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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १० ] रामाश्वमेधम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४९

सर्गः १० ] रामाश्वमेधम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४९

तद्वाक्यवचनं श्रुत्वा तदोलूकोऽब्रवीत् प्रभुम् । मया पूर्वं कृतं राम नगोपरि गृहं वने ॥ १२५॥
तत्कालेन मया त्यक्तं तत्र गृध्रोऽस्ति संस्थितः । नानेन दीयते मद्य मम गेहं रघूत्तम ॥१२६॥
तदुलूकवचः श्रुत्वा गृध्रमाह रघूद्वहः । किमर्थं दीयते नास्य त्वया गृध्र गृहं वद ॥१२७॥
तदा गृध्रोऽब्रवीद्वाक्यं राघवं दीर्घनिःश्वसन् । मया पूर्वं कृतं राम नगोपरि गृहं वने ॥१२८॥
तत्कालेन मया त्यक्तं तदोलूकः कियद्दिनम् । स्थितस्तेनापि त्यक्तन्तं तत्राहं संस्थितः पुनः ॥१२९॥
वृथायं स्पर्द्धते राम मन्वा गेहं ममेति च । मध्यमं कुरु राजेन्द्र त्वद्वंशेऽभून्न पातकी ॥१३०॥
तावुवाच रघुश्रेष्ठो युष्मभ्यो हि यदा गृहम् । कृतं नद्याश्च कः साक्षी तदा तौ नेति वोचतुः ॥१३१॥
विमानस्थांस्तदा सर्वान्प्रापवः प्राह सस्मितः । इदमप्यत्र सम्प्राप्तं दुर्घटं मां पुरःस्थितम् ॥१३२॥
कथं न्यायोऽत्र वै कार्यः कस्मै गेहं प्रदीयताम् । तद्रामवचनं श्रुत्वाऽप्यन्येऽप्यतिविस्मिताः ॥१३३॥
तदोलूकं विभुः प्राह कृतं गेहं त्वया कदा । उलूकः प्राह भूश्चैव यदा जाता तदा कृतम् ॥१३४॥
तदुलूकवचः श्रुत्वा गृध्रं समवलोकयत् । गृध्रः प्राह यदा चेयं महानीरेऽवनिस्तदा । १३५॥
भूतधात्रे कृतं विद्धि पुरं गेहं मया विभो । तद्गृध्रवचनं श्रुत्वा तदा तं प्राह राघवः ॥१३६॥
कथं विनाऽऽश्रयेणासीन्महानीरे नगन्ददा । नौकाऽक्षयवटः सोऽपि वृक्षाक्षम्भवता स्मृतः ॥१३७॥
तस्माद्मृषा त्वया गृध्र स्पर्धतेऽनेन निश्चितम् ।
वृथाऽयं तत्र वाक्येन धिक् त्वां दुष्टपत्रीणम् ॥१३८॥
इत्युक्त्वा राघवो दूतैस्तं गृध्रं पर्वतोपरि । त्रिशूलाग्रेषु चारोप्य प्रपन्नाम स्वं पदम् ॥१३९।
धन्यः स गृध्रो विज्ञेयो रामाग्रे यस्य वै मृतिः । अभूद्दर्शनमप्या यस्य देहविसर्जने ॥१४०॥

कहा कि तुम लोग क्यों लड़ रहे हो ? मुझे विस्तारपूर्वक कारण बतलाओ ॥ १२१-१२४ ॥ रामकी बात सुनकर उलूकने कहा कि मैने एक वृक्षपर रहनेके लिए एक घोंसला बनाया था। कालवश उसी समय उसे छोड़कर मुझे स्थानान्तरको चला जाना पड़ा और यह गृध्र उसमें रहने लगा। अब मेरे मागनेपर यह मुझे मेरा घोंसला नहीं दे रहा है। इस प्रकार उलूककी बात मानकर रामने गृध्रसे कहा कि तुम इसका घोंसला इसे क्यों नहीं देते ? गृध्रने तड़पकर कहा- हे राम ! बहुत दिन हुए वृक्षपर यह घोंसला बनाया था। कुछ दिनोंके लिए मैं बाहर चला गया तो यह उलूक उसमें रहने लगा। फिर वह जब उसे छोड़कर कहीं चला गया तो मैं आकर अपने घरमें रहने लगा। यह व्यर्थ हमसे लड़ाई कर रहा है। हे राम ! इसको बातोंमें आकर कहीं आप अधर्म न कीजियेगा। क्योंकि आपके वंशमें कभी कोई पातकी नहीं हुआ है ॥ १२५-१३० ॥ उन दोनोंसे रामने कहा कि तुमने उस घोंसलेको बनाया था, इसका कोई साक्षी दे सकते हो ? इस प्रकारके प्रश्न होनेपर वे दोनों चुप हो गये। क्योंकि उन दोनोंके पास कोई गवाह नहीं था। ऐसी दशामे मुसकराते हुए रामने विमानपर बैठे हुए लोगोंसे कहा कि यह विकट समस्या आगे आ गयी है। इस झगड़ेका कैसे न्याय हो ? किसको वह घोंसला दिया जाय ? इस तरह रामकी बात सुनकर सब लोग भौंचक्के रह गये। किसीको कोई युक्ति नहीं सूझी ॥ १३१-१३३ ॥ फिर रामने उलूकसे कहा कि तुमने कब अपना घोंसला बनाया था। उसने उत्तर दिया कि मैने अपना निवासस्थान उस समय बनाया था, जब इस पृथ्वीकी रचना हुई थी। इस प्रकार उलूककी बात सुनकर रामने गृध्रकी ओर देखा। गृध्रने उत्तर दिया कि मैंने उस घोंसलेको आम्रके वृक्षपर उसी समय बना लिया था, जब पृथ्वी जलमग्न थी- उसका उद्धार ही नहीं हुआ था। गृध्रसे रामने कहा कि जब पृथ्वीकी उत्पत्ति ही नहीं हुई थी, तब वह आम्रका वृक्ष जिसके सहारे खड़ा था, वृक्षोम तुमने अक्षयवट भी नहीं बताया जो किसी तरह रह भी जाता है। इसलिए मालूम पड़ता है कि तुम्हारी बात झूठ है। तुम उलूकको व्यर्थ सता रहे हो। तुम जैसे दुष्ट पक्षीको धिक्कार है ॥ १३४-१३८ ॥ इतना कहकर रामने दूतों द्वारा गृध्रको शूल पर चढ़ाकर उसे अपना परम पद दे दिया। वह गृध्र धन्य था, जिसकी मृत्यु रामके सम्मुख हुई और रामका दर्शन करते हुए उसने अपने प्राणोंका परित्याग किया। इस प्रकार उसे

५५०आनन्दरामायणे[ सर्गः १०

दत्त्वा गेहमुल्लूकाय ययौ रामो निजां पुरीम् । विवेश नगरीं नृत्यवाद्यगीतपुरःसरम् ॥१४१॥
शिशुं विप्रं क्षत्रियं च वैश्यं चापि चतुर्थकम् । तैलकारं पञ्चमं च लोहकारस्नुषां तथा ॥१४२॥
चर्मकारदुहितरं सप्तैतान्हि सुजीवितान् । दृष्ट्वा रामः समायातानात्मानं द्रष्टुमादरात् ॥१४३॥
तुतोष नितरां पत्न्या तैः सर्वैः संस्तुतो मुहुः । ततः संपूज्य तान् सर्वान् विससर्ज रघूद्वहः ॥१४४॥
तदा महोत्सवश्चासीदयोध्यायां समन्ततः । एवं नानाचरित्राणि चकार रघुनन्दनः ॥१४५॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे
यतिशूद्रगृध्रशिशूपाकरणं नाम दशमः सर्गः ॥१०॥


एकादशः सर्गः

( चार विप्रकन्याओंको रामका वरदान )

श्रीरामदास उवाच

अथैकदा रामचन्द्रो मृगयार्थं वनं ययौ । सीतया बन्धुभिः सैन्यैर्हस्त्यश्वरथपत्तिभिः ॥१॥
पश्यन् वनानि सर्वाणि मृगयारसिको भृशम् । कौतूहलसमाविष्ट आखेटव्यूहसंवृतः ॥२॥
उपानद्गूढपादश्च नीलोष्णीषी हरिच्छदः । नीलगोधांगुलित्राणो धनुष्पाणिः शरी नृपः ॥३॥
अश्वारूढः खङ्गचर्मधारी भूपै पदातिभिः । वेष्टितः कवची रामो विवेश गहनं वनम् ॥४॥
सीतया जालरन्ध्रैश्च वारं वारं निरीक्षितः । स रामो बन्धुवर्गैश्च पुत्राभ्यां नृपसत्तमैः ॥५॥
क्रीडां तदाऽकरोत्तत्र कुञ्जेषु मृगयन्मृगान् । इम्यतां इम्यतामेषो मृगो वेगात्पलायते ॥६॥
इति जल्पन् स्वभृत्येषु स्वयमुत्पत्य हन्ति च । गंधारेषु च रम्येषु वनेषु विपुलेषु च ॥७॥
उल्लङ्घितमहाश्रोता युवा पञ्चास्यविक्रमः । इतस्ततः पुनर्याति क्वचित्पश्यन् वनस्थलीम् ॥८॥

दण्ड देकर घोंसला उलूकको दे दिया और वहाँसे अपनी अयोध्या नगरीकी ओर चल पड़े। अयोध्यामें पहुँचे तो क्या देखा कि वहीं नाच-गान हो रहे हैं। ब्राह्मणका लड़का, मधुरपुरवाला ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तेली एवं लोहारकी पतोहू तथा चमारकी लड़की ये सब जीवित होकर रामके दर्शनोंको खड़े हैं। उनको जीवित देखकर सीता समेत राम अत्यन्त प्रसन्न हुए । वहाँ पहुँचे तो लोगोंने रामकी स्तुति की और रामने भी उनका सत्कार करके उनके ग्रामोंको भेज दिया। उस समय अयोध्या घरमें चारों ओर उत्सव ही उत्सव दीखता था। इस तरह राम अनेक प्रकारकी लीलायें करते रहते थे । १३६-१४५॥ इति श्रीमत्कोटिराम-चरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे दशमः सर्गः ॥१०॥

श्रीरामदास कहने लगे—इसके बहुत दिनों बाद रामचन्द्रजी एकसमय शिकार खेलनेके लिए सीता तथा भ्राताओं और बहुतसे हाथी-घोड़े आदिको साथ लेकर वनमें गये। मृगयाके आनन्दसे आनन्दित होकर वे बहुतसे वनोंको देखते हुए इधर-उधर घूम रहे थे। उस समय उनके साथ शिकार खेलनेवाले भीलोंका एक बहुत बड़ा दल था । रामचन्द्रजी जूता पहने थे, नीले रङ्गकी पगड़ी मस्तकपर बँधी थी हरे कपड़े पहने हुए थे और नीले ही रङ्गकी गोधांगुली उँगलियोंमें बँधी थी। हाथमें धनुष-बाण धारण किये थे, १-३॥ वे घोड़ेपर सवार थे, तलवार और ढाल बगलमें झूल रही थी। बहुतसे पैदल चलनेवाले राजे उनके साथ थे और उनके शरीर पर कवच पड़ा था। इस प्रकारका वेश धारण किये वे गहन वनमें जा पहुँचे। उस समय सीता पालकीकी खिड़कियोंसे रामकी ओर निहार रही थीं और रामचन्द्रजी अपने भ्राताओं और मित्रोंके साथ कुञ्जोंमें मृगोंको ढूँढ़ते हुए हर्षपूर्वक मृगया कर रहे थे। कभी-कभी 'मारो-मारो, यह मृग वेगसे भागा जा रहा है' इस प्रकार चिल्ला पड़ते । यदि कोई उसे मारनेको नहीं पहुंच पाता तो वे उसे स्वयं मार दिया करते थे। एक

सर्गः ११ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४५१

विटपोद्गीर्णसंस्वस्तलीनकेफिकुलाकुलाम् । हरिणीगणसन्त्रस्तां धावच्छायाददिश्रुताम् ॥९॥
क्वचित्केतच फूत्कारक्षिप्त गर्भावभीपनाम् । खड्गयूथैः क्वचिल्लक्ष्मीं दधानाभिव दन्तिनाम् ॥१०॥
क्वचित्कोटरमविशुक्रां नदत्पिनादिनाम् । मृग लिप्तमुदाभिमृदितां च क्वचित् क्वचित् ॥११॥
शार्दूलनखनिभिन्नरोहिद्रक्तारुणां क्वचित् । पायश्त्वङ्कभारानमुक्तिक्ष्मधविवाग्रजैः ॥१२॥
अवराधांग्लरोधाणि सुखपन्तीमिव क्वचित् । क्वचिदुवृक्षघमच्छायां वनपुष्पसुगन्धिनीम् ॥१३॥
क्वचिन्नागदशारमूमण्डलमवोरगाम् । सर्पनिःसुवनिर्मोकनागभीषणमण्डिताम् ॥१४॥
वृत्तस्याजगरं व्याप्तां क्वचिन्निर्मुक्तसर्पवीम् । क्वचिद्दावानलज्वालाशिग्वाद्याममहीरुहाम् ॥१५॥
ज्वलन्तिकुंजानिर्गच्छद्धरूपाश्रमसङ्कटाम् । व्यमुंचंस्तु शुनां यूथं शशकेषु कचित् कचित् ॥१६॥
पल्वलेषु च विश्रांतः पुनर्याति वनान्तरम् । ततो मध्याह्नसमये निवासं सरसस्तटे ।१७॥
कारयामास सेनायाः सीतायाश्च रघूत्तमः । स्वयं मृगद्वयोत्क्रीडामारभेटसुहृदंगतः ।१८॥
दूरस्थं मृगशरेण मुक्त्वा बाण जघान तान् एवं खेलति राजेंद्रै व्याघ्रगर्जं च वै द्विज ।१९॥
तत्र कोलाहलत्रस्तः पंचरभ्यो निर्गतो वनात् । स केसरी महावेगार्नाक्षाद्दष्ट्रा भयावहः ।२०॥
स्फुरद्दशममात्रौंतदुर्गममार्गमोहितः । कदाचिद्रगमासूढः कदाचिद्भूमिमाश्रितः ॥२१॥
न रयालश्यतां याति धन्विनां पृष्ठगामिनाम् । क्वचिद्दूरानिपथ याति दर्शनागोचरः क्वचित् ॥२२॥
वक्रमोद्योजितगंभीर कंटकीद्रुमसंकुलम् । शुकव्याघ्रममाकीर्ण पर्वतंञ्च भयंकरम् ॥२३॥
प्रविष्टो विषमरण्यं गमस्तस्य पदानुगः । दूरद्दूरं ततो गत्वा देशादेशं च निर्जनम् ॥२४॥

ठाठोंको छोड़कर दूसरेमें और दूसरेको छोड़कर तीसरेमें, इस तरह बार बार इधर उधर वनस्थलीमें दौड़ रहे थे ॥ ४-८ ॥ उस समय वही श्रृंगोपर रहनेवाले मयूरके परिवार भार दूषक वृक्षके शाखाम छिप जाने, हरिणियों चकित नत्राम इधर-उधर निवृत्त हुई भाग जाती, वनले जाब कालाहदृस त्रस्त होकर अपनी शौडसे निकल परन्त कही अपत्न विशम निकलकर सवपना फुफकार मारते थे ओर कश दौगुराकी भल्यन सनकर सुनाई देती थी। वही गेंडेके समान शोभाको धारण किये हुए हाथी भाव रहे थे, कही काटग्मे बेठे हुए तीन अनेक प्रकारकी बोलियां बोल रहे थे कही शरात्र पैशके निसान दिखाई देते थे ओर कही कियी सिंहके द्वारा मार गये हरिएाके रुधिरसे पृथ्वी रक्तवण हा गयी थी। कहीकी भूमि बड़े-बड़े स्तनोवाले भसांसे अन्त पुरके आंगनसदृश बाम सरला थी ओर कहीके पृथ्वी पन वृक्षाक छिपात छायामय्य हो गयी थी । कहीं वनपुष्योकी गानिपम यह स्थली सचगन्धयी हो रही थी और कही प्राकृतिक गैरिक स्तामण्डल बन गया था । उसपर जो भोरे मँडग रहे थे, वे उमक कारण सदृश जान पड़ते थे। कही मौर्यक शरीरसे आधा कवच छूटकर त्रिलक भूमपर लगी थी। इस प्रकार वडे वड सर्पोकी खिले दिखाई पड़ती थी । ९-१४। कहीं मुँह वाये हुए बड़े-बड़े अजगर हवं बैठे थे । कही सर्पोका केंचुवियां दिखायी देती थी । कहींपर दावानल लगनेके कारण जलते हुए निकुञ्जोमसे व्याघ्र पशू आदि बड़े-वड जन्तु निकल निकलकर भाग रहे थे। रामके सथ आये हुए शिकारी खरगोशांपर कुत्ते दौड़ा रहे थे। काई तलैया मिल जानपर वे लोग वहीं कुछ देर विश्राम करके आगे दूसरे वनमे चले जाते थे और मध्याह्नके समय किसी बड़े सरोवरपर सीता आदिके साथ आराम करते थे ॥ १५-१७॥ नौकर वहर उठकर फिर शिकारी लग जाने थे रामचन्द्रजी किसी भी मृगको देखकर उसके पीछे दौड़ पड़ते और उस बाणोंसे मार डालते थे। इस प्रकार रामचन्द्रजी मृगया कर ही रहे थे, तभो दूसरी ओरसे 'सिंह आया-सिंह आया' यह कोलाहल हान लगा। सिंह इसम ऊबकर और भी वेगस चला। उसके बड़े बड़े दाँत थे । देखनेमे वह बड़ा भयानक मालूम पड़ता था। वह बड़े भारी दुर्गम मार्गको त करता हुआ इन लोगोंकी ओर बढ़ता आ रहा था वह कभी छालां मारकर आकाशमार्गे चलता और कभी पृथ्वी-पर दौड़ता चलता था ॥ १८-२१॥ अतिशय वेगसे भागनेके कारण उसका पीछा करनेवाले लोग कभी उसे देख पाते थे-कभी नहीं इस तरह भागता हुआ वह एक ऐसे दुर्गम स्थानपर पहुँच गया, जहाँ एक टेढ़ा-

४६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११

एकाकी हयमारूढो विवेश गिरिगह्वरम् सर्व व्याधाश्च दूताश्च लक्ष्मणाद्याश्च बान्धवाः ॥२५॥
रामादर्शनमग्नांस्ता बभ्रमुस्त इतस्ततः। अथ रामः केसरीणं जघान निशितपत्रिणा ॥२६॥
ततः स दिव्यरूपेण नत्वा प्राह रघूत्तमम् । पुरा विद्याधरश्चाहं मया भुक्ता पतिव्रता ॥२७॥
मुनिपत्नी हठेनेव तया शप्तस्त्वहं क्रुधा। सिंहत्वन्निग्रहो यस्मान्मया मयि कृतोऽद्य हि ॥२८॥
अतस्त्वं मन्दिरात्सिंहा भवाग्रेऽथ महारने। तदा मया प्रार्थिता सा पुनर्मामाह राघव ॥२९॥
चिराद्रामशरस्पर्शाच्छापान्मुक्तिर्भवेत्तव । अतोऽद्य त्वच्छरस्पर्शाच्छापान्मुक्तश्चिरादहम् ॥३०॥
इत्युक्त्वा राममामन्त्र्य स स्वर्गं प्रययौ मुदा । ततः स रामचन्द्रोऽपि तुरगस्थो मुदान्वितः ॥३१॥
तत्र तस्थौ क्षणं यावद्यावत्तद्रिरिगह्वरे। गुहाद्वारे शिलामेकां ददर्श योजनायताम् ॥३२॥
महतीं तां शिलां दृष्ट्वा रामो विस्मितमानसः। धनुष्कोट्याऽक्षिपद्दूरं गुहायां प्रविवेश ह ॥३३॥
कियद्दूरं ततो गत्वाऽग्रे प्रकाशं ददर्श सः। तत्र द्रोण्यां पवनस्य तपस्यन्त्यः स्त्रियः प्रभुः ॥३४॥
ददर्श रामश्चतस्रः किंचिदन्तरसंस्थिताः । अस्थिचर्मावशिष्टैश्च देहैर्दृग्गोचरीकृताः ॥३५॥
घर्मैः सजीविताश्चेति ज्ञात्वाम्ना रघूत्तम. ॥३६।
निजरूपाणि चत्वारि कृत्वादौ तत्पुर स्थितः । अब्रवीन्मधुरं वाक्यं भिन्नरूपेण ताः पृथक् ॥३७॥
वरयध्वं वरान्नार्यः प्रसन्नोऽहं रघूत्तमः । ततस्ता रामसंस्पर्शान्मांसकादिधातुभिः । ३८।
पूरितानि शरीराणि ददृशुर्नयनैर्निजैः । श्रुत्वा तद्रामवाक्यं तास्तदा स्वपुरतोऽक्षिभिः ॥३९॥

मँदा नाला बह रहा था बहुतसे कँटीले वृक्षोंकी झाड़ियां इसके आसपास लगी थीं। आगे बांसके दरोंत-की दीवारें खड़ी थीं और झांड्य तथा व्याघ्र आदि हिंसक जीव उभय भरे पड़े थे। ऐसी अवस्थामें भी राम उसके पीछे-पीछे दौड़त चल जा रहे थे। उस समय रामचन्द्रजी अपने साथियोंसे बिछुड़कर बहुत दूर निर्जन वनमें उसके साथ निकल गये । अन्तमें वह सिंह पर्वतकी एक विशाल कन्दरामे घुस गया और रामचन्द्रजी भी घोड़ेपर चढ़े हुए उसके साथ कन्दरामे घुस गये । इधर रामके लक्ष्मणादि भ्राता, उनके दूत तथा शिकार खेलानेवाले बहलिये घबड़ाकर रामको इधर-उधर खोजने लगे। उसी समय रामने सिंहको एक विकराल बाणसे मारा ॥ २५-२६ ॥ तब वह एक दिव्य पुरुषके रूपमे परिणत हो और उनको प्रणाम करके कहने लगा हे राम मै पहिले विद्याधर था ; मैंने एक बार एक पतिव्रता मुनिपत्नीके साथ हठात् भोग किया। जिससे कुपित होकर उसने मुझे शाप दे दिया कि तूने सिंहके समान बरबस मेरी आबरू उतारी है, इसलिए मेरा बाण से तू व्याघ्र सिंह हो जा। इस प्रकार शाप का जानेपर मैने उससे विनती की तो उसने कहा कि बहुतसे बहुत दिनों बाद जब रामचन्द्रजी तुझे अपने बाणसे मारेंगे तब तू शरस्पर्श होते ही शापसे मुक्त हो जायगा। सो बहुत समय बाद आपकी दयासे मै आज उस शापसे मुक्त हो गया। इस तरह अपना पूर्ववृत्तान्त सुनानेके बाद उसने रामसे आज्ञा मांगी और अपने लोकको चला गया । रामचन्द्रजी अपने घोड़े-पर बैठे ही बैठे थोड़ी देर वहाँ ठहर हो उन्होने क्या देखा कि उस गुहाद्वारपर याजनो लम्बी चौड़ी एक शिला लगी हुई है। इतनी बड़ी शिला देखकर राम विस्मित हुए और अपने धनुषकी कोरसे उसे दूर हटा दिया । तब वे उसके भीतर घुसे । कुछ दूर आगे जानेपर उन्हे कुछ प्रकाश सा दिखायी पड़ा। और आगे बढ़े तो उन्होंने क्या देखा कि चार स्त्रियां तपस्या करती हुई बैठी हैं उनके शरीरमे हड्डी और चमड़ेके शिवाय मांसका नाम भी नहीं था। उनका श्वास चल रहा था। इससे उनको यह ज्ञात हुआ कि वे स्त्रियां अभी मरीं नहीं, प्रत्युत जीवित हैं। ऐसी अवस्थामें रामने अपना चार शरीर बनाया और सबके सम्मुख जाकर कहने लगे - 'हे नारियों! तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मांग लो। मै राम तुम लोगोंको तपस्या-से प्रसन्न हूं।' इसके अनन्तर रामने अपने हाथो उनके शरीरका स्पर्श किया । जिससे उनकी सूखी देहमे रक्त-मांसादिका संचार हो गया ॥ २७-३८ ॥ शरीर भर जानेपर उन सबोने अपने नेत्रोसे रामको देखा । उस समय प्रत्येक स्त्रीके सामनेवाले राम कोटि सूर्यकी दीप्तिके समान देदीप्यमान