श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः २ ] गद्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९३
सर्गः २ ] गद्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३९३
संदेहोऽनेन मे जातः स्तन्वङ्गः कथं भुवि । अयोध्यायां रामगेहे स्वर्गलोकान्समागतः ॥ २ ॥
प्रभो मे संशयं छिन्धि कृपां कृत्वा ममोपरि ।
सम्यक् पृष्टं विष्णुदास सावधानमनाः शृणु ॥ ३ ॥
एकदा राघवं द्रष्टुं दुर्वासा मुनिरभ्यगात् । शिष्यैः परिवृतस्तैश्च वेष्टितोऽचिन्तयत्पथि ॥ ४ ॥
विष्णुर्मनुजरूपेण रामो जातोऽत्र संशयम् । तथापि लोकान् रामस्य दर्शयिष्यामि पौरुषम् ॥ ५ ॥
एवं निश्चित्य साकेते मुनिः शिष्यैर्विबेश ह । विसृज्य सोऽष्टकक्षांस्तैः सीतागेहं ययौ मुनिः ॥ ६ ॥
सीतागेहे महत्द्वारप्रसंस्थितं मुनिपुङ्गवम् । दुर्वाससं शिष्ययुक्तं दृष्ट्वा वै वेत्रपाणयः ॥ ७ ॥
शीघ्रं निवेदयामासुर्दुर्व्यासां रामं रहः स्थितम् । रामोऽपि श्रुत्वा संप्राप्तं मुनिं प्रत्युज्जगाम सः ॥ ८ ॥
नत्वा चानाययामास सय ह्यासनमर्पयत् । एतस्मिन्नन्तरे रामं तिष्ठन्तं मुनिसत्तमः ॥ ९ ॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं शिष्यैः सर्वत्र वेष्टितः । अद्य वर्षसहस्राणामुपवाससमापनम् ॥ १०॥
अतो भोजनमिच्छामि हविष्यान्नलहैर्विना सिद्धमन्नं मुहूर्तेन सशिष्याय समर्पय ॥११॥
मम मनोरभिलषितं नानापक्वान्नसंयुतम् । तथा शंकूरुजनार्थे हि शम्भोः पुष्पाणि मे नरैः ॥१२॥
अदृष्टान्यन्यवस्त्राद्य गाहंश्चयं चेत्प्रयच्छसि । नोचेन्नाहं समर्थोऽस्मीत्युक्त्वा मां त्वं विसर्जये ॥१३॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा विहस्य रघुनन्दनः । सर्वमङ्गीकृतं चेति विनयेनाब्रवीन्मुनिम् ॥१४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तुष्टोऽभून् मुनिपुङ्गवात् । स्नात्वा सरय्वां शीघ्रन्याम गच्छामि त्वरं कुरु ॥१५॥
मदुक्तं सफलं कर्तुं सिद्धं कार्यश्च जानकी । तथेत्युक्त्वा भुवि रामः स्नानाथं तं व्यसर्जयत् ॥१६॥
तदा ते लक्ष्मणाद्याश्च बंधवो जानकी तथा । कुश या बालकाः सर्वे तेऽभूवन् भयविह्वलाः ॥१७॥
स्पर्शनामित धोयोपर बैठे हुए अनशनका व्यान करें ॥ १ ॥ सो सुनकर मुझे यह संदेह हो रहा है कि कल्प-वृक्ष स्वर्गलोकसे रामचन्द्रजीके भवनमें कैसे आया। मुझपर कृपा करके आप इस संशयका निवारण कीजिये। श्रीशेषदासजीने कहा—हे विष्णुदास तुमने बहुत अच्छी बात पूछा है। सावधान होकर सुनो ॥ २॥ ३॥ एक बार रामचन्द्रजीका दर्शन करनेके लिये सहस्र हजार शिष्योंस परिवेष्टित दुर्वासा मुनि अयोध्याको जा रहे थे। रास्तेमं जात-जात दुर्वासान सब कि स्वयं विष्णुभगवान् मनुष्यका रूप धारण करके यतारण आये हैं यह मैं जानता हूँ। फिर भी आज मगरके साधारण मनुष्योंको मैं उनका पौरुष दिख-लाऊंगा ॥ ४ ॥ ५ ॥ ऐसा निश्चय करके व अपन शिष्याँके साथ अयोध्या नगरीमं प्रविष्ट हुए और सबकी सथ लिये हुए आठ चौक लांघकर सीताके भवनमे जा पहुंचे ॥ ६ ॥ सीताक विशाल द्वारपर शिष्यों समेत आये हुए दुर्वासा को देखकर दण्डायोंने तुरन्त रामचन्द्रजीको खबर दी। यह समाचार सुनते ही भगवान् दुर्वासा मुनिक पास आ पहुंचे। उन्हें प्रणाम किया और सबको बड़े आदर समेत भवनके भीतर ले गये। वहाँ बैठनेके लिये उन्हें सुन्दर आसन दिया। उससमय बैठे हुए दुर्वासानि बड़े मधुर वाणीमं रामचन्द्रजीसे कहा महाराज ! आज एक हजार वर्षका मेरा उपवासव्रत पूरा हुआ है। इस कारण मेरे शिष्योंके साथ मुझे भोजन चाहिए। इसके लिये आपको केवल एक मुहूर्तका समय मिलेगा और वह भोजन मणि, कामधेनु तथा अग्निकी सहा-यतासे न तैयार किया जाय। बस, एक मुहूर्तमें इस मग इच्छाके अनुकूल भोजन मिले, जिसमं विविध प्रकार-के पक्वान्न सम्मिलित हों। यदि इस बपना दुर्भास्कर बने रहना चाहते होगे तो शिवजीकी पूजाके निमित्त मुझे ऐसे फूल मँगवा दो, जिन्हें अबतक किसीने न देखा हो। यदि ऐसा न कर सकत हो तो साफ साफ कह दो कि मैं ऐसा काममें असमर्थ हूँ। यह कहकर मुझे विदा कर दो। ७-१३॥ मुनिकी बातोंको सुनकर मुसकाते हुए राम नम्रता पूर्वक बोले-"मुझे सब कुछ अंगीकार है" ॥ १४॥ रामकी बातस प्रसन्न होकर दुर्वासान कहा कि मैं शीघ्र सरयूम स्नान करके आता हूं ॥१५। हमारे कथनानुसार सब चीजोंकी तैयारीके लिए अपने भ्राताओं तथा सीताको भी शीघ्रताके लिए कह दया। 'अच्छा' कहकर रामचन्द्रजाने दुर्वासाको स्नान करनेके लिये
| ३९४ | आनन्दरामायणे | [सर्गः २] |
|---|
ऊचुः परस्परं सर्वे रामन्यस्तेक्षणाः शनैः। किं याचितं हि मुनिना किं रामोऽग्रे करिष्यति ॥१८॥
विना गोवह्निमणिभिः कथमन्नं प्रदास्यति । ततो गते मुनौ रामः पत्रं सौमित्रिणा तदा ॥१९॥
विलिख्य बद्ध्वा बाणे तन्मुमोच शरमुत्तमम् । स शरो वायुवेगेन शीघ्रं गत्वाऽमरावतीम् ॥२०॥
सुधर्मायां सुरैर्युक्तस्येन्द्रस्याग्रे पपात ह । तं शरं सहसा दृष्ट्वा चकितो भयविह्वलः ॥२१॥
कस्यायमिति चोक्त्वा तद्बाणनाम व्यलोकयत् । सुवर्णाङ्कितं बाणपुच्छस्थं पापदारकम् २२॥
ततो ज्ञात्वा राघवस्य शूरोऽयमिति देवराट् । तस्मिन्ग्रन्थं विमुच्याथ पत्रं नत्वा पपाठ च ॥२३॥
एतस्मिन्नन्तरे बाणः पुन श्रीराघवं ययौ । त्रिदशं समनुज्ञाप्य पूर्वस्तूणीगतोऽभवत् ॥२४॥
मघवाऽपि सुधर्मायां श्रावयामास निर्जरान् । राममुद्राङ्कितं पत्रं भयाद्विस्मयसंयुतः ॥२५॥
मघवंस्त्वं सुखं तिष्ठ स्वर्गेऽहं त्वां सदा स्मरे । मन्नियोगं शृणुष्वाथ याचितोऽस्म्यधुना त्वहम् ॥२६॥
विना गोवह्निमणिभिरन्नं शिष्यैर्युतेन च । वरैः षष्टिसहस्रैश्च तथाऽन्यैर्मुनिसत्तमैः ॥२७॥
सहस्राब्दक्षुधितेन क्रोधिनाऽतितपस्विना । दुर्वाससा मुहूर्त्तात्तु मध्यात्त्वंगीकृतं हि तत् ॥२८॥
याचितान्यपि पुष्पाणि तेनादृष्टानि मानवैः । मयाङ्गीकृत्य सकलं स्नानार्थं ते विसर्जिताः ॥२९॥
अतः शीघ्रं कल्पवृक्षपारिजातौ समुद्रजौ । प्रेषयस्व क्षणान्मां त्वमादरात्स्वेन सादरम् ॥३०॥
मा रावणशिरश्छेत्तुः प्रतीक्षां त्वामिषोः कुरु। एवं संश्राव्य तद्यन्त्रं सुरेन्द्रः सुरैः सह ॥३१॥
समभ्याय कल्पवृक्षपारिजातौ विबुद्धमः । विमानेन सुरैर्युक्तः श्रीरामाग्रं ययौ ॥३२॥
इन्द्रागमनमाज्ञाय तं प्रत्युद्गम्य लक्ष्मणः। प्रायोध्यायां विनायेन्द्रं सभास्थं रघुनन्दनम् ३३॥
कल्पवृक्षपारिजातौ मधवा रघुनन्दनम् । समर्प्य नत्वा श्रीरामं स उपाविशदासने ॥३४॥
एतस्मिन्नन्तरे शिष्यं दुर्वासा मुनिरब्रवीत् । गत्वा त्वं पश्य रामं तु किं करोत्यधुना गृहे ॥३५॥
भेज दिया ॥ १८ ॥ इधर लक्ष्मणादिक भ्राता, जानकी और सभासद् आदि भयके मारे सब भयभीत हो गये और वे रामकी ओर निर्निमेष दृष्टिसे देखते हुए अपने मनमें कहने लगे कि मुनिने बड़ी अद्भुत वस्तुएँ मांगी हैं। देखें, राम अब क्या करते हैं। बिना गौ, मणि तथा अग्निके किस प्रकार भोजन तैयार करके देते हैं ॥१७-१८॥ मुनिके चले जानेपर रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे एक पत्र लिखवाया। उसे बाणके सामने बाँध कर धनुषपर चढ़ाया और छोड़ दिया। वह बाण वायुके समान वेगसे अमरावतीपुरीमें जाकर सुधर्मा नामकी देवसभामें इन्द्रके सामने गिरा। उस बाणको इन्द्रने देखा तो वे चकित होकर बोले ॥१९-२०॥ 'यह बाण किसका है !' यह कहकर उसपर लिखे रामके नामको देखा और पत्र संभालकर पढ़ा। पत्र से जान गया बाण वहाँसे फिर रामजीके तूणीरमें लौट आया । २१-२४॥ भय और विस्मय युक्त इन्द्रने वह पत्र सभामे बैठे हुए देवताओंको सुनाया। २५। उस पत्रपर लिखा था—'हे इन्द्र तुम स्वर्गमें सुखी रहो। मैं सदा तुम्हारा स्मरण किया करता हूँ। हाँ, इस समय तुमसे सहाय मांगा दे रहा हूँ। आज एक हजार वर्षके भूखे एवं उग्र क्रोधी दुर्वासा मुनि अपने साठ हजार अच्छे शिष्योंके साथ मेरे यहाँ आये हुए हैं वे ऐसा भोजन चाहते हैं कि जो गौ, मणि अथवा अग्निके द्वारा न बना हो। साथ ही उन्होंने शिवपूजनके लिए ऐसे फूल मांगे हैं, जिन्हें अबतक मनुष्योंने न देखा हो। मैंने उनकी गति स्वीकार करली है इस समय मैंने उन्हें स्नान करनेको भेज दिया है । २६-२९॥ इससे तुम सत्वर कल्पवृक्ष और पारिजात, जो कि क्षीरसागरमें निकले हैं, क्षणभरमें आदरपूर्वक मेरे पास भेज दी। ३०। देखो, कहीं रावणका विनाश करनेवाले मेरे बाणकी प्रतीक्षा न करने लगना,' इस प्रकार वह पत्र देवताओं को सुनाकर इन्द्रदेव गुरुके सबने साथ मन्त्रणा करके कल्पवृक्ष और पारिजात ले तथा देवताओंके समेत विमानपर चढ़कर अयोध्यापुरीमें जा पहुँचे ॥ ३१-३२॥ लक्ष्मणने जब यह जाना कि देवराज इन्द्र आ गये हैं तो उनके पास गये और आदरपूर्वक अयोध्यामें रामके पास ले आये ॥ ३३ ॥ इन्द्रने पारिजात तथा कल्पवृक्ष रामको अर्पण करके प्रणाम किया। फिर एक