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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गो १ ] मनोहरकाण्डम् ५६५

सर्गो १ ] मनोहरकाण्डम् ५६५

एवं ज्ञात्वा गताज्ञाना मुमोच निगळं सदा । ततः स्मितवदना प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् ॥७२॥
लब्धं ज्ञानं मया वत्स नय मां राघवं प्रति । इति तस्या वचः श्रुत्वा हृष्टो ज्ञानान्वितोऽब्रवीत् ॥७३॥
दन्तान्दोलनवेगाच्चाऽऽरुह्य नगरीं प्रति । कैकेयीमन्वथाद्यापि योषिद्देहं विवेश सा ॥७४॥
तत्र दृष्ट्वा समासीनं सीतया राघवाननम् । बहुपर्यटनं शास्तिरिति चित्रेऽर्थाद् कारेण हि ॥७५॥
माताऽऽरघुनादर्शं पश्यन् राममुनीश्वराः । ततो नत्वा पाद्या दत्वा कैकेयी वाक्यमब्रवीत् ॥७६॥
राम ते कृपया लब्धमेतज्ज्ञानमनिन्दितम् । उपदेशेन ते रामो मे ह्यदर्शनो न प्रयोजनम् ॥७७॥
उपदेशेन ते राम मया मुक्ताऽखिलं यथा । ततस्या वचनं श्रुत्वा मन्दस्मितं प्रहसन् विभुः ॥७८॥
कथं ज्ञानं त्वया जातं विचार्य वद मां कुरु । तस्याः स्मितैरेषां जन्म कुत्र कैकेयि ॥८०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा कैकेयी प्राह राघवम् । शृणु राम यथ लब्धं ज्ञानं तव वदाम्यहम् ॥८१॥
मयाऽविवचनान्मेषं तत्रारोपितुमेषिणी । श्रुत्वा मे मे स्थितो मेषा हृदये मतिरितं क्षमम् ॥८२॥
मे मे त्विति ममेत्यत्र श्रावयन्ति मुहुर्मुहुः । मुञ्च मे मे त्विति वदा त्वेषाऽप्यन्धिर्न च मया ॥८३॥
मे मे प्रकथनेने नित्यं पशुपुत्रगृहादिषु । मनो वस्तु नोपवेशाय मामताभिरुच्यते ॥८४॥
सर्वस्वं चोपदंशोऽथ निष्पेथे मा प्रकीर्त्यते । इतोऽहं न कदा मे मे प्रमदामन्त्रनं परम् ॥८५॥
मे माता मे सुतश्चायं मे बंधुश्च गृहं वरम् । मे राज्यं मे मान्यताय मे सर्वम्परगृहस्त्वयम् ॥८६॥
मे शरीरमिदं कांतं मे दिव्याभरणं वरम् । मे मेषा प्रिया दासी पुत्रादीन्यशुभा मतिः ॥८७॥
याऽहंश्व मे म निक्षिप्ता त्यक्तुनेति मानता । बोधयामासुर्भवन्तः स्वार्थैः स्पष्टं शृणुत्वम ॥८८॥
अन्येषाम नराणांस्त्रीणाञ्चायो बोधयति हि । मेमेबुद्ध्या मदाऽहंमाप्तिःपुत्रजन्मनि वर्तितम् ॥८९॥
देहस्त्वतो ह्यलँम्भी सुधर्मामम मतिस्तु मा । सर्वतः माऽत्र त्यक्तव्या नांगीकार्या कदाचन ॥९०॥

है। इसके बाद उसने आँख बन्द कर ली और घड़ी भर तक गौर करके सोचने लगी ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ उसका सारा मन्द ज्ञान ही नष्ट होकर वह बहुत प्रसन्न हुई और पुलकित होकर लक्ष्मणसे कहा- वत्स ! मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया। अब रामके पास ले चलो। उन्होंने पालकी पर बैठाकर कैकेयीको विदा कर दिया ॥७३॥ ७४॥ दूरपर बैठे हुए रथियोंने जोरसे घुमाया और नगरके भीतर पहुँचाया। कैकेयीको सीताके महलोंमें पहुँचा दिया और वह भीतर चला गया । उसने वहाँ पहुँचकर कैकेयीने देखा कि राम सीताके पास बैठे हुए सिरपर एक विचित्र प्रकारकी दाढ़ी बांध रहे हैं ॥ ७५ ॥ मोका हाथमें लेकर मुनि देख रहे हैं, और राम अपना मुखकमल देख लाजा रहे हैं। कैकेयीने पहुंचकर हाथ जोड़े प्रणाम किया और कहने लगी- ॥ ७६ ॥ हे राम ! आपकी कृपासे मैंने भेड़ोंके वाक्यों द्वारा यह ज्ञान प्राप्त कर लिया है अतः मुझे अब आपके उपदेशकी आवश्यकता नहीं रही। हे राघव ! मैं सब बंधनोंसे मुक्त हो गई। इस प्रकार कैकेयीकी बात सुनकर मुस्कुराते हुए राम बोले- ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ तुमने ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ ? यह सारा वृत्तान्त मुझे बतलाओ ॥ ८० ॥ रामके इस प्रश्नको सुनकर कैकेयीने कहा- हे राम ! मुझे दुर्बुद्धिका त्यागकर ज्ञान प्राप्त हुआ है, सो सुनाती हूँ ॥ ८१ ॥ उस मेढ़ेके समूहके पास पहुंचकर मैंने उन बकरोंके मुँहसे निकले हुए "मे मे" का शब्द सुना। फिर थोड़ी देर तक हृदयमें विचार किया। तब मैंने विचार किया कि वे "मे-मे" करके मुझे यह सुनाती हैं कि संसारके लोग जो सर्वदा अपने बालबच्चों, घरद्वार, पशु आदिमें 'यह मेरा-यह मेरा है' ऐसी बुद्धिके भ्रममें पड़कर अपना सर्वस्व नष्ट कर डालते हैं। यह ठीक है, इसलिए हे राम ! अवसं मैं इस ममताके बन्धनमें कभी भी नहीं पडूँगी ॥ ८२-८५ ॥ अभी तक ता मे-यह यह भाई है, यह मेरा सुन्दर घर है, यह मेरा राज्य है, यह मेरी सौत है, यह सौतेला लड़का है, यह सुन्दर शरीर है, ये दिव्य मेरे अलंकार हैं, यह मेरी प्रिय दासी मन्थरा है, ये सब बन्धन हैं ऐसी ममताके कारण यह सब हुआ था। इसके लिए उन भेड़ोंने मुझे स्पष्ट उपदेश दिया है कि ममता त्याग दो ॥ ८६-८८ ॥ यह उपदेश देकर वे संसारके अन्यान्य लोगोंको भी ये यही उपदेश देती रहती हैं कि पूर्वजन्मकी ममतावुद्धिने ही मुझे इस दशामें पहुँचाया है और यह भेड़का शरीर मिला है। अतएव तुम

५६६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २

मेमेमत्या बहिर्जाता चाऽस्माकं सकला जनाः। मेमेबुद्धिगता ह्येषुत्वां गतिः सैव भविष्यति ॥९१॥
एवं तो बोधयन्त्यत्र जनान्प्रत्यवचोभिः सदा। न तद्वाक्यं जनैर्बुद्ध्या कदा चित्ते विचार्यते ॥९२॥
तासां वाक्यौघदाहेन प्रनष्टा मेमतेः स्मरा। मेमेबुद्धिर्गता प्रत्यक्सोऽहं मुक्तोऽस्म्यहं न्विह ॥९३॥
मे देहोऽस्तिति संबुद्धेर्यत् मनः संप्रदाह तदा कि शेषमत्र्यत्र संसारे दुःखदायके ॥९४॥
अस्त्वद्य वाऽद्य यातु देहः सोऽस्त्वस्तु न । कः पुत्रः कस्य को भ्राता सर्वं ब्रह्म न संशयः ॥९५॥
अहमेवं परं ब्रह्म मनो मत्परं न हि। यत् यदुच्यते चेदं मायैषा तव राघव ॥९६॥
नश्वरां बुद्बुदाकारं ज्ञानं चेदं सदा प्रभो । इत्येवं वचः श्रुत्वा श्रीरामः प्राह सस्मितः ॥९७॥
सम्यग् विचारितं बुद्ध्या त्वयाऽपि भवनाशनम् । गच्छेतानीं सुखं गेहे जीवन्मुक्ताऽधुना ह्यसि ॥९८॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा कैकेयी तोषमागता। देहाभिमानहीना सा नत्वा सीतां रघूत्तमम् ॥९९॥
ययौ भरतगेहे हि नामक्ता क्वापि मानव्रते । एवं शिष्य मया प्रोक्तमवियाक्योपदेशतः ॥१००॥
यथा ज्ञानं हि कैकेय्यै ज्ञातं तल्लिखितं तव । इदानीं शृणु यच्चान्यत्ते वदामि कुतूहलम् ॥१०१॥
सुमित्रा त्वेकदा रामं सीतया रहसि स्थितम् । विलोक्य नत्वा तं प्राह राम राजीवलोचन ॥१०२॥
किंचिते प्रार्थयाम्यद्य किंचिदुपदिशस्व माम् । तस्या वचनं श्रुत्वा तामाह रघुनन्दनः ॥१०३॥
का त्वं चेति वदाग्रे मां पश्चादुपदिशामि ते । गच्छ गेहं स्वस्थ्यबुद्ध्या हृदि सम्यग्विचार्य च ॥१०४॥
श्वो मामेत्य मम प्रश्नस्योत्तरं देहि वै ततः। महदुपदेशमास्येऽद्य येन तुष्टा भविष्यसि ॥१०५॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सुमित्रा विस्मितानना। तूष्णीमेव ययौ गेहं रामवाक्यं व्यचिन्तयत् ॥१०६॥
काऽहं पृष्टा राघवेण किं वा देयं मयोत्तरम् । काऽहं देवी चामुता वा मानवी राक्षसी तथा ॥१०७॥
मानुषी चेत्पदं मत्वा यदि रामं वदामि वै। तर्हि नानादुरीराणि ध्रियन्ते नटवन्मया ॥१०८॥


छोड़ना चाहिए कि इस ममताका परित्याग कर दें, इसका आधार बर्त्ताव करें ॥ ९० ॥ ९०॥ 'यह मेरा है' इस बुद्धिमें पड़ने कि प्राप्त सङ्कटा जो गति हमारी हुई है वही गति तुम्हारी भी होगी ॥ ९१ ॥ अपनी वचनोंसे वे सबदा सब लोगोंको उपदेश देती रहती है। किन्तु संसारी लोग उनका बातोंपर विचार नहीं करते ॥ ९२ ॥ हे राघव ! आपको कृपा और उन बातोंके सदृश मेरा ममतामोह नष्ट हो गया है। इसलिए अब मैं मुक्त हो गयी हूँ ॥ ९३ ॥ 'यह देह मेरा है' इस अवस्था में आमत्व था। वह दम्भदायिनी भ्रान्ति नष्ट हो गयी तब और रह ही क्या गया है। यहां कौन किसका बेटा है, कौन किसकी माता है? सब सच्चिदानन्दमय ब्रह्मका रूप है। इसमें न संशय नहीं है। ९४-९५ ॥ यह जो प्रकष्ट है। मुझमें दरे कुछ है ही नहीं। हे राघव ! संसारमें जो कुछ दिखायी पड़ रहा है, वह सब तुम्हारा माया है। ९६ ॥ मैंने इस अध्रुव शरीरको पानीके बुलबुलेकी तरह नश्वर समझ लिया है। इस प्रकार कैकेयीकी बात सुनकर मुस्कराते हुए राम बोले - ॥ ९७ ॥ ठीक है, तुमने भेदोंकी बातपर बहुत अच्छा विचार किया है। अब जाओ और सुखसे अपने घरमें बैठो। हे कैकेयी ! अब तुम जीवन्मुक्त हो गयी हो ॥ ९८ ॥ रामका ज्ञान सुनकर प्रसन्न मन कैकेयी देहाभिमानसे रहित होकर सीता तथा रामको प्रणाम करके अपने बेटे भरतके भवनमें चली गयी और तबसे वह किसी वस्तुमें आसक्त नहीं हुई। इस प्रकार ब्रह्माकी बातसे कैकेयीको जिस तरह ज्ञान प्राप्त हुआ था, सो वृत्तांत कह सुनाया। अब मैं तुम्हें एक और कुतूहल भरा वृत्तांत सुनाता हूँ। ९९-१०१ । एक दिन राम सीताके साथ किसी एकान्त स्थानमे बैठे थे। तब तक सुमित्रा वहाँ आ पहुंची और कहने लगीं हे राजीवलोचन राम ! मै तुमसे विनय करती हूँ कि मुझे भी कुछ उपदेश दे दो। उसकी बात सुनकर रामने कहा- पहले मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो? अपने घर जाओ और स्वस्थबुद्धिसे विचार करके कल मेरे पास आकर बताओ। उस समय मै तुम्हें ऐसा उपदेश दूंगा, जिससे तुम बहुत प्रसन्न होओगी ॥ १०२-१०५ ॥ इस तरह रामका आदेश सुनकर वह आश्चर्य भरे मनसे उसी बातको सोचती हुई चुपचाप चली गयीं ॥ १०६ ॥ वह सोचने लगी कि