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सर्वकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 811 में से

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पृष्ठ 194

१७८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

ताम्बूलं दक्षिणां दत्त्वा नानाविधंन्नृप आदरात् । मुखशुद्धिं स्वयं कृत्वा तस्थौ सिंहासने पुनः ॥५४॥
श्रुत्वा शास्त्रपुराणानि वेदान्तांश्चापि सादरम् । सायंसन्ध्यादिकं कृत्वा कृत्वा होमं यथाविधि ॥५५॥
सिंहासने समासीनो वेश्यानां नृत्यमुत्तमम् । पश्यन् शृण्वन् गायनं च नीत्वा यामद्वयं निशाम् ५७
ततः सुष्वाप पर्यङ्के सीतया सह राघवः । द्वितीय दिवसे तत्र स्थित्वा रमान्नु कौतुकैः ॥५८॥
नीत्वा समग्रं सुदिनं तृतीये दिवसे पुनः । पूर्ववद्ब्राह्मणोयाद्यैः शनैः स्थानान्तरं ययौ । ५९॥
क्वचिद्दिनमतिक्रम्य क्वचिद्द्वे त्रीणि राघवः । स्थित्वा पश्यन्कौतुकानि प्रीणन् जनकात्मजाम्६०॥
शनैः शनैर्ययौ मार्गं मासेनैकेन राघवः । प्राप जीर्णं मुद्रलेन त्यक्तमाश्रममुत्तमम् । ६१।
राममागतमाज्ञाय मुद्गलो नूतनाश्रमात् । भागीरथ्या दक्षिणतः प्राप रामांतिकं तदा । ६२.।
तं दृष्ट्वा राघवश्चापि नत्वा सम्पूज्य सादरम् । रामोगेहे समारोप्य पप्रच्छ विनयान्मुनिम् । ६३॥
त्वयाऽयमाश्रमस्त्यक्तः किमर्थं मुनिसत्तम । तत्त्वं वद महाभाग यथावच्च मयिस्तरम् ॥६४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा मुद्गलो वाक्यमब्रवीत् । अद्य धन्योऽस्म्यहं राम निवृत्तं वनवासतः । ६५।
यत्त्वां पश्यामि नेत्राभ्यां चिरकालेन राघव । भरतप्राणरक्षार्थं यदा नीता मदाश्रमात् ॥६६॥
दिव्यौषध्यस्तदा जातं पूर्वं ते दर्शनं मम । मयाऽयमाश्रमन्त्यक्तः किमर्थं तद्व्रवीमि ते ॥६७॥
सान्निध्य नात्र गङ्गायाः सरय्वा अपि नात्र वै । इति मत्वा मया त्यक्तश्चाश्रमोऽयं महत्तमः ॥६८॥
अत्र सिद्धिं गताः पूर्वे शतशोऽथ सहस्रशः । मुनीश्वरा मयाप्यत्र तपस्तप्तं कियदिमम् ॥६९॥
इति राम मयाख्यातमाश्रमस्य च मोचने । कारणं च त्वया पृष्टं किमग्रे श्रोतुमिच्छसि । ७०॥

तथा मित्रोंके साथ बैठकर रामने घृतमिश्रित नाना प्रकारक स्वादिष्ट पकवानोंका भोजन किया । ५४॥
आदरस ब्राह्मणोंको ताम्बूल तथा अनेक प्रकारकी दक्षिणार देकर रामने मुखशुद्धिक लिए ताम्बूल खाया
और पुनः सिंहासनपर आ विराज । ५५॥ तदनन्तर वेदान्त आदि सत् शास्त्रों तथा पुराणोंकी कथाको
प्रेम और श्रद्धासे शान्तिपूर्वक सुना । सायंकाल होनेपर पुन यथाविधि संध्यावंदन तथा हवन
आदिस निवृत्त होकर सिंहासनपर आ सुशोभित हुए । वहां रात्रिके दो पहर तक वेश्याओंका नृत्य-गान
देखत सुनते रहे ॥ ५६ ॥ ५७॥ तदनन्तर राम सीताके साथ पलंगपर शयन करनेको चले गये दूसरा
भी सारा दिन रामने आनन्दसे वही रहकर विताया तीसरे दिन मानन्द ब्राह्मणोंके साथ धीरेधीरे
दूसरे पडावकी ओर बड़े ॥ ५८ । ५९ ॥ इसी प्रकार कहीं एक दिन, कहीं दो और कहीं तीन दिन तक निवास
करत हुए गम जानकी को प्रसन्न करने तथा विविध कौतुकोंको देखते रहे ॥ ६० । इस प्रकार एक मास
चीत जानेपर वे मुद्गल ऋषिके छोड़ हुए एक पुराने तथा पवित्र आश्रमम जा पहुँचे ॥ ६१ ॥ रामको अपने
पुराने आश्रमपर आये सुनकर मुद्गलऋषि भागीरथीके दक्षिण तटपर स्थित अपने नवीन आश्रमसे दर्शन
करनेके लिए उनके पास आये ॥ ६२ ॥ राघवने उन्हें देखकर नमस्कार किया और उनकी विधिवत् पूजा की।
पश्चात् ताम्बूल देकर आदरपूर्वक आसनपर बैठाया और उनसे नम्रतापूर्वक कहा- । ६३॥ हे मुनिश्रेष्ठ !
आपने इस आश्रमको क्यों छोड़ दिया ? हे महाभाग इसका कारण विस्तारसे आप हम कह सुन इयं
। ६४॥ यह सुनकर मुद्गल्मुनि कहने लगे- हे राम ! मेरा धन्य भाग्य है कि जो मैं आज बहुत दिनां बाद
वनवाससे लौट हुए आपको अपनी आंखों देख रहा हूँ । पूर्वकालमें भरतके प्राणोंकी रक्षा करनेके लिए जब
आप मेरे आश्रमम दिव्य औषधि ले गये थे, तब मुझे आपका दर्शन मिला था । अब मैने इस आश्रमको
क्यों छोड़ दिया, इसका कारण आपसे कहता हूँ । ६५-६७॥ हे प्रभो ! मैनें इस विशाल आश्रमका केवल
इसलिए छोड़ दिया है कि यहाँपर गंगा अथवा सरयू इन दोनों पवित्र नदियोंमेसे कोई भी नदी नहीं
है ॥ ६८॥ इस आश्रमम निवास करके हजारों मुनीश्वरोंने सिद्धि प्राप्त की है और मैंने भी कुछ दिनों
तक यहाँ रहकर तपस्या की है । परन्तु क्या करें, किसी तीर्थके न होनेसे इस स्थानपर बड़ा
कष्ट है ॥ ६९॥ हे राम ! यह तो मैंने आपके पूछनेके अनुसार इस आश्रमको छोड़नेका कारण कह