर रूप बना लिये ॥ २६२। २६३ ॥ इसके अनन्तर श्रुतियोंने ब्रह्माकी उत्पत्तिके लिए 'तज्जनान्' इस भूमिसे उस ब्रह्माको प्रार्थना की तब ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई ॥ २६४॥ यद्यपि ये सब कार्य हुए हैं। तथापि मोहवश इसमें ब्रह्मकी स्थिति नहीं हो सकती। जबतक

६२०आनन्दरामायणे[सर्ग ५

एतदर्थं विरक्तः सन् जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् । आश्रयेत्सद्गुरुं प्राज्ञं सूक्ष्मद्रष्टारं निरामयम् ॥२६७॥
तेन प्रबोधितः सिद्धमात्मानं मन्यतात्मनि । जानीयाद्ब्रह्मभावेन जगत्स्वप्नं स्थितं सदा ॥२६८॥
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे संस्थितोऽमलः । एकोऽद्वितीयः परमो नान्तः प्रज्ञादिलक्षणः ॥२६९॥
अक्षरः सच्चिदानन्दोऽजरोऽमर उत्तमः । निर्विकारो निराकारो निरामय उदीरितः ॥२७०॥
अलिङ्गोऽरूप एवासावेकत्वान्गणनात्परः । मायया लिङ्गरूपीव स्नेह इत्यभिधीयते ॥२७१॥
पुरुषश्च प्रकृतिश्च व्यक्तोऽहंकार एव च । चतुर्लिङ्गानि प्रोक्तानि लक्षणानि शिवस्य च ॥२७२॥
कार्यकारणभूतानामेकमेव हि पञ्चकम् । सत्त्वं रजस्तम इति वसुलिङ्गानि चात्मनः ॥२७३॥
दशेन्द्रियाणि च मनो बुद्धिश्चाद्वादशकं स्मृतम् । लिङ्गानां परमेशस्य विवंचोऽत्र प्रतिष्ठितः ॥२७४॥
इति कारणलिङ्गानि कार्यलिङ्गानपनेकशः । शतं सहस्रमयुतं कोटिशः सति संख्यया ॥२७५॥
सर्वाणि ज्ञापकान्येव शिवस्य परमात्मनः । वस्तुतस्तु परं तत्त्वं सजातीयादिहीनकम् ॥२७६॥
विचारे वर्तमाने तु तन्त्वाद्येव पटादि न । एवं सर्वं शिवो भाति न सर्वं शिव एव हि ॥२७७॥
बिन्दुनादमकारादि मात्रत्रयमुदीरितम् । आत्मेव पञ्चधा साक्षान्नवा ब्रह्मेसरो हरिः ॥२७८॥
विधिर्दुद्रौ एव पञ्च सद्योजातादिरूपकः । शुद्धः साक्षी तथा प्राज्ञस्तैजसो विश्व एव च ॥२७९॥
सच्चित्सुखरूपं नामरूपे ब्रह्मव केवलम् । जातं पञ्चात्मकं नान्यद्ब्रह्मैवेदमिति श्रुतिः ॥२८०॥
प्रधानं महदहं च पञ्चतन्मात्रकं च तत् । अष्टप्रकृतिरित्युक्तंच्छास्त्रेषु परिगीयते ॥२८१॥

बर्हभाव है, तभीतक इस संसारका विस्तार है।२६४। "यह" इस दृष्टिसे भिन्न होते ही न संसार रहता है और न उसका आश्रय ही रह जाता है। तेजके विलीन होने पर जगत्का भी नाश हो जाता है। जैसे कि निद्राका नाश होनेके साथ ही स्वप्न भी नष्ट हो जाता है ॥२६५॥ इसलिये जिज्ञासुको चाहिए कि वह विरक्त साक्षात् ब्रह्मस्वरूप तथा दोष लोभाङ्गरहित किसी सद्गुरुका शरण ले ॥२६७॥ जब कि उनके उपदेशसे वह प्रबुद्ध हो जाय और अपने आत्मारूप ही सिद्ध हो जाय, तब अपने जगत्स्वरूप चित्तको ब्रह्मभावसे देखे ॥२६८॥ सब प्राणियोंके हृदयमें वह अमल ईश्वर निवास करता है। वह एक, अद्वितीय और सर्वश्रेष्ठ है। न उसका अन्त है और न प्रज्ञा आदि लक्षणोंसे ही वह जाना जा सकता है ॥२६९॥ वह अक्षर (कभी नष्ट न होनेवाला), सच्चिदानन्द, अजर, अमर और सबसे श्रेष्ठ विद्वान् है। इसीलिये यह निर्विकार, निराकार और निरामय कहलाता है ॥२७०॥ उसका न कोई रूप है, न लिङ्ग है। यह अकेला रहकर भी गणनासे परे है। वह अपनी मायाके साथ लिङ्गरूपसा दीखता है किन्तु वास्तवमें रहता है अकेला ही ॥२७१॥ पुरुष, प्रकृति, व्यक्त, अहंकार, ये चिह्न उस लिङ्गरूप ब्रह्माको पहचाननेके लिए बताए हैं ॥२७२॥ प्राणियोंके कार्य, कारण, सत्त्व, रज, तम इनको भी कुछ लोग आत्माका लक्षण बताते हैं ॥२७३॥ कुछ लोग दश इन्द्रिय तथा मन और बुद्धि, इन बारहको भी उसके चिह्न बतलाते हैं। इस प्रकार यहाँ उस परमेश्वरके लिङ्गोंका विचार किया गया है ॥२७४॥ ऊपर बतलाये हुए सब चिह्न कार्यके हैं। इनके अतिरिक्त कारणके भी बहुतसे लिङ्ग हैं। इन लिङ्गोंकी संख्या सैकड़ा, हजार, दस हजार एवं करोड़ों पर्यंत है ॥२७५॥ उस मङ्गलमय परमात्माकी तो संसारकी समस्त वस्तुएँ ही ज्ञापक हैं। लेकिन वास्तवमें बड़ा सर्वप्रधान तत्त्व है और उसका कोई सजातीय और विजातीय नहीं है ॥२७६॥ अच्छी तरह विचार हो जानेपर यही निश्चित होता है कि वह केवल तन्तु ही है, पट आदि नहीं ॥२७७॥ जिस तरह बिन्दु-नादसे वह अकारादि मात्रत्रया-त्मक कहा जाता है। उसी तरह वह ब्रह्मा, ईश्वर या हरि अकेला रहता हुआ भी पाँच प्रकारका है ॥२७८॥ सद्योजातादि रूपोंद्वारा विधि (ब्रह्मा) और शिव भी पाँच ही पाँच प्रकारका है। वह स्वयं शुद्ध, साक्षी, प्राज्ञ, तैजस तथा विश्वरूप है ॥२७९॥ नाम और रूपके भेदसे वह सत्, चित् तथा आनन्द तीन प्रकारका है। किन्तु वह अकेला ही है। 'ब्रह्मैवेदम' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है कि वह अकेला ब्रह्म ही पाँच प्रकारका हुआ था ॥२८०॥ प्रधान, महत्, अहङ्कार, पांच तन्मात्रायें और

सर्गः ५] मनोहरकाण्डम् ५२१

अष्टमूर्त्तिस्वरूपं सद्भुवनादिनामभृत्। स्वस्वरूपस्वरूपेण मायया भाति सर्वतः। २८१॥
ज्योतिर्लिङ्गद्विषट्कं च द्वादशादित्यनामकम्। दशेंद्रियमनोबुद्धिनामभिर्भाति सन् स्फुटम् ॥२८२॥
दशेंद्रियाणि च प्राणपञ्चकं भोग्यपंचकम्। क्षेत्रज्ञतुच्छमात्मैव पंचविंशमतो बुधः ॥२८४॥
लक्षणां चतुरशीति भोगायतनविस्तरः। तस्यैव कल्प्यते भ्रान्त्या कर्मनिर्गुणभेदतः ॥२८५॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिं च भोगस्थानानि चात्मनः। भोगो भोक्ता भोजयिता सर्वं ब्रह्मैव न पृथक् ॥२८६॥
अध्यात्ममधिदैवं च अधिभूतमिति त्रिधा। स्थूलं सूक्ष्मं कारणं च सर्वं ब्रह्मैव न पृथक् ॥२८७॥
एतज्ज्ञानं च ध्यानं च त्रिवेकश्च विरागिता। जीवेश्वरजगद्ज्ञानमात्मैवेति न तु पृथक् ॥२८८॥
सर्वं खल्विदमिति चेदं सर्वं यदयमात्मता। ब्रह्मैवेदं सर्वमिति श्रुतयः प्रवदंति हि ॥२८९॥
अयं सिद्धस्य विषयो यन्मर्त्यान्मनि दर्शनम्। आरुरुक्षुः शांतशमन्वितस्तुः सर्वतो भवेत् ॥२९०॥
स्वदेशे प्राप्तपुरुषं निवघ्नंति वशीकृतम्। तैनामो विषयाः प्रोक्ता मुमुक्षुस्तांश्च विवर्जयेत् ॥२९१॥
विविक्तसेवी लघ्वाशीत्यादि आहत वचः। किं बहुकेन विधिना समाप्त शास्त्रहृद्गतम्। २९२॥
दत्तं मे गुरुणा किमप्यजडमानन्दामृतमव्यय
यत्संब्वात् इदं वदाम्यरुमहं न्यंचाशु नष्टं तमः।
आपूर्णं सहसोदितं मह ऋत गभीरमव्याहृतं
येनाच्छादितमिन्दुसूर्यपवन विध विशेषात्मकम् ॥२९३॥
तिर्यगूर्ध्वगता रेखाश्चत्वारिंशत्समाः शुभाः। तासामेकांक्रकोष्ठेषु परिधीं द्वौ प्रकल्पयेत् ॥२९४॥
समाप्ते प्रथमाभ्यास्तु ततो वाणांतकोष्ठके, तन्मध्यं रुद्ररुद्रषु पदष्वष्टादशः पदः ॥२९५॥

आठ प्रकृतियों ये शास्त्रोंने बतलायी गयीं हैं। २८१॥ उन आठों मूर्त्तिका स्वरूप सद्भूवन आदि नामों से विख्यात है और मायावश ये आठ वानुश्रुक नामस भी श्रामिहत हान है ॥ २८२॥ आठ ज्योतिर्लिंग, द्वादश आदित्य, दस इन्द्रियां, मन और बुद्धि इन नामोंसे भी वह विभुम स्पष्ट दिखायी देता है। २८३॥ दस इन्द्रियाँ, पाँच प्राणवायु, भोग्यपंचक और चार प्रकारका चित्त यह सब मिलकर वह पच्चीस प्रकारका माना गया है ॥२८४॥ चौरासी लाख योनियां ही उसके भोगरूपी घरका विस्तार है। भ्रान्तिवश या गुण-कर्मके भेदसे उसमें इन सबका कल्पना की जाती है॥ २८५॥ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति ये आत्माके भोगस्थान हैं। भोग, भोक्ता, भोज्य ये सब वह ब्रह्म ही है और कोई नहीं॥ २८६॥ अध्यात्म, अधिदेव, अधिभूत, स्थूल और सूक्ष्मका कारण एकमात्र ब्रह्म ही है॥२८७॥ यह ज्ञान, ध्यान, विवेक, विरागिता, जीव, ईश्वर, जगत्का भान यह सब वह आत्मा ही है और कोई नहीं ॥ २८८॥ "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" "यदयमात्मा' 'ब्रह्मैवेदम्' ये श्रुतियाँ भी इसी बातकी पुष्टि करती हैं॥ २८९॥ संसारके सब वस्तुओक अपनी आत्मामे देखना, यह विषय सिद्धपुरुषाका है। जो प्राणी सिद्धिके शिखरपर चढ़ना चाहता हो। उसे चाहिये कि वह शान्त, दान्त (इन्द्रियोंका दमन करनेवाला) और तितिक्षु बने ॥ २९०॥ अपने देशमे आये हुए पुरुषको ये सांसारिक विषय बाँध लेते हैं। इसीसे इन्हें लोग विषय (विशेषेण विन्वन्तं तिविषयाः। अर्थात् भली-भाँति पकड़ लेनेवाल) कहते हैं। मुमुक्षु प्राणीको चाहिए कि इनका परित्याग कर दे । २९१ । "एकान्त स्थानमे रहे, थोड़ा खाय" इत्यादि बात भगवानने गीतामें स्वयं कही है। यहाँ विशेष विधि विधान बतलानेकी आवश्यकता नहीं है। हृदयमे ज्ञानका प्रकाश होते ही सारे शास्त्र समाप्त हो जाते हैं॥ २९२॥ यदि किसी सद्गुरुने कृपा करके जड़तारहित आनन्दामृतक ज्ञानरूप वस्तु दे दी हो 'वह' 'हृणं सब एक हैं। यह भाव उत्पन्न होनेसे हृदयका अज्ञानान्धकार नष्ट हो गया। एक अनिर्वचनीय प्रकाश और चन्द्रमा-सूर्य तथा पवनपर भी आधिपत्य जमानेवाली गतिसे सहसा यह विश्व आलोकित हो उठा, तब और किसी उपदेशकी आवश्यकता ही क्या है? ॥२९३॥ सीधी और टेढ़ी चालीस रेखायें बराबर-बराबर खींचे। उनके उनतालीस कोष्ठकोंमें दो परिधियें बना दे॥ २९४॥ इस

६२२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

लिंगमेकं खंडवाप्यौ तुर्यतुर्यपदामिके । अष्टकोष्ठात्मकं भद्रं प्रोक्तं पश्चाच्चतुष्टये । २९६ ।
शृङ्खला द्विपदा चन्द्र स्त्रिपदा वल्लरी तथा । पञ्चाशः स्मृता वल्ल्यो त्रिपञ्चेषु नियोजयेत् । २९७ ।
द्वितीये त्रिपदश्चन्द्रः शृङ्खला वेदपादिका । वल्ली नवपदा भद्रत्रयं नवपदात्मकम् ॥ २९८ ॥
अष्टादशपदं वाप्योद्वयं पार्श्वे तु शृङ्खले द्विपदे रक्तवर्णे च भद्रं तुर्यपदं हरित् । २९९ ।
प्रतिपार्श्व भवेदेतत्प्रथमायःसु योजयेत् । प्रतिपार्श्वे चतुर्लिंगं वापोनां पञ्चकं तथा । ३००॥
अष्टादशपदं लिंगं वापी त्रयोदशात्मिका । भद्रं ग्यष्टैर्द्वयं वल्ली रुद्रपदामिका । ३०१॥
शृङ्खला पञ्चभिः पादैःखपदश्चंद्र ईरितः । लिंगोपस्थिता वीथी नीलवल्ल्या नियोजयेत् । ३०२॥
यद्वा रमते परिधि विधाय तदनन्तरम् । त्रिलिंगमेक लिंगं यद्दयोः पक्त्योः प्रकारयेत् । ३०३॥
आदौ चन्द्रकलं भद्र षट्कर्मपदैः स्मृतम् । शृङ्खलापञ्चभिर्वल्ली रुद्रकोष्ठा समीरिता ॥३०४॥
वापीचतुष्टय पूर्व पर वार्णद्वयं स्मृतम् । पूर्ववत्सकलं शेष बाह्याः परिधयः क्रमात् ॥३०५॥
पीतशुक्लरक्तकृष्णा ज्ञेयाः सङ्ख्याधिका शुभाः । एतन्मर्पेन्द्र लिंगाख्यं पीठं सम्यगुदाहृतम् । ३०६ ।
अथवाऽस्मिंस्त्रिकोष्ठानि वर्धयित्वा क्रमेण तु । पञ्चाते परिधी कार्या तत्रलिंगानि योजयेत् । ३०७॥
प्रथमे त्रीणि लिंगानि द्वितीये चैकमादितम् । चतुर्विशंत्पदैर्लिंग वाप्यष्टादशपादजा । ३०८॥
आदौ वेदमिला वाप्यो द्वे वाप्यो च द्वितीयके । आदौ नवपदं भद्र द्वितीयेऽर्कपदं स्मृतम् । ३०९॥
चंद्रवल्ल्यादिपूर्वोक्तं मध्ये लिंगं प्रकारयेत् । अष्टाविंशतिभिः पादैः शिरः कटिः ॥३१०।
अर्कअर्कपदं खंडवाप्यौ द्विपदशृङ्खलाः । पञ्चपादा स्मृता वल्ली त्रिपदा पीतशृङ्खला । ३११॥
अर्कपदेचतुर्दिक्षु मध्ये भद्रचतुष्टयम् । चतस्र त्रिपदः कोणे शिवमस्तक शशंके ॥३१२॥

कोष्ठकोंके बाद पहली परिधि बनाकर बाकी परिधियां पांच पांच कोष्ठकोंके बाद बनावे। उनके बीचमें एक सौ छब्बीस पादोंमेंसे अट्ठारह-अट्ठारह पादका एक एक लिंग बनावे। फिर चार-चार पदकी दो खण्डवापियां बनावे। इसके बाद बगल अष्टकोष्ठात्मक भद्र बनावे ॥ २९६ । २९७ । इसके बाद दो पादकी शृङ्खला एकसे चन्द्रमा और तीन पादकी वल्लरी बनाकर इसके तीन बगलमें पाँच-पाँच पादकी वल्लरियां बनावे ॥ २९७ ॥ दूसरी परिधिमें तीन पादका चन्द्रमा, चार पादकी शृङ्खला, नौ पादकी वल्लरी, नौ-नौ पादके तीन भद्र, तरह पादकी दो वापियें, बंगलमे दो लाल शृङ्खलायें और चार पादमे हरे भद्रकी रचना करे । २९८ ॥ २९९ । यह क्रम प्रत्येक पार्श्वभागमें रहेगा प्रत्येक पार्श्वभागमें चार लिंग होंगे तथा, अट्ठारह पादका लिंग, तेरह पादकी वापी, छै पादका भद्र, बारह पादकी वल्ली, फिर पाँच पादकी वल्लरी और तीन पादका चन्द्रमा बनेगा। लिंगके ऊपरकी वीथी नीली रहेगी और उसके साथ-साथ वल्लरी भी नीली रहेगी ॥ ३०० ॥ ३०१ ॥ ३०२ । अथवा छः कोष्ठकन द्वार परिधि बनाकर तीन लिंग या एक लिंग दोनों पंक्तियोंमे बनावे ॥ ३०३ । पहले सोलह पदका भद्र बनाकर पन्द्रह पादोंकी शृङ्खला और बारह कोष्ठकोंमेंसे पाँच पादकी वल्ली बनावे ॥ ३०४ ॥ पहले चार वापी और फिर द वापियोंकी रचना करे । बाकी सब पूर्ववत् रहेंगे और बाहरकी परिधियां क्रमश पीली, सफेद, लाल और काली रहेगा। यह सप्तन्दुलिंगात्मक पीठ मैने अच्छी तरह बतलाया । ३०५ ॥ ३०६ । अथवा इसी पीठमें दो कोष्ठक और बढ़ाकर छः के बाद दो परिधि बनावे और इस प्रकार लिंगोंकी योजना करे । ३०७ । प्रथम पंक्तिम तीन और दूसरीमें एक लिंग बनावे । इसी पीठमें चौबीस पादका लिंग बनेगा और अट्ठारह पादकी वापी बनेगी । ३०८ ॥ आदिये चार वापियें और दूसरेमे दो वापी रहेगी। आदिम नो पादका भद्र बनेगा और दूसरेमे बारह पादका भद्र बनेगा । चन्द्रमा तथा वल्लरी आदि पूर्वोक्त नियमके अनुसार ही रहेंगे और मध्यमें लिंगकी रचना की जायगी। उसमे अट्ठाइस पाद रहेंगे और चार पादमे शिर तथा कमरकी रचना होगी बारह-बारह पादसे दो खण्डवापियां बनायी जायेगी । दो पादकी शृङ्खलायें बनेंगी । पाँच पादकी वल्ली बनायी जायगी तीन पादसे पीतवर्णकी शृङ्खला बनेगी ॥ ३०९ ॥ ३१० ॥ ३११ । बारह पादसे चारों ओरको शृङ्खला बनेगी।

[सर्गः ६] मनोहराख्यम् ६२३

नेत्रार्थे द्वे परे शुक्ले शेषानि च पदानि हि । लिङ्गार्थं पञ्च पञ्च चथैवं तानि पूरयेत् ॥३१३॥
पीतशुक्लरक्तकृष्णा बहिःपरिधयो मताः । एतन्मण्डललिङ्गैर्लिङ्गतोभद्रमीरितम् ॥३१४॥
दशकं कारणानां च प्राणानां पञ्चकं मनः । षोडशैताः कला आत्मा साक्षी सप्तदशः स्मृतः ॥३१५॥
अरुर्लिङ्गात्मकं भद्रं शृणु शिष्य मयोच्यते । प्रागुदीच्या गता रेखाः षट्त्रिंशद्भिः प्रकल्पयेत् ३१६॥
पदानि द्वादशशतं पञ्चविंशतिरेव च। सर्वैस्तुखिपदैः कोणे शृङ्गता षट्पदात्मिका ॥३१७॥
त्रयोदशपदा वल्ली भद्रं तु नवभिः पदैः । भद्रोर्ध्वं त्रिपदा शेपा द्वितीया पीतश्रृङ्खला ॥३१८॥
त्रयोदशपदा वापौ लिङ्गमष्टादशैः स्मृतम् । लिंग नियम्य पक्तौ तु शोभा कोष्ठं चतुर्वश ॥३१९॥
तैराशुपरि पक्तौ तु कोष्ठाः सप्तदशैव तु । पूजापंक्तिः सिता ज्ञेया परितः परिकल्पिता ॥३२०॥
पूजापक्त्यंतरापक्षौ कोष्ठा अष्टादिसंख्यया । परिधिः स च विज्ञेयो मंडलीवरपोर्द्वयोः ॥३२१।
परिव्यंतरकोष्ठेषु सर्वतोभद्रमालिखेत् । विशेषञ्चात्र कहेरो शृङ्खला षट्पदा भवेत् ॥३२२॥
त्रयोदशपदा बल्ली भद्रं तु द्वादशैः पदैः । पञ्चविंशत्पदा वापौ परिधिः षोडशात्मकः ॥३२३॥
मध्ये नवपदैः पद्मं कर्णिकाकेसरान्वितम् । सत्वं रजस्तमोवर्याः परितो मण्डलस्य च ॥३२४॥
अपः परिधयः कार्यास्तत्र द्वाराणि कारयेत् । शितेंदुः शृङ्खला कृष्णा वल्ली नीला वपुःपदम् ॥३२५॥
भद्रं रक्तं श्रुङ्खलाऽन्या पीता वापी सिता स्मृता । लिंगानि कृष्णवर्यानि पार्श्वद् द्वारमेव तु ॥३२६॥
परिधिः पीतवर्णः स्यात्कमलं पञ्चवर्णकम् । कर्णिका च केसराणि पीतवर्णानि कारयेत् ॥३२७॥
प्रकारांतरमन्यच्च शृणु शिष्य मयोच्यते । पूर्वोत्तरगता रेखा मप्तविंशन्मिताः शुभाः ॥३२८॥
तच्छट्त्रिंशत्पदैष्वेव सर्वतोभद्रमुत्तमम् । अग्निवेनेत्र त्रिकै र्दृथं रवनेत्रुपरंचलुधम् ॥३२९॥

मध्यमें चार भद्र बनेंगे । कोणमे तीन पादका चन्द्रमा बनेगा। लिङ्गके मण्डलके बाम नेत्रके लिए दो पद सादा ही छोड़ दे । जितने पाद हैं, उनमेंसे लिङ्गके आसन्तसबाले पञ्च-पांच पदोंको अपन इच्छानुसार पूर्ण करे । ३१२ ॥ ३१३ ॥ बाहरकी सब परिधियां पीत, शुक्ल, रक्त तथा कृष्ण वर्णकी होंगी । यह शप्तरणलिङ्गात्मक भद्रको रचनाका प्रकार बतलाया गया ॥ ३१४ ॥ दस इन्द्रियोकी, पांच प्राणोको, एक मनकी ये सोलह कलायें होती हैं और सत्रहवां आत्मा साक्षी माना जाता है । ३१५ ॥ हे शिष्य ! अब मैं द्वादशलिङ्गात्मक लिङ्गतोभद्रको रचनाका प्रकार बतलाता हूं, सुनो। पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर-दक्षिणकी ओर छत्तीस-छत्तीस रेखायें खींचे ॥ ३१६ ॥ इससे कुल बारह सौ पच्चीस पाड होंगे । तीन पादसे खण्डेन्दु बनेगा और कोणकी ओर छः पादकी शृङ्खला रहेगी । ३१७॥ तरह पादकी दी वल्लरी, नौ पादका भद्र, भद्रके ऊपर तीन पादकी पीली शृङ्खला, तेरह पादकी वापी और अठारह पादका लिंग बनाकर पंक्तिमें कोष्ठ काष्ठक शोभाके लिये रहने दें । उसके ऊपरवाला पंक्तिमें सत्रह काष्ठक रहेंगे और चारों ओरसे सफेद रङ्गका एक पूजापंक्ति रहेगी ॥ ३१८-३२० ॥ पूजापंक्तिकी भितरवाला पंक्तिमें अठारह काष्ठक रहेंगे। वे उन दम्पतियोंके बीचमें पण्डिका काम देगें । ३२१। परिधिके भीतरवालि कोष्ठकोंमें सर्वतोभद्रकी रचना करे । इस भद्रमे जो विशेषता है, उसे समझ लो । इसकी शृङ्खला छः पादका रहेगी । ३२२ ॥ तेरह पादकी बल्लरी बनेगी । बारह पादका भद्र रहेगा । पच्चीस पादका बापी रहेगी और सोलह पादका परिधि बनेगी ॥ ३२३ । बीचमे नौ पादका एक कमल बनेगा, जिसमें कर्णिका तथा केसर आदि भार रहेंगे। पद्मके चारों ओर सत्व, रज, तम इन तीनों गुणकी रचना करनी होगी ॥ ३२४ ॥ इसमें तीन परिधियां रहेंगी और कई द्वार भी रहेंगे। इसमें उज्ज्वल चन्द्रमा, काली शृङ्खला, नील बल्लरी और लाल भद्र रहेगा। दूसरी शृङ्खला पीत वर्णकी और बापी सफेद रहेगी। आस-पास कृष्ण वर्णके बारह लिंग बनेंगे ॥ ३२५ ॥ ३२६ ॥ परिधि पीले रङ्गकी और कमल पांच रङ्गका बनेगा । उसकी कर्णिका तथा केसर पीतवर्णका रहेगा ॥ ३२७॥ हे शिष्य ! अब मैं इसका एक दूसरा प्रकार बतला रहा हूं। पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर-दक्षिण दोनों ओर सत्ताईस-सत्ताईस रेखायें खींचे ॥ ३२८ ॥ इसके छत्तीस पादोंसे सर्वतोभद्र तथा ३२४ पादसे अन्य वस्तुओंकी रचना करे

६२२ आनन्दरामायणे [ सर्ग ५

परिधित्रन्समेताश्च प्रकल्प्याः पीतवर्णकाः । अष्टोत्तरशतैर्लिङ्गतोभद्रं कथितं यथा ॥३३०॥
तस्य चतुर्षु पार्श्वेषु रचयेदर्कलिङ्गकम् । कोणे कोणे त्रिपदोऽब्जं शृङ्खला सप्तपादिका ॥३३१॥
वल्लीमनुपदा भद्रं षट्पदं श्रीदृशामिका । लिङ्गं षड्विंशपदकं भद्रं स्याद्गर्भकोपरि ॥३३२॥
लिख्यात्षट्पदान्येव षट् पीतानि प्रकल्पयेत् । लिङ्गोपरितना वीथी नीला रन्ध्रोनियोजयेत् ३३३॥
चतुष्पदैर्लिङ्गमस्तकस्था परिधयो बहिः । सर्वाणि तु यथापूर्वमुक्तवर्णैः सुरञ्जयेत् ॥३३४॥
चतुर्विंशतिरालेख्या रेखाः प्राग्दक्षिहायताः । कोणेषु शृङ्खला पंचपदा वल्ल्यश्च पार्श्वतः ॥३३५॥
षट्नवभिर्गलैरूवाथतन्निर्गलुषुशृङ्खलाः । लघुवल्ल्यः पदां षड्भिस्ततोष्टादशभिः पदैः ॥३३६॥
कुर्याल्लिङ्गानि बाह्यान्तु त्रयोदशभिरन्तरम् । ततो दीर्घीद्वयेनैव पीठं कुर्याद्विचक्षणः ॥३३७॥
तस्य पादाः पंचदश द्वारमप्यपि तथैव च । एकाशीतिपदं मध्ये पद्मं स्वस्तिकमिष्यते ॥३३८॥
कोणेषु शृङ्खलाः कार्याः पदैस्त्रिभिरतः परम् । पदैश्चतुर्भिर्दिक्षु स्युर्भद्राण्येषां समंततः ॥३३९॥
एकादशपदे वल्ल्यौ मध्येऽष्टदलमालिखेत् । पद्मं नवपदं ज्ञेयँलिङ्गतोभद्रमिष्यते ॥३४०॥
शृङ्खला कृष्णवर्णेन वल्ली नीलेन पूरयेत् । रक्तेन शृङ्खला लघ्वी वल्ली पीतेन पूरयेत् ॥३४१॥
लिङ्गानि कृष्णवर्णानि श्वेतेनाप्यथ द्वारिका पीठं स्वपादं श्वेतेन पीतेन द्वारपूरणम् ॥३४२॥
मध्ये स्युः शृङ्खला रक्ता वल्लीनीलेन पूरयेत् । भद्राणि पीतवर्णानि वीना पंकजकर्णिका ॥३४३॥
दलानि श्वेतवर्णानि यद्वा चित्राणि कल्पयेत् त्रिशो रेखा बहिः कार्याः सितरक्तासिताः क्रमात् ॥३४४॥
ऊर्ध्वलिङ्गोद्भवं बहल्लिङ्गतोभद्रमुच्यते । अन्यन्मयातिरम्यं शृणुष्व नृपमात्र कौतुकात् ३४५॥
अष्टाविंशतिरेखाश्च निर्यगूर्ध्वं समंततः । सप्तविंशतिकोष्ठेषु पदन्ते परिधयः स्मृताः ॥३४६॥
कोणेषु त्रिपदश्चन्द्रः शृङ्खला पञ्चपादिका । वाष्यर्कपादजा भद्रषट्कं षट्षट्पदाल्यकम् ॥३४७॥

॥ ३२९ ॥ उसके आगे चार पीतवर्णकः परिधि बनावे। पहले जो मैंने अष्टोत्तरशतात्मक लिङ्गतोभद्र बतलाया
है, उसके चारों बग़ल द्वादश लिङ्गकी रचना करे। प्रत्येक कायमें तीन पादका कमल बनाकर सात
पादकी शृंखला बनावे ॥ ३३० ॥ ३३१ ॥ फिर चौदह पादकी वल्ली, छ पादका भद्र, तीन तीन पादका चन्द्रमा
और वापी तथा छब्बीस पादका लिङ्ग वर्णिकाके ऊपर बनाया जायगा । ३३२ । लिङ्गके अगलवाले छः पाद पीले
रङ्गसे रङ्ग दिये जावें। लिङ्गके ऊपरवाली शृङ्खला नीले अन्तरियाके वोचम नियुक्त कर दे । ३३३ ॥ चौदह
पादसे लिंग, मस्तक तथा परिधियाँ बनावे बाकी सब रंगा ऊपर कह आये हैं उसके अनुसार ही रङ्गने के
॥ ३३४ ॥ पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर-दक्षिणकी ओर चौबीस चौबीस रेखाएं खींचे। कोणमें पांच पादकी
शृंखला तथा नौ पादोंकी वल्लियाँ बनावे। चार पादको छोटी शृङ्खला बनावे। छः पादकी लघु वल्लरी
बनावे। अठारह पादोंके लिङ्ग एवं तेरह पादकी वापियाँ बनावे, फिर दो वीथियोंसे पीठकी रचना करे
॥ ३३५-३३७॥ उस पीठका पैर पाँच पादमं तथा द्वार पाँच पादसे बनाकर मध्यमें इक्यासी पादका कमल बनेगा
॥ ३३८ ॥ तीन-तीन पादोंसे कोनोंम शृङ्खलायें बनावे चारों दिशाओ़म चार-चार पादके भद्र बनेंगे ॥ ३३९ ॥
ग्यारह पादकी दो वल्लरियां बनावे । नौ पादसे मध्यम अष्टदल कमलकी रचना करे। यह भी एक प्रकारका
लिङ्गतोभद्र है । ३४० ॥ इसमें की शृङ्खला कृष्ण वर्ण और दूसरी नील रङ्गसे पूर्णकी जायगी। रक्त वर्णसे
लघु शृङ्खला एवं पीत वर्णसे शेष वल्लरीकी पूर्ति की जायगी ॥ ३४१ ॥ इसक लिङ्ग कृष्ण वर्णके और वहरी सफेद
रङ्गकी रहेगी। इसकी पीठ और इसके पाद भी श्वेत रङ्गसे और पीत वर्णसे इसके द्वार रंगे जायेंगे ॥ ३४२ ॥
मध्यमें रक्त वर्णकी शृंखला और नील वर्णसे वल्लरी पूर्ण की जायगी। सब भद्र पीतवर्णके रहेंगे और कमलकी
कर्णिका भी पीले रङ्गकी रहेगी । ३४३ ॥ कमलके दलोंको सफेद या चित्र वर्णसे पूर्ण करे। बाहर तीन
रेखायें रहेगी और क्रमशः उनका वर्ण उज्ज्वल, रक्त तथा कृष्ण रहेगा । ३४४ ॥ अब हम ऊर्ध्वलिंगारणक
बहल्लिङ्गतोभद्रकी रचनाका दूसरा प्रकार बतलाते हैं, उसे मन लगाकर सुनो ॥ ३४५ ॥ सीधी और तिरछी
अट्ठाईस-अट्ठाईस रेखाएं खींचे। सत्ताईस कोष्ठक पर्यन्त छः छः काष्ठकके बाद परिधिदी रहेगी ॥ ३४६ ॥ कोणमें